Thursday, April 30, 2020

स्वर्णाकर्षण भैरव मंत्र साधना-







स्वर्णाकर्षण भैरव मंत्र साधना-


यह साधना विशेष रूप से स्वर्ण की प्राप्ति कराती है। रसकर्म(पारद बंधन) की आधारभूत साधनाओं में से यह एक साधना है। इसके माध्यम से स्वर्ण बनाने की प्रक्रिया का ज्ञान साधक को हो जाता है और पारे को बांधने की क्रिया का भी ज्ञान हो जाता है।

विशेषः 

इस साधना के बाद ही साधक में ऐसी पात्रता आ जाती है कि वह किसी भी यंत्रमालादि व मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण प्रामाणिकता के साथ कर सकता है।
इस साधना के अन्तर्गत ३ बिन्दु हैं-    
           
स्वर्णाकर्षण भैरव मंत्र-

 इस मंत्र के १,२५,००० जप के तीन अनुष्ठान करने चाहिए। प्रत्येक अनुष्ठान ४० दिनों में सम्पन्न करें। दशांश हवन, तर्पण व मार्जन करें। कुंवारी कन्याओं जो २-१० वर्ष की हों, को भोजन दक्षिणादि प्रदान करें। यह कर्म भी तीनों अनुष्ठानों में अनिवार्य है।

स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र- इस स्तोत्र के अनुष्ठान काल में हि तीनों कालों में (प्रातः, मध्याह्न, सायं) १०-१० पाठ करें। प्रत्येक अनुष्ठान काल के बाद कुछ अन्तराल आप रख सकते हैं। परन्तु इस अन्तराल में इस स्तोत्र के पाठ आप करते रहेंगे। स्तोत्र पाठ तीनों अनुष्ठानों के अन्तिम दिन तक अनवरत चलता रहेगा।

स्वर्णाकर्षण भैरव रसकर्मसिद्धि स्तोत्र- प्रथम दोनों क्रियाओं के बाद आप इस स्तोत्र के नित्य १०८ पाठ कुल ४० दिनों तक करें।

इन साधनाओं के लिये आवश्यक सामग्रीः

१. स्वर्णाकर्षण भैरव यंत्र २. स्वर्णसिद्धि यंत्र ३. रुद्राक्ष माला (या पीली हकीक माला)।    
                              
अथवा

पूर्ण चल-विधान के द्वारा प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग(कोई भी)। या आप चाहें तो मिट्टी का स्वयं बना लें। या किसी पूजन सामग्री के दुकान से लेकर प्रतिष्ठित कर लें। 

विनियोग-  

ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः, त्रिष्टुप्छन्दः, त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं, सः शक्तिः, वं कीलकं मम्‍ दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यासः 

श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि।
त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे।
श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः।

ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये।
सः शक्तये नमः पादयोः।
वं कीलकाय नमः नाभौ।
मम्‍ दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

करन्यासः      
    
ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। 
ऐं तर्जनीभ्यां नमः। 
क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः। 
क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः। 
क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। 
सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि न्यासः

आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः। 
अजामल वधाय शिरसे स्वाहा। 
लोकेश्वराय शिखायै वषट्‍। 
स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम्।
मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट्‍। 
श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट्‍। 
रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः।

ध्यानमः  

ध्यान मंत्र का पांच बार उच्चारण करें। जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है। वैसा ही आप भाव करें।

ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम्। 
अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम्॥
अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम्। 
सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम्॥
मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः।
भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा॥

हिन्दी भावार्थ:

श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार(सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं। उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं। उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं। उनके तीन नेत्र हैं।

 चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण—माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है। वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। 

ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं। आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।

मानसोपचार पूजन:

लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।
हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।
यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।
रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।
वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।
सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

अष्टापञ्चाशद (58) वर्णयुक्त मूल मंत्र :

ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम:।

विशेष:

 मंत्र में जो 'अजामल वधाय' पद है ये आपको अन्यत्र 'अजामल बद्धाय' के रूप में दृष्टिगोचर होगा। परन्तु बाद वाला अशुद्ध है। क्योंकि श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी ने अजामल नाम के राक्षस का संहार(वध) किया था। इसलिए आप 'अजामल वधाय' ही पढें।

साथ ही 'क्लां क्लीं क्लूं' पद भी आपको 'क्लीं क्लीं क्लूं' के रूप में मिलेगा। परन्तु तंत्र ग्रंथों के अनुसार बीज का वर्णन इस प्रकार है— दीर्घ काम त्रय बीजम्। अर्थात 'क्लां क्लीं क्लूं'। अत: जो दिया गया है वह शुद्ध है। आप मंत्र परिवर्तित न करें।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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Wednesday, April 29, 2020

जानिए रहस्यमयी तांत्रिक विश्वविद्यालय : चौसठ योगिनी मंदिर, मुरैना के बारे में






जानिए रहस्यमयी तांत्रिक विश्वविद्यालय : 


चौसठ योगिनी मंदिर, मुरैना के बारे में


आपने अब तक ऐसे बहुत से जगहो और मंदिरों के बारे में सुना होगा जहां तांत्रिक किर्याएँ होती है,जहां तांत्रिक अपनी सीढिया पाने के लिए तांत्रिक अनुष्ठान करते है, पर क्या अपने कभी आपने तांत्रिक के विश्वविद्यालय के बारे में सुना है?

