Thursday, December 31, 2020

हाथ की लकीरें बताती हैं किस्मत, जानें क्या कहती है आपकी भाग्य रेखा


 



हस्तरेखा: 


हाथ की लकीरें बताती हैं किस्मत, जानें क्या कहती है आपकी भाग्य रेखा


हस्तरेखा (Hast Rekha) में भाग्य रेखा महत्वपूर्ण मानी जाती है. जिससे व्यक्ति के व्यापार, नौकरी के साथ जीवन की सफलताओं एवं असफलताओं के बारे में जाना जा सकता है. कलाई के बीच से शुरू होकर ऊपर की ओर जानी वाली रेखा को भाग्य रेखा कहा जाता है. ये रेखा अनामिका के नीचे खत्म हो जाती है.


हस्त रेखा विज्ञान (Palmistry Lines or Palm Reading Science): ज्योतिष का हस्तरेखा से बहुत गहरा संबंध होता है. हस्तरेखा शास्त्र (Hast Rekha Shastra) के अनुसार हाथ की लकीरों से व्यक्ति के भाग्य से जुड़ी बहुत सी बातों को जाना जा सकता है. हथेलियों के पर्वत व्यक्ति की मनोदशा की स्थिति बताते हैं. वहीं, रेखाओं से व्यक्ति के भविष्य का पता चलता है.


हस्तरेखा (Hast Rekha) में भाग्य रेखा महत्वपूर्ण मानी जाती है. जिससे व्यक्ति के व्यापार, नौकरी के साथ जीवन की सफलताओं एवं असफलताओं के बारे में जाना जा सकता है. कलाई के बीच से शुरू होकर ऊपर की ओर जानी वाली रेखा को भाग्य रेखा कहा जाता है. ये रेखा अनामिका के नीचे खत्म हो जाती है. कई लोगों के हाथ में भाग्य रेखा बेहद मज़बूत होती है और एक दम ऊपर यानी अनामिका तक पहुंचती है.


हाथ में स्पष्ट दिखने वाली ये रेखा बिना टूटी हुई हो तो सबसे उत्तम भाग्य रेखा मानी जाती है. ऐसी रेखा वाले व्यक्ति का भाग्य बहुत उज्ज्वल होता है. साथ ही स्पष्ट एवं गहरी भाग्य रेखा वाले व्यक्तियों को बहुत कम परिश्रम में ज्यादा सफलता हासिल होती है. सांसारिक सुख के साथ काम का दोगुना फल प्राप्त होता है.


हस्तशास्त्र के अनुसार यदि भाग्य रेखा तर्जनी अंगुली की ओर मुड़ जाती है, तो कहा जाता है कि ऐसे व्यक्ति को उच्च पद एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. नौकरी में सफलता प्राप्त होने के साथ समाज में सम्मान भी मिलता है. ऐसी भाग्य रेखा वाले व्यक्ति पूजा-पाठ और आध्यात्म में रुचि रखने वाले होते हैं. 


यदि भाग्य रेखा हथेली में मस्तिष्क रेखा से निकलकर शनि पर्वत तक पहुंचती ही है ऐसे व्यक्ति परिश्रम, अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर आगे बढ़ते हैं. यदि हथेली में भाग्य रेखा स्पष्ट होने के साथ शनि पर्वत तक हो और जीवन रेखा भी घुमावदार हो तो ऐसे व्यक्ति के पास धन की कभी कमी नहीं रहती. ऐसी रेखाओं वाला व्यक्ति यश से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करता है. 


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तीव्र विद्वेषण प्रयॊग


 




तीव्र विद्वेषण प्रयॊग


यह प्रयॊग आप कृष्ण पक्ष शनिवार रात्रि से आरम्भ करे यह प्रयॊग ४० दिन का है किन्तु जादा समय नहीं लगता, स्नान कर साफ़ धोती धारण कर अपने साधना कक्ष में दक्षिण- पश्चिम दिशा के मध्य मुह कर काले ऊनी आसन पर बैठ जाए बैठने का तरीका स्वस्तिकासन में होना चाहिए 


! अपने सामने गणेश -गुरु और अपने इष्ट को विराजमान कर सर्व प्रथम आचमन - पवित्रीकरण आदि कर दाए हाथ में जल लेकर संकल्प करे - मैं अमुक नाम का साधक अमुक तिथी - गोत्र अमुक जातक का अमुक व्यक्ति के मध्य द्वेष उत्पन्न करने के उद्देश से मैं विद्वेषण प्रयॊग कर रहा हु !


 संकल्प करने के बाद गणेश -गुरु -इष्ट का पूजन कर गुरु मंत्र कर ले .. और प्रयॊग में पूर्ण सफलता की प्रार्थना कर काली हकीक माला का संक्षिप्त पूजन कर उपांशु विधि से मात्र ४ माला निम्न मंत्र की करे -


मंत्र :-


ॐ नमो नारदाय अमुकस्य अमुकेन सह

विदवेषण कुरु कुरु स्वाहा ॥

 

इसमें ( अमुकस्य ) के स्थान पर एक व्यक्ति का नाम बोले और उसकी लडाई जिससे करानी हो ( अमुकेन ) के स्थान पर उसका नाम बोले ! मंत्र का जप न तो बहुत शीघ्रता से करे और न ही बहुत धीमे -धीमे ! नित्य मंत्र जप के बाद अपने इष्ट की आरती कर शमा याचना अवश्य करे !


 ऐसा करने पर अवश्य ही उन दोनों के मध्य किसी बात को लेकर द्वेष उत्पन्न हो जाता है और वह एक दूसरे का मुह तक देखना पसंद नहीं करते ! 

अंत में यही कहना चाहूगा की गलत उद्देश से किया तंत्र प्रयॊग साधक के लिए ही घातक हो जाता है अतः साधक अपने विवेक का प्रयॊग करे !!


