Sunday, September 29, 2019

श्री गणेश के अनेक प्रचलित रूपों में हरिद्रा गणेश का अपना अलग विशेष महत्व है। दशों महाविद्याओं के अलग-अलग भैरव तथा गणेश हैं। श्री बगलामुखी के गणेश हरिद्रा गणेश हैं।






श्री गणेश के अनेक प्रचलित रूपों में हरिद्रा गणेश का अपना अलग विशेष महत्व है। दशों महाविद्याओं के अलग-अलग भैरव तथा गणेश हैं। श्री बगलामुखी के गणेश हरिद्रा गणेश हैं। 

पीला रंग स्तम्भन का माना जाता है तथा यह रंग सौंदर्यवर्धक तथा विघ्नविनाशक भी माना जाता है। त्रिपुर सुन्दरी श्रीदेवी के आवाहन करने पर हरिद्रा गणपति ने दैत्य के अभिचार को नष्ट किया था। 

हरिद्रा गणेश के प्रयोग से शत्रु का हृदय द्रवित होकर वशीभूत हो जाता है तथा श्री बगलामुखी साधना में बल प्रदान करता है। 

ध्यान- 

स्वर्ण के आसन पर स्थित, पीताम्बर धारण किए हुए, पाश, अंकुश, मोदक तथा हस्तिदंत धारण किए हुए, ‍त्रिनेत्र हल्दी के समान वर्ण वाले भगवान हरिद्रा गणेश को मैं भजता हूं। 

मंत्र- 

' ॐ हुं गं ग्लौं हरिद्रा गणपतये वर वरद सर्व जन हृदयं स्तम्भय-स्तम्भय स्वाहा।' 

हाथ में जल लेकर विनियोग करें। 

विनियोग : 

ॐ अस्य श्री हरिद्रा गणेश मंत्रस्य मदन ‍ऋषि:, अनुष्टुप छन्द:, श्री हरिद्रा गणेश देवता, ममाभीष्ट (कामना बोलें)। सिद्धयर्थे जपे विनियोग:। (जल छोड़ें।) 

ऋषियादिन्यास : 

ॐ मदन ऋषये नम: शिरसि, 
अनुष्टुप छन्दसे नम: मुखे, 
हरिद्रा गणेश देवतायै नम: ह्रीद, 
विनियोगाय नम: सर्वांगे। 

करन्या स__________________ अंगन्यास 

ॐ हुं गं ग्लौ ं__________________ अंगुष्ठाभ्यां नम: हृदयाय नम: 
हरिद्रा गणपतय े__________________ तर्जनीभ्यां नम: शिरसे स्वाहा 
वर वर द__________________ मध्यमाभ्यां नम:शिखायै वषट् 
सर्वजन हृदयम ्__________________ अनामिकाभ्यां नम: कवचाय हुम् 
स्तम्भय-स्तम्भ य_________________ कनिष्ठिकाभ्यां नम: नैत्रत्रयाय वौषट् 
स्वाह ा__________________ करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: अस्त्राय फट् 

इसमें गुड़ तथा पिसी हल्दी से गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करें। चार लाख जप करें तथा घृत-हल्दी मिश्रित तंदुल से दशांस होम कर कन्या द्वारा पिसी हल्दी का स्वयं के शरीर पर लेपन कर तीर्थ जल से स्नान कर शुक्ल चतुर्थी से पूजन जप-प्रारंभ करें। 

चार सौ चवालीस तर्पण कर एक हजार आठ जप करें। घृत मिश्रित अपूप से आहुति देकर बटुकों, कन्याओं को भोजन कराएं। लाजा होम से कन्या को वर प्राप्ति तथा संतानहीन स्त्री गोमूत्र तथा दुग्ध में धोकर 'बंच' और 'हल्दी' पीसकर मंत्र से 108 बार अभिमंत्रित कर औषध पान करें तो उसे पुत्र लाभ होगा। 

शत्रु वशीकरण हेतु घृत-हल्दी-चावल मिलाकर होम करें, पश्चात् कन्याओं तथा बटुकों को भोजन कराएं। अपने गुरु का पूजन कर वस्त्र, दक्षिणादि देकर संतुष्ट करें,‍ निश्चय ही सिद्धि होगी .

विशेष

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राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

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विवाह-रुकावटों को दूर करने के लिए माँ कात्यायनी के




विवाह-रुकावटों को दूर करने के लिए माँ कात्यायनी के सिद्ध मंत्र!


अगर विवाह संबंधी कार्य में बाधाएं आ रही हैं या उम्र ज्यादा हो गई है और उपयुक्त वर या वधु नहीं मिल रही है तो नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करें। भारतीय धर्म ग्रंथोंं में एेसा कहा गया है कि माता कात्यायनी की पूजा करने से विवाह जल्दी होता है तथा वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है। आपको बस मां कात्यायनी की पूजा आराधना करने की आवश्यकता है जिससे विवाह संबंधी सभी प्रकार की बाधाएें दूर हो जायेंगी। विवाह संबंधी परेशानियों से त्रस्त हैं और कोई उपाय नहीं सूझ रहा है तो मां कात्यायनी के पूजन करने की निम्न विधियों का पालन करें जिससे मां आपके समस्त कष्टों को दूर कर जीवन को मंगलमय करेंगी

कात्यायनी माँ की पूजा से किस तरह की मनोकामना पूरी होती है?

