Thursday, September 6, 2018

स्वप्न साधना प्रयोग




स्वप्न  साधना प्रयोग 

।। मन्त्र ।।

ॐ ह्रांग क्लींग रक्तचामुंडे स्वप्नेकथ्य कथ्य शुभाशुभम ॐ फटस्वाहा !

साधना समाग्री  : -  

स्वापनेशवारि  यंत्र  . गुटिका  काले हकीक की माला . सभी प्राण प्रतिष्ठा युक्त मन्त्र सिद्धी होना ज़रूरी हैं .

।। विधि ।।

इस साधना को आप किसी भी दिन सेशुरू कर सकते हैं ! रात्रि  को सोतेसमय अपने बिस्तर पर बैठ कर इसमंत्र का 1100 बार जप करें !

 मालाकोई भी इस्तेमाल कर सकते हैं औरयदि माला न हो तो हाथो पर भी  करसकते हैं ! यह क्रिया 21  दिन करनी हैंऔर यह साधना पूर्णत: गुप्त रहनीचाहिए !

 माता से प्रार्थना करे कि स्वप्नमें मुझे दर्शन दे और सिद्धि प्रदान करें !

अंतिम दिन ( 22वे दिन ) किसीकंवारी कन्या को भोजन कराएं औरदक्षिणा दें ,मन्त्र सिद्ध हो जाएगा! कन्या की उम्र 10 साल से कम होनीचाहिए !

राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

 (रजि.)

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

मोबाइल नं. : - 09958417249

                     08601454449

व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Wednesday, September 5, 2018

कड़ाही बांधनेका तंत्र साधना प्रयोग




कड़ाही बांधनेका  तंत्र साधना प्रयोग 

मित्रों आपने शायद पुराने ज़माने के कुछ जादूगर देखे होंगे  , जो आम लोगो के सामने कुछ खेल दिखाते थे , जैसे के आग में हाथ डालना और हाथ न जलना , गर्म तेल की कढाई में पूरी तलते हुए जादूगर उसमे हाथ डाल कर गर्म तेल से हाथ से पूरी निकालते हैं इत्यादि , जो खेल हुआ करते थे.

, उसी प्रकार बर्फ के अंदर नंगे बदन से साधना करना , जिससे क लोगो के लगे की महाराज नंगे बदन आधे बर्फ में खुद को दफना   कर लोगो को अचंभित करना ,

आज भी बद्रीनाथ में कुछ साधक।।।। लोगो को बेवकूफ बनाते हैं , ट्रिक के जरिये जादू दिखा कर। .. लोगो को लगता हैं के साधुजी महा सिद्ध है बर्फ में ठण्ड नहीं लगती और तपस्या कर रहे हैं  मित्रों ये सब पुराने टोटके हैं। .. 

जो लोगों को पता नहीं हैं। .. ठीक वैसे ही। .. भट्टी या चूल्हा भी बाँधा जा सकता हैं। .. उसमे कितनी भी आग जला लो मगर खाना नहीं पकेगा , वगेरा वगेरा। .. 

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मन्त्र -

"ओम् नमो जल बांधू जलवाई बांधू बांधू कुवा वाहीं नौ सो गांव का वीर बुलाऊं बांधे तेल कडाही जती हनुमंत की दुहाई शब्द सांचा पिंड काचा फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा सत्य नाम आदेश गुरु को "

दीपावली कि रात्रि को  पुरे विधि विधान से उपरोक्त मन्त्र को १००८  बार जप करके मंत्र सिद्ध के पश्चात् प्रयोग में लाया जा सकता  है

जब भी प्रयोग करना होतो रास्ते के सात कंकड लेकर उसे मंत्र से  अभीमत्रित करके कडाही पर मार दो

चाहे जितनी आग जला लेना कडाही गरम बिलकुल  नहीं होगी

नोट : -  

साधना से सम्बंधित कुछ जानकारी को छिपाया गया हैं जिस से कोई गलत प्रयोग ना कर सके . जो साधक साधना करना  चाहते हैं ओ फोन पर बात कर सकते हैं .

