Saturday, January 16, 2021

सट्टा साधना


 



सट्टा साधना


तंत्र विद्या सीखने की इच्छा रखने वाला संपर्क करें :-


> साधना


>>यह साधना केवल जरूरत मंद व्यक्ति ही करें शौक के तोर पर यह साधना ना करें क्योंकि अगर शौक के तोर पर करोगे तो इसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि यह साधना जरूरतमंद व्यक्ति यो के लिए ही है यह एक सरल साधना है जो केवल शनिवार या मंगलवार के दिन रात्रि में की जाति है।

>यह मेरी अनुभूत साधना है इसीलिए जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता के लिए मैं यह साधना पोस्ट की है।


>>सामग्री:-

>5 गुलाब के फूल

>5 कोरे पान दंडी सहित

>एक मीठा पान दंडी सहित

>5 पतासे

>दो लौंग

>दो सिगरेट

>एक सीसी इत्र की गुलाब या चमेली की

>एक पैकेट अगरबत्ती


>>>मंत्र:-

इंद्री चली वन को जिन लाये  हर नाम कल का पता**** ************बलवान।


NOTE:- मंत्र सम्पूर्ण नहीं दे रहे क्यों की लोग बिना गुरु के ही साधना शुरु कर देते है जो की घातक सिद्ध हो सकता हैं।


>>>विधि:-

यह सभी सामग्री को शनिवार या मंगलवार के दिन शाम के समय लगभग 7:00 बजे के बाद एक पत्तल में इकट्ठा कर ले और हाजिरी बना कर किसी दरिया के किनारे पहुंच जाएं जो चलता दरिया हो वहां पहुंचकर अगरबत्ती को जलाकर दरिया के किनारे पर लगा दें और हाजरी की सामग्री दरिया में छोड़ दे और अपना कार्य करने की स्वर्ण आकर्षण भैरव से लगाएं और वहां से सीधा उस कमरे में पहुंच जाएं जहां आप को साधना करनी है 


साधना किसी भी समय टाइम के अनुसार 3 घंटे तक खड़े होकर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें और इत्र अपने कपड़ों में लगाएं और अगरबत्ती से कमरे को सुगंधित करें उस कमरे में आप से अलग और कोई और ना आए और ना जाए केवल आप ही उस कमरे में रहे अपना आसन नीचे जमीन पर लगा दे और जाप के बाद वही पर लेट कर शो जाएं किसी से कोई बात ना करें।


                       

>चेतावनी― मंत्र साधना गुरु जी की निगरानी में ही करें अन्यथा परिणाम घातक हो सकते है। 


>इंटरनेट पर बहुत सारी साधनाए उपलब्ध है जिसमे मंत्र साधना, विधान बता रखा है,पर कितनो को सिद्धि प्राप्त हुई है आप सब लोग जानते ही है,ऐसे कोई सिद्धि प्राप्त हो ही नहीं सकती। इसलिए गुरु जी की आज्ञा से ही साधना करनी चाहिए, तभी सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं।


>विशेष आग्रह:- कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी ध्यान में रखते हुए भक्तों से मेरा निवेदन है की कोई भी भक्त हमसे मिलने की कोशिश न करें। हम फोन के माध्यम से जितना हो सके आप सभी का मारगदर्शन करेंगे।


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


राजगुरु जी


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Wednesday, January 6, 2021

श्री काली प्रत्यंगिरा स्तोत्र


 




श्री काली प्रत्यंगिरा स्तोत्र


इस स्तोत्र की रचना महर्षि अंगिरा द्वारा की गयी थी तथा इसमें शत्रुओं का जड़-मूल से नाश करने की अद्भुत क्षमता है - एवं इसका प्रयोग कभी निष्फल नहीं जाता। अच्छी संख्या या निर्धारित संख्या में जप पूर्ण हो जाने के पश्चात यदि इसे भोजपत्र में लिखकर दायीं भुजा अथवा कण्ठ में धारण कर लिया जाए तो स्वतः ही शत्रुओं का मर्दन होने लग जाता है। समस्त अनिष्टकारी ग्रहों तथा किसी भी प्रकार के शत्रुओं के जाल से निकालने के लिए यह स्तोत्र अमृततुल्य है। 


किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर अमावस्या की रात्रि तक यदि प्रतिदिन एक हजार की संख्या में इस स्तोत्र का नियमित पाठ किया जाए तो अनायास ही समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है - अथवा अनिष्टकारी ग्रहों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। 


स्तोत्र निम्न प्रकार है : 


विनियोग : 


