Friday, March 31, 2017

भुताकर्षण गोलक निर्माण विधि

सामग्री: पीपल के निचे की मिट्टी,लाल चन्दन,सिंदूर,काले तील,गुलाबजल और सादा जल।

विधि:

 निर्माण आपको अमावस्या की रात्रि में करना है. समय रात्रि दस बजे के बाद हो,दिशा दक्षिण हो ,आसन वस्त्र लाल या काले हो. अपने सामने एक पात्र में मिटटी रखे और और उसमे लाल चन्दन मिलाये,याद रखे मिटटी में कंकर न हो इसलिये उसे पहले ही सुखाकर छान कर रखे.

 अब गुलाब जल और सादा जल मिलाये।यह सब प्रक्रिया करते वक़्त" भ्रं भ्रं भूतेश्वराय " का जाप करते रहे.जब सारी सामग्री मिल जाए ,तब उसका एक गोला बना ले लड्डू की तरह।और उसे सुखा ले.जब वो सुख जाये तो उस पर सिंदूर का लेप कर दे.

अब किसी भी शनिवार की रात्रि में सामने लाल वस्त्र बिछा कर,उसपर ताम्र पात्र स्थापित करे. और उसमे सिंदूर या शमशान भस्म से बीज मंत्र ' हूं ' लिखे. और उस पर गोलक को स्थापित करे. और उसका सामान्य पूजन करे.

 भोग में गुड रखे. अब निरंतर बिना किसी माला के, मंत्र जाप करते जाये और काले तील गोलक पर अर्पण करते जाये।याद रखे इसमें तील के तेल का दीपक जलता रहे जब तक क्रिया पूर्ण न हो जाये .

अगर कोई अनुभव हो तो डरे नहि. सदगुरुदेव रक्षक है तो कैसा डर ?अगले दिन गोलक को संभाल कर रख ले.

 जब भी आप भूत साधना करे इसे सामने रखे और इसका पूजन कर मंत्र का एक सौ आठ बार जाप करे और साधना शुरू करे. लाल कपडा ,तील, भोग का गुड सभी को शमशान में फेक दे.

ताम्र पात्र को धो ले उसे उपयोग किया जा सकता है.एक बात और याद रखे आपको जिस दिन भी भूत साधना में सफलता मिल जाएगी,ये गोलक उसी वक़्त तेज हिन हो जायेगा,तब इसे अपने पास न रखे इसे भी शमशान में फेक दे कुछ दक्षिणा के साथ।जब तक सफलता न मिले इसका उपयोग किया जा सकता है. उसके बाद नहीं।जय माँ

मंत्र:

 ॐ हूं भ्रं भ्रं भ्रं भूतेश्वराय भूताकर्षण कुरु कुरु भ्रं भ्रं भ्रं हूं फट

राज गुरु जी

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Tuesday, March 28, 2017

सम्मोहन काजल निर्माण विधि-

यह प्रयोग दिवाली की रात्रि को करे। रात्रि 9 बजे के माँ के सामने एक घी का दीपक जलाये और उसकी लो को देकते हुए निम्न मंत्र की 11 माला रुद्राक्ष माला से करे।

 11 माला हो जाने के बाद उस दीपक पर एक कटोरी को इस तरह सेट कर दे की सारा काजल उस कटोरी में आ जाये। याद रखे ये दीपक रात्रि 9 से सुबह 4 बजे तक जलना चाहिए।

फिर सुबह सरे काजल को किसी शीशी में रख ले। और जब भी आपको सम्मोहन करना हो तब मंत्र का 11 बार जाप करके काजल को आँख में लगा ले। इस काजल से सभी आपके अनुकूल हो जायेंगे।

यहाँ तक जब आप कोई देवी देवता की साधना करे तब भी आप इसे आँखों में लगा ले ये दिव्या काजल उन्हें भी आपकी और आकर्षित करेगा। नोकरी के इंटरव्यू में जाना हो तब भी लगा सकते है।

रोज़ चाहे तो रोज़ लगाये इससे हर मिलने वाला व्यक्ति आपके अनुकूल हो जायेगा। मात्र एक दिवस का प्रयोग आपके लिए अत्यंत ही लाभकारी होगा।

मेरा अनुभूत है ये प्रयोग,ये काजल खासकर अप्सरा साधना में बहुत अच्छे परिणाम देता है।ऐसा कई साधको का अनुभव रहा है।अतः आप भी इससे लाभान्वित हो

मंत्र:

||ॐ ह्री सर्व सम्मोहिनी स्वाहा ||

||om hreem sarva sammohini swahaa||

राज गुरु जी

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Monday, March 27, 2017

विजय प्राप्ति बगलामुखी साधना (न्यायालय में विजय प्राप्ति हेतु )

अक्सर विरोधी हमें कोर्ट के चक्कर में उलझा देते है।अकारण ही हम उसमे इतना उलझते जाते है की,सम्पूर्ण जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है।और हम चाहकर भी उस परेशानी से निकल नहीं पाते है।

तब आवश्यकता है की हम साधना कर जगदम्बा से सहायता प्राप्त करे।माँ पीताम्बरा अत्यंत करुणामयी है। आप अपनी प्यारी माँ से सहायता मांगे और माँ आप पर कृपा न करे ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता है।

प्रस्तुत साधना इसी विषय पर है,जिसे संपन्न करने पर मुक़दमे से सम्बंधित परेशानियों में शीघ्र ही लाभ मिलता है।जिस पर भी केस चल रहा हो वो इस प्रयोग को कर सकता है अन्यथा उस व्यक्ति के लिये संकल्प लेकर कोई भी इसे कर सकता है।

साधना किसी भी रविवार रात्रि १० के बाद आरम्भ करे,आसन वस्त्र पीले हो,दिशा उत्तर या पूर्व हो।सामने बजोट पर पिला वस्त्र बिछा दे,और उस पर बगलामुखी यन्त्र या चित्र स्थापित करे।

अब भोज पत्र पर हल्दी की स्याही से बीज मंत्र

" ह्लीं "

लिखे और उसे यन्त्र के सामने रख दे।अब सरसों के तेल का दीपक जलाये और यन्त्र तथा भोज पत्र का सामान्य पूजन करे।भोग में कोई पिली वस्तु अर्पण करे जिसे केस वाले व्यक्ति को नित्य खा लेना है।

अब निम्न मंत्र पड़ते हुए एक चुटकी हल्दी यन्त्र तथा भोज पत्र पर अर्पण करे।इसी प्रकार हर मंत्र को ३६ बार पड़ना है और हल्दी अर्पण करना है।याद रखे एक मंत्र को ३६ बार पड़े और एक चुटकी हल्दी अर्पण करे।

ॐ बगलामुखी देव्ययी नमः

ॐ पीताम्बरा देव्ययी नमः

ॐ पीतवर्णा देव्ययी नमः

ॐ सर्व स्तंभिनी देव्ययी नमः

ॐ सर्व शत्रु नाशिनी देव्ययी नमः

ॐ सर्व उपद्रव नाशिनी देव्ययी नमः

ॐ सर्व रक्षिणी बगला देव्ययी नम:

इसके बाद निम्न मंत्र की हल्दी माला पिली हकिक माला या रुद्राक्ष माला से ११ माला जाप करे।इस प्रकार साधना नित्य ११ दिनों तक करे।

संकल्प अवश्य ले की आप ये साधना क्यों कर रहे है।साधना के बाद भोज पत्र को किसी तावीज़ में धारण कर ले।

जो हल्दी का चूर्ण नित्य अर्पण किया था उसे एकत्र करके रख ले और मस्तक पर लगाये माँ आपको अपनी गोद में उठाकर बचा लेगी।बस माँ के समक्ष करुण पुकार करना न भूले।

मंत्र:

 ॐ हूं ह्लीं हूं फट

 ( OM HOOM HLEEM HOOM PHAT)

जय पीताम्बरा

राज गुरु जी

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Friday, March 24, 2017

!! प्रचंड वीरभद्र साधना !!

हम चाहे कितना भी सावधानी से जीवन व्यतीत करे.किन्तु जाने अनजाने हमारे शत्रु बन ही जाते है.इसका कोई भी कारण हो सकता है.परन्तु शत्रुता कैसी भी हो वो कष्ट का कारण बनती ही है.

शत्रु के कारण सतत मानसिक,तथा आर्थिक कष्ट का अनुभव होता रहता है.

तो क्या हम शत्रु से हार मान  ले ?

नहीं कदापि नहीं 

जो हार मान  जाये वो साधक नहीं हो सकता।साधक तो पाषाण को तोड़कर जलधार प्रगट करने की क्षमता रखता है.

शत्रु आपको विचलित कर सकता है किन्तु परास्त नहीं।क्युकी आपके पास साधना की शक्ति है.इस विषय पर आपके समक्ष वीरभद्र साधना प्रस्तुत है.

इस साधना के माध्यम से आप शत्रु के हर षड़यंत्र को विफल कर सकते है.साथ ही उसे स्वयं से दूर जाने पर विवश कर सकते है.

प्रस्तुत साधना से केवल आप शत्रु पर विजय प्राप्त करे,किसी का अनर्थ करने की चेष्टा न करे अन्यथा प्रयोग की तीव्रता से आपका अनिष्ट हो सकता है.अतः संकल्प केवल विजय प्राप्ति का हो इसके सिवा और कोई नहीं।

साधना आप किसी भी रविवार या अमावस्या की रात्रि ११ के बाद आरम्भ कर सकते है.आपका मुख दक्षिण की और हो.अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर शिवलिंग स्थापित करे.

वीरभद्र शिव का ही रौद्र रूप है अतः आपको किसी अन्य विग्रह आदि की आवश्यकता नहीं है.आपके आसन वस्त्र लाल होना आवश्यक है। भगवान  शिव का सामान्य पूजन करे.तील के तेल का दीपक लगाये।तथा भोग में कोई भी मिठाई अर्पण करे.

भगवान  शिव के समक्ष प्रार्थना करे वे वीरभद्र रूप धारण कर हमारे जीवन से शत्रु का नाश करे तथा उसे पराजित करे.इसके बाद वीरभद्र मंत्र की २१ माला जाप रुद्राक्ष माला से करे.

मंत्र में जहा अमुक आया है वहा  शत्रु का नाम ले। जाप के बाद पूर्ण ह्रदय से प्रार्थना करे तथा प्रसाद स्वयं ग्रहण करे.यह क्रम तीन दिनों तक अवश्य करे.

अंतिम दिन अग्नि प्रज्वलित कर घी तथा काली  मिर्च को मिलाकर  १०८ आहुति प्रदान करे.बाद में यज्ञ की भस्म को जल प्रवाह कर दे,थोड़ी सी भस्म संभाल  कर रख ले,और शत्रु के द्वार पर मंत्र पड़कर भस्म फेक आये.

अगर ये संभव न हो तो उसके घर की और मुख करके भस्म फुक मारकर मंत्र पडत हुए उड़ा  दे.इस प्रकार ये साधना पूर्ण होती है,तथा साधक को शत्रु से मुक्ति प्रदान कर सुखी करती है.

मंत्र : ॐ ह्रौं हूं वीरभद्राय अमुक शत्रु नाशय नाशय हूं ह्रौं फट 

OM HROUM HOOM VEERBHADRAAY AMUK SHATRU NAASHAY NAASHAY HOOM HROUM PHAT

माँ आप  सबका कल्याण करे तथा आप सभी को साधना में सफलता प्रदान करे,इसी कामना के साथ 

राज गुरु जी

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Thursday, March 23, 2017

शिव शक्ति महाअघोर कवच

और लघु प्रयोग

मित्रो जिन साधको ने " शिव शक्ति महाअघोर कवच " मंगवाए थे,कवच निर्मित होते ही उन्हें कवच भेजने कि क्रिया आरम्भ कर दी जायेगी।

आपको कवच प्राप्ति के बाद साधना के लिए अधिक प्रतीक्षा न करना पड़े इसलिए यहाँ महाअघोर कवच पर किये जाने वाले कुछ लघु प्रयोग दिए जा रहे है,ताकि आप कवच प्राप्त होते ही उस पर प्रयोग कर सके.अतः आपकी सेवा में कुछ लघु प्रयोग प्रस्तुत है.