राजगुरु जी

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भुवनेश्वरी युक्त लक्ष्मी साधना



भुवनेश्वरी युक्त लक्ष्मी साधना

यह धन प्राप्ति की सबसे महत्वपूर्ण साधना है,जिनके पास नौकरी नहीं,जिन्हे प्रमोशन नहीं मिल रहा है,जिंनका व्यापार नहीं चलता,जिनके घर मे आर्थिक बाधाये कुछ ज्यादा ही है,ज्यो व्यक्ति जीवन मे सिर्फ मेहनत करते है परंतु धन नहीं मिल रहा है॰तो अब चिंता करने का कोई बात नहीं,येसा हो ही नहीं सकता है के आप यह साधना करो और आपके जीवन मे किसी भी प्रकार का आर्थिक समस्या रहे,मै तो कहेता हु भगादो आप अब इस समस्या को.........

साधना विधान:-

यह साधना संकष्ठ शुभ अवसर पे करनी है, आपके पास भुवनेश्वरी यंत्र हो तो अच्छी बात है,अगर नहीं हो तो हमे इस यंत्र को भोजपत्र पे बनाना पड़ेगा,भोजपत्र नहीं मिला तो फिर क्या करेगे,चलो कोई बात नहीं,सफ़ेद रंग के कागज पे यह यंत्र हम अनार की कलम और केसर की स्याही से तो अंकित कर लेगे॰

 अब हमे चाहिए रुद्राक्ष माला और रुद्राक्ष माला को गुरुवार के दिन श्याम को शिवजी के मंदिर ले जाना है,वहा पे शिवजी को माला चढानी है और फिर शिवजी के सँग माला का भी अभिषेक करना है “ॐ ह्रीं शिवाय तेजसे नम:” 108 बार बोलते हुये,अब तो शिवजी की कृपा और आज्ञा भी मिल गयी मतलब अब सफलता जरूर मिलेगी,हम्म............

अब वही पे माला का पूजन करे और दूसरे दिन फिर एक बार माला का पूजन करके मंत्र जाप रात्री मे १० बजे शुरू करना है,इतनी तेजस्वी माला से हम कम से कम 11 माला मंत्र जाप तो रोज कर सकते है,ये साधना 11  दिन की है और निच्छित ही हमे सफलता तो मिलेगी ही,सिर्फ 11 दिन की साधना से,12 वे दिन आप सभी सामग्री रखकर जल मे विसर्जित करदे और माला से नित्य 1 माला गुरुमंत्र का जाप किया करो,

भुवनेश्वरी महामंत्र साधना

विनियोग:-

ॐ अस्य श्री भुवनेश्वरी हृदय महामंत्रस्य श्री शत्तील: ऋषी : । गायत्री छन्दा:। श्री भुवनेश्वरी देवता हं बीजं । ईं शक्ति:। रं कीलकं । सकल-मनोवांछित सिद्यर्थे जपे विनियोग: ।  

ऋष्यादी न्यास

श्री शक्ति ऋषये नम: शिरसी ।
गायत्री छन्दसे नम: मुखे ।
श्री भुवनेश्वरी देवतायै नम हृदयी ।
हं बीजाय नम: गुहये।
ईं शक्तये नम: नाभौ ।
रं किलकाय नम: पादयौ: ।
सकल-मनोवांछित सिद्यर्थे जपे विनियोगाय नम: सर्वागे ।

ध्यान

सरोजनयनां चलत कनक कुंडलां शैशवीं ,
धनुर्जप वटी करामुदित सूर्य कोटी प्रभाम ।
शशांक कृत शेखरां शव शरीर संस्था शिवाम,
प्रात: स्मरामी भुवनेश्वरी शत्रु गति स्तम्भनीम ॥

महामंत्र:-

॥ ॐ श्रीं ॐ श्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ऐं क्लीं सौ: क्लीं सौ: क्रीं क्रीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: ॥

यह मंत्र रंक को भी राजा बनाने युक्त क्षमतावान है,कृपया इस साधना को किसी भी प्रकार से मज़ाक मे ना ले,एक बार साधना सम्पन्न कर लीजिये,नौकरी भी मिलेगा,पैसा भी खूप कमाओगे,जितना भी कर्जा हो आप कर्ज से मुक्त भी हो जाओगे.......

