Saturday, October 31, 2020

नौवी महाविद्या मातंगी


 





नौवी महाविद्या मातंगी


सांसारिक रूप में महाविद्या कमला का आराधना से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के बाद किसी भी आदमी को जरूरत होती है, अपने आभामंडल और प्रभाव को बढ़ाने की। इंसान चाहता है कि लोग उसके धन व ऐश्वर्य को समझें और उसे सम्मान दें। 


दूसरी ओर आध्यात्मिक क्षेत्र का साधक कमला की साधना से खुद को अंदर से परिपूर्ण करने के बाद प्रकृति को मोहित कर अपने साधना के स्तर को उठाना चाहता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ती है नौवीं महाविद्या मातंगी की। इनमें पूरे ब्रह्मांड को मोहित करने की शक्ति है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा था कि सभी महाविद्या में सब कुछ प्रदान करने की शक्ति है लेकिन उनके विशेषज्ञता के खास क्षेत्र हैं। 


तंत्र के क्षेत्र में मातंगी की साधना का काफी महत्व है। यह ममता की मूर्ति हैं और सामन्यतया साधकों पर प्रसन्न होने में अधिक देर नहीं लगाती हैं। इनकी प्रसन्नता से ज्ञान वृद्धि, शास्त्राज्ञाता, कवित्व शक्ति एवं संगीत विद्या की भी प्राप्ति संभव है।


 यह सम्मोहन और वशीकरण की अधिष्ठात्री हैं। इनके प्रयोग से भंडार की अक्षयवृद्धि होती है। आवश्यकता सिर्फ श्रद्धा का नियमपूर्वक साधना करने की है। मातंगी की साधना के बारे में संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है। विस्तृत जानकारी के लिए अपने आसपास के किसी योग्य व्यक्ति से या मेल से मुझसे जानकारी ली जा सकती है।


मातंगी के कई नाम हैं। इनमें प्रमुख हैं-सुमुखी, लघुश्यामा या श्यामला, उच्छिष्टचांडालिनी, उच्छिष्टमातंगी, राजमातंगी, कर्णमातंगी, चंडमातंगी, वश्यमातंगी, मातंगेश्वरी, ज्येष्ठमातंगी, सारिकांबा, रत्नांबा मातंगी एवं वर्ताली मातंगी।


1-अष्टाक्षर मातंगी मंत्र- कामिनी रंजनी स्वाहा


विनियोग— अस्य मंत्रस्य सम्मोहन ऋषिः, निवृत् छंदः, सर्व सम्मोहिनी देवता सम्मोहनार्थे जपे विनियोकगः।


ध्यान--- श्यामंगी वल्लकीं दौर्भ्यां वादयंतीं सुभूषणाम्। चंद्रावतंसां विविधैर्गायनैर्मोहतीं जगत्।


फल व विधि------ विनियोग से ही मंत्र का फल स्पष्ट 20 हजार जप कर मधुयुक्त मधूक पूष्पों से हवन करने पर अभीष्ट की सिद्धि होती है।

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2-दशाक्षर मंत्र------ ऊं ह्री क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा।


विनियोग— अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिःर्विराट् छंदः, मातंगी देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्लीं कीलकं, सर्वेष्टसिद्धये जपे विनियोगः।


अंगन्यास--- ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः से हृदयादि न्यास करें।


फल व विधि------ साधक छह हजार जप नित्य करते हुए 21 दिन प्रयोग करें। फिर दशांस हवन करें। चतुष्पद श्मसान या कलामध्य में मछली, मांस, खीर व गुगल का धूप दे तो कवित्व शक्ति की प्राप्ति होती है। इससे जल, अग्नि एवं वाणी का स्तंभन भी संभव है।


 इसकी साधना करने वाला वाद-विवाद में अजेय बन जाता है। उसके घर में स्वयं कुबेर आकर धन देते हैं।


3-लघुश्यामा मातंगी का विंशाक्षर मंत्र--------- ऐं नमः उच्छिष्ट चांडालि मांतगि सर्ववशंकरि स्वाहा।


विधि--- 


विनियोग व न्यास आदि के साथ देवी की पूजा कर 11, 21, 41 दिन या पूर्णिमा/आमावास्या से पूर्णिमा/आमावास्या तक एक लाख जप पूर्ण करें। मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इसका जप उच्छिष्ट मुंह किया जाना चाहिए। ऐसा किया भी जा सकता है लेकिन विभिन्न ग्रंथों में इसे पवित्र होकर करने का भी विधान है।


 अतः साधक सुविधानुसार जप करें। जप पू्र्ण होने के बाद महुए के फूल व लकड़ी के दशांस होम कर तर्पन व मार्जन करें।


फल-------


 इसके प्रयोग से डाकिनी, शाकिनी एवं भूत-प्रेत बाधा नहीं पहुंचा सकते हैं। इसकी साधना से प्रसन्न होकर देवी साधक को देवतुल्य बना देती है। उसकी समस्त अभिलाषाएं  पूरी होती हैं। 


चूंकि मातंगी वशीकरण विद्या की देवी हैं, इसलिए इसके साधक की वह शक्ति भी अद्भुत बढ़ती है। राजा-प्रजा सभी उसके वश में रहते हैं।


4-एकोन विंशाक्षर उच्छिष्ट मातंगी तथा द्वात्रिंशदक्षरों मातंगी मंत्र


मंत्र (एक)--- नमः उच्छिष्ट चांडालि मातंगी सर्ववशंकरि स्वाहा।


मंत्र (दो)---- ऊं ह्रीं ऐं श्रीं नमो भगवति उच्छिष्टचांडालि श्रीमातंगेश्वरि सर्वजन वशंकरि स्वाहा।


विधि-----


 विधिपूर्वक दैनिक पूजन के बाद निश्चित (जो साधक जप से पूर्व तय करे) समयावधि (घंटे या दिन) में दस हजार जप कर पुरश्चरण करे। उसके बाद दशांस हवन करे।


फल----- 


मधुयुक्त महुए के फूल व लकड़ी से हवन करने पर वशीकरण का प्रयोग सिद्ध होता है। मल्लिका फूल के होम से योग सिद्धि, बेल फूल के हवन से राज्य प्राप्ति, पलास के पत्ते व फूल के हवन में जन वशीकरण, गिलोय के हवन से रोगनाश, थोड़े से नीम के टुकड़ों व चावल के हवन से धन प्राप्ति, नीम के तेल से भीगे नमक से होम करने पर शत्रुनाश, केले के फल के हवन से समस्त कामनाओं की सिद्धि होती है।


 खैर की लकड़ी से हवन कर मधु से भीगे नमक के पुतले के दाहिने पैर की ओर हवन की अग्नि में तपाने से शत्रु वश में होता है।


5-सुमुखी मातंगी प्रयोग


इसमें दो मंत्र हैं जिसमें सिर्फ ई की मात्रा का अंतर है पर ऋषि दोनों के अलग-अलग हैं। इसमें फल समान है।


पहला मंत्र---- उच्छिष्ट चांडालिनी सुमुखी देवी महापिशाचिनी ह्रीं ठः ठः ठः।


इसके ऋषि अज, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं।


विधि---- 


देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह आठ हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है। साधक को धन की प्राप्ति होती है और उसका आभामंडल बढ़ता है। हवन की विधि नीचे है।


दूसरा मंत्र-----


 उच्छिष्ट चांडालिनि सुमुखि देवि महापिशाचिनि ह्रीं ठः ठः ठः।


इसके ऋषि भैरव, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं।


विधि---- 


इसकी कई विधियां हैं। एक में एक लाख मंत्र जप का भी विधान वर्णित है। लेकिन मेरा मानना है कि देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह दस हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है और साधक को धन की प्राप्ति होती है तथा उसका आभामंडल बढ़ता है।


हवन विधि------ 


दही से सिक्त पीली सरसो व चावल से हवन करने पर राजा-मंत्री सभी वश में हो जाते हैं। बिल्ली के मांस से हवन करने पर शस्त्र का वसीकरण होता है। बकरे के मांस के हवन से धन-समृद्धि मिलती है। 


खीर के हवन से विद्या प्राप्ति तथा मधु व घी युक्त पान के पत्तों के हवन से महासमृद्धि की प्राप्ति होती है।


 कौवे व उल्लू के पंख के हवन से शत्रुओं का विद्वेषण होता है।


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


राजगुरु जी


महाविद्या आश्रम


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Wednesday, October 28, 2020

सर्वजन वशीकरण प्रयोग एक अनुभूति साधना








सर्वजन वशीकरण प्रयोग एक अनुभूति साधना

लोहट मंत्र :-

"" नमो भगवते कामदेवाय सर्वजन प्रियाय सर्वजन सम्मोहनाय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हन हन वद वद तप तप सम्मोहाय सम्मोहाय सर्वजन मे वशं कुरु कुरु स्वाहा ""

मंत्र जाप संख्या : - इक्कीश हजार

दिशा :- उत्तर

स्थान :- घर का एकांत कक्ष

समय :- मध्य रात्रि

दिन ;- शुक्रवार / या मोहनी एकादशी

आसन :- सफ़ेद

वस्त्र :- सफ़ेद धोती

हवन :- ( दशांश ) देशी घी , पंचमेवा ( काजू , बादाम , किशमिश , पिश्ता , मखाना )

विधि :-

मोहनी एकादशी या किसी भी शुक्रवार को स्नान आदि से निवित्र होकर कांशे की थाली में समस्त तांत्रिक पूजन सामग्री स्थापित करके पंचोपचार पूजन करना चाहिए व्यक्ति विशेष को वश में करने का अथवा सिद्धि का संकल्प लेते हुए , 

विधि - 

विधान पूर्वक गुरु - गणेश वंदना करके , मूल मंत्र का जाप करे , . जाप की पूर्णता पर दशांश हवन करके ब्राह्मण , एवं पांच कुवारी कन्यायो को भोजन सहित उपयुक्त दान - दक्षिणा देकर साधना को पूरा करे .

इस महत्व पूर्ण सम्मोहनी साधना से साधक का व्यक्तित्व अत्यंत सम्मोहक और आकर्षक हो जाता हैं .उसके संपर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता . 

यदि कोई साधना करने में असमर्थ हो , तो योग्य विद्द्वान द्वारा या साधना सम्पन्न करा के करवाकर सम्मोहनी कवच धारण करके उक्त लाभ प्राप्त कर सकता हैं .

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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राज गुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

 (रजि.)

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Tuesday, October 27, 2020

बटुक भैरव तंत्र साधना कवच व प्रयोग,


 





बटुक भैरव तंत्र साधना कवच व प्रयोग,..


कलियुग में हनुमानजी के अलावा भैरव ही एकमात्र ऐसे देव हैं जिनकी पूजा तुरंत फल देती है। अगर सच्चे मन से उनकी पूजा की जाए तो वो अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने में क्षण भर भी देर नहीं करते हैं। विशेष तौर पर यदि भैरवाष्टमी या अष्टमी के दिन तंत्र प्रयोग किए जाए या भगवान कालभैरव के मंत्रों का प्रयोग किया जाए तो निश्चित ही हर इच्छा पूरी होती है।


पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमे से श्रेष्ठ कौन है?


 यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि सभी देवता घबरा गए. उन्हें डर था कि दोनों देवताओं के बीच युद्ध ना छिड़ जाए और प्रलय ना आ जाए.


 सभी देवता घबराकर भगवन शिव के पास चल गए और उनसे समाधान ढूंढऩे का निवेदन किया. जिसके बाद भगवान शंकर ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें भगवान शिव ने सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि और साथ में विष्णु और ब्रह्मा जी को भी आमंत्रित किया.