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।


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Monday, December 28, 2020

प्रेत बाधाओं से बचने का उपाय


 



प्रेत बाधाओं से बचने का उपाय


प्रायः आपने सुना होगा कि अमुक प्राणी अथवा स्त्री, युवा युवतियों पर भूत-प्रेत की छाया है। यह सत्य है आपको विश्वास आये या न आये परंतु जब आत्माएं किसी को अपने चंगुल मंे जकड़ लेती हंै तो बड़ी कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। 


यह तो सत्य है कि शरीर का ही अंत होता है जीवात्मा का नहीं। जो मकान खंडहर हो जाते हैं, तालाबों के किनारों पर अथवा जंगल में बरगद के पेड़ पर इनका डेरा मिलेगा। भूतप्रेत, जिन्न, चुडै़ल व ब्रह्म राक्षस आदि विनाशकारी आसुरी शक्तियां हैं जो प्राणियों के पीछे लग जाती हैं। 


बहुत सी आत्माएं तो अपना पुराना बदला भी लेती हैं। उस घर पर अचानक आक्रमण करती रहती हैं। घर वालों को हानि पहुंचाना, बनते हुए कामों को बिगाड़ना आदि समस्याएं उत्पन्न करती हैं।


उपाय:


शनिवार के दिन दोपहर को सवा दो किलो बाजरे का दलिया तैयार करके उसमें गुड़ मिला दें। इस दलिया को मिट्टी की एक हाँडी में डालकर सूर्यास्त के समय उस हाँडी को रोगग्रस्त पुरूष अथवा स्त्री पूरे शरीर पर बाएं से दायें सात बार घुमाकर किसी चैराहे पर रख दें। आते समय पीछे मुड़कर न देखें। 


यदि कोई मिल जाय व पूछना चाहे तो उससे बात न करें। यह क्रिया करते समय किसी को सामने नहीं करके धूप देकर सीधे हाथ में बांध दें। ऊँ हं हनुमते नमः मंत्र से जाप करने से ऊपरी बाधा से मुक्ति मिल जायेगी।


ऊँ नमो भगवते रुद्राय नमः कोशेश्वरस्य नमो ज्योति पतंगाय नमो रुद्राय नमः सिद्धि स्वाहा।


उपरोक्त मंत्र का स्नान करके शु़द्ध कपड़े पहनकर 1 माला का जाप प्रातः-सायं करने से प्रेतबाधा से मुक्ति मिल जाती है। हनुमान चालीसा का पाठ बजरंग बाण सहित करने से घर से ऐसी आत्माएं चली जाती हैं। उपरोक्त मंत्र से हनुमान जी का हवन भी करें। साथ ही गायत्री मंत्र से भी हवन करें। घर में सुख शांति हो जायेगी।


धूनिया:


प्रेतात्माओं को घर से भगाने के लिए घर में प्रतिदिन सुबह शाम धूनी दें। गाय के उपलों पर कोपलों की आग बनाकर उसपर लोहबान, गुग्गल- लाख दंत सर्प की कंेचुली, पीड़ित व्यक्ति या महिला के सिर का बाल लेकर सबको पीसकर तब अग्नि पर डालकर भुक्त भोगी को सूंघाते रहना चाहिए।


अश्विनी नक्षत्र में घोड़े के पैरों के नाखून को अग्नि में जलाकर धूनी दें उक्त मंत्र बोलते हुए- मंत्र - ऊँ नमः श्मशान वासिने भूतादीनां कुरू कुरू स्वाहा। उक्त मंत्र को सिद्ध कर लेना चाहिए। शीघ्र लाभ हो जाएगा।


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।


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Sunday, December 27, 2020

काले तिल के टोटके


 



काले तिल के टोटके 


कार्यों में आ रही परेशानियों और दुर्भाग्य को दूर करने के लिए ज्योतिष शास्त्र की किताबों में कई तरह के टोटके या उपाय बताए गए हैं उन्हीं में से एक है काले तिल के असरकार और चमत्कारिक उपाय। आप भी जानिए...


1 : --   राहु-केतु और शनि से मुक्ति हेतु


        

कुंडली में शनि के दोष हों या शनि की साढ़ेसाती या ढय्या चल रहा हो तो प्रत्येक शनिवार को बहते जल की नदी में काले तिल प्रवाहित करना चाहिए। इस उपाय से शनि के दोषों की शांति होती है।आप काले तिल भी दान कर सकते हैं। इससे राहु-केतु और शनि के बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। इसके अलावा कालसर्प योग, साढ़ेसाती, ढय्या, पितृदोष आदि में भी यह उपाय कारगर है।


2.


 धन की समस्या दूर करने हेतु   


 हर शनिवार काले तिल, काली उड़द को काले कपड़े में बांधकर किसी गरीब व्यक्ति को दान करें। इस उपाय से पैसों से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।

धनहानि रोकने हेतु : मुठ्ठी भर काले तिल को परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर सात बार उसारकर घर के उत्तर दिशा में फेंक दें, धनहानि बंद होगी|   


 3.   बुरे समय से मुक्ति हेतु     

                  

 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करते हुए प्रत्येक शनिवार को दूध में काले तिल मिलाकर पीपल पर चढ़ाएं। इससे कैसा भी बुरा वक्त चल रहा होगा तो वह दूर हो जाएगा।            

                    

4. रोग कटे सुख मिले  


हर रोज एक लोटे में शुद्ध जल भरें और उसमें काले तिल डाल दें। अब इस जल को शिवलिंग पर ऊँ नम: शिवाय मंत्र जप करते हुए चढ़ाएं। जल पतली धार से चढ़ाएं और मंत्र का जप करते रहें। जल चढ़ाने के बाद फूल और बिल्व पत्र चढ़ाएं। इससे शनि के दोष तो शांत होंगे ही पुराने समय से चली आ रही बीमारियां भी दूर हो सकती हैं। दूसरा उपाय यह है कि शनिवार को यह उपय करें।


 जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले तिल मिलाकर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा-सा तिल्ली का तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहां मिलेगा, इसका पता पहले ही मालूम करके रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है।


 5.


 कार्य में सफलता हेतु    

              

अपने हाथ में एक मुट्ठी काले तिल लेकर घर से निकलें। मार्ग में जहां भी कुत्ता दिखाई दे उस कुत्ते के सामने वह तिल डाल दें और आगो बढ़ जाए। यदि वह काले तिल कुत्ता खाता हुआ दिखाई दे तो यह समझना चाहिए कि कैसा भी कठिन कार्य क्यों न हो, उसमें सफलता प्राप्त होगी।             


6.


 नजरदोष      


जब कभी किसी छोटे बच्चों को नजर लग जाती है तो, वह दूध उलटने लगता है और दूध पीना बन्द कर देता है, ऐसे में परिवार के लोग चिंतित और परेशान हो जाते है। ऐसी स्थिति में एक बेदाग नींबू लें और उसको बीच में आधा काट दें तथा कटे वाले भाग में थोड़े काले तिल के कुछ दाने दबा दें। और फिर उपर से काला धागा लपेट दें। अब उसी नींबू को बालक पर उल्टी तरफ से 7 बार उतारें। इसके पश्चात उसी नींबू को घर से दूर किसी निर्जन स्थान पर फेंक दें। इस उपाय से शीघ्र ही लाभ मिलेगा।

                   

7. आयु वृद्धि


मंगल या शनिवार के दिन काले तिल, जौ का पीसा हुआ आटा और तेल मिश्रित करके एक रोटी पकावें, उसे अच्छी तरह से दोनों तरफ से सेकें, फिर उस पर तेल मिश्रित गुड़ चुपड़ कर व्यक्ति पर सात बार वारकर भैंसे को खिलावें।


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Saturday, December 26, 2020

काम वासना और ज्योतिष


 