अभी तक जितनी भी लक्ष्मी साधना आपने की है,उन्हे भूल जाओ क्यूकी यह साधना अत्याधिक तीव्र है,साधना कराते समय पायल खनक ने की आवाज आ सकती है

ये साधना मै एक बार फेसबूक पे दे चुका हु और इसका रिज़ल्ट साधको को 100% मिला है.

राजगुरु जी

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विश्व मोहिनी साधना विधि




विश्व मोहिनी साधना विधि

इस साधना से व्यक्तित्व में गज़ब का आकर्षण आ जाता है| यहाँ तक कि आपकी बोल-चाल, उठने बैठने की शैली भी सम्मोहक हो जाती है| इस साधना का उपयोग वैवाहिक जीवन में मधुरता लाने के लिए अत्यंत लाभदायक है| स्त्री तथा पुरुष दोनों समान रूप से इस साधना के द्वारा अपने जीवन को संवार सकते हैं|

साधना विधि

देवी योगमाया का  यंत्र  स्थापित कर, उन्हें सुगंधित जल से स्नान कराएं, इत्र तथा चुनरी अर्पित करते हुए प्रतिमा का सोलह श्रंगार करें| प्रसाद में सात प्रकार की मिठाई रखेँ| पूजन हेतु स्वयं लाल वस्त्र धारणकर पूर्व दिशा की और मुख कर बैठें| 

देवी  के यंत्र के  सम्मुख तिल की ढेरी लगाकर उस पर तिल के तेल का दीपक रख दें| लाल रंग का पुष्प चढ़ाएँ तथा पंचोपचार विधि से पूजन करें| तत्पश्चात स्फटिक की माला पर निम्नलिखित  मंत्र का 9000 हजार जाप का संकल्प लेकर एकादशी से प्रारम्भ करें –

साधना समाग्री   : -

  योगमाया देवी का यंत्र और गुटिका .  सफेद स्फटिक माला . प्राण - प्रतिष्ठा युक्त मंत्र सिद्धी होना चाहिए .

मंत्र : - - 

 दृॐ ह्रीं सर्व चक्र मोहिनी जाग्रय जाग्रय ॐ हुं स्वाहा !!

यह साधना सात दिनों में पूर्ण किया जा सकता है| इसके लिए एक दिन में आपको 16 माला जाप करना होगा| साधना के दौरान ब्रम्हचर्य का पालन करें| साधना के पश्चात श्रंगार सामाग्री किसी कुंवारी कन्या को दान कर दें अथवा कुछ दक्षिणा के साथ मंदिर में अर्पित कर दें|

 साधना समाप्त होते ही स्त्रियाँ अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी बन जाती है तथा पुरुषों में अद्भुत आकर्षण व्याप्त हो जाता है| इसकी सिद्धि से आप समस्त तनाव से मुक्त होकर जीवन की किसी भी समस्या का सामना करने में समर्थ हो जाते हैं|

राजगुरु जी

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Tuesday, September 4, 2018

कामाख्या तंत्र साधना




कामाख्या तंत्र   साधना

कामाख्या मंत्र अत्यधिक शक्तिशाली माना जाता है|  जिस साधक ने इस मंत्र को सिद्ध कर लिया उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है|

 मंत्र सिद्धि के विधान कठिन हैं इसलिए इसे हंसी-खेल में लेना घातक है| आत्मबल तथा सिद्धि के प्रति प्रतिबद्धता हो तभी इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए| 

 साधना के आरंभ में विनियोग, करन्यास, अंग न्यास करें| तत्पश्चात ध्यान के लिए देवी के निम्नलिखित अतुलनीय स्वरूप पर अपनी चेतना एकाग्र करें –

रक्ताभ वस्त्रधारिणी देवी कामाख्या, द्विभुजी हैं जिनके मस्तक पर सिंदूर का तिलक शोभा दे रहा है| वह चन्द्रमा के समान उज्जवल तथा कमल जैसी सुंदर हैं| उनके तन पर रत्न जड़ित आभूषण शोभित है|