आज हम आपको तांत्रिकों के विश्वविद्यालय के बारे में बताएंगे , इस विश्वविद्यालय में न ही कोई प्रोफ़ेसर है और न ही कोई स्टूडेंट इसके बाद भी अक्सर पूरी दुनिया से लोग तंत्र सकती में सिद्धि प्राप्त करने के लिए यहाँ रात में आकर तांत्रिक कर्म कांड करते है।

इस विश्वविद्यालय में भारत से ज्यादा विदेशी लोग आते है जिनको की यहाँ के स्थानीय तान्त्रिको के साथ बैठ कर कर्म कांड करते हुए देखा जा सकता है।

आइये अब इस अद्भुत जगह के बारे में बिस्तर से बताते है :-

भारत में चार प्रमुख चौसठ योगिनी मंदिर है, दो उड़ीसा में तथा दो मध्य प्रदेश में है परन्तु इन सब में मध्य प्रदेश के मुरैना स्थित चौसठ योगिनी मंदिर का विशेष महत्व है, इस मंदिर को गुजरे जमाने में तांत्रिकों का विशवविधालय कहा जाता था।

ग्राम पंचायत:- मितौली

थाना :- रिठौरा कला

जिला :- मुरैना

इस मंदिर की उचाई भूमि तल से 300 फिट है, करीब 1200 साल पहले 9 वीं सदी में अड़तिहार वंश के राजाओं द्वारा बनाए गए इस मंदिर में 101खम्बे है, और 64 कमरे है जिसमे सभी में एक एक शिवलिंग है।

मंदिर के मुख्य आंगन में भी एक शिवलिंग है, कमरों में रखे शिवलिंग के साथ साथ योगिनी देवियों की मूर्तियां भी थी, लेकिन बाद में इन योगिनि देवियों की मूर्तियों को दिल्ली के सग्रहालय में सुरक्षित रूप से पंहुचा दिया गया है।

इसी 64 योगिनी मूर्तियों के कारण इस विश्वविद्यालय का नाम चौसठ योगिनी मंदिर पड़ा है, ये सभी योगिनिया अलौकिक शक्ति से सम्पन्न थी।तथा यहाँ जो भी लोग कर्मकांड की सिद्धि के लिए आते है वो इन्ही के आशीर्वाद से अपनी सिद्धि को प्राप्त कर पाते है।

ये सभी देवियां माता काली का अवतार मानी जाती है, घोर नामक दानव से युद्ध करते वक्त माता ने 64 योगिनियो के रूप में अवतार लिए थे, यह भी माना जाता है कि ये सभी योगिनी माता पार्वती की सखिया है।

यह स्थान ग्वालियर से 40km की दूरी पर है, ये जगह काफी प्रसिद्ध एवं रहस्यमयी है अगर आप कभी मध्य प्रदेश के मुरैना आए तो इस जगह के दर्शन करना न भूले इस विश्वविद्यालय या यु कहे कि मंदिर से जुड़ी मान्यता कितनी विख्यात है ये तो आपको उसी वक्त पता चल जायेगा जब आप इस जगह पर पहुंचेंगे, यहाँ आपको काफी देशी और विदेशी लोग नज़र आएंगे जो सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए आस पास के गावं में दिख जाएंगे।

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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कुंडली मे कमजोर बुध से उत्पन्न परेशानियां एवं निवारण




कुंडली मे कमजोर बुध से उत्पन्न परेशानियां एवं निवारण


बुध आपकी जुबान, बर्ताव, आपके दिमाग और आपकी खूबसूरती का कारक ग्रह है. कुंडली में बुध की स्थति तय करती है कि आप कैसा बोलते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं, आपका व्यक्तित्व और बुद्धि कैसी है.

बुध का महत्व और विशेषताएं 
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बुध को ग्रहों में सबसे सुकुमार और सुन्दर ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में बुध को युवराज ग्रह भी कहते हैं। कन्या और मिथुन राशी का स्वामी बुध है और इसका तत्व पृथ्वी है। बुद्धि, एकाग्रता, वाणी, त्वचा, सौंदर्य और सुगंध का कारक होता बुध है। कान, नाक, गले और संचार से भी बुध का संबंध है। बुध बुद्धि तेज करता है। गणितीय और आर्थिक मामलों में कामयाबी दिलाता है।

बुध से बुद्धि, वाणी और एकाग्रता की समस्या 
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आपको लगता है कि आपकी सोचने और समझने की शक्ति कमजोर है. कोई भी फैसला लेने में आपको वक्त लगता है और आपका ध्यान भी बार-बार भटकता है तो हो सकता है कि आपका बुध कमजोर हो।

बुध कमजोर हो तो इंसान अपनी बुद्धि का सही प्रयोग नहीं कर पाता।

ऐसे इंसान को कोई भी चीज देर से समझ आती है और वह अक्सर दुविधा में ही रहता है।

बुध कमजोर हो तो इंसान ठीक से बोल नहीं पाता, कभी कभी हकलाहट भी होती है।

बुध से बुद्धि, वाणी और एकाग्रता की समस्याओं के उपाय 
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रोज सुबह तुलसी के पत्तों का सेवन करें। इसके बाद 108 बार 'ॐ ऐं सरस्वतयै नमः' का जाप करें।
हर बुधवार को गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं और इस दूर्वा को अपने पास रखें।

बुध के कारण त्वचा की समस्या 
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कमजोर बुध कभी-कभी त्वचा से जुड़ी समस्याएं भी देता है.
कमजोर बुद्ध से एलर्जी, दाने और खुजली की समस्या होती है। सूर्य का प्रभाव हो तो त्वचा पर दाग-धब्बे पड़ जाते हैं। मंगल का भी प्रभाव हो तो त्वचा झुलस सी जाती है। राहु का योग हो तो विचित्र तरह की त्वचा की समस्या होती है।

बुध के कारण त्वचा की समस्या के उपाय 
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रोज सुबह सूर्य को जल चढ़ाएं. ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियों और सलाद का सेवन करें।

प्रभावित जगह पर नारियल का तेल लगाएं।

अगर त्वचा की समस्या ज्यादा हो तो एक ओनेक्स पहनें।

बुध से कान, नाक और गले की समस्या 
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बुध बहुत कमजोर हो तो सुनने और बोलने में दिक्कत होती है। कभी-कभी गला खराब हो जाता है और लगातार खराब ही रहता है।

सर्दी-जुकाम की समस्या हो सकती है, किसी खास तरह की गंध से एलर्जी होती है।

बुध से कान, नाक और गले की समस्या के उपाय 
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रोज सुबह गायत्री मंत्र का जाप करें या मन में दोहराएं।
चांदी के चौकोर टुकड़े पर "ऐं" लिखवाकर गले में पहनें।
ज्यादा से ज्यादा हरे कपड़े पहनें।
रोज सुबह स्नान के बाद पीला चन्दन माथे, कंठ और सीने पर लगाएं।

