Friday, October 15, 2021

दीपावली पर करें महाविद्या की तंत्र साधना



दीपावली पर करें महाविद्या की तंत्र साधना


दीपावली पर करें महाविद्या की तंत्र साधना में महाविद्याओं का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ये महाविद्याएं दस हैं- 


काली, तारा, षोड्शी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, बगलामुखी, धूमावती, मातंगी और कमला। 


इन दस महाविद्याओं का प्राकट्य शिव पत्नी आद्या शक्ति सती के अंग से हुआ है।


 दसवीं महाविद्या कमला का प्राकट्य दिवस कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को हुआ था, इसीलिए इस दिन दीपावली महापर्व के रूप में मनाया जाता है। 


कमलात्मिका, महालक्ष्मी, लक्ष्मी श्री, पद्मावती, कमलाया आदि नामों से पूजित कमला तांत्रिकों की परम आराध्य देवी हैं।


 तंत्र साधना में विभिन्न मार्गों से आराधना की जाती है - वीर, शैव, कापालिक, पाशुपत, लिंगायन आदि।


 किंतु तंत्र साधना पद्धति में दक्षिण मार्गी और वाममार्गी दो पथ प्रमुख रूप से प्रचलित है। तंत्र गं्रथों में सात आचारों वर्णन है - वेदाचार, वैष्णवाचार शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिंद्धाचार तथा कौलाचार। 


ये मार्ग उŸारोŸार उŸाम माने गए हैं अर्थात् कौलाचार तांत्रिक सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक होता है। तंत्र और महाविद्या: शक्ति के उपासक तांत्रिक महाविद्या की ही आराधना करते हैं। काली, तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी और षोडशी को काली कुल की देवी माना जाता है जिनकी साधना उग्र और दुःसाध्य होती है।


 भैरवी, बगला, धूमावती, मातंगी और कमला ये पांच श्रीकुल की महाविद्याएं हैं। इनकी साधना काली कुल की देवियों की तुलना में सरल तथा सुसाध्य होती है। 


भगवती कमला की साधना: जिस देवी या देवता की साधना पूजा करनी हो उसके मूल स्वरूप स्वभाव तथा उससे संबंधित संपूर्ण जानकारी अति आवश्यक है। पूजन के समय सर्वप्रथम ध्यान करने तथा ध्यान मंत्र श्लोक का उच्चारण इसी उद्देश्य से किया जाता है। 


श्रीकमलात्मिका का उद्भव: जब देवताओं तथा दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तब समुद्र से चैदह रत्न निकले जिनमें ‘कमला’ का प्राकट्य हुआ था। कमल पर आसीन लक्ष्मी के चार हाथ हैं, चार हाथी स्वर्ण कलशों में जल भर कर उनका अभिषेक कर रहें है, वह मणिमाणिक्य, दिव्य रत्न धारण किए हुए हैं। 


श्री विद्या महात्रिपुर सुंदरी देवी षोडशी ने महालक्ष्मी को स्वयं में एक करके अपने समीप समकक्ष स्थान प्रदान किया। 


कामाख्या धाम शाक्त तांत्रिकों का सबसे बड़ा तंत्र शक्ति पीठ है जहां कामाख्या रूप में षोडशी और उन्हीं के समीप कमला तथा मातंगी स्थापित हैं।


 तंत्र शास्त्रों में महाविद्या की साधना में गणपति, शिव, बटुक तथा यक्षिणी साधना के भी निदेर्श दिए गए हैं अर्थात शक्ति की उपासना में शक्ति के साथ साथ शिव, गणेश, बटुक तथा यक्षिणी की आराधना पूजा करना अनिवार्य है। भगवती कमला के शिव भगवान नारायण गणेश ‘सिद्ध’, बटुक ‘सिद्ध’ तथा यक्षिणी ‘धनदा’ हैं।


 तंत्र विधान के अनुसार शक्ति के साथ उक्त चारों शक्तियों का पूजन तथा मंत्र जप करना चाहिए। 


कमला के मंत्र: ¬ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं क्षौ जगत्प्रसूत्यै नमः। ¬ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालयै प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीें ¬ महालक्ष्म्यै नमः। ¬ श्रीं श्रीयै नमः।। ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं कमल वासीन्यै स्वाहा।।