 वह मणि-माणिक्य जटित सिंहासन पर आरूढ़ हैं| उन्नत पयोधर वाली देवी कामाख्या मंद-मंद मुस्कुरा रही हैं| श्यामवर्णा देवी सुंदर नेत्रों वाली त्रिनेत्रा हैं| वह अनेक विद्याओं से घिरी हुई हैं| 

उनके निकट डाकिनी-शाकिनी करबद्ध हैं| हाथों में ताम्बूल लिए नायिकाएँ खड़ी हैं| सिंहों के झुंड देवी कामख्या की वंदना कर रहे हैं| देवी के अमृत समान वचनों को सुनने के लिए देवी सरस्वती तथा लक्ष्मी भी उत्सुक रहतीं हैं| तीनों लोकों में पूजिता देवी कामख्या करुणामयी तथा मंगलकारिणी हैं|

कामाख्या वशीकरण मंत्र:

(ध्यान हेतु एक एक शब्द की समझ आवश्यक है, यद्यपि इसके मंत्र संस्कृत में भी उपलब्ध है तथापि साधक को अर्थ समझने में अवरोध न हो इसलिए ध्यान पक्ष का मंत्र हिन्दी में दिया गया है)

इसके बाद देवी की षोडशोपचार पूजन करें तथा निम्नलिखित 22 अक्षरों का मंत्र का जाप करें –

त्रीं त्रीं त्रीं हूं, हूं स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये प्रसीद स्त्रीं हूं हूं त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा|

यह मंत्र अत्यंत शक्तिशाली माना गया है|  इसकी सिद्धि से समस्त लौकिक अभीष्ट सिद्ध होते हैं| जाप से पूर्व किसी योग्य तांत्रिक से विमर्श अवश्य करें तथा उसी की सलाह से जाप की संख्या का संकल्प लें| जाप के उपरांत निम्नलिखित मंत्र के माध्यम से देवी की स्तुति करें –

कामाख्ये कामसंपन्ने, कामेश्वरी हर-प्रिया

कामनां देहिमे नित्यं, कामेश्वरी नमोस्तुते ।

                                                        कामदे काम-रूपस्थे, सुभगे सुरसेविते                                                                

करोमि दर्शनं देव्याः, सर्व-कामार्थ सिद्धये।

 यह साधना कामाख्या में जाकर योग्य गुरु के निर्देशन में ही करना चाहिए|

साधना  समाग्री  : - - 

कामाख्या यंत्र . गुटिका .  मूँगे कु माला . सभी प्राण - प्रतिष्ठा युक्त मंत्र सिद्धि चैतन्य होना जरूरी हैं .

कामाख्या साधना:

यह साधना कहीं भी रहकर किया जा सकता है| यह अत्यधिक प्रभावशाली है|  किसी भी कृष्ण पक्ष में नवमी को मध्य रात्रि (12 बजे) लाल आसन पर पूरब दिशा में मुख करके  बैठें, सामने देवी कामाख्या की तस्वीर स्थापित करें|  सिंदूर तथा तिल का तेल मिश्रितकर पानी वाले नारियल पर टीका लगाएँ तथा देवी को अर्पित करें|

 ध्यान रखें नारियल की जटा को हटाना नहीं है|  पंचोपचार विधि से पूजन करें| प्रसाद अर्पित करें| इसके बाद विधिवत हाथ में जल लेकर जाप के लिए संकल्प लें तथा निम्नलिखित मंत्र का इक्यावन माला प्रतिदिन तीन दिनों तक करें-

ऊँ त्रीं नमः

जाप के लिए मूँगे की माला उपयोग करें| तीन दिन के बाद जाप समाप्त होने पर नारियल किसी नदी में ससम्मान प्रवाहित कर दें|

राजगुरु जी

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कामाख्या सिन्दूर प्रयोग




कामाख्या सिन्दूर प्रयोग

कामाख्या में एक विशेष प्रकार के सिंदूर को कामिया सिंदूर कहा जाता है| यह अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है|   | मान्यता है कि सुहागिनें इस सिंदूर को लगाएँ तो अखंड सौभाग्य को प्राप्त करतीं हैं|

