Saturday, July 30, 2016

धूमावती

धूमावती पार्वती का एक रूप हैं। इस रूप में उन्हें बहुत भूख लगी और उन्होंने महादेव से कुछ खाने को माँगा। महादेव ने थोड़ा ठहरने के लिये कहा। पर पार्वती क्षुधा से अत्यंत आतुर होकर महादेव को निगल गई। महादेव को निगलने पर पार्वती को बहुत कष्ट हुआ।

धूमावती साधना विधान

- अष्ठमी अमास्या अथवा रविवार के दिन सम्पन्न करें।
- रात्री 9 बजे से 12 बजे के मधय करें।
- पश्चिम दिशा की ओर मुह करके ऊनी आसन पर बैठें।
- लाल वस्त्र लाल धोती का प्रयोग करें ।
- ऐकांत स्थल पर साधना करें।
- अपने सामने चोकी पर लाल वस्त्र बिछाकर धूमावती का चित्र स्थापित करें ।
- यन्त्र को जल से धोकर उअस पर कुमकुम  से तीन बिन्दु लाइन से लगा लें।
- धूप दीप जला दें ओर पुजन प्रारम्भ करें ।

विनियोग:

अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ॠषि, र्निवृच्छन्द:, ज्येष्ठा देवता , 'धूं' बिजं, स्वाहा शक्ति:, धूमावती किलकं ममाभिष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग: ।

हाथ में लिये हुए जल को भुमि पर या किसी पात्र में छोड दें ।

ॠष्यादि न्यास :

ॐ पिप्पलाद ॠषये नम: शिरसे
ॐ र्निवृच्छन्दसे नम: मुखे
ॐ ज्येष्ठा देवतायै नम: हृद्धि
ॐ धूं बिजाय नम: गुह्ये
ॐ स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो
ॐ धूमावती किलकाय नम: नभौ
ॐ विनियोगाय नम:सर्वांगे

कर  न्यास :

ॐ धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नम:
ॐ धू तर्जनिभ्याम नम:
ॐ मां मधयाभ्याम नम:
ॐ वं अनामिकाभ्याम नम:
ॐ तीं कनिष्टकाभ्याम नम:
ॐ स्वाहा करतल कर पृष्टाभ्याम नम:

संकल्प :

 दाहिने हाथ मेइन जल लेकर संकल्प करें -
अमुक मास अमुक दिन अमुक  गोत्र अमुक  नाम समस्त शत्रु भय, व्याधि निवार्णाय दु:ख दारिद्र विनाशाय श्री धूमावती साधना करिष्ये ।
जल को भुमी पर छोड़ दें ।

धयान :

दोनो हाथ जोड कर भगवती धूमावती का धयान करें :

अत्युच्चा मलिनाम्बराखिल जनौ द्वेगावहा दुर्मना
रुक्षाक्षित्रितया विशालद्शना सुर्योदरी चंचला ।
तस्वेदाम्बुचित्ता क्षुधाकुल तनु: कृष्णातिरुक्षाप्रभा ;
धयेया मुक्तक्त्वा सदाप्रिय कलिर्धुमावती मन्त्रिणा ।

फिर 51 माला का जाप करें।

मन्त्र:
धूं धूं धूमावती ठ: ठ:

ऐसा 11 दिन करें।

माला यंत्र को  अगले दिन कभी भी किसी निर्जन स्थान पर दबा दें। पिछे मुड कर ना देखें । चाहे तो किसी नदी या सरोवर में भी प्रवाहित कर सकते हैं । घर आकर हाथ मुह धो लें ।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Thursday, July 28, 2016

बगलामुखी कवच

यदि बगलामुखी कवच आपतक पहुँच जाए तो यह मत समझियेगा- कि यह आपके भाग्य पर मिला है.यह तो माँ का आशीर्वाद है- कि आप भाग्यशाली हैं. कि इस कवच को आप धारण करते हैं. मैं ऐसा विश्वास करता हूँ- कि माँ के दिशा निर्देश से पूर्ण शास्त्रीय ढंग से निर्माण करता हूँ. कवच का निर्माण तांत्रिक क्रिया है.

जिसमे एक दिव्य शक्ति का समावेश होता है. इसका निर्माण माँ के इच्छा अनुसार होता है मानव तो मात्र एक कठपुतली के समान है. इससे मुझे यकीन है- कि रक्षा कवच सिर्फ काम ही नहीं करता बल्कि यह प्रमाणित होता है.

                    »» यदि कोई मनुष्य अपने शरीर और कुल का कल्याण चाहता है तो इस कवच को आवश्य धारण करना चाहिए.

                    »»सुरक्षा कवच कि सहायता से मनुष्य अपने मनोकामना को पूर्ण करता है और एक सफल जीवन जीता है.

                    »»सुरक्षा कवच के धारण से मनुष्य निर्भीक साहसी हो जाता है, वह हर क्षेत्र में उन्नति करता है और खुशहाल जीवन जीता है.

                    »»जो मनुष्य सुरक्षा कवच धारण किए हुए हैं उसके उपस्थिति मात्र से सभी बुरे तांत्रिक क्रिया काला जादू आदि बुरी शक्ति नष्ट हो जाती है.

                     »»बगलामुखी सुरक्षा कवच धारण किए हुए व्यक्ति से जो न आँखों से दिखाई देता है और जो मनुष्य के जीवन पर गलत प्रभाव देतें हैं इससे दूर रहते हैं. सरल भाषा   में यदि कहा जाए तो किसी भी प्रकार की नकारात्मक उर्जा से यह कवच उसका बचाव करता है.

                    »»इसे धारण किए हुए व्यक्ति अपने से बड़े अधिकारियों से सम्मान प्राप्त करता है. यह कवच बुद्धि को स्थिर करके उनके कार्य करने कि शक्ति को बढ़ाता है.

                    »»इस कवच के धारणकर्ता के व्यक्तित्व मे निखार आता है. वह समाज मे सम्मान प्राप्त करता है, उसका नाम और प्रसिद्धि चारों दिशाओं में फैलता है.

 राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम
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Sunday, July 24, 2016

TRATAK SE DHYAN KI OR                                                                                                    

योग शास्त्र के अनुसार हमारे शरीर में नाड़ियों के गुच्छों के रूप में सात चक्र स्थापित हैं जिन्हें सुप्त अवस्था में रहने देना है या जागृत करके उनसे मिलने वाले लाभों से खुद के जीवन को संवारना है यह स्वत: हम पर निर्भर करता है....यह बात हर उस आम व्यक्ति पर लागू होती है जिसे साधनाओं से कोई लेना देना नहीं होता पर जो व्यक्ति अपने जीवन में साधनाएं करते हैं वो जानते हैं की इन चक्रों की उन्के साधनात्मक जीवन में क्या महत्ता है|
वैसे तो हर चक्र का अपना एक विशेष महत्व है पर हमारे भूमध्य में स्थित आज्ञाचक्र का हमारे साधनात्मक जीवन से बड़ा लेनादेना है और वो इसलिए क्योंकि यह चक्र हमारी आँखों के बिलकुल मध्य में स्थित है जहाँ तीसरा नेत्र स्थापित होता है और साधना में आप कितनी तल्लीनता से बैठे हैं या आपका ध्यान कितना भटक रहा है ये सारा खेल यहीं से शुरू होता है ....पर यदि आपको याद हो तो मन से संबंधित लेख में हमने एक बहुत गुढ़ तथ्य को समझा था की –

     “ यदि भ्रम से बचना है तो भ्रम से होने वाले फायदों और नुक्सान को तिलांजली दे दो “

इस कथन का सरल सा अर्थ यह है की वो चीज़ जिसे आप जानते हो की नहीं है उसके पीछे भागना व्यर्थ है .....पर साधना के समय ऐसा नहीं हो पाता.....उस समय तो हमारी मानसिक स्थिति ऐसी होती है जैसे ईश्वर ने समस्त ब्रह्मांड का दायितत्व हमारे कंधो पर ड़ाल दिया हो और यह स्थिति तब तक ज्यों की त्यों रहती है जब तक हम साधना से उठ नहीं जाते, ऐसा होता है यह हम सब जानते हैं पर क्यों होता है इस पर यदा-कदा ही विचार करते हैं| पर असल में यह कभी-कभी नहीं बल्कि रोज विचारने वाला विषय है क्योंकि साधना या मंत्र जाप करने का अर्थ होता है की वो समय हमारा और हमारे इष्ट का है पर उस समय में भी अगर हम ज़माने भर की बातें सोच रहे हैं तो उससे अच्छा है हम आसन पर बैठे ही नहीं क्योंकि मात्र माला चला लेने से, या आँखें मूंद कर बैठ जाने से कोई भगवान कभी खुश नहीं होते ......और साधना में हमारी ऐसी दशा का कारण होता है हमारा मन ......क्योंकि  

 “ जो ज्ञानी होते है वो जानते हैं की मन ना तो भरोसेमंद मित्र है और ना ही आज्ञाकारी सेवक, हम इसे निर्देशित तो कर सकते हैं पर नियंत्रित कदापि नहीं “

.....पर जो सिद्ध सन्यासी होते हैं उनके साथ उनका मन ऐसा खेल कभी नहीं खेलता क्योंकि वो इस तथ्य से पूर्णतः परिचित होते हैं की असल में मन जैसी कोई चीज होती ही नहीं....यह सिर्फ एक भ्रम है, छलावा है और अगर विज्ञान की दृष्टि से इस बात की पुष्टि की जाए तो आपको चिकित्सक कभी किसी ऐसे शारीरिक अंग के बारे में नहीं बताएंगे जिसका नाम “ मन “ हो क्योंकि ऐसा कुछ होता ही नहीं है|

 हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली एक विशेष प्रकार की ऊर्जा या यूँ कहें की तरंग को हमने मन का नाम दे दिया है जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं हैं क्योंकि ऊर्जा हमेशा तब तक अनियंत्रित रहती है जब तक आपको उसका सदुपयोग समझ में ना आ जाये| हमारे अंदर निरंतर बनने वाली ऊर्जा को नियंत्रण में करने के लिए पहले हमें इसके मूल को समझना पड़ेगा जहाँ से इस ऊर्जा का निर्माण होता है|

......हम शरीर में सत, रज, और तम तीनों गुण कम या अधिक अनुपात में मौजूद हैं और हमारे मन या विचारों की गति और कार्य करने की क्षमता इन तीनों गुणों से हमेशा प्रभावित होती है और जिस समय आपके अंदर जिस गुण की प्रधानता होगी उस समय मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा, जिसे हमने मन का संबोधन दिया है, उसी तरफ जायेगी क्योंकि यह एक प्राकृतिक नियम है की ऊर्जा का प्रवाह हमेशा शक्ति के घनत्व की तरफ ही होता है और यही कारण है की हम हमेशा एक जैसे काम कभी नहीं करते.....कभी हम साधू होते है तो कभी.....
साधना में मन या अपने विचारों को स्थिर रखने के लिए ध्यान मार्ग, योग मार्ग इत्यादि में हजारों तरीके बताए गए हैं पर उन सब विधियों से उपर अगर कोई शक्ति या क्रिया है जो आपको अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर करती सकती है...तो वो हैं आप खुद हो क्योंकि आपको आपसे ज्यादा अच्छे से ओर कोई नहीं जानता| इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आपने आज तक अपने विचारों को एकाग्र करने के लिए किन-किन नियमों का पालन किया है क्योंकि आपके द्वारा किये गए सारे क्रिया कलाप व्यर्थ हो जाते हैं जब तक आपकी आँखे स्थिर नहीं हो जाती ओर आँखों को स्थिर करने के लिए आपको खुद को थकाने की कोई जरूरत नहीं है....यदि किसी चीज़ की जरूरत है तो वो है खुद को दोष मुक्त करने की....

 हम सब यह तो जानते हैं की मन या विचारों को नियंत्रित करना अत्यंत दुष्कर है....पर हमें यह तथ्य भी पता होना चाहिए की चेतना कभी मलीन या दूषित नहीं होती, ये तो हमारी आत्मा की एक तरंग है जिसे हमें बस सही दिशा दिखानी होती है और इस चेतना को हम सही दिशा तभी दिखा पायेंगे जब हमें इसका सही मार्ग पता हो| हठयोग में ६ तरह की अलग – अलग क्रियाएँ बताई गयी हैं

 जिनमें से त्राटक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह हमारी मानसिक शान्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति को भी बढ़ाता है|

हमारे मस्तिष्क में तरंगों के रूप में विचार हमेशा आते-जाते रहते हैं पर जब हम त्राटक का अभ्यास करते हैं तो इन विचारों के आने जाने से शतिग्र्स्त होने वाली ऊर्जा का ७० प्रतिशत हम पुन्ह: प्राप्त कर लेते हैं और वो इसलिए क्योंकि अब हमारी दौड़ विचारों को पकड़ने की ना होकर आँखों को स्थिर करने की है और यदि आप कोशिश करेंगे तो आप जानेंगे की विचारों की तुलना में आँखों की पुतलियों को स्थिर करना ज्यादा सहज भी है और कारागार भी| और यह एक बार नहीं हजारों बार अनुभूत की गयी क्रिया है की जैसे ही आपकी आँखों की पुतलियाँ स्थिर होती हैं...आपका मन भी आपके नियंत्रण में आ जाता है और इसका पता हमें चलता है शक्ति चक्र के मध्य में स्थित बिंदु के स्थिर हो जाने से|

 त्राटक दो तरीकों से किया जा सकता है-

१) बाह्य त्राटक

२) आंतरिक त्राटक

बाह्य त्राटक में आपको अपना ध्यान शक्ति चक्र के मध्य में स्थित बिंदु पर केंद्रित करना होता है जिससे आध्यात्मिक स्तर पर आप अपने विचारों पर नियंत्रण करने की कला सीखते हो और भौतिक स्तर पर आपकी आँखों में स्वत: ही किसी को भी सम्मोहित करने की क्षमता पैदा हो जाती है|

आंतरिक त्राटक में आपको अपने आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करना होता है....और इस क्रिया में आपको अपनी आँखों की पुतलियों को भूमध्य में केंद्रित करना पड़ता है जिससे शुरूआती दिनों में थोड़ा दर्द हो सकता है| इस त्राटक को सफलतापूर्वक करने से जहाँ आपके आज्ञाचक्र में स्पंदन होना शुरू हो जाता है.....वहीँ आप काल विखंडन साधना को करने की पात्रता भी अर्जित कर लेते हो|

भौतिक स्तर पर त्राटक का नियमित अभ्यास आपके सोचने, समझने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है और आपने अंदर नाकारात्मक ऊर्जा को नष्ट भी करता है.....बस आपको एक बात हमेशा ध्यान में रखनी है की आप जब भी त्राटक का अभ्यास करो तो आपके चारों तरफ शान्ति हो और इसीलिए सुबह का समय इसके लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है|

 यहाँ दिया गया मंत्र त्राटक की इस क्रिया में शीघ्रातिशीघ्र सफल होने में आपकी सहायता करेगा पर मंत्र अपना काम तभी दक्षता से करेगा जब आप नियमित रूप से इस क्रिया का अभ्यास करेंगे वो भी बस १० से १५ मिनट तक|  आपको मात्र शांत बैठ कर सदगुरुदेव प्रदत्त निम्न मंत्र का १०-१५ मिनट गुंजरन करना है.ये सुषुम्ना को जाग्रत कर आपके लक्ष्य प्राप्ति को सरल और सुगम कर देता है.

ॐ क्लीं क्लीं क्रीं क्रीं हुं हुं फट् ||

(OM KLEEM KLEEM KREEM KREEM HUM HUM PHAT)

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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ग्रह बाधा निवारण का एक अनूठा उपाय

आप और हम में से शायद कोई ही ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी न किसी ग्रह बाधा से पीड़ित नहीं होगा.

ग्रहों के खेल में ही इंसान की पूरी जिंदगी उलझी रह जाती है..

ग्रह बाधा दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय उपलब्ध हैं, कुछ तांत्रिक, कुछ मांत्रिक, और कुछ रत्नों से जुड़े हुए..

लेकिन इन सब से हटकर एक विचित्र ग्रह बाधा निवारण प्रयोग आज दिया जा रहा है जिसका आप सभी लाभ उठा सकते हैं..

ग्रह बाधा को हटाने के लिए एक स्नान विधि बताई जा रही है, जिसके बहुत ही धनातम्क परिणाम प्राप्त हुए हैं.

इस स्नान के लिए निम्नांकित पदार्थों को एक मिटटी की हांडी में रखकर उस हांडी को जल से भर दिया जाता है.

जल भरकर हांडी के मुख को एक ढक्कन से ढँक दिया जाता है. नियमित स्नान के समय इस हांडी में से एक कटोरी जल भर कर के आप अपने स्नान के जल में मिला लें.

हांडी में से जल निकालने के पश्चात उसमे उतना ही बाहरी शुद्ध जल डाल दें.

इस प्रकार ४० दिन तक यह प्रयोग करें.

प्रयोग के दौरान ही अच्छे परिणाम दिखाई देने लगेंगे.

स्नान में प्रयुक्त पदार्थ निम्न हैं.

१-      चावल         - एक मुट्ठी भर
२-      सरसों          - एक मुट्ठी भर
३-      नागर मोथा     - एक मुट्ठी भर
४-      सुखा आँवला    - एक मुट्ठी भर
५-      दूर्वा(दूब घाँस)   - २१ नग
६-      तुलसी पत्र      - २१ नग
७-      बेल पत्र        - २१ नग (३-३ पर्ण वाले)
८-      हल्दी          - २ गाँठ

नोट: इन पदार्थों के सड़ने से कभी कभी अत्यधिक दुर्गन्ध आती है. यदि वह असहनीय प्रतीत हो तो संपूर्ण पदार्थ किसी वृक्ष की जद में डालकर पुनः उक्त पदार्थों को उसी हांडी में नए सिरे से ले लें..

ज्यादा ताम झाम न होते हुए यह एक सरल प्रयोग है..

  प्रयोग करें और परिणाम बताएँ...