इस सभा में निर्णय लिया गया कि सभी देवताओं में भगवान शिव श्रेष्ठ है.


 इस निर्णय को सभी देवताओं समेत भगवान विष्णु ने भी स्वीकार कर लिया. ब्रह्मा ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया.


 वे भरी सभा में भगवान शिव का अपमान करने लगे. भगवान शंकर इस तरह से अपना अपमान सह ना सके और उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया.


भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए. भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए. 


वह श्वान (कुत्ते) पर सवार थे, उनके हाथ में एक दंड था और इसी कारण से भगवान शंकर को ‘दंडाधिपति भी कहा गया है. पुराणों के अनुसार भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था. उन्होंने ब्रह्म देव के पांचवें सिर को काट दिया तब ब्रह्म देव को अपनी गलती का एहसास हुआ.


 भैरव की पूजा से मिलते हैं ये लाभ नारदपुराण के अनुसार भैरव की पूजा करने से मनुष्य की हर मनोकामना पूर्ण होती है। यदि मनुष्य किसी पुराने रोग से पीडि़त है तो वह रोग, दुख और तकलीफ भी दूर हो जाएगी।


यही नहीं यदि जीवन में शनि और राहु की बाधाएं आ रही हैं तो वह भी इनकी कृपा से दूर होगी। इनकी पूजा करने से डर से लडऩे की हिम्मत भी मिलती है। भैरवाष्टमी या कालाष्टमी के दिन पूजा उपासना द्वारा सभी शत्रुओं और पापी शक्तियों का नाश होता है और सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं.  


भैरव देव जी के राजस, तामस एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं. 


भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए कि जाती है. इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं भैरव आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय प्राप्त होती है, व्यक्ति में साहस का संचार होता है.


 इनकी आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है, रविवार और मंगलवार के दिन इनकी पूजा बहुत फलदायी है. भैरव साधना और आराधना से पूर्व अनैतिक कृत्य आदि से दूर रहना चाहिए पवित्र होकर ही सात्विक आराधना की जाती है तभी फलदायक होती है.


 भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष अनेक विधियों का उल्लेख किया जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है. 


भैरव जी शिव और दुर्गा के भक्त हैं व इनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक माना गया है न की डर उत्पन्न करने वाला इनका कार्य है सुरक्षा करना और कमजोरों को साहस देना व समाज को सही मार्ग देना. 


1)-लोहबान, गूगल, कपूर, तुलसी, नीम, सरसों के पत्ते मिक्स करके सुबह-शाम घर में धूनी दें।


2)-भैरू जी के मंदिर में इमरती व मदिरा का भोग लगाएं।


3)-भैरू मंदिर में उड़द व सिद्ध एकाक्षी श्रीफल भैरू बाबा के समक्ष मन्नत मांग कर चढ़ाएं।


4)-काले कुत्ते को इमरती खिलाएं व कच्चा दूध पिलाएं।


5)-शुभ कामों में बार-बार बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार के दिन भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ाएं और बटुक भैरव स्तोत्र का एक पाठ करें।


6)-महाकाल भैरव मंदिर में चढ़ाए गए काले धागे को गले या बाजू में बांधने से भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।वो मत्रित्र होना चाहिये


7)-रोली, सिन्दूर, रक्तचन्दन का चूर्ण, लाल फूल, गुड़, उड़द का बड़ा, धान का लावा, ईख का रस, तिल का तेल, लोहबान, लाल वस्त्र, भुना केला, सरसों का तेल भैरव जी की प्रिय वस्तुएं हैं। इन्हें भैरव जी पर अर्पित करने से मुंह मांगा फल प्राप्त किया जा सकता है।


8)-प्रतिदिन भैरव मंदिर की आठ बार प्रदक्षिणा करने से पापों का नाश होता है।


9)-भगवान भैरव का वाहन कुत्ता है इसलिए कुत्ते की भी पूजा की जाती है। कहते हैं कि अगर कुत्ता काले रंग का हो तो पूजा का माहात्म्य और बढ़ जाता है। कुछ भक्त तो उसे प्रसन्न करने के लिए दूध पिलाते हैं और मिठाई खिलाते हैं।


सभी प्रकार की तंत्र बाधाओं के लिए ये प्रयोग है,.


अमावस्या, कृष्ण पक्ष मे अष्टमी/ त्रयोदशी/चतुर्दशी  या सावन माह की किसी भी रात्रि करें|


अपने सामने एक सूखा नारियल , एक कपूर की डली , 11 लौंग 11 इलायची, 1 डली लोबान या धुप रखें |

सरसों के तेल का दीपक जलाएं |


हाथ में नारियल लेकर अपनी मनोकामना बोलें | नारियल सामने रखें |


दक्षिण दिशा कीओर देखकर इस मन्त्र का 108 बार जाप करें |


श्री बटुक भैरव मंत्र,...


 ""ऊं ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं""


बटुक भैरव कवच || 


ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः ।


पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु ॥


पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा ।


आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः ॥


नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे ।


वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः ॥


भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा ।


संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः ॥


ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः ।


सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः ॥


रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु ।


जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च ॥


डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः ।


हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः ॥


पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः ।


मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा ॥


महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा ।


वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा


..जय श्री महाकाल.


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किसी भी प्रकार की कोई भी बाधा आ रही हूं तो करें यह उपाय तुरंत समाधान होगा

 






किसी भी प्रकार की कोई भी बाधा आ रही हूं तो करें यह उपाय तुरंत समाधान होगा 


सर्व बाधा नाशक मंत्र:---


राम नाम लेकर हनुमान चले,कहा चले चौकी बिठाने चले,

चौकी बिठाके रात की विद्या दिन की विद्या चारो प्रहर की विद्या काटे हनुमान जती,

मंत्र बाँध तंत्र बाँध जन्त्र बाँध रगड के बाँध,

मेरी आण मेरे गुरू की आण,छु वाचापुरी ll

 


मंत्र का रोज मंगलवार से 108 बार जाप 21 दिन करना है |


.मंत्र सिद्ध  हो जाएगा |  विधि पूर्ण होने के पश्चात  हनुमान जी को रोट या लड्डू का भोग लगाएं  गाय को चारा खिलाएं | फिर किसी  बभुत पर मंत्र को 11 बार पढकर 3 फुंक लगाये |


अब बभुत को जिसपर तंत्र बाधा हो उसके माथे पर लगा दे तो पीडित के कष्ट दुर हो जायेगा |


इस मंत्र से चौकी भी लगती है,बाधा भी कटती है और बंधन भी लगाया जाता है |


यह हनुमान जी का मंत्र बहुत ही चमत्कारिक मंत्र है |


इस मंत्र से झाडा़ भी लगा सकते है और पानी मे पढकर भी दिया जा सकता है |


 यह उपाय परम वीर हनुमान जी का बहुत ही सिद्ध और तांत्रिक उपाय हैं अतः इसे करने से पूर्व एक बार


 

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जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की


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Sunday, October 25, 2020

दुर्लभ बगला-प्रत्यंगिरा कवच


 




दुर्लभ बगला-प्रत्यंगिरा कवच


मन्त्राभ्यासेन योगेन ज्ञानं ज्ञानाय कल्पते।

न योगेन बिना मंत्रो न मन्त्रेण बिना ही सः।।

द्वायोर्भ्यास संयोगो ब्रह्मसंसिद्धि कारणं ।।


अर्थात मंत्र और उसके अभ्यासरूपी योग से ज्ञान की प्राप्ति होती है। मंत्र के बिना योग के बिना मंत्र नहीं सधते। दोनों के अभ्यास में निपुर्णता से ही सभी सिद्धि मिलती है।


खैर अब बगलामुखी साधना से पूर्व की जाने वाली दिग्बन्धन सब को ज्ञात हो इसके लिए वो विधि दे रहा हूँ

सभी और अक्षत फेकते हुवे और निम्न देवियों की कल्पना अपनी चारो और करे की यह रक्षा कर रहे हैं


ॐ ऐं ह्लीं श्रीं श्यामा माम् पूर्वतः पातु,

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं आग्नेयां पातु तारिणी।।

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं महाविद्या दक्षिणे पातु,

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं नैऋत्यां षोडशी तथा।।

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं भुवनेशी पश्चिमायाम,

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं वायव्यां बगलामुखी।।

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं उत्तरे छिन्नमस्ता च,

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ऐश्यान्याम धूमावती तथा।।

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं उर्ध्व तु, कमला पातु

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं अन्तरिक्षं सर्वदेवताः।।

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं अधस्ताच्चैव मातंगी,

ॐ ऐं ह्लीं श्रीं सर्वदिङ्गबगलामुखी।।

।।इति दिग बंधन।।


दुर्लभ बगला-प्रत्यंगिरा कवच


कई भाइयो के मन मे इश दुर्लभ प्रयोग को सिद्ध करने की लालशा भी जागृत हुवी होगी....यहाँ पर छिन्नमस्ता की उस प्रत्यंगिरा कवच तो नही दे रहा हूँ (अत्यंत ही विनाशक होने के कारण और इसका Misuse होने की chances बहुत हैं ) पर वैसा ही प्रयोग बगला-प्रत्यंगिरा दे रहा हूँ जिससे की हर व्यक्ति इस दुर्लभ की अगर कही व्यापार हो तो पूर्ण प्रतिकार कर सके...पर यह प्रयोग भी अत्यंत ही उग्र है...तसर्थ सभी साधकों को निवेदन करता हूँ की अपनी सूझ-बूझ और विवेक से इस प्रयोग को संपन्न करें और करने से पूर्व अपने  गुरुदेव को सूचित करें। उनसे आज्ञा ले , 


इस प्रयोग को करने से पूर्व भगवान् शिव की इस वाणी को अपने मनमे अवश्य गाढ़लें ...