१ निरंतर धन लाभ हेतु

आप ये प्रयोग अपनी नित्य पूजा में सम्मिलित कर सकते है.अपने सामने " शिव शक्ति महाअघोर कवच " को स्थापित करे और आपको कवच के साथ जो " सिद्धिप्रद रुद्राक्ष " दिया जा रहा है.उस रुद्राक्ष को कवच के ऊपर रखे या कवच के पास उससे सटाकर रख दे रुद्राक्ष इस प्रकार रखे कि वो कवच से स्पर्श होता रहे.अब सिद्धिप्रद रुद्राक्ष पर त्राटक करते हुए,

हूंहूं धनलक्ष्मी आकर्षय आकर्षय हूंहूं

मंत्र का जाप करे त्राटक आपको नित्य ५ मिनट  तक करना है,या आप रुद्राक्ष माला से जाप करते हुए एक माला करे और त्राटक करते रहे.इस प्रयोग से आपके जीवन में कभी भी धन कि रूकावट नहीं आएगी।

२  तंत्र बाधा निवारण

किसी भी समय ये प्रयोग किया जा सकता है.अपने बाये हाथ में कवच और रुद्राक्ष को रखकर मुट्ठी बांध ले.मुट्ठी जितनी हो सके कसकर बांधे।और अपने सामने एक पात्र में थोडा जल रखे.अब रुद्राक्ष माला से

रं रं हूं हूं फट

५ माला जाप करे.इसके बाद जल में फुक मार दे और कवच तथा रुद्राक्ष को पात्र से स्पर्श कराते  हुए ११ बार पुनः उपरोक्त मंत्र का जाप करे.फिर ये जल जिसे पिलाया जायेगा उस पर किया गया तंत्र प्रयोग तुरंत नष्ट हो जायेगा।आप इस जल को घर में भी छिट सकते है इससे घर नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित हो जायेगा।

३ बुरे सपनो के नाश हेतु

बाये हाथ में कवच और एक सुपारी रखे और दाये हाथ से ह्रदय मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए. " ॐ हूं वज्रेश्वर हूं " मंत्र का २१ बार जाप करे.इसके बाद इस सुपारी को जिसे बुरे स्वप्न  आते हो उसके तकिये के निचे रात  को सोते समय रख दे.और अगले दिन इस सुपारी को घर के बाहर फिकवा दे.समस्या का निवारण हो जायेगा।

४ उदर रोग नाश हेतु

किसी लाल वस्त्र पर एक पात्र स्थापित करे और उसे भस्म से भर दे.इस भस्म पर कवच स्थापित कर दे.और बाये हाथ में सिद्धिप्रद रुद्राक्ष रखे,अब

" ॐ ह्रीं शूलधारिणी ह्रीं फट "

मंत्र का रुद्राक्ष माला से २१ माला जाप करे प्रत्येक माला के बाद रुद्राक्ष को कवच से स्पर्श कराये।जब जाप पूर्ण हो जाये रुद्राक्ष और कवच संभाल  कर रख दे.और भस्म जिसे उदर रोग हो उसे नित्य एक चुटकी  सेवन कराये तथा कुछ भस्म पेट पर भी लगाये धीरे धीरे उदर रोग समाप्त होने लगेगा।

५ विपदा नाश हेतु

कभी कभी जीवन में एक के बाद एक विपदा आती रहती है.ऐसी समस्या के निवारण हेतु रविवार रात्रि १० के बाद कवच को लाल वस्त्र पर स्थापित करे.कवच का सामान्य  पूजन करे.और ११ माला रुद्राक्ष माला से

" ॐ हूं ह्लीं हूं फट "

 मंत्र कि ११ माला संपन्न करे.जाप के बाद अग्नि प्रज्वलित कर,सरसो के तेल और काली मिर्च से २५१ आहुति प्रदान करे.

इन प्रयोगो में सभी जाप वाचिक या उपांशु होंगे।मित्रो भविष्य में भी कई प्रयोग समय समय पर दिए जायेंगे।साधनाओ से सम्बंधित किसी भी प्रश्न के उत्तर हेतु आप सादर आमंत्रित है.

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Wednesday, March 22, 2017

सिद्ध योगिनी साधना

तंत्र में सदा से योगिनीयो का अत्यंत महत्व रहा है.तंत्र अनुसार योगिनी आद्य शक्ति के सबसे निकट होती है.माँ योगिनियो को आदेश देती है और यही योगिनी शक्ति साधको के कार्य सिद्ध करती है.मात्र लोक में यही योगिनिया है जो माँ कि नित्य सेवा करती है.

योगिनी साधना से कई प्रकार कि सिद्धियाँ साधक को प्राप्त होती है.प्राचीन काल में जब तंत्र अपने चरम पर था तब योगिनी साधना अधिक कि जाती थी.परन्तु धीरे धीरे इनके साधको कि कमी होती गयी और आज ये साधनाये बहुत कम हो गयी है.

इसका मुख्य कारण है समाज में योगिनी साधना के प्रति अरुचि होना,तंत्र के नाम से ही भयभीत होना,तथा इसके जानकारो का अंतर्मुखी होना।इन्ही कारणो से योगिनी साधना लुप्त सी होती गयी.परन्तु आज भी इनकी साधनाओ के जानकारो कि कमी नहीं है.आवश्यकता है कि हम उन्हें खोजे और इस अद्भूत ज्ञान कि रक्षा करे.

मित्रो आज हम जिस योगिनी कि चर्चा कर रहे है वो है " सिद्ध योगिनी " कई स्थानो पर इन्हे सिद्धा योगिनी या सिद्धिदात्री योगिनी भी कहा गया है.ये सिद्दी देने वाली योगिनी है.

जिन साधको कि साधनाये सफल न होती हो,या पूर्ण सफलता न मिल रही हो.तो साधक को सिद्ध योगिनी कि साधना करनी चाहिए।इसके अलावा सिद्ध योगी कि साधना से साधक में सतत प्राण ऊर्जा बढ़ती जाती है.और साधना में सफलता के लिए प्राण ऊर्जा का अधिक महत्व होता है.

विशेषकर माँ शक्ति कि उपासना करने वाले साधको को तो सिद्ध योगिनी कि साधना करनी ही चाहिए,क्युकी योगिनी साधना के बाद भगवती कि कोई भी साधना कि जाये उसमे सफलता के अवसर बड़ जाते है.साथ ही इन योगिनी कि कृपा से साधक का गृहस्थ जीवन सुखमय हो जाता है.

जिन साधको के जीवन में अकारण निरंतर कष्ट आते रहते हो वे स्वतः इस साधना के करने से पलायन कर जाते है.आइये  जानते है इस साधना कि विधि।

आप ये साधना किसी भी कृष्ण पक्ष कि अष्टमी से आरम्भ कर सकते है.इसके अलावा किसी भी नवमी या शुक्रवार कि रात्रि भी उत्तम है इस साधना के लिए.साधना का समय होगा रात्रि ११ के बाद का.आपके आसन तथा वस्त्र लाल होना आवश्यक है.

इस साधना में सभी वस्तु लाल होना आवश्यक है.अब आप उत्तर कि और मुख कर बैठ जाये और भूमि पर ही एक लाल वस्त्र बिछा दे.वस्त्र पर कुमकुम से रंजीत अक्षत से एक मैथुन चक्र का निर्माण करे.

इस चक्र के मध्य सिंदूर से रंजीत कर " दिव्याकर्षण गोलक " स्थापित करे  जिनके पास ये उपलब्ध न हो वे सुपारी का प्रयोग करे.इसके बाद सर्व प्रथम गणपति तथा अपने द्गुरुदेव का पूजन करे.

इसके बाद गोलक या सुपारी को योगिनी स्वरुप मानकर उसका पूजन करे,कुमकुम,हल्दी,कुमकुम मिश्रित अक्षत अर्पित करे,लाल पुष्प अर्पित करे.

भोग में गुड का भोग अर्पित करे,साथ ही एक पात्र में अनार का रस अर्पित करे.तील के तेल का दीपक प्रज्वलित करे.इसके बाद एक माला नवार्ण मंत्र कि करे.जाप में मूंगा माला का ही प्रयोग करना है या रुद्राक्ष माला ले.

नवार्ण मंत्र कि एक माला सम्पन करने के बाद,एक माला निम्न मंत्र कि करे,

ॐ रं रुद्राय सिद्धेश्वराय नमः

इसके बाद कुमकुम मिश्रित अक्षत लेकर निम्न लिखित मंत्र को एक एक करके पड़ते जाये और थोड़े थोड़े अक्षत गोलक पर अर्पित करते जाये।

ॐ ह्रीं सिद्धेश्वरी नमः

ॐ ऐं ज्ञानेश्वरी नमः

ॐ क्रीं योनि रूपाययै नमः

ॐ ह्रीं क्रीं भ्रं भैरव रूपिणी नमः

ॐ सिद्ध योगिनी शक्ति रूपाययै नमः

इस क्रिया के पूर्ण हो जाने  के बाद आप निम्न मंत्र कि २१ माला जाप करे.

ॐ ह्रीं क्रीं सिद्धाययै सकल सिद्धि दात्री ह्रीं क्रीं नमः

जब आपका २१ माला जाप पूर्ण हो जाये तब घी में अनार के दाने मिलाकर  १०८ आहुति अग्नि में प्रदान करे.ये सम्पूर्ण क्रिया आपको नित्य करनी होगी नो दिनों तक.आहुति के समय मंत्र के अंत में स्वाहा  अवश्य लगाये।

अंतिम दिवस आहुति पूर्ण होने के बाद एक पूरा अनार जमीन पर जोर से  पटक कर फोड़ दे और उसका रस अग्नि कुंड में निचोड़ कर अनार उसी कुंड में डाल दे.अनार फोड़ने से निचोड़ने तक सतत जोर जोर से बोलते रहे,

सिद्ध योगिनी प्रसन्न हो।

साधना समाप्ति के बाद अगले दिन गोलक को धोकर साफ कपडे से पोछ ले और सुरक्षित रख ले.कपडे का विसर्जन कर दे.

नित्य अर्पित किया गया अनार का रस और गुड साधक स्वयं ग्रहण करे.सम्भव हो तो एक कन्या को भोजन करवाकर दक्षिणा दे,ये सम्भव न हो तो देवी मंदिर में दक्षिणा के साथ मिठाई का दान कर दे.

इस प्रकार ये दिव्य साधना पूर्ण होती है.निश्चय ही अगर साधना पूर्ण मनोभाव और समर्पण के साथ कि जाये तो साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते है.और जीवन को एक नविन दिशा मिलती ही है.तो अब देर कैसी आज ही संकल्प ले और साधना के लिए आगे बड़े.

राज गुरु जी

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अघोर महालक्ष्मी दरिद्रता नाशक प्रयोग

जिन साधको ने " शिवशक्ति महाघोर कवच " मंगवाए थे उन सभी को कवच प्राप्त हो चुके है.अतः कवच पर कि जाने वाली साधना अब ब्लॉग पर आरम्भ कि जा  रही है.

मित्रो लक्ष्मी का जीवन में क्या महत्व है ये तो सभी जानते है.परन्तु परिश्रम के बाद भी यदि लक्ष्मी दूर रहे तो मनुष्य को साधना मार्ग का आश्रय लेना ही चाहिए।

क्युकी एक साधक पूर्णता प्राप्त करना चाहता है.और संसार में घुट घुट कर जीना एक साधक का काम नहीं है.साधक तो हर समस्या कि छाती पर पैर रखकर आगे निकल जाता है.और समस्त संसार का भोग करते हुए अंत में अपने इष्ट में लीन  हो जाता है.

संसार के भोग के लिए निश्चय ही लक्ष्मी कि कृपा कि आवश्यकता है.क्युकी जिस पर लक्ष्मी प्रसन्न न हो उसे धन तो मिल ही नहीं सकता साथ ही धन के अभाव के कारण मनुष्य कुण्ठा भाव से भी ग्रसित हो जाता है.और रही सही कसर  हमारा समाज पूरी कर देता है.

निरंतर आपको आपकी निर्धनता के बारे में कह कह कर.परन्तु आप स्मरण रखे प्रकृति ने यदि आपके भाग्य में कोई दुःख लिखा है तो उस दुःख को सुख में परिवर्तित करने का मार्ग भी इसी प्रकृति में ही है.

तंत्र में शिव कहते है कि मनुष्य को वही दुःख प्राप्त होता है जिसका हल पहले से निकाला  जा चूका है.बस मनुष्य उस हल को खोज नहीं पाता  है और फिर उसे भाग्य मानकर बैठ जाता है.कितनी सुलझी हुई बात कही है शिव ने.और एक साधक कभी भाग्य का रोना नहीं रोता है.

साधक तो भाग्य को परिवर्तित करने कि क्षमता रखता है.आपके हाथो में तंत्र रूपी कुंजी है जिसके माध्यम से आप भाग्य पर लगे ताले बड़ी सरलता से खोल सकते है.बस आवश्यकता है परिश्रम कि और समर्पण कि.

मित्रो आज जो आपको साधाना दी जा रही है.इस साधना के माध्यम से आपके जीवन में धन आगमन के मार्ग स्वतः खुल जायेंगे।साथ ही यदि किसी ने आपके रोजगार पर कोई बंधन कर दिया है तो वो भी स्वतः ही दूर हो जायेगा।धन कि समस्या का हल होगा एवं आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

प्रस्तुत प्रयोग  अघोर मार्ग का तीव्र प्रयोग है जिसका प्रभाव होता ही है.यहाँ एक बात  और कहना चाहूंगा कि आप जब भी कोई साधना करे.अपने द्वारा जपे जा रहे मंत्र पर और कि जा रही क्रिया पर पूर्ण विश्वास रखे.तील मात्र भी शंका हो तो सारी  क्रिया और जप व्यर्थ चला जाता है.

अतः साधना में विश्वास रखे.आईये अब हम  विधि कि और चलते है.

ये साधना आप किसी भी शुक्रवार से कर सकते है जो कि आपको अगले शुक्रवार तक अर्थात ८ दिनों तक करनी होगी।साधना के एक दिन पहले आप लाल कनेर अथवा नीम वृक्ष को निमंत्रण दे आये ये क्रिया आपको गुरूवार कि शाम को करनी होगी।

दोनों में से किसी एक वृक्ष के पास जाये अब वृक्ष का सामान्य पूजन करे और एक लोटा जल अर्पित करे और कुछ मिठाई का भोग रख तेल का दीपक लगाये अब हाथ में हल्दी मिश्रित अक्षत ले और कहे

 " है वृक्ष राज में कल से अघोर महालक्ष्मी दरिद्रता नाशक प्रयोग  आरम्भ करने जा रहा हु.मुझे उस प्रयोग में आपकी एक टहनी कि आवश्यकता है अतः में कल आपकी टहनी लेने आउंगा,और अक्षत वृक्ष पर अर्पित कर दे.अगले दिन प्रातः कोई अच्छी सी टहनी तोड़ लाये साथ ही वृक्ष के हाथ जोड़कर आर्शीवाद भी ले.अब इस लकड़ी को धोकर इसका सामान्य पूजन करे.

और

" ॐ अघोरेश्वराय हूं फट "

 मंत्र का जाप करते हुए लकड़ी पर सिन्दूर मिश्रित अक्षत अर्पित करे.ये क्रिया १०८ बार करे और लकड़ी को सुरक्षित रख दे.

