Tuesday, July 31, 2018

पन्द्रिया यंत्र साधना -- साबर विधि से

पन्द्रिया यंत्र साधना -- साबर विधि से जरुरी है| अतः इस साधना को उसी साधक को शुरू करना चाहिए जो इस साधना के नियम का पूर्ण शुद्धि से पालन करऔर जन कल्याण किया है | यह बहुत ही तीव्र साधना है | इस में शुद्धि का खास ध्यान ख़ास तौर पर रखा जाता है।। अन्यथा तकलीफ हो सकती है ..| हर उस व्यक्ति का बहुत ही सौभाग्य उदय होता है जब ऐसी साधना प्राप्त होती है | मेरी नजर में ऐसा कोई काम ही नहीं है।। जो इस साधना से पूरा ना हो | हिन्दू और इस्लामिक दोनों मतो में यह साधना की जाती है| मैंने कई मुसलमानी मौलवियों को भी इस यंत्र का प्रयोग करते हुए देखा है | यह मैं स्वयं भी इस साधना का प्रयोग बहुत बार करके इसे परख चुका हूँ| और कई संतो ने भी इसे समय-समय पर सिद्ध किया है यह साधना अगर शारदीय,चैत्र अथवा गुप्त नवरात्री में की जाये तो और भी फल मिलता है | इसे सिद्ध करने के लिए समय तो अवश्य ही लगेगा लेकिन अगर आप इसे सिद्ध कर ले तो किसी सिद्धि के पीछे भागने की आवश्कता नहीं है | इस में धैर्य बहुत जरुरी है और ब्रह्मचर्य का पालन भी सके | नियम --- १. एक समय शुद्ध भोजन करे, फलाहार कभी भी ले सकते हैं | २.ब्रह्मचर्य अनिवार्य है | ३.सत्य बोलने की कोशिश करे | ४.किसी से व्यर्थ में ना उलझें | ५.बड़ों का हमेशा सम्मान करें ! विधि -- शुद्ध धुले हुये वस्त्र पहने सिले हुए ना हो तो जयादा बेहतर है (जैसे धोती, चादर) | पीले लाल या सफ़ेद रंग के कपडे ज्यादा बेहतर है | लाल रंग विशेष फल दाई है ! २.शुद्ध घी का दीपक लगाये और एक बेजोट पर लाल वस्त्र बिछा कर माता जगदम्बा का सुन्दर चित्र स्थापत करें हर रोज पूजन करे और गुरु पूजन करे और पूर्ण समर्पित भाव से साधना शुरू करे ! ३.मन को विचलित ना होने दे माता का दर्शन होने के बाद कन्या पूजन करे जा साधना पूर्ण होने के बाद कन्या पूजन जरुरी है | ५.माता की हलवे का भोग लगा कर कन्या पूजन किया जा सकता है ! ६. इस यंत्र को निम्न मन्त्र पड़ते हए सवा लाख बार लिखना है और जितने रोज लिखो आटे में मिक्स कर के गोलिया बना ले और मछलियों को डाल दे किसी तालाब या नदी पर जाकर | इस यंत्र को जैसे नीचे दिया है बना ले | साबर मंत्र --- ॐ सात पूनम काल का बारह बरस क्वार ,एको देवी जानिए चौदह भुवन द्वार द्वि पक्षे निर्मलिये तेरह देवन देव अष्ट भुजी परमेशवरी ग्यारह रूद्र सेव ,सोलह कला समपुरनी तिन नयन भरपूर दसो द्वारी तुही माँ , पांचो बाजे नूर ,नव निधि षट दर्शनी पन्द्रह तिथि जान चारो युग में कालका कर काली कल्याण ......! ये मन्त्र थोडा उग्र का है ..इसलिए सात्विकता बरतिए ..और इसे प्रयोग में लाइए इस मन्त्र का जप करते हुए उपर वाला यन्त्र लिखे और जब साधना पूरी हो जाती है साधक के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता | प्रयोग -- जिस किसी व्यक्ति पर कैसी भी प्रेत बाधा या किसी का किया तंत्र प्रयोग (जैसे-मूठ) हो, तो इस यन्त्र को अष्ट गंध से लिख कर उस व्यक्ति को पहना दिया जाये तो बाधा शांत हो जाती है | कार्य सिद्धि के लिए इस यन्त्र को अपने साथ ले कर कार्य के लिए जा सकते है | मुक़दमे में विजय पाने के लिए है और घर छोड़ कर गये व्यक्ति को वापिस लाने के लिए इसका अचूक असर होता है वशीकरण के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है आप पहले इसे सिद्ध कर ले इसके प्रयोग तो सैकड़ो है उसे फिर कभी दे दूंगा | यंत्र सिद्ध करते करते माँ का दर्शन हो जाता है ऐसा मेरा और कई लोगो का अनुभव है | राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Monday, July 30, 2018

अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच

अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच चेहरे पर निखार, आकर्षक शरीर और एक सेहतमंद शरीर की कामना भला आज कौन नहीं करता है। हर कोई आकर्षक नज़र आना चाहता है। तो इस मनोकामना को पूरा करने के लिए व्यक्ति आमतौर पर अप्सरा वशीकरण मंत्र और साधना का इस्तेमाल करता है, जिसे काफी कारगर व असरदार भी माना गया है। इसके बारे मे ये भी कहां गया है कि अप्सरा साधना की मदद से अप्सरा के जैसा सौंदर्य व समृद्धि प्राप्त किया जा सकता है और ऐसा नहीं है की सिर्फ इसका इस्तेमाल स्त्रिया ही कर सकती है, क्यूकी सुंदर शरीर और खूबसूरत चेहरे की लालसा पुरुष भी रखता है। तो अब हम आपको बताते है अप्सरा साधना के बारे मे की किस प्रकार आप इसे कर सकते है। जैसा की हमेशा से यह मान्यता रही है कि अप्सराओ को गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और रातरानी जैसे फूलों की सुगंध काफी पसंद आती है। अप्सरा साधना करने के दौरान उस व्यक्ति को खास तौर पर अपनी यौन भावनाओं पर संयम रखना पड़ता है। ऐसा न कर पाने से साधना सिद्ध नहीं हो पाती है। साधक पूरे विश्वास और संकल्प व मंत्र की सहायता से अगर इस साधना को करता है, तो माना गया है कि अप्सरा प्रकट होती है और उस समय वो साधक उसे गुलाब के साथ इत्र भेंट करता है। साथ ही उसे दूध से बनी मिठाई व पान आदि भेंट देता है और उससे जीवन भर साथ रहने का वचन लेता है। इन अप्सराओ मे चमत्कारिक शक्तिया होती है जो साधक की जिंदगी को सुंदर बनाने की योग्यता रखती है। अब हम आपको रंभा अप्सरा साधना के बारे मे जानकारी देते हुए बताएँगे की इस साधना को करने के लिए आपको इस मंत्र का जप करना होता है, जोकि इस प्रकार है, मंत्र: ऊँ दिव्यायै नमः! ऊँ वागीश्वरायै नमः! ऊँ सौंदर्या प्रियायै नमः! ऊँ यौवन प्रियायै नमः! ऊँ सौभाग्दायै नमः! ऊँ आरोग्यप्रदायै नमः! ऊँ प्राणप्रियायै नमः! ऊँ उजाश्वलायै नमः! ऊँ देवाप्रियायै नमः! ऊँ ऐश्वर्याप्रदायै नमः! ऊँ धनदायै रम्भायै नमः! बाकी साधना के जैसे इसमे भी साधक को पूजा-अर्चना के बाद रम्भेत्किलन यंत्र के सामने बताए मंत्र का जप करना होता है। साधना हो जाने के बाद साधक की इक्छा पूर्ण होने के साथ उसके जीवन मे खुशियों आ जाती है। अप्सरा साधना विधि को करने के लिए साधक के लिए जरूरी होता है कि वो कोई एक शांत जगह चुन ले। फिर उस जगह पर सफ़ेद रंग का एक कपड़ा बिछाकर, पीले चावल के इस्तेमाल से एक यंत्र का निर्माण करे। इसके बाद साधक के लिए जरूरी है कि वो अपने वस्त्र पर इत्र लगा ले जिससे वो सुगन्धित हो जाये और मखमल को अपना आसन बनाए। केवल शुक्रवार के दिन, आधी रात को आप इस साधना करे। ध्यान जरूर रखे की साधना करते वक़्त आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो और फिर बनाए हुए यंत्र का पंचोपकर पूजन करे। जिस एकांत जगह या कमरे मे साधक बैठा है वो वहाँ गुलाब के इत्र का प्रयोग करे। आस-पास एक सुगन्धित माहोल बना ले। इन सबके बाद आप गुरु गणपति का ध्यान करके स्फटिक मणिमाला का मंत्र के साथ 51 जप करे। मंत्र: “ऊँ उर्वशी प्रियं वशं करी हुं! ऊँ ह्रीं उर्वशी अप्सराय आगच्छागच्छ स्वाहा!!” इस अनुष्ठान को आप कुल 7, 11 या 21 दिनों तक करे और आखिरी दिन 10 माल का जाप करे। बताए मंत्र के नीचे अपना नाम लिखकर उर्वशी माला की मदद से बताए मंत्र का 101 बार जप करे, मंत्र: “ऊँ ह्रीं उर्वशी मम प्रिय मम चित्तानुरंजन करि करि फट”। अप्सरा वशीकरण साधना से जुड़े एक शाबर मंत्र के बारे मे भी हम आपको बताते है। जिसको करने के लिए जरूरी है की आप एक बाजोट पर लाल रंग का कपड़ा बिछा ले और उस पर एक चावल से ढेरी बना ले, जो कुम्कुम से रंगे हो। आप जिस आसान पर बैठे वो भी लाल रंग का ही हो। इसके बाद उन चावल पर “पुष्पदेहा आकर्षण सिद्धि यंत्र” स्‍थापित कर दे और स्फटिक की माला से मंत्र जाप करे। मंत्र: “ॐ आवे आवे शरमाती पुष्पदेहा प्रिया रुप आवे आवे हिली हिली मेरो कह्यौ करै,मनचिंतावे,कारज करे वेग से आवे आवे,हर क्षण साथ रहे हिली हिली पुष्पदेहा अप्सरा फट् ॐ ”। शुक्रवार के दिन इस साधना को शुरू करे जो 7 दिनों तक चलती है। आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो इसका खास ध्यान रखे और मंत्र का रोज 11 माला जप करना होगा। बनाए हुए यंत्र पर रोज गुलाब का इत्र चढाये और 5 गुलाब भी चढा दे। घी का दीपक जला दे, जो साधना विधि के समय जलता रहे। आप जो धूप इस्तेमाल करे वो गुलाब का ही हो। जब मंत्र का जप किया जा रहा हो उस समय नजर यंत्र की ओर होनी चाहिए। इसी यंत्र के माध्यम से साधक को अप्सरा से वचन प्राप्त करने का मंत्र प्राप्त होता है। तो यकीन है की रूप-रंग व यौवन की चाहत रखने वाले लोगों के लिए ऊपर बताई गई बाते मददगार होंगी, जिनके उपयोग से साधक अपनी मनोकामना को पूर्ण कर सकता है।. राजगुरु जी .महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट ..किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मो.बाइल नं. : - 09958417249' 08601454449 व्हा.ट्सप्प न०;- 9958417249

Thursday, July 26, 2018

इतर योनि साधना

इतर योनि अवलोकन साधना मित्रों !!!! इस अनन्त ब्रह्मांड में मनुष्य अकेला नहीं है जिसका निर्माण भगवान द्वारा किया गया है । पेड़-पौधे, पशु- पक्षियों के इलावा कोई और भी है जो हमारी ही दुनिया में रहतीं हैं पर हमें दिखतीं नहीं । उनका हमें ज्ञान तो है पर प्रमाण नहीं । परंतु!! यदा-कदा वो किसी के सामने आ भी जाएँ , तो कौन यकीन करता है भाई!! क्योंकि दुनिया कहती है आँखों से देखी बात ही सत्य है । लेकिन आज की प्रस्तुत साधना आपको पूरा यकीन दिलाने के लिए है की हमारे इलावा और भी कोई है जो अगर हमारे वश में हो जाए तो वो अपनी शक्तिओं द्वारा पूरा जहान हमारे कदमों में लाकर रख सकती हैं । वो हैं इतर योनिआँ । मनुष्य को भगवान ने उसके कर्मों के अनुसार मृत्यु उपरांत कई योनिओं मे विभक्त किया है जैसे : - भूत , प्रेत , पिशाच , राक्षस , ब्रह्मराक्षस , देव , यक्ष , गन्धर्व , किन्नर , पितृ , अप्सरा , परि , जिन्नात आदि ॥ साधकों के लिए इन्हें सिद्ध करना किसी भयंकर चुनौती से कम नहीं होता क्योंकि इस संसार में कोई किसी का गुलाम बनकर नहीं रहना चाहता । हर कोई अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहता है तो ये योनिआँ कैसे यूं ही आपके वश में हो जाएँ । ये योनिआँ खुद को आपके वश से बचाने के लिये किसी भी हद तक जा सकतीं हैं । परंतु!! एक बार साधक इन्हें सिद्ध करले तो ये आजीवन साधक को वो सब कुछ देतीं रहती हैं जो साधक चाहता है । आपका वफ़ादार कुत्ता आपको एक बार काट सकता है पर ये योनिआँ अपनी शक्ति का प्रयोग आपके खिलाफ कभी नहीं करतीं । ये अपनी जान पर खेलकर भी आपके उपर आई मुसीबत खुद पर ले लेती हैं । परंतु कई मेरे भाई साधक एसे भी हैं जो लाख कोशिश करते हैं किसी इतर योनि को वश में करने की और अन्य साधनाएँ भी करते हैं और बाद में थक हार कर बैठ जाते हैं जब उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती । पर आज की यह साधना इतर योनिओं के दर्शन करने के लिए है जिसे अगर कोई नास्तिक भी करे तो वो भी इतर योनिओं के दर्शन कर अपना विश्वास इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की इन गुप्त शक्तिओं पे दृढ़ कर सकता है । आप खुद इस साधना को करके देखिए और अवलोकन कीजिए उन शक्तिओं का जिनका अस्तित्व अति दिव्य होने के साथ - साथ गोपनीय भी है । पूरी कर लीजिए अपने मन की कामना विभिन्न प्रकार की इतर योनिओं के दर्शन करके क्योंकि तंत्र में शंका का कोई स्थान नहीं है ।" तंत्र निर्मल है , स्वच्छ है और सबसे महत्वपूर्ण बात कि तंत्र प्रत्यक्ष है । जो भी इसका अनुसरण करेगा वो निश्चित ही समस्त भौतिक सुखों को भोगते हुए अंततः मुझमें विलीन हो जाएगा "॥ एसा भगवान शिव ने कहा है । इन योनिओं से आपको भय खाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो खुद भगवान शिव के सान्निधय में रहती हों और बेचैन होकर और किसी के बस में होकर अपनी मुक्ति के लिए तत्पर हों उनसे भय कैसा!!!!! ॥ साधना विधि ॥ दिन - अमावस्या साधना अवधि - 16 दिन दिशा - उत्तर वस्त्र एवं आसन - सफेद माला - रूद्राक्ष की साधना समय - रात 10 बजे साधक को चाहिये कि वो वट वृक्ष की थोड़ी सी जटा जो लमक रही होती है तोड़कर ले आए और उसे अपने साधना कक्ष में बाजोट पर रख दे । याद रखिए उसे धोना बिल्कुल नहीं है । इसके बाद स्नान करे और अपने साधना कक्ष में उत्तर की ओर मुख करके बैठे । गुरु पूजन एवं गणेश पूजन सम्पन्न करके उस जटा को अपने बाएँ हाथ में और माला दायें हाथ में पकड़ कर निम्न मंत्र की 11 माला संपन्न करे । इसके बाद किसी से बात किए बिना उस जटा को अपने तकिए के नीचे रखिए और सो जाइये । इससे आपको सपने में एसी - एसी इतर योनिओं के दर्शन होंगे जिनके बारे में आपने किसी किताब में ही पढ़ा या किसी से सिर्फ सुना होगा ॥ ॥ मन्त्र ॥ ॐ हूं हूं फट ( OM HOOM HOOM PHAT ) साधक को अगले दिन उस जटा को जल में प्रवाहित कर देना चाहिए और माला को पुनः प्राण प्रतिष्ठित कर देना चाहिए ताकि भविष्य में अन्य साधनाओं में इसका उपयोग किया जा सके । ॥ मेरा अनुभव ॥ जब मैंने ये साधना की थी तब एसी - एसी इतर योनिआँ मेरे सामने आ रहीं थी जिनमें से कई के मुँह में से आग निकल रही थी और कई एक छोटे Pipe के समान मुख में लगातार खून और मांस डालतीं जा रहीं थी । इसके पश्चात मुझे अप्सरा , परि और यक्ष एवं अन्य योनिओं के भी दर्शन हुए जो उग्र के साथ - साथ सौम्य भी थीं । राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Wednesday, July 25, 2018

