Monday, February 15, 2021

बगलामुखी देवी


 






बगलामुखी देवी


दश महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या का नाम से उल्लेखित है । वैदिक शब्द ‘वल्गा’ कहा है, जिसका अर्थ कृत्या सम्बन्ध है, जो बाद में अपभ्रंश होकर बगला नाम से प्रचारित हो गया । बगलामुखी शत्रु-संहारक विशेष है अतः इसके दक्षिणाम्नायी पश्चिमाम्नायी मंत्र अधिक मिलते हैं ।


 नैऋत्य व पश्चिमाम्नायी मंत्र प्रबल संहारक व शत्रु को पीड़ा कारक होते हैं । इसलिये इसका प्रयोग करते समय व्यक्ति घबराते हैं । वास्तव में इसके प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिये ।


 ऐसी बात नहीं है कि यह विद्या शत्रु-संहारक ही है, ध्यान योग में इससे विशेष सहयता मिलती है । यह विद्या प्राण-वायु व मन की चंचलता का स्तंभन कर ऊर्ध्व-गति देती है, इस विद्या के मंत्र के साथ ललितादि विद्याओं के कूट मंत्र मिलाकर भी साधना की जाती है ।


 बगलामुखी मंत्रों के साथ ललिता, काली व लक्ष्मी मंत्रों से पुटित कर व पदभेद करके प्रयोग में लाये जा सकते हैं । इस विद्या के ऊर्ध्व-आम्नाय व उभय आम्नाय मंत्र भी हैं, जिनका ध्यान योग से ही विशेष सम्बन्ध रहता है । त्रिपुर सुन्दरी के कूट मन्त्रों के मिलाने से यह विद्या बगलासुन्दरी हो जाती है, जो शत्रु-नाश भी करती है तथा वैभव भी देती है ।


महर्षि च्यवन ने इसी विद्या के प्रभाव से इन्द्र के वज्र को स्तम्भित कर दिया था । आदिगुरु शंकराचार्य ने अपने गुरु श्रीमद्-गोविन्दपाद की समाधि में विघ्न डालने पर रेवा नदी का स्तम्भन इसी विद्या के प्रभाव से किया था ।


 महामुनि निम्बार्क ने एक परिव्राजक को नीम के वृक्ष पर सूर्य के दर्शन इसी विद्या के प्रभाव से कराए थे । इसी विद्या के कारण ब्रह्मा जी सृष्टि की संरचना में सफल हुए ।

श्री बगला शक्ति कोई तामसिक शक्ति नहीं है, बल्कि आभिचारिक कृत्यों से रक्षा ही इसकी प्रधानता है । इस संसार में जितने भी तरह के दुःख और उत्पात हैं, उनसे रक्षा के लिए इसी शक्ति की उपासना करना श्रेष्ठ होता है । 


शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन संहिता के पाँचवें अध्याय की २३, २४ एवं २५वीं कण्डिकाओं में अभिचारकर्म की निवृत्ति में श्रीबगलामुखी को ही सर्वोत्तम बताया है । शत्रु विनाश के लिए जो कृत्या विशेष को भूमि में गाड़ देते हैं, उन्हें नष्ट करने वाली महा-शक्ति श्रीबगलामुखी ही है ।

त्रयीसिद्ध विद्याओं में आपका पहला स्थान है ।


 आवश्यकता में शुचि-अशुचि अवस्था में भी इसके प्रयोग का सहारा लेना पड़े तो शुद्धमन से स्मरण करने पर भगवती सहायता करती है । लक्ष्मी-प्राप्ति व शत्रुनाश उभय कामना मंत्रों का प्रयोग भी सफलता से किया जा सकता है ।


देवी को वीर-रात्रि भी कहा जाता है, क्योंकि देवी स्वम् ब्रह्मास्त्र-रूपिणी हैं, इनके शिव को एकवक्त्र-महारुद्र तथा मृत्युञ्जय-महादेव कहा जाता है, इसीलिए देवी सिद्ध-विद्या कहा जाता है । 


विष्णु भगवान् श्री कूर्म हैं तथा ये मंगल ग्रह से सम्बन्धित मानी गयी हैं ।


शत्रु व राजकीय विवाद, मुकदमेबाजी में विद्या शीघ्र-सिद्धि-प्रदा है । शत्रु के द्वारा कृत्या अभिचार किया गया हो, प्रेतादिक उपद्रव हो, तो उक्त विद्या का प्रयोग करना चाहिये । यदि शत्रु का प्रयोग या प्रेतोपद्रव भारी हो, तो मंत्र क्रम में निम्न विघ्न बन सकते हैं –


१॰ जप नियम पूर्वक नहीं हो सकेंगे ।


२॰ मंत्र जप में समय अधिक लगेगा, जिह्वा भारी होने लगेगी ।


३॰ मंत्र में जहाँ “जिह्वां कीलय” शब्द आता है, उस समय स्वयं की जिह्वा पर संबोधन भाव आने लगेगा, उससे स्वयं पर ही मंत्र का कुप्रभाव पड़ेगा ।