अब शुक्रवार रात्रि ११.३० बजे के करीब आप साधना आरम्भ कर सकते है.स्नान कर लाल वस्त्र धारण करे,तथा उत्तर कि और मुख करके लाल आसन पर बैठ जाये।भूमि पर बाजोट रखे तथा उस पर लाल वस्त्र बिछा दे.इस पर

" शिव शक्ति महाअघोर कवच रखे "

अब कवच के ऊपर ही हल्दी मिश्रित अक्षत के एक ढेरी  बनाये।ढेरी  इतनी बड़ी होनी चाहिए कि कवच पूरा ढक जाये।अब इस ढेरी पर एक सुपारी स्थापित करे सुपारी को सिंदूर से रंजीत करके ही स्थापित करे.

अब सर्व प्रथम सद्गुरु तथा गणपति का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करे.इसके बाद सुपारी का लक्ष्मी मानकर सामान्य पूजन करे.कुमकुम,हल्दी अक्षत अर्पित करे.खीर अथवा किसी भी मिष्ठान्न का भोग अर्पित करे.तील के तेल  का दीपक जलाये।अब

 " आओ लक्ष्मी विराजो कष्ट हरो आदेश अघोरेश्वर को "

 बोलते हुए २१ बार  सुपारी पर सफ़ेद तील अथवा अक्षत अर्पित करे.इस क्रिया के बाद जो लकड़ी आप लाये थे उसे अपने दाहिने हाथ में रखे और पास में ही एक कटोरी में अक्षत भरकर उस कटोरी में सिद्दीप्रद रुद्राक्ष स्थापित कर दे.

अब निम्न लिखित अघोर शाबर मंत्र को एक बार पड़े,पड़ते समय लकड़ी को सिद्धिप्रद रुद्राक्ष से स्पर्श कराकर रखे और जैसे ही मंत्र पूर्ण हो लकड़ी को सुपारी से स्पर्श कराये।

बस यही क्रिया आपको बार बार सतत २ घंटे करनी होगी।मंत्र को पड़ना है और सुपारी से स्पर्श कराना है.जब ये क्रिया पूर्ण हो जाये तो भगवान अघोरेश्वर और लक्ष्मी से दरिद्रता दूर करने कि प्रार्थना करे.

नित्य ये क्रिया आपको करनी होगी।साधना के अंतिम दिन जाप पूर्ण हो जाने के बाद.घृत में गूगल,तथा सफ़ेद तील मिलाकर २१ आहुति अग्नि में प्रदान करे.

आहुति पूर्ण हो जाने के बाद एक बार पुनः मंत्र पड़े और निम्बू काटकर अग्नि में निचोड़ दे.इस प्रकार ये साधना पूर्ण होती है.

अगले दिन रुद्राक्ष और कवच को रख ले.वस्त्र तथा अक्षत विसर्जित कर दे.आप जो लकड़ी लाये थे पुनः उसी वृक्ष के पास जाकर रख आये वृक्ष का पूर्व कि  भाती  ही पूजन करे भोग अर्पित करे तथा टहनी प्रदान करने के लिए धन्यवाद दे.

मंत्र

लागी लागि लागी अघोर धुन लागी,आयी धनलछमी भागी भागी भागी,घर मोय आईके दरिद्रता मिटाये,ना करे कहा तो अघोर दंड खाये,आदेश अघोरेश्वर को आदेश

इस प्रकार आपकी ये दिव्य साधना पूर्ण होती है जो कि आपके जीवन को बदलकर रख देने में सक्षम है.आवश्यकता है कि आप साधना को पूर्ण निष्ठा से करे.

किसी भी प्रश्न के लिए मेल करे.तथा अपनी और से मंत्र में कोई परिवर्तन ना करे.जैसा लिखा गया है वैसा ही करे.

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Tuesday, March 21, 2017

वशीकरण (सिंदूर) प्रयोग-

किसी भी बुधवार की रात्रि में पीले वस्त्र धारण करे पीले आसन पर बैठे।आपका मुख उत्तर या पूर्व की और हो।सामने बजोट पर पिला वस्त्र बिछा उस पर दत्तात्रेय यन्त्र रखे और उस यन्त्र पर सिंदूर रख दे।

घी का दीपक जलाये और मूल मंत्र का रुद्राक्ष माला से 11 माला जाप करे।जप समाप्ति पर सिंदूर को चांदी की डिबिया में संभाल कर रख ले।

अब जब भी आपको किसी से कोई कम करवाना हो तो मंत्र का मात्र 11 बार जाप करे और सिंदूर का तिलक लगाकर उस व्यक्ति के पास चले जाये,वो आपकी बात नहीं टालेगा।

जिन स्त्रियों के पति गलत संगत में हो वे इसे रोज़ अपनी मांग में भरे या तिलक लगाये।उनके पति निसंदेह सही मार्ग पर आ जायेंगे।बस आवश्यकता है साधना पर विश्वास कर उसे पूर्ण निष्ठां से करने की। मंत्र :

॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं द्राम दत्तात्रेयाय नम: ॥

॥ om shreem hreem kleem glaum draam dattatreyay namah ॥

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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वाक् सिद्धि हेतु तारा साधना

कई बार कुछ लोग ऐसे होते है,जो बोलने में झिझक महसूस करते है।कई लोग प्रेजेंटेशन ठीक से नहीं दे पाते है क्युकी उनकी वाक् शक्ति कमज़ोर है या वे बहुत लोगो के बिच बोलने में डर जाते है।

भाषण देना हो तो डर जाते है,की इतने सारे लोगो के सामने कैसे बोलू। इन सारी समस्यायों का हल है ये माँ तारा की साधना।माँ तारा साधक की बुद्धि को तेज कर उसे वाक् सिद्धि प्रदान करती है।और ये साधना मोहिनी साधना के नाम से भी जानी जाती है।

क्युकी इस साधना से जहा एक तरफ आपके अन्दर बोलने की शक्ति उत्पन है वही दूसरी तरफ आपकी वाणी में एक आकर्षण पैदा हो जाता है जिससे कोई आपकी बात को टाल नहीं पाता है।

अतः एक साधक को अपने जीवन में ये साधना एक बार अवश्य ही करना चाहिए।क्युकी ये साधना तो माँ तारा का वरदान है अपने भक्तो के लिए।

  विधि:

यह साधना किसी भी बुधवार की रात्रि से आरम्भ की जा सकती है।समय रात्रि 10 के बाद का हो।साधक लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर बैठे।आपका मुख पूर्व की और हो या उत्तर की और हो।

सामने बजोट पर लाल वस्त्र बिछा कर गुरुदेव का चित्र स्थापित करे,साथ ही गणेश विग्रह या चित्र और तारा यन्त्र भी स्थापित करे।

 सद्गुरु पूजन कर 1 माला गुरु मंत्र की करे,फिर गणेश पूजन करे,फिर यन्त्र का पंचोपचार पूजन करे।भोग में कोई भी मोसमी फल बिना काटे अर्पण करे,तील के तेल का दीपक और अगरबत्ती लगाये।

फिर हाथ में जल लेकर संकल्प करे की माँ में ये साधना वाक् सिद्धि प्राप्त करने के लिए कर रहा हु आप मुझ पर कृपा करे।फिर स्फटिक माला से मूल मंत्र की 21 माला करे।यह साधना 21 दिन करे।

आखरी दिन जाप के बाद हवन सामग्री में जौ और घी मिलाकर कम से कम 108 आहुति दे या इससे ज्यादा भी दी जा सकती है पर कम न हो।इस तरह यह साधना संपन्न होती है साधना के मध्य ही साधक को अपनी वाणी में हो रहे परिवर्तन दिखाई देने लगते है।

 ब्रह्मचर्य का पालन करे।तथा गुरु चरणों में मन लगाये। जय माँ तारा

मंत्र:

ॐ नमः पद्मासने शब्दरुपे एम ह्रीं क्लीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Monday, March 20, 2017

चौंतीसा लक्ष्मी प्राप्ति यंत्र

प्रभाव : -

१ . इस के प्रभाव से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।

२.  जिस की दुकान धनदा कम चल रहा हो । उस को ये यंत्र अपनी दुकान में स्थापित करना चाइये । इस के प्रभाव से दुकानदारी चलने लगती है ।

३. जिस के घर में धन का अभाव रहता हो उसको अपने घर में इस यंत्र को स्थापित करना चाइये ।

विधान :-

इस यंत्र को अष्टगंध या केशर की स्याही से अनार की कलम द्वारा रवि पुष्य नक्षत्र में निर्माण करना चाइये ।

विधिवध पूजन कर ११ पाठ श्री सूक्त के करने चाइये । गूगल से १०८ आहुति लक्ष्मी मंत्र की देनी चाइये ।

तथा ११ कन्याओं को खीर का भोजन करवाकर उनके पैर पूजने चाइये । और इस यंत्र को प्रार्थना  कर माँ लक्ष्मी से आशीर्वाद रूप लेरहे हैं ।

 इस प्रकार की भाव मन में रख कर आपने उद्देश अनुसार प्रयोग करना चाहिये ।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Sunday, March 19, 2017

उपाय जो बदल देगाआपकी किस्मत

आपकी समस्याएं-  

- क्या आप अपने जीवन से तंग आ चुके हैं?

- क्या आप धन की कमी से परेशान हैं?

- क्या आप पारिवारिक कलह से झुंझलाहट व क्रोध में रहते हैं।

- आप बच्चों की शादी से संकट में हैं?

- क्या आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाकर थक चुके हैं?

- क्या आपके ऊपर या परिजनों पर बुरी नजर लगी है?

- क्या आप हमेशा भाग्य को दोष देते रहते हैं?

- क्या आपका व्यापार-धंधा, उद्योग ठप है?

- क्या आपको नौकरी में प्रमोशन नहीं मिल रहा?

- क्या आप किसी को अपने वश में करना चाहते हैं?

- क्या आपकी जमीन, जायदाद जबरन हड़प ली है?

- क्या आप कोई नई नौकरी की तलाश में हैं?

- क्या आप एक अच्छा इंसान बनना चाहते हैं?

- क्या आपको मकान बनवाने में कई अड़चनें आ रही हैं?

- क्या आप अपनी धर्मपत्नी से परेशान हैं?

- क्या आप अपने पति की बुरी आदतें सुधारना चाहती हैं?

- क्या आपका बच्चा/बच्ची गुम हो गया है और सब प्रयासों 

के बावजूद वह नहीं मिल रहा है।

- क्या आप लव-मैरिज करना चाहते हैं?

- क्या आप अपनी सास को सुधारना चाहती हैं?

- क्या आपका कहना आपके बच्चे नहीं मानते?

- क्या आप अपने बच्चों को परीक्षा में अच्छे नंबर दिलाना चाहते हैं?

- क्या आप बार-बार दुर्घटना के शिकार हो रहे हैं?

- क्या आपके घर में बार-बार दुर्घटनाएं घटित हो रही हैं? 

एक उपाय जो बदल देगी आपकी किस्मत :- 

हर धार्मिक ग्रंथ में एक ही उपाय बताया गया है कि कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। ईश्वर सब जानता है। लेकिन जब दुर्भाग्य साथ जुड़ जाता है तो जातक कुछ नहीं कर पाता। 

कई वर्षों के शोध एवं अनुसंधान से हमारे संस्थान ने एक उच्चकोटि का तंत्र (ताबीज) स्वर्णभस्म, पारा एवं 18 अन्य बहुमूल्य चीजों से निर्मित किया है। 

यह तंत्र (ताबीज) प्राण-प्रतिष्ठित किया हुआ है, जिसका प्रभाव जिंदगी भर रहता है। इसके गले में धारण करने से आपका दुर्भाग्य, सौभाग्य में बदल जाएगा।

 इसके धारण करते ही आप इसका प्रभाव स्वयं देख सकते हैं। यंत्र की न्यौछावर मात्र  1500/-  रुपये (सामान्य) एवं  2500 रुपये (स्पेशल) है। 

नोट - 

तंत्र (ताबीज) पहनकर किसी के निधन, उठावनी, क्रियाक्रम संस्कार में नहीं जाना है, न ही शवयात्रा के पास से गुजरना है।

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Saturday, March 18, 2017

आकस्मिक / फंसा धन प्राप्ति प्रयोग(शेयर, लॉटरी, सट्टा एवम् प्रॉपर्टी में विशेष लाभदायक)
आकस्मिक धन प्राप्ति प्रयोग

(शेयर, लॉटरी, सट्टा एवम् प्रॉपर्टी में विशेष लाभदायक)
तांत्रिक जड़ीबूटियां
मित्रों,
    वनस्पति तंत्र के ऐसे कई प्रयोग हैं जो अविश्वसनीय रूप से लाभ पहुंचाते हैं।

ऐसी ही एक अद्भुद तंत्रोक्त वनस्पति है
हरसिंगार यानि पारिजात।

विद्वतजनों के अनुसार पुराणों में कल्पवृक्ष के नाम से सम्बोधन पाने वाला वृक्ष पारिजात है।

हरसिंगार के बारे में पुराणों में वर्णन है की ये समुद्रमन्थन में प्रकट हुआ और इसकी अभूतपूर्व सुंदरता के कारण देवराज इंद्र इसे अपने साथ स्वर्ग ले गए और वहां इसका रोपण किया।