 भगवान नारायण का मंत्र ¬ ¬ 


श्री हरि कमला वल्लभाय नमः


 गणेश जी का मंत्र लक्ष्मी विनायक मंत्र ¬ 


श्रीं गं सौम्याय गण-पतये वर-वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।। 


बटुक (भैरव) का मंत्र ¬ 


ह्रीं कमलाकान्ताय सिद्धनाथाय ह्रीं ¬


 धनदा यक्षिणी का मंत्र ¬


 रं श्रीं ह्रीं धं धनदे रतिप्रिये स्वाहा।।


 ।। जप विधानम्।। 


जप के समय सर्व प्रथम गणेश मंत्र का जप करें। फिर बटुक मंत्र का जप करें। इसके पश्चात् कमला का कोई एक मंत्र का जप करें। फिर नारायण मंत्र और अंत में धनदा यक्षिणी के मंत्र का जप करना चाहिए। कमला के मूल मंत्र के जप के दशांश के बराबर अन्य मंत्रों का जप करना आवश्यक है।


 जप के क्रमानुसार, जप संख्या का दशांश हवन तथा क्रमानुसार दशांश तर्पण और मार्जन करना चाहिए। हवन सामग्री में कमलगट्टे, विल्वफल, घी, शक्कर, तिल, शहद और कमल पुष्प का सम्मिश्रण होना चाहिए। तंत्र विधि से जप करने पर मनोकामना की पूर्ति निश्चित रूप से होती है।


 धन-संपŸिा में स्थिरता आती है और लक्ष्मी की प्राप्ति के साथ-साथ मान सम्मान, प्रतिष्ठा, यश विजय, आरोग्यादि की भी प्राप्ति होती है।


 वांछित फल की प्राप्ति के लिए दीपावली पर्व धनतेरस से द्वितीय तक पंच दिवसीय अनुष्ठान करना चाहिए है।


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Tuesday, October 12, 2021

महाविपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र का कोई नहीं कर सकता सामना


 


महाविपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र का कोई नहीं कर सकता सामना


महाविपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र का कोई नहीं कर सकता सामना। यह मंत्र देवताओं पर भी भारी पड़ता है। शत्रु की प्रबलतम क्रियाओं को नष्ट करता है। साथ ही शत्रु का भी नाश करता है। देवता, राक्षस व ग्रह-नक्षत्र भी निस्तेज हो जाते हैं। विपरीत प्रत्यंगिरा व महाविपरीत प्रत्यंगिरा की कोई काट नहीं है। इसका प्रयोग निष्फल नहीं होता है। इसके साधक को किसी का डर नहीं रहता। गुरु की देखरेख में ही इस साधना को पूरा करें। अन्यथा लेना का देना पड़ सकता है।


ध्यानं


टंकं कपालं डमरूं त्रिशूलं। संबिभ्रती चंद्रकलावतंसा।

पिंगोर्ध्वकेशाासित भीमदंष्ट्रा। भूयाद् विभूत्यै मम भद्रकाली।।


इस मंत्र से माता का भक्तिपूर्वक ध्यान करें। इसके बाद निम्न मंत्रों से आगे की प्रक्रिया करें।


विनियोग


ऊं अस्य श्रीविपरीत प्रत्यंगिरास्तोत्रमंत्रस्य भैरव ऋषि:। अनुष्टुप-छंद:। श्रीविपरीत प्रत्यंगिरा देवता। हं बीजं। ह्रीं शक्ति:। क्लीं क्लीकं। ममाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे पाठे च विनियोग:।


करंगन्यास


ऊं ऐं अंगुष्ठाभ्यां नम:। ऊं ह्रीं तर्जनीभ्यां नम:। ऊं श्रीं मध्यमाभ्यां नम:। ऊं प्रत्यंगिरे अनामिकाभ्यां नम:। ऊं मां रक्ष रक्ष कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ऊं मम शत्रून् भंजय भंजय करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।


हृदयादिन्यास


ऊं ऐं हृदयाय नम:। ऊं ह्रीं शिरसे स्वाहा। ऊं श्रीं शिखायै वषट्। ऊं प्रत्यंगिरे कवचाय हुम्। ऊं मां रक्ष रक्ष नेत्रत्रयाय वौषट्।। ऊं मम शत्रून भंजय भंजय अस्त्राय फट्।