  यदि इसे अभिमंत्रित कर दिया जाए तो इसके चमत्कारी प्रभाव से दैनिक जीवन में आने वाली किसी भी समस्या का निदान किया जा सकता है| इसे अभिमंत्रित करने की विधि सरल है तथापि नियम-निष्ठा का अनुपालन आवश्यक है|

कामख्या सिंदूर प्रयोग:

कामाख्या सिंदूर को अभिमंत्रित करने के लिए शुक्रवार से पूजा प्रारम्भ करें| चांदी के ढक्कन लगे पात्र में कामिया सिंदूर(कामख्या सिंदूर) भरकर अपने सम्मुख रखें,  तथा निम्नलिखित मंत्र का 108 जाप करें –

कामाख्याये वरदे देवी नीलपर्वतावासिनी

त्व देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते|

अगले सात दिन तक निरंतर इस विधि से पूजा तथा जाप करें| इस पूजा के लिए लाल आसन पर बैठें तथा स्वयं भी लाल वस्त्र धारण करें|

प्रयोग: अभिमंत्रित सिंदूर चुटकी भर लेकर उसमे केसर, गंगाजल चन्दन उसी अनुपात में मिश्रित करें तथा कामाख्या मंत्र 11 बार करें| ( मंत्र लेख के प्रथम अंश कामाख्या मंत्र साधना में वर्णित है|

जाप के बाद केसर, गंगाजल आदि मिश्रित सिंदूर से तिलक लगा लें| तिलक लगाते ही आपमें सम्मोहन की शक्ति आ जाती है| जो भी आपको देखेगा वह वशीभूत हो जाएगा|

कामख्या सिंदूर प्रयोग 

कामिया सिंदूर लेकर सर्वप्रथम विधि-विधान से पूजन करें, तत्पश्चात निम्नलिखित मंत्र का निरंतर 7 रविवार तक 108 बार जाप करें –

हथेली में हनुमंत बसै, भैरु बसे कपार।

नरसिंह की मोहिनी मोहे सब संसार, मोहन रे मोहनता वीर

सब वीरन में तेरा सीर , सबकी नज़र बांध दे

तेल सिंदूर चढ़ाऊँ तुझे,  तेल सिंदूर कहाँ से आया?

कैलास पर्वत से आया कौन लाया?

 अंजनी का हनुमंत, गौरी का गणेश लाया|

 काला गोरा तोतला तीनों बसे कपार दुहाई कामिया सिंदूर की

हमें देख शीतल हो जाए  सत्य नाम आदेश गुरु की सत गुरु सैट कबीर



यह मंत्र कामिया मोहन मंत्र के नाम से जाना जाता है| सात रविवार के बाद यह सिंदूर चुटकी में लेकर उक्त मंत्र 7 बार पढ़ें तथा तिलक लगा लें| इससे वशीकरण का प्रभाव उत्पन्न हो जाता है|

राजगुरु जी

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दस महाविद्या




दस महाविद्या:

 इस महाविद्याओं में पहली त्रिशक्तियों काप्रतिष्ठान जिन ग्रंथों में है उनमें से संक्षेप में कुछ ग्रंथों के नामऊपर दिए गए हैं। भुवनेश्वरी के विषय मेंभुवनेश्वरी रहस्यमुख्य ग्रंथ है। यह 26 पटलों में पूर्ण है। 

पृथ्वीधराचार्य काभुवनेश्वरी अर्चन पद्धतिएक उत्कृष्ट ग्रंथ है। ये पृश्रवीधर गांविंदपाद के शिष्य शंकराचार्य केशिष्य रूप से परिचित हैं। 

भुवनेश्वरीतंत्र नाम से एक मूल तंत्रग्रंथ भीमिलता हैं। इसी प्रकारराजस्थान पुरात्तत्व ग्रथमालामें पृथ्वीधर काभुवनेश्वरी महास्तोत्रमुद्रित हुआ है।

भैरवी के विषय मेंभैरवीतंत्र‘ प्रधान ग्रंथ है। यह प्राचीन ग्रंथ है। इसके अतिरिक्तभैरवीरहस्य , भैरवी सपयाविधिआदि ग्रंथ भी मिलते हैं।पुरश्चर्यार्णवनामक ग्रंथ मेंभैरवी यामलका उल्लेख है।