राजगुरु जी

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Monday, July 18, 2016

ध्यान रखें : खजाना या गड़ा धन मिलने से पहले कुछ ऐसा होने लगता है

ऐसा माना जाता है कि खजाना हर किसी व्यक्ति को नहीं मिल सकता। जिसकी किस्मत में अचानक अपार धन प्राप्त करने के योग हैं वहीं गुप्त खजाना प्राप्त कर सकता है। अचानक धन लाभ होने से पहले आपको किस्मत के इशारे मिलते हैं।

ये इशारे सपने में और खुली आखों से या आसपास होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के रूप में महसुस होते हैं। धन लाभ के लिए कई तरह के संकेत होते हैं। रावण संहिता के अनुसार सपने, शगुन और स्वर विज्ञान उनमें से एक है।

खास तौर से किन लोगों को महसुस होता है गड़ा धन-
सपने में कुआं देखना भी गड़ा खजाना मिलने का एक संकेत हैं। अगर जमीन में छुपा खजाना आपको मिलने वाला है तो अक्सर आपको सपने में कोई गड्डा, छोटा कुआं या खाई दिखने लगेगी। जमीन में छुपा खजाना अक्सर साफ दिल वाले लोगों को ही मिलता है या उन लोगों को मिलता है जिनके मन में कोई छल, कपट नहीं होता।

कुछ लोगों को पितृ देवता का इष्ट होता है ऐसे लोगों को सपने में अक्सर सफेद सांप या दीपक जलते हुए दिखाई देते हैं और उन लोगों को गड़ा धन या खजाना अचानक मिल जाता है या महसुस होता है।

कुछ खास लोग होते हैं जिन्हे गड़ा धन या खजाना महसुस हो जाता है, ये वो लोग होते हैं जो पैर की तरफ से जन्म लेते हैं यानी जिनके जन्म के समय पहले सिर बाहर न आते हुए पैर बाहर आते हैं।

कैसे निकालें खजाना या गड़ा धन :
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गड़ा धन निकानले के लिए सबसे पहले निश्चित करें कि किस जगह धन है। उस जगह को पहले पवित्र करें और उस स्थान की पूजा करें। पुराणों के अनुसार ऐसी जगहों पर विशेष शक्तियों का पहरा होता है। गड़े धन या खजाने की रक्षा नाग लोक करता है। नाग योनी पितृ देवताओं की होती है। पितृ ही गड़े धन की रक्षा नाग के रूप में करते हैं। इस खजानें को बिना पितृ की आज्ञा से नहीं निकालना चाहिए। पहले पितृ देवताओं को खुश करना चाहिए। इसके लिए उनके निमित्त हवन और दान कर के धन
सही उपयोग का संकल्प लेना चाहिए। गड़े धन का बड़ा हिस्सा धर्म-कर्म, दान और पितृ पूजा में लगाने का संकल्प लेना चाहिए।
शुभ तिथि और वार को या किसी खास पर्व, ग्रहों के शुभ संयोग या अपनी कुंडली के अनुसार शुभ दिन निकलवाकर उस दिन गड़ा धन निकालना चाहिए। धन निकालन के पहले होने वाली पूजा भी शुभ तिथि या पितृ की तिथि यानी पंचमी, अमावस्या या पूर्णिमा पर पूजा पाठ करवाना चाहिए। पूजा करवाने के बाद पितृ आपको सपने में दर्शन देते हैं अगर सपने में पितृ देव आपको धन निकालने की आज्ञा दें तो ही धन निकालना चाहिए ।

कहां मिलता है खजाना:
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रावण संहिता और वाराह संहिता के अनुसार गुप्त खजाना कहां छिपा होता है? यह मालूम करने के कई उपाय बताए गए हैं। जिस भी स्थान पर अपार धन, सोना-चांदी, हीरे-मोती छिपे या दबे होते हैं वहां सफेद नाग या कोई बहुत पुराना नाग अवश्य दिखाई देता है। इसके अलावा कहीं-कहीं नागों के झूंड भी ऐसे गुप्त खजानों की रक्षा करते हैं। ऐसे नागों का दिखाई देना ही इस बात की ओर इशारा करता है कि उस क्षेत्र में कहीं खजाना दबा हो सकता है।

कईं साल पुराने घरों में खजाना छुपा हो सकता है। ऐसे घरों में जो पितृ के समय से ज्यों के त्यों पड़ें हों या जिन घरो में सालों से कोई खुदाई या नव निर्माण नहीं किया गया हो ऐसी जगहों पर खजाना या गड़ा धन होता है।
पूराने किलें जहां कभी राजा-महाराजा रहा करते थे। खंडहरों में भी खजाना छुपा होता है क्योंकि वहां पर शक्तियों को परेशान करने वाला कोई नहीं होता और इंसानो से दुर इनकी अपनी अलग दुनिया होती है।

जंगलों में भी ऐसे खजाने मिलते हैं क्योंकि पहले के लोग ज्यादातर समय युद्ध में और जंगलों में बीताते थे। धन की रक्षा के लिए वो उसे जमीन में छुपा दिया करते थें और मौत के बाद सांप के रूप में वो उसी जगह बस जाते हैं और धन की रक्ष करते हैं।

कैसे सपने बताते हैं खजाने के बारे में

सांप या नाग :

- अगर आपको सपने में सफेद सांप दिखाई दे तों समझिए आपको अचानक धन लाभ होने वाला है। नाग पितृ देवता के रूप में विचरण करते हैं और योग्य व्यक्ति को सपने में आकर दर्शन देते हैं।

- सपने में सफेद नाग-नागिन का जोड़ा जिस घर में या जिस स्थान पर दिखें उस जगह पर आपके पूर्वजों द्वारा रखा गया गड़ा धन होता है।

फूल-

- अगर सपने में फूल दिखाई दे तो आपको अचानक धन लाभ, खजाना या कहीं से गड़ा धन मिलने का संकेत होता है।

- रावण संहिता के अनुसार आपको सपने में दिखने वाला फूल अगर कमल हो तो ये अचानक कहीं से आपको बड़ा फायदा होने का संकेत है।

- अगर आप सपने में में इन्द्र धनुष के साथ कमल को देखते हैं यानी इन्द्र धनुष दिखे और कमल का फूल आपके हाथ हो तो आने वाले 45 दिनों में ही आपको इस सपने का फल देखने को मिल जाता है। अगर आप सपने में कमल के पत्ते पर भोजन करते हुए खुद को देखते हैं तो आपको आने वाले कुछ ही दिनों में छुपा हुआ धन लाभ होने वाला है।

आभूषण और मंगल चिन्ह

अगर सपने में कलश, शंख और सोने के गहने दिखे तो आपको अचानक धन लाभ होगा। रावण संहिता के अनुसार कलश, शंख और गहने आदि मंगल चीजे सपने तभी आती है जब आप पर लक्ष्मी जी खुश होती है।

पौराणिक ग्रंथों और संहिताओं के अनुसार कुछ सपने ऐसे होते हैं जो जैसे के तैसे सच हो जाते हैं।

- अगर आपको सपने में कोई कन्या जो खुद सोने के आभूषण पहने हुए हो और वो आपको सोने का सिक्का दे तो आने वाले कुछ ही दिनों में आपको इस सपने का फल मिल जाएगा।

- कलश सिर पर रखे हुए अगर कोई कन्या सपने में आपको सिक्का दे या किसी दिशा में इशारा करें तो उस दिशा में आपको गड़ा धन मिलेगा।

हरे पेड़ या पीपल-

- अगर आप सपने में पिपल पर कच्च दुध चढ़ा रहे हैं तो आपको पुर्वजों का धन मिलेगा अगर आपके निवार स्थान वाला पिपल हो तो आपको वहीं धन लाभ होगा लेकिन पिपल नहीं कटवाना चाहिए इससे परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

- अगर आपको सपने में पिपल का पेड़ या उस पेड़ पर कोई सफेद कपड़ें में बैठकर आपको किसी दिशा की तरफ इशारा करे तो आपको वहां से धन लाभ होगा।

पानी-

जिस घर, किले या खंडहर में धन छुपा होता है सपने में उसी जगह पर पानी भरा हुआ दिखाई देता है।

उस पानी में खुद को बहते हुए देखना या उस जगह सिर्फ पानी को बहते देखना खजाना या गड़ा धन मिलने का संकेत हैं।

सपने में जिस जगह पर पानी में कमल, शंख और कलश बहते दिखाई दें तो समझें आपको उस जगह से गड़ा धन प्राप्त होने वाला है।

पूराने मंदिर-

अगर आपको खजाना मिलने वाला है तो आपको ऐसे पूराने मंदिरो के सपने आएंगे जो

कई साल पूराने हों। ऐसे मन्दिरों में आपको घंटीयां बजती हुई सुनाई देंगी। ऐसे मन्दिर शिव या नाग देवता के हों तो आपको धन लाभ होने के योग बनते हैं।

- आपको पूरानी भगवान की मुर्तियां या नाग की मुर्तियां जब दिखने लगे तो समझना चाहिए कि धन लाभ होने वाला है।

- ऐसे सपने खास तौर पर पंचमी, अमावस्या या पूर्णिमा को दिखाई दे तो समझना चाहिए सपने का फल जल्दी ही मिलने वाला है।

सफेद हाथी-

अगर आपको सपने में ऐरावत या सफेद हाथी का दर्शन हो तो आपको अचानक धन लाभ होगा। सफेद हाथी आपको जिस जगह दिखे उस जगह ही गड़ा धन होना जानना चाहिए।

सपने में हाथी दांत से बनी चिजें धारण करना भी शुभ स्वपन होता है। ऐसा सपना तभी आता है जब आपको गड़ा धन या अचानक कहीं से धन लाभ के योग होते हैं।

मल और गाली गलौज युक्त झगड़ा-

अगर सपने में आप मल देखें या खुद को शरीर पर मल लगाते देखें तो आपको अचानक धन लाभ होगा।