४॰ ‘बुद्धिं विनाशय’ पर परिभाषा का अर्थ मन में स्वयं पर आने लगेगा ।


सावधानियाँ –


१॰ ऐसे समय में तारा मंत्र पुटित बगलामुखी मंत्र प्रयोग में लेवें, अथवा कालरात्रि देवी का मंत्र व काली अथवा प्रत्यंगिरा मंत्र पुटित करें । तथा कवच मंत्रों का स्मरण करें । सरस्वती विद्या का स्मरण करें अथवा गायत्री मंत्र साथ में करें ।


२॰ बगलामुखी मंत्र में


 “ॐ ह्ल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाश ह्ल्रीं ॐ स्वाहा ।” 


इस मंत्र में ‘सर्वदुष्टानां’ शब्द से आशय शत्रु को मानते हुए ध्यान-पूर्वक आगे का मंत्र पढ़ें ।


३॰ यही संपूर्ण मंत्र जप समय ‘सर्वदुष्टानां’ की जगह काम, क्रोध, लोभादि शत्रु एवं विघ्नों का ध्यान करें तथा ‘वाचं मुखं …….. जिह्वां कीलय’ के समय देवी के बाँयें हाथ में शत्रु की जिह्वा है तथा ‘बुद्धिं विनाशय’ के समय देवी शत्रु को पाशबद्ध कर मुद्गर से उसके मस्तिष्क पर प्रहार कर रही है, ऐसी भावना करें ।


४॰ बगलामुखी के अन्य उग्र-प्रयोग वडवामुखी, उल्कामुखी, ज्वालामुखी, भानुमुखी, वृहद्-भानुमुखी, जातवेदमुखी इत्यादि तंत्र ग्रथों में वर्णित है । समय व परिस्थिति के अनुसार प्रयोग करना चाहिये ।


५॰ बगला प्रयोग के साथ भैरव, पक्षिराज, धूमावती विद्या का ज्ञान व प्रयोग करना चाहिये ।


६॰ बगलामुखी उपासना पीले वस्त्र पहनकर, पीले आसन पर बैठकर करें । गंधार्चन में केसर व हल्दी का प्रयोग करें, स्वयं के पीला तिलक लगायें । दीप-वर्तिका पीली बनायें । पीत-पुष्प चढ़ायें, पीला नैवेद्य चढ़ावें । हल्दी से बनी हुई माला से जप करें । अभाव में रुद्राक्ष माला से जप करें या सफेद चन्दन की माला को पीली कर लेवें । तुलसी की माला पर जप नहीं करें ।


।। बगला उत्पत्ति ।।


एक बार समुद्र में राक्षस ने बहुत बड़ा प्रलय मचाया, विष्णु उसका संहार नहीं कर सके तो उन्होंने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप महा-त्रिपुर-सुन्दरी की आराधना की तो श्रीविद्या ने ही ‘बगला’ रुप में प्रकट होकर राक्षस का वध किया । मंगलवार युक्त चतुर्दशी, मकर-कुल नक्षत्रों से युक्त वीर-रात्रि कही जाती है । इसी अर्द्ध-रात्रि में श्री बगला का आविर्भाव हुआ था ।


 मकर-कुल नक्षत्र – भरणी, रोहिणी, पुष्य, मघा, उत्तरा-फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, श्रवण तथा उत्तर-भाद्रपद नक्षत्र है ।


।। बगला उपासनायां उपयोगी कुल्कुलादि साधना ।।


बगला उपासना व दश महाविद्याओं में मंत्र जाग्रति हेतु शापोद्धार मंत्र, सेतु, महासेतु, कुल्कुलादि मंत्र का जप करना जरुरी है । 


अतः उनकी संक्षिप्त जानकारी व अन्य विषय साधकों के लिये आवश्यक है ।


नाम – बगलामुखी, पीताम्बरा, ब्रह्मास्त्र-विद्या ।


आम्नाय – मुख आम्नाय दक्षिणाम्नाय हैं इसके उत्तर, ऊर्ध्व व उभयाम्नाय मंत्र भी हैं ।


आचार – इस विद्या का वामाचार क्रम मुख्य है, दक्षिणाचार भी है ।


कुल – यह श्रीकुल की अंग-विद्या है ।


शिव – इस विद्या के त्र्यंबक शिव हैं ।


भैरव – आनन्द भैरव हैं । कई विद्वान आनन्द भैरव को प्रमुख शिव व त्र्यंबक को भैरव बताते हैं ।


गणेश – इस विद्या के हरिद्रा-गणपति मुख्य गणेश हैं । स्वर्णाकर्षण भैरव का प्रयोग भी उपयुक्त है ।


यक्षिणी – विडालिका यक्षिणी का मेरु-तंत्र में विधान है ।


 प्रयोग हेतु अंग-विद्यायें -मृत्युञ्जय, बटुक, आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, पार्जन्यास्त्र, संमोहनास्त्र, पाशुपतास्त्र, कुल्लुका, तारा स्वप्नेश्वरी, वाराही मंत्र की उपासना करनी चाहिये ।