भैरवी के नाना प्रकार के भेद हैं- 

जैसे, सिद्ध भैरवी, त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, षटकुटा भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी, इत्यादि। फ़ सिद्ध भैरवीफ़ उत्तरान्वय पीठ की देवता है।

त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता है। नित्या भैरवी पश्चिमान्वय कीदेवता है। भद्र भैरवी महाविष्णु उपासिका और दक्षिणासिंहासनारूढा है।त्रिपुराभैरवी चतुर्भुजा है। भैरवी के भैरव का नाम बटुक है। 

इस महाविद्याऔर दशावतार की तुलना करने पर भैरवी एवं नृसिंह को अभिन्न माना जाता है।

‘बगलाका मुख्य ग्रंथ है -सांख्यायन तंत्र। यह 30 पटलों में पूर्ण है। 

यह ईश्वर और क्रौंच भेदन का संबंद्ध रूप है। इस तंत्र कोषट् विद्यागमकहा जाता है।बगलाक्रम कल्पवल्लीनाम से यह ग्रंथ मिलता है जिसमें देवी के उद्भव का वर्णन हुआ है।

प्रसिद्धि है कि सतयुग में चारचर जगत् के विनाश के लिये जब वातीक्षीम हुआथा उस समय भगवान् तपस्या करते हुए त्रिपुरा देवी की स्तुति करने लगे।

 देवीप्रसन्न होकर सौराष्ट्र देश में वीर रात्रि के दिन माघ मास में चतुर्दशीतिथि की प्रकट हुई थीं। इस वगलादेवी कोत्रैलोक्य स्तंभिनी विद्याजाता है।

घूमवती के विषय में विशेष व्यापक साहित्य नहीं है। इनके भैरव का नाम कालभैरव है।किसी किसी मत में घूमवती के विधवा होने के कारण उनका कोई भैरव नहीं है। वेअक्ष्य तृतीया को प्रदीप काल में प्रकट हुई थीं। वे उत्तरान्वय की देवताहैं। 

अवतारों में वामन का धूमवती से तादात्म्य है। धूमवती के ध्यान से पताचलता है कि वे काकध्वज रथ में आरूढ़ हैं। हस्त में शुल्प (सूप) हैं। मुखसूत पिपासाकातर है।

 उच्चाटन के समय देवी का आवाहन किया जाता है। फ़प्राणातोषिनीफ़ ग्रंथ में धूवती का आविर्भाव दर्णित हुआ है।

मातंगीका नामांतर सुमुखी है। मातंगी को उच्छिष्टचांडालिनी या महापिशाचिनी कहा जाता है। मातंगी के विभिन्न प्रकार के भेद हैं-

उच्छिष्टमातंगी, राजमांतगी, सुमुखी, वैश्यमातंगी, कर्णमातंगी, आदि। ये दक्षिण तथा पश्चिम अन्वय की देवता हैं।

ब्रह्मयामल के अनुसार मातंग मुनि ने दीर्घकालीन तपस्या द्वारा देवी को कन्यारूप मेंप्राप्त किया था। यह भी प्रसिद्धि है कि धने वन में मातंग ऋषि तपस्या करतेथे।

 क्रूर विभूतियों के दमन के लिये उस स्थान में त्रिपुरसुंदरी के चक्षुसे एक तेज निकल पड़ा। काली उसी तेज के द्वारा श्यामल रूप धारण करकेराजमातंगी रूप में प्रकट हुईं।

 मातंगी के भैरव का नाम सदाशिव है। मातंगी केविषय मेंमातंगी सपर्या , रामभट्ट कामातंगीपद्धति शिवानंद कामंत्रपद्धति है। 

मंत्रपद्धतिसिद्धांतसिधु का एक अध्याय है। काशीवासी शंकर नामक एक सिद्ध उपासक सुमुखी पूजापद्धति केरचयिता थे। 

शंकर सुंदरानंद नाथ के शिष्य (छठी पीढ़ी में) प्रसिद्धविद्यारणय स्वामी की शिष्यपरंपरा में थे।

राजगुरु जी

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...