लीलावती अप्सरा मंत्र

लीलावती अप्सरा मंत्र यह एक विशेष साधना है,जिसको सिर्फ चंद्रग्रहण पर ही शुरू किया जा सकता है,अन्य समय पर शुरुआत करने से लाभ प्राप्त करना कठिन है। यहा दिया जाने वाला लीलावती अप्सरा मंत्र पुर्ण और प्रामाणिक है, साधना के लाभ: जो व्यक्ति पूर्ण रूप से हष्ट पुष्ट होते हुए भी आकर्षक व्यक्तित्व न होने के कारण अन्य लोगों को अपनी और आकर्षित नहीं कर पाते हैं तथा हीनभावना से ग्रस्त होते हैं , इस साधना के प्रभाव से उनका व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक व चुम्बकीय हो जाता है तथा उनके संपर्क में आने वाले सभी लोग उनकी और आकर्षित होने लगते हैं । जो मन के अनुकूल सुंदर जीवन साथी पाना चाहते हैं किन्तु किसी कारणवश यह संभव न हो रहा हो, इस साधना के प्रभाव से उनको मन के अनुकूल सुंदर जीवन साथी प्राप्त होने की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं और मनचाहा जीवनसाथी मिल जाता है । जिस व्यक्ति के वैवाहिक, पारिवारिक, सामाजिक जीवन में क्लेश व तनाव की स्थिति उत्पन्न हो, इस साधना के प्रभाव से उनके वैवाहिक, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में प्रेम सौहार्द की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं ! जो व्यक्ति अभिनय के क्षेत्र में सफल होने की इच्छा रखते हैं किन्तु सफल नहीं हो पाते हैं, इस साधना के प्रभाव से उनके अंदर उत्तम अभिनय की क्षमता की वृद्धि होने के साथ-साथ अभिनय के क्षेत्र में सफल होने की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं । जो व्यक्ति युवावस्था में होने पर भी पूर्ण यौवन से युक्त नहीं होते हैं, इस साधना से उनके अंदर उत्तम यौवन व व्यक्तित्व निखर आता है । जो व्यक्ति सुन्दर रूप सौन्दर्य की इच्छा रखते हैं किन्तु प्रकृति द्वारा कुरूपता से दण्डित हैं, इस साधना के प्रभाव से उनके अंदर आकर्षक रूप सौन्दर्य निखर आता है । जो व्यक्ति कार्यक्षेत्र में मन के अनुकूल अधिकारी या सहकर्मी न होने के कारण असहज परिस्थियों में नौकरी करते हैं, या नौकरी चले जाने का भय रहता है, इस साधना के प्रभाव से उनके अधिकारी व सहकर्मी उनके साथ मित्रवत हो जाते हैं तथा नौकरी चले जाने का भय भी समाप्त हो जाता है । जो व्यक्ति ऐसा मानते हैं कि वह अन्य लोगों को अपनी बात या कार्य से प्रभावित नहीं कर पाते हैं, इस साधना के प्रभाव से उनका व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक व चुम्बकीय हो जाता है तथा उनके संपर्क में आने वाले सभी लोग उनकी और आकर्षित होकर उनकी बातों या कार्य से प्रभावित होने लगते हैं । उपरोक्त विषयों में अत्यंत कम समय में ही अपेक्षित परिणाम देकर आनंदमय जीवन को प्रशस्त करने वाली यह लीलावती अप्सरा साधना अवश्य ही संपन्न कर लेनी चाहिए, जिससे निश्चित ही आप अपनी इच्छा की पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं व आनंदमय भौतिक जीवन व्यतीत कर सकते हैं । all क्योंकि अप्सराएं सौन्दर्य, यौवन, प्रेम, अभिनय, रस व रंग का ही प्रतिरूप होती हैं, अतः इनका प्रभाव जहाँ भी होता है वहां पर सौन्दर्य, यौवन, प्रेम, अभिनय, रस व रंग ही व्याप्त होता है । लीलावती अप्सरा की साधना अनेक रूपों में की जाती है, जैसे माँ, बहन, पुत्री, पत्नी अथवा प्रेमिका के रूप में इनकी साधना की जाती है ओर साधक जिस रूप में इनको साधता है. ये उसी प्रकार का व्यवहार व परिणाम भी साधक को प्रदान करती हैं, अप्सराओं को पत्नी या प्रेमिका के रूप में साधने पर साधक को कोई कठिनाई या हानी नहीं होती है, क्योंकि यह तो साधक के व्यक्तित्व को इतना अधिक प्रभावशाली बना देती हैं कि साधक के संपर्क में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अप्सरा साधक के मन के अनुकूल आचरण करने लगता है । अप्सरा को प्रत्यक्ष सिद्ध कर लिए जाने पर वह अपने गुण, धर्म, प्रभाव व सीमा के अधीन बिना किसी बाध्यता के अपनी सीमाओं के अधीन साधक की सभी इच्छाओं की पूर्ति करती है । माँ के रूप में साधने पर वह ममतामय होकर साधक का सभी प्रकार से पुत्रवत पालन करती हैं तो बहन व पुत्री के रूप में साधने पर वह भावनामय होकर सहयोगात्मक होती हैं ओर पत्नी या प्रेमिका के रूप में साधने पर उस साधक को उनसे अनेक सुख प्राप्त हो सकते हैं । साधना विधी:- यह साधना ग्रहण शुरुआत होने के कुछ ही समय पहिले ही शुरू करना है,जैसे 5-10 मिनट पुर्व शुरु कर सकते है और ग्रहण के समाप्ति के बाद भी 5-10 मिनट तक मंत्र जाप करते रहना है। मंत्र जाप बिना किसी माला के जाप करना भी सम्भव है। साधना करने हेतु किसी बाजोट पर पिला वस्त्र बिछाये और उसके उपर एक चमेली के फुलो का माला रखे,किसी प्लेट मे कुछ मिठाइयाँ रखे,एक छोटे ग्लास मे पानी रखें। बडा सा दिपक जलाये जो ग्रहण काल तक चलता रहे और दिपक मे शुद्ध देसी गाय के घी का ही उपयोग करें। धूप कोई भी चलेगा और साधना काल मे बुझ जाये तो कोई चिंता का बात नही है। मंत्र जाप उत्तर दिशा के तरफ ही मुख करके करना है,आसन वस्त्र का कोई बंधन नही है,किसी भी रंग के ले सकते हो । यह एक दिवसीय साधना है परंतु साधक चाहे तो चंद्रग्रहण के बाद भी नित्य जब तक चाहे तब तक मंत्र जाप कर सकता है। मंत्र:- ।। ॐ हूं हूं लीलावती कामेश्वरी अप्सरा प्रत्यक्षं सिद्धि हूं हूं फट् ।। om hoom hoom lilaawati kaameshwari apsaraa pratyaksham siddhi hoom hoom phat साधना समाप्ति के बाद रखा हुआ मिठाइयों का भोग स्वयं ग्रहण करले और ग्लास मे रखा हुआ जल पिपल के पेड़ के जड पर चढा दे,जल चढाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण जी से मन ही मन साधना सफलता हेतु प्रार्थना करें। साधना से आपको अपने जिवन मे परिवर्तन नजर आयेगा,इस साधना से किसी प्रकार का कोई नुकसान नही होता है सिर्फ अप्सरा प्रति स्वयं का भावना शुद्ध रखें। जब भी जिवन मे किसी विशेष मनोकामना को पुर्ण करवाना हो तो शुक्रवार या सोमवार के रात्री मे 9 बजे के बाद अप्सरा से प्रार्थना करते हुए मंत्र का 1 घण्टे तक जाप करने से आपका कोई भी मनोकामना शिघ्र ही पुर्ण हो सकता है। मंत्र जाप से पहिले वही विधी करना है जैसे हमने चंद्रग्रहण के समय किया था। जो साधक अप्सरा को प्रत्यक्ष सिद्ध करना चाहते है उन्हे यह साधना कम से कम नित्य रात्रिकाल मे 2-3 घण्टे तक करते रहना चाहिए। येसा कम से कम 21 दिनो तक करने से लीलावती अप्सरा का प्रत्यक्षीकरण होना सा सम्भव है। यह विशेष साधना करने से आपको बहोत सारी अनुभुतिया हो सकती है,जिसमे आपको सुगंध का एहसास हो सकता है और पायल/घुंगरु के बजने का आवाज भी आसकता है। आप सभी को साधना मे अवश्य ही सफलता प्राप्त हो,यही मातारानी से प्रार्थना है। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

मंत्र विज्ञान अनुसंधान संस्थान

मंत्र विज्ञान अनुसंधान संस्थान तंत्र अपनी कमियों को स्वीकार कर विजय प्राप्त करने की ही क्रिया है , यह प्रकृति,यह तारा मण्डल,मनुष्य का संबंध,चरित्र,विचार,भावनाये सब कुछ तो तंत्र से ही चल रहा है;जिसे हम जीवन तंत्र कहेते है॰ जीवन मे कोई घटना आपको सूचना देकर नहीं आता है,क्योके सामान्य व्यक्ति मे इतना अधिक सामर्थ्य नहीं होता है के वह काल के गति को पहेचान सके,भविष्य का उसको ज्ञान हो,समय चक्र उसके अधीन हो ये बाते संभव ही नहीं,इसलिये हमे तंत्र की शक्ति को समजना आवश्यक है यही इस ब्लॉग का उद्देश्य है. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

चमत्कारी साधना

चमत्कारी साधना सामिग्री लक्ष्मी जी चित्र या प्रतिमा नारियल खीर पंच मेवा की मीठा पान बतासे कमल गठ्ठे 11 गोमती चक्र 5 कोङी 11 गुलाब का हार चंदन, शिंदूर, चावल, चोकी, लाल कपङा सर्वप्रथम एक लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं |उस पर चार जगह आटा और हल्दी के मिश्रण से अष्टदल कमल बनाएं |खाली जगह पर चावल बिछाएं | अब माँ लक्ष्मी को स्थापित करें उनकी पंचोपचार विधी से पुजा अर्चना करे पूजा के बाद सभी प्रसाद माँ को अर्पण करे गोमती चक्र और कोङी चढ़ाएं कमल गट्टे की माला से 31 माला *ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः * ईस मंत्र की करे या 21 माला ईस मंत्र की *||ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥ *एक विशेष बात ये सब क्रिया चन्द्रमा की चांदनी मे ही करनी है* अगले दिन प्रताकाल: कोङी और गौमती चक्र लाल कपङे मे बाधकर तिजोरी मे रखें एक गोमती चक्र का लाकेट वनबाकर गले मे धारण करे 2 गोमती चक्र अपने पर्स मे रखें बाकी बचा सामन तिजोरी मे रखें *ये गोमती चक्र अपके आगे आने वाली हर रूकावट को खत्म करेगा* *यह एक सफल प्रयोग है पिछले 5 साल से करा रहा हूँ और खुद भी करता है* *ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥* राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Tuesday, July 24, 2018

श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र प्रस्तुत 'विचित्र-वीर-हनुमन्-माला-मन्त्र' दिव्य प्रभाव से परिपूर्ण है। इससे सभी प्रकार की बाधा, पीड़ा, दुःख का निवारण हो जाता है। शत्रु-विजय हेतु यह अनुपम अमोघ शस्त्र है। पहले प्रतिदिन इस माला मन्त्र के ११०० पाठ १० दिनों तक कर, दशांश गुग्गुल से 'हवन' करके सिद्ध कर ले। फिर आवश्यकतानुसार एक बार पाठ करने पर 'श्रीहनुमानजी' रक्षा करते हैं। सामान्य लोग प्रतिदिन केवल ११ बार पाठ करके ही अपनी कामना की पूर्ति कर सकते हैं। विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, षडंग-न्यास, ध्यान का पाठ पहली और अन्तिम आवृत्ति में करे। विनियोगः- ॐ अस्य श्रीविचित्र-वीर-हनुमन्माला-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्रो भगवान् ऋषिः। अनुष्टुप छन्दः। श्रीविचित्र-वीर-हनुमान्-देवता। ममाभीष्ट-सिद्धयर्थे माला-मन्त्र-जपे विनियोगः। ऋष्यादि-न्यासः- श्रीरामचन्द्रो भगवान् ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे। श्रीविचित्र-वीर-हनुमान्-देवतायै नमः हृदि। ममाभीष्ट-सिद्धयर्थे माला-मन्त्र-जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे। षडङ्ग-न्यासः- ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः (हृदयाय नमः)। ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा)। ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्)। ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः (कवचाय हुं)। ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः (नेत्र-त्रयाय वौषट्)। ॐ ह्रः करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः (अस्त्राय फट्)। ध्यानः- वामे करे वैर-वहं वहन्तम्, शैलं परे श्रृखला-मालयाढ्यम्। दधानमाध्मातमु्ग्र-वर्णम्, भजे ज्वलत्-कुण्डलमाञ्नेयम्।। माला-मन्त्रः- "ॐ नमो भगवते, विचित्र-वीर-हनुमते, प्रलय-कालानल-प्रभा-ज्वलत्-प्रताप-वज्र-देहाय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, प्रकट-विक्रम-वीर-दैत्य-दानव-यक्ष-राक्षस-ग्रह-बन्धनाय, भूत-ग्रह, प्रेत-ग्रह, पिशाच-ग्रह, शाकिनी-ग्रह, डाकिनी-ग्रह ,काकिनी-ग्रह ,कामिनी-ग्रह ,ब्रह्म-ग्रह, ब्रह्मराक्षस-ग्रह, चोर-ग्रह बन्धनाय, एहि एहि, आगच्छागच्छ, आवेशयावेशय, मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय, स्फुट स्फुट, प्रस्फुट प्रस्फुट, सत्यं कथय कथय, व्याघ्र-मुखं बन्धय बन्धय, सर्प-मुखं बन्धय बन्धय, राज-मुखं बन्धय बन्धय, सभा-मुखं बन्धय बन्धय, शत्रु-मुखं बन्धय बन्धय, सर्व-मुखं बन्धय बन्धय, लंका-प्रासाद-भञ्जक। सर्व-जनं मे वशमानय, श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सर्वानाकर्षयाकर्षय, शत्रून् मर्दय मर्दय, मारय मारय, चूर्णय चूर्णय, खे खे श्रीरामचन्द्राज्ञया प्रज्ञया मम कार्य-सिद्धिं कुरु कुरु, मम शत्रून् भस्मी कुरु कुरु स्वाहा। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः फट् श्रीविचित्र-वीर-हनुमते। मम सर्व-शत्रून् भस्मी-कुरु कुरु, हन हन, हुं फट् स्वाहा।।" (प्रति-दिनमेकादश-वारं जपेत्। पूर्व-न्यास-ध्यान-पूर्वकं निवेदयेत्). राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Monday, July 23, 2018

यह उपाय ना तो किसी किताब में मिलेगा ना ही इंटरनेट पर यह उपाय केवल रावण संहिता के प्राचीन और ताम्रपत्र लिखित

यह उपाय ना तो किसी किताब में मिलेगा ना ही इंटरनेट पर यह उपाय केवल रावण संहिता के प्राचीन और ताम्रपत्र लिखित धन आकर्षक श्री लक्ष्मी इत्र बनाने का विधान आज के समय मे हर कोई धन के लिए प्रयास करता है सुबह से लेकर शाम तक धन के लिए भागादौड़ी करता है परन्तु धन की देवी हैं महालक्ष्मी जी माँ लक्ष्मी को प्रसन्न कर लिया जाए तो धन की कमी नहीं रहती आज हम आपको ऐसी एक विधि बता रहे हैं जिसको करने के बाद आप रोज माँ लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं इस इत्र का निर्माण करने के लिए आप सबसे पहले शुक्रवार के दिन माँ लक्ष्मी के चरणों मे एक बड़ा सी देसी घी की दीपक प्रज्ज्वलित करें अब एक बड़ा सा बर्तन लेकर उसमे १ किलो काली मिटटी डाल दें. अब इसमें किलो पानी डालें अब इसने एक किलो गुलाब के फूल डालें अब २० ग्राम साबुत लौंग डालें २० पान के पत्ते ( साबुत) डालें अब इसे पकने रख दें इसे २ घंटे पका लें अब इस इत्र को छान कर किसी कांच के बर्तन मे भर लें और माँ ल्क्स्मी के चरणों मे रख दें अब इस शक्तिशाली लक्ष्मी आकर्षक मंत्र ऊँ महाशक्ति वेगेन, आकर्षय आकर्षय मणिभद्र स्वाहा के १००८ जाप करें ध्यान रखें कि पूरी प्रक्रिया के दौरान माँ लक्ष्मी जी के चरणों मे दीपक जलता रहे अब इस इत्र को स्प्रे वाली शीशी मे भर लें और नियम से लगाएं यह इत्र माँ लक्ष्मी जी का आशीर्वाद प्राप्त करने मे सहायता करेगा राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Sunday, July 22, 2018

रावण संहिता की प्रचंड वशीकरण साधना

रावण संहिता की प्रचंड वशीकरण साधना मंत्र ऊँ नमो भगवते कामदेवाय सर्वजन प्रियाय सर्वजन सम्मोहनाय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हन हन वद वद तप तप सम्मोहय सम्मोहाय सर्वजन मे वशं कुरू कुरू स्वाहा। मंत्र जप संख्या: इक्कीस हजार दिशा: उत्तर स्थान: घर का एकांत कक्ष समय: मध्य रात्रि दिन: शुक्रवार/मोहिनी एकादशी आसन: सफेद रंग वस्त्र: सफेद धोती हवन: (दशांश) देशी घी, पंचमेवा (काजू, बादाम, किशमिश, पिस्ता, मखाना) साधना सामग्री: सम्मोहन सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित यंत्र, सिद्ध वशीकरण माला, सम्मोहिनी कवच वशीभूत गुटिका, सम्मोहिनी सिद्ध तंत्र फल एवं अन्य उपयोगी आवश्यक पूजन सामग्री। विधि: मोहिनी एकादशी या किसी शुक्रवार को स्नान आदि से निवृत्त होकर कांसे की थाली में समस्त तांत्रिक पूजन सामग्री स्थापित करके पंचोपचार पूजन करना चाहिए। व्यक्ति विशेष को वश में करने का अथवा सिद्धि का संकल्प लेते हुए विधि-विधान पूर्वक गुरु-गणेश वंदना करके मूल मंत्र का जप करें। जप की पूर्णता पर दशांश हवन करके ब्राह्मण एवं पांच कंुआरी कन्याओं को भोजन सहित उपयुक्त दान दक्षिणा देकर साधना को पूरा करें। इस महत्वपूर्ण सम्मोहिनी साधना से साधक का व्यक्तित्व अत्यंत सम्मोहक और आकर्षक हो जाता है। उसके संपर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता। यदि कोई साधना करने में असमर्थ हो, तो योग्य विद्वान द्वारा यह साधना संपन्न करवाकर सम्मोहिनी कवच धारण करके उक्त लाभ प्राप्त कर सकता है राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Friday, July 20, 2018