कमजोर बुध से गणित से जुड़े विषयों की समस्या
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कई बार पढ़ाई-लिखाई में कड़ी मेहनत करने के बावजूद कुछ लोग गणित और इससे जुड़े विषयों में कमजोर ही रह जाते हैं. ज्योतिष के जानकारों की मानें तो इसका कारण कमजोर बुध हो सकता है।

बुध कमजोर हो तो गणित या गणित से जुड़े विषयों में समस्या होती है। गणित से मिलते जुलते विषय जैसे - अकाउंट्स, इकोनॉमिक्स या सांख्यिकी में भी दिक्कत होती है।
इंसान को बार-बार इन विषयों में नाकामी का सामना करना पड़ता है।

कमजोर बुध के चलते गणित से जुड़ी समस्याओं के उपाय 

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अपनी इच्छा से ही गणित से जुड़े विषय चुनें, जबरदस्ती नहीं।
रोज सुबह और शाम "ॐ बुं बुधाय नमः" मंत्र का जाप करें। अपने पढ़ने की जगह पर कोई हरे रंग की देव प्रतिमा लगाएं। एवं खाने में थोड़ी सी हरी मिर्च का प्रयोग जरूर 

और ज्यादा जानकारी समाधान उपाय विधि प्रयोग या कुंडली का पूर्ण विश्लेषण के लिए संपर्क करें और कुंडली का पूर्ण जानकारी प्राप्त करके जीवन में अनेकों लाभ प्राप्त करें ..

 जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की 

दक्षिणा  -  201 मात्र .

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विशेष

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राजगुरु जी

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हनुमान जी का दिव्य प्रयोग:






हनुमान जी का दिव्य प्रयोग:


आज वर्ष का प्रथम मंगलवार है। एक छोटा सा उपाय और पुरे वर्ष मंगलमय जीवन।

प्रातः काल 9 बजे से पूर्व अथवा सांय 6 से 7 के मध्य इस उपाय को करे। किसी भी हनुमान मंदिर ,जो मंदिर चौराहे के पास हो यदि वो मिल जाये तो अति शुभ है में हनुमान जी को 5 लौंग के बीड़े ( लौंग वाले पान )

5 बारीक़ बूंदी के लड्डू,एवम् 1 किलोग्राम लाल मसूर की दाल अर्पित करे। एक घी का दीपक एवम् धुप कपिराज को प्रदर्शित करें एवम् अपने इष्ट पाठ आदि करे।

आजनन्ये से अपने परिवार की मंगल कामना करे व् घर आ जाये।

श्री रामदूत बालाजी महाराज आपका कल्याण करे।

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कामाख्या वशीकरण मंत्र







कामाख्या वशीकरण मंत्र


माँ कामाख्या देवी माँ सती की अंग स्वरूपा के रूप में प्रसिद्ध है, जो जातक कामाख्या देवी की पूजा करता है उसका कार्य या मनोकामना जरूर पूरी हो जाती है, कामाख्या देवी का स्थान कामरु कामाख्या नामक स्थान पर स्थित है |

भगवान शिव के तांडव व् वियोग के फल स्वरूप ५१ शक्ति पीठ की उत्पत्ति हुई है, मान्यताओ के अनुसार भगवान विष्णु ने सती के भस्म शरीर को सुदर्शन से अंग भंग कर दिया था और सती के अंग जहा जहा गिरे उसे शक्ति पीठ जाना जाता है |

माता सती की योनि कामुरु नामक स्थान पर गिरी थी जिसे आज कामाख्या देवीं का स्थान कहा जाता है, इस स्थान को देवी की ५१शक्ति पीठ में सबसे शक्तिशाली पीठ माना जाता है |

और यही से कामाख्या सिन्दूर प्राप्त होता है, जो जातक इस सिन्दूर का प्रयोग करता है, उसपे माँ की कृपा बनी रहती है इस सिन्दूर से भूत प्रेत, वशीकरण, जादू टोना, गृह कलेश, व्यापर में अवरोध, प्रेम की समस्या, विवाह में परेशानी, व् अन्य समस्या का निवारण होता है |

कामाख्या सिन्दूर का प्रयोग मांगलिक व् पूजा कार्यो में करने से जातक की मनोकामना पूर्ण होती है |

कामाख्या सिन्दूर पूजा करने की विधि:

जो जातक सिन्दूर का उपयोग करता है सर्व प्रथम उसके मन में माता के प्रति विश्वाश और आस्था होनी चाहिए, मन को शांत करके कामाख्या देवी पूजा विधि प्रारम्भ करनी चाहिए | जातक लाल रंग का वस्त्र धारण करके एक चाँदी के बर्तन या डिब्बी में सिन्दूर रख कर मंत्र का उच्चारण 108 करे।

” कामाख्याये वरदे देवी नीलपावर्ता वासिनी |
त्व देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते || ”

इसे शुक्रवार दिन से प्रारम्भ करना चाहिए और सात दिन तक करना चाहिए, सातवे दिन डिब्बे में सिन्दूर को निकल कर 11 या 7 बार मंत्र पढ़े यह सिन्दूर सिद्ध हो जायेगा | इस सिन्दूर को हथेली में लेकर गंगा जल ,केसर , चंदन पाउडर मिलाकर मंत्र का उच्चारण करते हुए माथे पर तिलक लगाने से अभिलाषित देखते ही वशीभूत होने लगेगा और व्यक्ति आपसे आकर्षित हो जायेगा | इस मंत्र का प्रयोग स्त्री व पुरुष कोई भी कर सकता है |

कामाख्या सिन्दूर तिलक लगाने का मंत्र : इस सिन्दूर को 7 या 11 बार मंत्र का उचराण करके तिलक लगाये :

“कामाख्याम कामसम्पन्ना कामेश्वरी हरप्रिया |
कमाना देहि में नित्य कामेश्वरी नमोस्तुते ||”

कामाख्या सिन्दूर का तिलक लगाने से माँ कामाख्या देवी की कृपा जातक पर बनी रहती है |

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

विशेष -

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Tuesday, April 28, 2020

कामख्या सिद्धि,कामख्या साधना,मायोंग बूढ़ा मायोंग,माँ कामख्या मंत्र





कामख्या सिद्धि,कामख्या साधना,मायोंग  बूढ़ा मायोंग,माँ कामख्या मंत्र


भगवान शुदर्शन के चक्र से खंडित होकर सती के देह अंग का टुकड़ा जहा जहा गिरा था मित्रो उन सभी जगहों स्थानों पर देवी का  प्रत्यक्ष वाश हुआ वह सभी स्थान मित्रो शक्ति पीठ कहलाये आज भी सभी स्थान पूजनीय व शक्ति पीठ ही है ,