- कन्याओं के शीघ्र विवाह के लिए इनकी पूजा अद्भुत मानी जाती है। - मनचाहे विवाह और प्रेम विवाह के लिए भी इनकी उपासना की जाती है। - वैवाहिक जीवन के लिए भी इनकी पूजा फलदायी होती है। - अगर कुंडली में विवाह के योग क्षीण हों तो भी विवाह हो जाता है।

शीघ्र विवाह के लिए कैसे करें माँ कात्यायनी की पूजा?
- गोधूलि वेला में पीले वस्त्र धारण करें। - माँ के समक्ष दीपक जलायें और उन्हें पीले फूल अर्पित करें। - इसके बाद 3 गाँठ हल्दी की भी चढ़ाएं। - माँ कात्यायनी के मन्त्रों का जाप करें। - मन्त्र है - "कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी।नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।"- हल्दी की गांठों को अपने पास सुरक्षित रख लें।

आयुवर्ग के अनुसार विवाह हेतु माँ कात्यायनी साधना!
निम्नानुसार चार आयुवर्ग के अनुरूप देवी आराधना निश्चय ही मनोवांछित फल देगी और विवाह सम्बन्धी बाधाएँ दूर होंगी। 

१) 20 से 25 वर्ष के आयु वर्ग : शाम को मां के सामने घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें। मां को पीले रंग की चुनरी चढ़ाएें तथा हल्दी का अर्पण करें। इस पूजन प्रक्रिया के बाद मां के सामने दोनों हाथ जोड़कर विवाह संबंधी परेशानी या बाधाओं के निवारण हेतु प्रार्थना करें। इसके बाद पीले रंग की चुनरी में हल्दी की गांठ लगाएे तथा उसे अपने साथ रखें।

आयुवर्ग के अनुसार विवाह हेतु माँ कात्यायनी साधना!

२) 26 से 30 आयु वर्ग : शाम को माता के सम्मुख चौमुखी दीपक का प्रज्ज्वलन करें। ततपश्चात मां को पीतल या सोने की अंगूठी का अर्पण करें। फिर मां के देवी मंत्र "ॐ कात्यायनी दैव्ये नमः!" के मूलमंत्र का 108 बार जाप करें। जाप करने के बाद दाहिने हाथ की तर्जनी में उस पीतल या सोने की अंगुठी को धारण करें।

शीघ्र विवाह हेतु देवी कात्यायनी-साधना!

३) 31 से 35 आयु वर्ग : - माता के सामने दीप का प्रज्ज्वलन करें। - इसके बाद हवन समाग्री में सरसों के बीज को मिलायें। - इसके बाद आम की लकड़ी में हवन हेतु अग्नि का प्रज्ज्वलन करें। - अब हवन की समाग्री से 108 बार आहुति करें। - आहुति के साथ ही "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे" मंत्र का उच्चारण करें। इससे आपका विवाह अतिशीघ्र संपन्न होगा।

मंत्र जप में इन बातों का ध्यान रखे ---

1- नो दिनों तक एक निश्चित समय पर ही मंत्र का जप करें । 2- पहले दिन जितनी माला का जप किया है, बाकी दिनों में भी उतनी ही माला का जप करना हैं । 3- मंत्र का जप मन ही मन करें । 4- व्रत रखें और एक समय फलाहार करें। 5- संभव हो तो इन नौ दिनों तक भूमि पर शयन करें ।

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Sunday, September 22, 2019

आद्यशक्ति मां काली की 64 योगिनियां







आद्यशक्ति मां काली की 64 योगिनियां







प्राचीन तंत्र शास्त्र में 64 योगिनियां बताई गई हैं। कहा जाता है कि ये सभी आद्यशक्ति मां काली की ही अलग-अलग कला है। इनमें दस महाविद्याएं तथा सिद्ध विद्याएं भी शामिल हैं।

 तंत्र के अनुसार घोर नामक दैत्य के साथ युद्ध करते हुए मां आद्यशक्ति ने 64 रुप धारण किए थे, जो कालांतर में 64 योगिनी कहलाईं। तंत्र शास्त्र में किसी भी महाविद्या का पूजन आरंभ करने से पूर्व 64 योगिनियों को सिद्ध करने का विधान बताया गया है।

 इन्हें सिद्ध करने के बाद विश्व में ऐसा कोई काम नहीं जो साधक नहीं कर सकता, अर्थात् साधक स्वयं ही ईश्वरमय हो जाता है।

64 योगिनियों साधना के द्वारा वास्तु दोष, पितृदोष, कालसर्प दोष तथा कुंडली के अन्य सभी दोष दूर हो जाते हैं। इनके अलावा दिव्य दृष्टि (किसी का भी भूत, भविष्य या वर्तमान जान लेना) जैसी कई सिद्धियां बहुत ही आसानी से साधक के पास आ जाती है। परन्तु इन सिद्धियों का भूल कर भी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। अन्यथा अनिष्ट होने की आशंका रहती है।