दिग्बंध

ऊं भूर्भुव: स्व:। इति दिग्बंध:। सभी दिशाओं में चुटकी बजाएं।


लघु मंत्र

ऊं ऐं ह्रीं श्रीं प्रत्यंगिरे मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भंजय भंजय फे हूं फट स्वाहा।


रोज 108 बार जप करें। शत्रु प्रबल हो तो एक बार में 16 हजार जप करें। दसवें हिस्से का हवन करें। हवन में कालीमिर्च, लावा, सरसो, नमक और घी की समान मात्रा हो। इस लघु महाविपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र का भी जवाब नहीं।


विपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र


ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ कुं कुं कुं मां सां खां चां लां क्षां ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं वां धां मां सां रक्षां कुरु। ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ स: हुं ॐ क्षौं वां लां धां मां सां रक्षां कुरु। ॐ ॐ हुं प्लुं रक्षां कुरु।


ॐ नमो विपरीतप्रत्यंगिरायै विद्याराज्ञि त्रैलोक्यवंशकरि तुष्टि-पुष्टि-करि सर्वपीडापहारिणि सर्वापन्नाशिनि सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिनि मोदिनि सर्वशास्त्राणां भेदिनि क्षोभिणि तथा परमंत्र-तंत्र-यंत्र-विष-चूर्ण-सर्वप्रयोगादीननयेषां निर्वर्तयित्वा यत्कृतं तन्मेस्स्तु कलिपातिनि सर्वहिंसा मा कारयति अनुमोदयति मनसा वाचा कर्मणा ये देवासुर राक्षसास्तिर्यग्योनिसर्वहिंसका विरुपेकं कुर्वंति मम मंत्र-तंत्र-यंत्र-विष-चूर्ण-सर्व-प्रयोगादीनात्महस्तेन यः करोति करिष्यित्वा पातय कारय मस्तके स्वाहा।


गुरु मंत्र


ऊं हुं स्फारय स्फारय मारय मारय शत्रुवर्गान् नाशय नाशय स्वाहा।


इस मंत्र का सौ बार जप करें। मारण के लिए सफेद सरसों का प्रयोग करें।


विनियोग


ऊं अस्य श्रीमहाविपरीत प्रत्यंगिरास्तोत्र मंत्रस्य महाकालभैरवऋषि:। स्त्रिष्टुप् छन्द:। श्रीमहाविपरीत प्रत्यंगिरा देवता। हं बीजं। ह्रीं शक्ति:। क्लीं कीलकं। मम सर्वार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोग:। परमंत्र, परयंत्र, परकृत्याछेदनार्थे, सर्वशत्रु क्षयार्थे विनियोग:।


महाविपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र का माला मंत्र

ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं नमो विपरीतप्रत्यंगिरायै सहस्रानेककार्यलोचनायै कोटि विद्युज्जिह्वायै महाव्यापिन्यै संहाररूपायै जन्मशांति कारिण्यै मम सपरिवारकस्य भावि भूत भवच्छत्रु दाराप्रत्यान् संहारय संहारय महाप्रभावं दर्शय दर्शय हिलि हिलि किलि किलि मिलि मिलि चिलि चिलि भूरि भूरि विद्युज्जिह्वे ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ध्वंसय ध्वंसय प्रध्वंसय प्रध्वंसय ग्रासय ग्रासय पिब पिब नाशय नाशय त्रासय त्रासय वित्रासय वित्रासय मारय मारय विमारय विमारय भ्रामय भ्रामय विभ्रामय विभ्रामय द्रावय द्रावय विद्रावय विद्रावय हूं हूं फट् स्वाहा।


हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं विपरीतप्रत्यंगिरे हूं लं ह्रीं लं क्लीं लं ऊं लं फट फट स्वाहा। हूं लं ह्रीं क्लीं ऊं विपरीतप्रत्यंगिरे मम सपिरवारकस्य यावच्छत्रून् देवता पितृ पिशाच नाग गरुड किन्नर विद्याधर गंधर्व यक्ष राक्षस लोकपालान् ग्रह भूत नर लोकान् समन्त्रान् सौषधान् सायुधान् स-सहायान् पाणौ धिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि निकृन्तय निकृन्तय छेदय छेदय उच्चाटय उच्चाटय मारय मारय तेषां साहंकारादि धर्मान् कीलय कीलय घातय घातय नाशय नाशय विपरीतप्रत्यंगिरे स्फ्रें स्फ्रेत्कारिणी ऊं ऊं जं ऊं ऊं जं ऊं ऊं जं ऊं ऊं जं ऊं ऊं जं ऊं ठ: ऊं ठ: ऊं ठ: ऊं ठ: ऊं ठ: मम सपरिवारकस्य शत्रूणां सर्वा: विद्या: स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय हस्तौ स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय मुखं स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय नेत्राणि स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय दंतान् स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय जिह्वां स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय पादौ स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय गुह्यं स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय सकुटुम्बानां स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय स्थानं स्तंभय स्तंभय नाशय नाशय सं प्राणान् कीलय कीलय नाशय नाशय हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्री ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं फट् फट् स्वाहा। मम सपरिवारकस्य सर्वतो रक्षां कुरु कुरु फट् फट् स्वाहा।


ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रूं ह्रीं क्लीं हूं सों विपरीतप्रत्यंगिरे! मम सपरिवारकस्य भूत भविष्य च्छत्रूणामुच्चाटनं कुरु कुरु हूं हूं फट् स्वाहा। ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं वं वं वं वं वं लं लं लं लं लं रं रं रं रं रं यं यं यं यं यं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं नमो भगवति विपरीतप्रत्यंगिरे दुष्ट चांडालिनी त्रिशूल वज्रांकुश शक्ति शूल धनु: शर पाशधारिणी शत्रुरुधिर चर्म मेदो मांसाास्थि मज्जा शुक्र मेहन वसा वाक् प्राण मस्तक हेत्वादिभक्षिणी परब्रह्मशिवे ज्वालादायिनी मालिनी शत्रूच्चाटन मारण क्षोभन स्तंभन मोहन द्रावण जृम्भण भ्रामण रौद्रण संतापन यंत्र मंत्र तंत्रान्तर्याग पुरश्चरण भूतशुद्धि पूजाफल परमनिर्वाण हारण कारिणि कपालखट्वांग परशुधारिणि मम सपरिवारकस्य भूतभविष्यच्छत्रून् स-सहायान् सवाहनान् हन हन रण रण दह दह दम दम धम धम पच पच मथ मथ लंघय लंघय खादय खादय चर्वय चर्वय व्यथय व्यथय ज्वरय ज्वरय मूकान् कुरु कुरु ज्ञानं हर हर हूं हूं फट् फट् स्वाहा।


ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं विपरीतप्रत्यंगिरे ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं फट् स्वाहा। मम सपिरवारकस्य कृतमंत्र यंत्र तंत्र हवन कृतौषध विषचूर्ण शस्त्राद्यभिचार सर्वोपद्रवादिकं येन कृतं कारितं कुरुते करिष्यति वा तान् सर्वान् हन हन स्फारय स्फारय सर्वतो रक्षां कुरु कुरु हूं हूं फट् फट् स्वाहा। हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ओं ओं ओं ओं ओं ओं ओं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं फट् फट् स्वाहा। ऊं हूं ह्रीं क्लीं ऊं अं विपरीतप्रत्यंगिरे मम सपरिवारकस्य शत्रव: कुर्वन्ति करिष्यन्ति शत्रुश्च कारयामास कारयन्ति कारयिष्यन्ति याान्यायं कृत्यान्तै: सार्धं तांस्तां विपरीतां कुरु कुरु नाशय नाशय मारय मारय श्मशानस्थानं कुरु कुरु कृत्यादिकां क्रियां भावि भूत भवच्छत्रूणां यावत्कृत्यादिकां क्रियां विपरीतां कुरु कुरु तान् डाकिनीमुखे हारय हारय भीषय भीषय त्रासय त्रासय परम शमनरूपेण हन हन धर्मावच्छिन्न निर्वाणं हर हर तेषाम् इष्टदेवानां शासय शासय क्षोभय क्षोभय प्राणादि मनोबुद्ध्य हंकार क्षुत्तृष्णा कर्षण लयन आवागमन मरणादिकं नाशय नाशय हूं हूं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं फट् फट् स्वाहा।