महाविद्या मातंगी

नौवी महाविद्या मातंगी सांसारिक रूप में महाविद्या कमला का आराधना से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के बाद किसी भी आदमी को जरूरत होती है, अपने आभामंडल और प्रभाव को बढ़ाने की। इंसान चाहता है कि लोग उसके धन व ऐश्वर्य को समझें और उसे सम्मान दें। दूसरी ओर आध्यात्मिक क्षेत्र का साधक कमला की साधना से खुद को अंदर से परिपूर्ण करने के बाद प्रकृति को मोहित कर अपने साधना के स्तर को उठाना चाहता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ती है नौवीं महाविद्या मातंगी की। इनमें पूरे ब्रह्मांड को मोहित करने की शक्ति है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा था कि सभी महाविद्या में सब कुछ प्रदान करने की शक्ति है लेकिन उनके विशेषज्ञता के खास क्षेत्र हैं। तंत्र के क्षेत्र में मातंगी की साधना का काफी महत्व है। यह ममता की मूर्ति हैं और सामन्यतया साधकों पर प्रसन्न होने में अधिक देर नहीं लगाती हैं। इनकी प्रसन्नता से ज्ञान वृद्धि, शास्त्राज्ञाता, कवित्व शक्ति एवं संगीत विद्या की भी प्राप्ति संभव है। यह सम्मोहन और वशीकरण की अधिष्ठात्री हैं। इनके प्रयोग से भंडार की अक्षयवृद्धि होती है। आवश्यकता सिर्फ श्रद्धा का नियमपूर्वक साधना करने की है। मातंगी की साधना के बारे में संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है। विस्तृत जानकारी के लिए अपने आसपास के किसी योग्य व्यक्ति से या मेल से मुझसे जानकारी ली जा सकती है। मातंगी के कई नाम हैं। इनमें प्रमुख हैं- सुमुखी, लघुश्यामा या श्यामला, उच्छिष्टचांडालिनी, उच्छिष्टमातंगी, राजमातंगी, कर्णमातंगी, चंडमातंगी, वश्यमातंगी, मातंगेश्वरी, ज्येष्ठमातंगी, सारिकांबा, रत्नांबा मातंगी एवं वर्ताली मातंगी। 1-अष्टाक्षर मातंगी मंत्र- कामिनी रंजनी स्वाहा विनियोग— अस्य मंत्रस्य सम्मोहन ऋषिः, निवृत् छंदः, सर्व सम्मोहिनी देवता सम्मोहनार्थे जपे विनियोकगः। ध्यान--- श्यामंगी वल्लकीं दौर्भ्यां वादयंतीं सुभूषणाम्। चंद्रावतंसां विविधैर्गायनैर्मोहतीं जगत्। फल व विधि------ विनियोग से ही मंत्र का फल स्पष्ट 20 हजार जप कर मधुयुक्त मधूक पूष्पों से हवन करने पर अभीष्ट की सिद्धि होती है। ------------------------------------------------------- 2-दशाक्षर मंत्र------ ऊं ह्री क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा। विनियोग— अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिःर्विराट् छंदः, मातंगी देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्लीं कीलकं, सर्वेष्टसिद्धये जपे विनियोगः। अंगन्यास--- ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः से हृदयादि न्यास करें। फल व विधि------ साधक छह हजार जप नित्य करते हुए 21 दिन प्रयोग करें। फिर दशांस हवन करें। चतुष्पद श्मसान या कलामध्य में मछली, मांस, खीर व गुगल का धूप दे तो कवित्व शक्ति की प्राप्ति होती है। इससे जल, अग्नि एवं वाणी का स्तंभन भी संभव है। इसकी साधना करने वाला वाद-विवाद में अजेय बन जाता है। उसके घर में स्वयं कुबेर आकर धन देते हैं। 3- लघुश्यामा मातंगी का विंशाक्षर मंत्र--------- ऐं नमः उच्छिष्ट चांडालि मांतगि सर्ववशंकरि स्वाहा। विधि--- विनियोग व न्यास आदि के साथ देवी की पूजा कर 11, 21, 41 दिन या पूर्णिमा/आमावास्या से पूर्णिमा/आमावास्या तक एक लाख जप पूर्ण करें। मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इसका जप उच्छिष्ट मुंह किया जाना चाहिए। ऐसा किया भी जा सकता है लेकिन विभिन्न ग्रंथों में इसे पवित्र होकर करने का भी विधान है। अतः साधक सुविधानुसार जप करें। जप पू्र्ण होने के !बाद बाद महुए के फूल व लकड़ी के दशांस होम कर तर्पन व मार्जन करें। फल------- इसके प्रयोग से डाकिनी, शाकिनी एवं भूत-प्रेत बाधा नहीं पहुंचा सकते हैं। इसकी साधना से प्रसन्न होकर देवी साधक को देवतुल्य बना देती है। उसकी समस्त अभिलाषाएं पूरी होती हैं। चूंकि मातंगी वशीकरण विद्या की देवी हैं, इसलिए इसके साधक की वह शक्ति भी अद्भुत बढ़ती है। राजा-प्रजा सभी उसके वश में रहते हैं। 4- एकोन विंशाक्षर उच्छिष्ट मातंगी तथा द्वात्रिंशदक्षरों मातंगी मंत्र मंत्र (एक)--- नमः उच्छिष्ट चांडालि मातंगी सर्ववशंकरि स्वाहा। मंत्र (दो)---- ऊं ह्रीं ऐं श्रीं नमो भगवति उच्छिष्टचांडालि श्रीमातंगेश्वरि सर्वजन वशंकरि स्वाहा। विधि----- विधिपूर्वक दैनिक पूजन के बाद निश्चित (जो साधक जप से पूर्व तय करे) समयावधि (घंटे या दिन) में दस हजार जप कर पुरश्चरण करे। उसके बाद दशांस हवन करे। फल----- मधुयुक्त महुए के फूल व लकड़ी से हवन करने पर वशीकरण का प्रयोग सिद्ध होता है। मल्लिका फूल के होम से योग सिद्धि, बेल फूल के हवन से राज्य प्राप्ति, पलास के पत्ते व फूल के हवन में जन वशीकरण, गिलोय के हवन से रोगनाश, थोड़े से नीम के टुकड़ों व चावल के हवन से धन प्राप्ति, नीम के तेल से भीगे नमक से होम करने पर शत्रुनाश, केले के फल के हवन से समस्त कामनाओं की सिद्धि होती है। खैर की लकड़ी से हवन कर मधु से भीगे नमक के पुतले के दाहिने पैर की ओर हवन की अग्नि में तपाने से शत्रु वश में होता है। 5- सुमुखी मातंगी प्रयोग इसमें दो मंत्र हैं जिसमें सिर्फ ई की मात्रा का अंतर है पर ऋषि दोनों के अलग-अलग हैं। इसमें फल समान है। पहला मंत्र---- उच्छिष्ट चांडालिनी सुमुखी देवी महापिशाचिनी ह्रीं ठः ठः ठः। इसके ऋषि अज, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं। विधि---- देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह आठ हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है। साधक को धन की प्राप्ति होती है और उसका आभामंडल बढ़ता है। हवन की विधि नीचे है। दूसरा मंत्र----- उच्छिष्ट चांडालिनि सुमुखि देवि महापिशाचिनि ह्रीं ठः ठः ठः। इसके ऋषि भैरव, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं। विधि---- इसकी कई विधियां हैं। एक में एक लाख मंत्र जप का भी विधान वर्णित है। लेकिन मेरा मानना है कि देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह दस हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है और साधक को धन की प्राप्ति होती है तथा उसका आभामंडल बढ़ता है। हवन विधि------ दही से सिक्त पीली सरसो व चावल से हवन करने पर राजा-मंत्री सभी वश में हो जाते हैं। बिल्ली के मांस से हवन करने पर शस्त्र का वसीकरण होता है। बकरे के मांस के हवन से धन-समृद्धि मिलती है। खीर के हवन से विद्या प्राप्ति तथा मधु व घी युक्त पान के पत्तों के हवन से महासमृद्धि की प्राप्ति होती है। कौवे व उल्लू के पंख के हवन से शत्रुओं का विद्वेषण होता है। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Wednesday, July 18, 2018

पारद गुटिका के दिव्य प्रयोग

पारद गुटिका के दिव्य प्रयोग आज हम पारद गुटिका के कुछ प्रयोग के विषय में बात करेंगे.पारद के बंधन को ही सिद्धों और सभी दिव्या योनियों ने धन्य कहा है. बस जरूरत इतनी है की इसके महत्व को हम समझे और अपने जीवन को सफल बनायें. आख़िर हम क्यूँ नही समझते हैं की कोई तो वजह होगी जो पारद तंत्र को तंत्र की अन्तिम और गोपनीय विद्या मन जाता है. क्यूंकि इस विद्या के द्वारा सर्जन किया जा सकता है और सर्जन वही कर सकता है जो की इस ब्रह्मंडा के गोपनीय रहस्य को या तो जान चुका हो या फिर जानने की और पूर्ण रूप से अग्रसर हो . अभी पिछले दिनों मैं मेरे एक अतिप्रिय आत्मीय मित्र से मिलने के लिए पहाड़ी प्रदेश गया था . पिछले जीवन के सूत्र इतनी मजबूती से जुड़े हुए हैं की मुझे जाना ही पड़ा .मेरे वो आत्मीय पेट के रोग से ग्रस्त हैं और यही वजह उनकी साधनात्मक प्रक्रिया के विकास में बाधक भी है. जब मैंने उनकी जन्मपत्रिका का अध्धयन किया तो मुझे वो बात समझ भी आ गयी की क्यूँ वो अभी तक वह नही पहुच पाए जहा उन्हें पहुच जन था. उच्च संस्कृत परिवार में जन्म लेने के बाद और आत्मीय स्वाभाव के होने बाद भी वे अत्यन्त संकोची हैं और मैंने कई बार उनसे कहा भी की आप मुझे बताएं.पर ..... खैर. मैं उनके लिए अत्यन्त दुर्लभ पारद कल्प भी ले गया था पर उनको इस कल्प का फल भी तभी मिल पाटा (क्यूंकि यह कल्प आध्यात्मिक और शारीरिक प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक है). पहले मुझे उन्हें पेट के विकार का निवारण भी करना था बस इसी कारण मैं आज वे रहस्य आप लोगो के सामने प्रकट कर रहा हूँ जो की सरल लेकिन अत्यन्त चमत्कारी हैं.आप इन प्रयोगों को संपन्न करें और ख़ुद इनके प्रभाव को देखें. ये प्रयोग स्वयं ही तंत्र हैं इनमे किसी मंत्र का कोई प्रयोग नही है. सुद्ध और संस्कृत पारद से बद्ध गुटिका के दुर्लभ प्रयोग इस प्रकार हैं:- १.कुंडलिनी जागरण और ध्यान व संकल्प शक्ति के द्वारा अपने मनोरथ पूरे करने के लिए इस गुटिका को यदि अपनी जीभ के ऊपर रख कर अपना संकल्प लें और उसकी पूर्णता के लिए प्रे करें. एक इम्प बात यह है की पारद इस उनिवेर्स का सर्वाधिक चैतन्य जीव है जो शिव वीर्य होने के कारण आपके कार्यों को तीव्र गति देता है. गुटिका को मुख में रख कर योग करने से सफलता शीघ्र मिलती है.इस अभ्यास को कम से कम ५ मिनट करना चाहिए और गुटिका को निगलना नही है अन्यथा नुक्सान होगा ही.पारद उष्ण प्रकृति का है इसीलिए समय धीरे-२ बाधाएं.और ध्यान का अभ्यास हो जाने पर लंबे समय तक ध्यान किया जा सकता है. २.बल प्राप्ति और रोग मुक्ति हेतु-सोते समय रात मे२०० मिली दूध को गुनगुन आकार के पारद गुटिका को उसमे ४ बार दुबयें और निकल लें और उसे पी लें.कम से कम ४० दिन तक प्रयोग करे रोगों से मुक्ति होती है. ३.गले में धारण करने से यदि गुटिका का स्पर्श हार्ट पर होता है तो हार्ट के रोगों का निवारण होता है. ४.शरीर के किसी भी भाग में दर्द हो तो गुटिका को प्लास्टर से उस स्थान पर चिपका लें.गुटिका दर्द को खीच लेती है. ५.सम्भोग के समय मुह में रखने से स्तम्भन का समय बढ़ते जाता है .ध्यान रखिये गुटिका को निगलना नही है.वीर्य स्तम्भन और नापुन्शाकता के लिए भी ये बेहद उपयोगी है. ६.पेट के विकार,लगातार डकार,अजीर्ण,गैस आदि के लिए इस गुटिका को रात में अपनी नाभि के ऊपर २० मिनुत तक रखने से कैसी भी बीमारी जड़ से समाप्त होती ही है. ७.आँखों में यदि कोई बीमारी हो और देखने में परेशानी हो रही हो तोरात में सोते समय इस गुटिका को आँखों को बंद करके २० मिनट तक बंधने से बीमारी ठीक होती है. ८.यदि पैदल चलने से थकान होती हो तो आप पारद गुटिका को कमर पर बाँध कर देखे थकान बहुत कम हो जाती है चलने पर.अति उच् वनस्पतियों के द्वारा संस्कृत की गयी ऐसी गुटिका भूचरी गुटिका कहलाती है जिसके प्रयोग द्वारा व्यक्ति एक दिन में १०० मील भी चल लेता है और थकान नही होती है. ९.यदि आपको यह पहचानना है तो आपके शरीर पर पंचभूतों के किस तत्त्व का प्रभाव ज्यादा है तो गुटिका को गले में धारण करें से जब आपको पसीना आता है तो गुटिका भी उसी रंग में बदल जाती है जिस रंग का स्वामी तत्त्व है. blue-sky violot(jamuni)-air red-fire green-earth white-water १०.तंत्र बढ़ा और भूत प्रेत के निवारण के लिए काले धागे में बाँध कर के गुटिका पहनने से शमन होता है. ११.गुटिका के धारण करने से अत्रक्शन पॉवर बढ़ता ही है. मुझे आप सभी के विचारों का इन्तजार है राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

हनुमान चालीसा के. विशिष्ठ प्रयोग

हनुमान चालीसा के. विशिष्ठ प्रयोग भारतीय आगम तथा निगम में स्तोत्र का एक महत्वपूर्ण स्थान है. सामान्य रूप से स्तोत्र की व्याख्या कुछ इस प्रकार की जा सकती है की स्तोत्र विशेष शब्दों का समूह है जिसके माध्यम से इष्ट की अभ्यर्थना की जाती है. वस्तुतः स्तोत्र के भी कई कई प्रकार है लेकिन तंत्र में इन स्तोत्र को सहजता से नहीं लिया जा सकता है, तंत्र वह क्षेत्र है जहां पर पग पग पर अनन्त रहस्य बिखरे पड़े है. चाहे वह शिवतांडव स्तोत्र हो या सिद्ध कुंजिका, सभी अपने आप में कई कई गोपनीय प्रक्रिया तथा साधनाओ को अपने आप में समाहित किये हुवे है. कई स्तोत्र, कवच, सहस्त्रनाम, खडगमाल आदि शिव या शक्ति से श्रीमुख से उच्चारित हुवे है जो की स्वयं सिद्ध है और यही स्तोत्र विभिन्न तंत्र के भाग है. इसके अलावा कई महासिद्धो ने भी अपने इष्ट की साधना कर उनको प्रत्यक्ष किया था तथा तदोपरांत स्तोत्र की रचना कर उन स्तोत्र की जनमानस के कल्याण सिद्धि हेतु अपने इष्ट से वरदान प्राप्त किया था. ऐसे स्तोत्र निश्चय ही सर्व सिद्धि प्रदाता होते है. उपरोक्त पंक्तियाँ हनुमान चालीसा की है. हनुमान चालीसा के बारे में आज के युग में कोन व्यक्ति अनजान है. वस्तुतः हनुमान चालीसा एक विलक्षण साधना क्रम है जिसमे कई सिद्धो की शक्ति कार्य करती है, विविध साबर मंत्रो के समूह सम यह चालीसा अनंत शक्तियों से सम्प्पन है. खेर, देखा देखि में आज के युग में हर देवी देवता से सबंधित चालीसा प्राप्त हो जाती है लेकिन तंत्र की द्रष्टि से देखे तो वह मात्र काव्य से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है क्यों की न ही उसमे कोई स्वयं चेतना है और ना ही इष्ट शक्ति. इसके अलावा उसमे कोई महासिद्ध का कोई प्रभाव आदि भी नहीं है. एसी चालीसा और दूसरे काव्यों में कोई अन्तर नहीं है उसका पठन करने पर साधक को क्या और केसे कोई उपलब्धि हो सकती है इसका निर्णय साधक खुद ही कर सकता है. निश्चय ही आदी चालीसा अर्थात हनुमान चालीसा के अलावा कोई भी चालीसा का पठन सिद्धि प्रदान करने में असमर्थ है. अगर सूक्ष्म रूप से अध्ययन किया जाए तो हनुमान जी के मूल शिव स्वरुप के आदिनाथ स्वरुप की ही साबर अभ्यर्थना है, कानन कुंडल, संकर सुवन, तुम्हारो मन्त्र, आपन तेज, गुरुदेव की नाइ, अष्ट सिद्धि आदि विविध शब्द के बारे में साधक खुद ही अध्ययन कर विविध पदों के गूढार्थ समजने की कोशिश करे तो कई प्रकार के रहस्य साधक के सामने उजागर हो सकते है. कई वर्षों पूर्व साधना जगत में प्रवेश के प्रारंभिक दिनों में ही जूनागढ़ के एक साधक से मुलाकात हुई, जिनका नाम जिज्ञेश था. योग और तांत्रिक साधना में बचपन से ही काफी रुजान था उनका. गिरनार क्षेत्र के सिद्धो के सबंध में खोज में उनकी विशेष रूचि थी. सम्मोहन तथा वशीकरण आदि विद्याओ के बारे में काफी अच्छा ज्ञान रखते थे. उनके इष्ट हनुमान थे. तंत्र सबंधित चर्चा में सर्व प्रथम उन्होंने हनुमान चालीसा के बारे में विशेष जानकारी प्रदान की थी. उन्होंने बताया की “जो सत् बार पाठ करे कोई, छूटही बंदी महासुख होई” जो हनुमान चालीसा का 100 बार पाठ कर लेता है तो बंधन से मुक्त होता है तथा महासुख को प्राप्त होता है. लेकिन यह सहज ही संभव नहीं होता है, भौतिक अर्थ इसका भले ही कुछ और हो लेकिन आध्यात्मिक रूप से यहाँ पर बंधन का अर्थ आतंरिक तथा शारीरिक दोनों बंधन से है. तथा महासुख अर्थात शांत चित की प्राप्ति होना है. लेकिन कोई भी स्थिति की प्राप्ति के लिए साधक को एक निश्चित प्रक्रिया को करना अनिवार्य है क्यों की एक निश्चित प्रक्रिया ही एक निश्चित परिणाम की प्राप्ति को संभव बना सकती है. हनुमान चालीसा से सबंधित एक प्रयोग उन्होंने ही मुझे बताया था, उसका उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है. लेकिन उससे पहले इससे सबंधित कुछ अनिवार्य तथ्य भी जानने योग्य है. हनुमान चालीसा का यह प्रयोग सकाम प्रयोग तथा निष्काम प्रकार दोनों रूप में होता है. इस लिए साधक को अनुष्ठान करने से पूर्व अपनी कामना का संकल्प लेना आवश्यक है. अगर कोई विशेष इच्छा के लिए प्रयोग किया जा रहा हो तो साधक को संकल्प लेना चाहिए की “ में अमुक नाम का साधक यह प्रयोग ____कार्य के लिए कर रहा हू, भगवान हनुमान मुझे इस हेतु सफलता के लिए शक्ति तथा आशीर्वाद प्रदान करे. ” अगर साधक निष्काम भाव से यह प्रयोग कर रहा है तो संकल्प लेना आवश्यक नहीं है. साधक अगर सकाम रूप से साधना कर रहा है तो साधक को अपने सामने भगवान हनुमान का वीर भाव से युक्त चित्र स्थापित करना चाहिए. अर्थात जिसमे वह पहाड़ को उठा कर ले जा रहे हो या असुरों का नाश कर रहे हो. लेकिन अगर निष्काम साधना करनी हो तो साधक को अपने सामने दास भाव युक्त हनुमान का चित्र स्थापित करना चाहिए अर्थात जिसमे वह ध्यान मग्न हो या फिर श्रीराम के चरणों में बैठे हुवे हो. साधक को यह क्रम एकांत में करना चाहिए, अगर साधक अपने कमरे में यह क्रम कर रहा हो तो जाप के समय उसके साथ कोई और दूसरा व्यक्ति नहीं होना चाहिए. स्त्री साधिका हनुमान चालीसा या साधना नहीं कर सकती यह मात्र मिथ्या धारणा है. कोई भी साधिका हनुमान साधना या प्रयोग सम्प्पन कर सकती है. रजस्वला समय में यह प्रयोग या कोई साधना नहीं की जा सकती है. साधक साधिकाओ को यह प्रयोग करने से एक दिन पूर्व, प्रयोग के दिन तथा प्रयोग के दूसरे दिन अर्थात कुल 3 दिन ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए. सकाम उपासना में वस्त्र लाल रहे निष्काम में भगवे रंग के वस्त्रों का प्रयोग होता है. दोनों ही कार्य में दिशा उत्तर रहे. साधक को भोग में गुड तथा उबले हुवे चने अर्पित करने चाहिए. कोई भी फल अर्पित किया जा सकता है. साधक दीपक तेल या घी का लगा सकता है. साधक को आक के पुष्प या लाल रंग के पुष्प समर्पित करने चाहिए. यह प्रयोग साधक किसी भी मंगलवार की रात्रि को करे तथा समय १० बजे के बाद का रहे. सर्व प्रथम साधक स्नान आदि से निवृत हो कर वस्त्र धारण कर के लाल आसान पर बैठ जाये. साधक अपने पास ही आक के १०० पुष्प रखले. अगर किसी भी तरह से यह संभव न हो तो साधक कोई भी लाल रंग के १०० पुष्प अपने पास रख ले. अपने सामने किसी बाजोट पर या पूजा स्थान में लाल वस्त्र बिछा कर उस पर हनुमानजी का चित्र या यन्त्र या विग्रह को स्थापित करे. उसके बाद दीपक जलाये. साधक गुरु पूजन गुरु मंत्र का जाप कर हनुमानजी का सामान्य पूजन करे. इस क्रिया के बाद साधक ‘हं’ बीज का उच्चारण कुछ देर करे तथा उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम करे. प्राणायाम के बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करे तथा अपनी मनोकामना बोले. इसके बाद साधक राम रक्षा स्तोत्र या ‘रां रामाय नमः’ का यथा संभव जाप करे. जाप के बाद साधक अपनी तीनों नाडी अर्थात इडा पिंगला तथा सुषुम्ना में श्री हनुमानजी को स्थापित मान कर उनका ध्यान करे. तथा हनुमान चालीसा का जाप शुरू कर दे. साधक को उसी रात्रि में १०० बार पाठ करना है. हर एक बार पाठ पूर्ण होने पर एक पुष्प हनुमानजी के यंत्र/चित्र/विग्रह को समर्पित करे. इस प्रकार १०० बार पाठ करने पर १०० पुष्प समर्पित करने चाहिए. १०० पाठ पुरे होने पर साधक वापस ‘हं’ बीज का थोड़ी देर उच्चारण करे तथा जाप को हनुमानजी के चरणों में समर्पित कर दे. इस प्रकार यह प्रयोग पूर्ण होता है. साधक दूसरे दिन पुष्प का विसर्जन कर दे. इसके अलावा भी हनुमान चालीसा से सबंधित कई महत्वपूर्ण प्रयोग मुझे उस साधक ने बताये थे जो की कई बार अनुभूत है, वो प्रयोग भी समय समय पर आप के मध्य रखने का प्रयास रहेगा जिससे की समस्त साधकगण लाभान्वित हो सके. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Tuesday, July 17, 2018