सती के छन्न भिन्न अंगों से अर्थात योनि मंडल अर्थात कामरूप (इसे कम गिरी के नाम से भी जाना जाता है,,,,,,,,,,,
यह स्थान गोहाटी,असम में स्थित है,)

यह गिरा इस लिए शक्ति पीठ की अधिस्त्ररास्ठि देवी भैरवी "कामख्या के नाम से जानी जाती है 'कामख्या निल पर्वत वासनी है ,

योनि मण्डल गिरने के कारण कामरूप तीरथो को चूड़ामणि माना जाता है,ब्रह्मपुत्र नदी के स्थल पर स्थित है """"महायोगस्थल""""के नाम पर लोग अमृत मानते है तंत्र साधना के नाम पर परम् कल्याणकारी है ,,,

इस स्थान को कुब्जिका पीठ के नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त है,,
इस स्थान पर भगवती सदैब ब हर मिनट बिराजित रहती है,,

इस पर्वत पर सती का योनि मंडल गिर कर निल वर्ण हुआ इस लिए यह पर्वत नीलांचल के नाम सर जाना जाता है ,,,,,,,,,

"""कालिका पुराण में लिखा हुआ है सती का योनि मंडल गिरकर नीलांचल पर्वत के ऊपर पत्थर बन गया उसी पत्थर मई योनि में कामख्या माता सदैव निवास करती है ,,,,,,,

जो मनुष्य शिला को स्पर्श करते है वह परम् मोक्ष की प्राप्ति कर स्वर्ग को जाते है,
मोक्ष की प्राप्ति कर ब्रह्म लोक पहुच जाते है,,,,,,,,
चार वर्ग धनु छेत्र बिसिष्ठ शिला पीठ  के ऊपर जहा निरन्तर जल निकलता है,,,,,

वही कामख्या का योनि मंडल है ,,,मितरो दोस्तो सज्जनो ,,
इस योनि की लंबाई चौड़ाई एक हाथ लंबा तथा बारह उंगल
चावड़ा है,सतासी धनु परिमित स्थान में रुद्र रक्त  है एवं सपुलक अस्तहथ तथा पचास हज़ार शिवलिंग युक्त है,,,
मातृ वर्ग होने के कारण इसका आधा भाग सुवर्ण के टोप से सदा आवित्त रहता है,,,,,

इस टोप को भी बस्त्र एवं पुष्प माला आदि से ढका तथा सुषोभित रखा जाता है,मात्रि अंग महामुद्रा अर्थात योनि मण्डल गिरने के के कारण इस महा तीर्थ को महा छेत्र कहा जाता है,
यह सभी तीर्थों में प्रधान स्थल है,,,

शक्ति साधक इस स्थान को सर्वप्रधान तथा तांत्रिक क्रिया पर्दिति का केंद्र समझ कर महा मुद्रा का नृत्या दर्शन एवं उपासना करते है,,,,,,, आज भी लोगो के मन मे बिश्वाश और मान्यता है कि पराम्बा प्रति मास रजस्वला होती है ,,,,,,

प्रत्येक बर्ष सौर असाढ़ मास के 6 या 7 से 10 या 11 तक अंबूवाचि योग रहता है ,इस काल मे मंदिर 3 दिनों तक बंद रहता है और दर्शन इत्यादि नही होते,अंबुवाची योग में माता कामख्या के रक्त वस्त्रो का महिमा अवर्णीय है,

इस रक्त वस्त्र को मनुष्य अपने देह पे धारण कर समस्त साधनायो को प्राप्त करता है,
   कामरूप तथा कामख्या पर्वत के चारो तरफ कई तीर्थ
स्थान है,,

कामख्या शक्ति पीठ के 5 कोष के अंदर जितने भी तीर्थ स्थान है वह सभी कामख्या पीठ के ही अंगों के नाम से पुराणों में वर्णित है ,,,,,

कामख्या पर्वत के नाम से एक आलेख मिलता है पहले यह 100 योजना ऊँचा था,,महा माया के गुप्त अंग गिरने के कारण पर्वत डगमगाने लगा ,और पाताल में प्रवेश करने लगा पताल में प्रवेश होता देखकर त्रिदेव ब्रह्म बिष्णु महेश(शिव)ने पर्वत का एक एक श्रृंग को धारण किया तथापि यह पर्वत
पतालगामी होता चला गया तब महामाया ने अपनी आकर्षणी शक्ति के द्वारा पर्वत को धारण किया किन्तु पर्वत अपने पूरी उचाई को प्राप्त नही कर पाया वह केवल एक कोष ऊँचा रह गया यह स्थान साधको की प्रत्येक मनोकामना व साधनावो को पूरा करने वाला है ,

भगवान भूत नाथ की क्रोधाग्नि से रति पति कामदेव यही भस्मीभूत हुए पुनः उन्ही की कृपा से कामदेव अपना पूर्ण रूप प्राप्त किया अतः इस देश का नाम कामरूप पडा
कलयुग मे यह स्थान विशेष रुप से जागृत है यदि कोई साधक किसी भी कामना के पूर्ति के लिए माँ की आराधना करता है ,

तो माँ प्रस्सन होकर अति शीघ्र मनोरथ पूर्ण करती है,,,
कामरूप छेत्र देश देवी छेत्र के नाम से पुराणों तथा तंत्रो में वर्णित है ,

कुमारी पूजा
कामख्या में कुमारी पूजा का विशेष महत्व है ,दर्शनार्थी देवी भाव से कुमारी  पूजन कर कृत कृत्य होते है,जिस प्रकार प्रयाग में मुंडन तथा काशी में दंड भोजन का महत्व है उसी प्रकार कामख्या में कुमारी पूजन तथा भोजन करवाने का विधान है ,यहां कुमारी पूजन करने से पुत्र,धन,भूमि,एवम विद्या आदि का लाभ होता है तथा यहां सब इच्छाई पूरी होती है 