कुल्लुका – “ॐ क्ष्रौं” अथवा “ॐ हूँ क्षौं” शिर में १० बार जप करना ।


सेतु – कण्ठ में १० बार “ह्रीं” मंत्र का जप करें ।


महासेतु – “स्त्रीं” इसका हृदय में १० बार जप करें ।


निर्वाण – हूं, ह्रीं श्रीं से संपुटित करे एवं मंत्र जप करें ।


 दीपन पुरश्चरण आदि में “ईं” से सम्पुटित मंत्र का जप करें ।


जीवन – मूल मंत्र के अंत में ” ह्रीं ओं स्वाहा” १० बार जपे । नित्य आवश्यक नहीं है ।


मुख-शोधन – (दातून) करने के बाद “हं ह्रीं ऐं”


 जलसंकेत से जिह्वा पर अनामिका से लिखें एवं १० बार मंत्र जप करें ।


शापोद्धार – “ॐ ह्लीं बगले रुद्रशायं विमोचय विमोचय ॐ ह्लीं स्वाहा” १० बार जपे ।


उत्कीलन – “ॐ ह्लीं स्वाहा” मंत्र के आदि में १० बार जपे ………


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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Wednesday, February 10, 2021

भुवनेश्वरी मंत्र साधना


 



भुवनेश्वरी मंत्र साधना


भुवनेश्वरी महाविद्या  । भुवनेश्वरी देवी, दस महाविद्याओं में से एक है, जो चौथे स्थान में विराजित है,भुवनेश्वरी देवी के अवतार आदि शक्ति का रूप है, जो शक्ति का आधार है । इन्हें ओम शक्ति भी कहा जाता है,भुवनेश्वरी देवी को प्रकति की माँ माना जाता है, जो समस्त प्रकति को संभालती है । 


ये भगवान शिव की अभिव्यक्ति है, इन्हें सभी देवियों से कोमल एवं उज्जवल माना जाता है । भुवनेश्वरी देवी ने चंद्रमा को अपने माथे में सजाया हुआ है, और इसके श्वेत प्रकाश से वे समस्त धरती को प्रकाशमय करती है । इन्हें सभी देविओं में उत्तम माना जाता है, जिन्होंने समस्त धरती की रचना की और दानव शक्तियों को मार गिराया । जो इस देवी शक्ति की पूजा करता है, उसे शक्ति, बुद्धि और धन की प्राप्ति होती है ।


भुवनेश्वरी साधना:-


1. सब पहले आपके सामने देवी का कोई भी चित्र या यंत्र या मूर्ति हो। इनमेसे कुछ भी नही तो आपके रत्न या रुद्राक्ष पर पूजन करे ।


2. घी का दीपक या तेल का दीपक या दोनों दीपक जलाये। धुप अगरबत्ती जलाये। बैठने के लिए आसन हो। जाप के लिए रुद्राक्ष माला या काली हकीक माला हो ।


3. एक आचमनी पात्र , जल पात्र रखे। हल्दी,कुंकुम,

चन्दन,अष्टगंध और अक्षत पुष्प ,नैवेद्य के लिए

मिठाई या दूध या कोई भी वस्तु ,फल भी एकत्रित करे। अगर यह सामग्री नहीं है तो मानसिक पूजन करे ।


4. सबसे पहले गुरु का स्मरण करे। अगर आपके गुरु नहीं है तो भी गुरु स्मरण करे। गणेश का स्मरण करे-


ॐ गुं गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री गणेशाय नमः

ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नम:

क्रीं कालिकायै नमः

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम :


फिर आचमनी या चमच से चार बार बाए हाथ से दाहिने हाथ पर पानी लेकर पिए -

(अगर जल नहीं है तो मानसिक ग्रहण करे )


ह्रीं आत्मतत्वाय स्वाहा

ह्रीं विद्या तत्वाय स्वाहा

ह्रीं शिव तत्वाय स्वाहा

ह्रीं सर्व तत्वाय स्वाहा


उसके बाद पूजन के स्थान पर पुष्प अक्षत अर्पण करे -(अगर पूजन सामग्री नहीं है तो मानसिक करे )


ॐ श्री गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नमः


उसके बाद अपने आसन का स्पर्श करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे-


ॐ पृथ्वीव्यै नमः


अब तीन बार सर से पाँव तक हाथ फेरे -


।।बॐ श्री दुर्गा भुवनेश्वरी सहित महाकाल्यै नमः आत्मानं रक्ष रक्ष ।।


अब जल के पात्र को गंध लगाकर अक्षत पुष्प अर्पण करे-

।। ॐ कलश मण्डलाय नमः ।।


अब दाहिने हाथ में जल पुष्प अक्षत लेकर संकल्प करे -


"मन में यह बोले की मैं (अपना नाम और गोत्र ) भुवनेश्वरी जयंती (or भुवनेश्वरी पुंजन) पर् भगवती भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त होने हेतु तथा अपनी समस्या निवारण हेतु या अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु यथा शक्ति साधना कर रहा हूँ " और जल को जमीन पर छोड़े ।