भगवान शिव को इसके पुष्प अति प्रिय हैं और इसके पुष्पों से उनका श्रृंगार होने के कारण ही इसे हर सिंगार कहते हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार नारद ऋषि ने इसके फूल स्वर्ग से लाकर भगवान् कृष्ण की पत्नी सत्यभामा को दिए। इन पुष्पों की सुंदरता से अभिभूत सत्यभामा ने श्री कृष्ण से ये वृक्ष लाने की जिद की। वे इसे अपने प्रांगण में लगाना चाहती थीं। कृष्ण ने पहले इंद्र से माँगा पर जब उन्होंने मना किया तो वे स्वर्ग पर आक्रमण कर युद्ध में इंद्र को परास्त कर इसे ले आये।

समुद्रोत्प्नना होने के कारण ये माँ लक्ष्मी का सहोदर हुआ और इसलिए उन्हें अति प्रिय है।

ये वृक्ष हनुमान जी को भी अति प्रिय है और वर्णन है कि

आञ्जनेय मति पाटलालनं
काञ्चनाद्रिकमनीय विग्रहं
पारिजात तरु मूल वासिनं
भावयामि पवमान नन्दनम।।

इस वृक्ष का महात्म्य इसी से समझा जा सकता है की इसके पुष्पों को हाथ से नहीं तोडा जाता और तोड़ने पर देवकोप का भाजन बनना पड़ता है। वृक्ष के नीचे रात्रि में चादर बिछा दी जाती है और रात्रि में जो पुष्प उस पर स्वयं टूट कर गिरते हैं उनसे ही प्रातः भगवान् का श्रृंगार होता है।

जिस घर में ये वृक्ष मात्र लगा हो वहां कभी दरिद्रता नहीं आती।

जहाँ इसका नित्य पूजन होता है वो घर समृद्धिशाली होता है।

इसके नीचे विद्यार्जन यानि पठन पाठन करने से माँ सरस्वती का आशीर्वाद सदैव प्राप्त होता है।

यह पौधा चंद्र से संबंध रखता है। घर के बीचोबीच या घर के पिछले हिस्से में इसको लगाना लाभकारी होता है। इसकी सुगंध से मानसिक शांति मिलती है।आयुर्वेद में भी ये बेहद महत्वपूर्ण औषधि है।

ग्रामीण भाषा में इसे हडजोड़  भी कहते हैं ,क्योकि ग्रामीण क्षेत्रों में टूटी हुई हड्डी आदि को जोड़ने के लिए इसकी टहनियों को कुचलकर टूटी जगह लगाकर बांधने से हड्डी आपस में जुड़कर ठीक हो जाती है |

इसके अलावा गठिया में इसके पत्तों की चटनी खाने से लाभ होता है।

इसकी पत्तियों और बीज को तिल के तेल में पकाकर उस तेल की मालिश करने से गंजे के सर में भी बाल आ जाते हैं और ये प्रमाणिक प्रयोग है। बालों के टूटने झड़ने सफ़ेद होने से बचाने के लिए भी ये राम बाण प्रयोग है।

ऊपरी बाधा से ग्रसित व्यक्ति को इसका अभिमंत्रित मूल पहनाने से लाभ होता है।

इसके बहुत से तांत्रिक उपयोग हैं ,जैसे पारिवारिक कलह हटाने के लिए समृद्धि और सर्वत्र विजय के लिए।

आकस्मिक धन प्राप्ति हेतु प्रयोग

आकस्मिक धन प्राप्ति के लिए रवि पुष्य नक्षत्र में प्राप्त हर सिंगार की जड़ और श्वेत गूंजा के ग्यारह दाने और उसी नक्षत्र में निर्मित और अभिमंत्रित प्राण प्रतिष्ठित विजय लक्ष्मी यन्त्र चांदी के ताबीज में धारण करने से आकस्मिक धन प्राप्ति के साधन बनते रहते हैं ।

शेयर मार्किट , रिस्क इन्वेस्टमेंट, जुआ ,सट्टा, लाटरी , जमीन प्रापर्टी ,सेल्स से जुड़े लोगों के लिए यह बहुत कारगर हो सकता है ।

इसे अपने कार्यस्थल, केबिन- डेस्क , या दुकान प्रतिष्ठान में स्थापित किया जा सकता है।

बाजार में फंसे धन की प्राप्ति

यदि आप व्यापारी हैं और आपका पैसा बाजार में फंसा अटका है। काम पूरा करने के बाद भी पेमेंट बहुत धीरे धीरे टुकड़ों में मिलती है तो उपरोक्त सामग्री यानि पारिजात मूल, श्वेत गुंजा, और विजय लक्ष्मी यंत्र को कुश के बांदे के साथ अपने दुकान प्रतिष्ठान के मन्दिर में स्थापित करें। शीघ्र ही फंसे पैसे वापस आने शुरू हो जायेंगे।

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Thursday, March 16, 2017

व्यापार बन्धन - कर्ज मुक्ति पोटली

    व्यापारी, कारोबारी या दुकानदार हर कोई व्यापार में उतार चढ़ाव से परेशान है।

 कभी कभी ये मार्किट की मंदी से भी होता है जो समझ में आता है किंतु कई बार अच्छी मार्किट होने पर भी धंधा बिलकुल मन्दा या ठप हो जाता है जो अक्सर व्यापार बन्धन होने से ही होता है।

दुकान या बिजनेस चाहे छोटा हो या बड़ा हर कोई इज़से परेशान है छोटे से किराना व्यापारी, ब्यूटी पार्लर वाले से लेकर बड़े बड़े प्रोपेर्टी डीलर और बिल्डर तक।

ये व्यापार का बन्धन सबसे पहले आपके विरोधी कराते हैं जो आपके ही धंधे में होते हैं, जब वो देखते हैं कि आपके अच्छे सामान, काम और व्यवहार के कारण उनका धंधा ठप हो रहा है।

दूसरे आपके पास पड़ोस के दुकानदार या लोग जो आपकी बढ़ती दुकानदारी और तरक्की देख नहीं पाते। जलने लगते हैं।

तीसरे आपके ही कोई सगे सम्बन्धी, मित्र, रिश्तेदार जो आपकी समृद्धि और तरक्की से जलते हैं।

ये बन्धन कई प्रकार के हो सकते हैं, भस्म भभूत, उड़द, सरसों, राई, छोटे से लाल, हरे, नीले या काले धागेसे, किसी यंत्र ताबीज़ से, छोटे सादे कागज से भी।
ये सब उस तांत्रिक पर निर्भर है कि वो क्या और कैसे कर के देता है।
कुछ चीजें आपकी पीठ पीछे दुकान ऑफिस के शटर के बाहर डाल दी जाती है, कुछ शटर गेट पर रख दी जाती हैं तो कुछ आपकी नजरो के सामने ही कर दी जाती हैं और आपको पता भी नहीं चलता।

व्यापार बन्धन होता है तो कमाई ठप और फिर उधार का चक्र चलता है। पहले हुए माल की रकम भी नहीं दे पाते और नया लेने पुराना चुकाने को कर्ज लेते हैं।
कभी व्यापार बढ़ाने को कर्ज लेते हैं माल लाते हैं और माल बिकता नहीं बस डंप हो जाता है।

कभी कभी इज़से उबरने को सट्टे में भी पैसा लगाते हैं कि शायद किस्मत साथ दे जाये और सब निपट जाये किंतु दांव उलटे पड़ते हैं और कर्ज उधारी घटने के बजाए बढ़ जाती है। कभी कभी तो दोगुनी और उससे भी ज्यादा हो जाती है।

    इन सभी चीजों से निपटने के लिए मैं पहले भी कई उपाय दे चुका हूँ।
कर्ज मुक्ति

व्यापार वृद्धि
जुएं सट्टे लॉटरी में सफलता हेतु
व्यापार बन्धन खोलने हेतु

किंतु इतना सब कर पाना , क्रमशः कई पाठ नियमित रूप से करना, जप करना आदि लोगों से सम्भव नहीं हो पाता।

कहीं कहीं कुछ दुर्लभ चीजें भी चाहिए जो पहले तो मिलती नहीं, मिले भी तो महंगी और असली नकली का संशय भी बना रहता है।

इसीलिए इस नवरात्रि में परम् आदरणीय गुरुदेव के निर्देशन में हम एक विशेष

लक्ष्मी गणपति यंत्र पोटली

तैयार कर रहे हैं, जो सभी प्रकार के व्यापार बन्धन चाहे हिन्दू तंत्र से हो या मुस्लिम  खोलने में सक्षम है।

 लक्ष्मी का आकर्षण करेगी अतः कर्ज से मुक्ति दिलाएगी।

जुएं सट्टे में भी विजय दिलवायेगी। (जेब में ले जाएं)

जब किसी विशेष डीलिंग के लिए जाएँ तो दिया धूप दिखाकर इसे अपने साथ जेब या बैग  में ले जाएं।
सबसे बड़ी बात ये की इसमें आपको कोई विशेष जप, पाठ आदि नहीं करना है।

सिर्फ नित्य पूजन की तर्ज पे दिया और धूप भर दिखानी है।

बाकि सब काम भगवान गणेश और माँ लक्ष्मी के सिद्ध यंत्रों से युत ये पोटली स्वयं कर देगी।
जिसका पता आपको शीघ्र ही इसका असर देख के चल जायेगा।

अधिक जानकारी, समस्या समाधान और "श्रीलक्ष्मी गणपति व्यापार बन्धन कर्ज मुक्ति पोटली "मंगवाने हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Wednesday, March 15, 2017

यंत्र

कलयुग वह युग है जिसमे यंत्र शक्ति सबसे ज्यादा प्रबल होती है। प्रत्येक युग में उसके अनुसार किये गए उपाय अधिक कारगर साबित होते है , और कलयुग में मन्त्र तंत्र सभी से अधिक  प्रभावी यंत्र शक्ति है।

इसी लिए सभी दैवीय शक्तियों के मन्त्र के साथ साथ उनके यंत्र भी है।  जिनका धारण करना ,पूजन करना इत्यादि बहुत ही अधिक लाभकारी साबित होता है।

 वर्तमान समय की बाजारवादी मानसिकता ने यंत्र मन्त्र तंत्र को भी बाजार में बिकने वाली वस्तु बना  दिया है।

 विज्ञ जन भलीभांति जानते है की इस प्रकार बाजार  में बिकने वाले मशीनो द्वारा निर्मित यंत्रो से कोई लाभ नही पहुचता। इनमे पवित्रता की कमी तथा अनेक अनेक अशुद्धियाँ होती है.

 बिना प्राणपतिस्ठा और सिद्ध किये कोई यंत्र किसी काम का नही होता।

इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए दैवीय शक्तियों में आस्थावान मनुष्यो  के लिए शुद्ध तथा विधि विधान से हस्त निर्मित यंत्रो को उपलब्ध करने का प्रयास हमारे संस्थान द्वारा किया जा रहा है। इस कार्य  को करने के लिए विशुद्ध ब्राह्मण पंडितो को  ही केवल नियुक्त किया गया है।

हम यंत्रो को बेचते नही है। किन्तु इन्हे तैयार करने में पूजन यजन के विधिविधान में खर्च आता ही है ,अतः हम आपसे सहयोग राशि की जरूर अपेक्षा रखते है ,ताकि यह कार्य अनवरत चल सके।

जो व्यक्ति अत्यंत गरीब है ,बिलकुल भी धन से सहयोग नहीं कर सकते उन्हें दरिद्रता नाशक यंत्र निः शुल्क दिया जाता है।

अपना पता हमरी इ मेल पर भेजे तथा अपनी समस्या भी लिखे ,हम आपका पूरा सहयोग करेंगे।  आपसे किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नही लिया जायेगा।

चेतावनी -

कृपिया झूठ मुठ  बहाना  बना कर निः शुल्क सामग्री मंगवाने का प्रयास न  करे, अन्यथा दैवीय शक्तियों से किया गया मजाक आपकी भरी हानि करायेगा , अतः सावधान यह मजाक का विषय नही है।  

राजगुरु जी

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Saturday, March 11, 2017

वचन  सिद्धि यंत्र ताबीज

भविष्य कथन के क्षेत्र में कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों के लिए आवश्यक है  यह ताबीज।

 सभी भविष्यवक्ता बहुत ही अच्छी तरह से जानते है की बिना दैवीय कृपा  के सफल भविष्य कथन नहीं  किया जा सकता है। यह  वचन  सिद्धि यंत्र ताबीज आपको ऐसी ही दैवीय कृपा दिलाता है , जिससे आप सटीक और सफल  भविष्य कथन करने वाले भविष्य वक्ता बन सकते है।

आज  के समय में "कर्ण पिशाचिनी" जैसी सिद्धियाँ  कर  पाना  संभव  नही है , और सामाजिक  जीवन जीने  वालो को करना भी नहीं चाहिए। ऐसे में दैवीय कृपा प्राप्त करने का सुरक्षित मार्ग  हिमालय वासी अद्भुत चमत्कारी अघोरी बाबा ने हमें दिखाया है  अद्भुत यंत्र ताबीज द्वारा।

यह यंत्र जब सिद्ध करके चांदी के ताबीज में  करके श्रद्धा विश्वाश के साथ धारण किया जाता है तो धारक में अद्भुत चमत्कारी परिवर्तन होते है।

अचानक ही वह वे बातें  भी बताने लगता है जिन्हे साधारण ज्योतिषी कभी  जान ही नही पाता है। आप भी इसका लाभ उठाये और सफल भविष्य वक्त बने।

सहयोग राशि- २५०० मात्र

राजगुरु जी

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Friday, March 10, 2017

श्रीदेवी कवच- आर्थिक उन्नति और ऐश्वर्य प्राप्ति में सहायक

सौभाग्यतारिणी कवच- दुर्भाग्य नाशक और कार्य में सफलता हेतु

सारस्वत कवच – स्मरण शक्ति और विद्यार्जन में सहायक

विघ्नेश्वर कवच- सभी प्रकार की विघ्न बाधाओं से सुरक्षा हेतु

रुद्रमृत्युन्जय कवच – अकाल दुर्घटना और प्रेत बाधा और रोग नाश में सहायक

वल्गाशत्रुन्जयी कवच – शत्रुओं से रक्षाकारी और झूठे मुकदमों तथा राज्य बाधा की उलझन से निकलने में सहायक