यहां महा माया कुमारी रूप में विद्यमान है ,कुमारी सर्वविद्या स्वरूपा है इसमें कई संदेह नही है ,एक कुमारी पूजन करने से देव देवियो की पूजा का फल मिलता है ,जो मनुष्य माँ से जैसे कारण की कामना करता है पूजा पाठ जप तप हवन आदि कर माँ को प्रस्सन करता है माँ उसकी अभीष्ठ मनोकामना को अवश्य पूरी करती है ,जो लोग भक्ति भाव से देवी योनि मंडल का दर्शन ,स्पर्श करते है ,वे पित्र ऋn देव ऋन तथा ऋषी ऋन से अवश्य मुक्त हो जाते है,

योनि मण्डल का वर्णन

देवी के अंग ,चित्र पट ,पुष्टिमणि,खग शमशान महालिंग प्रतिमा जल मंत्र तंत्र तथा शालिग्राम में मण्डल वर्जित है,महामोह में  मण्डल करने से महापातक करने से महापातक की प्राप्ति होती है और उसमें मण्डल करने पर  उस स्थान को छोड़ कर अपने घर को लौट जाना चाहिए,अन्य योनि में भी मण्डल नही करना चाहिए,,शमशान के पूर्वभाग में देवी का महामंडल स्थित है,वही पर पूजा क्रिया करनी चाहिए ,

देवी दर्शन का नियम

सिद्धि की कामना करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह स्नान काल ,अर्धरात्रि तथा महापूजा के अवसान समय मे महामाया के समीप गमन अथवा स्पर्श न करे ,
कुमारन महाअष्टमी ,सायकाल ,युगादि तथा कार्तिक मास में देवी का दर्शन नही करना चाहिए ,यदि शूद्र लोग कामख्या देवी की आरतीयुक्त दर्शन करते है तो वे रूपवान होकर सद्गति को प्राप्त होते है ,स्नान के समय ,मध्याह्न में तथा निर्माल्य बिशरजन के समय स्त्रियो स्त्रियों को देवी के दर्शन नही करना चाहिए,,,

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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बगलामुखी मन्त्र अनुष्ठान से पहले






बगलामुखी मन्त्र अनुष्ठान से पहले


ॐ ह्ल्री बगलामुखी सर्व दुश्तानाम वाचं मुखम पदम् स्तम्भय स्तम्भय |
जिव्हां कीलय कीलय बुद्धिम विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ||

माँ बगलामुखी का यह मन्त्र एक अमोघ अस्त्र है जिसे प्रयोग करने के पश्चात् आपका जीवन शत्रु बाधा से मुक्त हो सकता है | निस्संदेह इस मन्त्र से आपके शत्रु का स्तम्भन हो जाएगा परन्तु बगलामुखी मन्त्र के साधक को उचित अनुचित का ज्ञान होना परमावश्यक है |

 इस मन्त्र को प्रयोग करने के लिए केवल नियमों का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है अपितु पात्र कुपात्र का ध्यान भी रखना पड़ता है | छोटी बड़ी किताबों और इन्टरनेट आदि के माध्यम से इस मन्त्र को आज हर व्यक्ति जान गया है परन्तु गुरु के मुख से मिले हुए मन्त्र में और सुने सुनाये ज्ञान में अंतर होता है | गुरु का आदेश है कि अच्छी तरह से जांच परख कर ही किसी व्यक्ति को यह मन्त्र दिया जाना चाहिए |

इस वेबसाइट पर बगलामुखी मन्त्र का वर्णन केवल पाठकों की ज्ञान वृद्धि के लिए दिया गया है | यदि मैंने यह मन्त्र किसी व्यक्ति को दिया है तो केवल उसकी कहानी पर विशवास करके नहीं अपितु मैंने स्वयं अनुभव किया है कि अमुक व्यक्ति को इस मन्त्र की आवश्यकता है | यदि कोई साधक इस विद्या का गुप्त मार्ग किसी कुपात्र को बतलाता है तो वह व्यक्ति तो कुपात्र होते हुए भी रक्षित हो जाएगा परन्तु उसके द्वारा किसी निर्दोष को हानि पहुँचने पर पाप का भागी उस साधक को सबसे पहले हानि पहुंचाएगा |

इस मन्त्र का दुरूपयोग होते मैंने स्वयं देखा है | इसके बाद होने वाले प्रभाव को भी मैं अनुभव कर चुका हूँ | आधुनिक युग में समय किसी के पास नहीं है | छोटे से लेकर बड़ा व्यक्ति सब व्यस्त हैं | इस व्यस्तता के चलते एक व्यक्ति ने किसी ब्राह्मण को बुलाकर बगलामुखी मन्त्र का एक लाख जप करने को कहा | ब्राह्मण मान गया और अकेले ही उसने ५ दिनों में उस व्यक्ति को विशवास दिलाया कि जप तो पूरा हो चुका है अब आपका काम हो जाएगा |

अगले ही दिन यजमान को पता चला कि उसने जिस शत्रु का स्तम्भन करने के लिए अनुष्ठान किया था उसने पुलिस में उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाई है तो यजमान को जाना पड़ा और काफी परेशानी से दिन गुजरने लगे | अब शत्रु उस पर हावी था | बाद में निष्कर्ष यह निकला कि उनके झगडे का समझौता तो हो जायेगा परन्तु हर तरह बेचारे यजमान को मुह की खानी पड़ी |

इसमें माँ बगलामुखी का क्या दोष ? क्या कोई एक व्यक्ति पांच दिन में माँ बगलामुखी के मन्त्रों का सवा लाख जप कर सकता है ? मुझे स्वयं इस मन्त्र की एक माला करने में १० मिनट लगते हैं | यदि मैं एक घंटा रोज लगाता हूँ तो दस मिनट के १०८ और ६० मिनट के ६४८ मन्त्र होते हैं | 

इस हिसाब से यदि रोज मैं दो घंटे का जप भी करता हूँ तो १२९६ हुए | पांच दिन में ६४८० मन्त्र यदि मैं पूरी शक्ति लगाकर करता हूँ तो अधिक से अधिक ५०० मन्त्रों का अंतर पड़ता है | और फिर प्रश्न उठता है कि कितने लोग इस अनुष्ठान को कितने दिन में पूरा करेंगे ? क्या वे सच बोलेंगे कि संख्या पूरी हुई या यजमान उनके मन्त्रों की गिनती करेगा | नाप तोल का प्रश्न ही नहीं उठता है | 