अब गणेशजी का ध्यान करे -


वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ

निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा

ॐ श्री गणेशाय नमः का 11 या 21 बार जाप करे ।


फिर भैरव जी का स्मरण करे -


।।ॐ भं भैरवाय नमः।।


भगवती भुवनेश्वरी पूजन-


अब आप भगवती भुवनेश्वरी जी का ध्यान का जो मंत्र है उसे पढे और उनका आवाहन करे-


ध्यान मंत्र :-


उदत दिन द्युतिम इंदुं किरिटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम ।

स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशाभितिकरां प्रभजे भुवनेशीम ।।

ह्रीम भुवनेश्वर्यै नम: माँ भगवती राजराजेश्वरी भुवनेश्वरी आवाहयामि मम पूजा स्थाने मम हृदये स्थापयामि पूजयामि नम: ।।


अब आवाहनादि मुद्राये आती हो तो प्रदर्शित करे-


ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: आवाहिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: संस्थापिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निधापिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निरुद्धा भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सम्मुखी भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: अवगुंठिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: वरदो भव सुप्रसन्नो भव ।


फिर भुवनेश्वरी देवी का पंचोपचार पूजन करे-


ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: गंधं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: पुष्पं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: धूपं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: दीपं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: नैवेद्यं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: तांबूलं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सर्वोपचारार्थे पुन: गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।


इसके बाद अगर आवरण पूजन करना हो तो करे या फिर नीचे दिये हुये भुवनेश्वरी खडगमाला स्तोत्र का पाठ करे और भगवती भुवनेश्वरी के साथ चलनेवाली समस्त आवरण देवताओं के पुजन हेतु पुष्पाक्षत अर्पण करे,खडगमाला के पाठ से आवरण देवताओं का पूजन अपने आप होता है  ।


श्री भुवनेश्वरी खडगमाला स्तोत्र :-


ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं भुवनेश्वरी - हृदयदेवि- शिरोदेवि- शिखादेवि- कवचदेवि -नेत्रदेवि - अस्त्रदेवि - कराले विकराले उमे सरस्वती श्री दुर्गे उषे लक्ष्मि श्रूति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कांति आर्ये श्री भुवनेश्वरी - दिव्यौघ गुरुरुपिणी - सिद्धौघ गुरुरुपिणी - मानवौघ गुरुरुपिणी - श्री गुरु रुपिणी - परम गुरु रुपिणी - परात्पर गुरु रुपिणी - पारमेष्ठी गुरु रुपिणी - अमृतभैरव सहित श्री भुवनेश्वरी - हृदय शक्ति - शिर शक्ति - शिखा शक्ति - कवच शक्ति - नेत्र शक्ति - अस्त्र शक्ति - हृल्लेखे गगने रक्ते करालिके महोच्छुष्मे - सर्वानंदमय चक्रस्वामिनी !

गायत्रीसहित ब्रम्हमयि - सावित्रीसहित विष्णुमयि - सरस्वतीसहित रुद्रमयि - लक्ष्मीसहित कुबेरमयि - रतिसहित काममयि - पुष्टिसहित विघ्नराजमयि - शंखनिधि सहित वसुधामयि - पद्मनिधि सहित वसुमतिमयि - गायत्र्यादिसह श्री भुवनेश्वरी ! ह्रां हृदयदेवि - ह्रीं शिरोदेवि - ह्रैं कवचदेवि - ह्रौं नेत्रदेवि - ह्र: अस्त्रदेवि - सर्वसिद्धप्रदचक्रस्वामिनि !

अनंगकुसुमे - अनंगकुसुमातुरे - अनंगमदने - अनंगमदनातुरे - भुवनपाले - गगनवेगे - शशिरेखे - अनंगवेगे - सर्वरोगहर चक्रस्वामिनि !

कराले विकराले उमे सरस्वति श्री दुर्गे उषे लक्ष्मी श्रूति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कांति आर्ये सर्वसंक्षोभणचक्रस्वामिनि !

ब्राम्हि माहेश्वरी कौमारि वैष्णवी वाराही इंद्राणी चामुंडे महालक्ष्म्ये - अनंगरुपे - अनंगकुसुमे - अनंगमदनातुरे - भुवनवेगे - भुवनपालिके - सर्वशिशिरे - अनंगमदने - अनंगमेखले - सर्वाशापरिपूरक चक्रस्वामिनि !