“मूर्खेण तु कृते तंत्रे स्वस्मिन्नेव समापतेत् ।


तस्माद्रक्ष्यः सदात्मा वै प्रत्यङ्गिरा नक्वचिच्चरेत ।।


न देयं तस्य मुर्खाणां यः संपूर्ण कुल विनाश कारणं


कथनम् मम नान्यथा ।।“


अर्थात मूर्खो द्वारा प्रत्यंगिरा का प्रयोग करने से उस पर ही उलटा प्रभाव होता है और यह पूर्णतः निश्चित होता है। अतः स्वार्थ और लोभादी से ग्रसित मुर्ख को कभी भी इन प्रयोगों से मजाक नही करना चाहिए। इससे ना केवल अपना


बल्कि पुरे कुल का समूल विनाश होता है और मेरे इस कथन में संसय न करो।


1) विनियोग


अस्य श्री बगलाप्रत्यंगिरामन्त्रस्य नारद ऋषिस्त्रिष्टुप छन्दः प्रत्यंगिरा देवता ह्लीं बीजं, हूं शक्तिः ह्रीं कीलकम् ह्लीं ह्लीं ह्लीं प्रत्यंगिरा मम शत्रुविनाशे विनियोगः ।


2) ||ॐ प्रत्यंगिरायै नमः प्रत्यांगिरे सकलकामान् साधय मम रक्षा कुरू कुरू सर्वान् शत्रुन् खादय खादय मारय मारय घातय घातय ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ||


ॐ भ्रामरी स्तंभिनि देवी क्षोभिणि मोहिनी तथा ।

संहारिणी द्राविणि च जृम्भिणी रौद्ररूपिणि ।।

इत्यष्टौ शक्तयो देवी शत्रु पक्षे नियोजिताः ।

धारयेत् कण्ठदेशे च सर्वशत्रु विनाशिनीः ।।


ॐ ह्लीं भ्रामरी मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं स्तंभिनि मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं क्षोभिणि मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं मोहिनी मम शत्रुन् मोहय मोहय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं संहारिणी मम शत्रुन् संहारय संहारय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं द्राविणि मम शत्रुन् द्रावय द्रावय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं जृम्भिणी मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ॐ ह्लीं स्वाहा।।

ॐ ह्लीं रौद्रि मम शत्रुन् संतापय संतापय ॐ ह्लीं स्वाहा।।


इयं विद्या महाविद्या सर्वशत्रु निवारिणी ।

धारिता साधकेन्द्रस्य सर्वान दुष्टान् विनाशयेत् ।।

त्रिसन्ध्यामेकसंध्यं वा यः पठेत्स्थिर मानसः ।

न तस्य दुर्लभं लोके कल्पवृक्ष इव स्थितः ।।

यं यं स्पृशति हस्तेन यं यं पश्यति चक्षुषाः ।

स एव दासतां याति सारात्सारमिमं मनुं ।।


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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बात शुक्र ग़ह और बहुत खूबसूरत दिखने वाली स्फटिक की माला की


 






बात शुक्र ग़ह और बहुत खूबसूरत दिखने वाली स्फटिक की माला की 


मित्रो शुक्र ग़ह जिस इंसान का अछा होता है उसे जीवन में धन,वैभव,सुख साधन की अनेक वस्तुओ का सुख , प्रेमी प्रेमिका पति पत्नी का सुख , चेहरे पर बहुत खूबसूरत चमक ये सब सुख उसको प्राप्त होते है 


जो इंसान शुक्र ग़ह को मजबूत करले उसे ऊपर लिखे सब सुख प्राप्त होते है शुक्र को मजबूत करने के लिए सबसे सरल उपाय है हाथ में शुक्र वार को ब्रेसलेट की तरहा जहा कंगन पहने जाते है वहा स्फटिक की माला पहन ले आपको जीवन बहुत जल्दी ऊपर लिखे सुख प्राप्त होंगे 


स्फटिक की माला धारण करने के लाभ 


(1) शुक्र ग़ह मजबूत होता है 


(2) जीवन में धन ,वैभव ,समृद्धि प्राप्त होती है 


(3) प्रेमी प्रेमिका पति पत्नी को वश में करके प्यार को बहुत तेज़ गति से बढ़ाता है


(4) वीर्य को बढ़के चेहरे पर खूबसूरती , आकर्षण पैदा करके वशीकरण करता है


(5) सुब्हे से रात तक काम करके न थकने वाली चुस्ती फुर्ती देता है 


ईसी कैसे प्राप्त करे इसकी कीमत 750 रुपये है जोकि आप हमारे  बैंक अकाउंट में जमा करके हमे घर की aadres बताय ये माला 5 दिन के अन्दर आपके घर भेज दी जायगी.


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Saturday, October 24, 2020

महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि


 





।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।।


इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पहले सुरक्षा घेरे से बाहर न आये । इस मंत्र को प्रतिदिन 11 माला जाप करे । माला कोई भी ले सकते है ।


चौमुखा तेल का दीपक जलाए और अंत में 11 आहुतियाँ बकरे की कलेजी की और गुग्गल की अग्नि में दे । अग्नि गोबर के कंडे की होनी चाहिए । यह क्रिया आपको 41 दिन तक करनी है । इस साधना में भैरव जी प्रत्यक्ष दर्शन देते है । साधना के दौरान ब्रह्मचारी रहे, ब्रह्मचर्य खंडित हो जाने पर व्यक्ति साधना का फल कम हो जाता है ।


।। प्रयोग विधि ।।


जब भी कोई कार्य करवाना हो तो इस मंत्र की 1 माला जप करे और अग्नि में 11 आहुतियाँ देकर भैरव जी से प्रार्थना करे , कार्य सिद्ध हो जायेगा अथवा कपूर का काजल अपनी हथेली पर लगाये और हथेली को देखते हुए मंत्र का जाप करे , भैरव जी हथेली में दर्शन देंगे और जो भी कार्य कहा जायेगा , वह कर देंगे ।


।। मंत्र ।।


।। काला भैरो काला बाण

खप्पर खाए चढ़े समान ,

जिन्दे को मारे , मुए की खबर ले आये

कढ कलेजा मुख विच पाए

चोटी मार तली ते आये

ता काला भैरो कहलाये ।।


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Friday, October 23, 2020

संतान संबंधित परेशानी या सेक्स प्रॉब्लम हो रहा है तो तूरमूली रत्ना धारण करें ....


 






संतान संबंधित परेशानी या सेक्स प्रॉब्लम हो रहा है तो तूरमूली रत्ना धारण करें ....


आप यदि सही ढंग से वैवाहिक सुख प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं यहां सेक्स लाभ नहीं ले पा रहे हैं या शारीरिक कमजोरी हो रही है 


या आपसी मेलजोल में कमी है या अन्य किसी भी प्रकार से समस्याएं हो रही है तो आप तूरमूली रत्ना धारण करें और पूरी तरीके से लाभ ले 


 व्यक्तिगत आजमाया हुआ रत्ना है और बहुत ही प्रभावी और लाभदायक रत्ना है खास विधि प्रयोग जानने के लिए हमें कॉल करें और रत्न के लिए संपर्क करें 


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नवग्रह शान्ति मन्त्र ( ग्रहों के कुप्रभाव को शांत करने के लिए मंत्र )


 




नवग्रह शान्ति मन्त्र ( ग्रहों के कुप्रभाव को शांत करने के लिए मंत्र )


सूर्य ग्रह की शांति के लिए आप शुक्ल पक्ष के रविवार से उपवास आरंभ कर सकते हैं। रविवार को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए और गेहूं की रोटी व गुड़ से अथवा गुड़ से बने दलिया का सेवन करना चाहिए। साथ ही पांच माला सूर्य के बीज मंत्र का जप करें,


ॐ हृं हृं स: सूर्याय नम:।


चंद्रमा की शांति के लिए आप श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक अथवा मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष के सोमवार से उपवास आरंभ कर सकते हैं। इसके अलावा प्रतिदिन “ॐ नम: शिवाय” मंत्र का जप पांच माला करें। सोमवार के दिन पांच माला चंद्रमा के बीज मंत्र का भी जप करना चाहिए। इस दिन शिव-पार्वती पर श्वेत पुष्प, सुपारी, अक्षत, बिल्व पत्र आदि चढ़ाकर ग्रह शांति की प्रार्थना करें।


ऊं श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम


मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगलवार को उपवास करना चाहिए। यह व्रत 21 सप्ताह तक करने से पूर्ण फल मिलता है। इस दिन नमक छोड़ दें और लाल पुष्प, फल, ताम्र बर्तन, नारियल आदि द्वारा हनुमान जी की पूजन करके उन्हें सिंदूर अर्पित करना चाहिए तथा लाल चंदन की माला से पांच माला यह मंत्र जपे।


ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:


बुध की शांति के लिए लिए बुधवार का उपवास रखना चाहिए और भगवान विष्णु की पूरे विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। अगर आप 21 या 31 बुधवार के व्रत का संकल्प लें, तो बेहतर होगा। व्रत के दिन श्री विष्णु सहस्रनाम का पांच या ग्यारह बार पाठ करें। यह पाठ प्रतिदिन पांच बार ही करना श्रेयस्कर माना गया है। घी, मूंग की दाल से बने पदार्थ से बुधवार को परहेज करें और इस मंत्र की पाँच माला जपे।


ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:


गुरु या बृहस्पति की शांति के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से उपवास आरंभ किया जाए, तो उपासक की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। व्रत के दिन स्नानादि के बाद पीले वस्त्र धारण करके पीले फूल, पीला नैवेद्य, गुड़, चने की दाल, हल्दी या पीले चंदन से सत्यनारायण भगवान की आराधना करें। साथ ही इस मंत्र का पांच माला जप करें।


ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:


शुक्र की शांति के लिए उपवास लक्ष्मी या वैभव लक्ष्मी के समक्ष श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, मावा की मिठाई, दीया, धूप आदि से पूजन करें और इस मंत्र का जप करें। यह व्रत 21 शुक्रवार तक करने तथा प्रतिदिन श्रीसूक्त का पाठ करने से लाभ होता है


ऊं द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:


शनि ग्रह की शांति के लिए: शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से यह उपवास आरंभ किया जा सकता है। 11 या 21 शनिवार तक व्रत करें, तो लाभप्रद होगा। इस दिन स्नान से पहले अपने ऊपर से 20-25 ग्राम सरसों या तिल के तेल में काले तिल डालकर सात बार सिर से पांव तक उतार लें और शनिदेव पर अर्पित करें। इसके बाद स्नान करके नीले वस्त्र पहनें। लौह निर्मित शनि प्रतिमा पर पंचामृत से स्नान कराएं तथा इस मंत्र का जप करें।


ॐ शं शनैश्चराय नम:


राहु की शांति के लिए: यह छाया ग्रह है, इसलिए इसके लिए कोई रात या दिन नहीं होता। राहु का उपवास शनिवार को ही करना चाहिए। इस दिन या प्रतिदिन पक्षियों को बाजरा खिलाएं और राहु मंत्र का 21 बार उच्चारण करें। साथ ही इस मंत्र का जप करें।


ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:


केतु की शांति के लिए: यह भी एक छाया ग्रह है, इसलिए इसकी कोई राशि या दिन नहीं होता। विद्वानों के अनुसार केतु मंगल के समान ही है। इसलिए इसका व्रत भी मंगलवार को ही करना चाहिए। इस दिन नमक रहित भोजन करें और बीज मंत्र का जप करें।


ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:


अशांत ग्रह को शांत करने के लिए सामान्य गृहस्थों के लिए कठोर तप के विकल्प के रूप में उपवास का विधान शास्त्रों में बताया गया है, जिससे वह किसी ग्रह की भी उपासना कर सकते हैं


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भगवती पीताम्बरा व धनाभाव


 





भगवती पीताम्बरा   व  धनाभाव 


मेरे यजमान की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, वह हर समय पैसों के अभाव में परेशान रहता था। उसके लिए अनुष्ठान करने का मन बना लिया, अब कोई ऐसा अनुष्ठान कंरू, जिससे उसे तुरन्त राहत मिलने लगे, बिना भगवती के प्रसन्न हुए यह सम्भव नहीं था, 


अतः भगवती बगला की प्रसन्नता एवं धन लाभ हेतु बगला शतनाम के पाठ व हवन का संकल्प लिया।


बगला शतनाम के एक सौ आठ माला पाठ कर, हवन कर दिया। परिणाम तुरन्त सामने आया यजमान की आर्थिक स्थिति में जबरदस्त सुधान प्रारम्भ हो गया।


क्रिया इस प्रकार की गई - विष्णुयामल से उद्धत है-


विनियोग - 


ऊँ अस्य श्री पीताम्वर्य अण्ठोन्तर शतनाम स्त्रोतस्य सदा शिव ऋषि, अनुष्टुप छन्दः श्री पीताम्बरी देवता श्री पीताम्बरी जपे हवन विनियोगः। (जल पृथवी पर डाल दें)