सपने में खुद को ऐसी जगह देखना जहां मल ही मल हो, ये भी धन लाभ का सपना है।

अगर आप सपने में खुद को गाली-गलौज युक्त लड़ाई में देख रहे हैं, लेकिन सुबह तक गाली-गलौज आपको याद न रहें तो ये भी आपका रूका पैसा आने का संकेत होता है।

नेवला-

रावण संहिता के अनुसार नेवला धन संकेत देने वाला जीव है। अगर आप किसी सुनसान जगह हों या ऐसे जंगल में हो जहां नेवेले अधिक हो तो आपको उस जगह से गड़ा धन जरूर मिलेगा।

अगर किसी पूराने मंदिर, खंडहर या पुराने घर में हो और वहां पर नेवला आपके आसपास रहे तो वहां आस-पास धन गड़ा हुआ समझना चाहिए।

उल्लु-

पक्षी तंत्र के अनुसार उल्लू धन के संकेत देने वाला होता है। जिन जगहों पर गड़ा धन या खजाना होता है। वहां उल्लूूू पाए जाते हैं। तंत्र शास्त्रों में उल्लू को धन की रक्षा करने वाला माना जाता है। उल्लू जिस घर या मंदिर में रहने लग जाए तो समझे उस जगह गड़ा धन या खजाना होगा और जहां उल्लू रहने लग जाते हैं ऐसी जगह जल्दी ही सुनसान हो जाती है

राजगुरु जी

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तिलोत्तमा अप्सरा

तिलोत्तमा अप्सरा की गिनती भी श्रेष्ठ अप्सराओं मे होती हैं। यह अप्सरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो ही रुप मे साधक की सहायता करती रहती हैं। यह साधना अनुभुत हैं। इस साधना को करने से सभी सुखो की प्राप्ति होती हैं। इस साधना को शुरु करते ही एक – दो दिन में धीमी धीमी खुशबू का प्रवाह होने लगता हैं। यह खुशबू तिलोत्तमा के सामने होने की पूर्व सुचना हैं। अप्सरा का प्रत्यक्षीकरण एक श्रमसाध्य कार्य हैं। मेहनत बहुत ही जरुरी हैं। एक बार अप्सरा के प्रत्यक्षीकरण के बाद कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता, इसमे कोई दोराय नहीं हैं। यह प्रक्रिया आपकी सेवा में प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ। सामान्यतः अप्सरा साधना भी गोपनीयता की श्रेष्णी में आती हैं। सभी को इस प्रकार की साधना जीवन मे एक बार सिद्ध करने की पुरी कोशिश करनी चाहिए क्योंकि कलियुग में जो भी कुछ चाहिए वो सब इस प्रकार की साधना से सहज ही प्राप्त किया जा सकता हैं। इन साधनाओं की अच्छी बात यह हैं कि इन साधनाओं को साधारण व्यक्ति भी कर सकता हैं मतलब उसको को पंडित तांत्रिक बनाने की कोई अवश्यकता नहीं हैं।

साधक स्नान कर ले अगर नही भी कर सको तो हाथ-मुहँ अच्छी तरह धौकर, धुले वस्त्र पहनकर, रात मे ठीक 10 बजे के बाद साधना शुरु करें। रोज़ दिन मे एक बार स्नान करना जरुरी है। मंत्र जाप मे कम्बल का आसन रखे और अप्सरा और स्त्री के प्रति सम्मान आदर होना चाहिए। अप्सरा , गुरु, धार्मिक ग्रंथो और विधि मे पुर्ण विश्वास होना चाहिए, नहीं तो सफलत होना मुश्किल हैं। अविश्वास का साधना मे कोई स्थान नही है। साधना का समय एक ही रखने की कोशिश करनी चाहिए।

एक स्टील की प्लेट मे सारी सामग्री रख ले। साधना करते समय और मंत्र जप करते समय जमीन को स्पर्श नही करते। माला को लाल या किसी अन्य रंग के कपडे से ढककर ही मंत्र जप करे या गौमुखी खरीदे ले। मंत्र जप को अगुँठा और माध्यमा से ही करे । मंत्र जपते समय माला मे जो अलग से एक दान लगा होता हैं उसको लांघना नहीं है मतलब जम्प नहीं करना हैं। जब दुसरी माला शुरु हो तो माला के आखिए दाने/मनके को पहला दान मानकर जप करें, इसके लिए आपको माला को अंत मे पलटना होगा। इस क्रिया का बैठकर पहले से अभ्यास कर लें।

पूजा सामग्री:-

सिन्दुर, चावल, गुलाब पुष्प, चौकी, नैवैध, पीला आसन, धोती या कुर्ता पेजामा, इत्र, जल पात्र मे जल, चम्मच, एक स्टील की थाली, मोली/कलावा, अगरबत्ती,एक साफ कपडा बीच बीच मे हाथ पोछने के लिए, देशी घी का दीपक, (चन्दन, केशर, कुम्कुम, अष्टगन्ध यह सभी तिलक के लिए))

विधि :

पूजन के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-सुथरे आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके बैठ जाएं। पूजन सामग्री अपने पास रख लें।

बायें हाथ मे जल लेकर, उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर, शरीर और पूजन सामग्री पर छिड़क लें या पुष्प से अपने को जल से छिडके।
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ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
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(निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए शिखा/चोटी को गांठ लगाये / स्पर्श करे)
ॐ चिद्रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते। तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥
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(अपने माथे पर कुंकुम या चन्दन का तिलक करें)
ॐ चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रं पापनाशनम्। आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥
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(अपने सीधे हाथ से आसन का कोना जल/कुम्कुम थोडा डाल दे) और कहे
ॐ पृथ्वी! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥
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संकल्प:- दाहिने हाथ मे जल ले।
मैं ........अमुक......... गोत्र मे जन्मा,................... यहाँ आपके पिता का नाम.......... ......... का पुत्र .............................यहाँ आपका नाम....................., निवासी.......................आपका पता............................ आज सभी देवी-देव्ताओं को साक्षी मानते हुए देवी तिलोत्त्मा अप्सरा की पुजा, गण्पति और गुरु जी की पुजा देवी तिलोत्त्मा अप्सरा के साक्षात दर्शन की अभिलाषा और प्रेमिका रुप मे प्राप्ति के लिए कर रहा हूँ जिससे देवी तिलोत्त्मा अप्सरा प्रसन्न होकर दर्शन दे और मेरी आज्ञा का पालन करती रहें साथ ही साथ मुझे प्रेम, धन धान्य और सुख प्रदान करें।
जल और सामग्री को छोड़ दे।
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गणपति का पूजन करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः। ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
गुरु पुजन कर लें कम से कम गुरु मंत्र की चार माला करें या जैसा आपके गुरु का आदेश हो।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणि नमोअस्तुते
ॐ श्री गायत्र्यै नमः। ॐ सिद्धि बुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।
ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः। ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।
ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।
ॐ भ्रं भैरवाय नमः का 21 बार जप कर ले।
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अब अप्सरा का ध्यान करें और सोचे की वो आपके सामने हैं।

दोनो हाथो को मिलाकर और फैलाकर कुछ नमाज पढने की तरफ बना लो। साथ ही साथ “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं तिलोत्त्मा अप्सरा आगच्छ आगच्छ स्वाहा” मंत्र का 21 बार उचारण करते हुए एक एक गुलाब थाली मे चढाते जाये। अब सोचो कि अप्सरा आ चुकी हैं।

हे सुन्दरी तुम तीनो लोकों को मोहने वाली हो तुम्हारी देह गोरे गोरे रंग के कारण अतयंत चमकती हुई हैं। तुम नें अनेको अनोखे अनोखे गहने पहने हुये और बहुत ही सुन्दर और अनोखे वस्त्र को पहना हुआ हैं। आप जैसी सुन्दरी अपने साधक की समस्त मनोकामना को पुरी करने मे जरा सी भी देरी नही करती। ऐसी विचित्र सुन्दरी तिलोत्तमा अप्सरा को मेरा कोटि कोटि प्रणाम।
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इन गुलाबो के सभी गन्ध से तिलक करे। और स्वयँ को भी तिलक कर लें।
ॐ अपूर्व सौन्दयायै, अप्सरायै सिद्धये नमः।
मोली/कलवा चढाये : वस्त्रम् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
गुलाब का इत्र चढाये : गन्धम समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
फिर चावल (बिना टुटे) : अक्षतान् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
पुष्प : पुष्पाणि समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
अगरबत्ती : धूपम् आघ्रापयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
दीपक (देशी घी का) : दीपकं दर्शयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
मिठाई से पुजा करें।: नैवेद्यं निवेदयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
फिर पुजा सामप्त होने पर सभी मिठाई को स्वयँ ही ग्रहण कर लें।
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पहले एक मीठा पान (पान, इलायची, लोंग, गुलाकन्द का) अप्सरा को अर्प्ति करे और स्वयँ खाये। इस मंत्र की स्फाटिक की माला से 21 माला जपे और ऐसा 11 दिन करनी हैं।
ॐ क्लीं तिलोत्त्मा अप्सरायै मम वश्मनाय क्लीं फट
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यहाँ देवी को मंत्र जप समर्पित कर दें। क्षमा याचना कर सकते हैं। जप के बाद मे यह माला को पुजा स्थान पर ही रख दें। मंत्र जाप के बाद आसन पर ही पाँच मिनट आराम करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः।
यदि कर सके तो पहले की भांति पुजन करें और अंत मे पुजन गुरु को समर्पित कर दे।
अंतिम दिन जब अप्सरा दर्शन दे तो फिर मिठाई इत्र आदि अर्पित करे और प्रसन्न होने पर अपने मन के अनुसार वचन लेने की कोशिश कर सकते हैं।
पुजा के अंत मे एक चम्मच जल आसन के नीचे जरुर डाल दें और आसन को प्रणाम कर ही उठें।
॥ हरि ॐ तत्सत ॥
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नियम जिनका पालन अधिक से अधिक इस साधना मे करना चाहिए वो सब नीचे लिखे हैं।