इंद्रमयि - अग्निमयि - यममयि- नैर्ऋतमयि - वरुणमयि - वायुमयि - सोममयि - ईशानमयि - ब्रम्हमयि- अनंतमयि - वज्रमयि - शक्तिमयि - दंडमयि - खडगमयि- पाशमयि - अंकुशमयि - गदामयि- त्रिशूलमयि - पद्ममयि - चक्रमयि - वरमयि - अंकुशमयि - पाशमयि - अभयमयि - बटुकमयि- योगिनिमयि - क्षेत्रपालमयि - गणपतिमयि - अष्टवसुमयि - द्वादशआदित्य मयि - एकादशरुद्रमयि - सर्वभूतमयि - अमृतेश्वरसहित भुवनेश्वरी - त्रैलोक्यमोहन चक्रस्वामिनि - नमस्ते नमस्ते नमस्ते स्वाहा श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ ।।


मंत्र :-

।। ॐ ह्रीम नम: ।।


फिर मंत्र जाप भगवती को समर्पित करे और एक आचमनी जल मे कुंकुम या अष्टगंध मिलाकर भगवती को अर्घ्य दे "ह्रीं भुवनेश्वर्यै विद्महे रत्नेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात् "


फिर आप अपनी बाधा समस्या का स्मरण करे या कोइ समस्या नही है तो फिर कोइ समस्या बाधा घर मे ना आये ऐसा स्मरण कर एक निंबु काटे,फिर उस निंबु को पानी बहा दे या मिट्टी मे गाडे या ऐसी कोइ सुविधा ना हो तो कचरे मे डाले । अगर आप निंबु ना काटे तो भी चलेगा इसकी जगह नारियल भी फोड सकते है ।


यह बहुत संक्षिप्त पूजन है , इस साधना से घर मे कोइ नकारात्मक बाधा नही होगी , रोग नही आयेंगे ,शत्रू बाधा या काम मे कोइ रुकावट आ रही है तो वो दूर होगी ,भगवती दुर्गा महाकाली एवं भुवनेश्वरी की कृपा से जीवन मे कोइ किसी प्रकार की नकारात्मक बाधा नही होगी । पुजन के बाद माँ से मन ही मन क्षमा प्रार्थना भी अवश्य करे ।


"जय जय माँ भुवनेश्वरी"


राज गुरु जी


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गुप्त नवरात्रि 12 फरवरी से प्रारंभ हो रहे है,


 



*गुप्त नवरात्रि 12 फरवरी से प्रारंभ हो रहे है, 



जाने घट स्थापना का शुभ मुहूर्त*


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🇮🇳हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्रि का विशेष महत्व होता है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि तंत्र-मंत्र को सिद्ध करने वाली मानी गई है। कहा जाता है कि गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली पूजा से कई कष्टों से मुक्ति मिलती है , गुप्त नवरात्रि में तांत्रिक महाविद्याओं को भी सिद्ध करने के लिए मां दुर्गा जी की उपासना की जाती है।


*घट स्थापना शुभ मुहूर्त:-* नवरात्रि प्रारंभ 12 फरवरी 2021 दिन शुक्रवार से 21 फरवरी 2021 दिन रविवार तक रहेगे।


*कलश स्थापना मुहूर्त:-* सुबह 08 बजकर 34 मिनट से 09 बजकर 59 मिनट तक।


*अभिजीत मुहूर्त:-* दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 58 मिनट तक। 


*मां दुर्गा जी के इन स्वरूपों की होती है, पूजा:-*

 मां कालिके, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता चित्रमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूम्रवती, माता बगलामुखी, मातंगी, कमला देवी यह दस महाविद्याओं की पूजन होती है।


*मां दुर्गा की गुप्त नवरात्रि में ऐसे करें पूजा:-* कहते हैं कि गुप्त नवरात्रि के दौरान तांत्रिक और अघोरी मां दुर्गा जी की आधी रात में पूजा करते हैं। मां दुर्गा जी की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर लाल रंग का सिंदूर और सुनहरे गोटे वाली चुनरी अर्पित की जाती है।

इसके बाद मां के चरणों में पूजा सामग्री को अर्पित किया जाता है। मां दुर्गा को लाल पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है साधक अनेक प्रकार से माँ को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह की साधनाये करते है।


🙏धन्यवाद।🙏

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चेतावनी -


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राजगुरु जी


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Tuesday, February 9, 2021

महावशीकरण श्यामा मातंगी यन्त्र /कवच और महावशीकरण मन्त्र


 



महावशीकरण श्यामा मातंगी यन्त्र /कवच और महावशीकरण मन्त्र


मातंगी महाविद्या ,दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या ,,वैदिक सरस्वती का तांत्रिक रूप हैं और श्री कुल के अंतर्गत पूजित हैं |यह सरस्वती ही हैं और वाणी ,संगीत ,ज्ञान ,विज्ञान ,सम्मोहन ,वशीकरण ,मोहन की अधिष्ठात्री हैं |त्रिपुरा ,काली और मातंगी का स्वरुप लगभग एक सा है |यद्यपि अन्य महाविद्याओं से भी वशीकरण ,मोहन ,आकर्षण के कर्म होते हैं और संभव हैं किन्तु इस क्षेत्र का आधिपत्य मातंगी [सरस्वती] को प्राप्त हैं |यह जितनी समग्रता ,पूर्णता ,निश्चितता से इस कार्य को कर सकती हैं कोई अन्य नहीं क्योकि सभी अन्य की अवधारणा अन्य विशिष्ट गुणों के साथ हुई है |