1. ऊँ बगलाये नमः स्वाहा।

2. ऊँ विष्णु विनिताये नमः स्वाहा।

3. ऊँ विष्णु शंकर भामनी नमः स्वाहा।

4. ऊँ बहुला नमः स्वाहा।

5. ऊँ वेदमाता नमः स्वाहा।

6. ऊँ महा विष्णु प्रसूरपि नमः स्वाहा।

7. ऊँ महा-मत्स्या नमः स्वाहा।

8. ऊँ महा-कूर्मा नमः स्वाहा।

9. ऊँ महा-वाराह-रूपिणी नमः स्वाहा।

10. ऊँ नरसिंह-प्रिया रम्या नमः स्वाहा।

11. ऊँ वामना वटु-रूपिणी नमः स्वाहा।

12. ऊँ जामदग्न्य-स्वरूपा नमः स्वाहा।

13. ऊँ रामा राम-प्रपूजिता नमः स्वाहा।

14. ऊँ कृष्णा नमः स्वाहा।

15. ऊँ कपर्दिनी नमः स्वाहा।

16. ऊँ कृत्या नमः स्वाहा।

17. ऊँ कलहा नमः स्वाहा।

18. ऊँ कलविकारिणी नमः स्वाहा।

19. ऊँ बुद्धिरूपा नमः स्वाहा।

20. ऊँ बुद्धि-भार्या नमः स्वाहा।

21. ऊँ बौद्ध-पाखण्ड- खण्डिनी नमः स्वाहा।

22. ऊँ कल्कि-रूपा नमः स्वाहा।

23. ऊँ कलि-हरा नमः स्वाहा।

24. ऊँ कलि-दुर्गति-नाशिनी नमः स्वाहा।

25. ऊँ कोटि-सूर्य-प्रतीकाशा नमः स्वाहा।

26. ऊँ कोटि-कन्दर्प-मोहिनी नमः स्वाहा।

27. ऊँ केवला नमः स्वाहा।

28. ऊँ कठिना नमः स्वाहा।

29. ऊँ काली नमः स्वाहा।

30. ऊँ कला कैवल्य-दायिनी नमः स्वाहा।

31. ऊँ केश्वी नमः स्वाहा।

32. ऊँ केश्वाराध्या नमः स्वाहा।

33. ऊँ किशोरी नमः स्वाहा।

34. ऊँ केशव-स्तुता नमः स्वाहा।

35. ऊँ रूद्र-रूपा नमः स्वाहा।

36. ऊँ रूद्र-मूर्ति नमः स्वाहा।

37. ऊँ रूद्राणी नमः स्वाहा।

38. ऊँ रूद्र-देवता नमः स्वाहा।

39. ऊँ नक्षत्र-रूपा नमः स्वाहा।

40. ऊँ नक्षत्रा नमः स्वाहा।

41. ऊँ नक्षत्रेश-प्रपूजिता नमः स्वाहा।

42. ऊँ नक्षत्रेश-प्रिया नमः स्वाहा।

43. ऊँ नित्या नमः स्वाहा।

44. ऊँ नक्षत्र-पति-वन्दिता नमः स्वाहा।

45. ऊँ नागिनी नमः स्वाहा।

46. ऊँ नाग-जननी नमः स्वाहा।

47. ऊँ नाग-राज-प्रवन्दिता नमः स्वाहा।

48. ऊँ नागेश्वरी नमः स्वाहा।

49. ऊँ नाग-कन्या नमः स्वाहा।

50. ऊँ नागरी नमः स्वाहा।

51. ऊँ नगात्मजा नमः स्वाहा।

52. ऊँ नगाधिराज-तनया नमः स्वाहा।

53. ऊँ नाग-राज-प्रपूजिता नमः स्वाहा।

54. ऊँ नवीना नमः स्वाहा।

55. ऊँ नीरदा नमः स्वाहा।

56. ऊँ पीता नमः स्वाहा।

57. ऊँ श्यामा नमः स्वाहा।

58. ऊँ सौन्दर्य-करिणी नमः स्वाहा।

59. ऊँ रक्ता नमः स्वाहा।

60. ऊँ नीला नमः स्वाहा।

61. ऊँ घना नमः स्वाहा।

62. ऊँ शुभ्रा नमः स्वाहा। 

63. ऊँ श्वेता नमः स्वाहा।

64. ऊँ सौभाग्या नमः स्वाहा।

65. ऊँ सुन्दरी नमः स्वाहा।

66. ऊँ सौभगा नमः स्वाहा।

67. ऊँ सौम्या नमः स्वाहा।

68. ऊँ स्वर्णभा नमः स्वाहा।

69. ऊँ स्वर्गति-प्रदा नमः स्वाहा।

70. ऊँ रिपु-त्रास-करी नमः स्वाहा।

71. ऊँ रेखा नमः स्वाहा।

72. ऊँ शत्रु-संहार-कारिणी नमः स्वाहा।

73. ऊँ भामिनी नमः स्वाहा।

74. ऊँ तथा माया नमः स्वाहा।

75. ऊँ स्तम्भिनी नमः स्वाहा।

76. ऊँ मोहिनी नमः स्वाहा।

77. ऊँ राग-ध्वंस-करी नमः स्वाहा।

78. ऊँ रात्री नमः स्वाहा।

79. ऊँ शैख-ध्वंस-कारिणी नमः स्वाहा।

80. ऊँ यक्षिणी नमः स्वाहा।

81. ऊँ सिद्ध-निवहा नमः स्वाहा।

82. ऊँ सिद्धेशा नमः स्वाहा।

83. ऊँ सिद्धि-रूपिणी नमः स्वाहा।

84. ऊँ लकां-पति-ध्ंवस-करी नमः स्वाहा।

85. ऊँ लंकेश-रिपु-वन्दिता नमः स्वाहा।

86. ऊँ लंका-नाथ-कुल-हरा नमः स्वाहा।

87. ऊँ महा-रावण-हारिणी नमः स्वाहा।

88. ऊँ देव-दानव-सिद्धौध-पूजिता नमः स्वाहा।

89. ऊँ परमेश्वरी नमः स्वाहा।

90. ऊँ पराणु-रूपा नमः स्वाहा।

91. ऊँ परमा नमः स्वाहा।

92. ऊँ पर-तन्त्र-विनाशनी नमः स्वाहा।

93. ऊँ वरदा नमः स्वाहा।

94. ऊँ वदराऽऽराध्या नमः स्वाहा।

95. ऊँ वर-दान-परायणा नमः स्वाहा।

96. ऊँ वर-देश-प्रिया-वीरा नमः स्वाहा।

97. ऊँ वीर-भूषण-भूषिता नमः स्वाहा।

98. ऊँ वसुदा नमः स्वाहा।

99. ऊँ वहुदा नमः स्वाहा।

100. ऊँ वाणी नमः स्वाहा।

101. ऊँ ब्रह्म-रूपा नमः स्वाहा।

102. ऊँ वरानना नमः स्वाहा।

103. ऊँ वलदा नमः स्वाहा।

104. ऊँ पीत-वसना नमः स्वाहा।

105. ऊँ पीत-भूषण-भूषिता नमः स्वाहा।

106. ऊँ पीत-पुष्प-प्रिया नमः स्वाहा।

107. ऊँ पीत-हारा नमः स्वाहा।

108. ऊँ पीत-स्वरूपिणी नमः स्वाहा।


हवन सामग्री:-


शक्कर का बूरा  - 2 किलो0

काला तिल   - 2 किलो

कमल बीज  - 200 ग्राम

शहद   - 100 ग्राम

देशी घी          -  200 ग्राम

नमक   - 10 ग्राम


-निर्देश ----- 


1. पहले 10 माला का हवन यानी दस हजार आहुतियाँ देकर प्रतिदिन छत्तीस दिनों तक एक माला हवन यानी एक सौ आहुतियाँ देते रहने से आर्थिक स्थिति में जबर्दस्त सुधार हो जाता है।


2. इस शतनाम हवन के प्रयोग से भगवती की प्रसन्नता साधक के प्रति बढ़ जाती है, जिससे साधक के प्रत्येक कार्य सुगमता-पूर्वक होने लगते हैं व विपक्षियों की उल्टी गिनती प्रारम्भ हो जाती है।


3. हवन कर अग्नि विसर्जन कर दें - हे अग्नि देव अब आप अपने लोक में प्रस्थान करें व हमारे द्वारा दी गई आहुतियाँ सम्बन्धित देवी/देवताओं को पहुँचा दें, कह कर हवन की अग्नि पर तीन बार जल डाल दें।


उपरोक्त पोस्ट ऐक अनुभवी साधक का स्वंय का अनुभवहै।


वशीकरण कर्म 


षट् कर्मो मे दूसरे नम्बर पर आता है वशीकरण 

यानि किसी को भी अपने वश मे करना 

आज मे वशीकरण के नियम बता रहा हू जिनके पालन करने से वशीकरण के प्रयोग सफल होते है और ना करने पर असफल


वशीकरण की देवी सरस्वती है 


वशीकरण पूर्व या उत्तर मुख होकर किया जाता है 


वशीकरण के लिये वसन्त रितु उत्तम मानी जाती है 


वशीकरण दशमी एकादशी , प्रतिपदा ,अमावस्या को शुभ होता है 


वशीकरण शुक्रवार शनिवार को किया जाता है 


ज्येष्ठा , उत्ताषाढ ,अनुराधा , रोहिणी ये माहेन्द्र मण्डल के नक्षत्र है इनमे वशीकरण करना चाहिये 


मीन मेष कन्या धनु लग्न मे वशीकरण करना चाहिये 


वशीकरण अग्नि तत्व के उदय मे करने चाहिये 


वशीकरण आकर्षण के लिये देवता को लोहित वर्ण मे ध्यान करना चाहिये 


वशीकरण भद्रासन मे करना चाहिये 


मेढा के आसन पर बैठकर वशीकरण करे या लाल कम्बल पर 


वशीकरण मे पाश मुद्रा का प्रयोग किया जाता है 


वशीकरण मे देवता को सुन्दर रूप का ध्यान किया जाता है 


वशीकरण मे पीतल का कलश रखा जाता है 


वशीकरण रूद्राक्ष या स्फटिक माला प्रयोग करनी चाहिये 


आकर्षण मे घोडे के पूछ के बालो से माला तैयार करनी चाहिये 


वशीकरण के लिये योनि जैसी आकृति वाले कुण्ड मे वायव्य कोण की तरफ मुह करके हवन करना चाहिये 


चमेली के फूलो से , वशीकरण कर्म मे हवन करना चाहिये 


आकर्षण कर्म मे ईशान कोण मे स्थित अग्नि की स्वर्ण वर्णा  हिरण्या नामक जिह्वा की जरूरत होती है 


वशीकरण मे पूर्ण आहुति के समय अग्नि के कामद नाम का उच्चारण करना चाहिये


वशीकरण मे मंत्र के अंत मे स्वाहा लगाकर होम किया जाता है 


अगली पोस्ट विद्वेषण पर  होगी 


इनमे दी गयी सारी जानकारी प्रयोग करते समय पालन करने से प्रयोग निष्फल नही होता 


चेतावनी -


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Thursday, October 22, 2020

बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग


 






बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग


भौतिक मनोकामनाओं की पुर्ति के लिये बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग 


अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए मंगल अथवा शनिवार का दिन चुन लें। हनुमानजी का एक चित्र या मूर्ति जप करते समय सामने रख लें। ऊनी अथवा कुशासन बैठने के लिए प्रयोग करें। अनुष्ठान के लिये शुद्ध स्थान तथा शान्त वातावरण आवश्यक है। घर में यदि यह सुलभ न हो तो कहीं एकान्त स्थान अथवा एकान्त में स्थित हनुमानजी के मन्दिर में प्रयोग करें।