चौसठ योगिनियों के नाम इस प्रकार है-

(1) बहुरूपा (2) तारा (3) नर्मदा (4) यमुना (5) शांति (6) वारुणी (7) क्षेमकरी (8) ऐन्द्री
(9) वाराही (10) रणवीरा (11) वानरमुखी (12) वैष्णवी (13) कालरात्रि (14) वैद्यरूपा (15) चर्चिका (16) बेताली
(17) छिन्नमस्तिका (18) वृषवाहन (19) ज्वाला कामिनी (20) घटवारा (21) करकाली (22) सरस्वती (23) बिरूपा (24) कौवेरी
(25) भालुका (26) नारसिंही (27) बिराजा (28) विकटानन (29) महालक्ष्मी (30) कौमारी (31) महामाया (32) रति
(33) करकरी (34) सर्पश्या (35) यक्षिणी (36) विनायकी (37) विंध्यवासिनी (38) वीरकुमारी (39) माहेश्वरी (40) अम्बिका
(41) कामायनी (42) घटाबरी (43) स्तुति (44) काली (45) उमा (46) नारायणी (47) समुद्रा (48) ब्राह्मी
(49) ज्वालामुखी (50) आग्नेयी (51) अदिति (52) चन्द्रकान्ति (53) वायुवेगा (54) चामुण्डा (55) मूर्ति (56) गंगा
(57) धूमावती (58) गांधारी (59) सर्व मंगला (60) अजिता (61) सूर्यपुत्री (62) वायु वीणा (63) अघोर (64) भद्रकाली

तंत्र में 64 योगिनियों की साधना द्वारा मुख्यतः षटकर्मों सिद्ध किए जाते हैं। ये सभी अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न होने के कारण साधक को उसकी मनवांछित वरदान देने में सक्षम है।

 इन्हें सिद्ध कर लेने के बाद साधक जो भी चाहें कर सकता है। संक्षेप में इन्हीं को मातृका भी कहा जाता है और इनकी आराधना के द्वारा साधक विभिन्न प्रकार की दिव्य सिद्धियां प्राप्त कर चमत्कार दिखाने में सक्षम होते हैं।

64 योगिनियों के सिद्धि मंत्र एवं साधना विधि जानने के लिए.




चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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       राजगुरु जी 

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जन्म-कुंडली में बनने वाले कुछ प्रेत अरिष्ट योग इस प्रकार हैं :-





जन्म-कुंडली में बनने वाले कुछ प्रेत अरिष्ट योग इस प्रकार हैं :-


१. सूर्य अथवा चन्द्र यदि तृतीय भाव में पापी ग्रहों के साथ हैं तो बच्चा बीमार रहेगा अथवा कुछ समय पश्चात उसकी मृत्यु हो जाती है।

२. यदि चंद्र अष्टम भाव के स्वामी के साथ केंद्रस्थ है तथा अष्टम भाव में भी पापी ग्रह हैं तो शीघ्र मृत्यु होती है।

३. यदि चंद्र से सप्तम भाव में मंगल एवं शनि हैं तथा राहु लग्नस्थ है तो जन्म के कुछ दिनों के अन्दर ही मृत्यु हो जाती है।

इस प्रकार कुंडली में आने वाले कुछ भूत-प्रेत बाधा योग ये हैं :-

१. यदि कुंडली में चंद्रमा अथवा लग्न लग्नेश पर राहु केतु का प्रभाव है तो उस जातक पर ऊपरी हवा, जादू-टोने इत्यादि का असर अति शीघ्र होता है।

२. कुंडली में सप्तम भाव में अथवा अष्टम भाव में क्रूर ग्रह राहु-केतु, मंगल, शनि पीड़ित अवस्था में हैं तो ऐसा जातक भूत-प्रेत, जादू-टोने तथा ऊपरी हवा आदि जैसी परेशानियों से अति शीघ्र प्रभावित होता है।

बालारिष्ट एवं भूत-प्रेत बाधाओं का पारस्परिक संबंध

जन्म कुंडली में लग्न भाव, आयु भाव अथवा मारक भाव पर यदि पाप प्रभाव होता है तो जातक का स्वास्थ्य प्राय निर्बल रहता है अथवा उसे दीर्घायु की प्राप्ति नहीं होती है। साथ ही चन्द्रम, लग्नेश तथा अष्टमेश का अस्त होना, पीड़ित होना अथवा निर्बल होना भी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जातक अस्वस्थ रहेगा या उसकी कुंडली में अल्पायु योग हैं। 


ठीक इसी प्रकार चंद्रमा लग्न, लग्नेश अष्टमेश पर पाप प्रभाव इन ग्रहों की पाप ग्रहों के साथ युति अथवा कुंडली में कहीं-कहीं पर चंद्र की राहु-केतु के साथ युति यह दर्शाती है कि जातक पर भूत-प्रेत का प्रकोप हो सकता है। 

मुख्यतः 

चंद्र-केतु की युति यदि लग्न में हो तथा मंचमेश और नवमेश भी राहु के साथ सप्तम भाव में है तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि जातक ऊपरी हवा इत्यादि से ग्रस्त होगा। फलतः उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, स्वास्थ्य तथा आयु पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा।

उपर्युक्त ग्रह योगों से प्रभावित कुंडली वाले जातक प्रायः मानसिक अवसाद से ग्रस्त रहते हैं। उन्हें नींद भी ठीक से नहीं आती है। एक अनजाना भय प्रति क्षण सताता रहता है तथा कभी-कभी तो वे आत्महत्या करने की स्थिति तक पहुंच जाते हैं। जो ग्रह भाव तथा भावेश बालारिष्ट का कारण होते हैं,