ॐ ॐ ॐ अस्य श्री प्रत्यंगिरा मंत्रस्य 

श्री अंगिरा ऋषिः, 

अनुष्टुप छन्दः, 

श्री प्रत्यंगिरा देवता, 

हूं बीजम्, 

ह्रीं शक्तिः, 

क्रीं कीलकं ममाभीष्ट सिद्धये पाठे विनियोगः।


अंगन्यास : 


श्री अंगिरा ऋषये नमः शिरसि

अनुष्टुप छंदसे नमः मुखे

श्री प्रत्यंगिरा देवतायै नमः हृदि

हूं बीजाय नमः गुह्ये

ह्रीं शक्तये नमः पादयो

क्रीं कीलकं नमः सर्वांगे

ममाभीष्ट सिद्धये पाठे विनियोगाय नमः अंजलौ। 


ध्यान : 


भुजैश्चतुर्भिधृत तीक्ष्ण बाण,

धनुर्वरा - भीश्च शवांघ्रि-युग्मा। 

रक्ताम्बरा रक्त तनस्त्रि-नेत्रा, 

प्रत्यंगिरेयं प्रणतं पुनातु।।


स्तोत्र : 


ॐ नमः सहस्र सूर्येक्षणाय श्रीकण्ठानादि रुपाय पुरुषाय पुरू हुताय ऐं महा सुखय व्यापिने महेश्वराय जगत सृष्टि कारिणे ईशानाय सर्व व्यापिने महा घोराति घोराय ॐ ॐ ॐ प्रभावं दर्शय दर्शय। 


ॐ ॐ ॐ हिल हिल ॐ ॐ ॐ विद्द्युतज्जिव्हे बंध-बंध मथ-मथ प्रमथ-प्रमथ विध्वंसय-विध्वंसय ग्रस-ग्रस पिव-पिव नाशय-नाशय त्रासय-त्रासय विदारय-विदारय मम शत्रून खाहि -खाहि मारय-मारय मां सपरिवारं रक्ष-रक्ष कर कुम्भस्तनि सर्वापद्र-वेभ्यः। 


ॐ महा मेघौघ राशि सम्वर्तक विद्युदन्त कपर्दिनी दिव्य कनकाम्भो- रुहविकच माला धारिणी परमेश्वरि प्रिये। छिन्दि-छिन्दि विद्रावय-विद्रावय देवि! पिशाच नागासुर गरुण किन्नर विद्याधर गन्धर्व यक्ष राक्षस लोकपालान् स्तम्भय-स्तम्भय कीलय-कीलय घातय-घातय विश्वमूर्ति महा तेजसे। 

ॐ हूं सः मम् शत्रूणां विद्यां स्तम्भय-स्तम्भय। 

ॐ हूं सः मम् शत्रूणां मुखं स्तम्भय-स्तम्भय। 

ॐ हूं सः मम् शत्रूणां हस्तौ स्तम्भय-स्तम्भय। 

ॐ हूं सः मम् शत्रूणां पादौ स्तम्भय-स्तम्भय। 

ॐ हूं सः मम् शत्रूणां गृहागत कुटुंब मुखानि स्तम्भय-स्तम्भय। 


स्थानम् कीलय-कीलय, ग्रामं कीलय-कीलय मंडलम कीलय-कीलय देशं कीलय-कीलय सर्वसिद्धि महाभागे। धारकस्य सपरिवारस्य शांतिम कुरु कुरु फट स्वाहा। 


ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अं अं अं अं अं हूं हूं हूं हूं हूं खं खं खं खं खं फट स्वाहा। जय प्रत्यंगिरे। 

धारकस्य सपरिवारस्य मम रक्षाम् कुरु कुरु ॐ हूं सः जय जय स्वाहा।


ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्रह्माणि! मम शिरो रक्ष-रक्ष, हूं स्वाहा 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वैष्णवि! मम कण्ठं रक्ष-रक्ष, हूं स्वाहा 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कौमारी! मम वक्त्रं रक्ष-रक्ष, हूं स्वाहा 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नारसिंही! ममोदरं रक्ष-रक्ष, हूं स्वाहा 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं इंद्राणी! मम नाभिं रक्ष-रक्ष, हूं स्वाहा 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चामुण्डे! मम गुह्यं रक्ष-रक्ष, हूं स्वाहा 


ॐ नमो भगवति उच्छिष्ट चाण्डालिनि, त्रिशूल वज्रांकुशधरे मांस भक्षिणी, खट्वांग कपाल वज्रांसि-धारिणी। दह-दह, धम-धम, सर्व दुष्टान् ग्रस-ग्रस, ॐ ऐं ह्रीं श्रीं फट स्वाहा।