ब्रह्मचरी रहना परम जरुरी होता हैं अगर कुछ विचारना हैं तो केवल अपने ईष्‍ट का या ॐ नमः शिवाय या अप्सरा का ध्यान करें, आप सदैव यह सोचे कि वो सुन्दर सी अप्सरा आपके पास ही मौजुद हैं और आपको देख रही हैं। ऐसी अवस्था मे क्या शोभनीय हैं आप स्वयँ अन्दाजा लगा सकते हैं।

भोजन: मांस, शराब, अन्डा, नशे, तम्बाकू, तामसिक भोजन आदि सभी से ज्यादा से ज्यादा दुर रहना हैं। इनका प्रयोग मना ही हैं। केवल सात्विक भोजन ही करें क्योंकि यह काम भावना को भडकाने का काम करते हैं। मंत्र जप के समय कृपा करके नींद्, आलस्य, उबासी, छींक, थूकना, डरना, लिंग को हाथ लगाना, सेल फोन को पास रखना, जप को पहले दिन निधारित संख्या से कम-ज्यादा जपना, गा-गा कर जपना, धीमे-धीमे जपना, बहुत् ही ज्यादा तेज-तेज जपना, सिर हिलाते रहना, स्वयं हिलते रहना, मंत्र को भुल जाना (पहले से याद नहीं किया तो भुल जाना), हाथ-पैंर फैलाकर जप करना यह सब कार्य मना हैं। मेरा मतलब हैं कि बहुत ही गम्भीरता से मंत्र जप करना हैं। यदि आपको पैर बदलने की जरुरत हो तो माला पुरी होने के बाद ही पैरों को बदल सकते हैं या थोडा सा आराम कर सकते हैं लेकिन मंत्र जप बन्द ना करें।

यदि आपको सिद्धि चाहिए तो भगवन श्री शिव शंकर भगवान के कथन को कभी ना भुलना कि "जिस साधक की जिव्हा परान्न (दुसरे का भोजन खाना) से जल गयी हो, जिसका मन में परस्त्री (अपनी पत्नि के अलावा कोई भी) हो और जिसे किसी से प्रतिशोध लेना हो उसे भला केसै सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं"।

यदि उसे एक बार भी प्रेमिका की तरह प्रेम/पुजा किया तो आने मे कभी देरी नही करती है। साधना के समय वो एक देवी मात्र ही हैं और आप साधक हैं। इनसे सदैव आदर से बात करनी चाहिए। समस्त अप्सराएँ वाक सिद्ध होती हैं।

किसी भी साधना को सीधे ही करने नही बैठना चाहिए। उससे पहले आपको अपना कुछ अभ्यास करना चाहिए। मंत्रो का उचारण कैसे करना है यह भी जान लेना चाहिए और बार बार बोलकर अभ्यास कर लेना चाहिए।

ऐसा करने पर अप्सरा जरुर सिंद्ध होती हैं बाकी जो देवी कालिका की इच्छा क्योंकि होता वही हैं जो देवी जगत जननी चाहती हैं। साधना से किसी को नुकसान पहुँचाने पर साधना शक्ति स्वयँ ही समाप्त होने लगती हैं। इसलिए अपनी साधना की रक्षा करनी चाहिए। किसी को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरुरत नहीं हैं। यहाँ कोई किसी के काम नहीं आता हैं लेकिन फिर भी कभी कभार किसी ना किसी जो बहुत ही जरुरत मन्द हो की सहायता करी जा सकती हैं। वैसे यह साधना साधक का ही ज्यादा भला करने वाले हैं।

मैं तो इतना ही कहुगाँ कि इस साधना को नए साधक और ऐसे आदमी को जरुर करना चाहिए जो देवी देवता मे यकीन ना रखता हो। यदि ऐसे लोगों थोडा सा विश्वास करके भी इस साधना को करते हैं तो उन्हें कुछ ना कुछ अच्छे परिणाम जरुर मिलने चाहिए। यदि किसी को साधना करने मे कोई दिक्कत हो रही हैं तो हमसे भी सम्पर्क (ईमेल का पता सबसे उपर दिया गया हैं) किया जा सकता हैं। यदि पहली बार में साधना मे सिद्धि प्राप्त नहीं हो रही है तो आप सहायता के लिए ईमेल कर सकते हैं। देवी माँ आपको सभी सिद्धि प्रदान करें इस कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Saturday, July 16, 2016

श्री तारा महाविद्या प्रयोग

          सृष्टि की उत्तपत्ति से पहले घोर अन्धकार था, तब न तो कोई तत्व था न ही कोई शक्ति थी, केवल एक अन्धकार का साम्राज्य था, इस परलायाकाल के अन्धकार की देवी थी काली, उसी महाअधकार से एक प्रकाश का बिन्दु प्रकट हुआ जिसे तारा कहा गया, यही तारा अक्षोभ्य नाम के ऋषि पुरुष की शक्ति है, ब्रहमांड में जितने धधकते पिंड हैं सभी की स्वामिनी उत्तपत्तिकर्त्री तारा ही हैं, जो सूर्य में प्रखर प्रकाश है उसे नीलग्रीव कहा जाता है, यही नील ग्रीवा माँ तारा हैं, सृष्टि उत्तपत्ति के समय प्रकाश के रूप में प्राकट्य हुआ इस लिए तारा नाम से विख्यात हुई किन्तु देवी तारा को महानीला या नील तारा कहा जाता है क्योंकि उनका रंग नीला है, जिसके सम्बन्ध में कथा आती है कि जब सागर मंथन हुआ तो सागर से हलाहल विष निकला, जो तीनों लोकों को नष्ट करने लगा, तब समस्त राक्षसों देवताओं ऋषि मुनिओं नें भगवान शिव से रक्षा की गुहार लगाई, भूत बावन शिव भोले नें सागर म,अन्थान से निकले कालकूट नामक विष को पी लिया, विष पीते ही विष के प्रभाव से महादेव मूर्छित होने लगे, उनहोंने विष को कंठ में रोक लिया किन्तु विष के प्रभाव से उनका कंठ भी नीला हो गया, जब देवी नें भगवान् को मूर्छित होते देख तो देवी नासिका से भगवान शिव के भीतर चली गयी और विष को अपने दूध से प्रभावहीन कर दिया, किन्तु हलाहल विष से देवी का शरीर नीला पड़ गया, तब भगवान शिव नें देवी को महानीला कह कर संबोधित किया, इस प्रकार सृष्टि उत्तपत्ति के बाद पहली बार देवी साकार रूप में प्रकट हुई, दस्माहविद्याओं में देवी तारा की साधना पूजा ही सबसे जटिल है, देवी के तीन प्रमुख रूप हैं

१) उग्रतारा २) एकाजटा और ३) नील सरस्वती
देवी सकल ब्रह्म अर्थात परमेश्वर की शक्ति है, देवी की प्रमुख सात कलाएं हैं जिनसे देवी ब्रहमांड सहित जीवों तथा देवताओं की रक्षा भी करती है ये सात शक्तियां हैं

१) परा २) परात्परा ३) अतीता ४) चित्परा ५) तत्परा ६) तदतीता ७) सर्वातीता

इन कलाओं सहित देवी का धन करने या स्मरण करने से उपासक को अनेकों विद्याओं का ज्ञान सहज ही प्राप्त होने लगता है, देवी तारा के भक्त के बुद्धिबल का मुकाबला तीनों लोकों मन कोई नहीं कर सकता, भोग और मोक्ष एक साथ देने में समर्थ होने के कारण इनको सिद्धविद्या कहा गया है |

देवी तारा ही अनेकों सरस्वतियों की जननी है इस लिए उनको नील सरस्वती कहा जाता हैदेवी का भक्त प्रखरतम बुद्धिमान हो जाता है जिस कारण वो संसार और सृष्टि को समझ जाता हैअक्षर के भीतर का ज्ञान ही तारा विद्या हैभवसागर से तारने वाली होने के कारण भी देवी को तारा कहा जाता हैदेवी बाघम्बर के वस्त्र धारण करती है और नागों का हार एवं कंकन धरे हुये हैदेवी का स्वयं का रंग नीला है और नीले रंग को प्रधान रख कर ही देवी की पूजा होती हैदेवी तारा के तीन रूपों में से किसी भी रूप की साधना बना सकती है समृद्ध, महाबलशाली और ज्ञानवानसृष्टि की उतपाती एवं प्रकाशित शक्ति के रूप में देवी को त्रिलोकी पूजती हैये सारी सृष्टि देवी की कृपा से ही अनेक सूर्यों का प्रकाश प्राप्त कर रही हैशास्त्रों में देवी को ही सवित्राग्नी कहा गया हैदेवी की स्तुति से देवी की कृपा प्राप्त होती है |

स्तुति . . .