 लगभग उन्हीं ग्रहों पर पाप प्रभाव भावेशों का पीड़ित, अस्त अथवा निर्बल होना इस बात का भी स्पष्ट संकेत करता है कि जातक की कुंडली में भूत-प्रेत बाधा योग भी है। अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बालाश्रिष्ट तथा भूत-प्रेत बाधा का पारस्परिक संबंध अवश्य होता है।

यदि अनुभव हो कि भूत प्रेत का असर है तो घर में नियमित रूप से सुन्दरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा सूर्य देव को जल चढ़ाएं।



१. यदि किसी मनुष्य पर भूत-प्रेत का असर अनुभव हो, तो उसकी चारपाई के नीचे नीम की सूखी पत्ती जलाएं।

२. मंगल या शनिवार को एक समूचा नींबू लेकर भूत-प्रेत ग्रसित व्यक्ति के सिर से पैर तक ७ बार उतारकर घर से बाहर आकर उसके चार टुकड़े कर चारों दिशाओं में फेंक दें। यह ध्यान रहे कि जिस चाकू से नींबू काटा है उसे भी फेंक देना चाहिए।


अाप भी अपने जीवन से जुड़ा हुआ किसी की जानकारी चाहते हैं तो संपर्क करें और हाथ का रेखा का पूर्ण विश्लेषण के पश्चात अनेकों लाभ प्राप्त करें ..







जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की 

दक्षिणा  -  501  मात्र .

Pytam नम्बर -  9958417249

विशेष

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Saturday, September 21, 2019

योगिनी साधना





योगिनी साधना


योगिनी दशा सरलतम साधना तंत्र से सांसारिक दुःखों से मुक्ति पाने के लिए योगिनी साधना एक महत्त्वपूर्ण साधना मानी गयी है । 

माता, बहन, पुत्री आदि जिस भाव से उनकी साधना या उपासना की जाए उसी रूप में वे सदैव प्रसन्न होकर साधक का कल्याण करती हैं । परन्तु सर्वश्रेष्ठ यह होता है कि साधक किसी एक रूप विशेष में ही योगिनी साधना करें ।

योगिनियों के नाम

योगिनियाँ अनेक रूप और नाम की अध्यात्म, योग तथा अन्य गुह्य विषयों में चर्चित हैं, जैसे योग साधक का योगी इसी प्रकार योग साधिका को सामान्यतः लोग योगिनी सम्बोधित कर देते हैं । 

ज्योतिष शास्त्र में जैसे जातक की विंशोत्तरी दशा, अष्टोत्तरी दशा, चर दशा, महादशा आदि दशाएं जन्म से जीवन के अन्तिम समय तक क्रमशः एक निश्चित क्रम में आती रहती हैं, इसी प्रकार योगिनी दशाएं भी जीवन में निरन्तर घटित होकर प्रभावी रहती हैं । कुछ योगनियाँ वह हैं जो महाविद्याओें के साथ निवास करती हैं । 

कुछ वह हैं, जो साधना करते-करते शरीर त्याग देती हैं और साधना पूर्ण नहीं कर पातीं अथवा जिनकी साधना पूर्ण हो जाती है परन्तु किन्हीं त्रुटि के कारण उनकी सद्गति नहीं हो पाती अथवा उनका पुनर्जन्म नहीं हो पाता । कुछ शक्तियों के नाम विशेष जो सङ्ख्या में कुल ६४ हैं को भी योगिनी कहते हैं । तन्त्र क्षेत्र में यह ६४ योगिनियों के नाम से विख्यात हैं ।

प्रस्तुत लेख में जातक दशा चक्रिणी योगिनियों का सरलीकृत परिचय दे रहा हूँ । योगिनी दशाओं भोग का एक निश्चित समय निर्धारित है । ज्योतिष शास्त्र की दशाओं की तरह योगिनी दशाएं भी अपने समय काल में सुख और दुःख का जातक को उनके कर्मानुसार फल देती हैं । 

योगिनी दशाओं कि कुल संख्या ८ हैं । इनमें से कोई सिद्धदायिनी है, कोई मंगलकारक है, कोई कष्टकारी है, कोई सफलता प्रदायक आदि हैं । जीवन की सफलता के लिए यदि इनकी साधना कर ली जाए तो साधक के लिए यह बहुत ही भाग्यशाली सिद्ध होती हैं । जन्म पत्री में जिस योगिनी की दशा चल रही है उसकी पूजा-अर्चना करने की सरलतम विधि पाठकों के लाभार्थ दे रहा हूँ ।

योगिनी अत्यन्त सामान्य से नियमानुसार निम्न प्रकार से सुख-दुःख अपनी दशा में देती हैं-

१. मंगला - 

मंगला देवी की कृपा जिस व्यक्ति पर हो जाती है उसको हर प्रकार के सुखों से सम्पन्न कर देती हैं । यथाभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति मंगल ही मंगल भोगता है । 

२. पिंगला - 

पिंगला देवी की कृपा से सारे विघ्न शांत हो जाते हैं । धन-धान्य और उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं । 

३.धान्या - 

धान्या देवी की कृपा से धन-धान्य की कभी क्षति नहीं होती है ।

४. भ्रामरी - 

यदि भ्रामरी दशा में देवी की कृपा हो जाए तो शत्रु पक्ष पर विजय, समाज में मान-सम्मान तथा अनेक लाभ के अवसर आने लगते हैं । 