काम वासना और ज्योतिष


मनुष्य में काम वासना एक जन्मजात प्रवृति और वह इससे आजीवन प्रभावित -संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है किसी में ज्यादा हो सकता है । ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की व्यक्ति में काम भावना किस रूप में विद्यमान है और वह उसका प्रयोग किन क्षत्रों में कितने अंशों में कर रहा है ।


  लग्न / लग्नेश 


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1👉  यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।


2👉 यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो ,तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है ।


3👉 यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो और सप्तमेश लग्न में हो , तो जातक स्त्री और पुरुष दोनों में रूचि रखता है , उसे समय पर जैसा साथी मिल जाए वह अपनी भूख मिटा लेता है । यदि केवल सप्तमेश लग्न में स्थित हो तो जातक में काम वासना अधिक होती है तथा उसमें रतिक्रिया करते समय पशु प्रवृति उत्पन्न हो जाती है और वह निषिद्ध स्थानों को अपनी जिह्वा से चाटने लगता है ।


4👉 यदि लग्नेश ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो जातक अप्राकृतिक सेक्स और मैस्टरबेशन आदि प्रवृतियों से ग्रसित रहता है और ये क्रियाएँ उसे आनंद और तृप्ति प्रदान करती हैं ।


5👉 लग्न में शुक्र की युति 2 /7 /6 के स्वामी के साथ हो तो जातक का चरित्र संदिग्ध ही रहता है ।


6👉 मीन लग्न में सूर्य और शुक्र की युति लग्न/चतुर्थ भाव में हो या सूर्य शुक्र की युति सप्तम भाव में हो और अष्टम में पुरुष राशि हो तो स्त्री , स्त्री राशि होने पर पुरुष अपनी तरक्की या अपना कठिन कार्य हल करने के लिए अपने साथी के अतिरिक्त अन्य से सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।


सप्तम भाव और तुला राशि 

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1👉 सातवें भाव में मंगल , बुद्ध और शुक्र की युति हो इस युति पर कोई शुभ प्रभाव न हो और गुरु केंद्र में उपस्थित न हो तो जातक अपनी काम की पूर्ति अप्राकृतिक तरीकों से करता है ।


2👉 मंगल और शनि सप्तम स्थान पर स्थित हो तो जातक समलिंगी {होमसेक्सुअल } होता है , अकुलीन वर्ग की महिलाओं के संपर्क में रहता है । अष्टम /नवम /द्वादश भाव का मंगल भी अधिक काम वासना उत्पन्न करता है , ऐसा जातक गुरु पत्नी को भी नही छोड़ पाता है ।


3👉 तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ।


4👉 तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी पारिवारिक कलेश का कारण बनती है ।


5👉 दूषित शुक्र और बुद्ध की युति सप्तम भाव में हो तो जातक काम वासना की पूर्ति के लिए गुप्त तरीके खोजता है ।


    शुक्र 

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1👉 यदि शुक्र स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपने उच्च राशि का हो कर लग्न से केंद्र में हो तो मालव्य योग बनता है । इस योग में व्यक्ति सुन्दर,गुणी , संपत्ति युक्त ,उत्साह शक्ति से पूर्ण , सलाह देने या मंत्रणा करने में निपुण होने के साथ साथ परस्त्रीगामी भी होता है । ऐसा व्यक्ति समाज में अत्यंत प्रतिष्ठा से रहता है तथा आपने ही स्तर की महिला/पुरुष से संपर्क रखते हुए भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देता है । समाज भी सब कुछ जानते हुए उसे आदर सम्मान देता रहता है ।


2👉 सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।


3👉 शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है ।


4👉 शुक्र तीसरे भाव में स्थित हो और मंगल से दूषित हो , छठे भाव में मंगल की राशि हो और चन्द्रमा बारहवें स्थान पर हो तो व्यभिचारी प्रवृतियां अधिक होती है ।


5👉 शुक्र के ऊपर शनि की दृष्टि/युति /प्रभाव जातक में अत्याधिक मैस्टरबेशन की प्रवृति उत्पन्न करते हैं 


     गुरु 

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1👉 गुरु लग्न/चतुर्थ /सप्तम/दशम स्थान पर हो या पुरुष राशि में छठे भाव में हो या द्वादश भाव में हो , जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए सभी सीमाओं को तोड़ डालता है 


2👉 छठे भाव में गुरु यदि पुरुष राशि में बैठा हो तो जातक काम प्रिय होता है 


    शनि

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1👉 यदि शनि स्वक्षेत्री ,मूलत्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि का होकर लग्न से केंद्रवर्ती हो तो शशः योग बनता है । ऐसा व्यक्ति राजा ,सचिव, जंगल पहाड़ पर घूमने वाला ,पराये धन का अपहरण करने वाला ,दूसरों की कमजोरियों को जानने वाला ,दूसरों की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा करने वाला होता है ।कभी कभी अपने इस दुराचार के लिए उसकी प्रतिष्ठा कलंकित हो सकती है , वह दूसरों की नज़रों में गिर सकता है और समाज में अपमानित भी हो सकता है ।


2👉 शनि लग्न में हो तो जातक में वासना अधिक होती है,पंचम भाव में शनि अपनी से बड़ी उम्र की स्त्री से आकर्षण , सप्तम में होने से व्यभिचारी प्रवृति,चन्द्रमा के साथ होने पर वेश्यागामी, मंगल के साथ होने पर स्त्री में और शुक्र के साथ होने पर पुरुष में कामुकता अधिक होती है ।


3👉 दशम स्थान का शनि विरोधाभास उत्पन्न करता है , जातक कभी कभी ज्ञान वैराग्य की बात करता है तो कभी कभी कामशास्त्र का गंभीरता से विश्लेषण करता है , काम और सन्यास के बीच जातक झूलता रहता है ।


4👉 दूषित शनि यदि चतुर्थ भाव में उपस्थित हो तो जातक की वासना उसे इन्सेस्ट की और अग्रसर करती है ।


5👉 शनि की चन्द्रमा/शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है ।


    चंद्र

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1👉 चन्द्रमा बारहवें भाव में मीन राशि में हो तो जातक अनेकों का उपभोग करता है ।


2👉 नवम भाव में दूषित चन्द्रमा की उपस्थिति गुरु/ शिक्षक /मार्गदर्शक के साथ व्यभिचार करने के उकसाते हैं ।


3👉 सप्तम भाव में क्षीण चन्द्रमा किसी पाप ग्रह के साथ बैठा हो तो जातक विवाहित स्त्री से आकर्षित होता है ।


4👉 नीच का चन्द्रमा सप्तम स्थान पर हो तो जातक आपने नौकर /नौकरानी से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं ।


   मंगल 

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1👉 मंगल की उपस्थिति 8 /9 /12 भाव में हो तो जातक कामुक होता है 