प्रत्यालीढ़ पदार्पिताग्ध्रीशवहृद घोराटटहासा पराखड़गेन्दीवरकर्त्री खर्परभुजा हुंकार बीजोद्भवा,खर्वा नीलविशालपिंगलजटाजूटैकनागैर्युताजाड्यन्न्यस्य कपालिके त्रिजगताम हन्त्युग्रतारा स्वयं

देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता हैगृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिएदेवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैंलाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्नदेवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पतादेवी की मूर्ती पर रुद्राक्ष चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती हैमहाविद्या तारा के मन्त्रों से होता है बड़े से बड़े दुखों का नाश |

देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र है. . .

श्री सिद्ध तारा महाविद्या महामंत्र

" ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट "

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे
1. बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है

2.मधु. शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है

3.घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण होता है।

4. काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।

देवी के तीन प्रमुख रूपों के तीन महा मंत्रमहाअंक-देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं तारा ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है -

"1"विशेष पूजा सामग्रियां-पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती हैसफेद या नीला कमल का फूल चढ़ानारुद्राक्ष से बने कानों के कुंडल चढ़ानाअनार के दाने प्रसाद रूप में चढ़ानासूर्य शंख को देवी पूजा में रखनाभोजपत्र पर ह्रीं लिख करा चढ़ानादूर्वा,अक्षत,रक्तचंदन,पंचगव्य,पञ्चमेवा व पंचामृत चढ़ाएंपूजा में उर्द की ड़ाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करेंसभी चढ़ावे चढाते हुये देवी का ये मंत्र पढ़ें-

" ॐ क्रोद्धरात्री स्वरूपिन्ये नम: "

१) देवी तारा मंत्र - ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट

२) देवी एक्जता मंत्र - ह्रीं त्री हुं फट

३) नील सरस्वती मंत्र - ह्रीं त्री हुं

सभी मन्त्रों के जाप से पहले अक्षोभ्य ऋषि का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिएसबसे महत्पूरण होता है देवी का महायंत्र जिसके बिना साधना कभी पूरण नहीं होती इसलिए देवी के यन्त्र को जरूर स्थापित करे व पूजन करेंयन्त्र के पूजन की रीति है-

पंचोपचार पूजन करें-धूप,दीप,फल,पुष्प,जल आदि चढ़ाएं,

" ॐ अक्षोभ्य ऋषये नम: मम यंत्रोद्दारय-द्दारय"

कहते हुये पानी के 21 बार छीटे दें व पुष्प धूप अर्पित करेंदेवी को प्रसन्न करने के लिए सह्त्रनाम त्रिलोक्य कवच आदि का पाठ शुभ माना गया हैयदि आप बिधिवत पूजा पात नहीं कर सकते तो मूल मंत्र के साथ साथ नामावली का गायन करेंतारा शतनाम का गायन करने से भी देवी की कृपा आप प्राप्त कर सकते हैंतारा शतनाम को इस रीति से गाना चाहिए-

"तारणी तरला तन्वी तारातरुण बल्लरी,तीररूपातरी श्यामा तनुक्षीन पयोधरा,तुरीया तरला तीब्रगमना नीलवाहिनी,उग्रतारा जया चंडी श्रीमदेकजटाशिरा"
 देवी को अति शीघ्र प्रसन्न करने के लिए अंग न्यास व आवरण हवन तर्पण व मार्जन सहित पूजा करेंअब देवी के कुछ इच्छा पूरक मंत्

1) देवी तारा का भय नाशक मंत्र

"ॐ त्रीम ह्रीं हुं"

नीले रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करेंपुष्पमाला,अक्षत,धूप दीप से पूजन करेंरुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करेंमंदिर में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता हैनीले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखेंपूर्व दिशा की ओर मुख रखेंआम का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

2) शत्रु नाशक मंत्र

 "ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौ: हुं उग्रतारे फट"

नारियल वस्त्र में लपेट कर देवी को अर्पित करेंगुड से हवन करेंरुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करेंएकांत कक्ष में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता हैकाले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखेंउत्तर दिशा की ओर मुख रखेंपपीता का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

3) जादू टोना नाशक मंत

्र "ॐ हुं ह्रीं क्लीं सौ: हुं फट"

 देसी घी ड़ाल कर चौमुखा दीया जलाएंकपूर से देवी की आरती करेंरुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें

4) लम्बी आयु का मंत्र

"ॐ हुं ह्रीं क्लीं हसौ: हुं फट"

 रोज सुबह पौधों को पानी देंरुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करेंशिवलिंग के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता हैभूरे रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखेंपूर्व दिशा की ओर मुख रखेंसेब का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

5) सुरक्षा कवच का मंत्र

"ॐ हुं ह्रीं हुं ह्रीं फट"

देवी को पान व पञ्च मेवा अर्पित करेंरुद्राक्ष की माला से 3 माला का मंत्र जप करेंमंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखेंकिसी खुले स्थान में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता हैकाले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखेंउत्तर दिशा की ओर मुख रखेंकेले व अमरुद का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएंदेवी की पूजा में सावधानियां व निषेध-बिना "अक्षोभ ऋषि" की पूजा के तारा महाविद्या की साधना न करेंकिसी स्त्री की निंदा किसी सूरत में न करेंसाधना के दौरान अपने भोजन आदि में लौंग व इलाइची का प्रयोग नकारेंदेवी भक्त किसी भी कीमत पर भांग के पौधे को स्वयं न उखाड़ेंटूटा हुआ आइना पूजा के दौरान आसपास न रखें

राजगुरु जी

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Friday, July 15, 2016

धूत विजय करक प्रयोग

जो लोग जुआ , सट्टा , मटका , रेसकोर्स , इत्यादि खेलने के शौक़ीन हों अथवा जिन्होंने इस शौक को ही अपना व्यापार बना रखा हो तो जुए इत्यादि में निरंतर सफलता प्राप्त के लिए उन्हें इस प्रयोग को अवशय ही सम्पन्न कर के लाभ उठाना चाहिए .

सामग्री ;;----- स्वर्णाकर्षण गुटिका ( मंत्र सिद्धि प्राण - प्रतिष्ठित ) तेल का दीपक
माला ;-- विद्दुत माला ( मंत्र सिद्धि चैतन्य )
समय ;-- रात का कोई भी समय
दिन ;;--- शुक्रवार
धारणीय वस्त्र ;;---- सफ़ेद रंग की धोती
आसन ;;-- सफ़ेद रंग का सूती आसन
दिशा ;;--- उत्तर
जाप संख्या ;;-- इक्कीस हजार ( २१००० )
अवधि -- इस्क्किस दिन

मंत्र ;;-----

'' ॐ नमो वीर बैताल आकस्मिक धन देहि देहि नमः '''

प्रयोग विधि ;;---

किसी भी शुक्रवार की रात्रि को यह प्रयोग करें . अपने दाहिने हाथ में स्वर्णाकर्षण गुटिका लेकर उसे पहले भली प्रकार से देखें , फिर सामने रख कर तेल का दीपक लगाकर उपरोक्त मंत्र का इक्कीस हजार जाप करें , जप के बाद इक्कीस दिनों में वह स्वर्णाकर्षण गुटिका गुटिका सिद्धि हो जाती हैं . जब यह गुटिका सिद्धि हो जाये तो जब भी किसी जुए में जावें अथवा जुआ खेले या रेसकोर्स में जाये तो इस स्वर्णाकर्षण गुटिका को अपनी जेब में रखकर ले जाने से सफलता प्राप्त हो सकती हैं ,

नोट - 

साधको को सूचित किया जाता हैं की हर चीज की अपनी एक सीमा होती हैं , इसलिए किसी भी साधना का प्रयोग उसकी सीमा में ही रहकर करे , और मानव होकर मानवता की सेवा करे अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाएँ ,.

राजगुरु जी

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शत्रु नाशक बगला प्रयोग

जिस साधक पर भगवती बगलामुखी की कृपा हो जाती है, उसके शत्रु कभी अपने षड़यंत्र मे सफल नही हो पाते है.क्युकी भगवती का मुद्गर उन शत्रुओ की समस्त क्रियाओ को निस्तेज कर देता है.प्रस्तुत साधना उन साधको के लिये है,जो शत्रू के कारण समस्याओ से घिर जाते है.वैसे दरिद्रता,रोग,दुख ये भी माँ कि दृष्टि मे आपके शत्रू ही है.अतः सभी को यह साधना करनी करनी चाहिये.यह साधना आपको २६ तारीख को करना है.किसी कारणवश ना कर पाये तो किसी भी रविवार को करे.समय रात्रि १० के बाद का रखे.आसन वस्त्र पिले हो.आपका मुख उत्तर की और होना चाहिये.सामने बाजोट रखकर उस पर पिला वस्त्र बिछा दे.और वस्त्र पर पिले सरसो कि एक ढ़ेरी बनाये.इस ढ़ेरी पर एक मिट्टि का दिपक सरसो का तेल डालकर प्रज्जवलित करे.ईसके अतिरिक्त किसी सामग्री की आवश्यक्ता नही है.दिपक की सामान्य पुजन कर गुड़ का भोग अर्पित करे.अब संकल्प ले .

हे माता बगलामुखी हर शत्रू से,रोगो से,दुखो से,दरिद्रता से तथा हर कष्ट प्रद स्थिती से रक्षा हेतु मै यह प्रयोग कर रहा हु.आप मेरी साधना को स्विकार कर.मुझे सफलता प्रदान करे.