एक अवसर पर मैंने २१ ब्राह्मणों को यह अनुष्ठान ५ दिन में विधि विधान से पूरा करते हुए देखा है जिनका रोज का काम ही यही है | इसलिए ऐसा नहीं है कि बगलामुखी मन्त्र का अनुष्ठान विधिपूर्वक करने वाले व्यक्ति उपलब्ध नहीं हैं | अवश्य हैं और हमेशा रहेंगे परन्तु ये भी सच है कि ढोंगी और पैसे के पुजारी लोग भी आपको कदम कदम पर मिलेंगे |

निष्कर्ष यह है कि यदि आप बगलामुखी मन्त्र द्वारा अभीष्ट सिद्धि चाहते हैं तो यथासंभव स्वयं जप करें और हो सके तो गुरु के मुख से ही इस मन्त्र को ग्रहण करें |

|| जय माँ बगलामुखी ||

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कैसे हुई कालभैरव की उत्पत्ति- पौराणिक तथ्य







कैसे हुई कालभैरव की उत्पत्ति- पौराणिक तथ्य


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तंत्राचार्यों का मानना है कि वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन 'भैरव' के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। 

इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान 'भैरव' ही हैं। भगवान शंकर के अवतारों मेंभैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है।

तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं। वामकेश्वर तंत्र की योगिनीह्रदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- 'विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।'

भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। तंत्रालोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है।
श्री तत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं-

'भ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है, भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है। वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।

'र' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं। उनके वस्त्र लाल हैं। सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं।

'व' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक के सामान श्वेत हैं। वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है। विकसित कमल पुष्प उनका आसन है। वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं।

स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है। गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए, तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी 'काशी' में आकर दोष मुक्त हुए।

ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।

भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वालेभैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है। 

जय माँ तारा जय गुरु बामदेब 

जय माँ कामाख्या

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काली






काली :-


देवी कालिका काम रुपणि है इनकी कम से कम 9,11,21 माला का जप काले हकीक की माला से किया जाना चाहिए। 

इनकी साधना को बीमारी नाश, दुष्ट आत्मा दुष्ट ग्रह से बचने के लिए, अकाल मृत्यु के भय से बचने के लिए, वाक सिद्धि के लिए, कवित्व के लिए किया जाता है। 

षटकर्म तो हर महाविद्या की देवी कर सकती है। षट कर्म मे मारण मोहन वशीकरण सम्मोहन उच्चाटन विदष्ण आदि आते है।परन्तु बुरे कार्य का अंजाम बुरा ही होता है।

 बुरे कार्य का परिणाम या तो समाज देता है या प्रकृति या प्रराब्ध या कानून देता ही है। इसलिए अपनी शक्ति से शुभ कार्य करने चाहिए।

मंत्र “ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहाः”

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रावण द्वारा रचित वे अचूक मंत्र जिनके जाप से बदल जाता व्यक्ति का भाग्य*






*रावण द्वारा रचित वे अचूक मंत्र जिनके जाप से बदल जाता व्यक्ति का भाग्य*


✍🏻रामायण कथा के अहम किरदारों में एक है रावण। रावण का किरदार भले ही नकारात्मक हो, लेकिन इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वह एक प्रकाण्ड विद्वान था। रावण शिव जी का परम भक्त था। रावण ने शिव जी की स्तुति में *शिव तांडव स्तोत्र* की रचना की थी.!

*२:-रावण* भगवान शिव का परम भक्त होने के साथ ही महान तांत्रिक और ज्योतिषी भी था। रावण की तंत्र विद्या और ज्योतिष का सार रावण संहिता में मिलता है। इसमें रावण ने जहां कई ज्योतिषीय रहस्य खोले हैं वहीं कुछ ऐसे उपाय भी बताए जिनसे किस्मत के ताले खोलकर देवी लक्ष्मी को धन देने के लिए मनाया जा सकता है.!

३:-प्रातः काल स्नान ध्यान करके बड़गद के पेड़ के नीचे आसान बिछाकर *'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नम: ध्व: ध्व: स्वाहा'* इस मंत्र का 1100 बार जप करें। जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपायोग करना चाहिए। कहते हैं 21 दिनों तक ऐसा करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है और धन प्राप्ति के रास्ते खुल जाते हैं.!

४.-आपकी आय में असंतुलन बना रहता यानी आय में बार-बार बाधा आती रहती है तो संध्या के समय नियमित रूप से 40 दिनों तक *'ॐ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा।*' मंत्र का जप करें.!

५:-आपकी आमदनी तेजी से नहीं बढ़ रही है तो आपको कुबेर का मंत्र *'ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवाणाय, धन धन्याधिपतये धन धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।'* जप करें। जप करते समय अपने पास एक कौड़ी रखें। तीन माह तक इस मंत्र का जप करने के बाद कौड़ी को उस स्थान पर रख दें जहां आप पैसा रखते हैं।

६:-धन दौलत की प्राप्ति के लिए आप रावण ने एक अन्य मंत्र बताए हैं *ॐ नमो विघ्नविनाशाय निधि दर्शन कुरु कुरु स्वाहा।*' इस मंत्र के विषय में कहा जाता है कि आपका धन खो गया हो या आपकी जमा पूंजी लगातार कम होती जा रही है तो इसके जप से धन का ठहराव होता है और खोया धन पाने के संयोग बनते हैं। मंत्र के जप की संख्या दस हजार है.!

*७:-'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी, महासरस्वती ममगृहे आगच्छ-आगच्छ ह्रीं नम:।*' इस मंत्र का जप अक्षय तृतीया, होली या दीपावली की रात में करने से धन प्राप्ति के मार्ग खुल जाते हैं.....!