2👉 मंगल सप्तम भाव में हो और उसपर कोई शुभ प्रभाव न हो तो जातक नबालिकों के साथ सम्बन्ध बनाता है ।


3👉 मंगल की राशि में शुक्र या शुक्र की राशि में मंगल की उपस्थित हो तो जातक में कामुकता अधिक होती है ।


4👉 जातक कामांध होकर पशु सामान व्यवहार करता है यदि मंगल और एक पाप ग्रह सप्तम में स्थित हो या सूर्य सप्तम में और मंगल चतुर्थ भाव हो या मंगल चतुर्थ भाव में और राहु सप्तम भाव में हो या शुक्र मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम को देखता हो ।


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Friday, December 25, 2020

चमत्कारी काल तंत्र का महाउपाय


 



चमत्कारी काल तंत्र का महाउपाय


कई बार लोग अपने शत्रुओं या विरोधियों से अत्यधिक परेशां रहते हैं। कोई आपकी तरक्की से जलता है , कोई घर की समृद्धि और खुशहाली से। कुछ आपकी कमाई से परेशान रहते हैं तो कुछ बीवी बच्चे या आपके कपड़ों तक से।


फिर आपकी इस ख़ुशी तरक्की खुशहाली को वो नज़र लगाते हैं, उससे भी दिल नहीं भरता तो भौतिक रूप से किसी न किसी प्रकार परेशां करते है,ं चाहे छोटी छोटी बातों को पकड़ के इधर उधर बुराई करके या ऐसी हरकतें करके जिससे आप चिढ जाएँ या मानसिक रूप से परेशां हों और गुस्से में कुछ ऐसा कर दें जिससे उन्हें आगे मौका मिले और तब भी सुकून न मिले तो तांत्रिक कर्मों का सहारा लेकर दुखी करने में भी ऐसे निम्न मानसिकता के लोग पीछे नहीं रहते।


सबसे सरल तो ये है की इनसे दूर रहें नज़रंदाज़ करे। भगवान में विश्वास रखते हुए अपने काम में लगे रहें।


यूँ तो ऐसे चिढने जलने वाले लोग हर जगह मिलते हैं पर कुछ लोग पीछे ही पद जाते हैं और जीना दूभर कर देते 

ऐसे लोगों के लिए फिर एक ही इलाज है की उन्हें उन्ही के अंदाज़ में जवाब दें।


निम्न प्रयोग करके आप अपने शत्रु को ही पीड़ित कर देंगे जिससे वो अपनी ही समस्याओं में उलझा रहेगा और आपको कम परेशान करेगा।


किसी मंगल या शनिवार के दिन एक मिटटी की छोटी सी हांड़ी ले ले। अपने शत्रु का नाम एक कागज पर चिता भस्म या काजल से शत्रु का नाम लिखें और उस कागज़ को अछि तरह मकड़ी के जाले में लपेट लें। फिर किसी सुनसान स्थान पर एक पीपल या कीकर का पेड़ चिन्हित करें और रात ग्यारह बजे के बाद उसकी जड़ के पास एक फुट गहरा एक गड्ढा करें।


 वहीँ बैठ कर उस हांड़ी में वो कागज रखें उसके ऊपर एक मुट्ठी उड़द और चावल सामान मात्रा में मिला कर डाल दें। और  फिर  एक निम्बू में काजल से उसका नाम लिख के उसकी एक आकृति बना दे ।


 अब शत्रु का ध्यान करते हुए 21 बार मन्त्र पढ़ते  हुए 21 बार इस्पे सिंदूर छिडकें फिर तीन लौंग लें और प्रत्येक पर मन्त्र 11 बार  पढके  शत्रु को जहाँ जहाँ पीड़ा देना चाहें उस आकृति पे उक्त अंग पे लौंग गाड़ दें। फिर उसका नाम लेते हुए तीन निम्बू काट के इस आकृति वाले निम्बू के ऊपर निचोड़ दें।


एक ढक्कन से बंद कर मिटटी से ढक दें।


मंत्र: 

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं विकट भैरवाय मम शत्रून

नाशय नाशय त्रासय त्रासय ताडय ताडय ह्रीं ह्रीं ह्रीं फट।


चुप चाप घर आ जाएँ पीछे मुडके न देखें और घर आ के हाथ मुंह धो लें।


कुछ ही दिनों में उसकी दुर्दशा की खबर मिल जाएगी।


इस प्रयोग से शत्रु अपनी ही मानसिक और शारीरिक उलझनों में फंसा रहेगा साथ ही विभिन्न शारीरिक पीड़ा चोट फोड़े आदि से भी जूझता रहेगा।


विशेष चेतावनी:


 कमजोर ह्रदय वाले डरपोक लोग ये प्रयोग न करे क्यूंकि कभी कभी वहां मौजूद शक्तियां प्रत्यक्ष हो जाती हैं। प्रयोग से पूर्व अपने गुरु मन्त्र की 3 माला जप और हनुमान चालीसा के 5 या अधिक पाठ घर में ही कर लें।


वो सब लोग जिन्हें कोई परेशानी नहीं है वो सिर्फ दूसरों को परेशां करने के लिए इसका प्रयोग करने की न सोचे न ही इसे पढ़ के खुश हों क्यूंकि ऐसे प्रयोग भावना प्रधान होते है।


 दुखी व्यक्ति की भावना दुःख देने वाले से भिन्न होती है। जिसने दूसरों को परेशां करने के लिए कोशिश कइ वो अतिशीघ्र या उसी स्थान पर मजा भी चख लेगा।


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


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Saturday, December 19, 2020

मां प्रत्यंगिरा का भद्रकाली या महाकाली का ही विराट रूप है


 





मां प्रत्यंगिरा का भद्रकाली या महाकाली का ही विराट रूप है। मां प्रत्यंगिरा की गुप्तरूप से की गई आराधना, जप से अच्छों अच्छों के झक्के छूट जाते हैं। कितना ही बड़ा काम क्यों न हो अथवा कितना बड़ा शत्रु ही क्यों न हो, सभी का मां चुटकियों में शमन कर देती हैं।


प्रत्यक्ष शत्रु से निपटना आसान होता है किन्तु हमारे कई अप्रत्यक्ष शत्रु होते हैं जो सामने मित्रता पूर्ण व्यवहार रखते हैं किन्तु हमारे पीठ पीछे हमे नुकसान पहुंचाते हैं व हमारी छवि बिगाड़ते रहते हैं, और हमारे परिवार के सदस्यो पर अपनी शत्रुता निकालते हैं। 


ऐंसे शत्रुओं पर यह मारण प्रयोग करने पर सिर्फ शत्रु ही नहीं बल्कि उसके परिवार के सदस्य पर भी प्रभाव होता है। शत्रु को हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज, कैंसर, क्षय रोग, लकवा, पागलपन, विक्षिप्त बनाने, आपसी विवाद कराने, वाहन दुर्घटना, सूखी लगाना, धन हानि, व्यापार मे नुकसान पहुंचाकर बदला लेने के लिए इन तांत्रिक प्रयोगो को करें।