अब निम्न मंत्र कि पिली हकीक माला,हल्दि माला,अथवा रूद्राक्ष माला से २१ माला करे.

क्रीं ह्लीं क्रीं सर्व शत्रू मर्दिनी क्रीं ह्लीं क्रीं फट्

Kreem hleem kreem sarv shatru mardini kreem hleem kreem phat

यह मंत्र महाकाली समन्वित बगला मंत्र है.जो कि अत्यंत तिव्र है.ईसका जाप वाचिक कर पाये तो उत्तम होगा अन्यथा उपांशु करे.पंरतु मानसिक ना करे.जाप समाप्त होने के बाद.घृत मे सरसो मिलाकर १०८ आहुति प्रदान करे.इस प्रकार साधना पुर्ण होगी.साधना के बाद पुनः स्नान करना आवश्यक है.

अगले दिन गुड़,सरसो पिला वस्त्र किसी वृक्ष के निचे रख आये.यह एक दिवसीय प्रयोग साधक को शत्रू से मुक्त कर देता है.साधक चाहे तो साधना को ३,७, या २१ दिवस के अनुष्ठान रूप मे भी कर सकता है.

राजगुरु जी

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Wednesday, July 13, 2016

मातंगी :-

ऊं ह्लीं एं श्रीं नमो भगवति उच्छिष्ट चांडालि श्रीमातंगेश्वरि सर्वजन वंशकरि स्वाहा

इस मंत्र का पुरश्चरण दस हजार जप है। जप का दशांश शहद व महुआ के पुष्पों से होम करना चाहिए। काम्य प्रयोग से पूर्व एक हजार बार मूलमंत्र का जाप करके पुन: शहदयुक्त महुआ के पुष्पों से होम करना चाहिए। पलाश के पत्तों या पुष्पों के होम से वशीकरण, मल्लिका के पुष्पों के होम से लाभ, बिल्व पुष्पों से राज्य प्राप्ति, नमक से आकर्षण होता है।

राजगुरु जी

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TEEVRA त्रिशक्ति JAAGRAN साधना

क्रिया ज्ञान इच्छा स शक्तिः

इस ब्रह्माण्ड में आदि शक्ति के अनंत रूप अपने अपने सुनिश्चित कार्यों को गति प्रदान करने के लिए तथा ब्रह्माण्ड के योग्य संचालन के लिए अपने नियत क्रम के अनुसार वेगवान है. यही ब्रह्मांडीय शक्ति के मूल तिन द्रश्य्मान स्वरुप को हम महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली के रूप में देखते है. तांत्रिक द्रष्टि से यही तिन शक्तियां सर्जन, पालन तथा संहार क्रम की मूल शक्तियां है जो की त्रिदेव की सर्वकार्य क्षमता का आधार है.
यही त्रिदेवी ब्रह्माण्ड की सभी क्रियाओ में सूक्ष्म या स्थूल रूप से अपना कार्य करती ही रहती है. तथा यही शक्ति मनुष्य के अंदर तथा बाह्य दोनों रूप में विद्यमान है. मनुष्य के जीवन में होने वाली सभी घटनाओ का मुख्य कारण इन्ही त्रिशक्ति के सूक्ष्म रूप है

ज्ञानशक्ति

इच्छाशक्ति

क्रियाशक्ति

ज्ञान, इच्छा तथा क्रिया के माध्यम से ही हमारा पूर्ण अस्तित्व बनता है, चाहे वह हमारे रोजिंदा जीवन की शुरूआत से ले कर अंत हो या फिर हमारे सूक्ष्म से सूक्ष्म या वृहद से वृहद क्रियाकलाप. हमारे जीवन के सभी क्षण इन्ही त्रिशक्ति के अनुरूप गतिशील रहते है.

वस्तुतः जेसा की शाश्त्रो में कहा गया है मनुष्य शरीर ब्रह्माण्ड की एक अत्यंत ही अद्भुत रचना है. लेकिन मनुष्य को अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं है, उसकी अनंत क्षमताएं सुप्त रूप में उसके भीतर ही विद्यमान होती है.  इसी प्रकार यह त्रिशक्ति का नियंत्रण वस्तुतः हमारे हाथ में नहीं है और हमें इसका कोई ज्ञान भी नहीं होता है. लेकिन अगर हम सोच के देखे तो हमारा कोई भी सूक्ष्म से सूक्ष्म कार्य भी इन्ही तीनों शक्तियों में से कोई एक शक्ति के माध्यम से ही संपादित होता है. योगीजन इन्ही शक्तियों के विविध रूप को चेतन कर उनकी सहायता प्राप्त करते हुवे ब्रह्माण्ड के मूल रहस्यों को जानने का प्रयत्न करते रहते है.

न सिर्फ आध्यात्मिक जीवन में वरन हमारे भौतिक जीवन के लिए भी इन शक्तियों का हमारी तरफ अनुकूल होना कितना आवश्यक है यह सामन्य रूप से कोई भी व्यक्ति समज ही सकता है.

ज्ञान शक्ति एक तरफ आपको जीवन में किस प्रकार से आगे बढ़ कर उन्नति कर सकते है यह पक्ष की और विविध अनुकूलता दे सकती है

वहीँ दूसरी और जीवन में प्राप्त ज्ञान का योग्य संचार कर विविध अनुकूलता की प्राप्ति केसे करनी है तथा उनका उपभोग केसे करना है यह इच्छाशक्ति के माध्यम से समजा जा सकता है

क्रिया शक्ति हमें विविध पक्ष में गति देती है तथा किस प्रकार प्रस्तुत उपभोग को अपनी महत्तम सीमा तक हमें अनुकूलता तथा सुख प्रदान कर सकती है यह तथ्य समजा देती है.

प्रस्तुत साधना, इन्ही त्रिशक्ति को चेतन कर देती है जिससे साधक अपने जीवन के विविध पक्षों में स्वतः ही अनुकूलता प्राप्त करने लगता है, न ही सिर्फ भौतिक पक्ष में बल्कि आध्यात्मिक पक्ष में भी.
साधक के नूतन ज्ञान को प्राप्त करने तथा उसे समजने में अनुकूलता प्राप्त होने लगती है. किसी भी विषय को समजने में पहले से ज्यादा साधक अनुकूलता अनुभव करने लगता है. अपने अंदर की विविध क्षमता तथा कलाओं के बारे में साधक को ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसके लिए क्या योग्य और क्या अयोग्य हो सकता है इससे सबंध में भी साधक की समज बढ़ाने लगती है.
इच्छाशक्ति की वृद्धि के साथ साधक विविध प्रकार के उन्नति के सुअवसर प्राप्त होने लगते है तथा साधक को अपने ज्ञान का उपयोग किस प्रकार और केसे करना है यह समज में आने लगता है. उदहारण के लिए किसी व्यक्ति के पास व्यापार करने का ज्ञान है लेकिन उसके पास व्यापर करने की कोई क्षमता नहीं है या उस ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग हो नहीं पा रहा है तो इच्छाशक्ति के माध्यम से यह संभव हो जाता है.

क्रियाशक्ति के माध्यम से साधक अपनी इच्छाशक्ति में गति प्राप्त करता है. अर्थात किसी भी कार्य का ज्ञान है, उसको करने के लिए मौका भी है लेकिन अगर वह क्रिया ही न हो जो की परिणाम की प्राप्ति करवा सकती है तो सब बेकार हो जाता है. क्रिया शक्ति वाही परिणाम तक साधक को ले जाती है तथा एक स्थिरता प्रदान करती है.
त्रिशक्ति से सबंधित यह तीव्र प्रयोग निश्चय ही एक गुढ़ प्रक्रिया है. वास्तव में अत्यंत ही कम समय में साधक की तिन शक्तियां चैतन्य हो कर साधक के जीवन को अनुकूल बनाने की और प्रयासमय हो जाती है. इस प्रकार की साधना की अनिवार्यता को शब्दों के माध्यम से आँका नहीं जा सकता है वरन इसे तो मात्र अनुभव ही किया जा सकता है. साधना प्रयोग का विधान कुछ इस प्रकार है.
इस साधना को साधक किसी भी शुभदिन से शुरू कर सकता है, समय रात्रि में ९ बजे के बाद का रहे.
साधक सर्व प्रथम स्नान आदि से निवृत हो कर लाल वस्त्र को धारण कर लाल आसन पर बैठ जाए.

साधक का मुख उत्तर दिशा की और रहे.

अपने सामने बाजोट पर या किसी लकड़ी के पट्टे पर साधक को लाल वस्त्र बिछा कर उस पर एक भोजपत्र या सफ़ेद कागज़ पे एक अधः त्रिकोण कुमकुम से बनाना है. तथा उसके तीनों कोण में बीज को लिखना है. इस यंत्र निर्माण के लिए साधक चांदी की सलाका का प्रयोग करे तो उत्तम है. अगर यह संभव न हो तो साधक को अनार की कलम का प्रयोग करना चाहिए. साधक उस यंत्र का सामान्य पूजन करे. तथा दीपक प्रज्वलित करे. दीपक किसी भी तेल का हो सकता है.

साधक सर्व प्रथम गुरुपूजन गणेशपूजन तथा भैरवपूजन कर गुरु मन्त्र का जाप करे. उसके बाद साधक निम्न मन्त्र की २१ माला मंत्र जाप करे.



इस मंत्र जाप के लिए साधक मूंगा माला का प्रयोग करे.