५. भद्रिका - 

शत्रु का शमन और जीवन में आए समस्त व्यवधान समाप्त होने लगते हैं, यदि देवी की कृपा हो जाए ।

६. उल्का -

 कार्यों में किसी भी प्रकार से यदि व्यवधान आ रहे हैं और अपनी दशा में उल्का देवी की व्यक्ति पर कृपा हो जाए तो तत्काल व्यक्ति के समस्त कार्यों में गति आने लगती है । 

७. सिद्धा - 

सिद्धा दशा में परिवार में सुख-शान्ति, कार्य की सिद्धि, यश, धन लाभ आदि में आश्चर्यजनक रूप से फल मिलने लगते हैं । परन्तु सम्भव यह उस दशा में ही सम्भव है जब देवी की कृपा हो जाए ।

८. संकटा - 

यथानाम रोग, शोक और संकटों के कारण इस दशा का समय काल व्यक्ति को त्रस्त करता है । संकटों से मुक्ति के लिए मातृ रूप में योगिनी की पूजा करें तो देवी की कृपा होने लगती है । सङ्कटा के अवधि में प्रारम्भ के चार साल तक यह राहु के शुभ/अशुभ फलों को प्रदान करती है तथा बाद के चार साल पर्यन्त यिनका रूप विकटा का हो जाता है, और वह केतु के शुभ/अशुभ फलों को प्रदान करती हैं । 

योगिनी दशाओं को अनुकूल बनाने के लिए यथा भाव, सुविधा और समय निम्न प्रकार से साधना करें :-

किसी शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि से पूर्णिमा तक प्रत्येक योगिनी दशा के कारक ग्रह के दिन से सम्बन्धित योगिनी दशा के कारक ग्रह के पांच-पांच हजार मंत्र पूरे कर लें । संकटा दशा के कारक ग्रह के लिए रविवार राहु के लिए तथा मंगलवार केतु के लिए चुनें ।

 इसी प्रकार मंगला के कारक ग्रह चन्द्रमा के लिए सोमवार, पिंगला के लिए रविवार, धान्या के कारक ग्रह गुरू के लिए गुरूवार, भ्रामरी के मंगल के लिए मंगलवार, भद्रिका के ग्रह बुध के लिए बुधवार, उल्का के शनि ग्रह के लिए शनिवार और सिद्धा के लिए शुक्रवार चुनें ।

योगिनी दशाओं का कुल समय काल १ वर्ष से आरम्भ होकर क्रमशः २, ३, ४, ५, ६, ७ और ८ वर्षों का होता है । जितने वर्ष तक योगिनी दशा का समय जन्मपत्री के अनुसार चल रहा है उतने वर्षों में निरन्तर नहीं तो अपनी समय की सुविधानुसार कुछ-कुछ अन्तराल से योगिनी दशाओं के समय काल में उनके मंत्र जप अवश्य करते रहें । 

साधना वांछित मंत्र जप साधना के लिए पीला आसन तथा गोघृत का दीपक जलाकर बैठें । सम्भव हो तो एक नवग्रह यंत्र अपनी पूजा में ध्यान के लिए स्थापित कर लें । जप के बाद प्रत्येक दिन पांच देवी रूप कन्याओें को भोजन करवाकर उनकी प्रसन्नता और आशीर्वाद लें ।

 अन्तिम अर्थात् पूर्णिमा को नवग्रह यंत्र अपनी पूजा में स्थाई रूप से स्थापित कर दें । तदन्तर में नित्य एक माला उस योगिनी देवी की करते रहें जिनकी दशा आप भोग रहे हैं । 
जप मंत्र

मंगला - 

ॐ ह्रीं मङ्गले मङ्गलायै स्वाहा ।                              (जाप सङ्ख्या - १०००)

पिंगला -

 ॐ ग्लौं पिङ्गले वैरिकारिणी प्रसीद फट् स्वाहा ।         (जाप सङ्ख्या - २०००)

धान्या - 

ॐ श्रीं धनदे धान्यै स्वाहा ।                                   (जाप सङ्ख्या - ३०००)

भ्रामरी - 

ॐ भ्रामरि जगतामधीश्वरि भ्रामरि क्लीं स्वाहा ।          (जाप सङ्ख्या - ४०००)

भद्रिका - 

ॐ भद्रिके भद्रं देही अभद्रं नाशय स्वाहा ।              (जाप सङ्ख्या - ५०००)

उल्का - 

ॐ उल्के मम रोगं नाशय जृम्भय स्वाहा ।                 (जाप सङ्ख्या - ६०००)

सिद्धा - 

ॐ ह्रीं सिद्धे मे सर्वमानसं साधय स्वाहा ।                  (जाप सङ्ख्या - ७०००)

संकटा - 

ॐ ह्रीं सङ्कटे मम रोगं नाशय स्वाहा ।                     (जाप सङ्ख्या - ८०००)

विकटा - 

ॐ नमो भगवति विकटे वीरपालिके प्रसीद, प्रसीद ।  (जाप सङ्ख्या - ८०००)

 चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

       राजगुरु जी 

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कर्ज खत्म करने के लिए क्या करें