तिलोत्तमा अप्सरा

तिलोत्तमा अप्सरा तिलोत्तमा अप्सरा की गिनती भी श्रेष्ठ अप्सराओं मे होती हैं। यह अप्सरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो ही रुप मे साधक की सहायता करती रहती हैं। यह साधना अनुभुत हैं। इस साधना को करने से सभी सुखो की प्राप्ति होती हैं। इस साधना को शुरु करते ही एक – दो दिन में धीमी धीमी खुशबू का प्रवाह होने लगता हैं। यह खुशबू तिलोत्तमा के सामने होने की पूर्व सुचना हैं। अप्सरा का प्रत्यक्षीकरण एक श्रमसाध्य कार्य हैं। मेहनत बहुत ही जरुरी हैं। एक बार अप्सरा के प्रत्यक्षीकरण के बाद कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता, इसमे कोई दोराय नहीं हैं। यह प्रक्रिया आपकी सेवा में प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ। सामान्यतः अप्सरा साधना भी गोपनीयता की श्रेष्णी में आती हैं। सभी को इस प्रकार की साधना जीवन मे एक बार सिद्ध करने की पुरी कोशिश करनी चाहिए क्योंकि कलियुग में जो भी कुछ चाहिए वो सब इस प्रकार की साधना से सहज ही प्राप्त किया जा सकता हैं। इन साधनाओं की अच्छी बात यह हैं कि इन साधनाओं को साधारण व्यक्ति भी कर सकता हैं मतलब उसको को पंडित तांत्रिक बनाने की कोई अवश्यकता नहीं हैं। साधक स्नान कर ले अगर नही भी कर सको तो हाथ-मुहँ अच्छी तरह धौकर, धुले वस्त्र पहनकर, रात मे ठीक 10 बजे के बाद साधना शुरु करें। रोज़ दिन मे एक बार स्नान करना जरुरी है। मंत्र जाप मे कम्बल का आसन रखे और अप्सरा और स्त्री के प्रति सम्मान आदर होना चाहिए। अप्सरा , गुरु, धार्मिक ग्रंथो और विधि मे पुर्ण विश्वास होना चाहिए, नहीं तो सफलत होना मुश्किल हैं। अविश्वास का साधना मे कोई स्थान नही है। साधना का समय एक ही रखने की कोशिश करनी चाहिए। एक स्टील की प्लेट मे सारी सामग्री रख ले। साधना करते समय और मंत्र जप करते समय जमीन को स्पर्श नही करते। माला को लाल या किसी अन्य रंग के कपडे से ढककर ही मंत्र जप करे या गौमुखी खरीदे ले। मंत्र जप को अगुँठा और माध्यमा से ही करे । मंत्र जपते समय माला मे जो अलग से एक दान लगा होता हैं उसको लांघना नहीं है मतलब जम्प नहीं करना हैं। जब दुसरी माला शुरु हो तो माला के आखिए दाने/मनके को पहला दान मानकर जप करें, इसके लिए आपको माला को अंत मे पलटना होगा। इस क्रिया का बैठकर पहले से अभ्यास कर लें। साधना समाग्री : - तिलोत्तमा अप्सरा आकर्षण सिद्धि यंत्र . गुटिका . सिफलल्या मुद्धिका . स्फटिक का माला . गुलाब का इत्र . पूजा सामग्री:- सिन्दुर, चावल, गुलाब पुष्प, चौकी, नैवैध, पीला आसन, धोती या कुर्ता पेजामा, इत्र, जल पात्र मे जल, चम्मच, एक स्टील की थाली, मोली/कलावा, अगरबत्ती,एक साफ कपडा बीच बीच मे हाथ पोछने के लिए, देशी घी का दीपक, (चन्दन, केशर, कुम्कुम, अष्टगन्ध यह सभी तिलक के लिए)) विधि : पूजन के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-सुथरे आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके बैठ जाएं। पूजन सामग्री अपने पास रख लें। बायें हाथ मे जल लेकर, उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर, शरीर और पूजन सामग्री पर छिड़क लें या पुष्प से अपने को जल से छिडके। ————————————————————————————————— ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ————————————————————————————————— (निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए शिखा/चोटी को गांठ लगाये / स्पर्श करे) ॐ चिद्रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते। तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥ ————————————————————————————————— (अपने माथे पर कुंकुम या चन्दन का तिलक करें) ॐ चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रं पापनाशनम्। आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥ ————————————————————————————————— (अपने सीधे हाथ से आसन का कोना जल/कुम्कुम थोडा डाल दे) और कहे ॐ पृथ्वी! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥ ————————————————————————————————— संकल्प:- दाहिने हाथ मे जल ले। मैं ........अमुक......... गोत्र मे जन्मा,................... यहाँ आपके पिता का नाम.......... ......... का पुत्र .............................यहाँ आपका नाम....................., निवासी.......................आपका पता............................ आज सभी देवी-देव्ताओं को साक्षी मानते हुए देवी तिलोत्त्मा अप्सरा की पुजा, गण्पति और गुरु जी की पुजा देवी तिलोत्त्मा अप्सरा के साक्षात दर्शन की अभिलाषा और प्रेमिका रुप मे प्राप्ति के लिए कर रहा हूँ जिससे देवी तिलोत्त्मा अप्सरा प्रसन्न होकर दर्शन दे और मेरी आज्ञा का पालन करती रहें साथ ही साथ मुझे प्रेम, धन धान्य और सुख प्रदान करें। जल और सामग्री को छोड़ दे। ————————————————————————————————— गणपति का पूजन करें। ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः। ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। गुरु पुजन कर लें कम से कम गुरु मंत्र की चार माला करें या जैसा आपके गुरु का आदेश हो। सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणि नमोअस्तुते ॐ श्री गायत्र्यै नमः। ॐ सिद्धि बुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः। ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः। ॐ भ्रं भैरवाय नमः का 21 बार जप कर ले। ————————————————————————————————— अब अप्सरा का ध्यान करें और सोचे की वो आपके सामने हैं। दोनो हाथो को मिलाकर और फैलाकर कुछ नमाज पढने की तरफ बना लो। साथ ही साथ “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं तिलोत्त्मा अप्सरा आगच्छ आगच्छ स्वाहा” मंत्र का 21 बार उचारण करते हुए एक एक गुलाब थाली मे चढाते जाये। अब सोचो कि अप्सरा आ चुकी हैं। हे सुन्दरी तुम तीनो लोकों को मोहने वाली हो तुम्हारी देह गोरे गोरे रंग के कारण अतयंत चमकती हुई हैं। तुम नें अनेको अनोखे अनोखे गहने पहने हुये और बहुत ही सुन्दर और अनोखे वस्त्र को पहना हुआ हैं। आप जैसी सुन्दरी अपने साधक की समस्त मनोकामना को पुरी करने मे जरा सी भी देरी नही करती। ऐसी विचित्र सुन्दरी तिलोत्तमा अप्सरा को मेरा कोटि कोटि प्रणाम। ————————————————————————————————— इन गुलाबो के सभी गन्ध से तिलक करे। और स्वयँ को भी तिलक कर लें। ॐ अपूर्व सौन्दयायै, अप्सरायै सिद्धये नमः। मोली/कलवा चढाये : वस्त्रम् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः गुलाब का इत्र चढाये : गन्धम समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः फिर चावल (बिना टुटे) : अक्षतान् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः पुष्प : पुष्पाणि समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः अगरबत्ती : धूपम् आघ्रापयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः दीपक (देशी घी का) : दीपकं दर्शयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः मिठाई से पुजा करें।: नैवेद्यं निवेदयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः फिर पुजा सामप्त होने पर सभी मिठाई को स्वयँ ही ग्रहण कर लें। ————————————————————————————————— पहले एक मीठा पान (पान, इलायची, लोंग, गुलाकन्द का) अप्सरा को अर्प्ति करे और स्वयँ खाये। इस मंत्र की स्फाटिक की माला से 21 माला जपे और ऐसा 11 दिन करनी हैं। ॐ क्लीं तिलोत्त्मा अप्सरायै मम वश्मनाय क्लीं फट ————————————————————————————————— यहाँ देवी को मंत्र जप समर्पित कर दें। क्षमा याचना कर सकते हैं। जप के बाद मे यह माला को पुजा स्थान पर ही रख दें। मंत्र जाप के बाद आसन पर ही पाँच मिनट आराम करें। ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः। यदि कर सके तो पहले की भांति पुजन करें और अंत मे पुजन गुरु को समर्पित कर दे। अंतिम दिन जब अप्सरा दर्शन दे तो फिर मिठाई इत्र आदि अर्पित करे और प्रसन्न होने पर अपने मन के अनुसार वचन लेने की कोशिश कर सकते हैं। पुजा के अंत मे एक चम्मच जल आसन के नीचे जरुर डाल दें और आसन को प्रणाम कर ही उठें। ॥ हरि ॐ तत्सत ॥ ————————————————————————————————— नियम जिनका पालन अधिक से अधिक इस साधना मे करना चाहिए वो सब नीचे लिखे हैं। ब्रह्मचरी रहना परम जरुरी होता हैं अगर कुछ विचारना हैं तो केवल अपने ईष्‍ट का या ॐ नमः शिवाय या अप्सरा का ध्यान करें, आप सदैव यह सोचे कि वो सुन्दर सी अप्सरा आपके पास ही मौजुद हैं और आपको देख रही हैं। ऐसी अवस्था मे क्या शोभनीय हैं आप स्वयँ अन्दाजा लगा सकते हैं। भोजन: मांस, शराब, अन्डा, नशे, तम्बाकू, तामसिक भोजन आदि सभी से ज्यादा से ज्यादा दुर रहना हैं। इनका प्रयोग मना ही हैं। केवल सात्विक भोजन ही करें क्योंकि यह काम भावना को भडकाने का काम करते हैं। मंत्र जप के समय कृपा करके नींद्, आलस्य, उबासी, छींक, थूकना, डरना, लिंग को हाथ लगाना, सेल फोन को पास रखना, जप को पहले दिन निधारित संख्या से कम-ज्यादा जपना, गा-गा कर जपना, धीमे-धीमे जपना, बहुत् ही ज्यादा तेज-तेज जपना, सिर हिलाते रहना, स्वयं हिलते रहना, मंत्र को भुल जाना (पहले से याद नहीं किया तो भुल जाना), हाथ-पैंर फैलाकर जप करना यह सब कार्य मना हैं। मेरा मतलब हैं कि बहुत ही गम्भीरता से मंत्र जप करना हैं। यदि आपको पैर बदलने की जरुरत हो तो माला पुरी होने के बाद ही पैरों को बदल सकते हैं या थोडा सा आराम कर सकते हैं लेकिन मंत्र जप बन्द ना करें। यदि आपको सिद्धि चाहिए तो भगवन श्री शिव शंकर भगवान के कथन को कभी ना भुलना कि "जिस साधक की जिव्हा परान्न (दुसरे का भोजन खाना) से जल गयी हो, जिसका मन में परस्त्री (अपनी पत्नि के अलावा कोई भी) हो और जिसे किसी से प्रतिशोध लेना हो उसे भला केसै सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं"। यदि उसे एक बार भी प्रेमिका की तरह प्रेम/पुजा किया तो आने मे कभी देरी नही करती है। साधना के समय वो एक देवी मात्र ही हैं और आप साधक हैं। इनसे सदैव आदर से बात करनी चाहिए। समस्त अप्सराएँ वाक सिद्ध होती हैं। किसी भी साधना को सीधे ही करने नही बैठना चाहिए। उससे पहले आपको अपना कुछ अभ्यास करना चाहिए। मंत्रो का उचारण कैसे करना है यह भी जान लेना चाहिए और बार बार बोलकर अभ्यास कर लेना चाहिए। ऐसा करने पर अप्सरा जरुर सिंद्ध होती हैं बाकी जो देवी कालिका की इच्छा क्योंकि होता वही हैं जो देवी जगत जननी चाहती हैं। साधना से किसी को नुकसान पहुँचाने पर साधना शक्ति स्वयँ ही समाप्त होने लगती हैं। इसलिए अपनी साधना की रक्षा करनी चाहिए। किसी को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरुरत नहीं हैं। यहाँ कोई किसी के काम नहीं आता हैं लेकिन फिर भी कभी कभार किसी ना किसी जो बहुत ही जरुरत मन्द हो की सहायता करी जा सकती हैं। वैसे यह साधना साधक का ही ज्यादा भला करने वाले हैं। मैं तो इतना ही कहुगाँ कि इस साधना को नए साधक और ऐसे आदमी को जरुर करना चाहिए जो देवी देवता मे यकीन ना रखता हो। यदि ऐसे लोगों थोडा सा विश्वास करके भी इस साधना को करते हैं तो उन्हें कुछ ना कुछ अच्छे परिणाम जरुर मिलने चाहिए। यदि किसी को साधना करने मे कोई दिक्कत हो रही हैं तो हमसे भी सम्पर्क (ईमेल का पता सबसे उपर दिया गया हैं) किया जा सकता हैं। यदि पहली बार में साधना मे सिद्धि प्राप्त नहीं हो रही है तो आप सहायता के लिए ईमेल कर सकते हैं। देवी माँ आपको सभी सिद्धि प्रदान करें इस कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ।. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