हनुमान जी के अनुष्ठान मे अथवा पूजा आदि में दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। पाँच अनाजों (गेहूँ, चावल, मूँग, उड़द और काले तिल) को अनुष्ठान से पूर्व एक-एक मुट्ठी प्रमाण में लेकर शुद्ध गंगाजल में भिगो दें। अनुष्ठान वाले दिन इन अनाजों को पीसकर उनका दीया बनाएँ।


 बत्ती के लिए अपनी लम्बाई के बराबर कलावे का एक तार लें अथवा एक कच्चे सूत को लम्बाई के बराबर काटकर लाल रंग में रंग लें। इस धागे को पाँच बार मोड़ लें। इस प्रकार के धागे की बत्ती को सुगन्धित तिल के तेल में डालकर प्रयोग करें। समस्त पूजा काल में यह दिया जलता रहना चाहिए। हनुमानजी के लिये गूगुल की धूनी की भी व्यवस्था रखें।


जप के प्रारम्भ में यह संकल्प अवश्य लें कि आपका कार्य जब भी होगा, हनुमानजी के निमित्त नियमित कुछ भी करते रहेंगे। अब शुद्ध उच्चारण से हनुमान जी की छवि पर ध्यान केन्द्रित करके बजरंग बाण का जाप प्रारम्भ करें। “श्रीराम–” से लेकर “–सिद्ध करैं हनुमान” तक एक बैठक में ही इसकी एक माला जप करनी है।


गूगुल की सुगन्धि देकर जिस घर में बगरंग बाण का नियमित पाठ होता है, वहाँ दुर्भाग्य, दारिद्रय, भूत-प्रेत का प्रकोप और असाध्य शारीरिक कष्ट आ ही नहीं पाते। समयाभाव में जो व्यक्ति नित्य पाठ करने में असमर्थ हो, उन्हें कम से कम प्रत्येक मंगलवार को यह जप अवश्य करना चाहिए।


बजरंग बाण ध्यान


श्रीराम

अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं।

दनुज वन कृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।

रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।


दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।

तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।


चौपाई

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।

जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।

जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।

बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।

अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।

लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।

अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।

जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।

ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।

गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।

सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।

सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।

जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।

वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।

पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।

जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।

बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।

भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।

इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।

जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।

जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।

उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।

ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।

ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।

अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।

ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।

ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।

हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।

हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।

जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।

जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।

जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।

जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।

जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।

ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।

राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।

विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।

तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।

यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।

सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।

एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।

याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।

मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।

डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।

भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।

प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।

आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।

दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।

यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।

शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।

तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।

तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।


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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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Wednesday, October 21, 2020

स्वर्णाकर्षण भैरव यन्त्र और गुटिका के कुछ प्रयोग:


 




स्वर्णाकर्षण भैरव यन्त्र और गुटिका के कुछ प्रयोग:


स्नेही स्वजनों ! अभी कुछ दिनों पूर्व हमने स्वर्णाकर्षण भैरव यंत्र और गुटिका के बारे में एक पोस्ट दी थी और उसी के प्रतिउत्तर में मुझे कई सारे मैसेज आये कि हमें इससे सम्बंधित प्रयोग भी दिए जाएँ, और आज मैंने मन बना ही लिया कि मुझे इससे सम्बंधित प्रयोग देना ही है जिससे की आप सब लाभ उठा सकें, 


हालाँकि------


 मै जानत हूँ कि लोग कम ही है जो साधना या प्रयोग करना चाहते हैं, लेकिन जो चाहते हैं कम से कम उन्हें तो ये प्रयोग मिलना ही चाहिए न .....


भाइयो बहनों क्या आप जानते हैं की इन आठ दस वर्षों में सैंकड़ों प्रयोग आये सैंकड़ों साधनाएं दी जा चुकी हैं, किन्तु उन्हें ही आज तक लोग नहीं कर पाए हाँ उसके आगे की चाह जरुर रखते हैं,


 सिर्फ कलेक्सन हेतु---- सॉरी, किन्तु यही सच है..... कोई बात नहीं हमें तो बस अब आगे ही बढ़ना है जिनको वाकई इन साधना और प्रयोग की आवश्यकता है उन्हें तो मिलना ही चाहिए .... तो स्वर्णाकर्षण यंत्र और भैरव गुटिका से सम्बंधित तीन महत्वपूर्ण प्रयोग, वैसे तो इस पर अनेक प्रयोग समय-समय पर दिए हैं किन्तु ये तीन अति आवश्यक और समयानुकूल और परिस्तिथि के अनुकूल हैं....


 ये प्रयोग जो एक तरफ लक्ष्मी प्राप्ति के साधन हैं, तो दूसरी तरफ तंत्र बाधा निवारण में सहायक हैं, तथा एक और गृहस्थ जीवन में सुख शांति लाने समर्थ हैं तो दूसरी और स्वास्थ्य लाभ के लिए भी अति महत्वपूर्ण..... अतः इन साधनाओं को एक बार जरुर आजमायें ---


वैसे इन्हें प्रयोग करने के लिए विशेस तिथि है वैशाख माह की एकादशी, किन्तु समय और परिस्तिथि के अनुसार इन प्रयोगों को किसी भी माह की एकादशी, या तंत्र बाधा हेतु अमावश्या और कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सम्पन्न कर सकते हैं |


इस प्रयोग को संपन्न करने के लिए साधक पीली धोती पहनकर, उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके बैठ जाएँ | सामने लाल वस्त्र बिछाकर उस पर आठ चावलों की ढेरी बनायें, और उनके सामने एक बड़ी चावल की ढेरी बनायें और उस पर यंत्र का स्थापन करें तथा उस यंत्र पर ही उस गुटिका को भी स्थापिय कर दें, अब उन आठ चावल की ढेरी पर आठ कमल बीज स्थापित करें, भाइयो बहनों कमल बीज मार्केट में पूजा की दुकान पर बड़ी आसानी से प्राप्त हो जाता है----


अतः परेशांन होकर शांत भाव से सारी सामग्री एकत्रित कर लें तब साधना में बैठे, और शांत भाव से एकाग्रचित्त होकर लगभग दो घंटे निम्न मन्त्र का जप संपन्न करें, इसमें माला या गिनती का बंधन बिलकुल नहीं है अतः दो घंटे में जितना भी जाये.....


मन्त्र—


“ॐ ह्रीं धनधान्याधिपतये स्वर्णाकर्षण कुबेराय सम्रद्धिं देहि-दापय स्वाहा” |


“Om hreem dhandhaanyadhipataye swarnakarshan kuberay samraddhim dehi dapay swaha” |


मन्त्र जप से पूर्व हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि अमुक व्यापार या कार्य के लिए पूर्ण सफलता के लिए ये प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ या रही हूँ....... ये एक ही दिन का प्रयोग हैऔर जप के बाद उस सारी सामग्री को उसी कपडे में बाँध कर 


किसी कोने में या लॉकर में रख दें ऐसा करने पर मनोवांछित प्राप्त होता ही है....


२- तंत्र बाधा निवारण हेतु ---


साधक सफ़ेद वस्त्र पहनकर सफ़ेद आसन पर बैठ जाएँ सामने पट्टे पर सफ़ेद वस्त्र बिछा दें तथा एक मिटटी का हांड़ी या छोटा कुल्हड़ लें और उसमें भैरव गुटिका रखकर उसे लगभग सौ ग्राम पीली सरसों या इसके आभाव में काली मिर्च लेकर गुटिका को ढँक दें और इस हांड़ी को अपने सामने जमीन पर रख दें तथा सामने उस सफ़ेद वस्त्र पर स्वर्णाकर्शंभैरव यंत्र स्थापित कर उस पर सिंदूर, (जो कि बजरंगबली को चढाते हैं) लगा दें तथा संकल्प लेकर निम्न मन्त्र का जप दो घंटे तक ही करें तथा जप के बाद उस हांड़ी को गुटिका के साथ ही घर से कहीं दूर जमीन में दबा दें--------


चूँकि ये तंत्र बाधा के लिए है अतः इसे घर से दूर ही दबाना है—


मन्त्र-


“ॐ क्लीं क्रीं हुं मम इच्छित कार्य सिद्धि करि-करि हुं क्रीं क्लीं फट्” |


“Om kleem kreem hum mam ikshit kary siddhi kari-kari hum kreem kleem fatta” |


३- स्वस्थ्य लाभ हेतु---


इस प्रयोग में यंत्र और गुटिका के साथ काली हकिक माला की भी आवश्यकता होती है यदि काली हक़ीक न मिल सके तो रुद्राक्ष की भी ले सकते हैं सामने लाल वस्त्र बिछाकर कर यंत्र का स्थापन करें यंत्र का पूजन सिंदूर और अक्षत से करें तथा संकल्प लेकर एक ताम्बे के पात्र में गुटिका को यंत्र के सामने ही स्थापित करे इसमें सीधे यानि दायें हाथ से माला करते हुए उलटे हाथ से गुटिका पर जल चढाते हुए दो घंटे तक मन्त्र करना है----- फिर उस जल को रोगी को पिला दें, औए उस पर छिड़क भी दें.......


मन्त्र—


“ॐ यं स्वर्णाकर्षण गुटिकायै मम कार्य सिद्धि करि-करि हुं फट्” | 


“Om yam swarnakarshan gutikayai mam kary siddhi kari-kari hum fatta” |


भाइयो बहनों, एक महत्वपूर्ण बात ये कि इन तीनो प्रयोग में यंत्र तो एक होगा किन्तु गुटिका अलग-अलग ही प्रयोग होंगी.


चूँकि मेरे तो अनुभूत हैं ही आप भी आजमाइए----


दक्षिणा शुल्क 1500 रू +डाक व्यय


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राहु से बनने वाले कुछ योग


 







*राहु से बनने वाले कुछ योग-*


*आज का विषय बहुत ही अच्छा रखा है अच्छा तो हर रोज होता है हर रोज ही महत्वपूर्ण होता है। आज हम बात करते हैं राहु से बनने वाले योगों से लोगों के बारे में ऊपर हमारे विद्वानों ने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है तो मैं भी एक थोड़ा सा और छोटा सा विश्लेषण दे रहा हूं।


 सबसे पहले मुख्य बात है राहु एक पाप ग्रह है और वह जिस स्थान में बैठता है वहां की कुछ ना कुछ हानि जरूर करता है लेकिन वह शुभ ग्रहों के साथ या शुभ राशि में या मित्र राशि में वह बैठता है तो अच्छा फल देता है।


 सिर्फ एक कुंडली से ही पता नहीं चलता उसे नवमांश दशांश गोचर दशा महादशा अंतर्दशा यह सभी देखकर ही सब कुछ पता लगाया जा सकता है कि यह कैसा फल देगा फिर भी कुछ योग बनते हैं।


 जैसे कपट योग, क्रोध योग,अष्ट लक्ष्मी योग, पिशाच बाधा योग, चांडाल योग, अंगारक योग, ग्रहण योग, सर्प शाप योग, परिभाषा योग, अरिष्ट भंग योग, लग्न कारक योग, पायालु योग, और राहु शनि की युति के योग इस तरह से कुछ लोग हैं और भी कई योग हैं।*


*1- कपट योग- 


जब कुंडली के चौथे घर में शनि हो और राहु 12 वे घर में हो तो कपट योग होता है इस योग के कारण कथनी और करनी में अंतर होता है।*