उन्हें वशीकरण ,मोहन के कर्म हेतु अपने मूल गुण के साथ अलग कार्य करना होगा जबकि मातंगी वशीकरण ,मोहन की देवी ही हैं अतः यह आसानी से यह कार्य कर देती हैं |मातंगी के तीन विशिष्ट स्वरुप हैं श्यामा मातंगी ,राज मातंगी और वश्य मातंगी |श्यामा मातंगी स्वरुप मातंगी का उग्र स्वरुप है और वशीकरण ,मोहन, आकर्षण को तीब्रता से करता है |इनका मात्र अति विशिष्ट है ,जिसमे माया [देवी] ,सरस्वती [मातंगी ],लक्ष्मी ,त्रिपुरसुन्दरी[श्री विद्या]और काली के बीज मन्त्रों का विशिष्ट संयोग है जिससे मातंगी की मुख्यता के साथ इन सभी शक्तियों की शक्ति भी सम्मिलित होती है जिससे यह विद्या सब कुछ देने के साथ वशीकरण ,आकर्षण में निश्चित सफलता देती है |


मातंगी ,या श्यामा मातंगी का मंत्र ,मातंगी साधक ही प्रदान कर सकता है ,अन्य किसी महाविद्या का साधक इनके मंत्र को प्रदान करने का अधिकारी नहीं है |स्वयं मंत्र लेकर जपने से महाविद्याओं के मंत्र सिद्ध नहीं होते ,अतः जब भी मंत्र लिया जाए मातंगी साधक से ही लिया जाए ,यद्यापि मातंगी साधक खोजे नहीं मिलते जबकि अन्य महाविद्या के साधक मिल जाते हैं |इनके मंत्र और यंत्र का उपयोग अधिकतर प्रवचनकर्ता ,धर्म गुरु ,tantra गुरु ,बौद्धिक लोग करते हैं जिन्हें समाज-भीड़-लोगों के समूह का नेतृत्व अथवा सामन करना होता है ,ज्ञान विज्ञानं की जानकारी चाहिए होती है |मातंगि के शक्ति से इनमे सम्मोहन -वशीकरण की शक्ति होती है |


मातंगी का यन्त्र इसमें अतिरिक्त ऊर्जा का कार्य करता है जिसे मातंगी साधक निर्मित करता है भोजपत्र पर |मातंगी का यन्त्र बाजार में धातु का मिल जाता है किन्तु श्यामा मातंगी का मिलना मुश्किल होता है |धातु के यन्त्र की प्रभावित भी संदिग्ध होती है जबकि मातंगी साधक द्वारा निर्मित श्यामा मातंगी के यन्त्र में साधक की शक्ति ,मुहूर्त की शक्ति ,भोजपत्र की पवित्रता ,अष्टगंध की विशिष्टता ,मंत्र की शक्ति ,प्राण प्रतिष्ठा की शक्ति सम्मिलित होती है जिससे यह यन्त्र निश्चित प्रभावकारी हो जाता है |धारण करने पर इससे उत्पन्न विशिष्ट तरंगे व्यक्ति और वातावरण को प्रभावित करती हैं जिससे खुद व्यक्ति में भी परिवर्तन आता है और आसपास के लोग भी प्रभावित होते हैं |इसके वाशिकारक प्रभाव में संपर्क में आने वाले लोग बांध जाते हैं |यद्यपि यन्त्र किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए भी बनाया जा सकता है किन्तु व्यक्ति केन्द्रित न रखा जाए तो यह सब पर प्रभाव डालता है |


श्यामा मातंगी का मंत्र और यन्त्र प्रकृति की सभी शक्तियों में सर्वाधिक शक्तिशाली वाशिकारक और मोहक प्रभाव रखता है क्योकि यह इसी की शक्ति हैं ही |यद्यपि इनका यन्त्र काफी महंगा पड़ जाता है ,जबकि अन्य वशीकरण के यन्त्र बाजार में बहुत सस्ते मिल जाते हैं ,यह अलग है की अन्य भले असफल हो जाए इनका यन्त्र प्रभाव जरुर देता है |उदाहरण के लिए ,श्यामा मातंगी का मंत्र केवल इनका साधक ही जप सकता है और वाही अभिमंत्रित कर सकता है यन्त्र को जबकि अगर वह दिन में 5 घंटे लगातार जप करे तो भी तीन हजार मंत्र से अधिक जप नहीं कर सकता ,कारण मंत्र बड़ा और क्लिष्ट होता है |ऐसे में यन्त्र को २१ हजार अभिमंत्रित करने के लिए कम से कम 7 दिन चाहिए ,पूजा प्राण प्रतिष्ठा और बाद में हवन के लिए दो दिन अतिरिक्त चाहिए अर्थात ९ दिन लगेंगे एक यन्त्र बनाने में अर्थात 2000 /- रु ,,500 अन्य पूजा पाठ और हवन आदि के खर्च अर्थात कुल 2500 रु. |इस प्रकार केवल २१ हजार मंत्र से अभिमंत्रित यन्त्र भी 2500 रु. का पड़ जाता है |कम से कम अभिमंत्रित यन्त्र भी 7000 से कम में नहीं आएगा यदि वास्तविक प्रभाव लानी है ,क्योकि बहुत कम अभिमन्त्रण अपेक्षित परिणाम नहीं देगा |इस तरह सबके लिए तो नहीं किन्तु जरूरतमंद के लिए यह यन्त्र लाभदायक होता है |