धूमावती एक एसी महाविद्या है

धूमावती एक एसी महाविद्या है धूमावती एक एसी महाविद्या है जिनके बारे मे साहित्य अत्यधिक कम मात्र मे मिलता है. इस महाविद्या के साधक भी बहोत कम मिलते है. मूल रूप से इनकी साधना शत्रु स्तम्भन और नाशन के लिए की जाती है. लेकिन इस महाविद्या से सबंधित कई ऐसे प्रयोग है जिनके बारे मे व्यक्ति कभी सोच भी नहीं सकता. चरपटभंजन नाम धूमावती के उच्चकोटि के साधको के मध्य प्रचलित रहा है, चरपट भंजन को ही चरपटनाथ या चरपटीनाथ कहा गया है. चरपटनाथ ने अपने जीवन काल मे धूमावती सबंधित साधनाओ का प्रचुर अभ्यास किया था और मांत्रिक धूमावती को सिद्ध करने वाले गिने चुने व्यक्ति मे इनकी गणना होती है, वे कालजयी रहे है और आज भी वे सदेह है. उनके बारे मे ये प्रचलित है की वह किसी भी तत्व मे अपने आप को बदल सकते है चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म, जैसे मनुष्य पशु पक्षी पानी अग्नि या कुछ भी. ७५०-८०० साल पहले धूमावती साधना के सबंध मे फैली भ्रान्ति को दूर करने के लिए इस महान धूमावती साधक ने कई ग्रंथो की रचना की जिसमे धूमावतीरहस्य, धूमावतीसपर्या, धूमावती पूजा पध्धति जैसे अत्यधिक रोचक ग्रंथ सामिल है. कई गुप्त तांत्रिक मठो मे आज भी यह ग्रन्थ सुरक्षित है. लेकिन यह साधना पद्धतिया लुप्त हो गयी और जन सामान्य के मध्य कभी नहीं आई. धूमावती अलक्ष्मी होते हुए भी लक्ष्मी प्राप्ति से लेके वैभव ऐश्वर्य तथा जीवन के पूर्ण भोग प्राप्त करने के लिए भी धूमावती साधना के कई विधानों का उन्होंने प्रचार किया था. लेकिन ये साधनाओ को गुप्त रखने की पीछे का मूल चिंतन सायद तब की परिस्थिति हो या कुछ और लेकिन इससे जन सामान्य के मध्य साधको का हमेशा ही नुक्सान रहा है. चरपटभंजन ने जो कई गुप्त पध्धातियो का विकास किया था उनमे से एक साधना एसी भी थि जिसको करने से व्यक्ति अपने सामने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे मे कुछ भी जान लेता है. जैसे की चरित्र कैसा है, इस व्यक्ति की प्रकृति क्या है, इसके दिमाग मे इस वक्त कौनसे विचार चल रहे होंगे? इस प्रकार की साधना अत्यधिक दुस्कर है क्यों जीवन के रोज ब रोज के कार्य मे ऐसी साधनाओ से कितना और क्या विकास हो सकता है कैसे फायदा हो सकता है ये तो व्यक्ति खुद ही समज सकता है. मानसिक शक्तियो के विकास की अत्यधिक दुर्लभ साधनाओ मे यह साधना अपना एक विशेष स्थान लिए हुए है. चरपटनाथ द्वारा प्रणित धूमावती प्रयोग आप सब के मध्य रख रहा हू. इस साधना को करने से पूर्व साधक अपने स्थान का चुनाव करे. साधक के साधना स्थल पर और आसान पर साधक की जब तक साधना चले कोई और व्यक्ति न बैठे. इस साधना मे साधक को ११ माला मंत्र जाप एक महीने (३० दिन) तक करना है. माला काले हकीक की रहे. वस्त्र काले रहे. समय रात्रि काल मे ११ बजे के बाद का हो. धूमावती का यन्त्र चित्र अपने सामने स्थापित करे. तेल का दीपक साधना समय मे जलते रहना चाहिए. यन्त्र चित्र का पूजन कर के विनियोग करे विनियोग: अस्य श्री चरपटभंजन प्रणित धूमावती प्रयोगस्य पूर्ण विनियोग अभीष्ट सिद्धियर्थे करिष्यमे पूर्ण सिद्धियर्थे विनियोग नमः इसके बाद निम्न मंत्र का ११ माला जाप करे ओम धूमावती करे न काम, तो अन्न हराम, जीवन तारो सुख संवारो, पुरती मम इच्छा, ऋणी दास तमारो ओम छू मंत्र जाप के बाद साधक धूमावती देवी को ही मंत्र जाप समर्पित कर दे. ये अत्यधिक दुर्लभ विधान सम्प्पन करने के बाद व्यक्ति यु कहा जाए की अजेय बन जाता है तो भी अतिशियोक्ति नहीं होगी. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Sunday, July 15, 2018

भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा और तांत्रिक अभिचार से मुक्ति के उपाय

भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा और तांत्रिक अभिचार से मुक्ति के उपाय भूत-प्रेत-चुड़ैल जैसी समस्याओं से व्यक्ति अथवा परिवार के सहयोग से मुक्ति पायी जा सकती है ,किन्तु उच्च स्तर की शक्तियां सक्षम व्यक्ति ही हटा सकता है , कुछ शक्तियां ऐसी होती हैं की अच्छे अच्छे साधक के छक्के छुडा देती हैं और उनके तक के लिए जान के खतरे बन जाती है ,ऐसे में केवल श्मशान साधक अथवा बेहद उच्च स्तर का साधक ही उन्हें हटा या मना सकता है , किन्तु यहाँ समस्या यह आती है की इस स्तर का साधक सब जगह मिलता नहीं ,उसे सांसारिक लोगों से मतलब नहीं होता या सांसारिक कार्यों में रूचि नहीं होती ,पैसे आदि का उसके लिए महत्व नहीं होता या यदि वह सात्विक है तो इन आत्माओं के चक्कर में पना नहीं चाहता ,क्योकि इसमें उसकी उस शक्ति का खर्च होता है जो वह अपनी मुक्ति के लिए अर्जन कर रहा होता है . भूत-प्रेत चुड़ैल जैसी समस्याओं को कौवा तंत्र के प्रयोग से हटाया जा सकता है किन्तु यह जानकार साधक ही कर सकता है , प्रेत अथवा पिशाच- पिशाचिनी साधक भी इन्हें हटा सकता है ,अच्छा तांत्रिक भी इन्हें हटा सकता है ,देवी साधक,हनुमान-भैरव साधक इन्हें हटा सकता है ,किन्तु उच्च शक्तिया केवल उच्च साधक ही हटा सकता है,इन्हें देवी[दुर्गा-काली-बगला आदि महाविद्या ]साधक ,भैरव-हनुमान साधक ,श्मशान साधक ,अघोर साधक ,रूद्र साधक हटा सकता है , . कुछ क्रियाएं इन समस्याओं पर अंकुश लगाती हैं ,पर यहाँ भी योग्य का मार्गदर्शन आवश्यक होता है ,फिर भी प्रसंगवश कुछ क्रियाएं निम्न हैं [१]भूत-प्रेत ग्रस्त व्यक्ति को हरसिंगार की जड़ के साथ घोड़े की नाल धारण कराने से लाभ होता है . [२]भूत ग्रस्त व्यक्ति के सामने उल्लू का मांस जलाने से उसे राहत मिलती है . [३]नागदमन के पत्ते के साथ सियार के बाल को टोना टोटका ग्रस्त व्यक्ति के ऊपर से उतार कर अग्नि में डालने से उसे लाभ होता है . [४]नागदमन और अपामार्ग की जड़ को धारण करने से बाधा में लाभ होता है . [५]रविपुष्य में निकली और अभिमंत्रित श्वेतार्क की जड़ धारण करने से भूत-प्रेत बाधा दूर होती है . [६]भूत-प्रेत ग्रस्त व्यक्ति के सामने गुडमार के सूखे पत्तों की धूनी जलाने से उसे लाभ होता है . [७]कटहल की ज धारण करने से टोन से बचाव होता है . [८]महानिम्ब की जड़ धारण करने से भूत-प्रेत से सुरक्षा होती है . [९]गरुड़ वृक्ष के ९ इंच के बराबर की लकड़ी को ९ बराबर हिस्सों में काटकर ९ सूअर के दांत के साथ अलग अलग घर के चारो और जमीन में ठोंक देने से घर में भूतों का उपद्रव शांत हो जाता है . [१०]मंत्र सिद्ध सूअर दांत को व्यक्ति के पुराने कपडे में लपेटकर बहते पानी में छोड़ देने से भूत-प्रेत की पीड़ा शांत होती है . [११]भालू के बालों की धूनी देने से भूत-प्रेत दूर होते हैं . [१२]टिटहरी के पंख को बढ़ा ग्रस्त व्यक्ति पर से उतारकर जलाने से भूत-प्रेत से राहत मिलती है . [१३]दक्षिणमुखी हनुमान जी के दाहिने पैर पर लगे सिन्दूर के तिलक से भूत-प्रेत बाधा में राहत मिलती है . [१४]तुलसी-कालीमिर्च-सहदेई की जड़ धारण करने से भूत बाधा में राहत मिलती है . [१५]सफ़ेद घुंघुची की जड़ या काले धतूरे की जड़ धारण कराने से ऐसी पीड़ा दूर होती है .,, उपरोक्त प्रयोगों को बिना उचित मार्गदर्शन के खुद करने से यथा संभव बचें ,क्योकि अगर आपके उपाय की शक्ति कम हुई और वायव्य बाधा की शक्ति अधिक हुई तो वह चिढ़कर अथवा कुपित होकर अधिक नुकसान कर सकती है अथवा कष्ट दे सकती है |इन प्रयोगों में शक्ति संतुलन का बहुत महत्व होता है | उपरोक्त प्रयोगों के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के प्रयोग और उतारे होते हैं जिनसे ऐसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है ,साधक मंत्र और तंत्र प्रयोग से ऐसे समस्याओं से मुक्ति दिलाते है . बजरंग बाण का पाठ ,सुदर्शन कवच ,दुर्गा कवच,काली सहस्त्रनाम ,बगला सहस्त्रनाम ,काली कवच, बगला कवच, आदि के पाठ से इनके प्रभाव पर अंकुश लगता है ,उग्र शक्तियों की आराधना इनके प्रभाव को रोकती है ,बगला अनुष्ठान ,शतचंडी यज्ञ ,काली अनुष्ठान ,बगला प्रत्यंगिरा ,काली प्रत्यंगिरा,गायत्री हवन ,महामृत्युंजय हवन से इनसे मुक्ति पायी जा सकती है ,सिद्ध साधक द्वारा बनाई यन्त्र -ताबीज आदि से इनके प्रभाव को रोका भी जा सकता है और मुक्ति भी पायी जा सकती है ,यद्यपि अनेक प्रकार के टोटके इन शक्तियों पर उपयोग किये जाते हैं पर यह कम शक्तिशाली प्रभावों पर ही अधिक प्रभावी होते हैं ,उच्च शक्तियों पर इनका बहुत प्रभाव नहीं पड़ता कुछ अंकुश अवश्य हो सकता है ,कभी-कभी कुछ छोटे टोटके जिनका इन पर बहुत प्रभाव न पड़े इन्हें और अधिक उग्र भी कर देते है अतः सावधानी और उपयुक्त मार्गदर्शन आवश्यक होता है , सबसे बेहतर तो यही होता है की यदि इस प्रकार की कोई समस्या हो तो किसी अच्छे जानकार व्यक्ति को दिखाया जाए ,किन्तु यदि कोई बेहतर जानकार न मिले या आसपास न हो अथवा आसपास के कम जानकारों से न लाभ मिल पा रहा हो तो ,किसी उच्च स्तर के साधक से संपर्क करना चाहिए ,यदि वह पीड़ित तक न जाए तो पीड़ित को वहां ले जाएँ ,यह भी न हो सके तो साधक से यन्त्र- ताबीज बनवाकर पीड़ित को धारण करवाए ,,यदि पीड़ित करने वाली शक्ति कम शक्तिशाली होगी तो तुरंत हट जायेगी नहीं तो उसके प्रभाव में कमी तो आ ही जायेगी ,उसे व्यक्ति को प्रभावित करने में तो दिक्कत आएगी ही ,,यंत्रो-ताबीजो से निकलने वाली तरंगे और सकारात्मक ऊर्जा से उस नकारात्मक शक्ति को कष्ट होता है ,कभी कभी यह ताबीज उतारने या हटवाने का भी प्रयास करते हैं ,, यह क्रिया उसी प्रकार की है की जैसे किसी व्यक्ति का भोजन बंद कर दिया जाए तो वह कितने दिन तक जीवित रहेगा ,उसी प्रकार अतृप्त आत्मा या अभिचार जिस उद्देश्य से आया है यदि उसमे रुकावट उत्पन्न कर दिया जाए तो वह कब तक रुका रहेगा ,इस प्रकार धीरे-धीरे व्यक्ति को राहत मिल जाती है ,साथ में अगर जानकार के बताये टोटके भी किये जाए और उपाय अपनाए जाए तो जल्दी राहत मिल सकती है , इस प्रकार उच्च शक्तियों को भी रोका जा सकता है ,हां यन्त्र की शक्ति भी उसी अनुपात में होनी चाहिए की वह उसके प्रभाव को रोक सके ,,बगलामुखी यन्त्र ,काली यन्त्र ,छिन्नमस्ता यन्त्र ,धूमावती यन्त्र ,तारा यन्त्र ,हनुमान यन्त्र ,भैरव यन्त्र ,दुर्गा यन्त्र आदि इस श्रेणी में आते हैं की किसी भी शक्ति के प्रभाव को रोक सकते हैं बशर्ते की यह उनके सिद्ध साधक द्वारा निर्मित हों | राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट .किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249' 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Saturday, July 14, 2018

शत्रु नाशक बगला प्रयोग

शत्रु नाशक बगला प्रयोग जिस साधक पर भगवती बगलामुखी की कृपा हो जाती है, उसके शत्रु कभी अपने षड़यंत्र मे सफल नही हो पाते है.क्युकी भगवती का मुद्गर उन शत्रुओ की समस्त क्रियाओ को निस्तेज कर देता है. प्रस्तुत साधना उन साधको के लिये है,जो शत्रू के कारण समस्याओ से घिर जाते है.वैसे दरिद्रता,रोग,दुख ये भी माँ कि दृष्टि मे आपके शत्रू ही है. अतः सभी को यह साधना करनी करनी चाहिये.यह साधना आपको २६ तारीख को करना है.किसी कारणवश ना कर पाये तो किसी भी रविवार को करे.समय रात्रि १० के बाद का रखे. आसन वस्त्र पिले हो.आपका मुख उत्तर की और होना चाहिये.सामने बाजोट रखकर उस पर पिला वस्त्र बिछा दे.और वस्त्र पर पिले सरसो कि एक ढ़ेरी बनाये. इस ढ़ेरी पर एक मिट्टि का दिपक सरसो का तेल डालकर प्रज्जवलित करे.ईसके अतिरिक्त किसी सामग्री की आवश्यक्ता नही है. दिपक की सामान्य पुजन कर गुड़ का भोग अर्पित करे.अब संकल्प ले . हे माता बगलामुखी हर शत्रू से,रोगो से,दुखो से,दरिद्रता से तथा हर कष्ट प्रद स्थिती से रक्षा हेतु मै यह प्रयोग कर रहा हु.आप मेरी साधना को स्विकार कर.मुझे सफलता प्रदान करे. अब निम्न मंत्र कि पिली हकीक माला,हल्दि माला,अथवा रूद्राक्ष माला से २१ माला करे. क्रीं ह्लीं क्रीं सर्व शत्रू मर्दिनी क्रीं ह्लीं क्रीं फट् Kreem hleem kreem sarv shatru mardini kreem hleem kreem phat यह मंत्र महाकाली समन्वित बगला मंत्र है.जो कि अत्यंत तिव्र है.ईसका जाप वाचिक कर पाये तो उत्तम होगा अन्यथा उपांशु करे.पंरतु मानसिक ना करे. जाप समाप्त होने के बाद.घृत मे सरसो मिलाकर १०८ आहुति प्रदान करे.इस प्रकार साधना पुर्ण होगी.साधना के बाद पुनः स्नान करना आवश्यक है. अगले दिन गुड़,सरसो पिला वस्त्र किसी वृक्ष के निचे रख आये.यह एक दिवसीय प्रयोग साधक को शत्रू से मुक्त कर देता है.साधक चाहे तो साधना को ३,७, या २१ दिवस के अनुष्ठान रूप मे भी कर सकता है. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

दरिद्त्रता नाशक प्रचंड प्रयोग चमत्कारी मुद्रिका

दरिद्त्रता नाशक प्रचंड प्रयोग प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रन्थ "" शारदा तिलक """ में इस पवित्र मुद्रिका के विषय और प्रयोग के बारे में विशद उल्लेख किया गया हैं . त्रिधातु ( सोना २ रत्ती , चाँदी १२ रत्ती , और तांबा १६ रत्ती , ) से शास्त्रोक्त पद्धतिके अनुसार निर्मित तथा श्री यन्त्र जड़ित इस चमत्कारी मुद्रिका को धारण करने से दरिद्रता का समूल नाश हो जाता हैं . सामग्री - जल पात्र , घी का दीपक , अगरबत्ती , भोजपत्र , मंत्र सिद्धि पवित्री मुद्रिका . माला - पवित्री माला ( मंत्र सिद्धि चैतन्य ) समय - दिन या रात में कोई भी समय दिन - शुक्रवार . धारणीय - वस्त्र - पीले रंग की धोती आसन - पीले रंग का दिशा - पूर्व जप संख्या - ११००० हजार अवधि - ११ दिन मंत्र - ॐ क्लीं नमः ( कनकधारा स्त्रोत ) प्रयोग - सर्व प्रथम भोजपत्र पर केशर से उपरोक्त यन्त्र को अंकित कर दे और उसके ऊपर पवित्री मुद्रिका रख दे , ( जो की मंत्र सिद्धि प्राण - प्रतिष्ठा युक्त हो ) इसके बाद सामने अगरबत्ती व दीपक लगा दे तथा कनक धरा स्त्रोत का जाप प्रारम्भ कर दे . उसके बाद निम्न मंत्र का ११०० मंत्र का जाप प्रतिदिन करे , ११ दिन . ११ वे दिन जाप पूरा कर के भोजपत्र को चांदी के ताबीज में बंद कर गले में धारण कर ले और मंत्र सिद्धि प्राण - प्रतिष्ठा युक्त पवित्री मुद्रिका दाहिने हाथ की किसी भी ऊँगली में धारण कर ले , इस अगूंठी के प्रभाव से राज्य से सम्बंधित सभी बंधाये दूर हो जाती हैं . और उसे मान सम्मान प्राप्त होता हैं साथ ही यह पवित्री मुद्रिका धारण करता की दरिद्रता का विनाश कर के उसके लिए लक्ष्मी प्राप्त में परम सहायक होती हैं . राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Friday, July 13, 2018