*2-क्रोध योग- 


सूर्य बुध या शुक्र के साथ राहु लग्न में हो तो क्रोध योग होता है। जिसके कारण जातक को लड़ाई झगड़ा,वाद विवाद के परिणाम स्वरूप हानि और दुख उठाना पड़ता है।*


*3- अष्टलक्ष्मी योग- 


जब राहु षष्ठम में और गुरु केंद्र (दशम) मैं हो तो अष्टलक्ष्मी योग होता है। इस योग के कारण व्यक्ति शांति के साथ यशस्वी जीवन जीता है।*


*4- पिशाच बाधा योग-


 चंद्र के साथ राहु लग्न में हो तो पिशाच बाधा योग होता है इस योग के कारण पिशाच बाधा की तकलीफ सहनी पड़ती है और व्यक्ति निराशावादी अपने को घात पहुंचाने की कोशिश करता है।*


*5- मेष कर्क तुला मकर लग्न में अगर चंद्र राहु की युति केंद्र में हो तो शुभ फलदायक होता है ।अगर त्रिकोण (5,9) का स्वामी चंद्र हो उन्हें मैं चंद्र राहु की युति हो तो शुभ फल देती है। अन्य भागों में चंद्र राहु की युति होने से भयंकर आरोपों के द्वारा उत्पन्न मुकदमा वाजी का सामना करना पड़ता है तथा अनेक प्रकार का दुख भोगना पड़ता है।*


*6- चांडाल योग- 


गुरु के साथ राहु की युति होने से चांडाल योग बनता है इस योग के प्रभाव से नास्तिक और पाखंडी होता है लेकिन इसमें अंशौ को देखना बहुत जरूरी है।*


*7- परिभाषा योग- 


लग्न में या 3,6,11 मैं से किसी भी स्थान में राहु हो तो परिभाषा योग होता है इस राहु पर शुभ ग्रह की दृष्टि से यह शुभ फलदायक होता है।*


*8- अरिष्ट भंग योग- 


मेष, वृष, कर्क इन तीनों राशियों में से कोई लग्न हो और राहु 9,10,11 में हो तो अरिष्ट भंग होता है और यह शुभ फलदायक होता है।*


*9- लग्न कारक योग- 


मेष वृष या कर्क लग्न हो और 2,9,10 इन स्थानों को छोड़कर अन्य किसी स्थान में राहु हो तो लगन कारक होता है। यह योग सर्वरिष्ट निवारक होता है।*


*10- पायालू योग- 


जब राहु और लग्नेश दोनों दशम भाव में हो तो जातक मां के गर्भ से पैरों की तरफ से जन्म लेता है इसे पायालु कहते हैं।*


*11- अंगारक योग- 


राहु और मंगल की युति हो तो उसे अंगारक योग कहते हैं जिसमें व्यक्ति को हानि उठानी पड़ती है और सबसे पहले यह देखना होता है कि वह किस भाव में है शुभ है या अशुभ।*


*12- राहु शनि युति योग- 


शनि राहु की युति लग्न में हो तो सेहत ठीक नहीं रहती व्यक्ति हमेशा बीमार रहता है। चतुर्थ स्थान में होने से माता को कष्ट होता है पंचम में होने से संतति के लिए कष्ट होता है सप्तम में पति पत्नी के लिए कष्ट होता है नवम में पिता के लिए कष्ट होता है दशम में व्यापार एवं प्रतिष्ठा की हानि होती है परंतु यदि गुरु की दृष्टि हो तो प्रभाव में कमी आ जाती है।*


और अधिक जानकारी समाधान उपाय विधि प्रयोग या ओरिजिनल रत्न की जानकारी या रत्न प्राप्ति के लिए या कुंडली विश्लेषण कुंडली बनवाने के लिए संपर्क करें


जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की


  परामर्श      दक्षिणा  -  201  मात्र .


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Tuesday, October 20, 2020

जन्मपत्री


 





जन्मपत्री मे गृह दशा व हाथो की रेखा अच्छी होने पर भी कुछ व्यक्ति असहाय होकर कुछ कर नहीं पाते है व दिन प्रतिदिन आर्थिक, मानसिक, शारीरिक, घरेलू परेशानी बढ़ती जाती है. 


ऐसा व्यक्ति का किसी भी कारण से नजर दोष तंत्र मंत्र ऊपरी हवा के प्रभाव मे आने से होता है. जब व्यक्ति तांत्रिक प्रभाव मे होता है तो उसे कुछ शारीरिक परेशानी होती है. जैसे.....


शरीर पर बिना चोट के नीले निशान होना 

सिर के पीछे वाले भाग मे दर्द रहना 

रात्रि मे बुरे / गंदे सपने दिखाई देना

व्यक्ति को गन्दा रहना अच्छा लगना 

बिना किसी कारण के घबराहट रहना

अपने आपसे खुद बात करना 


ज्योतिष उपाय...


ऐसे व्यक्तिओ को रामचरितमानस की चौपाई " मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।" का रोज जाप व एक सुलमानी हकीक रत्न धारण करना चाहिए.    


नोट : 


कुछ व्यक्ति तंत्र मंत्र प्रभाव को ढोंग समझते है, ऐसे व्यक्ति पीपल के पेड़ की छाँव मे रात्रि के समय पेशाब या लघु शंका करे, उन्हे तंत्र मंत्र का प्रभाव महसूस हो जाएगा.    


जन्मपत्री - 


हस्तरेखा सलाह व नजर दोष रत्न सुलेमानी हकीक कीमत  550/ -  वजन 11 रत्ती अपने घर पर डाक से मंगवाने के लिए, हमे फ़ोन करे. .


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  परामर्श      दक्षिणा  -  251  मात्र .


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सम्भोग सुख वशीकरण






सम्भोग सुख वशीकरण

ऐं सहवल्लरी क्लीं कर क्लीं कर पिसाच
अमुकीं काम ग्राहा, स्वपने मम रूपे नखै
विदारय विदारय, द्रावय, द्रावय रद महेन
बन्धय बन्धय श्रीं फट्

विधि : मध्य रात्रि के समय सारे कपडे उतार कर, उत्तर दिशा कि तरफ मुख कर के इस मंत्र का पाठ करना है।  जप करते समय अमुकी के स्थान पर अभिलाषित लड़की और स्त्री का नाम लें। 

ध्यान रखें: इस जप को जपते समय आपको अपने आप को पूर्ण रूप से कामुक कर लेना है तभी ये सफल होगा।  इस क्रिया से आपको जल्दी ही मनचाही स्त्री प्राप्त होगी। 

अवधि : इस को कुल 21 दिनों तक करना है।  और सूर्यादय से पहले ये करना है।  प्रतिदिन 3 माला  जपना  है।  सफलता आपके हाथ में होगी। 

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Sunday, October 18, 2020

यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, तो अपना नाम बदलकर उन्नति पा सकते है आइये जानते है केसे -


 




यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, तो अपना नाम बदलकर उन्नति पा सकते है आइये जानते है केसे -


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यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, आप अपने व्यवसाय में निरंतर नुकसान में चल रहे है या आप अपने नाम से उन्नति या प्रसिद्धि नहीं पा रहे हैं तो अपना नाम बदलकर उन्नति पा सकते हैं। आप अपने व्यावसायिक नाम में मामूली हेर-फेर कर अपने व्यापार को प्रगति की ओर अग्रसर कर सकते हैं और यश-प्रतिष्ठा के भागी बन सकते हैं।


अंक ज्योतिष द्वारा आप किस प्रकार लाभ पाएँ, इसकी जानकारी यहाँ प्रस्तुत आलेख में पाएँगे। यहाँ पर में एक चार्ट दे रही हूँ -अँग्रेजी वर्णमाला जैसे ए से लेकर झेड तक के अक्षरों के अलग-अलग अंक निर्धारित हैं, आप अपने नाम को इस वर्णमाला में देखकर अंक जोड़ें। यदि नामांक प्रतिकूल हो तब नाम में थोड़ा हेर-फेर कर उसे अनुकूल बनाया जा सकता है।


उपरोक्त चार्ट अनुसार अँग्रेजी वर्णमाला ए से झेड के अंक दिए गए हैं। हम अंक विद्या से निम्न प्रश्नों के उत्तर जान सकते हैं।


* वर्तमान में जो नाम है, वह मेरे व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने में सहायक है या नहीं?


* क्या मैं अपना नाम परिवर्तन कर अनुकूल बना सकता हूँ?


* मेरे नाम का योगफल मेरी जन्मतिथि से अनुकूल है या नहीं?


* मैं जिस शहर में रह रहा हूँ, वह मेरे नाम के अनुकूल है या नहीं?


* मेरे पति या मेरी पत्नी का नाम के अंकों अनुसार अनुकूल है या नहीं?


* मेरे और मेरे साझेदार के नाम में मित्रता है या नहीं?


* मेरे से संबंधित व्यापार-व्यवसाय या जिस संस्था में कार्य कर रहा हूँ, अनुकूल है या नहीं?


* मेरे पुत्र या मेरी कन्या का नामांक उसकी जन्म तारीख से संबंधित है या नहीं?


* मेरी संतान के नामांक मेरे नामांक से संबंधित हैं या नहीं?


* मेरे मित्र से मेरा नामांक मिलता है या नहीं?


इस प्रकार के अनेक सवालों का जवाब हमें मिल सकता है, बस थोड़ा-सा गणित करना भर रहता है। हम यहाँ पर कुछ उदाहरण देकर समझाएँगे, जिसकी सहायता से आप अपने नामांक को सुधार सकते हैं एवं उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर पा सकते हैं। 


जैसे किसी का नाम राजेन्द्रकुमार वर्मा है तो इस प्रकार जानेंगे।


इस प्रकार उपरोक्त नाम का टोटल अंक 50 आया, जो मध्यम फल दर्शाता है।


 यदि ये अपना नाम सिर्फ राजेंद्रकुमार लिखेंगे तो टोटल अंक 36 आएगा, जो इनके लिए उत्तम साबित होगा।


 इसी प्रकार एम.एस. पंवार को लें तो...टोटल अंक 30 आया जो पूर्णता का है, ऐसे जातक ऊँचाइयों पर जाते हैं।


 इसी प्रकार किसी भी संस्था का नाम या मित्र आदि को देखकर जान सकते है कि यह अपने लिए लाभकारी रहेंगे या मध्यम या फिर नहीं। 


इसके लिए हम यहाँ पर अंकों के हिसाब से उत्तम, मध्यम व अशुभ अंक में लिखेंगे।


व्यक्ति का एक और अंक होता है जिसे सौभाग्य अंक (Destiny Number/ Lucky Number) कहते हैं.


 यह नम्बर परिवर्तनशील है. व्यक्ति के नाम के अक्षरो के कुल योग से बनने वाले अंक को सौभाग्य अंक कहा जाता है, जैसे कि मान लो किसी व्यक्ति का नाम RAMAN है, तो उसका सौभाग्य अंक R=2, A=1, M=4, A=1, एंव N=5 = 2+1+4+1+5 =13 =1+3 =4 होगा. 


यदि किसी व्यक्ति का सौभाग्य अंक उसके अनुकूल नही है तो उसके नाम के अंको में घटा जोड करके सौभाग्य अंक (Saubhagya Anka) को परिवर्तित कर सकते हैं, जिससे कि वह उस व्यक्ति के अनुकूल हो सके.


 सौभाग्य अंक का सीधा सम्बन्ध मूलांक से होता है. व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव मूलांक का होता है. 


चूंकि मूलांक स्थिर अंक होता है तो वह व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को दर्शाता है तथा मूलांक का तालमेल ही सौभाग्य अंक से बनाया जाता है.