 स्तोत्रम प्रारंभ करने से पूर्व प्रथम पूज्य श्रीगणेश, भगवान शंकर पार्वती, गुरुदेव, मां सरस्वती, गायत्रीदेवी, भगवान सूर्यदेव, इष्टदेव, कुलदेव तथा कुलदेवी का ध्यान अवश्य कर लें। यह स्तोत्र रात्रि 10 बजे से 2 के मध्य किया जाए तो तत्काल फल देता है।


चेतावनी: यह प्रयोग केवल educational purpose से दिया गया है, कृपया स्वयं इसका प्रयोग न करें एवं योग्य गुरु के मार्गदर्शन मे ही करें। किसी मासूम निर्दोष व्यक्ति पर प्रयोग न करें। तंत्र क्रिया परमाणु बम के जैंसी होती है सही विधि से प्रयोग न की जाये तो radiation से आपका विनाश कर सकती है।


श्री महाविपरीतप्रत्यंगिरा स्तोत्रम


नमस्कार मन्त्रः श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा काल्यै नमः।


पूर्व पीठिका महेश्वर उवाच


श्रृणु देवि, महा विद्यां, सर्व सिद्धि प्रदायिकां। यस्याः विज्ञान मात्रेण, शत्रु वर्गाः लयं गताः।।

विपरीता महा काली, सर्व भूत भयंकरी। यस्याः प्रसंग मात्रेण, कम्पते च जगत् त्रयम्।।

न च शान्ति प्रदः कोऽपि, परमेशो न चैव हि। देवताः प्रलयं यान्ति, किं पुनर्मानवादयः।।

पठनाद्धारणाद्देवि, सृष्टि संहारको भवेत्। अभिचारादिकाः सर्वेया या साध्य तमाः क्रियाः।।

स्मरेणन महा काल्याः, नाशं जग्मुः सुरेश्वरि, सिद्धि विद्या महा काली, परत्रेह च मोदते।।

सप्त लक्ष महा विद्याः, गोपि


चेतावनी -


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Friday, December 18, 2020

इस तंत्र का उपयोग मुख्यतः दुश्मन को बर्बाद करने हेतु किया जाता है।







 






तमस तंत्र:-

 इस तंत्र का उपयोग मुख्यतः दुश्मन को बर्बाद करने हेतु किया जाता है।

इस क्रिया का पूर्ण विवरण तो नही बताऊंगा लेकिन इसमें किसी भी स्त्री पुरुष के अंतः वस्त्रों का पुतला बना कर शमशानी क्रिया कर उसको मुख्यतः मानसिक,सारीरिक ओर आर्थिक परेशानी के साथ ही सामाजिक रूप से भी बदनाम किया जाता है।अगर आपके साथ:-

1.रात्रि में चाहे वो स्त्री हो या पुरुष संभोग अथवा अंतरंग क्रिया महसूस हो।

2.अर्धचेतन अवस्था मे होते हुए समस्त क्रिया का अनुभव होना।तथा चाहते हुए भी स्वयं का स्वयं के सरीर पर ही नियंत्रण न होना।

3.किसी खास समय या दिन पर चारो तरफ मीठी सुगंधित अथवा बदबूदार तीव्र गंध आना
4.किन्ही खास अंगों में निश्चित समय पर तीव्र दर्द कुछ समय के लिए होना।

5.कोई बीमारी न होते हुए भी लगतर बीमार रहने
6.नितम्बो पर लगातार स्पर्श महसूस होना।
7.आर्थिक स्तिथि जैसे व्यापार में अचानक से गंभीर हानियां ओर पैसों के आने में कमी।

8.गंभीर सारीरिक नुकसान ओर आर्थिक नुकसान से मानसिक संतुलन बिगड़ने।

9. समाज मे सामाजिक रूप से गंभीर हानि या परिवारजनों के शत्रुतुल्य व्यवहार,या समाज मे प्रतिष्ठा में ओरो की अपेक्षा कमी।

ओर भी कई कारण है जो कभी फिर बताऊंगा।
अतह इन प्रकार के लक्षणों हेतु उपचार जरूर करवाये

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Friday, December 11, 2020

महाकाली साधना


 




महाकाली साधना  

                     


          

           फिर भी जिन साधकों काली साधना को सिद्ध किया है, उनके अनुसार निम्न तथ्य तो साधना सम्पन्न करते ही प्राप्त हो जाते हैं ---


         १. काली साधना से तुरन्त वाक् सिद्धि (जो भी कहा जाए, वह सत्य हो जाए) तथा इस लोक में समस्त मनोवांछित फल प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है।

          २. इस साधना की सिद्धि करने से व्यक्ति समस्त रोगों से मुक्त हो कर पूर्ण स्वास्थ, सबल एवं सक्षम हो जाता है।

          ३. यह साधना जीवन के समस्त भोगों को दिलाने में समर्थ है, साथ ही काली साधना से मृत्यु के उपरान्त मोक्ष की प्राप्ति होती हैे।

          ४.  शत्रुओं को मान-मर्दन करने के लिए, उन पर विजय पाने के लिए, मुकदमे में सफलता के लिए और पूर्ण सुरक्षा के लिए इस से बढ़ कर और कोई साधना नहीं है।

          ५.  इस साधना से दस महाविद्याओ में से एक महाविद्या सिद्ध हो जाती है, जिससे सिद्धाश्रम जाने का मार्ग प्रशस्त होता है।

          ६.  इस साधना की सिद्धि से तुरन्त आर्थिक लाभ और प्रबल पुरुषार्थ की प्राप्ति सम्भव होती है।

          ७. "काली पुत्रे फलप्रदः" के अनुसार काली साधना योग्य पुत्र की प्राप्ति व पुत्र की उन्नति, उसकी सुरक्षा और उसे पूर्ण आयु प्रदान करने के लिए श्रेष्ठ साधना कही गई हैे।

         ८. इसके साथ ही काली साधना से साधक मृत्यु को जीतकर पूर्ण निर्भय हो जाता है।


          वस्तुतः काली साधना को संसार के श्रेष्ठ साधकों और विद्वानों ने अद्भुत एवं शीघ्र  सिद्धि देने वाली साधना कहा है। इस साधना से साधक अपने जीवन के सारे अभाव को दूर कर अपने भाग्य को बनाता हुआ पूर्ण सफलता प्राप्त करता है।