क्लींकारी सिद्ध कवच – नौकरी और व्यवसाय में सफलता प्रदायक

राहू रोग नाशक कवच –असाध्य रोगों को साध्य करने हेतु मार्ग दिखाने में सहायक

पंचतत्व कवच – असाध्य  कार्यों को सरल करने में और त्रिदोषों वात-पित्त-कफ जैसे रोगों का नाश करने में सहायक

ऋणमोचक भूमिसुत कवच – कर्जों से राहत प्राप्ति हेतु

तंत्र बाधा निवारण कवच – तांत्रिक बाधाओं और अभिचार कर्मों से पूर्ण रक्षाकारक

काली सम्मोहन कवच- मोहन क्षमता से युक्त और पूर्ण आत्मविश्वास प्रदायक

मातृ शक्ति युक्त नवग्रह कवच – ग्रह माताओं की शक्ति युक्त नवग्रह की अनुकूलता पाने में सहायक

अघोर विवाह बाधा निवारक कवच – विवाह में आ रही बाधाओं का निवारण करने में सहायक

  भविष्य में और भी कई कवचों का निर्माण किया जायेगा,जिसकी सूचना समय समय पर दी ही जायेगी | इनमे से किसी भी कवच या यन्त्र का निर्माण सहज नहीं है और ना ही इनका निर्माण कार्य इनके नाम को पढ़ने जितना सरल ही है |

 हर कवच की निर्माण व चैतान्यीकरण क्रिया दुसरे से भिन्न भिन्न हैं | कोई साबर पद्धति से सिद्ध होगा तो कोई कापालिक... किसी का निर्माण मुस्लिम तंत्र के द्वारा होगा तो किसी का तीव्र तांत्रिक विधान के द्वारा |

 कोई वेदोक्त मन्त्रों से अभिषिक्त होगा तो कोई पूर्ण शाक्त तंत्र से | साथ ही इनकी निर्माण सामग्री तथा यज्ञ सामग्री आदि भी भिन्न भिन्न होगी...

 इनका निर्माण जहाँ आर्थिक रूप से महंगा होगा वही कठोर परिश्रम और ज्ञान का भी प्रयोग इनमे होगा,ताकि जो भी निर्मित हो अद्विय्तीय, तथा पूर्ण प्रभाव कारी हो |

 किन्तु आप सभी निश्चिन्त रहे आपको कोई व्यय नहीं उठाना है,आप मात्र इन्हें अपने तथा परिवार के लिए प्रयोग कर,अपना कर देखिये और तंत्र को सराहिये |

 तंत्र की स्थापना ही मेरा जीवन उद्देश्य है | और सदगुरुदेव के श्री चरणों में मेरी अश्रु और कर्मांजलि भी|

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Thursday, March 9, 2017

  हनुमान   चूटकी मंत्र साधना.....    


     प्रिय दोस्तो इस मंत्र से सभी अला बलाओ से सूरक्षा होती है यहा तक की पक्की मसानी भी इस मंत्र के मात्र 3 बार जाप कर चूटकी बजाने मात्र से दूर हो जाती है,इस साधना को पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का निचम का पालन कर साधना की जाती,अगर आप किसी कारणवश इस साधना को करने मे असमर्थ है तो सिध्द अभिमंत्रित हनुमान यंत्र हमारे संस्थान से मंगवा सकते है जो आपकी 100% तांत्रीक क्रियाओ से रक्षा करता है  ,  

              यह मंत्र मुझे एक महात्मा की कृपा से मिला है | इस लिए इसे आप स्व परख ले और लाभ देख सकते है | किसी भी तरह की आलोचना से मैं हमेशा दूर ही रहता हूँ| सिद्धि कोई भी हो साधक की मनोदशा पर निर्भर करती होती है | यह मंत्र आपको किसी किताब से नहीं मिलेगा क्यू के ऐसे मंत्र किताबों में बहुत कम मिलते है |

साधना विधि ---

इसे आप दीपावली के दिन अथवा किसी भी सामान्य रात्रि में कभी भी सिद्ध कर सकते है | किन्तु 12 से 1 बजे तक का समय न चुने, और कोई भी टाइम चलेगा | आसन कोई भी ले सकते हैं। वैसे कुशा का आसन सर्वोत्तम है |

इस साधना को कर

ने के लिए पास किसी भी हनुमान जी के मंदिर में जाये | एक सरसों के तेल का दिया जला दे जो जब तक आपका मंत्र जप पूरा न हो दिया जलता रहना चाहिए | इस लिए एक बड़ा दिया ले लें | सवा मीटर लाल कपड़ा जो आपको हनुमान जी को लगोट के रूप में अर्पण करना है और सवा किलो लड्डू किसी भी तरह के ले ले |

एक बात हमेशा याद रखे हनुमान जी को भोग अर्पण करते समय हमेशा एक तुलसी दल भोग के उपर रख देना चाहिए तभी उनकी क्षुधा शांत होती है |माला मूँगे की अथवा रुद्राक्ष की ले |

 आपको एक माला मंत्र जाप करना है | प्रसाद व लाल वस्त्र वही हनुमान जी के चरणों में छोड़ दे और अपनी व परिवार की रक्षा के लिए प्रार्थना करे और घर आ जाए |

साबर चुटकी मंत्र-

ॐ नमो गुरु जी चुटकी दाये चुटकी बाये,
चुटकी रक्षा करे हर थाएं |
बजर का कोठा अजर कबाड़ ,
चुटकी बांधे दसो दुयार ||
जो कोई घाले मुझ पे घाल उलटत देव वही पर जाए |
हनुमान जी चुटकी बजाए ,
राम चंदर पछताये, सीता माता भोग बनाया हनुमान मुसकाये |
माता अंजनी की आन ,
चुटकी रक्षा करो तमाम |
जय हनुमान, जय हनुमान, जय हनुमान ||

प्रयोग विधि --

सिद्ध करने के बाद जब भी जरूरत हो एक वार मंत्र पढ़ के तीन वार चुटकी वज़ा दे | एक वार दाये एक वार बाये एक वार सिर के उपर उसी वक़्त रक्षा होगी

 |                                       .....दोस्तो यदी आप सिध्द ओर अभिमंत्रित सिध्द हनुमान रक्षा  यंत्र को पाना चाहतेे है तो आप हम को व्हाटसप या फोन द्वारा सिधे सम्पर्क कर सिध्द हनुमान  यंत्र/ तावीज बनवा सकते है,हमारे द्वारा सिध्द हनुमान  यंत्र का तावीज 7 हवनो ओर  सवा लाख मंत्रो से अभिमंत्रित कर सिध्द ओर प्राणप्रतिष्ठीत किये जाते है                                            ।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Wednesday, March 8, 2017

तुलसी यक्षिणी साधना

प्रस्तुत साधना उन लोगो के लिये वरदान
सामान है जो सरकारी नोकरी पाना चाहते
है।
... क्युकी तुलसी यक्षिणी को ही राज्य पद
यक्षिणी भी कहा जाता है।अर्थात राज्य
पद देने वाली।अतः ये साधना राजनीती में भी सफलता देने वाली है।

यदि आपकी पदोन्नति नहीं हो रही है
तो,भी यह साधना की जा सकती है।
या सरकारी नोकरी की इच्छा रखते है
तो भी यह दिव्य साधना अवश्य संपन्न
करे।निश्चित आपकी कामना पूर्ण हो जाएगी।

विधि :

साधना किसी भी शुक्रवार
की रात्रि से आरम्भ करे,समय रात्रि १०
बजे के बाद का हो,आपका मुख उत्तर
दिशा की और हो,आपके आसन वस्त्र
सफ़ेद हो।

प्रातः तुलसी की जड़ निकाल
कर ले आये और उसे साफ करके सुरक्षित रख ले,जड़ लाने के पहले निमंत्रण
अवश्य दे।

अब अपने सामने एक
तुलसी का पौधा रखे और उसका सामान्य
पूजन करे,दूध से बनी मिठाई का भोग
लगाये और तील के तेल का दीपक लगाये।

तुलसी की जड़ को अपने आसन के निचे रखे।अब स्फटिक माला से मंत्र की १०१
माला संपन्न करे।यह क्रम तीन दिन तक
रखे,आखरी दिन घी में पञ्च
मेवा मिलाकर यथा संभव आहुति दे।बाद
में उस जड़ को सफ़ेद कपडे में लपेट कर
अपनी बाजु पर बांध ले।मिठाई नित्य स्वयं ही खाए।इस तरह ये दिव्य
साधना संपन्न होती है।

अगर आप ये
साधना ग्रहण काल में करते है तो मात्र एक
ही दिन में पूर्ण हो जाएगी।

अन्यथा उपरोक्त विधि से तो अवश्य कर
ही ले।कभी कभी इस साधना में प्रत्यक्षीकरण होते देखा गया है।अगर
ऐसा हो तो घबराये नहीं देवी से वर मांग
ले।

प्रत्यक्षीकरण न
भी हो तो भी साधना अपना पूर्ण फल
देती ही है,आवश्यकता है पूर्ण
श्रधा की।माँ सबका कल्याण करे।

मंत्र :ॐ क्लीं क्लीं नमः

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Monday, March 6, 2017

अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच

चेहरे पर निखार, आकर्षक शरीर और एक सेहतमंद शरीर की कामना भला आज कौन नहीं करता है। हर कोई आकर्षक नज़र आना चाहता है। तो इस मनोकामना को पूरा  करने के लिए व्यक्ति आमतौर पर अप्सरा वशीकरण मंत्र  और साधना का इस्तेमाल करता है, जिसे काफी कारगर व असरदार भी माना गया है। इसके बारे मे ये भी कहां गया है कि अप्सरा साधना की मदद से अप्सरा के जैसा  सौंदर्य व समृद्धि प्राप्त किया जा सकता है और ऐसा नहीं है की सिर्फ इसका इस्तेमाल स्त्रिया ही कर सकती है, क्यूकी सुंदर शरीर और खूबसूरत चेहरे की लालसा पुरुष भी रखता है।

तो अब हम आपको बताते है अप्सरा साधना के बारे मे की किस प्रकार आप इसे कर सकते है। जैसा की हमेशा से यह मान्यता रही है कि अप्सराओ को गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और रातरानी जैसे फूलों की सुगंध काफी पसंद आती है।

अप्सरा साधना करने के दौरान उस व्यक्ति को खास तौर पर अपनी यौन भावनाओं पर संयम रखना पड़ता है। ऐसा न कर पाने से साधना सिद्ध नहीं हो पाती है।

साधक पूरे विश्वास और संकल्प व मंत्र की सहायता से अगर इस साधना को करता है, तो माना गया है कि अप्सरा प्रकट होती है और उस समय वो साधक उसे गुलाब के साथ इत्र भेंट करता है। साथ ही उसे दूध से बनी मिठाई व पान आदि भेंट देता है और उससे  जीवन भर साथ रहने का वचन लेता है।

 इन अप्सराओ मे चमत्कारिक शक्तिया होती है जो साधक की जिंदगी को सुंदर बनाने की योग्यता रखती है।
अब हम आपको रंभा अप्सरा साधना के बारे मे जानकारी देते हुए बताएँगे की इस साधना को करने के लिए आपको इस मंत्र का जप करना होता है, जोकि इस प्रकार है,

मंत्र:

ऊँ दिव्यायै नमः! ऊँ वागीश्वरायै नमः!

ऊँ सौंदर्या प्रियायै नमः! ऊँ यौवन प्रियायै नमः!

ऊँ सौभाग्दायै नमः! ऊँ आरोग्यप्रदायै नमः!

 ऊँ प्राणप्रियायै नमः! ऊँ उजाश्वलायै नमः! ऊँ देवाप्रियायै  नमः!

 ऊँ ऐश्वर्याप्रदायै नमः! ऊँ धनदायै रम्भायै नमः!

बाकी साधना के जैसे इसमे भी साधक को पूजा-अर्चना के बाद  रम्भेत्किलन यंत्र के सामने बताए मंत्र का जप करना होता है।

साधना हो जाने के बाद साधक की इक्छा पूर्ण होने के साथ उसके जीवन मे खुशियों आ जाती है।

अप्सरा साधना विधि को करने के लिए साधक के लिए जरूरी होता है कि वो कोई एक शांत जगह चुन ले। फिर उस जगह पर सफ़ेद रंग का एक कपड़ा बिछाकर, पीले चावल के इस्तेमाल से एक यंत्र का निर्माण करे।

इसके बाद साधक के लिए जरूरी है कि वो अपने वस्त्र पर इत्र लगा ले जिससे वो  सुगन्धित हो जाये और मखमल को अपना आसन बनाए। केवल शुक्रवार के दिन, आधी रात को आप इस साधना करे। ध्यान जरूर रखे की साधना करते वक़्त आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो और फिर बनाए हुए यंत्र का पंचोपकर पूजन करे।

 जिस एकांत जगह या कमरे मे साधक बैठा है वो वहाँ गुलाब के इत्र का प्रयोग करे। आस-पास एक सुगन्धित माहोल बना ले।

 इन सबके बाद आप गुरु गणपति का ध्यान करके स्फटिक मणिमाला का मंत्र के साथ 51 जप करे।

मंत्र:

 “ऊँ उर्वशी प्रियं वशं करी हुं! ऊँ ह्रीं उर्वशी अप्सराय आगच्छागच्छ स्वाहा!!”