श्यामा मातंगी यन्त्र का प्रभाव और उपयोग


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१. यन्त्र धारण करने से वशीकरण की शक्ति बढती है |व्यक्तित्व का प्रभाव बढ़ता है |

२. अधिकारी वर्ग को अपने कर्मचारियों पर नियंत्रण और उन्हें वशीभूत रखने में आसानी होती है |

३.कर्मचारी को अपने अधिकारियों को अनुकूल रखने में मदद मिलती है |

४.पति को पत्नी की और पत्नी को पति की अनुकूलता अपने आप प्राप्त होती है और धारण करने वाले का पति या पत्नी वशीभूत होता है |

५.सेल्स ,मार्केटिंग ,पब्लिक रिलेसन का कार्य करने वालों को लोगों का अपेक्षित सहयोग मिलता है |

६.व्यवसायी को ग्राहकों की अनुकूलता मिलती है और अपरोक्त उन्नति में सहायत मिलती है |

७.रुष्ट परिवार वालों को इससे अनुकूल करने में मदद मिलती है |

८.वाद-विवाद ,मुकदमे ,बहस ,समूह वार्तालाप ,आपसी बातचीत में सामने वाले की अनुकूलता प्राप्त होती है |

९. चूंकि यह महाविद्या यन्त्र है और काली की शक्ति से संयुक्त है अतः नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है |

१०. किसी पर पहले से कोई वशीकरण की क्रिया है तो यन्त्र भरे हुए चांदी कवच को सुबह शाम कुछ दिन एक गिलास जल में डुबोकर वह जल व्यक्ति को पिलाने से वशीकरण का प्रभाव उतरता है |

११.किसी भी तरह के इंटरव्यू में परीक्षक पर सकारात्मक प्रभाव देता है |

१२. व्यक्ति विशेष के लिए बनाया गया यन्त्र धारण और मंत्र जप निश्चित रूप से सम्बंधित व्यक्ति को वशीभूत करता है |

१३.दाम्पत्य कलह ,पारिवारिक कलह ,मनमुटाव ,विरोध में लोगों को प्रभावित करता है और व्यक्ति के अनुकूल करता है |

१४.सामाजिक संपर्क रखने वालों को लोगों की अनुकूलता प्राप्त होती है |

१५.ज्ञान-विज्ञानं-अन्वेषण-परीक्षा-प्रतियोगिता ,प्रवचन ,भाषण से समबन्धित लोगों को सफल होने में मदद करता है |


इस प्रकार ऐसा कोई क्षेत्र लगभग नहीं जहाँ इस यन्त्र से लाभ न मिलता हो क्योकि लोगों की अनुकूलता की जरुरत सबको होती है और लोग या व्यक्ति प्रभावित हो अनुकूल हों ,वशीभूत हों तो व्यक्ति को लाभ अवश्य होता है |अतः श्यामा मातंगी साधक द्वारा बनाया गया श्यामा मातंगी यन्त्र ,अन्य किसी यन्त्र से अधिक लाभकारी होता है |यदि कोई श्यामा मातंगी साधक श्यामा यन्त्र को रविपुष्य योग में


कवच दक्षिणा 2500


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》


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Saturday, February 6, 2021

सुलेमानी हकीक रत्न के लाभ




 




सुलेमानी हकीक रत्न के लाभ 


1. काला जादू ख़त्म करता है और बुरी नज़र से बचाव

करता है |


2 .नौकरी और व्यवसाय में आ रही अड़चनो को दूर करता

है ।


3 . सुलेमानी हकीक को धारण करने के बाद लोग आपकी

तरफ आकर्षित होने लगते है और आपको महत्त्व देने लगते

है ।


4 . सुलेमानी हकीक एक ऐसा चमत्कारी पत्थर है जो

आपको लोगो की बुरी नजर से बचा कर रखता है ।


5. आपका व्यवसाय काला जादू या टोना - टोटका की

वजह से मंदा चल रहा है तो सुलेमानी हकीक पत्थर

उसका काट कर देता है और व्यवसाय में बढ़ोतरी होती

है 


6 . अगर घर में बरकत नही होती है तो बरकत होने लगती है |


7 . अगर आपके शत्रु ज़्यादा है या आपका शत्रु आपको

परेशान करता है या आप पर जादू टोना करवाता है तो

आपका उसके किए हुए जादू टोना से बचाव करता है

और आपके शत्रु को परास्त करता है | आपका शत्रु आपके

सामने शक्तिहीन हो जाता है |


8. अगर आपकी सेहत सही नही रहती है आप बार बार

बीमार होते है तो आपको सुलेमानी हकीक धारण

करना चाहिए उस से आपकी सेहत में काफ़ी अच्छा

सुधार होगा


9. सुलेमानी हकीक राहु, केतु और शनि द्वारा आ रही

बाधाओ को दूर करता है और व्यक्ति को सफलता

मिलने लगती है |


10. आपको सुलेमानी हकीक शनिवार को धारण करना है


व मध्यमा उंगली (middle finger) में धारण करना है व

चाँदी की अंगूठी में धारण करना है व सीधे हाथ में

करना है |


अगर आप उंगली में धारण नही करना चाहते है तो चाँदी

के लॉकेट में भी गले में धारण कर सकते है शनिवार के

दिन |


सुलेमानी हकीक को कोई भी व्यक्ति

धारण कर सकता है

आपको सुलेमानी हकीक कोरियर सर्विस या स्पीड पोस्ट से भेजा जायगा और ट्रॅकिंग नंबर दिया जायगा |

सवाल और उनके जवाब :-

सवाल: सुलेमानी हकीक को कैसे धारण करें ?