साधना विधि :-----


         नवरात्रि के प्रथम दिन से अथवा किसी भी मास की शुक्लपक्ष की नवमी के दिन से अथवा किसी भी मंगलवार से साधक इस साधना को आरम्भ कर सकता है। परन्तु नवरात्रि काल में इस विशिष्ट साधना का विशेष महत्व बताया गया है। इसे नवरात्रि के प्रथम दिन से ही प्रारम्भ करना चाहिए और अष्टमी को इसका समापन किया जाना शास्त्र सम्मत है। इस साधना में कुल एक लाख मन्त्र जाप किया जाता है। यह नियम नहीं है कि नित्य निश्चित संख्या में ही मन्त्र जाप हो, परन्तु यदि नित्य पन्द्रह हज़ार मन्त्र जाप होता है तो उचित है। यह साधना प्रातः या रात्रि दोनों समय में की जा सकती है। यदि साधक चाहे तो प्रातःकाल और रात्रि दोनों ही समय का उपयोग कर सकता है।


          साधक स्नान करके शुद्ध काले या लाल वस्त्र धरण करके काले अथवा लाल आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाए। फिर अपने सामने एक बाजोट पर काला अथवा लाल वस्त्र बिछाकर उसपर सद्गुरुदेव और भगवती महाकाली का चित्र या यन्त्र स्थापित कर दे। साथ ही साधक गणेश और भैरव के प्रतीक रूप में दो सुपारी मौलि बाँधकर क्रमशः अक्षत और काले तिल की ढेरी पर स्थापित कर दे।


          फिर शुद्ध घी का दीपक और धूप-अगरबत्ती जलाकर सर्वप्रथम साधक संक्षिप्त गुरुपूजन सम्पन्न करे और गुरुमन्त्र का चार माला जाप करे। इसके बाद सद्गुरुदेवजी से भगवती महाकाली साधना सम्पन्न करने आज्ञा लें और साधना की सफलता के लिए प्रार्थना करे।


          फिर साधक भगवान गणपतिजी का संक्षिप्त पूजन करे और “ॐ वक्रतुण्डाय हुम्” मन्त्र की एक माला जाप करे। इसके बाद साधक भगवान गणपति जी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और साधना की सफलता के लिए प्रार्थना करें।


          इसके बाद साधक संक्षिप्त भैरव पूजन सम्पन्न करे और “ॐ  भ्रं भ्रं क्रीं क्रीं महाकाल भैरवायै भ्रं भ्रं क्रीं क्रीं फट्” मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर साधक महाकाल भैरवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।


          इसके पश्चात साधक को साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए। इसके लिए साधक दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करे कि “मैं अमुक पिता का नाम अमुक गोत्र अमुक गुरुजी का शिष्य होकर आज से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए, सिद्धि के लिए महाकाली साधना का अनुष्ठान प्रारम्भ कर रहा हूँ। मैं ८ दिनों तक नित्य १५० माला मन्त्र जाप सम्पन्न करूँगा। हे, माँ! आप मेरी इस साधना को स्वीकार कर मुझे सिद्धि प्रदान करें और इसकी ऊर्जा को आप मेरी बुद्धि में स्थापित कर दें।”


          ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल जमीन पर छोड़ देना चाहिए। इसके बाद प्रतिदिन संकल्प करने की आवश्यकता नहीं है।


         इसके बाद साधक महाकाली यन्त्र अथवा चित्र का पंचोपचार से पूजन करे। पूजन में कुमकुम, अक्षत, पुष्प और प्रसाद अर्पित करके धूप व दीप समर्पित करें।


         फिर साधक दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र का उच्चारण करके जल भूमि पर छोड़ दें ---


विनियोग :-----


        ॐ अस्य श्रीदक्षिणकालीमन्त्रस्य भैरव ऋषिः, उष्णिक् छन्द, दक्षिण कालिका देवता, क्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्रीं कीलकं ममाभिष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।


व्यापक न्यास :------


        श्री दक्षिणकाली देवी के मूल मन्त्र से पाँच बार या सात बार अथवा नौ बार व्यापक न्यास करें ---


ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा ॥


         फिर हाथ जोड़कर भगवती काली का निम्नानुसार ध्यान करे -----


ॐ शवारूढ़ां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम्,                                                          चतुर्भुजां खड्ग-मुण्ड वराभयकरां शिवाम्।                                         मुण्डमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगम्बराम्,                                                                 एवं सञ्चिन्तयेत् कालीं श्मशानालयवासिनीम्॥


         इस प्रकार ध्यान करने के पश्चात निम्न मन्त्र का काली हकीक माला अथवा रुद्राक्ष माला से १५० माला जाप करे -----


काली साधना मन्त्र :-----


॥ ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा ॥


         मन्त्र जाप के उपरान्त साधक निम्न श्लोक का उच्चारण करने के बाद एक आचमनी जल छोड़कर सम्पूर्ण जाप माँ भगवती महाकाली को समर्पित कर दें।


ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं।

     सिद्धिर्भवतु मे देवि! त्वत्प्रसादान्महेश्वरि।।


         इस प्रकार यह साधना क्रम साधक नित्य ८ दिनों तक निरन्तर सम्पन्न करें।


         इस काली साधना में आपको कुल एक लाख मन्त्र जाप करना है। नवरात्रि काल में यह जाप आठ दिनों में सम्पन्न हो जाना चाहिए। अन्य दिनों में यह साधना २१ दिनों में भी सम्पन्न की जा सकती है।


चेतावनी -


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Thursday, December 10, 2020

कुंडली में होते हैं कैसे-कैसे राजयोग



 


कुंडली में होते हैं कैसे-कैसे राजयोग


👉


राजयोग का नाम सुनते ही लोगों के में मस्तिष्क में किसी बड़े पद का ख़्याल आ जाता है।वे सोचने लगते हैं कि राजयोग यदि जन्मपत्रिकामें है तो वे निश्चित ही कोई बड़े राजनेता,उद्योगपति या नौकरशाह बनेंगे। उन्हें अकूत धन-सम्पदा और सामाजिक प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी।


 लेकिन वास्तव में यह ज्योतिषीय राजयोग के मानक नहीं है। मेरी ज्योतिषीय राजयोग परिकल्पना में राजयोग का अर्थ है वह जीवन जिसमें किसी भी प्रकार की असंतुष्टि ना हो, वह व्यक्ति जो अपने आप में पूर्ण संतुष्ट व आनन्दित हो जैसे बुद्ध, महावीर।


ऐसा राजयोग बहुत कम फ़लित होता है। बुद्ध और महावीर राजपुत्र थे। बुद्ध की जन्मपत्रिका में राजयोग था लेकिन बुद्ध का राजयोग बड़े दूसरे प्रकार से फ़लित हुआ। सांसारिक अर्थों में तो बुद्ध भिक्षु थे लेकिन ऐसे अप्रतिम भिक्षु जिनके आगे सम्राट अपने मस्तक झुकाते थे। सामान्य जनमानस की राजयोग की परिभाषा अलगहोती है लेकिन ज्योतिषीय राजयोग की बिल्कुल अलग।