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Tuesday, January 5, 2021

बगलामुखी हवन


 



बगलामुखी हवन


१) वशीकरण : मधु, घी और शर्करा मिश्रित तिल

से किया जाने वाला हवन (होम) मनुष्यों को

वश में करने वाला माना गया है। यह हवन

आकर्षण बढ़ाता है।


२) विद्वेषण : तेल से सिक्त नीम के पत्तों से

किया जाने वाला हवन विद्वेष दूर करता है।


३) शत्रु नाश : रात्रि में श्मशान की अग्नि में

कोयले, घर के धूम, राई और माहिष गुग्गल के होम

से शत्रु का शमन होता है।


४) उच्चाटन : गिद्ध तथा कौए के पंख, कड़वे तेल,

बहेड़े, घर के धूम और चिता की अग्नि से होम करने

से साधक के शत्रुओं को उच्चाटन लग जाता है।


५) रोग नाश : दूब, गुरुच और लावा को मधु, घी

और शक्कर के साथ मिलाकर होम करने पर साधक

सभी रोगों को मात्र देखकर दूर कर देता है।


६ ) मनोकामना पूर्ति : कामनाओं की सिद्धि

के लिए पर्वत पर, महावन में, नदी के तट पर या

शिवालय में एक लाख जप करें।


७) विष नाश / स्तम्भन :


एक रंग की गाय के दूध में मधु और शक्कर मिलाकर

उसे तीन सौ मंत्रांे से अभिमंत्रित करके पीने से

सभी विषों की शक्ति समाप्त हो जाती है

और साधक शत्रुओं की शक्ति तथा बुद्धि का

स्तम्भन करने में सक्षम होता है।


अन्य किसी जानकारी , समस्या समाधान और

 विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।


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Monday, January 4, 2021

*दाम्पत्य जीवन और आपकी जन्म पत्रिका*


 



*दाम्पत्य जीवन और आपकी जन्म पत्रिका*


*सूर्य, शनि, राहु अलगाववादी स्वभाव वाले ग्रह हैं वहीं मंगल व केतु मारणात्मक स्वभाव वाले ग्रह। ये सभी दाम्पत्य-सुख के लिए हानिकारक होते हैं।*


*जैसे:-


१.-यदि सप्तम भाव पर राहु, शनि व सूर्य की दृष्टि हो एवं सप्तमेश अशुभ स्थानों में हो एवं शुक्र पीड़ित व निर्बल हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य-सुख नहीं मिलता।* 


*२.-यदि सूर्य-शुक्र की युति हो व सप्तमेश निर्बल व पीड़ित हो एवं सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता है।*


*३.-यदि लग्न में शनि स्थित हो और सप्तमेश अस्त, निर्बल या अशुभ स्थानों में हो तो जातक का विवाह विलम्ब से होता है व जीवनसाथी से उसका मतभेद रहता है।* 


*४.-यदि सप्तम भाव में राहु स्थित हो और सप्तमेश पाप ग्रहों के साथ छ्ठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक के तलाक की संभावना होती है।*


*५.-यदि लग्न में मंगल हो व सप्तमेश अशुभ भावों में स्थित हो व द्वितीयेश पर मारणात्मक ग्रहों का प्रभाव हो तो पत्नी की मृत्यु के कारण व्यक्ति को दाम्पत्य-सुख से वंचित होना पड़ता है।*


*६.-यदि किसी स्त्री की जन्मपत्रिका में गुरु पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, सप्तमेश पाप ग्रहों से युत हो एवं सप्तम भाव पर सूर्य, शनि व राहु की दृष्टि हो तो ऐसी स्त्री को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता।*


सम्पूर्ण जन्म कुंडली विश्लेषण हेतु आप सम्पर्क कर सकते हो


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जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की


दक्षिणा  -  251 मात्र .


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हथेली से जाने कि लव मैरिज होगी या नहीं.


 





💕  हथेली से जाने कि लव मैरिज होगी या नहीं. 