इस अनुष्ठान को आप कुल 7, 11 या 21 दिनों तक करे और आखिरी दिन 10 माल का जाप करे। बताए मंत्र के नीचे अपना नाम लिखकर उर्वशी माला की मदद से बताए मंत्र का 101 बार जप करे,

 मंत्र:

“ऊँ ह्रीं उर्वशी मम प्रिय मम चित्तानुरंजन करि करि फट”।

अप्सरा वशीकरण साधना से जुड़े एक शाबर मंत्र के बारे मे भी हम आपको बताते है। जिसको करने के लिए जरूरी है की आप एक बाजोट पर लाल रंग का कपड़ा बिछा ले और उस पर एक चावल से ढेरी बना ले, जो कुम्कुम से रंगे हो।

 आप जिस आसान पर बैठे वो भी लाल रंग का ही हो। इसके बाद उन चावल पर “पुष्पदेहा आकर्षण सिद्धि यंत्र” स्‍थापित कर दे और स्फटिक की माला से मंत्र जाप करे।

 मंत्र:

“ॐ आवे आवे शरमाती पुष्पदेहा प्रिया रुप आवे आवे हिली हिली मेरो कह्यौ करै,मनचिंतावे,कारज करे वेग से  आवे आवे,हर क्षण साथ रहे हिली हिली पुष्पदेहा अप्सरा फट् ॐ ”।

 शुक्रवार के दिन इस साधना को शुरू करे जो 7 दिनों तक चलती है। आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो इसका खास ध्यान रखे और मंत्र का रोज 11 माला जप करना होगा। बनाए हुए यंत्र पर रोज गुलाब का इत्र चढाये और 5 गुलाब भी चढा दे।

 घी का दीपक जला दे, जो साधना विधि के समय जलता रहे। आप जो धूप इस्तेमाल करे वो गुलाब का ही हो। जब मंत्र का जप किया जा रहा हो उस समय नजर  यंत्र की ओर होनी चाहिए। इसी यंत्र के माध्यम से साधक को अप्सरा से वचन प्राप्त करने का मंत्र प्राप्त होता है।

तो यकीन है की रूप-रंग व यौवन की चाहत रखने वाले लोगों के लिए ऊपर बताई गई बाते मददगार होंगी, जिनके उपयोग से साधक अपनी मनोकामना को पूर्ण कर सकता है।

राजगुरु जी

.महाविद्या आश्रम

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कुंडलाहारिणी अप्सरा सबसे शीघ्र आती है।

इसे बुलाने की विधी इस प्रकार है, ऐक चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाऐं उस अष्ट दल कमल सफेद चावल से बनाकर अप्सरा का चित्र रखें।

सफेद वस्त्र पहने रात में 11 बजे से मंत्र जप करे 31 माला जप करें,

उससे पहले न्यास और ध्यान करके अप्सरा का पूजन कर लें।

इस अप्सरा की साधना में तिथि, वार, नक्षत्र कुछ भी नही देखना,

ये अप्सरा बहुत शीघ्र आती है, जिस कमरे आप साधना करे उसमें कोई और प्रवेश ना करे,

मंत्र इस प्रकार है▪▪

"ऊॅ श्रीं ह्रीं कुण्डलहारिणी आगच्छ स्वाहा"

मोगरे का इत्र कमरे में छिड़क लें, स्फटिक की माला से जप करें।

अप्सरा परीक्षा लेगी आपको डरा सकती है परीक्षा सफल होने के बाद वो सामने आऐगी उस से वचन ले जो भी चाहो

आपको स्वर्ग का भी दर्शन कराऐगी जो वस्तु मांगोगे वो लाकर देगी, प्रेमिका बनकर रहेगी।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Saturday, March 4, 2017

रम्भा साधना


उच्चकोटि कि अप्सराओं कि श्रेणी में रम्भा का प्रथम स्थान है, जो शिष्ट और मर्यादित मणि जाती है, सौंदर्य कि दृष्टि से अनुपमेय कही जा सकती है | शारीरिक सौंदर्य वाणी कि मधुरता नृत्य, संगीत, काव्य तथा हास्य और विनोद यौवन कि मस्ती, ताजगी, उल्लास और उमंग ही तो रम्भा है | जिसकी साधना से वृद्ध व्यक्ति भी यौवनवान होकर सौभाग्यशाली बन जाता है |

जिसकी साधना से योगी भी अपनी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करता है | अभीप्सित पौरुष एवं सौंदर्य प्राप्ति के लिए प्रतेक पुरुष एवं नारी को इस साधना में अवश्य रूचि लेनी चाहिए | सम्पूर्ण प्रकृति सौंदर्य को समेत कर यदि साकार रूप दिया तो उसका नाम रम्भा होगा |

सुन्दर मांसल शारीर, उन्नत एवं सुडौल वक्ष: स्थल, काले घने और लंबे बाल, सजीव एवं माधुर्य पूर्ण आँखों का जादू मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान दिल को गुदगुदा देने वाला अंदाज यौवन भर से लदी हुई रम्भा बड़े से बड़े योगियों के मन को भी विचिलित कर देती है | जिसकी देह यष्टि से प्रवाहित दिव्य गंध से आकर्षित देवता भी जिसके सानिध्य के लिए लालायित देखे जाते हैं |

सुन्दरतम वर्स्त्रलान्कारों से सुसज्जित, चिरयौवन, जो प्रेमिका या प्रिय को रूप में साधक के समक्ष उपस्थित रहती है | साधक को सम्पूर्ण भौतिक सुख के साथ मानसिक उर्जा, शारीरिक बल एवं वासन्ती सौंदर्य से परिपूर्ण कर देती है |

इस साधना के सिद्ध होने पर वह साधक के साध छाया के तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रहती है तथा उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती है |

रम्भा साधना सिद्ध होने पर सामने वाला व्यक्ति स्वंय खिंचा चला आये यही तो चुम्बकीय व्यक्तिव है|

साधना से साधक के शरीर के रोग, जर्जरता एवं वृद्धता समाप्त हो जाती है |

यह जीवन कि सर्वश्रेष्ठ साधना है | जिसे देवताओं ने सिद्ध किया इसके साथ ही ऋषि मुनि, योगी संन्यासी आदि ने भी सिद्ध किया इस सौम्य साधना को |

इस साधना से प्रेम और समर्पण के कला व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुरित होती है | क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों में बिमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जायेगा | प्रेम को अभिव्यक्त करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है रम्भा साधना | जिन्होंने रम्भा साधना नहीं कि है, उनके जीवन में प्रेम नहीं है, तन्मयता नहीं है, प्रस्फुल्लता भी नहीं है |

साधना विधि

सामग्री – प्राण प्रतिष्ठित रम्भोत्कीलन यंत्र, रम्भा माला, सौंदर्य गुटिका तथा साफल्य मुद्रिका |

यह रात्रिकालीन २७ दिन कि साधना है | इस साधना को किसी भी पूर्णिमा को, शुक्रवार को अथवा किसी भी विशेष दिन प्रारम्भ करें | साधना प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि स्नान आदि से निवृत होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीला या सफ़ेद किसी भी आसान पर बैठे, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें | पूर्व दिशा कि ओर मुख करके बैठें | घी का दीपक जला लें | सामने चौकी पर एक थाली या पलते रख लें, दोनों हाथों में गुलाब कि पंखुडियां लेकर रम्भा का आवाहन करें |

|| ओम ! रम्भे अगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते ||

यह आवश्यक है कि यह आवाहन कम से कम १०१ बार अवश्य हो प्रत्येक आवाहन मन्त्र के साथ एक गुलाब के पंखुड़ी थाली में रखें | इस प्रकार आवाहन से पूरी थाली पंखुड़ियों से भर दें |

अब अप्सरा माला को पंखुड़ियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसान पर ओर अपने ऊपर इत्र छिडके | रम्भोत्कीलन यन्त्र को माला के ऊपर आसान पर स्थापित करें | गुटिका को यन्त्र के दाँयी ओर तथा साफल्य मुद्रिका को यन्त्र के बांयी ओर स्थापित करें | सुगन्धित अगरबती एवं घी का दीपक साधनाकाल तक जलते रहना चाहिए |

सबसे पहले गुरु पूजन ओर गुरु मन्त्र जप कर लें | फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्री का पंचोपचार से पूजन सम्पन्न करें |स्नान, तिलक, धुप, दीपक एवं पुष्प चढावें |

इसके बाद बाएं हाथ में गुलाबी रंग से रंग हुआ चावल रखें, ओर निम्न मन्त्रों को बोलकर यन्त्र पर चढावें

|| ॐ दिव्यायै नमः ||

|| ॐ प्राणप्रियायै नमः ||

|| ॐ वागीश्वये नमः ||

|| ॐ ऊर्जस्वलायै नमः ||

|| ॐ सौंदर्य प्रियायै नमः ||

|| ॐ यौवनप्रियायै नमः ||

|| ॐ ऐश्वर्यप्रदायै नमः ||

|| ॐ सौभाग्यदायै नमः ||

|| ॐ धनदायै रम्भायै नमः ||

|| ॐआरोग्य प्रदायै नमः ||

इसके बाद उपरोक्त रम्भा माला से निम्न मंत्र का ११ माला प्रतिदिन जप करें |

मंत्र : ||ॐ हृीं रं रम्भे ! आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांछितं देहि ऐं ॐ नमः ||

प्रत्येक दिन अप्सरा आवाहन करें, ओर हर शुक्रवार को दो गुलाब कि माला रखें, एक माला स्वंय पहन लें, दूसरी माला को रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगन्ध एक दम बढने लगे अप्सरा का बिम्ब नेत्र बंद होने पर भी स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने यन्त्र पर पहना दें |

२७ दिन कि साधना प्रत्येक दिन नये-नये अनुभव होते हैं, चित्त में सौंदर्य भव भाव बढने लगता है, कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है | स्त्रियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने पर चेहरे पर झाइयाँ इत्यादि दूर होने लगती हैं |

साधना पूर्णता के पश्चात मुद्रिका को अनामिका उंगली में पहन लें, शेष सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें | यह सुपरिक्षित साधना है | पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर अवश्य मनोकामना पूर्ण होती ही है |

राजगुरु जी

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Thursday, March 2, 2017

शिव स्वर्णखप्पर साधना
                   

धन की इच्छा किसे नहीं होती, चाहे वह गृहस्थ हो अथवा योगी यति हो, देवता हो अथवा दानव हो, लक्ष्मी की साधना में तत्पर हो जाते हैं I लेकिन ये तथ्य जानना आवश्यक है कि श्री महालक्ष्मी तभी सिद्ध होती है जब घर में स्वर्णखप्पर साधना संपन्न की जाती है एवं स्मरण किया जाता है I

 लक्ष्मी का स्वरुप ऋद्धि-सिद्धि तो गणपति की भार्याएँ हैं और शुभ-लाभ उनके पुत्र हैं, और विशेष बात ये है कि महेश्वरी,गौरी,पार्वती उनकी माँ हैं तथा देवाधिदेव महादेव उनके पिता हैं I इन सबकी साधना शिव पूजा से ही प्रारम्भ होती है तथा सिद्ध भी होती है I

इस साधना को संपन्न करने के बाद उसके जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों तरह का परिवर्तन परिलक्षित होता है I वह धन-धान्य, सुख-सौभाग्य से परिपूर्ण होकर श्रीवान एवं ऐश्वर्यवान बन जाता है Iइसके साथ ही साथ उसके शत्रु का स्वत: ही शमन हो जाता है I

 आध्यात्मिक क्षेत्र में उसको दिव्य अनुभूतियाँ होने लगती हैं, तथा अनन्त सिद्धियाँ स्वत: ही उसके पास आ जाती हैं I साधक की तृतीय नेत्र खुल जाता है, वह ‘त्रिकालदर्शी’ बन जाता है, और तब वह किसी के भी भूत और भविष्य को देखकर उसके विषय में जान सकता है I

शिव स्वर्ण खप्पर साधना तो जीवन को पूर्णता देने वाली होती है जिसके द्वारा साधक को एक के पश्चात् एक धन के स्त्रोत  मिलने आरम्भ हो जाते हैं I अगर वह नौकरी पेशा है तो काई नया मार्ग मिल जाता है या पैतृक धन आदि के द्वारा धन प्राप्ति का नया मार्ग खुल जाता है Iव्यापारी है तो व्यापार में लाभ की स्थिति या नये व्यापार में लाभ की स्थिति बनती है या शेयर मार्केट में एकदम से लाभ मिल जाता है I

कहने का तात्पर्य है कि धन प्राप्ति के इतने मार्ग या तो खुल जाते हैं या तो सूझने लगते हैं कि साधक आश्चर्यचकित रह जाता है I

     शिव स्वर्णखप्पर साधना के लिए आपको विशेष रूप से अभिमंत्रित (जीरो आकर के दाने की जिसमे मुख न हो) रुद्राक्ष की माला चाहिए जिसमे ब्रह्मग्रंथी लगी हो I शेष कुछ और नहीं चाहिए I

यह साधना किसी भी सोमवार से शुरू कर सकते है , साधना रात्रिकालीन है इसे मध्यरात्रि करीब 11 बजे शुरू करें I सबसे पहले शिव से प्रार्थना करें I शिव से लगन पूर्वक कहें –

आप प्रसन्न होकर इस मन्त्र को अकीलित करते हुए मुझे पूर्ण सफलता प्रदान करें, जिससे की मैं अपने जीवन में, जैसे आप चिंतारहित हैं, जिस प्रकार आप मस्त हैं, जिस प्रकार आप आनंदयुक्त हैं, जिस प्रकार आप शक्ति के अधिपति हैं, जिस प्रकार आपके परिवार में गणेश जैसा पुत्र है और जिस प्रकार आप निर्भीक हैं,निश्चिन्त,निरापद, और रोग-रहित हैं, वैद्दनाथ हैं,

ऐसा ही जीवन मुझे प्राप्त हो, और मेरा जीवन निश्चिन्ता, निर्भिकता और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो I इसके पश्चात् निम्न मंत्र का प्रतिदिन 21 माला जाप करें I यह जाप 21 दिन करना है I यह मंत्र इस प्रकार है –

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं अघोर स्वर्ण खप्पर सिद्धि कनकधारा ह्रीं ह्रीं ॐ

इस साधना का प्रभाव साधना आरम्भ करने से अनुभव होने लग जाता है I तन्त्र बाधाएँ स्वयं समाप्त होने लग जाती है, परिस्थितियों में अनुकूलता आने लग जाती है, शत्रु  आपसे सहयोग करने लगता है और आप तीव्रता के साथ अपने लक्ष की ओर गतिशील होने लगते हैं I

इसमें न तो अखण्ड दीपक जलाने की आवश्यकता है और न ही किसी यन्त्र की I जिस समय मंत्र का जाप करें उस समय घी का दीपक और गुलाब की अगरबत्ती लगा दें I

राजगुरु जी

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वीर बेताल साधना

यह साधना रात्रि कालीन है स्थान एकांत होना चाहिए ! मंगलबार को यह साधना संपन की जा सकती है ! घर के अतिरिक्त इसे किसी प्राचीन एवं एकांत शिव मंदिर मे या तलब के किनारे निर्जन तट पर की जा सकती है ! पहनने के बस्त्र आसन और सामने विछाने के आसन सभी गहरे काले रंग के होने चाहिए !