किसी राजयोग का फ़लित कहने से पूर्व एक ज्योतिषी के लिए जातक की जन्मपत्रिका के अन्यबुरे व अशुभ योगों का आनुपातिक अध्ययन करना आवश्यक है।  केवल एक राजयोग का जन्मपत्रिका में सृजन हो जाने मात्र से जीवन सानन्द व्यतीत होगा


 ऐसा नहीं कहा जा सकता जब तक कि जन्मपत्रिका के अन्य विविध योगों का अध्ययन ना कर लिया जाए। ज्योतिष शास्त्र में कई प्रकार के राजयोगों का वर्णन हैं। आइए कुछ प्रमुख राजयोगों के बारे में जानते हैं-


👉विपरीत राजयोग


-"रन्ध्रेशो व्ययषष्ठगो,रिपुपतौ रन्ध्रव्यये वा स्थिते।रिःफेशोपि तथैव रन्ध्ररिपुभे यस्यास्ति तस्मिन वदेत,अन्योन्यर्क्षगता निरीक्षणयुताश्चन्यैरयुक्तेक्षिता,जातो सो न्रपतिः प्रशस्त विभवो राजाधिराजेश्वरः॥"


जब छठे,आठवें,बारहवें घरों के स्वामी छठे,आठवे,बारहवें भाव में हो अथवा इन भावों में अपनी राशि में स्थित हों और ये ग्रह केवल परस्पर ही युत व दृष्ट हो, किसी शुभ ग्रह व शुभभावों के स्वामी से युत अथवा दृष्ट ना हों तो 'विपरीत राजयोग' का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य धनी,यशस्वी व उच्च पदाधिकारी होता है।


👉नीचभंग राजयोग-जन्म कुण्डली में जो ग्रह नीच राशि में स्थित है उस नीच राशि का स्वामी अथवा उस राशि का स्वामी जिसमें वह नीच ग्रह उच्च का होता है, यदि लग्न से अथवा चन्द्र से केन्द्र में स्थित हो तो 'नीचभंग राजयोग' का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य राजाधिपति व धनवान होता है।


👉अन्य राजयोग-


-    जब तीन या तीन से अधिक ग्रह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में होते हुए केन्द्र में स्थित हों।


-    जब कोई ग्रह नीच राशि में स्थित होकर वक्री और शुभ स्थान में स्थित हो।


-    तीन या चार ग्रहों को दिग्बल प्राप्त हो।


-    चन्द्र केन्द्र में स्थित हो और गुरु की उस पर दृष्टि हो।


-    नवमेश व दशमेश का राशि परिवर्तन हो।


-    नवमेश नवम में व दशमेश दशम में हो।


-    नवमेश व दशमेश नवम में या दशम में हो।


और शनि एक साथ बैठे है तो आप अपनी कुंडली ज़रूर दिखाये।


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Friday, December 4, 2020

शनिवार व्रत कथा






!! शनिवार व्रत कथा !!

                               !! न्याय के देवता शनि है

एक समय सभी नवग्रहओं : सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद छिड़ गया, कि इनमें सबसे बड़ा कौन है? सभी आपस मेंं लड़ने लगे, और कोई निर्णय ना होने पर देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे. इंद्र इससे घबरा गये, और इस निर्णय को देने में अपनी असमर्थता जतायी. परन्तु उन्होंने कहा, कि इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य हैं, जो कि अति न्यायप्रिय हैं। 

वे ही इसका निर्णय कर सकते हैं। सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और अपना विवाद बताया। साथ ही निर्णय के लिये कहा।

 राजा इस समस्या से अति चिंतित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे, कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही कुपित हो उठेगा. तब राजा को एक उपाय सूझा. उन्होंने स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रख दिये. फ़िर उन सबसे निवेदन किया, कि आप सभी अपने अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें। जो अंतिम सिंहासन पर बेठेगा, वही सबसे छोटा होगा।

 इस अनुसार लौह का सिंहासन सबसे बाद में होने के कारण, शनिदेव सबसे बाद में बैठे. तो वही सबसे छोटे कहलाये. उन्होंने सोचा, कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है।

 उन्होंने कुपित हो कर राजा से कहा “राजा! तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं. परन्तु मैं ढाई से साढ़े-सात साल तक रहता हुँ. बड़े बड़ों का मैंने विनाश किया है.

 श्री राम की साढ़े साती आने पर उन्हें वनवास हो गया, रावण की आने पर उसकी लंका को बंदरों की सेना से परास्त होना पड़ा.अब तुम सावधान रहना. ” ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहां से चले गये. अन्य देवता खुशी खुशी चले गये। कुछ समय बाद राजा की साढ़े साती आयी। 

तब शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर वहां आये। उनके साथ कई बढ़िया घोड़े थे। राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा को सवारी हेतु दिया। 

राजा ज्यों ही उस पर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा,भिषण वन में पहुंच वह अंतर्धान हो गया, और राजा भूखा प्यासा भटकता रहा। तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया. राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दी। 

वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया, और वहां अपना नाम उज्जैन निवासी वीका बताया। वहां एक सेठ की दूकान में उसने जल इत्यादि पिया. और कुछ विश्राम भी किया। भाग्यवश उस दिन सेठ की बड़ी बिक्री हुई। सेठ उसे खाना इत्यादि कराने खुश होकर अपने साथ घर ले गया। वहां उसने एक खूंटी पर देखा, कि एक हार टंगा है, जिसे खूंटी निगल रही है। थोड़ी देर में पूरा हार गायब था। तब सेठ ने आने पर देखा कि हार गायब है। उसने समझा कि वीका ने ही उसे चुराया है। 

उसने वीका को कोतवाल के पास पकड़वा दिया। फिर राजा ने भी उसे चोर समझ कर हाथ पैर कटवा दिये। वह चौरंगिया बन गया।और नगर के बाहर फिंकवा दिया गया। वहां से एक तेली निकल रहा था, जिसे दया आयी, और उसने वीका को अपनी गाडी़ में बिठा लिया। वह अपनी जीभ से बैलों को हांकने लगा।

 उस काल राजा की शनि दशा समाप्त हो गयी। वर्षा काल आने पर वह मल्हार गाने लगा। तब वह जिस नगर में था, वहां की राजकुमारी मनभावनी को वह इतना भाया, कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया, कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। उसने दासी को ढूंढने भेजा। दासी ने बताया कि वह एक चौरंगिया है। परन्तु राजकुमारी ना मानी। 

अगले ही दिन से उठते ही वह अनशन पर बैठ गयी, कि विवाह करेगी तो उसी से। उसे बहुतेरा समझाने पर भी जब वह ना मानी, तो राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा।फिर उसका विवाह राजकुमारी से हो गया। तब एक दिन सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा: राजन्, देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है।