क्षं लं हं सं षं शं वं लं रं यं मं भं बं फं पं नं धं दं थं तं णं ढं डं ठं टं ञं झं जं छं चं ङं घं गं खं कं अ: अं औं ओं ऐं एं लृं लृं ऋृं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं विपरीतप्रत्यंगिरे हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं फट् स्वाहा। क्षं लं हं सं षं शं वं लं रं यं मं भं बं फं पं नं धं दं थं तं णं ढं डं ठं टं ञं झं जं छं चं ङं घं गं खं कं अ: अं औं ओं ऐं एं लृं लृं ऋृं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं फट् स्वाहा। अ: अं औं ओं ऐं एं लृं लृं ऋृं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं ङं घं गं खं कं ञं झं जं छं चं णं ढं डं ठं टं नं धं दं थं तं मं भं बं फं पं क्षं लं हं सं षं शं वं लं रं यं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं मम सपरिवारकस्य स्थाने शत्रूणां कृत्यान् सर्वान् विपरीतान् कुरु कुरु तेषां तंत्र मंत्र तंत्रार्चन शमशानरोहण भूमिस्थापन भस्म प्रक्षेपण पुरश्चरण होमाभिषेकादिकान् कृत्यान् दूरी कुरु कुरु हूं विपरीतप्रत्यंगिरे मां सपरिवारकं सर्वत: सर्वेभ्यो रक्ष रक्ष हूं ह्रीं फट् स्वाहा।


अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं हूं ह्रीं क्लीं ऊं विपरीतप्रत्यंगिरे हूं ह्रीं क्लीं ऊं फट् स्वाहा। ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं ऊं क्लीं ह्रीं श्रीं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं विपरीतप्रत्यंगिरे मम सपरिवारकस्य शत्रूणां विपरीतक्रियां नाशय नाशय त्रुटिं कुरु कुरु तेषामिष्टदेवतादि विनाशं कुरु कुरु सिद्धम् अपनय अपनय विपरीतप्रत्यंगिरे शत्रुमर्दिनि भयंकरि नाना कृत्यामर्दिनि ज्वालिनि महाघोरतरे त्रिभुवन भयंकरि शत्रुभ्य: मम सपरिवारकस्य चक्षु: श्रोत्राणि पादौ सर्वत: सर्वेभ्य: सर्वदा रक्षां कुरु कुरु स्वाहा।


श्रीं ह्रीं ऐं ऊं वसुंधरे मम सपरिवारकस्य स्थानं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं महालक्ष्मि मम सपरिवारकस्य पादौ रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं चंडिके मम सपरिवारकस्य जंघे रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं चामुंडे मम सपरिवारकस्य गुह्यं रक्ष  रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं इंद्राणी मम सपरिवारकस्य नाभिं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं नारसिंहि मम सपरिवारकस्य बाहूं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं वाराहि मम सपरिवारकस्य हृद्यं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं वैष्णवि मम सपरिवारकस्य कंठं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं कौमारि मम सपरिवारकस्य वक्त्रं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं माहेश्वरि मम सपरिवारकस्य नेत्रे रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। श्रीं ह्रीं ऐं ऊं ब्रह्माणि मम सपरिवारकस्य शिरो रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। हूं ह्रीं क्लीं ऊं विपरीतप्रत्यंगिरे मम सपरिवारकस्य छिद्रं सर्वगात्राणि रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।


ऊं संतापिनि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् संतापय संतापय हूं फट् स्वाहा। ऊं संहारिणि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् संहारय संहारय हूं फट् स्वाहा। ऊं रौद्रि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् रौद्रय रौद्रय हूं फट् स्वाहा। ऊं भ्रामिणि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् भ्रामय भ्रामय हूं फट् स्वाहा। ऊं जृम्भिणि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् जृम्भय जृम्भय हूं फट् स्वाहा। ऊं द्राविणि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् द्रावय द्रावय हूं फट् स्वाहा। ऊं क्षोभिणि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् क्षोभय क्षोभय हूं फट् स्वाहा। ऊं मोहिनि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् मोहय मोहय हूं फट् स्वाहा। ऊं स्तंभिनि स्फ्रें स्फ्रें मम सपरिवारकस्य शत्रून् स्तंभय स्तंभय हूं फट् स्वाहा।


ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं विपरीत परब्रह्म महाप्रत्यंगिरे ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं मम सपरिवारकस्य सर्वेभ्य: सर्वत: सर्वदा रक्षां कुरु कुरु मरण भयापन पापनय त्रिजगतां पररूपवित्तायुर्मे सपरिवारकाय देहि देहि दापय साधकत्वं प्रभुत्वं च सततं देहि देहि विश्वरूपे धनं पुत्रान् देहि देहि मां सपरिवारकस्य मां पश्येत्तु देहिन: सर्वे हिंसका: प्रलयं यान्तु मम सपरिवारकस्य शत्रूणां बलबुद्धिहानिं कुरु कुरु तान् स-सहायान स्वेष्टदेवतान् संहारय संहारय स्वाचारमपनयाापनय ब्रह्मास्त्रादीनि व्यर्थीकुरु हूं हूं स्फ्रें स्फ्रें ठ: ठ: फट् फट् ऊं।


महाविपरीत प्रत्यंगिरा मंत्र का पाठ रोज करें। आपके सामने शत्रु टिक नहीं सकेगा। वह बैठने और बात करने में भी परेशान हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति के समक्ष किसी भी तरह का विरोधी कुछ देर बैठ तक नहीं सकता है। प्राकृतिक शक्ति भी निस्तेज हो जाएगी। देव-दानव तक प्रताड़ित नहीं कर सकेंगे।


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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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Thursday, October 7, 2021

पाताल भैरवी साधना--


 



पाताल भैरवी साधना-- 


यह साधना 40 दिन की होती है।इसको किसी एकांत स्थान में  बैठकर सिद्ध किया जाता है। इस साधना को अमावस्या या त्रयोदशी से शुरू करते है। 


साधक को सफेद वस्त्र ,दिशा उत्तर,सिद्ध कणिका माला से ,सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए। 


भोग में सफेद बर्फी,चावल,मदिरा ,का भोग देना चाहिए। सिद्धि के समय अनेक उपद्रव होते है। 


श्मशान की जमीन का अचानक फटना,बड़े बड़े डरावने ब्रह्मराक्षस ,दैत्य,नरमुंड आदि दिखाई देना आदि होते है। 40 वे दिन भूमि फाड़ कर पाताल भैरवी ऊपर आती है।


साधक यदि डरा नही तो वचन देकर षट्कर्म करती है। यदि साधक भयभीत हो गया तो उस समय साधक पाताल भैरवी का महा भयानक रूप देखकर मोहित नही होना चाहिए


मन्त्र- 


ॐ पाताल भैरवी त्रिकाल कल्प ॐ तरु तरु स्वाहा ॐ कल्प कल्प स्वाहा।।


साधना समाग्री दक्षिणा === 1500


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Monday, October 4, 2021

योनि- महालक्ष्मी कामाख्या महामंत्र ' की अघोर रहस्यमयी साधना


 


योनि- महालक्ष्मी कामाख्या महामंत्र ' की  अघोर रहस्यमयी साधना


गहराई से विचार करें तो मानव-जीवन में तुष्टि, पुष्टि, सृष्टि और सुख-समृद्धि की वृष्टि करनेवाली एकमात्र देवी भगवती 'योनि-लक्ष्मी' ही हैं | जिस घर में स्त्री-योनि संतुष्ट रहती है, वहाँ सभी प्रकार की शांति और संपदा स्वत: आकर विराजमान हो जाती हैं |


'योनि-तंत्र' की साधना वस्तुत: त्रिगुणात्मक आद्याशक्ति की ही उपासना है - योनि के ऊपरी भाग में कमल की पंखुड़ियों को सदृश भगोष्ठों के मध्य कमलासना लक्ष्मी, मध्य के गह्वर में महाकाली तथा मूल में स्थित गर्भनाल (कमलनाल) में सरस्वती की स्थिति कही गई है -


"कार्तिकी कुंतलंरूपं योन्युपरि सुशोभितम् ......."

या

"योनिमध्ये महाकाली छिद्ररूपा सुशोभना ....."


आदि-आदि श्लोकों में इसी त्रिगुणात्मिका शक्ति की ही अभ्यर्थना की गई है |


इसलिए 'कामतंत्र' में स्त्री (योनि) की संतुष्टि ही सभी प्रकार की ऋद्धि-सिद्धि और समृद्धि का आधार मानी गई है | यानी जिस घर में स्त्री असंतुष्ट-अतृप्त रहती है, वहाँ दु:ख, दरिद्रता, कलह और रोग-शोक आदि का साम्राज्य हो जाता है | 


शायद इसीलिए शास्त्रों ने यह उद्घोष किया है कि -


"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता |"


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योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा। 

रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा।।


.......................