तीव्र त्रिशक्ति जागरण साधना

तीव्र त्रिशक्ति जागरण साधना क्रिया ज्ञान इच्छा स शक्तिः इस ब्रह्माण्ड में आदि शक्ति के अनंत रूप अपने अपने सुनिश्चित कार्यों को गति प्रदान करने के लिए तथा ब्रह्माण्ड के योग्य संचालन के लिए अपने नियत क्रम के अनुसार वेगवान है. यही ब्रह्मांडीय शक्ति के मूल तिन द्रश्य्मान स्वरुप को हम महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली के रूप में देखते है. तांत्रिक द्रष्टि से यही तिन शक्तियां सर्जन, पालन तथा संहार क्रम की मूल शक्तियां है जो की त्रिदेव की सर्वकार्य क्षमता का आधार है. यही त्रिदेवी ब्रह्माण्ड की सभी क्रियाओ में सूक्ष्म या स्थूल रूप से अपना कार्य करती ही रहती है. तथा यही शक्ति मनुष्य के अंदर तथा बाह्य दोनों रूप में विद्यमान है. मनुष्य के जीवन में होने वाली सभी घटनाओ का मुख्य कारण इन्ही त्रिशक्ति के सूक्ष्म रूप है ज्ञानशक्ति इच्छाशक्ति क्रियाशक्ति ज्ञान, इच्छा तथा क्रिया के माध्यम से ही हमारा पूर्ण अस्तित्व बनता है, चाहे वह हमारे रोजिंदा जीवन की शुरूआत से ले कर अंत हो या फिर हमारे सूक्ष्म से सूक्ष्म या वृहद से वृहद क्रियाकलाप. हमारे जीवन के सभी क्षण इन्ही त्रिशक्ति के अनुरूप गतिशील रहते है. वस्तुतः जेसा की शाश्त्रो में कहा गया है मनुष्य शरीर ब्रह्माण्ड की एक अत्यंत ही अद्भुत रचना है. लेकिन मनुष्य को अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं है, उसकी अनंत क्षमताएं सुप्त रूप में उसके भीतर ही विद्यमान होती है. इसी प्रकार यह त्रिशक्ति का नियंत्रण वस्तुतः हमारे हाथ में नहीं है और हमें इसका कोई ज्ञान भी नहीं होता है. लेकिन अगर हम सोच के देखे तो हमारा कोई भी सूक्ष्म से सूक्ष्म कार्य भी इन्ही तीनों शक्तियों में से कोई एक शक्ति के माध्यम से ही संपादित होता है. योगीजन इन्ही शक्तियों के विविध रूप को चेतन कर उनकी सहायता प्राप्त करते हुवे ब्रह्माण्ड के मूल रहस्यों को जानने का प्रयत्न करते रहते है. न सिर्फ आध्यात्मिक जीवन में वरन हमारे भौतिक जीवन के लिए भी इन शक्तियों का हमारी तरफ अनुकूल होना कितना आवश्यक है यह सामन्य रूप से कोई भी व्यक्ति समज ही सकता है. ज्ञान शक्ति एक तरफ आपको जीवन में किस प्रकार से आगे बढ़ कर उन्नति कर सकते है यह पक्ष की और विविध अनुकूलता दे सकती है वहीँ दूसरी और जीवन में प्राप्त ज्ञान का योग्य संचार कर विविध अनुकूलता की प्राप्ति केसे करनी है तथा उनका उपभोग केसे करना है यह इच्छाशक्ति के माध्यम से समजा जा सकता है क्रिया शक्ति हमें विविध पक्ष में गति देती है तथा किस प्रकार प्रस्तुत उपभोग को अपनी महत्तम सीमा तक हमें अनुकूलता तथा सुख प्रदान कर सकती है यह तथ्य समजा देती है. प्रस्तुत साधना, इन्ही त्रिशक्ति को चेतन कर देती है जिससे साधक अपने जीवन के विविध पक्षों में स्वतः ही अनुकूलता प्राप्त करने लगता है, न ही सिर्फ भौतिक पक्ष में बल्कि आध्यात्मिक पक्ष में भी. साधक के नूतन ज्ञान को प्राप्त करने तथा उसे समजने में अनुकूलता प्राप्त होने लगती है. किसी भी विषय को समजने में पहले से ज्यादा साधक अनुकूलता अनुभव करने लगता है. अपने अंदर की विविध क्षमता तथा कलाओं के बारे में साधक को ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसके लिए क्या योग्य और क्या अयोग्य हो सकता है इससे सबंध में भी साधक की समज बढ़ाने लगती है. इच्छाशक्ति की वृद्धि के साथ साधक विविध प्रकार के उन्नति के सुअवसर प्राप्त होने लगते है तथा साधक को अपने ज्ञान का उपयोग किस प्रकार और केसे करना है यह समज में आने लगता है. उदहारण के लिए किसी व्यक्ति के पास व्यापार करने का ज्ञान है लेकिन उसके पास व्यापर करने की कोई क्षमता नहीं है या उस ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग हो नहीं पा रहा है तो इच्छाशक्ति के माध्यम से यह संभव हो जाता है. क्रियाशक्ति के माध्यम से साधक अपनी इच्छाशक्ति में गति प्राप्त करता है. अर्थात किसी भी कार्य का ज्ञान है, उसको करने के लिए मौका भी है लेकिन अगर वह क्रिया ही न हो जो की परिणाम की प्राप्ति करवा सकती है तो सब बेकार हो जाता है. क्रिया शक्ति वाही परिणाम तक साधक को ले जाती है तथा एक स्थिरता प्रदान करती है. त्रिशक्ति से सबंधित यह तीव्र प्रयोग निश्चय ही एक गुढ़ प्रक्रिया है. वास्तव में अत्यंत ही कम समय में साधक की तिन शक्तियां चैतन्य हो कर साधक के जीवन को अनुकूल बनाने की और प्रयासमय हो जाती है. इस प्रकार की साधना की अनिवार्यता को शब्दों के माध्यम से आँका नहीं जा सकता है वरन इसे तो मात्र अनुभव ही किया जा सकता है. साधना प्रयोग का विधान कुछ इस प्रकार है. इस साधना को साधक किसी भी शुभदिन से शुरू कर सकता है, समय रात्रि में ९ बजे के बाद का रहे. साधक सर्व प्रथम स्नान आदि से निवृत हो कर लाल वस्त्र को धारण कर लाल आसन पर बैठ जाए. साधक का मुख उत्तर दिशा की और रहे. अपने सामने बाजोट पर या किसी लकड़ी के पट्टे पर साधक को लाल वस्त्र बिछा कर उस पर एक भोजपत्र या सफ़ेद कागज़ पे एक अधः त्रिकोण कुमकुम से बनाना है. तथा उसके तीनों कोण में बीज को लिखना है. इस यंत्र निर्माण के लिए साधक चांदी की सलाका का प्रयोग करे तो उत्तम है. अगर यह संभव न हो तो साधक को अनार की कलम का प्रयोग करना चाहिए. साधक उस यंत्र का सामान्य पूजन करे. तथा दीपक प्रज्वलित करे. दीपक किसी भी तेल का हो सकता है. साधक सर्व प्रथम गुरुपूजन गणेशपूजन तथा भैरवपूजन कर गुरु मन्त्र का जाप करे. उसके बाद साधक निम्न मन्त्र की २१ माला मंत्र जाप करे. इस मंत्र जाप के लिए साधक मूंगा माला का प्रयोग करे. ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं फट् (om hreeng shreeng kreeng phat) साधक अगले दो दिन यह क्रम जारी रखे. अर्थात कुल ३ दिन तक यह प्रयोग करना है. प्रयोग पूर्ण होने के बाद साधक उस यन्त्र को पूजा स्थान में ही स्थापित कर दे. माला को प्रवाहित नहीं किया जाता है. साधक ऊस माला का प्रयोग वापस इस मंत्र की साधना के लिए कर सकता है तथा निर्मित किये गए यन्त्र के सामने ही मंत्रजाप को किया जा सकता है. साधक को यथा संभव छोटी बालिकाओ को भोजन कराना चाहिए तथा वस्त्र दक्षिणा आदि दे कर संतुष्ट करना चाहिए. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Wednesday, July 11, 2018

तीव्र उच्छिष्ट गणपति साधना

तीव्र उच्छिष्ट गणपति साधना कड़वे नीम की जड़ से कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन अंगूठे के बराबर की गणेश की प्रतिमा बनाकर रात्रि के प्रथम प्रहर में स्वयं लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर पश्चिम मुख होकर झूठे मुँह से सामने थाली में प्रतिमा को स्थापित कर साधना में सफलता की सदगुरुदेव से प्रार्थना कर संकल्प करें और ततपश्चात गणपति का ध्यान कर उनका पूजन लाल चन्दन,अक्षत,पुष्प के द्वारा पूजन करे और लाल चन्दन की ही माला से झूठे मुँह से ही ५ माला मन्त्र जप करें. सात दिनों तक ऐसे ही पूजन करे और आठवे दिन अर्थात अमावस्या को पञ्च मेवे से ५०० आहुतियाँ करें इससे मंत्र सिद्ध हो जाता है. तब आप इनके विविध प्रयोगों को कर सकते हैं. २ प्रयोग नीचे दिए गए हैं. १. जिस व्यक्ति का आकर्षण करना हो चाहे वो आपका बॉस हो, सहकर्मी हो, प्रेमी,प्रेमिका या फिर कोई मित्र या शत्रु हो जिससे, आपको अपना काम करवाना हो.उसके फोटो पर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ३ दिनों तक १ माला मन्त्र जप करने से निश्चय ही उसका आकर्षण होता है. २. अन्न के ऊपर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ११ दिनों तक नित्य ३ माला मंत्र जप करने से वर्ष भर घर में धन धान्य का भंडार भरा रहता है और यदि इसके बाद नित्य ५१ बार मंत्र को जप कर लिया जाये तो ये भंडार भरा ही रहता है. नहीं तो आपको प्रति ६ माह या वर्ष में करना चाहिए. ध्यान मन्त्र – दंताभये चक्र- वरौ दधानं कराग्रग्रम् स्वर्ण-घटं त्रि-नेत्रं , धृताब्जयालिंगितमब्धि-पुत्र्या लक्ष्मी-गणेशं कनकाभमीडे. मंत्र- ॐ नमो हस्ति मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्ठाय स्वाहा. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) फाउंडेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Tuesday, July 10, 2018

कामदेव वशीकरण मंत्र

कामदेव वशीकरण मंत्र जब किसी व्यक्ति को किसी से प्रेम हो जाए या वह आसक्त हो। विवाहित स्त्री या पुरुष की अपने जीवनसाथी से संबंधों में कटुता हो गई हो या कोई युवक या युवती अपने रुठे साथी को मनाना चाहते हो। किंतु तमाम कोशिशों के बाद भी वह मन के अनुकूल परिणाम नहीं पाता। तब उसके लिए तंत्र क्रिया के अंतर्गत कुछ मंत्र के जप प्रयोग बताए गए हैं। जिससे कोई अपने साथी को अपनी भावनाओं के वशीभूत कर सकता है। धर्मशास्त्र में कामदेव को प्रेम, सौंदर्य और काम का देव माना गया है। इसलिए परिणय, प्रेम-संबंधों में कामदेव की उपासना और आराधना का महत्व बताया गया है। इसी क्रम में तंत्र विज्ञान में कामदेव वशीकरण मंत्र का जप करने का महत्व बताया गया है। इस मंत्र का जप हानिरहित होकर अचूक भी माना जाता है। यह मंत्र है - “ॐ नमः काम-देवाय। सहकल सहद्रश सहमसह लिए वन्हे धुनन जनममदर्शनं उत्कण्ठितं कुरु कुरु, दक्ष दक्षु-धर कुसुम-वाणेन हन हन स्वाहा” कामदेव के इस मन्त्र को सुबह, दोपहर और रात्रिकाल में एक-एक माला जप का करें। माना जाता है कि यह जप एक मास तक करने पर सिद्ध हो जाता है। मंत्र सिद्धि के बाद जब आप इस मंत्र का मन में जप कर जिसकी तरफ देखते हैं, वह आपके वशीभूत या वश में हो जाता है। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) फाउंडेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Monday, July 9, 2018

यदि आप मुझसे कुछ सीखना चाहते है

यदि आप मुझसे कुछ सीखना चाहते है तो परिश्रम तो करना ही होगा। किसी को दो दिन में तारा चाहिए,तो किसी को ९ दिन में छिन्नमस्ता,किसी को ५ दिन में मातंगी सिद्ध करना है तो,किसी को ११ दिन में भुवनेश्वरी। कितनी बचकानी बात है. हर साधना कि एक विशेष प्रक्रिया होती है जिससे होकर प्रत्येक साधक को गुजरना ही पड़ता है. और अगर बात महाविद्या कि हो तो ये कार्य और भी कठिन हो जाता है. इसमें तो और भी अधिक परिश्रम करना होता है. कई कई मंत्रो को क्रमशः सिद्ध करना होता है,कई कई अनुष्ठान करने होते है.जब हम आपको ये प्रक्रिया बताते है तो आपको लगता है कि हम टाल रहे है. इस बात पर में कोई सफाई नहीं दूंगा।यदि महाविद्या सिद्धि कि और बढ़ना है तो परिश्रम करना सीखे।अन्यथा जो दो या तीन दिन में सिद्ध करवा दे आलसी लोग उनके पास जा सकते है. कम से कम मेरा कार्य भार कम होगा। और मुझे भी पता चल जायेगा कि तारा २ दिन में और काली ११ दिन में कैसे सिद्ध होती है. मेरा उद्देश्य किसी के ह्रदय को पीड़ित करना नहीं है.अगर किसी को दुःख हुआ हो तो हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थी हु.परन्तु कभी कभी व्यर्थ का रोग मिटाने के लिए कड़वे वचनो कि औषधि आवश्यक हो जाती है. राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Sunday, July 8, 2018