 तब राजा ने उनसे क्षमा मांगी, और प्रार्थना की , कि हे शनिदेव जैसाजैसा दुःख मुझे दिया है, किसी और को ना दें। शनिदेव मान गये, और कहा: जो मेरी कथा और व्रत कहेगा, उसे मेरी दशा में कोई दुःख ना होगा। जो नित्य मेरा ध्यान करेगा, और चींटियों को आटा डालेगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे।

 साथ ही राजा को हाथ पैर भी वापस दिये। प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गयी। वीका ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। सभी अत्यंत प्रसन्न हुए। सेठ ने जब सुना, तो वह पैरों पर गिर कर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। 

सेठ ने फिर भी निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों से राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया, और अपनी कन्या श्रीकंवरी से पाणिग्रहण का निवेदन किया। 

राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय पश्चात राजा अपनी दोनों रानीयों मनभावनी और श्रीकंवरी को सभी उपाहार् सहित लेकर उज्जैन नगरी को चले। वहां पुरवासियों ने सीमा पर ही उनका स्वागत किया। सारे नगर में दीपमाला हुई, व सबने खुशी मनायी। 

राजा ने घोषणा की , कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया था, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा ने बहुत समय खुशी और आनंद के साथ बीताया। जो कोई शनि देव की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिये।

और

एक समय की बात है ।भगवान सूर्य के पुत्र शनि बचपन में बहुत सुंदर थे ।और तेजस्वी भी, इनकी सुंदरता को देखते हुए ,गंधर्व ने अपनी पुत्री कंकाली के साथ शनि देव का विवाह करा दिया । लेकिन अत्यंत सुंदर होने के कारण इंद्र की सभा के अप्सरा अक्सर इन्हें देखने जाया करती थी।

 इन अप्सरा को देखकर कई बार शनि देव उन पर मोहित हो ,गया यह बात गंधर्व पुत्री कंकाली को अच्छी नहीं लगती थी।

 तब गंधर्व पुत्री कंकाली ने अपने पति शनिदेव को यह श्राप दे दिया कि आज की पश्चाताप सुंदरता को खोकर बदसूरत हो। जाए और आपकी दृष्टि हमेशा नीचे की तरफ रहे अगर आप सीधी दृष्टि से किसी की तरफ देखते हैं ।

तो उस पर साढ़ेसाती का प्रभाव पड़ जाएगा । तब शनिदेव भगवान शिव की घोर तपस्या की तपस्या के पश्चात भगवान शिव प्रसन्न हुए और बोले हे सूर्यपुत्र शनिदेव वर मांगो। 

तब शनिदेव बोले यह सदा शिव शंभू हम पर कृपा करके हमें सृष्टि पर सीधे देखने के लिए वर दीजिए भगवान शिव भोले जो व्यक्ति शनिवार के दिन पीपल के नीचे तेल चढ़ेगा उस पर तुम्हारे पढ़ने वाले को दृष्टि शुभ दृष्टि में बदल जाएगी इसीलिए शनिवार के दिन पीपल के नीचे शनिदेव की पूजा होती है।

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राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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Thursday, December 3, 2020

क्या प्रोफेशनल एजुकेशन ले जिसमे कैरियर बने जाने अपने जन्म कुंडली से


 




क्या प्रोफेशनल एजुकेशन ले जिसमे कैरियर बने  जाने अपने जन्म कुंडली से ...                          


 उच्च स्तर के प्रोफेशनली कोर्स अच्छा कैरियर रहे ,कैरियर उचाईयों को छुए इसी कारण हम प्रोफ़ेशनली कोर्स करते है या अपने बच्चों को कराते है।


प्रोफेशनली कोई भी कोर्स करने से पहले यह यदि पता चल जाये कि इस क्षेत्र में कैरियर है जातक/जातिका का या नही तो इससे अच्छी बात कोई ओर हो ही नही सकती वरना यदि जो कोर्स अच्छे कैरियर बनाने के लिए किया जा रहा है 


यदि उस क्षेत्र में सफलता के ग्रह योग न होकर दूसरे क्षेत्र में हो तब कोई फायदा नही, जैसे कोर्स किया इंजीनियर का लेकिन सफलता है मेडिकल क्षेत्र में या टीचिंग में।


तब ऐसी स्थिति में जिस क्षेत्र में सफलता के योग हो उसी क्षेत्र का चुनाव शिक्षा के लिए करने पर कैरियर में शिक्षा काम आती है।

                                                              कुंडली का 5 वा भाव शिक्षा (कैरियर एजुकेशन/प्रोफेशनल एजुकेशन) का है तो दसवाँ भाव कैरियर के है।


जब 5 वे भाव और भावेश और दसवे भाव या दसवे भाव के स्वामी के बीच  संबंध हो तब तो जो भी प्रोफेशनली एजुकेशन कैरियर बनाने के लिए व्यक्ति लेगा उसमे सफलता मिल जाती है 


और जो अच्छे कैरियर के लिए प्रोफेसनली कोर्स किया गया है वह काम आता है।  इसके अतिरिक जब 5 वे भाव और दसवे भाव की स्थिति अच्छी को और जो ग्रह दसवे भाव को प्रभावित कर रहे हैं 


वही ग्रह पाचवे भाव को प्रभावित करे तब जो भी कोर्स किया गया होता है उसी क्षेत्र में कैरियर रहेगा क्योंकि शिक्षा/प्रोफेशनली कोर्स भाव (5वे भाव) का सबंध कैरियर/रोजगार(10वे भाव) से जुड़ गया है।


इस तरह यदि जिस क्षेत्र में कैरियर और रोजगार सफलता है उसी क्षेत्र से संबंधित प्रोफेशनली कोर्स किया जाए तब ऐसा प्रोफेशनली कोर्स कैरियर निर्माण में काम आता है।


जबकी ऐसा कोई एजुकेशन कोर्स प्रोफेसन के लिए कर लिया जाए जिस क्षेत्र में ग्रह कैरियर न बना रहे हो और किसी दूसरे क्षेत्र में कैरियर दिखता हो तब ऐसी स्थिति में आगे चलकर कैरियर में सफलता नही मिल पाती और जो कोर्स किया होता है


 उसका बजी कोई लाभ नही मिलता है।अब कब जो कैरियर बनाने के लिए प्रोफेशनली कोर्स किया जा रहा है उस क्षेत्र में कैरियर होगा या नही और कितना अच्छा है?  

                                                                      

                                                            

इस तरह सही कैरियर कोर्स करने पर जिस क्षेत्र में सफ़लता है उस क्षेत्र से सम्बंधित ही प्रोफेसनली कोर्स करने पर एजुकेशन कैरियर में उचाईयों देकर अच्छी सफलता देगा, इस कारण सही शिक्षा चुनाव ही अच्छा कैरियर सफलता देगा।


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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

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