चेतावनी -

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काली महाकाली कालिके परमेश्वरी । सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।





काली महाकाली कालिके परमेश्वरी । 

सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।


स्त्री केवल वासनापूर्ति का एक माध्यम ही नहीं, वरन शक्ति का उदगम भी होती है और यह क्रिया केवल सदगुरुदेव ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते हैं।

तंत्र के क्षेत्र में प्रविष्ट होने के उपरांत साधक को किसी न किसी चरण में भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना पड़ता ही है। यह तंत्र एक निश्चित मर्यादा है। प्रत्येक साधक, चाहे वह युवा हो, अथवा वृद्ध, इसका उल्लंघन कर ही नहीं सकता, क्योंकि भैरवी 'शक्ति' का ही एक रूप होती है, तथा तंत्र की तो सम्पूर्ण भावभूमि ही, 'शक्ति' पर आधारित है।

कदाचित इसका रहस्य यही है, कि साधक को इस बात का साक्षात करना होता है, कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का एक माध्यम ही नहीं, वरन शक्ति का उदगम भी होती है और यह क्रिया केवल सदगुरुदेव ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते है, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं व् संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

इसी कारणवश तंत्र के क्षेत्र में तो पग-पग पर गुरु साहचर्य की आवश्यकता पड़ती है, अन्य मार्गों की अपेक्षा कहीं अधिक।

जब इस मर्यादा का किसी कारणवश लोप हो गया और समाज की स्मृति में केवल इतना ही शेष रह गया, कि तंत्र के क्षेत्र में भैरवी का साहचर्य करना होता है, तभी व्यभिचार का जन्म हुआ, क्योंकि ऐसी स्थिति में पग-पग संभालने के लिए सदगुरुदेव की वह चैतन्य शक्ति नहीं रही।

🔯यह भी संभव है, कि कुछ दूषित प्रवृत्तियों के व्यक्तियों ने एक श्रेष्ठ परम्परा को अपनी वासनापूर्ति के रूप में अपना लिया हो, किन्तु यह तो प्रत्येक दशा में सत्य है ही, कि इस मार्ग में सदगुरु की महत्ता को विस्मृत कर दिया गया।

जो श्रेष्ठ साधक है, वे जानते है, कि तंत्र के क्षेत्र में प्रवेश के पूर्व श्मशान पीठ एवं श्यामा पीठ की परीक्षाएं उत्तीर्ण करनी होती हैं, तभी साधक उच्चकोटि के रहस्यों को जानने का सुपात्र बन पाता है।

💃 भैरवी साधना इसी श्रेणी की साधना है, किन्तु श्यामा पीठ साधना से कुछ कम स्तर की। वस्तुतः जब भैरवी साधना का संकेत सदगुरुदेव से प्राप्त हो जाय, तब साधक को यह समझ लेना चाहिए, कि वे उसे तंत्र की उच्च भावभूमि पर ले जाने का मन बना चुके हैं।

💃भैरवी साधना, भैरवी साधना के उपरांत श्यामा साधना और तब वास्तविक तंत्र की साधना का प्रारम्भ होता है, जहां साधक अपने ही शरीर के तंत्र को समझता हुआ, अपनी ही अनेक अज्ञात शक्तियों से परिचय प्राप्त करता हुआ न केवल अपने ही जीवन को धन्य कर लेता है, वरन सैकडों-हजारों के जीवन को भी धन्य कर देता है।

व्यक्ति के अनेक बंधनों में से सर्वाधिक कठिन बंधन है उसकी दैहिक वासनाओं का - और तंत्र इसी पर आघात कर व्यक्ति को एक नया आयाम दे देता है। वास्तविक तंत्र केवल वासना पर आघात करता है, न कि व्यक्ति की मूल चेतना पर।

इसी कारणवश एक तांत्रिक किसी भी अन्य योगी या यति से अधिक तीव्र एवं प्रभावशाली होता है।

'भैरवी' के विषय में समाज की आज जो धारणा है, उसे अधिक वर्णित करने की आवश्यकता ही नहीं, किन्तु मैंने अपने जीवन में भैरवी का जो स्वरुप देखा, उसे भी वर्णित कर देना अपना धर्म समझता हूं।

शेष तो व्यक्ति की अपनी भावना पर निर्भर करता है, कि वह इसे कितना सत्य मानता है अथवा उसे अपनी धारणाओं के विपरीत कितना स्वीकार्य होता है।

आज से कई वर्ष पूर्व मैं अपने सन्यस्त जीवन में साधना के कठोर आयामों से गुजर रहा था, उसी मध्य मुझे भैरवी-साहचर्य का अनुभव मिल सका। संन्यास का मार्ग एक कठोर मार्ग तो होता ही है, साथ ही उसकी कुछ ऐसी जटिलताएं होती हैं, जिसे यदि मैं चाहूं, तो वर्णित नहीं कर सकता, क्योंकि वे भावगत स्थितियां होती हैं, जिन्हें योग की भाषा में आलोडन-विलोडन कहते हैं।

 संन्यास केवल बाह्य रूप से ही एक कठोर दिनचर्या नहीं है, वरन उससे कहीं अधिक आतंरिक कठोरता की दूःसाध्य स्थिति भी है। कब किस समय गुरुदेव का कौन सा आदेश मिल जाय और बिना किसी हाल-हवाले या ना-नुच के उसे तत्क्षण पूर्ण भी करना पड़े, इसको तो केवल सन्यस्त गुरु भाई-बहन समझ सकते हैं।

चेतावनी -

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विशेष -

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भैरवी तंत्र :भैरवी विद्या





::::::::::::::::::::::भैरवी तंत्र :भैरवी विद्या :::::::::::::::::::


तंत्र का वह मार्ग जिसमे भैरवी को आधार मानकर साधना की जाती है अर्थात जिसमे स्त्री देवी और पुरुष देवता स्वरुप होकर साधना करते हैं अर्थात जिसमे स्त्री भैरवी और पुरुष भैरव स्वरुप होकर साधना करते हैं अर्थात जिसमे स्त्री महामाया का अंश और पुरुष सदाशिव का अंश हो साधना करते हैं ,भैरवी तंत्र कहलाता है |

मूलतः यह कौल मार्ग की साधना है ,पर अन्य मार्गों में भी इसके विविध रूप उपयोग होते हैं |यह कौल मार्ग की भैरवी विद्या है जिसे श्री विद्या भी कहा जाता है |इसके कई रूप विभिन्न मार्गों में विभिन्न स्वरूपों में प्रयोग किये जाते हैं |यह आध्यात्मिक क्षेत्र की सर्वाधिक विवादास्पद विद्या है |इसके सम्बन्ध में भारी भ्रम फैले हुए हैं और इन भ्रमो के कारण इसकी सर्वाधिक आलोचना भी होती रही है |