लिंग पूजा पूरे विश्व में होती है ,सभी बड़ी ख़ुशी से छू छू कर करते हैं ,पर योनी पूजा के नाम पर नाक भौं सिकुड़ता है ,जबकि मूल उत्पत्ति कारक यही है | इसे मूर्खता और छुद्र मानसिकता नहीं तो और क्या कहेंगे |    


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सम्भोग का अर्थ है सम+भोग यथा एक दसरे का बराबर भोग करना 

भोग मात्र शारीरिक नहीं होता भोग के कई स्वरुप है भोग जिससे आनंद की अनुभूति हो जोकि किसी एक तरीके से बंधा नहीं है या शारीरिक सुख भी उसका ही स्वरुप है,किसी भी शक्ति की पूर्ण संतुष्टि के लिए साधक को हर तरह से उसे प्रसन्न करने के लिए तत्पर होना चाहिए...


"योनिमध्ये महाकाली छिद्ररूपा सुशोभना ....."


इस बीज मंत्र का उपयोग करने के लिए प्रतिदिन सुबह उठकर स्नानादि करने के बाद शुद्ध हो जाएं, उसके बाद अपने पूजा गृह में मां कामाख्या की एक कामाख्या देवी यंत्र स्थापित करें और उस यंत्र के आगे धूप और दिया दे | उसके पश्चात  निम्म्न दिए गए इस बीज मंत्र का 125 माला जप करें, मंत्र जप करते समय मन में मां कामाख्या का स्मरण करें और साथ ही जो भी आपकी मनोकामनाएं हैं उसकी पूर्ति हेतु मां कामाख्या से प्रार्थना करें | इस तरह एक 9 दिनों तक इसी तरह मंत्रों का जाप करें उसके पश्चात आप खुद ही देखेंगे कि आपके घर में हर तरह की सुख समृद्धि, धन का आगमन व्यापार व्यवसाय में वृद्धि होने लगेगी 


कामाख्या यंत्र को स्थापित करे तथा निम्न रूप से उसका पूजन करे.


ॐ श्रीं स्त्रीं गन्धं समर्पयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं पुष्पं समर्पयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं धूपं आध्रापयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं दीपं दर्शयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं नैवेद्यं निवेदयामि |


साधक को पूजन में तेल का दीपक लगाना चाहिए तथा भोग के रूपमें कोई भी फल या स्वयं के हाथ से बनी हुई मिठाई अर्पित करे. इसके बाद साधक निम्न रूप से न्यास करे. इसके अलावा इस प्रयोग के लिए साधक देवी यंत्र का अभिषेक शहद से करे.


करन्यास


ॐ श्रीं स्त्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः

ॐ महापद्मे तर्जनीभ्यां नमः

ॐ पद्मवासिनी मध्यमाभ्यां नमः

ॐ द्रव्यसिद्धिं अनामिकाभ्यां नमः

ॐ स्त्रीं श्रीं कनिष्टकाभ्यां नमः

ॐ हूं फट करतल करपृष्ठाभ्यां नमः


हृदयादिन्यास


ॐ श्रीं स्त्रीं हृदयाय नमः

ॐ महापद्मे शिरसे स्वाहा

ॐ पद्मवासिनी शिखायै वषट्

ॐ द्रव्यसिद्धिं कवचाय हूं

ॐ स्त्रीं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्

ॐ हूं फट अस्त्राय फट्


न्यास के बाद साधक को देवी कामाख्या का ध्यान करना है.


इस प्रकार ध्यान के बाद साधक देवी के निम्न मन्त्र की 125  माला मन्त्र जाप करे. साधक यह जाप शक्ति माला,   से करे तो उत्तम है. अगर यह कोई भी माला उपलब्ध न हो तो साधक को स्फटिक माला या रुद्राक्ष माला से जाप करना चाहिए.


मंत्र -


क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः

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किसी भी एक मंत्र का जाप रात्रि काल में ९ से ३ बजे के बीच करना चाहिये.


साधना से पहले गुरु से कामाख्या दीक्षा लेना लाभदायक होता है.


साधक यह क्रम 9 दिन तक करे. 9 दिन जाप पूर्ण होने पर साधक शहद से इसी मन्त्र की १०८ आहुति अग्नि में समर्पित करे. इस प्रकार यह प्रयोग 9 दिन में पूर्ण होता है. 


साधक की धनअभिलाषा की पूर्ति होती है


चेतावनी - 


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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...