कर्ज खत्म करने के लिए क्या करें


एक बहुत ही आजमाया हुआ कारगर उपाय है जिससे हर किसी को इस 

मुसीबत से छुटकारा मिल सकता है | जिन लोगों ने इस उपाय को किया 

है न केवल कर्ज से मुक्त हुए हैं बल्कि धनी भी बन गए हैं | आवश्यकता 

है तो बस विशवास की, श्रद्धा की और समर्पण की |

गणेश जी को ऋणहर्ता माना गया है | उन्ही की कृपा से आपको कर्ज से 

हमेशा के लिए मुक्ति मिल सकती है | पूरे विशवास के साथ किसी भी 

मंगलवार की सुबह गणेश जी के आगे आसान बिछाकर बैठ जाएँ | धूप 

दीप से पूजन करने के बाद हाथ में जल लेकर संकल्प लें | ४० दिन, ६ 

महीने या कर्ज की आयु के अनुसार ९ महीने नीचे लिखे गणेश मन्त्र का 

प्रतिदिन ३ माला जप करें |

ओम गणेश ऋणं छिन्दि छिन्दि वरेण्यम हूं नमः फट

जप के दोरान धूप दीप जलता रहना चाहिए और इस साधना के समाप्त 

होने तक इस मन्त्र का जिक्र किसी से मत करें | पहले १५ दिन के भीतर 

ही आपको आशा की किरण दिखाई देने लगेगी |

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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Friday, September 20, 2019

हाथाजोडी साधना






हाथाजोडी साधना


हाथाजोडी की साधना में लौंग अवश्य चढाये . इसके साथ ही महाकाली जी के मंत्र की प्रतिदिन ७ या ११ माला जपें . धयान रहे कि हाथाजोडी में देवी चामुण्डा जी का वास रहता हैं . जो देवी महाकाली का ही प्रतिरूप हैं .

 अतः महाकाली का मंत्र जपने से उनकी कृपा अवस्य प्राप्ति होती हैं . महाकाली का सब से सरल मंत्र इस प्रकार हैं .
मंत्र

"" ॐ किलि किलि स्वाहा """

इस मंत्र को नित्य ११ माला जापे . जप के पूरा होने पर हाथाजोडी कि लौंग , धूप , डीप से पूजा करे और कोई सिक्का भी चढ़ाये . यह प्रयोग आपकी आर्थिक दशा अवस्य सुधर देगा

चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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त्रिपुर सुंदरी उपासना





त्रिपुर सुंदरी उपासना


त्रिपुर सुंदरी की उपासना लक्ष्‍मी रूप में होती है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश की शक्तियां उनमें समाहित हैं। भगवती 
त्रिपुरसुंदरी दस महाविद्याओं में दसवें स्थान पर हैं। इन्हें षोडशी,ललिता और राजराजेश्वरी नाम से भी वर्णित 

किया गया है। षोडशी इसलिए कही जाती हैं क्योंकि ये 16 साल की युवती का प्रतिनिधित्व करती हैं। शाक्त 
तांत्रिकों के मध्य ये सबसे प्राचीन पूजित देवी हैं। इन्हें तीनों लोकों में सबसे सुंदर और आकर्षक माना गया है। 

इसका एक अर्थ यह भी है कि ये स्थूल,सूक्ष्म और परालोक की अद्भुत प्रभाव वाली देवी हैं जो हर तरह की सुख-

संपदा देने में सक्षम हैं।

त्रिपुर सुंदरी मंत्र: ऐं  ह्रीं  श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:

व्यक्तित्व विकास, स्वस्थ्य और सुन्दर काया के लिए त्रिपुर सुंदरी देवी की साधना करें। रुद्राक्ष की माला का 
प्रयोग करें। दस माला मंत्र २१ दिन तक लगातार जप अवश्य करें।

चमत्कार आपके सामने होगा

चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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कुदरत का करिश्मा श्वेतार्क गणपति,व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो तो वहां श्वेतार्क गणपति करते है हर बाधा को दूर




कुदरत का करिश्मा श्वेतार्क गणपति,व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो तो वहां श्वेतार्क गणपति करते है हर बाधा को दूर 


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शास्त्रों में श्वेतार्क के बारे में कहा गया है- "जहां कहीं भी यह पौधा अपने आप उग आता है, उसके आस-पास पुराना धन गड़ा होता है। जिस घर में श्वेतार्क की जड़ रहेगी, वहां से दरिद्रता स्वयं पलायन कर जाएगी। इस प्रकार मदार का यह पौधा मनुष्य के लिए देव कृपा, रक्षक एवं समृद्धिदाता है।

सफेद मदार की जड़ में गणेशजी का वास होता है, कभी-कभी इसकी जड़ गणशेजी की आकृति ले लेती है। इसलिए सफेद मदार की जड़ कहीं से भी प्राप्त करें और उसकी श्रीगणेश की प्रतिमा बनवा लें। 

उस पर लाल सिंदूर का लेप करके उसे लाल वस्त्र पर स्थापित करें। यदि जड़ गणेशाकार नहीं है, तो किसी कारीगर से आकृति बनवाई जा सकती है। शास्त्रों में मदार की जड़ की स्तुति इस मंत्र से करने का विघान है-

चतुर्भुज रक्ततनुंत्रिनेत्रं पाशाकुशौ मोदरक पात्र दन्तो।
करैर्दधयानं सरसीरूहस्थं गणाधिनाभंराशि चूùडमीडे।।
गणेशोपासना में साधक लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। नेवैद्य में गुड़ व मूंग के लड्डू अर्पित करें। 

"ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्" 