खजाना या गड़ा धन मिलने से पहले कुछ ऐसा होने लगता है

ध्यान रखें : खजाना या गड़ा धन मिलने से पहले कुछ ऐसा होने लगता है ऐसा माना जाता है कि खजाना हर किसी व्यक्ति को नहीं मिल सकता। जिसकी किस्मत में अचानक अपार धन प्राप्त करने के योग हैं वहीं गुप्त खजाना प्राप्त कर सकता है। अचानक धन लाभ होने से पहले आपको किस्मत के इशारे मिलते हैं। ये इशारे सपने में और खुली आखों से या आसपास होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के रूप में महसुस होते हैं। धन लाभ के लिए कई तरह के संकेत होते हैं। रावण संहिता के अनुसार सपने, शगुन और स्वर विज्ञान उनमें से एक है। खास तौर से किन लोगों को महसुस होता है गड़ा धन- सपने में कुआं देखना भी गड़ा खजाना मिलने का एक संकेत हैं। अगर जमीन में छुपा खजाना आपको मिलने वाला है तो अक्सर आपको सपने में कोई गड्डा, छोटा कुआं या खाई दिखने लगेगी। जमीन में छुपा खजाना अक्सर साफ दिल वाले लोगों को ही मिलता है या उन लोगों को मिलता है जिनके मन में कोई छल, कपट नहीं होता। कुछ लोगों को पितृ देवता का इष्ट होता है ऐसे लोगों को सपने में अक्सर सफेद सांप या दीपक जलते हुए दिखाई देते हैं और उन लोगों को गड़ा धन या खजाना अचानक मिल जाता है या महसुस होता है। कुछ खास लोग होते हैं जिन्हे गड़ा धन या खजाना महसुस हो जाता है, ये वो लोग होते हैं जो पैर की तरफ से जन्म लेते हैं यानी जिनके जन्म के समय पहले सिर बाहर न आते हुए पैर बाहर आते हैं। कैसे निकालें खजाना या गड़ा धन : ********************* गड़ा धन निकानले के लिए सबसे पहले निश्चित करें कि किस जगह धन है। उस जगह को पहले पवित्र करें और उस स्थान की पूजा करें। पुराणों के अनुसार ऐसी जगहों पर विशेष शक्तियों का पहरा होता है। गड़े धन या खजाने की रक्षा नाग लोक करता है। नाग योनी पितृ देवताओं की होती है। पितृ ही गड़े धन की रक्षा नाग के रूप में करते हैं। इस खजानें को बिना पितृ की आज्ञा से नहीं निकालना चाहिए। पहले पितृ देवताओं को खुश करना चाहिए। इसके लिए उनके निमित्त हवन और दान कर के धन सही उपयोग का संकल्प लेना चाहिए। गड़े धन का बड़ा हिस्सा धर्म-कर्म, दान और पितृ पूजा में लगाने का संकल्प लेना चाहिए। शुभ तिथि और वार को या किसी खास पर्व, ग्रहों के शुभ संयोग या अपनी कुंडली के अनुसार शुभ दिन निकलवाकर उस दिन गड़ा धन निकालना चाहिए। धन निकालन के पहले होने वाली पूजा भी शुभ तिथि या पितृ की तिथि यानी पंचमी, अमावस्या या पूर्णिमा पर पूजा पाठ करवाना चाहिए। पूजा करवाने के बाद पितृ आपको सपने में दर्शन देते हैं अगर सपने में पितृ देव आपको धन निकालने की आज्ञा दें तो ही धन निकालना चाहिए । कहां मिलता है खजाना: ************** रावण संहिता और वाराह संहिता के अनुसार गुप्त खजाना कहां छिपा होता है? यह मालूम करने के कई उपाय बताए गए हैं। जिस भी स्थान पर अपार धन, सोना-चांदी, हीरे-मोती छिपे या दबे होते हैं वहां सफेद नाग या कोई बहुत पुराना नाग अवश्य दिखाई देता है। इसके अलावा कहीं-कहीं नागों के झूंड भी ऐसे गुप्त खजानों की रक्षा करते हैं। ऐसे नागों का दिखाई देना ही इस बात की ओर इशारा करता है कि उस क्षेत्र में कहीं खजाना दबा हो सकता है। कईं साल पुराने घरों में खजाना छुपा हो सकता है। ऐसे घरों में जो पितृ के समय से ज्यों के त्यों पड़ें हों या जिन घरो में सालों से कोई खुदाई या नव निर्माण नहीं किया गया हो ऐसी जगहों पर खजाना या गड़ा धन होता है। पूराने किलें जहां कभी राजा-महाराजा रहा करते थे। खंडहरों में भी खजाना छुपा होता है क्योंकि वहां पर शक्तियों को परेशान करने वाला कोई नहीं होता और इंसानो से दुर इनकी अपनी अलग दुनिया होती है। जंगलों में भी ऐसे खजाने मिलते हैं क्योंकि पहले के लोग ज्यादातर समय युद्ध में और जंगलों में बीताते थे। धन की रक्षा के लिए वो उसे जमीन में छुपा दिया करते थें और मौत के बाद सांप के रूप में वो उसी जगह बस जाते हैं और धन की रक्ष करते हैं। कैसे सपने बताते हैं खजाने के बारे में सांप या नाग : - अगर आपको सपने में सफेद सांप दिखाई दे तों समझिए आपको अचानक धन लाभ होने वाला है। नाग पितृ देवता के रूप में विचरण करते हैं और योग्य व्यक्ति को सपने में आकर दर्शन देते हैं। - सपने में सफेद नाग-नागिन का जोड़ा जिस घर में या जिस स्थान पर दिखें उस जगह पर आपके पूर्वजों द्वारा रखा गया गड़ा धन होता है। फूल- - अगर सपने में फूल दिखाई दे तो आपको अचानक धन लाभ, खजाना या कहीं से गड़ा धन मिलने का संकेत होता है। - रावण संहिता के अनुसार आपको सपने में दिखने वाला फूल अगर कमल हो तो ये अचानक कहीं से आपको बड़ा फायदा होने का संकेत है। - अगर आप सपने में में इन्द्र धनुष के साथ कमल को देखते हैं यानी इन्द्र धनुष दिखे और कमल का फूल आपके हाथ हो तो आने वाले 45 दिनों में ही आपको इस सपने का फल देखने को मिल जाता है। अगर आप सपने में कमल के पत्ते पर भोजन करते हुए खुद को देखते हैं तो आपको आने वाले कुछ ही दिनों में छुपा हुआ धन लाभ होने वाला है। आभूषण और मंगल चिन्ह अगर सपने में कलश, शंख और सोने के गहने दिखे तो आपको अचानक धन लाभ होगा। रावण संहिता के अनुसार कलश, शंख और गहने आदि मंगल चीजे सपने तभी आती है जब आप पर लक्ष्मी जी खुश होती है। पौराणिक ग्रंथों और संहिताओं के अनुसार कुछ सपने ऐसे होते हैं जो जैसे के तैसे सच हो जाते हैं। - अगर आपको सपने में कोई कन्या जो खुद सोने के आभूषण पहने हुए हो और वो आपको सोने का सिक्का दे तो आने वाले कुछ ही दिनों में आपको इस सपने का फल मिल जाएगा। - कलश सिर पर रखे हुए अगर कोई कन्या सपने में आपको सिक्का दे या किसी दिशा में इशारा करें तो उस दिशा में आपको गड़ा धन मिलेगा। हरे पेड़ या पीपल- - अगर आप सपने में पिपल पर कच्च दुध चढ़ा रहे हैं तो आपको पुर्वजों का धन मिलेगा अगर आपके निवार स्थान वाला पिपल हो तो आपको वहीं धन लाभ होगा लेकिन पिपल नहीं कटवाना चाहिए इससे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। - अगर आपको सपने में पिपल का पेड़ या उस पेड़ पर कोई सफेद कपड़ें में बैठकर आपको किसी दिशा की तरफ इशारा करे तो आपको वहां से धन लाभ होगा। पानी- जिस घर, किले या खंडहर में धन छुपा होता है सपने में उसी जगह पर पानी भरा हुआ दिखाई देता है। उस पानी में खुद को बहते हुए देखना या उस जगह सिर्फ पानी को बहते देखना खजाना या गड़ा धन मिलने का संकेत हैं। सपने में जिस जगह पर पानी में कमल, शंख और कलश बहते दिखाई दें तो समझें आपको उस जगह से गड़ा धन प्राप्त होने वाला है। पूराने मंदिर- अगर आपको खजाना मिलने वाला है तो आपको ऐसे पूराने मंदिरो के सपने आएंगे जो कई साल पूराने हों। ऐसे मन्दिरों में आपको घंटीयां बजती हुई सुनाई देंगी। ऐसे मन्दिर शिव या नाग देवता के हों तो आपको धन लाभ होने के योग बनते हैं। - आपको पूरानी भगवान की मुर्तियां या नाग की मुर्तियां जब दिखने लगे तो समझना चाहिए कि धन लाभ होने वाला है। - ऐसे सपने खास तौर पर पंचमी, अमावस्या या पूर्णिमा को दिखाई दे तो समझना चाहिए सपने का फल जल्दी ही मिलने वाला है। सफेद हाथी- अगर आपको सपने में ऐरावत या सफेद हाथी का दर्शन हो तो आपको अचानक धन लाभ होगा। सफेद हाथी आपको जिस जगह दिखे उस जगह ही गड़ा धन होना जानना चाहिए। सपने में हाथी दांत से बनी चिजें धारण करना भी शुभ स्वपन होता है। ऐसा सपना तभी आता है जब आपको गड़ा धन या अचानक कहीं से धन लाभ के योग होते हैं। मल और गाली गलौज युक्त झगड़ा- अगर सपने में आप मल देखें या खुद को शरीर पर मल लगाते देखें तो आपको अचानक धन लाभ होगा। सपने में खुद को ऐसी जगह देखना जहां मल ही मल हो, ये भी धन लाभ का सपना है। अगर आप सपने में खुद को गाली-गलौज युक्त लड़ाई में देख रहे हैं, लेकिन सुबह तक गाली-गलौज आपको याद न रहें तो ये भी आपका रूका पैसा आने का संकेत होता है। नेवला- रावण संहिता के अनुसार नेवला धन संकेत देने वाला जीव है। अगर आप किसी सुनसान जगह हों या ऐसे जंगल में हो जहां नेवेले अधिक हो तो आपको उस जगह से गड़ा धन जरूर मिलेगा। अगर किसी पूराने मंदिर, खंडहर या पुराने घर में हो और वहां पर नेवला आपके आसपास रहे तो वहां आस-पास धन गड़ा हुआ समझना चाहिए। उल्लु- पक्षी तंत्र के अनुसार उल्लू धन के संकेत देने वाला होता है। जिन जगहों पर गड़ा धन या खजाना होता है। वहां उल्लूूू पाए जाते हैं। तंत्र शास्त्रों में उल्लू को धन की रक्षा करने वाला माना जाता है। उल्लू जिस घर या मंदिर में रहने लग जाए तो समझे उस जगह गड़ा धन या खजाना होगा और जहां उल्लू रहने लग जाते हैं ऐसी जगह जल्दी ही सुनसान हो जाती है राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट .किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249' 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

श्री हनुमान भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन करने हेतु अनुष्ठान

श्री हनुमान भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन करने हेतु अनुष्ठान हर व्यक्ति की यही इच्छा रहती है की उसे अपने जीवन में किसी न किसी रूप में ईश्वर के दर्शन हो जाएँ। आज आप सब के लाभार्थ एक अनुपम हनुमान साधना का विवरण कर रहा हूँ। यदि इस अनुष्ठान को पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के साथ नियम-पालन करते हुए किया जाये तो हनुमान जी किसी न किसी भेष में आपको दर्शन दे देंगे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। साधना सामग्री : हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठित पारद मूर्ति, मूंगे की माला, लकड़ी का बाजोट, गुड-चने का प्रसाद, स्टील या तांबे की थाली, सिन्दूर, धुप, अगरबत्ती, घी का दीपक, लाल वस्त्र (सवा मीटर ), जनेऊ, फल, दक्षिणा। साधना समय : किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के शनिवार या मंगलवार से आरम्भ करके ११ दिन लगातार साधना विधि : मंगलवार या शनिवार को सुबह उठकर नहाधोकर लाल रंग के वस्त्र पहने। सर्वप्रथम घर के पूजा-स्थान में रखी हनुमान मूर्ति या चित्र के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करें। उठने के बाद आपको मौन धारण करना है किसी से बात नहीं करनी है और पूरे दिन मौन रहना है। अब अपने पूजा स्थान में बैठ जाएँ और सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करके "ॐ गं गणपतये नमः " इस मन्त्र को १०८ बार जाप करके गणेश जी को प्रणाम करें एवं उनसे विनती करें की जो अनुष्ठान आप करने जा रहे हो उसमे कोई विघ्न न आये व उसमे आपको सफलता प्राप्त हो। इसके पश्चात अपने सामने लकड़ी का बाजोट रख लें। इस बाजोट के ऊपर लाल रंग का कपडा बिछा दें व उससे मोली से बाजोट के चारों तरफ से बाँध दे। एक स्टील या तांबे की थाली लें उससे बाजोट पर रख दें। इसके बाद इस थाली में गुलाब के पुष्प की पंखुड़ियाँ बिछा दें। उस पर श्री हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठित पारद मूर्ति रख दें। मूर्ति को पहले गंगाजल से उसके बाद पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण ) से स्नान कराएं। इसके बाद एक दूसरी थाली में सिन्दूर के घोल से ॐ का चिन्ह बनायें और उस पर पुनः लाल पुष्प की पंखुड़ियाँ रख कर पारद हनुमान मूर्ति स्थापित कर दें। इसके बाद मूर्ति के ऊपर हनुमान जी के लाल सिन्दूर के घोल से लेप कर दें। अब घी का दीपक जलाएं, धुप अगरबत्ती जलाएं और हनुमान जी को दिखाएँ। इसके पश्चात लाल पुष्प अर्पित करें, जनेऊ चढ़ाएं, और गुड-चने के प्रसाद और फल का भोग लगाएं। अब दक्षिणा भी अर्पित करें। इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर आँखे बंद करकर हनुमान जी का ध्यान करें और इस अनुष्ठान को करने की अपनी मनोकामना या इच्छा को मन ही मन दोहराएं। जल को दाहिनी और जमीन पर छोड़ दें। अब मूंगे की माला से इस मन्त्र के आपको १५१ जाप करने हैं। मन में हनुमान जी का चिंतन करें। मन्त्र : ॐ नमो हनुमंताय आवेशय आवेशय स्वाहा । । मन्त्र जाप के पश्चात पुनः हनुमान जी को प्रणाम करें व अपनी मनोकामना उनके सामने रखे। बाजोट व समस्त सामग्री को वहीँ रखा रहने दें। प्रसाद उठाकर थोड़ा स्वयं ग्रहण करें एवं बाकि घर के सदस्यों में बाँट दें। दिनभर आपको मौन धारण करते हुए हनुमान जी का ही ध्यान करना है। व किसी भी प्रकार के बुरे विचारों को अपने मन में न आने दें। दिन में एक बार आपको बिना नमक और हल्दी का भोजन करना है। ऐसा ११ दिन तक लगातार करना है। ११ दिन के बाद यह अनुष्ठान पूर्ण हो जायेगा और आपको हनुमान जी किसी न किसी रूप में दर्शन देने अवश्य आएंगे। राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Friday, July 6, 2018

स्फटिक की माला के चमत्कार से कर देगा आपकी जिंदगी

स्फटिक की माला के चमत्कार से कर देगा आपकी जिंदगी स्फटिक जिसे बिल्लौर भी कहते हैं। ये कई रंगों में मिलता है व पारदर्शी होता है, अतः पारदर्शी माला भी कहते हैं। यह स्मृद्धि, धन, लक्ष्मी आगमन हेतु सर्वश्रेष्ठ होती है। इसे सौम्य व शुभ सात्विक कार्यो में प्रयोग करते है। यह देवी, शिव व चन्द्र को प्रिय है। अतः वशीकरण, शान्ति, कर्म व समृद्धि हेतु इसे धारण करना सर्वश्रेष्ठ होता है। · स्फटिक की माला को विधिवत पूजन करके गले में धारण करने से धीरे-धीरे धन में वृद्धि होने लगती है। · जिस व्यक्ति के उपर लगातार ऋण का बोझ बढ़ रहा हो वह व्यक्ति घर के ईशान कोण में जल का कलश रखकर स्फटिक माला जल में रखें व शुक्रवार को लक्ष्मी जी की आराधना करने से लाभ अवश्य मिलेगा। · मानसिक तनाव दूर करने व शीतलता प्रदान करने के लिए स्फटिक की माला से कम से 1008 मन्त्रों का जाप करके इस माला को गले में पहने से चमत्कारिक लाभ मिलता है। · स्फटिक की माला शुक्र ग्रह से सम्बन्धित होती है। यदि आपका शुक्र ग्रह कमजोर है या फिर पीड़ित तो शुक्रवार के दिन स्फटिक की माला से ''ऊॅ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः'' मन्त्र की कम से कम एक माला जाप जरूर करें। ऐसा करने से धीमे-धीमे आपका शुक्र मजबूत होकर अच्छा फल देने लगेगा। · घर में क्लेश मिटाने के लिए स्फटिक की माला से पार्वती जी के इस मन्त्र ''ऊॅ गौरये नमः'' का जाप करें और इसी माला को गले में धारण करें। यह उपाय श्रद्धापूर्वक करने से अवश्य लाभ मिलता है। · विद्या प्राप्ति के लिए सरस्वती जी के इस ''ऊॅ ऐं'' मन्त्र का स्फटिक की माला से जाप करने से विद्या के क्षेत्र में अपार सफलता मिलती है। · जिन लोगों को उच्च रक्त या अधिक क्रोध आता है उन लोगों को स्फटिक की माला पहनने से अत्यन्त लाभ मिलता है। · जिन पति-पत्नियों में आपसी झगड़ा अधिक होता है और प्रेम न के बराबर है। ऐसे में पति-पत्नी दोनों लोगों को एक-एक स्फटिक की माला पहनने से आपसी पे्रम में वृद्धि होती है। माला पहनने की विधि-शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को पहले जल व दूध में स्फटिक की माला को डाल दें, उसके बाद गायत्री मन्त्र की कम से कम एक माला का जाप करें फिर सूर्योदय होने के 3 घण्टे के अन्दर माला को पहन लेना चाहिए राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

माँ बगलामुखी साधना

माँ बगलामुखी साधना यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। सामनेवाले विरोधियों को शांत करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा। मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या किलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है। हम यहाँ पर सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली, कोर्ट में विजय दिलाने वाली, अपने विरोधियों का मुँह बंद करने वाली माँ बगलामुखी की आराधना का सही प्रस्तुतीकरण दे रहे हैं। हमारे पाठक इसका प्रयोग कर लाभ उठाने में समर्थ होंगे, ऐसी हमारी आशा है। यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। इस साधना में विशेष सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है जिसे हम यहाँ पर देना उचित समझते हैं। इस साधना को करने वाला साधक पूर्ण रूप से शुद्ध होकर (तन, मन, वचन) एक निश्चित समय पर पीले वस्त्र पहनकर व पीला आसन बिछाकर, पीले पुष्पों का प्रयोग कर, पीली (हल्दी) की 108 दानों की माला द्वारा मंत्रों का सही उच्चारण करते हुए कम से कम 11 माला का नित्य जाप 21 दिनों तक या कार्यसिद्ध होने तक करे या फिर नित्य 108 बार मंत्र जाप करने से भी आपको अभीष्ट सिद्ध की प्राप्ति होगी। आँखों में तेज बढ़ेगा, आपकी ओर कोई निगाह नहीं मिला पाएगा एवं आपके सभी उचित कार्य सहज होते जाएँगे। खाने में पीला खाना व सोने के बिछौने को भी पीला रखना साधना काल में आवश्यक होता है वहीं नियम-संयम रखकर ब्रह्मचारीय होना भी आवश्यक है। ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा। हमने उपर्युक्त सभी बारीकियाँ बता दी हैं। अब यहाँ पर हम इसकी संपूर्ण विधि बता रहे हैं। इस छत्तीस अक्षर के मंत्र का विनियोग ऋयादिन्यास, करन्यास, हृदयाविन्यास व मंत्र इस प्रकार है-- विनियोग अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि। त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये। ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:। ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:। आवाहन ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा। ध्यान सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम् हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम् हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्। मंत्र इस प्रकार है-- ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा। मंत्र जाप लक्ष्य बनाकर किया जाए तो उसका दशांश होम करना चाहिए। जिसमें चने की दाल, तिल एवं शुद्ध घी का प्रयोग होना चाहिए एवं समिधा में आम की सूखी लकड़ी या पीपल की लकड़ी का भी प्रयोग कर सकते हैं। मंत्र जाप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर के करना चाहिए। साधनाकाल की सावधानियाँ - ब्रह्मचर्य का पालन करें। - पीले वस्त्र धारण करें। - एक समय भोजन करें। - बाल नहीं कटवाए। - मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें। - दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें। - साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्‍ठ फलदायी होता है। - साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए। राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Thursday, July 5, 2018