इस विद्या के सिद्ध आचार्यों का कथन सत्य है की अज्ञानता में डूबे पशु साधक जो कर्मकाण्ड के नियमों ,आचार संहिता के कठोर नियमों का पालन करके साधना करते हैं ,वे एक कल्पना जगत में जीते हैं ,जिनका निर्माण वे स्वयं करते हैं |"श्री विद्या" के अतिरिक्त तमाम मार्ग कृत्रिम मानव निर्मित हैं ,केवल यही एक विद्या है ,जो प्राकृतिक है और स्वयं परमात्मा [सदाशिव] द्वारा उत्पादित है |

यह बार सत्य भी है | सृष्टि की उत्पत्ति और उसके विकास के वैज्ञानिक सूत्रों को बताने वाली विद्या केवल यही है |जो लोग अध्यात्म के चरम ज्ञान को प्राप्त कर लेने का दावा करते हैं ,उन्हें भी इस विद्या में बताये गए गोपनीय सृष्टि सूत्र और ऊर्जा सूत्र का ज्ञान नहीं है |

यह केवल इस विद्या के पक्ष में दिया गया तर्क नहीं है ,अपितु इसका ठोस वैज्ञानिक आधार है |अब तक हुए सभी महान साधकों ने किसी न किसी रूप में इस विद्या की साधना अवश्य की है ,,उन्होंने भैरवी का उपयोग किया या नहीं यह एक विवादस्पद विषय है |

निःसंदेह यह विद्या गोपनीय है और इसकी साधनाओं एवं क्रिया कलापों के बारे में बहुत विशेष विवरण नहीं मिलता | यह केवल गुरु-शिष्य परंपरा में प्रतिपादित मार्ग है और इसके साधक अपना व्यक्तित्व तक गुप्त रखते हैं |वे साधना रहस्यों को प्रकाशित करने की सोच भी नहीं सकते |जो शास्त्रों में वर्णित है ,वह अपर्याप्त है और अनेक भ्रम भी उत्पन्न करता है |

सामाजिक आवरणों से लिप्त है अथवा मिथकों -कथाओं के रूप में वर्णित है |

यह सोचना निहायत ही अवैज्ञानिक और अज्ञानता है की शक्ति ,सिद्धि और ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग कठोर आचरण संहिता का पालन करके ही प्राप्त किया जा सकता है |आधुनिक विज्ञान भी इस प्रकृति की ही शक्ति प्राप्त करके मनुष्य के लिए असंभव कृत्यों को संभव बनाता जा रहा है |

यही कार्य साधना द्वारा भी होता है और सिद्धि अर्थात शक्ति प्राप्त की जाती है इसी प्रकृति के ऊर्जा सूत्रों और नियमों से |आध्यात्मिक मार्ग की शक्तियां सूक्ष्म अवश्य हैं ,पर वे प्रकृति की ही शक्तियां हैं ,जिन्हें हम अपने शरीर को यन्त्र बनाकर प्राप्त करते हैं |इसके लिए कठोर आचरण संहिता और विशालतम विधि विधान का पालन आवश्यक नहीं है |

जरुरत है मूल सूत्र को ,मूल नियम को पकड़कर शक्ति प्राप्त और नियंत्रित करने की |यह इस विद्या का मूल सूत्र है |जिस प्रकार धन और ऋण के संयोग से यह समस्त प्रकृति की उत्पत्ति है ,उसी प्रकार धन-ऋण के आपसी सहयोग से शक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है ,यह विद्या उस मार्ग का रास्ता दिखता है | इस प्रकृति का सार सूत्र है ऊर्जा ,अर्थात शक्ति |

इन्ही शक्तियों को विभिन्न वर्गों के रूप में हम देवियों या देवताओं के रूप में जानते हैं |जिन स्वरूपों की हम आराधना करते हैं वे भाव रूप हैं और इनकी कल्पना की जाती है |इस समस्त रहस्यों को भी यह विद्या स्पष्ट बताती है ,पौराणिक कथाओं की तरह भ्रम में नहीं डालती 

|कथाएं इसमें भी होती हैं ,पर यह बताया जाता है की इन कथाओं में गूढ़ रहस्य छिपे हैं |कथा महत्व पूर्ण नहीं है ,इनमे छिपा रहस्य सार सबकुछ है |जबकि होता है समाज में उल्टा ,कथाओं को ही सच्चाई मानकर कल्पना लोक में लोग जीते रहते हैं |

प्रकृति का समस्त ऊर्जा चक्र ,यहाँ तक की कृत्रिम भी धनात्मक और ऋणात्मक के मध्य चल रहा है |सभी आविष्कारों का भी सार सूत्र यही होता है ,क्योकि इस ऊर्जा रूप प्रकृति की उत्पत्ति ही इसी सार सूत्र पर होती है |

श्री विद्या या भैरवी विद्या या भैरवी तंत्र इस समस्त सार सूत्र के रहस्य की एक एक परत हटाकर बताता है की हमारा ऋणात्मक नारी है |नारी के स्पर्श ,क्रीडा ,केलि ,रतिक्रीड़ा के मध्य हमारा ऊर्जा प्रवाह आठ से पच्चीस गुना बढ़ जाता है |यदि इसे हम शक्ति ,सिद्धि ,समाधि आदि में प्रयोग करें ,तो सब कुछ अत्यंत सरल हो जाता है ,शून्य समाधि भी |यही इस मार्ग का सूत्र है ,मार्ग की शक्ति है |

अर्थात स्त्री और पुरुष की शारीरिक -मानसिक ऊर्जा का उपयोग कर आध्यात्मिक लक्ष्य और ईष्ट प्राप्त करना अथवा परम ऊर्जा का साक्षात्कार इस मार्ग का मूल मंत्र है |धनात्मक और ऋणात्मक के शार्ट सर्किट से उत्पन्न तीब्र उर्जा को नियंत्रित कर ईष्ट प्राप्ति अथवा लक्ष्य प्राप्ति की और मोड़कर लक्ष्य प्राप्त करना यह मार्ग बताता है

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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