निम्‍नानुसार जो उत्तम है, वो उत्तम सहायक व उन्नतिदायक प्रसिद्धि के अंक हैं। मध्यम अंक मिली-जुली स्थिति वाले अंक हैं एवं अशुभ वाले अंक यदि आपके जोड़ में आते हों तो फेरबदल कर उत्तम लाभ पा सकते हैं।


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योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है



 





योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है


-अधिष्ठान(निवास स्थान)।यही वह अधिष्ठान है जहाँ योगी स्थिर हो कर आदि शक्ति में लीन होता है।आदि शक्ति,ललिताम्बा,त्रिपुरसुंदरी यहाँ अधिष्ठात्री हैं।

"योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिपुराम्बा त्रिकोणगा"


कतिपय साधकों के अनुसार,लाहिड़ी महाशय कहते थे कि योनि मुद्रा का अभ्यास रात्रि में ही करना चाहिए।परंतु इसे सत्य नही माना जा सकता।योनि मुद्रा ध्यान की अवस्था में एक विशिष्ठ सोपान है तथा क्रिया के अभ्यास के पहले तथा बाद में भी माता की कृपा होती है।


योनि मुद्रा एक स्वयम्भू मुद्रा है तथा इस मुद्रा के संदर्भ में,यद्यपि साधक को अभ्यास करना होता है,अभ्यास शब्द उचित प्रतीत नही होता।यही बात महा मुद्रा तथा खेचरी मुद्रा के संदर्भ में भी सत्य है।ये मुद्राएं योगी की उन्नत क्रमविकास की पराकाष्टा की ओर संकेत करती हैं।अंतः अभ्यास शब्द के स्थान पर मै "प्रणाम" शब्द का प्रयोग करता हूँ।


आज्ञा चक्र के माध्यम से भ्रूमध्य में योनि(त्रिकोण) का दर्शन माता की कृपा से ही सम्भव होता है।वर्षों की साधना के बाद ही योगी पात्र हो पाता है।योगी को कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं।


विधि-


1-आरम्भ में खेचरी मुद्रा के बिना भी योनि मुद्रा को प्रणाम कर सकते हैं।


2-आँखे तथा मुख बन्द कर क्रिया प्राणायाम की तरह ही प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर खींचना शरू करें तथा बिंदु(मेडुला) तक ले कर आएं।


साथ ही अपने दोनों हाथों की कुहनियों को ऊपर उठाते हुए अँगुलियों को चेहरे के समीप लाएं।यहाँ उद्देश्य है कि हमारी आँखे,मुख, कान तथा नासिकॉ छिद्र अँगुलियों द्वारा पूर्ण रूपेण बन्द किये जाएं।


लेखकों ने नियम भी बना दिए हैं,जैसे कानों को अंगूठों से,होठों को अनामिका से इत्यादि।


मेरा सुझाव है कि आप अपनी सुविधा से अँगुलियों का प्रयोग करें।कालांतर में नासिका छिद्र एवम् होठों के लिए अँगुलियों के प्रयोग की आवश्यकता ही नही पड़ती।संक्षेप में,समस्त द्वार जहाँ से ऊर्जा बाहर जा सकती है,बन्द होने चाहिए।


ध्यान रहे,नासिका छिद्र बन्द करने के पूर्व आपका ऊर्जा आरोहण(inhalation) पूर्ण हो जाना चाहिए।


3-ऊर्जा का आरोहण पूर्ण है;समस्त द्वार बन्द हैं,ऊर्जा मस्तक में घनीभूत है तथा इन्द्रिय संयम का प्रकाश रुपी ओज भ्रूमध्य की ओर जा रहा है।


इस अवस्था में ऊर्जा स्वतः भ्रूमध्य की ओर गमन करेगी।कुछ ही क्षणों में साधक को प्रकाशमयी अखण्ड मंडल के दर्शन होंगे।साधक तब तक उस अवस्था में स्थिर रहे जहाँ तक वह सहज हो।श्वास को रोके रखना है तब तक कि साधक सहज रह सके।कूटस्थ के दर्शन की अवस्था में भ्रूमध्य में ॐ का जप करें।


4-अब साधक को श्वास(प्राण ऊर्जा) छोड़नी है(क्रिया प्राणायाम की तरह मूलाधार तक)।


यह एक प्रणाम हुआ।ऐसे तीन प्रणाम करें।प्रत्येक प्रणाम के पश्चात् साधक अपने हाथों को यथास्थान रख सकता है तथा उन्हें वापस भी ला सकता है।यथास्थान ही रखना श्रेयस्कर होगा जिससे संचित ऊर्जा बाहर न जा सके एवम् साधक अंतर्मुखी बना रहे।


अतः आप योनि मुद्रा में भी तीन क्रिया प्राणायाम करते हैं।


जैसा मैंने कहा कि ये मुद्राएं स्वयम्भू हैं।अतः साधक की अनुभूति जो कुछ भी लिखा गया है,उसकी तुलना में अलग एवम् अद्वितीय हो सकती है।कुछ साधकों को ॐ का नाद भी सुनाई पड़ता है।


प्रणाम के पश्चात् भी कूटस्थ ज्योति ललाट में मंडराती हैं।साधक को पूर्ण निष्ठा के साथ ज्योति को प्रणाम कर अगाध शांति में डूबे रहना चाहिए।यह शांति ध्यान आसन से उठने के बाद भी साधक के हर क्रिया कलाप में परिलक्षित होती है।


दक्षिणा शुल्क 1500 रू +डाक व्यय


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Saturday, October 17, 2020

सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना विधि

 






सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना विधि 



सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना विधि ,सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना मंत्र और अनुभव के बारे मे हम यहां पर बात करेंगे । दोस्तों सुर सुंदरी भी एक यक्षिणी  होती है।हालांकि इनके बारे मे हमको ज्यादा जानकारी नहीं है कि यह किस प्रकार से काम करती हैं। लेकिन जहां तक जानकारी है कि इस ब्रह्रामांड के अंदर अनेक प्रकार के लोक और लोकांतर हैं। लेकिन वहां पर भौतिक देहधारी प्राणी नहीं रहते हैं। ‌‌‌वरन वहां पर कुछ ऐसे प्राणी रहते हैं जिनकी कोई भौतिक देह नहीं होती है। यानी वे सूक्ष्म शरीर के अंदर होते हैं।

सुरसुन्दरी यक्षिणी भी यक्षिणी का एक प्रकार है जो अभौतिक देह के अंदर रहती है। माना जाता है कि यक्ष का लोक धरती के सबसे निकट है और यक्ष के पास काफी अधिक शक्तियां होती हैं।

सुरसुन्दरी यक्षिणी कौन होती है ? 

सुरसुन्दरी यक्षिणी के बारे मे अधिक जानकारी नहीं है लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह सबसे सुंदर स्त्री होती है। संभव है आपको  वैसी स्त्री कहीं पर भी ना मिले ।सुरसुन्दरी यक्षिणी के दर्शन यदि आप कर लेते हैं तो यह आपके लिए सौभाग्य की बात होगी और इसकी सुंदरता के बारे ‌‌‌वे ही अधिक बता सकते हैं जिन्होंने यह साधना की होगी ।लेकिन इतना माना जाता है कि यह सुंदरता मे सबसे अच्छी होती है।

 आपको बतादें कि यह भौतिक सुंदरता नहीं होती है। क्योंकि यक्षिणी का कोई ‌‌‌सुंदरता की वजह से ही इसको सुरसुन्दरी यक्षिणी कहा गया है। भौतिक शरीर नहीं होता है। इनका शरीर अपंचिक्रत होता है। सुरसुन्दरी यक्षिणी आदि के बारे मे सम्पूर्ण रहस्य को बताया नहीं गया है। और बताया गया है तो संभव है वह विलुप्त हो चुका हो । कुछ योगी ही अब बचे हैं जो इसके रहस्य को अच्छे से जानते हैं।

सुरसुन्दरी यक्षिणी की साधना किस रूप मे की जा सकती है ?

दोस्तों सुरसुंदरी यक्षिणी की साधना आप माता ,बहन या प्रेमिका के रूप मे कर सकते हैं लेकिन कहा जाता है कि आप इसको एक प्रेमिका के जैसे उपयोग कर सकते हैं यह आपको एक रियल स्त्री के अनुभव दिला सकती है लेकिन इस प्रयोग के अंदर भोग का कोई ‌‌‌स्थान नहीं होता है। कुछ साधक सोचते हैं कि वे यक्षिणी को सिद्व करके उनके साथ भोग कर सकते हैं तो यह उनकी गलत फैमी है।

सुरसुन्दरी यक्षिणी की साधना यदि आप प्रेमिका के रूप मे करें तो अधिक अच्छा होगा ।ऐसा माना जाता है कि यह एक रियल प्रेमिका के जैसा व्यवहार कर सकती है या आपकी मन की बात को पढ़ सकती है और आप इससे बात भी कर सकते हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि आप इसको कहीं पर भी बुला सकते हैं।

‌‌‌सुना जाता है कि कि सुरसुंदरी को पत्नी के रूप मे कभी भी सिद्व नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि वह किसी दूसरी स्त्री को स्पर्श करता है तो साधक की मौत हो जाती है। हालांकि इसकी सही जानकारी कोई योग्य गुरू ही बता सकते हैं। ‌‌‌सबसे अच्छी बात है कि आप उसे एक मित्र की तरह सिद्व कर सकते हैं । यह सबसे अच्छा तरीका है।

‌‌‌सुर सुंदरी यक्षिणी साधना करने का तरीका

‌‌‌दोस्तों आपको कोई भी साधना यहां पर देखकर नहीं करनी चाहिए ।यहां पर हम जो तरीका बता रहे हैं वह मात्र जानकारी है। कुछ लोग किताबों से पढ़कर यक्षिणी साधना करने बैठ जाते हैं तो अंत मे उनको नुकसान होता है। ‌‌‌यह साधना रात को 10 से 12 बजे के बीच आरम्भ करनी होती है।हालांकि अलग अलग गुरूओं के अलग अलग नियम हो सकते हैं। उसके बाद माला स्फटिक की लेनी होती है। यह पूरी तरह से सिद्व होनी चाहिए ।

‌‌‌आपको स्नान करके गुलाबी और लाल वस्त्र पहनने होंगे ।और गुलाब का इत्र लगाएं और लाल रंग के आसन पर बैठना होगा ।अपने सामने एक चोकी लगाएं और लाल और गुलाबी कपड़ा बिछाएं ।उसके बाद उसके उपर सुरसुंदरी की फोटो रखें और चमेली का दीपक जलाएं ।
भोग मे दुध से वनी मिठाई और ड्राई फ्रूट रखे एक प्याले मे शराब रखे सुगन्धित धुप जलाये और चारो तरफ ईत्र छिड़के फिर एक माला गणेशजी के मन्त्र की करे

 ॐ गं गणपतये नमः। 

उसके बाद
‌‌‌उसके बाद एक माला भैरवजी के मंत्र की करें उसके बाद एक माला अपने गुरू मंत्र की करनी होगी ।यह सारी प्रोससे रोज ही करनी होती है। उसके बाद 108 माला रोज सुर सुंदरी यक्षिणी की करनी होगी और उसके बाद यह क्रिया 21 दिन तक करनी होगी ।

ॐ ऐं ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा

22 वे दिन हवन करे 1008 आहुतियां दे हवन शुद्ध घी मे चमेली का इत्र और गुलाब की पत्ती मिला कर करना है। और ऐसा करने से सुर सुंदरी प्रसन्न हो जाएगी और आपको दर्शन देगी ।

‌‌‌सुर सुंदरी दर्शन भी देती है ?