बेताल साधना

वीर बेताल साधना यह साधना रात्रि कालीन है स्थान एकांत होना चाहिए ! मंगलबार को यह साधना संपन की जा सकती है ! घर के अतिरिक्त इसे किसी प्राचीन एवं एकांत शिव मंदिर मे या तलब के किनारे निर्जन तट पर की जा सकती है ! पहनने के बस्त्र आसन और सामने विछाने के आसन सभी गहरे काले रंग के होने चाहिए ! साधना के बीच मे उठना माना है ! इसके लिए वीर बेताल यन्त्र और वीर बेताल माला का होना जरूरी है ! यन्त्र को साधक अपने सामने बिछे काले बस्त्र पर किसी ताम्र पात्र मे रख कर स्नान कराये और फिर पोछ कर पुनः उसी पात्र मे स्थापित कर दे ! सिन्दूर और चावल से पूजन करे और निम्न ध्यान उच्चारित करें !! फुं फुं फुल्लार शब्दो वसति फणिर्जायते यस्य कण्ठे डिम डिम डिन्नाति डिन्नम डमरू यस्य पाणों प्रकम्पम! तक तक तन्दाती तन्दात धीर्गति धीर्गति व्योमवार्मि सकल भय हरो भैरवो सः न पायात !! इसके बाद माला से 31 माला मंत्र जप करें यह 21 दिन की साधना है ! !! ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं वीर सिद्धिम दर्शय दर्शय फट !! साधना के बाद सामग्री नदी मे या शिव मंदिर मे विसर्जित कर दें साधना का काल और स्थान बदलना नहीं चाहिए. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249
ओपल रत्न पति-पत्नी , प्रेमी-प्रेमिका के क्लेश को दूर करता है । ओपल रत्न पति-पत्नी क्लेश को दूर करता है (Opel gemstone remove spouse problem) ओपल रत्न शुक्र ग्रह के प्रभाव को बढ़ाने लिए धारण किया जाता है। हीरे का दो उपरत्न है 1. जरकन 2. ओपल । हिंदी में ओपल रत्न को दूधिया पत्थर के नाम से जाना जाता है। ओपल को हर दंम्पति और प्रेमी को धारण करना चाहिए । ओपल/दूधिया पत्थर (Opel gemstone) धारण करना चाहिए। ओपल पहनने से पति-पत्नी (Spouse, Husband-Wife ) प्रेमी-प्रेमिका के बीच यदि खराब सम्बन्ध है तो शीघ्र ही दूर करता है और मान-सम्मान में बृद्धि करता है। ओपल पत्थर एक प्रकार के धातु से बना जैल है जो बहुत ही कम तापमान पर चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, आग्नेय चट्टान, मार्ल और बेसाल्ट जैसे चट्टान की दरारों में इकठ्ठा होने से बनता है। इसका प्रयोग मोती का विकल्प के रूप में भी किया जाता है। ओपल रत्न पहनने से लाभ (What benefit to wear Opel gemstone ) ओपल या दूधिया पत्थर पहनने से निम्नलिखित लाभ शीघ्र ही मिलता है और यदि जातक निम्नलिखित लाभ लेने की इच्छा रखता है तो उसे अवश्य ही ओपल रत्न धारण करना चाहिए । दाम्पत्य-जीवन, पति-पत्नी, में यदि अकारण क्लेश या दरार आने लगे तो उस स्थिति में ओपल रत्न धारण करने से उत्पन्न कड़वाहट को शीघ्र ही दूर किया जा सकता है। ओपल पहनने से यौन शक्ति की बृद्धि होती है क्योकि यह शुक्र ग्रह का कारक ग्रह है और शुक्र वीर्य का कारक है। सौंदर्य शक्ति को वृद्धि करता है इसके वृद्धि से व्यक्ति में स्वयं ही आकर्षण शक्ति विकसित होने लगता है। यह रत्न मानसिक स्तर की भी वृद्धि करता है। जो व्यक्ति अपने आप निराश और थका हुआ महसूस करता है वह जातक यदि ओपल उपरत्न पहनता है तो वह अपने आप को ऊर्जावान और रोमांचित महशुस करने लगता है। इसके पहनने से व्यक्ति में आध्यात्मिकता तथा सात्विक चिंतन का विकास होता है। आर्थिक समृद्धि, मान सम्मान, लोकप्रियता के साथ साथ, शारीरिक तंदरुस्ती भी प्रदान करता है। यह मन को शांत,एकाग्र एवं रचनात्मक विचारो को बढ़ाता है तथा बुरे स्वप्न से भी दूर रखता है। केश-मुकदमों अर्थात अदालती मामलों में जीत दिलाने में मदद करता है। यात्रा, पर्यटन और आयात / निर्यात के साथ जुड़े व्यवसाय में लगे लोगों के लिए विशेष रूप से लाभदायक होता है। अधिकतर मामलों में ओपल रत्न महिलाओं तथा पुरुषो के निजी जीवन में प्यार और रोमांस को पुनर्जीवित किया है। शुक्र ग्रह से जुड़े काम यथा अभिनेता, अभिनेत्री, टीवी, फिल्म, थिएटर और में काम कर रहे कलाकारों तथा कंप्यूटर,आईटी आदि से जुड़े काम वाले व्यक्ति को यह उपरत्न पहनना चाहिए। ओपल रत्न मानसिक तनाव, उदासीनता, आलस्य, लाल रक्त कणिकाओं तथा नेत्र रोग,से संबंधित विकारों से राहत दिलाती है. राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Wednesday, July 4, 2018

महाकाल संग मा कामख्या योनि ओर अध्यात्म का क्या रिश्ता है एक छोटी सी बात(पुराणों वे अनुसार) योनी तंत्र के अनुसार (जो माता पारवती और भगवान् शिव कासंवाद है ) ब्रह्मा ,विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का निवासप्रत्येक नारी की योनी में है क्योंकि हर स्त्री देवी भगवती का ही अंशहै । दश महाविद्या अर्थात देवी के दस पूजनीय रूप भी योनी में निहित है. अतः पुरुष को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिएमन्त्र उच्चारण के साथ देवी के दस रूपों की अर्चना योनी पूजाद्वारा करनी चाहिए। योनी तंत्र में भगवान् शिव ने स्पष्ट कहा हैकी श्रीकृष्ण । श्रीराम और स्वयं शिव भी योनी पूजा से ही शक्तिमानहुए हैं । भगवान् राम ,शिव जैसे योगेश्वर भी योनी पूजा कर योनीतत्त्व को सादर मस्तक पर धारण करते थे ऐसा योनी तंत्र में कहागया है क्योंकि बिना योनी की दिव्य उपासना के पुरुष कीआध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है । सभी स्त्रियाँ परमेश्वरी भगवतीका अंश होने के कारण इस सम्मान की अधिकारिणी हैं”। अतःअपना भविष्य उज्जवल चाहने वाले पुरुषों को कभी भी स्त्रियों कातिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए । कृपया अब कोई मत पूछना की योनि ओर अध्यात्म का क्या रिश्ता है। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 8601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

दूसरों के मन के विचारों को जानना-

दूसरों के मन के विचारों को जानना- कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी व्यवसायिक संबंध, रिश्ते नाते, प्रेम संबंध, मे हम असमंजस मैं होते हैं कि सामने वाले के मन में उस विषय में क्या विचार है? कृत्रिम जीवन ने मनुष्य के विचारों पर अनेकों बंधन लाद रखें है। वह जिस व्यवहार को करता है,जो वह बोलता है , वह अधिकतर वास्तविक नहीं होता। यह पाखंड आज हर ओर व्याप्त है। नारियों में अपनी भावना को व्यक्त न करने के प्रबृति होती है । वह घुटती रहेगी ,लेकिन अपने मन के भावों को ब्यक्त नहीं करेगी । कभी कभी वह जो ब्यक्त करती है , वह उसकी आंतरिक भावना के सर्वथा विपरीत होता है। इसका कारण उसकी प्रकृति भी है और उस पर लादे गए सामाजिक एवं नैतिक नियमों के बंधन भी। ऐसी स्थिति में यह जानना अत्यंत कठिन हो जाता है उसका वास्तविक रूप क्या है। ? उदाहरण स्वरूप कोई युवक किसी युवती से प्रेम करता है या कोई युवती किसी युवक से प्रेम करती है; किंतु युवक को यह नहीं मालूम है कि युवती भी उसे प्रेम करती है या नही; क्योंकि वह अपने मन के भाव को व्यक्त नहीं करती। युवती को यह नहीं मालूम कि जिस युवक से वह प्रेम करती है, वह वास्तव में उससे प्रेम करता है या उससे छल कर रहा है। के लिए मैं कुछ प्रयोग दे रहा हूं जो आप करेंगे आपको अवश्य सफलता मिलेगी यह प्रयोग आधी रात के समय करें। इस प्रयोग को जानने के लिए हमें पर्सनल मैसेज करें । विशेष जानकारी और किसी भी प्रकार की आर्थिक मानसिक और शारीरिक समस्याओं के समाधान हेतु और अपने घर बैठे ही आत्म सम्मोहन साधना,सम्मोहन साधना सीखने के लिए आप संपर्क करें । राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 8601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Monday, July 2, 2018

श्रीदेवी कवच

श्रीदेवी कवच- आर्थिक उन्नति और ऐश्वर्य प्राप्ति में सहायक सौभाग्यतारिणी कवच- दुर्भाग्य नाशक और कार्य में सफलता हेतु सारस्वत कवच – स्मरण शक्ति और विद्यार्जन में सहायक विघ्नेश्वर कवच- सभी प्रकार की विघ्न बाधाओं से सुरक्षा हेतु रुद्रमृत्युन्जय कवच – अकाल दुर्घटना और प्रेत बाधा और रोग नाश में सहायक वल्गाशत्रुन्जयी कवच – शत्रुओं से रक्षाकारी और झूठे मुकदमों तथा राज्य बाधा की उलझन से निकलने में सहायक क्लींकारी सिद्ध कवच – नौकरी और व्यवसाय में सफलता प्रदायक राहू रोग नाशक कवच –असाध्य रोगों को साध्य करने हेतु मार्ग दिखाने में सहायक पंचतत्व कवच – असाध्य कार्यों को सरल करने में और त्रिदोषों वात-पित्त-कफ जैसे रोगों का नाश करने में सहायक ऋणमोचक भूमिसुत कवच – कर्जों से राहत प्राप्ति हेतु तंत्र बाधा निवारण कवच – तांत्रिक बाधाओं और अभिचार कर्मों से पूर्ण रक्षाकारक काली सम्मोहन कवच- मोहन क्षमता से युक्त और पूर्ण आत्मविश्वास प्रदायक मातृ शक्ति युक्त नवग्रह कवच – ग्रह माताओं की शक्ति युक्त नवग्रह की अनुकूलता पाने में सहायक अघोर विवाह बाधा निवारक कवच – विवाह में आ रही बाधाओं का निवारण करने में सहायक भविष्य में और भी कई कवचों का निर्माण किया जायेगा,जिसकी सूचना समय समय पर दी ही जायेगी | इनमे से किसी भी कवच या यन्त्र का निर्माण सहज नहीं है और ना ही इनका निर्माण कार्य इनके नाम को पढ़ने जितना सरल ही है | हर कवच की निर्माण व चैतान्यीकरण क्रिया दुसरे से भिन्न भिन्न हैं | कोई साबर पद्धति से सिद्ध होगा तो कोई कापालिक... किसी का निर्माण मुस्लिम तंत्र के द्वारा होगा तो किसी का तीव्र तांत्रिक विधान के द्वारा | कोई वेदोक्त मन्त्रों से अभिषिक्त होगा तो कोई पूर्ण शाक्त तंत्र से | साथ ही इनकी निर्माण सामग्री तथा यज्ञ सामग्री आदि भी भिन्न भिन्न होगी... इनका निर्माण जहाँ आर्थिक रूप से महंगा होगा वही कठोर परिश्रम और ज्ञान का भी प्रयोग इनमे होगा,ताकि जो भी निर्मित हो अद्विय्तीय, तथा पूर्ण प्रभाव कारी हो | किन्तु आप सभी निश्चिन्त रहे आपको कोई व्यय नहीं उठाना है,आप मात्र इन्हें अपने तथा परिवार के लिए प्रयोग कर,अपना कर देखिये और तंत्र को सराहिये | तंत्र की स्थापना ही मेरा जीवन उद्देश्य है | और सदगुरुदेव के श्री चरणों में मेरी अश्रु और कर्मांजलि भी| राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

धन प्राप्ति का मंत्र

धन प्राप्ति का मंत्र मित्रो ! मेरे पास जितनी भी समस्याओं के मेल या मेसेज आते है उनमे 70 % समस्याएं आर्थिक संकट की होती हैं। किसी का उधार वापस नहीं मिल पा रहा है या किसी की आमदनी उसकी ज़रूरतों से कहीं कम है। चूँकि समय बदलता जा रहा है, सभी की जरूरतें बदल रही हैं, हमारी आदतें बदली है और इनकी पूर्ति के लिए पैसों की चाहत बढ़ती जा रही है। कोई भी व्यक्ति कितना भी धन कमाए परंतु वह उसे कम ही लगता है। जरूरतें इतनी बढ़ गई हैं कि पैसों की कमी महसूस होने लगती है। साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है इसलिए अपनी चादर के अनुसार ही हमें पैर फ़ैलाने चाहिए। सामान्यत: हमारे कर्मों के आधार पर ही हमें प्रतिफल स्वरूप धन प्राप्त होता है। परन्तु अथक प्रयासों के बाद भी अगर उतना धन प्राप्त नहीं हो रहा है इसका सीधा सा अर्थ है कि आपके ग्रह आपका साथ नहीं दे रहे है। तब आप ईश्वर भक्ति या शक्ति का प्रयोग कर सकते है। मित्रो ! मंत्रो में अपार शक्ति होती है। अगर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से इनका जप किया जाय तो यह आपके हाथों की लकीरें भी बदल सकते हैं। यहाँ आप सभी के आग्रह पर मैं एक अति सरल मंत्र आप को बता रहा हूँ जो आपके जीवन से 'आर्थिक तंगी' को जड़ से समाप्त कर देगा - ऊँ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा। OM SARASWATI ISHWARI BHAGWATI MATA KRAM KLIM SHRIM SHRIM MAM DHANAM DEHI FAT SWAHA मंत्र सिद्ध करने की विधि - किसी भी शुभ मुहूर्त में पूरे विधि-विधान के साथ इस मंत्र का जप करें। मंत्र का जप 40 दिनों तक प्रतिदिन 108 बार करें। मंत्र जप के समय लक्ष्मी और सरस्वती का चित्र अपने सामने रखें। इस मंत्र के सिद्ध होने के बाद साधक का रुका हुआ पैसा वापस मिल जाएगा और मां सरस्वती की कृपा से बुद्धि और विवेक बढ़ेगा। यदि साधक की किसी व्यक्ति पर उधारी बाकी है और वह उसे प्राप्त नहीं हो रही है तो इस मंत्र के सिद्ध होने के बाद पैसा वापस आना शुरू हो जाएगा तथा जीवन में नये नये आय के स्रोत खुलते चले जायेंगे। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट .किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249' 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

हम भैरवी साधना करना चाहते है; उपाय बताये

हम भैरवी साधना करना चाहते है; उपाय बताये करवाने से होता है; उसी प्रकार तंत्र और भैरवी मार्ग की साधनायें भी बताने का विषय नहीं है। भैरवी-साधना के 9 चरण होते है। इनको एक-एक कर करना होता है। पांच सिद्ध करने के बाद साधक वीर कहलाता है, नौ सिद्ध करने के बाद दिव्य। ‘वीर’ को ही अलौकिक शक्तियाँ और ज्ञान पारपत होता है। इसमें सबसे पहली साधना, जो सामान्य क्रियात्मक प्रयोग होते है, संस्कारों को नष्ट करने की होती है। मनुष्य अपने ही बनाये हुए नियमों से पाशबद्ध होकर उस पशु की तरह विवश हो गया है, जो बंधन में है। इन संस्कारों से मुक्ति सबसे कठिन काम है। इनमें उत्तीर्ण होने के बाद ही भैरवी चक्र की दीक्षा दी जाती है। मुझे स्वयं भी 10 वर्ष पहले इसमें प्रवेश के लिए कठोर परिक्षण से गुजरना पड़ा था। मुझे ज्ञान और बौद्धिक क्षमता के लिए शिव और सरस्वती का वरदान चाहिए था, जो प्राप्त हुआ। तीसरी समस्या भैरवी की होती है। हृदय से उत्साह के साथ कोई 18 से 30 वर्ष की युवती भैरवी बनकर साधना की पार्टनर बनना चाहे; तभी इस मार्ग की साधनाएं सफल होती है। युवती को ज्ञात होना चाहिए कि यह काम आधारित साधनायें है। दूसरे उसमें अपने पार्टनर से शिव और गुरु से सदाशिव के समान भक्ति और श्रद्धा होना चाहिए। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Sunday, July 1, 2018

भैरवी चक्र साधना में साधक-साधिकाओं के लिए निर्देश

भैरवी चक्र साधना में साधक-साधिकाओं के लिए निर्देश 1.किसी भी नारी कि उपेक्षा या अपमान न करें। 2.कन्याओं को देवी का रूप समझकर उनकी पूजा करें। 3.कन्याओं-नारियों की शक्ति पर सहायता एवं रक्षा करें। 4.पेड़ न काटे, न कटवाएं। 5.मदिरापान या मांसाहार केवल साधना हेतु है। इसे व्यसन न बनाये।जो मस्तिष्क और विवेक को नष्ट कर दे; उस मदिरापान से भैरव जी कुपित होकर उसका विनाश कर देते है। 6.भैराविमार्ग की अपनी साधना को गुप्त रखें, किसी को न बताएं। 7.दिन में सामान्य पूजा करें।साधना 9 से 1 बजे तक रात्रि में प्रशस्त हैं। 8.नवमी एवं चतुर्दशी को भैरवी में स्थित देवी की पूजा करें। 9.इस मार्ग के आलोचकों से मत उलझे। इस संसार में भांति-भांति के प्राणी रहते है। सब की प्रवृत्ति एवं एवं सोच अलग-अलग होती है। न तो किसी को इस मार्ग कि ओर प्रेरित करे, न ही विरोध करे। 10.यह प्रयास रखे कि भैरवी सदा प्रसन्न रहे। 11.यदि वह मांसाहारी नहीं है; तो वानस्पतिक गर्म और कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन करें और विजया से निर्मित मद का प्रयोग करें। अन्य जानकारियाँ 11.आसन, वस्त्र लाल होते हैं। एक वस्त्र का प्रयोग करे, जो ढीला हो। कुछ सिले हुए वस्त्र की भी वर्जना करते हैं। 12.पूजा केवल नवमी-चतुर्दशी को होती है। अन्य तिथियों में केवल साधना होती है। 13.साधना के अनेक स्तर है। यहाँ सामान्य स्तर दिया गया है। भैरवी को सामने बैठाकर देवीरुप कल्पना में मंत्र जप करने से मन्त्र सिद्ध होते है। 14.मूलाधार के प्लेट के नीचे से खोपड़ी कि जोड़ तक और सिर के चाँद तक में मुख्य चक्र होते है। साधक-साधिका को इस पर जैतून या चमेली के तेल की मालिश करते रहना चाहिए। 15.इन चक्रों पर नीचे से ऊपर तक होंठ फेरने और चुम्बन लेने से ये शक्तिशाली होते है। 16.एक-दूसरे के आज्ञाचक्र को चूमने से मनासिक शक्ति प्रबल होती है। 17.चषक (पानपात्र) को सम्हाल कर रखें। इनका दिव्य महत्त्व होता है। 18.घट हर बार न्य लें, पूराने को विसर्जित कर दें। घट के प्रसाद में मध के साथ सुगन्धित पदार्थ और गुलाब –केवड़ा जैसे फूलों को रखने का निर्देश है। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 8601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...