साधना के बीच मे उठना माना है !

इसके लिए वीर बेताल यन्त्र और वीर बेताल माला का होना जरूरी है !

 यन्त्र को साधक अपने सामने बिछे काले बस्त्र पर किसी ताम्र पात्र मे रख कर स्नान कराये और फिर पोछ कर पुनः उसी पात्र मे स्थापित कर दे !

सिन्दूर और चावल से पूजन करे और निम्न ध्यान उच्चारित करें

!! फुं फुं फुल्लार शब्दो वसति फणिर्जायते यस्य कण्ठे
डिम डिम डिन्नाति डिन्नम डमरू यस्य पाणों प्रकम्पम!
तक तक तन्दाती तन्दात धीर्गति धीर्गति व्योमवार्मि
सकल भय हरो भैरवो सः न पायात !!

इसके बाद माला से १५ माला मंत्र जप करें यह ५ दिन की साधना है !

!! ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं वीर सिद्धिम दर्शय दर्शय फट !!

साधना के बाद सामग्री नदी मे या शिव मंदिर मे विसर्जित कर दें ! साधना का काल और स्थान बदलना नहीं चाहिए !

वीर साधना :-

मंत्र :-

सौह चक्र की बावड़ी डाल मोतियाँ का हार पदम् नियानी निकरी लंका करे निहार लंका सी कोट समुन्द्र सी खाई चले चौकी हनुमंत वीर की दुहाई कौन कौन वीर चले मरदाना वीर चले सवा हाथ जमीं को सोखंत करनाजल का सोखंत करना पय का सोखंत करना पवन का सोखंत करना लाग को सोखंत करना चूड़ी को सोखंत करना पलना को भुत को पलट को अपने बैरी को सोखंत करना मेवात उपट बहकी चन्द्र कले नहीं चलती पवन मदन सुतल करे माता का दूध हरम करे शब्द सांचा फुरे मंत्र इश्वरो वाचा

इस मंत्र को गुरुवार से शुरू करे ४४ दिन तक १००८ जाप करे , ४० वे दिन वीर दर्शन दे सकता है और आप बिना किसी डर के उस से जो मांगना है मांग ले याद रहे की किसी का भी बुरा नहीं मांगना है सुदध घी का दीपक जलाना है और लोबान की धुनी लगातार देनी है चमेली के पुष्प और कुछ फल इनको अपिँत करे तो प्रसन्न होकर वर देते है

फकीरों की सेवा करे और उनको सौहा वीर के नाम से भोजन और एक मीठा जरुर दे तो शीघ्र प्रसन्न हो जाते है साधक इस साधन मई मॉस और मदिरा से दूर रहे और इस मंत्र को करने से पहले अपने चारो तरफ रक्षा रेखा खींच ले गोलाकार जब तक १००८ जाप पूरा नहीं हो तब तक इस गोले सबहिर नै निकलना है और डेली पुष्प के सुगन्धित पानी से स्नान करना है झूठ नहीं बोलना है .

ओम गुरूजी को आदेश गुरूजी को प्रणाम,धरती माता धरती पिता धरती धरे ना धीरबाजे श्रींगी बाजे तुरतुरि आया गोरखनाथमीन का पुत् मुंज का छडा लोहे का कड़ा हमारी पीठ पीछेयति हनुमंत खड़ा शब्द सांचा पिंड काचास्फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा

विधान :

जिस साधना के विधान में शरीर किलन की आवश्यकता हो उस साधना में इस मन्त्र को सात बार पढ पढ करा चाकु से अपने चारो तरफ रक्षा रेखा खींच ले गोलाकार , स्वयं हनुमानजी साधक की रक्षा करते हैं,

(  ये शोहा वीर का मंत्र है…

इनकी साधना में जूही चमेली के फूलो की विशेष महत्ता होती है, गुलाब और मोगरे की गंध इनको जल्दी आकर्षित करती है.शुद्ध इत्तर का धुप उपयोग करना उत्तम है, बहते पानी के पास सिद्धि जल्दी होगी , साफ़ सफाई ज़रूरी नियम है…

इनकी सिद्धि हो जाने पर साधक को विशेष ध्यान रखना चाहिए की उसके दोनों पावो के बीच से कभी पानी की धार बह के ना पार हो…अगर वो पानी की धर फिर किसी पानी तक पहुची तो सिद्धि तत्काल समाप्त हो जाएगी  )

राजगुरु जी

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क्‍या सुंदर स्त्रियां हमेशा पुरुषों की कमजोरी रही हैं, जानें स्‍वर्ग की अप्सराओं के बारें में अदभुत बातें

सुंदर स्त्रियां हमेशा पुरुषों की कमजोरी रही हैं। हिन्दू पौराणिक कथाओं में ऐसी अपूर्व सुंदरियों का उल्लेख मिलता है जो अपनी मोहक और कामुक अदाओं से किसी को भी अपना दीवाना बना देती थीं।

इन्हें अप्सरा कहा जाता है और माना जाता है कि ये स्वर्ग लोक में रहती हैं। देवताओं द्वारा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने में इनका उपयोग किया जाता था। किसी को भी दीवाना बना देती थीं ये खूबसूरत युवतियां इनकी मोहक अदाओं में फंसकर अपना सब कुछ गवां बैठते थे महान और प्रभावशाली कहे जाने वाले लोग।

आकर्षक सुन्दरतम वस्त्र, अलंकार और सौंदर्य प्रसाधनों से युक्त-सुसज्जित, चिरयौवना रंभा के बारे में कहा जाता है कि उनकी साधना करने से साधक के शरीर के रोग, जर्जरता एवं बुढ़ापा समाप्त हो जाते हैं।

चार अप्सराएं थीं सबसे खूबसूरत

ऋग्वेद और महाभारत में कई अप्सराओं का उल्लेख है। स्वर्ग की चार अत्यंत सुंदर जिन चार अप्सराओं का ज्यादातर उल्लेख किया जाता है उनके नाम हैं उर्वशी, मेनका, रंभा और तिलोत्तमा। कहा जाता है कि इन्होंने अपने रूप, सौंदर्य और कामुक अदाओं से कई ऋषि मुनियों की तपस्या भंग की और उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया।

विश्वामित्र को रिझाया था अप्सरा ने

कहा जाता है कि अप्सराओं का सबसे ज्यादा उपयोग इंद्र ने किया। ऋषि विश्वामित्र की कठोर तपस्या से इंद्र को यह भय हुआ कि वे कहीं उनके सिंहासन पर कब्जा न कर लें। जिस पर उन्होंने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने उस समय की नामी अप्सरा रंभा को पृथ्वी लोक पर भेजा।

रंभा ने अपनी मोहक अदाओं से विश्वामित्र को लुभाने का प्रयास किया पर विश्वामित्र ने उसे श्राप दे दिया और वह पाषाण मूर्ति बन गई। रंभा के असफल रहने पर इंद्र ने रंभा से भी ज्यादा खूबसूरत अप्सरा मेनका को भेजा जिसने पहले एक युवती का रूप धरा और फिर अपनी मोहक व कामुक अदाओं से विश्वामित्र को वश में कर उनका तप भंग कर दिया। दोनों के संसर्ग से एक पुत्री का जन्म हुआ जिसका नाम शकुंतला रखा गया जिसका पालन पोषण कण्व ऋषि ने किया।

अप्सरा के लिए मर मिटे ये राक्षस

एक बार पृथ्वी पर जब सुंद और उपसुंद नामक राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया तो उनके संहार के लिए तिलोत्तमा नामक अप्सरा का सहारा लिया गया। देवताओं ने उसे उन दोनों के पास भेजा। दोनों राक्षस उसके सौंदर्य पर रीझ गए और उसे पाने के लिए आपस में लड़ कर मर गए।

अर्जुन को श्राप

महाभारत के एक दृष्टांत के अनुसार एक बार इन्द्रदेव ने अपने पुत्र अर्जुन को स्वर्ग लोक में आमंत्रित किया। वहां उर्वशी ने उसके सामने नृत्य प्रस्तुत किया बाद में इंद्र ने उर्वशी से अर्जुन को प्रसन्न करने को कहा। जब उर्वशी अर्जुन के कक्ष में पहुंची और उसे आमंत्रित किया तो अर्जुन ने मना कर दिया जिस पर उर्वशी ने अर्जुन को शिखंडी होने का श्राप दे दिया। फलस्वरूप अर्जुन को एक साल तक वृहन्नलला के रूप में रहना पड़ा।

अप्सरा रंभा के विलक्षण मंत्र

आकर्षक सुन्दरतम वस्त्र, अलंकार और सौंदर्य प्रसाधनों से युक्त-सुसज्जित, चिरयौवना रंभा के बारे में कहा जाता है कि उनकी साधना करने से साधक के शरीर के रोग, जर्जरता एवं बुढ़ापा समाप्त हो जाते हैं।

रंभा के मंत्र सिद्ध होने पर वह साधक के साथ छाया के तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रहती है तथा उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती है।

 यह जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है। जिसे देवताओं ने सिद्ध किया इसके साथ ही ऋषि मुनि, योगी, संन्यासी आदि ने भी सिद्ध किया इस सौम्य साधना को। इस साधना से प्रेम और समर्पण के गुण व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुरित होते हैं क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों में बीमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जाएगा। प्रेम को अभिव्यक्त करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है रंभा साधना।

साधना विधि

सामग्री - प्राण प्रतिष्ठित रंभोत्कीलन यंत्र, रंभा माला, सौंदर्य गुटिका तथा साफल्य मुद्रिका।

यह रात्रिकालीन 27 दिन की साधना है। इस साधना को किसी भी पूर्णिमा या शुक्रवार को अथवा किसी भी विशेष मुहूर्त में प्रारंभ करें। साधना प्रारंभ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि स्नान आदि से निवृत होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीला या सफ़ेद किसी भी आसान पर बैठे, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें। पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। घी का दीपक जला लें। सामने चौकी पर एक थाली रख लें, दोनों हाथों में गुलाब की पंखुडियां लेकर रंभा का आह्वान करें।

|| ॐ ! रंभे अगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते ||

यह आवश्यक है कि यह आह्वान कम से कम 101 बार अवश्य हो प्रत्येक आह्वान मंत्र के साथ गुलाब की पांखुरी थाली में रखें। इस प्रकार आवाहन से पूरी थाली पांखुरियों से भर दें।

अब अप्सरा माला को पांखुरियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसान पर ओर अपने ऊपर इत्र छिडकें। रंभोत्कीलन यंत्र को माला के ऊपर आसन पर स्थापित करें। गुटिका को यन्त्र के दाएं तरफ तथा साफल्य मुद्रिका को यंत्र के बाएं तरफ स्थापित करें। सुगन्धित अगरबती एवं घी का दीपक साधनाकाल तक जलते रहना चाहिए।

सबसे पहले गुरु पूजन ओर गुरु मंत्र जप कर लें। फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्री का पंचोपचार से पूजन संपन्न करें। स्नान, तिलक, धूप, दीपक एवं पुष्प चढ़ाएं।

इसके बाद बाएं हाथ में गुलाबी रंग से रंग हुआ चावल रखें, ओर निम्न मंत्रों को बोलकर यंत्र पर चढ़ाएं।

|| ॐ दिव्यायै नमः ||

|| ॐ प्राणप्रियायै नमः ||

|| ॐ वागीश्वर्ये नमः ||

|| ॐ ऊर्जस्वलायै नमः ||

|| ॐ सौंदर्य प्रियायै नमः ||

|| ॐ यौवनप्रियायै नमः ||

|| ॐ ऐश्वर्यप्रदायै नमः ||

|| ॐ सौभाग्यदायै नमः ||

|| ॐ धनदायै रम्भायै नमः ||

|| ॐ आरोग्य प्रदायै नमः ||

इसके बाद प्रतिदिन निम्नलिखित मंत्र से 11 माला प्रतिदिन जप करें |

मंत्र : || ॐ हृीं रं रम्भे ! आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांछितं देहि ऐं ॐ नमः ||

प्रत्येक दिन अप्सरा आह्वान करें। हर शुक्रवार को दो गुलाब की माला रखें, एक माला स्वंय पहन लें, दूसरी माला को रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगन्ध एकदम बढ़ने लगे अप्सरा का बिम्ब नेत्र बंद होने पर भी स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने यन्त्र पर पहना दें।

27 दिन की साधना में प्रत्येक दिन नए-नए अनुभव होते हैं, चित्त में सौंदर्य भाव बढ़ने लगता है, कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है।

साधना पूर्णता के पश्चात मुद्रिका को अनामिका अंगुली में पहन लें, शेष सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। यह सुपरिक्षित साधना है। पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर अवश्य मनोकामना पूर्ण होती ही है।

राजगुरु जी

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Wednesday, March 1, 2017

योगिनी साधना:

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तंत्र में सदा से योगिनीयो का अत्यंत महत्व रहा है.तंत्र अनुसार योगिनी आद्य शक्ति के सबसे निकट होती है.माँ योगिनियो को आदेश देती है और यही योगिनी शक्ति साधको के कार्य सिद्ध करती है.मात्र लोक में यही योगिनिया है जो माँ कि नित्य सेवा करती है.