मंत्र का जप करें। श्रद्धा और भावना से की गई श्वेतार्क की पूजा का प्रभाव थोड़े बहुत समय बाद आप स्वयं प्रत्यक्ष रू प से अनुभव करने लगेंगे।

तन्त्र शास्त्र में श्वेतार्क गणपति की पूजा का विधान है | यह आम लक्ष्मी व गणपति की प्रतिमाओं से भिन्न होती है | यह प्रतिमा किसी धातु अथवा पत्थर की नहीं बल्कि जंगल में पाये जाने वाले एक पोधे को श्वेत आक के नाम से जाना जाता है | इसकी जड़ कम से कम २७ वर्ष से जयादा पुरानी हो उसमें स्वत: ही गणेश जी की प्रतिमा बन जाती है |

 यह प्रक्रति का एक आश्चर्य ही है | श्वेतक आक की जड़ (मूल ) यदि खोदकर निकल दी जाये तो निचे की जड़ में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी | इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से साधक को धन-धान्य की प्राप्ति होती है | यह प्रतिमा स्वत: सिद्ध होती है | 

तन्त्र शास्त्रों के अनुसार ऐशे घर में यंहा यह प्रतिमा स्थापित हो , वंहा रिद्धी-सिद्ध तथा अन्नपूर्णा देवी वस् करती है | श्वेतार्क की प्रतिमा रिद्धी-सिद्ध की मालिक होती है | जिस व्यक्ति के घर में यह गणपति की प्रतिमा स्थापित होगी उस घर में लक्ष्मी जी का निवास होता है तथा जंहा यह प्रतिमा होगी उस स्थान में कोई भी शत्रु हानी नहीं पहुंचा सकता |

 इस प्रतिमा के सामने नित्य बैठकर गणपति जी का मूल मन्त्र जपने से गणपति जी के दर्शन होते हैं तथा उनकी क्रपा प्राप्त होती है |

श्वेतक आक की गणपति की प्रतिमा अपने पूजा स्थान में पूर्व दिशा की तरफ ही स्थापित करें | ' ओम गं गणपतये नम:' मन्त्र का प्रतिदिन जप करने | जप के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह जप करें तो जप कल में ही साधक की हर मनोकामना गणपति जी पूरी करते हैं |

व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो तो वहां श्वेतार्क गणपति तथा की स्थापना करें।

श्वेतक आक गणपति एक दुर्लभ प्रकतिक उपहार

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जंगल में पाये जाने वाले एक पोधे को सफेद आक के नाम से जाना जाता है | इसकी जड़ पुरानी हो तो उसमें स्वत: ही गणेश जी की प्रतिमा बन जाती है | यह प्रक्रति का एक आश्चर्य ही है | श्वेतक आक की जड़ (मूल ) यदि खोदकर निकल दी जाये तो निचे की जड़ में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी | 

इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से साधक को धन-धान्य की प्राप्ति होती है | यह प्रतिमा स्वत: सिद्ध होती है | तन्त्र शास्त्रों के अनुसार ऐशे घर में यंहा यह प्रतिमा स्थापित हो , वंहा रिद्धी-सिद्ध तथा अन्नपूर्णा देवी वस् करती है ,

श्वेतक आक गणपति पूजन विधि:

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श्वेतक आक गणपति की प्रतिमा रवि पुष्य या गुरु पुष्य जैसे शुभ मुहूर्त पर प्राप्त करके गंगा जल में स्नान करवा कर लाल संदुर का लेप करे ,अब गणपति जी को पूर्व दिशा में लाल कपड़े पर ही स्थापित करें, उसके बाद गणपति पर षोडश उपचार से पूजन कर . इसके बाद प्रतिदिन नीचे लिखे मन्त्र की एक माला जाप करे:-

ऊँ गं गणपतये नमः

जप के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें |

पूजन लाभ:

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आपके सभी प्रकार के रोगों का नाश होगा, सौभाग्य में वृद्धि होगी, चेहरे पर तेज, कांति व चमक शोभायमान होती है। 

साथ ही साथ यदि किसी भी तरह का वशीकरण या फिर तांत्रिक प्रयोग किया हुआ हो तो उसका भी नाश होकर परिवार में सुख-समृद्धि व शांति का वास होकर माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद सदैव के लिए बना रहता है। 

ऐसा करने से आपके घर में हमेश के लिए गणपति की असीम कृपा के साथ-साथ रिद्धि-सिद्धि का वास होगा।

चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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माँ बगलामुखी साधना






माँ बगलामुखी साधना


यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है।

 इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। 

सामनेवाले विरोधियों को शांत करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा।

मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या किलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है।

हम यहाँ पर सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली, कोर्ट में विजय दिलाने वाली, अपने विरोधियों का मुँह बंद करने वाली माँ बगलामुखी की आराधना का सही प्रस्तुतीकरण दे रहे हैं। हमारे पाठक इसका प्रयोग कर लाभ उठाने में समर्थ होंगे, ऐसी हमारी आशा है।

यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है।

इस साधना में विशेष सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है जिसे हम यहाँ पर देना उचित समझते हैं।

 इस साधना को करने वाला साधक पूर्ण रूप से शुद्ध होकर (तन, मन, वचन) एक निश्चित समय पर पीले वस्त्र पहनकर व पीला आसन बिछाकर, पीले पुष्पों का प्रयोग कर, पीली (हल्दी) की 108 दानों की माला द्वारा मंत्रों का सही उच्चारण करते हुए कम से कम 11 माला का नित्य जाप 21 दिनों तक या कार्यसिद्ध होने तक करे या फिर नित्य 108 बार मंत्र जाप करने से भी आपको अभीष्ट सिद्ध की प्राप्ति होगी।