जब कोई सुर सुंदरी की साधना को विधि पूर्वक सम्पन्न करता है तो वह साधक को दर्शन भी देती है और ऐसी स्थिति के अंदर सुर सुंदरी को प्रणाम करना चाहिए । वह इस समय पूछे कि आप ने उसे क्यों याद किया तो आप इसके लिए वचन ले सकते हैं। कि आप मेरी सखा बनना स्वीकार कीजिए।

सुर सुंदरी साधना करने के फायदे

जैसा कि दोस्तों हर यक्षिणी साधना के अपने फायदे होती हैं। इसी प्रकार से सुर सुंदरी को  ऐश्वर्य, धन, संपत्ति देने वाली बताया गया है। यदि कोई इसको माता के रूप मे सिद्व करता है तो यह साधक का एक माता की भांति पूरा ख्याल रखती है।‌‌‌इसी प्रकार से यदि कोई सुर सुंदरी को बहन के रूप मे सिद्व करता है तो फिर उसके प्रति उसी प्रकार के भावों को रखना चाहिए । वह एक बहन की तरह साधक के साथ व्यवहार करती है।

सुरसुन्दरी यक्षिणी साधना अनुभव

दोस्तों हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि हम कोई साधक नहीं हैं। बस हम मात्र जानकारी एकत्रित करते हैं। और उसको यहां पर प्रकाशित कर देते हैं। यह मात्र ज्ञान के लिए ही होता है। ‌‌‌कुछ लोग इससे अच्छा मनोरंजन कर लेते हैं।कुछ लोगों के लिए यह काल्पनिक हो सकती है।
‌‌‌मेरा नाम  जगदिश कुमार है । साधना के क्षेत्र मे मेरी रूचि हमेशा से ही रही है। हालांकि मैंने पहले भी कई साधना की थी और उसके अंदर मुझे अच्छी सफलता मिली थी। सुन रखा था कि सुरसुंदरी यक्षिणी काफी सुंदर होती है और यदि कोई उसकी साधना कर लेता है तो उसके रूप का पान किया जा सकता है।

 सुंदरता के बारे ‌‌‌मे बहुत कुछ जाना जा सकता है।खैर मेरे गुरू के पास मैं गया और उनके चरण छूकर बोला ……गुरूजी मैं चाहता हूं कि आप मुझे यक्षिणी सुरसुंदरी की साधना के बारे मे बताएं और उसके करने की आज्ञा प्रदान करें ।

‌‌‌………… मैं चाहता हूं कि तुम इन फालतू की साधनाओं के चक्कर मे ना पड़ो और अपने मोक्ष के बारे मे सोचो और उसी के उपर काम करो ।

………. क्या सुर सुंदरी यक्षिणी साधना बुरी होती है ?
……… नहीं बुरी नहीं होती है यदि आपका मन मैला है तो आप उस शक्ति से वैसी ही आसा रखोगे । हर साधना मे मन ‌‌‌को साफ रखना बहुत ही जरूरी होता है।यदि मन मैला होगा तो बुरी गति होगी । वरना तो भूतों से भी सही काम करवाए जा सकते हैं।वैसे मैंने यह साधना नहीं की है लेकिन विधि बता सकता हूं ।

‌‌‌उसके बाद गुरू ने मुझे इसकी पूरी विधि बताई । जिसका उल्लेख मे यहां पर नहीं कर सकता हूं ।मैंने उस विधि को अपनी एक बुक के अंदर नोट कर लिया था। उसके बाद गुरू का आशीर्वाद लेकर आ गया । गुरू ने बोला था कि कोई भी गलत इच्छा मत करना वरना नष्ट हो जाओगे ।
‌‌‌मुझे बोला गया था कि इस साधना को एकांत के अंदर ही करना है।

 मेरे खेत के अंदर एक मकान था और वहां पर मैं कुछ सामान ले गया और यह साधना 22 दिन की थी। घरवालों को नहीं पता था कि मैं कहां जा रहा हूं । पहले ही दिन आसन लगाया और  ‌‌‌इससे पहले कपड़ों के उपर इत्र लगाया नए कपड़े पहने पूरे कमरे मे इत्र की सुगंध आ रही थी। और आस पास सारी चीजें रखी जो इस साधना के लिए आवश्यक थी। सबसे पहले गणेश की मंत्र की एक माला की और उसके बाद भैरव की और फिर गुरू मंत्र की एक माला की । 

उसके बाद
‌‌‌मैंने यक्षिणी की 108 माला लगभग 5 घंटे के अंदर पूरी करदी थी। हालांकि मैं बड़े आराम से जप रहा था। इस दिन मुझे कुछ भी अनुभव नहीं हुआ हालांकि लगातार 5 घंटे बैठे रहने से सिर थोड़ा भारी हुआ । उसके बाद वहीं पर लैट गया । ‌‌‌इसी प्रकार से होते हुए लगभग 3 दिन और गुजर गए ।

मुझे किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं हो रहा था। हालांकि मन मे यह संशय भी था कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो रहा है। उसके बाद 5 दिन मैंने वही प्रक्रिया दौहराई और जैसे ही एक माला जपी मेरे मन के अंदर बैचेनी होने लगी ।

‌‌‌यक्षिणी मन के उपर काफी प्रभाव डाल रही थी।मन के अंदर काफी बेचेनी थी और बार बार मन कह रहा था कि माला जप छोड़दे । लेकिन मुझे पहले ही बताया जा चुका था कि यदि माला जप बीच मे छोड़ दिया तो सुरसुंदरी मौत देगी । ‌‌‌मैं पहले ही कई साधनाओं को कर चुका था तो अनुभव था। उस दिन बड़ी ही बैचेनी के साथ 108 माला को पूरा किया । हालांकि कुछ भी अनुभव नहीं हुआ बस मन बैचेन रहा । माला को पूरा करने मे 5 घंटे से अधिक समय लग गया ।

‌‌‌मैं आपको बतादूं कि मैं दिन के अंदर सुरसुंदरी यक्षिणी साधना मे सोता नहीं था । गुरू ने इसके लिए मना किया था।उसके बाद 6 दिन भी कुछ खास नहीं हुआ । और इसी प्रकार से लगभग 10 दिन बीत गए नोर्मल चीजे ही हुई। उसके बाद 11 वे दिन मैं जैसे ही माला जपने के लिए बैठा । मैंने देखा कि मेरे सामने एक बहुत ‌‌‌ही भयंकर राक्षस आकर खड़ा हो गया है।और उसके एक हाथ के अंदर तलवार है। उसे देखकर मेरा कलेजा सूख रहा था। मुंह के अंदर आवाज भी नहीं निकल रही थी। वह अपनी तेजी से मेरे उपर प्रहार करता है लेकिन मेरा कुछ नहीं हुआ । बाद मे वह अचानक से गायब हो गया ।

‌‌‌इस समय मेरी हालत बहुत खराब थी। और बहुत ही मुश्किल से 100 माला जप की । उसके बाद अगली माला जप करने बैठा तो देखा कि सामने एक विशाल आग का गोला मेरी ओर आ रहा है । और वह जल्दी ही मुझे जलाकर रखा कर देगा । हालांकि मेरी मानसिक एकाग्रता काफी अधिक थी। इसकी ‌‌‌वजह से मैं इस साधना के अंदर टिका रहा । 

यदि कोई दूसरा होता तो वह इस साधना मे टिकना काफी मुश्किल हो जाता ।जब आग का गोला मेरे समीप आया तो वह रूक गया । कुछ देर वह ऐसे ही मेरे पास रहा । मुझे काफी अधिक गर्म लग रही थी। शरदी के मौसम के अंदर भी काफी तपन महसूस कर हरा था।

‌‌‌मैं मंत्र जप करता रहा और वह आग का गोला मेरे सामने वैसे ही स्थिर रहा । जैसे ही मंत्र जप समाप्त हुआ वह चला गया । इस दौरान मेरे शरीर से बहुत अधिक पसीना निकल रहा था।

‌‌‌इस प्रकार से से मुझे अनुभव होते रहे और मे साधना के मार्ग मे आगे बढ़ता रहा ।लगभग इसी तरीके के डरावने अनुभव को झेलते हुए मुझे 19 दिन बीत गए । 19 वे दिन जब माला जप करने के लिए नहाया धोया और इत्र लगाकर बैठा तो 10 माला जपने के बाद अनुभव हुआ जैसे कोई स्त्री मेरे चारो ओर घूम रही है। ‌‌‌और वातावरण के अंदर बहुत अधिक मादक सुगंध आ रही थी। और मन इतना बैचेन हो गया कि इस साधना को छोड़ दिया जाए । मन की बैचेनी काफी तेजी से बढ़ रही थी। और 100 माला जपते जपते मुझे लगा जैसे की कोई स्त्री मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई है।

‌‌‌मैं उसकी सुंगध को महसूस कर सकता था।वाकाई मे उसके जैसी सुंगध कहीं और नहीं थी। इस दिन मुझे किसी प्रकार के डरावने अनुभव नहीं हुए । उसके बाद ‌‌‌20 वा दिन जब माला जप करने बैठा तो एक बहुत ही सुंदर स्त्री जो मेरे पास आई और बैठ गई। इतनी सुंदर की उसकी सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता था। वह मुझसे चिपकी हुई थी और आराम से बैठी थी।

‌‌‌हालांकि इस दिन उसने मुझसे कोई बात नहीं की और मंद मंद मुस्कुराती हुई मंत्रजप करने के बाद चली गई।
अंतिम दिन भी कुछ इसी प्रकार का अनुभव हुआ और उसके बाद जब मैंने हवन वैगरह किया तो वही सुंदर स्त्री मेरे सामने प्रकट हुई और बोली की आपकी साधना से मैं प्रसन्न हुं आपकी क्या सहायता मैं कर सकती हूं।

‌‌‌उसके बाद मैंने उसको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोला ……… कि आप मेरी सखा बनकर रहे और जब भी मैं आपको बुलाउं तभी आप आएं और मेरे साथ वक्त गुजारें ।उसके बाद सुरसुंदरी ने अपना वचन दिया और मेरे पास बैठ गई। मुझे पहली बार एहसास हुआ कि वह बहुत अधिक सुंदर थी। स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर थी।  ‌‌‌इस प्रकार की सुंदर स्त्री को मैंने आज तक घरती के उपर नहीं देखा था।इतनी सुंदर होने की वजह से ही इसको सुर सुंदरी नाम से पुकारा जाता है। वह सिर्फ मानसिक रूप  से मेरे साथ कुछ बात की और उसके बाद चली गई।

‌‌‌सुर सुंदरी यक्षिणी की साधना का अनुभव काफी अच्छा रहा । पहले तो मैं यक्षिणी कोई बार बुलाता था और उसका सहाचर्य प्राप्त करता था लेकिन बाद मे मुझे महसूस होने लगा कि मेरा मन उसकी ओर काफी अधिक आकर्षित हो चुका है। वह अपने रस्ते से भटक सकता है

 तो मैंने उसे बुलाना बंद कर दिया और अपनी जरूरी दूसरी
‌‌‌साधना के बारे मे ध्यान देने लगा ।यह साधना हर कोई नहीं कर सकता है। और करनी भी नहीं चाहिए । जिस इंसान ने मन की एक खास एकाग्रता को विकसित कर लिया है। वही इसके अंदर सफल हो सकता है।

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...