योगिनी साधना से कई प्रकार कि सिद्धियाँ साधक को प्राप्त होती है.प्राचीन काल में जब तंत्र अपने चरम पर था तब योगिनी साधना अधिक कि जाती थी.परन्तु धीरे धीरे इनके साधको कि कमी होती गयी और आज ये साधनाये बहुत कम हो गयी है.

इसका मुख्य कारण है समाज में योगिनी साधना के प्रति अरुचि होना,तंत्र के नाम से ही भयभीत होना,तथा इसके जानकारो का अंतर्मुखी होना।इन्ही कारणो से योगिनी साधना लुप्त सी होती गयी.परन्तु आज भी इनकी साधनाओ के जानकारो कि कमी नहीं है.आवश्यकता है कि हम उन्हें खोजे और इस अद्भूत ज्ञान कि रक्षा करे.

मित्रो आज हम जिस योगिनी कि चर्चा कर रहे है वो है " सिद्ध योगिनी " कई स्थानो पर इन्हे सिद्धा योगिनी या सिद्धिदात्री योगिनी भी कहा गया है.ये सिद्दी देने वाली योगिनी है.

जिन साधको कि साधनाये सफल न होती हो,या पूर्ण सफलता न मिल रही हो.तो साधक को सिद्ध योगिनी कि साधना करनी चाहिए।इसके अलावा सिद्ध योगी कि साधना से साधक में सतत प्राण ऊर्जा बढ़ती जाती है.

और साधना में सफलता के लिए प्राण ऊर्जा का अधिक महत्व होता है.विशेषकर माँ शक्ति कि उपासना करने वाले साधको को तो सिद्ध योगिनी कि साधना करनी ही चाहिए,क्युकी योगिनी साधना के बाद भगवती कि कोई भी साधना कि जाये उसमे सफलता के अवसर बड़ जाते है.साथ ही इन योगिनी कि कृपा से साधक का गृहस्थ जीवन सुखमय हो जाता है.

जिन साधको के जीवन में अकारण निरंतर कष्ट आते रहते हो वे स्वतः इस साधना के करने से पलायन कर जाते है.आइये जानते है इस साधना कि विधि।

आप ये साधना किसी भी कृष्ण पक्ष कि अष्टमी से आरम्भ कर सकते है.इसके अलावा किसी भी नवमी या शुक्रवार कि रात्रि भी उत्तम है इस साधना के लिए.साधना का समय होगा रात्रि ११ के बाद का.आपके आसन तथा वस्त्र लाल होना आवश्यक है.

इस साधना में सभी वस्तु लाल होना आवश्यक है.अब आप उत्तर कि और मुख कर बैठ जाये और भूमि पर ही एक लाल वस्त्र बिछा दे.वस्त्र पर कुमकुम से रंजीत अक्षत से एक मैथुन चक्र का निर्माण करे.इस चक्र के मध्य सिंदूर से रंजीत कर े सुपारी का प्रयोग करे.

इसके बाद सर्व प्रथम गणपति तथा अपने सद्गुरुदेव का पूजन करे.इसके बाद गोलक या सुपारी को योगिनी स्वरुप मानकर उसका पूजन करे,कुमकुम,हल्दी,कुमकुम मिश्रित अक्षत अर्पित करे,लाल पुष्प अर्पित करे.भोग में गुड का भोग अर्पित करे,साथ ही एक पात्र में अनार का रस अर्पित करे.तील के तेल का दीपक प्रज्वलित करे.इसके बाद एक माला नवार्ण मंत्र कि करे.

जाप में मूंगा माला का ही प्रयोग करना है या रुद्राक्ष माला ले.नवार्ण मंत्र कि एक माला सम्पन करने के बाद,एक माला निम्न मंत्र कि करे,

ॐ रं रुद्राय सिद्धेश्वराय नमः

इसके बाद कुमकुम मिश्रित अक्षत लेकर निम्न लिखित मंत्र को एक एक करके पड़ते जाये और थोड़े थोड़े अक्षत गोलक पर अर्पित करते जाये।

ॐ ह्रीं सिद्धेश्वरी नमः

ॐ ऐं ज्ञानेश्वरी नमः

ॐ क्रीं योनि रूपाययै नमः

ॐ ह्रीं क्रीं भ्रं भैरव रूपिणी नमः

ॐ सिद्ध योगिनी शक्ति रूपाययै नमः

इस क्रिया के पूर्ण हो जाने के बाद आप निम्न मंत्र कि २१ माला जाप करे.

ॐ ह्रीं क्रीं सिद्धाययै सकल सिद्धि दात्री ह्रीं क्रीं नमः

जब आपका २१ माला जाप पूर्ण हो जाये तब घी में अनार के दाने मिलाकर १०८ आहुति अग्नि में प्रदान करे.ये सम्पूर्ण क्रिया आपको नित्य करनी होगी नो दिनों तक.

आहुति के समय मंत्र के अंत में स्वाहा अवश्य लगाये।अंतिम दिवस आहुति पूर्ण होने के बाद एक पूरा अनार जमीन पर जोर से पटक कर फोड़ दे और उसका रस अग्नि कुंड में निचोड़ कर अनार उसी कुंड में डाल दे.अनार फोड़ने से निचोड़ने तक सतत जोर जोर से बोलते रहे,

सिद्ध योगिनी प्रसन्न हो।

साधना समाप्ति के बाद अगले दिन गोलक को धोकर साफ कपडे से पोछ ले और सुरक्षित रख ले.कपडे का विसर्जन कर दे.नित्य अर्पित किया गया अनार का रस और गुड साधक स्वयं ग्रहण करे.

सम्भव हो तो एक कन्या को भोजन करवाकर दक्षिणा दे,ये सम्भव न हो तो देवी मंदिर में दक्षिणा के साथ मिठाई का दान कर दे.इस प्रकार ये दिव्य साधना पूर्ण होती है.

निश्चय ही अगर साधना पूर्ण मनोभाव और समर्पण के साथ कि जाये तो साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते है.और जीवन को एक नविन दिशा मिलती ही है.इस साधना को यदि 21 दिनों तक किया जाए और साधना स्थल सुनसान वीरान जंगल या श्मशान हो अथवा ऐसा शिवमंदिर जो पुराना हो तो अद्भुत सफलता मिल सकती है ।

चेतावनी-

बिना गुरु मार्गदर्शन और सुरक्षा कवच के साधना न करें ।......................................

राजगुरु जी

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भुतिनि साधना

मनुष्य की कल्पना का एक निश्चित दायरा होता है जिसके आगे वह सोच भी नहीं सकता है और तर्क बुद्धि उनको स्व ज्ञान से आगे कुछ स्वीकार करने के लिए हमेशा रोक लगा देती है, लेकिन आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक परिक्षण में भी ऐसे कई तथ्य सामने आये है जिसके माध्यम से यह सिद्ध होता है की मनुष्य की गति सिर्फ जन्म से ले कर मृत्यु तक की यात्रा मात्र नहीं है वरन मृत्यु तो एक पड़ाव मात्र ही है.

मनुष्य मृत्यु के समय शरीर त्याग के बाद कोई विविध योनी को धारण करता है विविध नाम और उपनाम दिए जाते है.

भले ही आज का विज्ञान उसके अस्तित्व पर अभी भी शोध कर रहा हो लेकिन हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने इस विषय पर सेकडो हज़ारो सालो पहले ही अत्यंत ही प्रगाढ़ अन्वेषण कर के अत्यधिक विस्मय युक्त जानकारी जनमानस को प्रदान की थी.

मनुष्य के मृत्यु के बाद उसकी निश्चय ही कार्मिक गति होती है तथा इसी क्रम में विविध प्रकार की योनी उसे प्राप्त होती है या उसका पुनर्जन्म होता है. इसके भी कई कई भेद है, लेकिन जो प्रचलित है वह योनी है भुत, प्रेत, पिशाच, राक्षस या ब्रह्मराक्षस आदि है जो की कर्मजन्य होते है. यह विषय अत्यंत ही वृहद है. यहाँ पर हम चर्चा करेंगे तंत्र में इन से जुडी हुई प्रक्रिया की.

विविध योनियो से सबंधित विविध प्रकार के प्रयोग तंत्र में प्राप्त होते है. जिसमे साधनाओ के माध्यम से विविध प्रकार के कार्य इन इतरयोनियो से करवाए जाते है. लेकिन यह साधनाए दिखने में जितनी सहज लगती है उतनी सहज होती नहीं है इस लिए साधक के लिए उत्तम यह भी रहता है की वह इन इतरयोनियों के सबंध में लघु प्रयोग को सम्प्पन करे.

जिस प्रकार भुत एक पुरुषवाचक संज्ञा है उसी प्रकार भुतिनी एक स्त्रीवाचक संज्ञा है. वस्तुतः यह भ्रम ही है की भुतिनियाँ डरावनी होती है तथा कुरुप होती है, वरन सत्य तो यह है की भुतिनि का स्वरुप भी उसी प्रकार से होता है जिस प्रकार से एक सामान्य लौकिक स्त्री का. उसमे भी सुंदरता तथा माधुर्य होता है.

वस्तुतः यह साधना तथा साध्य के स्वरुप के चिंतन पर उनका रूप हमारे सामने प्रकट होता है, तामसिक साधना में भयंकर रूप प्रकट होना एक अलग बात है लेकिन सभी साधना में ऐसा ही हो यह ज़रुरी नहीं है.

प्रस्तुत प्रयोग इक्कीश दिन अचरज पूर्ण प्रयोग है, जिसे सम्प्पन करने पर साधक को भुतिनी को स्वप्न के माध्यम से प्रत्यक्ष कर उसे देख सकता है तथा उसके साथ वार्तालाप भी कर सकता है. साधको के लिए यह प्रयोग एक प्रकार से इस लिए भी महत्वपूर्ण है की इसके माध्यम से व्यक्ति अपने स्वप्न में भुतिनी से कोई भी प्रश्न का जवाब प्राप्त कर सकता है.

यह प्रयोग भुतिनी के तामस भाव के साधन का प्रयोग नहीं है, अतः व्यक्ति को भुतिनी सौम्य स्वरुप में ही द्रश्यमान होगी.

यह प्रयोग साधक किसी भी अमावस्या को करे तो उत्तम है, वैसे यह प्रयोग किसी भी बुधवार को किया जा सकता है.

साधक को यह प्रयोग रात्री काल में १० बजे के बाद करे. सर्व प्रथम साधक को स्नान आदि से निवृत हो कर लाल वस्त्र पहेन कर लाल आसान पर बैठ जाए. गुरु पूजन तथा गुरु मंत्र का जाप करने के बाद दिए गए यन्त्र को सफ़ेद कागज़ पर बनाना चाहिए.

 इसके लिए साधक को केले के छिलके को पिस कर उसका घोल बना कर उसमे कुमकुम मिला कर उस स्याही का प्रयोग करना चाहिए. साधक वट वृक्ष के लकड़ी की कलम का प्रयोग करे. यन्त्र बन जाने पर साधक को उस यन्त्र को अपने सामने किसी पात्र में रख देना है तथा तेल का दीपक लगा कर मंत्र जाप शुरू करना चाहिए.

साधक को निम्न मंत्र की ११ माला मंत्र जाप करनी है इसके लिए साधक को रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए.

भ्रं भ्रं भ्रं भुतेश्वरी भ्रं भ्रं भ्रं फट्

(bhram bhram bhram bhuteshwari bhram bhram bhram phat)

मंत्र जाप पूर्ण होने पर जल रहे दीपक से उस यन्त्र को जला देना है. यन्त्र की जो भष्म बनेगी उस भष्म से ललाट पर तिलक करना है तथा तिन बार उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करना है. इसके बाद साधक अपने मन में जो भी प्रश्न है उसके मन ही मन ३ बार उच्चारण करे तथा सो जाए. साधक को रात्री काल में भुतिनी स्वप्न में दर्शन देती है तथा उसके प्रश्न का जवाब देती है.

 जवाब मिलने पर साधक की नींद खुल जाती है, उस समय प्राप्त जवाब को लिख लेना चाहिए अन्यथा भूल जाने की संभावना रहती है. साधक दीपक को तथा माला को किसी और साधना में प्रयोग न करे लेकिन इसी साधना को दुबारा करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता है. जिस पात्र में यन्त्र रखा गया है उसको धो लेना चाहिए. उसका उपयोग किया जा सकता है.

अगर यन्त्र की राख बची हुई है तो उस राख को तथा जिस लकड़ी से यन्त्र का अंकन किया गया है उस लकड़ी को भी साधक प्रवाहित कर दे. साधक दूसरे दिन सुबह उठ कर उस तिलक को चेहरा धो कर हटा सकता है लेकिन तिलक को सुबह तक रखना ही ज़रुरी है.

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...