जवाब: आपको सुलेमानी हकीक  शनिवार को चाँदी की अंगूठी में बनवा के सीधे हाथ की मध्यमा उंगली (middle finger) में धारण करना है |


 

सवाल: क्या   सुलेमानी हकीक को कोई भी राशि या लग्न वाला व्यक्ति धारण कर सकता है ?


जवाब : हाँ ।


विशेष जानकारी या कुण्डली/हस्तरेखा विश्लेषण या हस्तलिखित कुण्डली संपूर्ण विवरण सहित बनवाने हेतु या किसी भी प्रकार की समस्याओं के ज्योतिषीय एवं तांत्रिकीय सहायता एवं परामर्श हेतु हमारे प्रोफाइल नम्बर पर संपर्क कर सकते हैं।


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Monday, February 1, 2021

धूमावती प्रचंड साधना कर के या करवाकर सम्मोहनी कवच धारण करके उक्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं , 9958417249



 



धूमावती प्रचंड साधना कर के या  करवाकर सम्मोहनी कवच धारण करके उक्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं , 9958417249


यह देवी साधक के सभी शत्रुओ को समाप्त कर देती हैं . इस देवी का सिद्ध साधक निर्भय हो जाता हैं .


प्रचंड भगवती धूमावती तंत्र की सातवी महाविद्या के रूप जगत में प्रसिद्धि हैं .  माँ भगवती धूमावती का साधना प्रयोग इस प्रकार हैं .


धूमावती मुखं पातु धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी |

ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी ||

कल्याणी ह्रदयपातु हसरीं नाभि देशके |

सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना ||

सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः |

सौभाग्यमयतं प्राप्य जाते देवितुरं ययौ ||


॥ धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा॥


मंत्र जाप संख्या : - सवा लाख

दिशा :- दक्षिण

स्थान :- शमशान , शिवालय , सिद्धि पीठ , या निर्जन स्थान ,

समय :- रात्रि

दिन ;- शनिवार / या धूमावती जयंती

आसन :- सफ़ेद

वस्त्र :- काले रंग की धोती , कला वस्त्र , काला कम्बल ,

हवन :- ( दशांश ) हवन


विधि :-


मोहनी एकादशी या किसी भी शुक्रवार को स्नान आदि से निवित्र होकर कांशे की थाली में समस्त तांत्रिक पूजन सामग्री स्थापित करके पंचोपचार पूजन करना चाहिए व्यक्ति विशेष को वश में करने का अथवा सिद्धि का संकल्प लेते हुए , विधि - विधान पूर्वक गुरु - गणेश वंदना करके , मूल मंत्र का जाप करे , . जाप की पूर्णता पर दशांश हवन करके ब्राह्मण , एवं पांच कुवारी कन्यायो को भोजन सहित उपयुक्त दान - दक्षिणा देकर साधना को पूरा करे .


इस महत्व पूर्ण सम्मोहनी साधना से साधक का व्यक्तित्व अत्यंत सम्मोहक और आकर्षक हो जाता हैं .उसके संपर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता . यदि कोई साधना करने में असमर्थ हो , तो योग्य विद्द्वान द्वारा या साधना सम्पन्न करा के करवाकर सम्मोहनी कवच धारण करके उक्त लाभ प्राप्त कर सकता हैं .


साधना सामग्री :-


सिद्धि अधेर मंत्रो से अभिमंत्रित धूमावती यन्त्र . काले हकीक की या रुद्राक्ष की माला , गुड़हल के फूल , तेल का दीपक नैवेद्य , कपूर ,एवं पूजन की अन्य आवश्यक सामग्री ,. विधि :- भय रहित ह्रदय से नदी या तालाब में स्नान आदि से निवृत होकर पूर्ण विधि - 


विधान से एकाग्र भाव से साधना करें . मंत्र जाप की समाप्ति पर दशांश यज्ञ हवन करना चाहिए . किसी विशेष प्रयोजन हेतु यदि आप धूमावती साधना अनुष्ठान करने के इच्छुक हैं तो अपनी मनोकामना का स्पष्ट शब्दों में संकल्प करें . यह देवी साधक के सभी शत्रुओ को समाप्त कर देती हैं . इस देवी का सिद्ध साधक निर्भय हो जाता हैं .


.दक्षिणा शुल्क - 1100


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


राजगुरु जी


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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...