आँखों में तेज बढ़ेगा, आपकी ओर कोई निगाह नहीं मिला पाएगा एवं आपके सभी उचित कार्य सहज होते जाएँगे। खाने में पीला खाना व सोने के बिछौने को भी पीला रखना साधना काल में आवश्यक होता है वहीं नियम-संयम रखकर ब्रह्मचारीय होना भी आवश्यक है।

\ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा।

हमने उपर्युक्त सभी बारीकियाँ बता दी हैं। अब यहाँ पर हम इसकी संपूर्ण विधि बता रहे हैं। इस छत्तीस अक्षर के मंत्र का विनियोग ऋयादिन्यास, करन्यास, 

\

हृदयाविन्यास व मंत्र इस प्रकार है--

विनियोग

अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।

त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।

ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।

ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।

आवाहन

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।

ध्यान

सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्

हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्

हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै

व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

मंत्र इस प्रकार है-- 

ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा।

मंत्र जाप लक्ष्य बनाकर किया जाए तो उसका दशांश होम करना चाहिए। जिसमें चने की दाल, तिल एवं शुद्ध घी का प्रयोग होना चाहिए एवं समिधा में आम की सूखी लकड़ी या पीपल की लकड़ी का भी प्रयोग कर सकते हैं। मंत्र जाप पूर्व या 

उत्तर दिशा की ओर मुख कर के करना चाहिए।

साधनाकाल की सावधानियाँ

- ब्रह्मचर्य का पालन करें।

- पीले वस्त्र धारण करें।

- एक समय भोजन करें।

- बाल नहीं कटवाए।

- मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें।

- दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें।

- साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्‍ठ फलदायी होता है।

- साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए।

चेतावनी - 

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Thursday, September 19, 2019

महाकाली साधना.







महाकाली साधना.


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मै 12 वर्ष से काली साधना ही कर रहा,कुछ अनुभुतिया भी प्राप्त की तो कभी किसी वक्त नाराज भी होना पढा,परंतु साधना बंद नही की,हमेशा करता रहा सिर्फ इस वर्ष नही कर पाया फिर भी रोज 21 बार मंत्र बोलता हू.माँ ने बहोत कुछ दिया मुझे जिसे लिखना भी मेरे लिये संभव नही.

ह्रुदय से माँ को हमेशा एक ही कामना करता हू "पूर्ण जीवन मे कुछ मत देना मुझे,सिर्फ आखरी समय मे मुझ पर कृपा कर देना",क्या करे माँ है वो सिर्फ देना जानती है और कुछ ना कुछ देती रहेती है.इसलिये जो मुझे दिल से ठिक लगा वोही साधना यहा दे रहा हू.

येसा इस दुनिया मे कुछ भी नही जो माँ दे नही सकती सिर्फ माँगने वाला सही होना चाहिये.अघोरी हो या तांत्रिक हो सब की आराध्या महाकाली ही है,जिसने काल को सेवा मे रखा हुआ है.जहा महाकाली है वही महाकाल है और जो व्यक्ती महाकाली साधना करता है उसपर महाकाल तो कृपा करते ही है.व्यर्थ का चिंता छोड दो और  महाकाली साधना संपन्न कर लो.

साधना विधान:-

वस्त्र कोई भी हो आसन लाल हो,रुद्राक्ष का माला या काली हकिक माला से जाप करे,दिशा उत्तर,चैत्र नवरात्री मे जाप करना हो तो रात्री मे 9 बजे के बाद करे,रोज 11 माला अवश्य करे.

ध्यान :-

ओम कराल वदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम
आद्यं कालिकां दिव्यां मुंडमाला विभूषिताम
सद्यश्छिन्ना शिरः खडग वामोर्ध्व कराम्बुजाम
महामेघप्रभाम् कालिकां तथा चैव दिगम्बराम्
कंठावसक्तमुंडाली गलद्वधिर चर्चिताम्
कर्णावतंसतानीत शव युग्म भयानकाम
घोरदृष्टाम करालास्यां पीनोन्नत पयोधराम
शवानाम करसंघातै कृतकांची हसनमुखीम्
सृक्कद्वय गलद्वक्त धारा विस्फुरिताननाम
घोररावां महारौद्रीं श्मशानालय वासिनीम्
बालार्क मंडलाकारां लोचन त्रितयांविताम्
दंतुरां दक्षिण व्यापि मुक्तालविकचोच्चयाम
शव रूप महादेव हृदयोपरि संस्थिताम्
शिवाभिर्घोर रावाभिष्चतुर्दिक्षु समन्विताम्
महाकालेन च समं विपरीत रतातुराम
सुख प्रसन्न वदनां स्मेराननसरोरुहाम ll

मंत्र:-

ll ओम क्रीं क्रीं महाकालीके क्रीं क्रीं फट ll

हर सकंट मे मंत्र का जाप करे,सही रास्ता मिलेगा.रोग कोई भी हो माँ के कृपा से भाग जायेगा,यह छोटासा मंत्र माँ के दर्शन प्राप्त कराने हेतु सक्षम है.

चेतावनी - 

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...