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं फट्

(om hreeng shreeng kreeng phat)

साधक अगले दो दिन यह क्रम जारी रखे. अर्थात कुल ३ दिन तक यह प्रयोग करना है. प्रयोग पूर्ण होने के बाद साधक उस यन्त्र को पूजा स्थान में ही स्थापित कर दे.

 माला को प्रवाहित नहीं किया जाता है. साधक ऊस माला का प्रयोग वापस इस मंत्र की साधना के लिए कर सकता है तथा निर्मित किये गए यन्त्र के सामने ही मंत्रजाप को किया जा सकता है. साधक को यथा संभव छोटी बालिकाओ को भोजन कराना चाहिए तथा वस्त्र दक्षिणा आदि दे कर संतुष्ट करना चाहिए.

राजगुरु जी

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तीव्र आकर्षण साधना –गुमशुदा व्यक्ति को बुलाने के लिए)

व्यक्तियों को वापिस बुलाने के लिए मैंने इस साधना का प्रभाव बहुत अचरजकारी है. और अन्य मन्त्रों के बजाय इसे सिद्ध करने में कोई दिक्कत भी नहीं आती, नवरात्री में १०,००० की संख्या में इस मन्त्र को कर लेने से ये सिद्ध हो जाता है , सामने तीव्र आकर्षण यन्त्र या पारद शिवलिंग रख कर मूंगा माला से इस मंत्र को १४ माला नित्य करने से ९ दिन में ये साधना सिद्ध हो जाती है. मन्त्र सिद्ध हुआ या नहीं इसका परीक्षण करने के बिनोला,पीली सरसों,तथा चूहे के बिल की मिटटी को मिला निम्न मंत्र से १०८ बार अभिमंत्रित करे,और एक सरकंडे को बीच में से चीर कर दो अलग अलग लोगो को जोर से पकडे रहने के लिए दे दे , और मन्त्र पढ़ कर उस अभिमंत्रित मिश्रण को उस सरकंडे पर मारे .यदि सरकंडा आपस में जुड जाये तो समझ ले की सफलता मिल गयी है .

    फिर जब भी किसी खोये हुए व्यक्ति को वापिस बुलाना हो तो मध्य रात्रि में खोये हुए व्यक्ति का चित्र अथवा वस्त्र सामने रख उस पर अभिमंत्रित पिष्टी को ५४० बार मंत्र का उच्चारण करते हुए मारे. यदि व्यक्ति जीवित है तो निश्चय ही शीघ्र अतिशीघ्र वो वापिस आ जाता है.

मन्त्र- ॐ नमो भगवते रुद्राय ए दृष्टि लेखि नाहर : स्वाहा,
       दुहाई कंसासुर की जूट-जूट ,फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा .  

राजगुरु जी

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Monday, July 11, 2016

DISCLAIMER: *** : –1. मन्त्रों का प्रभाव और परिणाम हमेशा साधक के विश्वास व् श्रद्धा पर आधारित होता है।
2. E-BOOKS OR BLOG में जो भी मंत्र दिए गए है केवल सूचनार्थ ही है अन्यथा अगर साधना करनी है तो वो पूर्ण जानकार गुरु के निर्देशन में ही करने लाभदायक होंगे, किसी भी नुक्सान के लिए प्रकाशक व् लेखक जिम्मेदार नहीं होगा।
3. आगंतुक अगर ब्लॉग को नहीं देखना चाहता तो ही ईबूक्स खरीदे अन्यथा ब्लॉग पर ही सभी मंत्र दिए गए है।
4. मारण कर्म का प्रयोग तभी करना है जब आपके अपने प्राण संकट में हो और कोई भी रास्ता आपके बचने का न हो तब आप अपनी रक्षा के लिए इसका प्रयोग कर सकते है। अन्यथा इसका प्रयोग आपको पाप का भागीदार बना देगा ।





Wednesday, July 6, 2016

इस तरह पूजा करने से होते हैं हनुमानजी के दर्शन

     

हनुमानजी को रूद्रावतार भी कहा जाता है। वह भगवान शिव की तरह ही जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्त की हर इच्छा पूरी करते हैं। यूं तो हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए कई तरीके हैं फिर भी कुछ विशेष तांत्रिक प्रयोगों के द्वारा उनके न केवल दर्शन किए जा सकते हैं वरन उनसे मनचाहा वरदान भी पाया जा सकता है।

हनुमान प्रत्यक्ष दर्शन साधना भी ऎसी ही एक तांत्रिक विधि है जिसके द्वारा हनुमानजी के दर्शन होते हैं। इस साधना को किसी मंदिर या गुप्त स्थान पर ही किया जाता है। यदि किसी नदी के कि नारे एकांत स्थान या पर्वत पर स्थित मंदिर में किया जाए तो ज्यादा बेहतर होता है। कुल मिलाकर साधना का स्थान पूर्णतया पवित्र, शांत और शुद्ध होना चाहिए।

पूजा के पहले करें ये तैयारियां

इस पूजा के लिए आपको सबसे पहले सफेद या लाल वस्त्र ले लेने चाहिए। बिना सिले वस्त्र जैसे धोती अधिक उपयुक्त है परन्तु अनिवार्य नहीं है। साथ ही आसन भी सफेद या लाल ही होना चाहिए। पूजा के लिए लड्डू, सिंदूर, केले, दीपक, धूप, गंगाजल, जल का लोटा दूध, माचिस तथा लाल या सफेद फूल ले लें।

मंगलवार को उपवास रखें। इसके साथ ही जल के लोटे में दूध मिला दें और उसे जाप करने के बाद पीपल के पेड़ में चढ़ा दे और हनुमानजी के मंदिर में घी का दीपक जला कर साधना के लिए आज्ञा दें। आपको जल्दी ही स्वप्न में या अन्य किसी संकेत द्वारा हनुमानजी की पूजा की आज्ञा मिल जाएगी। यदि नहीं मिलती है तो इस पूजा को न करें।

ऎसे करें पूजा

ऊपर बताए अनुसार किसी शांत, शुद्ध और एकान्त स्थान पर जाकर गंगा जल छिड़क कर जगह को पवित्र कर लें। वहां गाय के गोबर लीप कर एक चौका बनालें। उस पर स्वास्तिक का चिन्ह बना कर फूल बिछाएं और उस पर हनुमानजी की मूर्ति, चित्र या यंत्र रखें। इसके बाद आसन पर विराजमान होकर मन ही मन भगवान गणेश और अपने गुरू से पूजा आरंभ करने की आज्ञा लें। इसके बाद आप अपनी साधना आरंभ करें।

दीपक जलाकर, पुष्प अर्पण कर भगवान राम के नाम की एक माला का जाप कर भलीभांति हनुमानजी की पूजा-अर्चना कर नीचे दिए मंत्र का मूंगे की माला से 11 माला जाप करें और हनुमानजी को भोग अर्पण करें। भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य होना चाहिए। ध्यान रहें प्रतिदिन फल और पुष्प ताजा ही लाने चाहिए। इसके साथ ही अपने आसन और हनुमानजी के चारों तरफ राम नाम का जाप करते हुए एक गोल घेरा बना लें। यह घेरा आपकी सभी विध्नों से रक्षा करेगा। जाप के लिए मंत्र इस प्रकार है

ओम नमो हनुमान बाराह वर्ष के जवान हाथ में लड्डू मुख में पान,
हो के मारू आवन मेरे बाबा हनुमान ये नम:।

पूजा में इन नियमों का पालन अवश्य करें

मंत्र प्रतिदिन शाम को 7 से 11 बजे के बीच ही करना है। भोग लगाकर प्रसाद स्वयं खाएं या छोटे लड़कों को बांट दें।

साधना 41 दिन चलती है और इसे मंगलवार या गुरूवार को ही शुरू करें।

पूरे 41 दिनों के दौरान किसी महिला के संपर्क में न आएं। स्वयं का खाना भी खुद ही बना कर खाएं।

मन-मस्तिष्क में किसी भी तरह का कोई विकार न आने दें और अपने आपको पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर दें।

ये भी पढ़ेः हनुमान जी के इन 5 मंत्रों के जाप से सभी अमंगल होंगे मंगल

सिर्फ 14 दिन में ही हो सकते हैं आपको दर्शन

साधना का असर 14 दिन के अंदर ही दिखने लगता है। आपको शुरू में धरती हिलती हुई अनुभव होगी। आपको बड़े ही डरावने और भयावह अनुभव होने लगेंगे परन्तु किसी बात से डरना नहीं है। आप चुपचाप हनुमानजी में ध्यान एकाग्र कर अपने मंत्र जाप करते हैं। भगवान रोजाना आकर अपना प्रसाद लेंगे और खा लेंगे। 41वें दिन भगवान साक्षात प्रकट होकर आपको दर्शन देंगे और मनचाहा वरदान मांगने को कहेंगे। आप उस दौरान उनसे कुछ भी मांग कर अपनी इच्छा पूरी कर सकते हैं।

सावधानियां

यह एक अत्यन्त प्रचंड और विलक्षण सिद्धी है। इसे करते समय व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होना चाहिए। जरा सा भी डर या कमजोरी आदमी को पागल कर सकती है या उसे मार सकती है। इसीलिए यह प्रयोग हर किसी को नहीं करना चाहिए वरन अपने गुरू की आज्ञा और आर्शीवाद लेकर ही करना चाहिए।

राजगुरु जी

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Monday, July 4, 2016

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...