            


          बहुत से सम्मानित सज्जनों के पास जन्म सम्बधित डिटेल न होने के कारण जन्म कुंडली उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे अपना भविष्य नहीं जान सकते। हस्तरेखाओं से भी आसानी से जीवन में हर क्षेत्र में होने वाली घटनाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है। ज्यादातर मामलों में यह जन्म कुंडली की तुलना में अधिक सटीक होता है।


     💝  आमतौर पर यह माना जाता है कि सबसे छोटी अंगुली के नीचे प्रेम या विवाह की रेखाएं होती हैं। जनमानस में यह भ्रम फैला दिया गया है कि यहां जितनी रेखाएँ होंगी, उतनी संख्या में विवाह होते हैं। 


लेकिन अनुभव में मैंने देखा है कि इन रेखाओं का विवाह से कोई संबंध नहीं है। जिन लोगों की हथेली में तीन रेखाएँ हैं उनका भी एक ही विवाह होता है। दूसरी बात यह भी है कि यदि इतनी आसानी से रेखाओं से संकेत मिलते तो, हर कोई ज्योतिषी बन जाता। 


हस्तरेखा या ज्योतिष में कोई भी योग हार्ड एण्ड फास्ट नहीं होता है। केवल संकेत मिलते हैं और उन्ही के आधार पर हमें अपनी धारणा बनानी होती है। और यह कतई आसान नहीं है और लम्बे अनुभव से आता है।


    💟  प्रेम विवाह की रेखाएँ बृहस्पति और मंगल के स्थान पर होती हैं। जब इन रेखाओं का परस्पर योग बने, तो उस उम्र में व्यक्ति प्रेम संबंध बनाने की शुरुआत करता है। ये रेखाएँ जितनी दीर्घ होंगी, प्रेम संबंध उतना ही लम्बे समय तक चलता है। 


जब ये रेखाएँ सुंदर और स्पष्ट आकर में जहाँ परस्पर मिलें, उसी उम्र विशेष में जातक का प्रेम विवाह होता है। यदि ये रेखाएँ एक दूसरे से दूर रहकर ही रुक जाती हैं तो प्रेम तो होगा लेकिन यह प्रेम विवाह में कन्वर्ट नहीं होगा। 


इस स्थिति में अरैन्जड मैरिज कहना चाहिए। इसका अर्थ है कि जिससे प्रेम किया है उससे विवाह नहीं होगा। जब ये रेखाएँ एक दूसरे को काट कर आगे बढ़ रही हों तो भी प्रेम विवाह होता है। 


जब ये रेखाएँ कटी-फटी स्थिति में एक-दूसरे से मिल रही हों तो प्रेम विवाह तो होगा लेकिन शीघ्र ही दोनों प्रेमियों में मतभेद हो जाएगा और दोनों अलग हो जायेंगे।


ॐ卐ॐ卐ॐ


सभी का भविष्य मंगलमय हो।

ॐ卐ॐ


 


ध्यान रखें तांत्रिक उपाय करते समय किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी का परामर्श अवश्य लें।


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                💘   💝   💕   ❤   💙

Sunday, January 3, 2021

योगिनी साधना:👉🏻 गुप्त विद्या


 



योगिनी साधना:👉🏻 गुप्त विद्या


तंत्र में सदा से योगिनीयो का अत्यंत महत्व रहा है.तंत्र अनुसार योगिनी आद्य शक्ति के सबसे निकट होती है.माँ योगिनियो को आदेश देती है और यही योगिनी शक्ति साधको के कार्य सिद्ध करती है.


मात्र लोक में यही योगिनिया है जो माँ कि नित्य सेवा करती है.


योगिनी साधना से कई प्रकार कि सिद्धियाँ साधक को प्राप्त होती है.प्राचीन काल में जब तंत्र अपने चरम पर था तब योगिनी साधना अधिक कि जाती थी.


परन्तु धीरे धीरे इनके साधको कि कमी होती गयी और आज ये साधनाये बहुत कम हो गयी है.इसका मुख्य कारण है समाज में योगिनी साधना के प्रति अरुचि होना,तंत्र के नाम से ही भयभीत होना,तथा इसके जानकारो का अंतर्मुखी होना।


इन्ही कारणो से योगिनी साधना लुप्त सी होती गयी.परन्तु आज भी इनकी साधनाओ के जानकारो कि कमी नहीं है.आवश्यकता है कि हम उन्हें खोजे और इस अद्भूत ज्ञान कि रक्षा करे.आज हम जिस योगिनी कि चर्चा कर रहे है वो है " सिद्ध योगिनी " कई स्थानो पर इन्हे सिद्धा योगिनी या सिद्धिदात्री योगिनी भी कहा गया है.ये सिद्दी देने वाली योगिनी है.


जिन साधको कि साधनाये सफल न होती हो,या पूर्ण सफलता न मिल रही हो.तो साधक को सिद्ध योगिनी कि साधना करनी चाहिए।इसके अलावा सिद्ध योगी कि साधना से साधक में सतत प्राण ऊर्जा बढ़ती जाती है.


और साधना में सफलता के लिए प्राण ऊर्जा का अधिक महत्व होता है.विशेषकर माँ शक्ति कि उपासना करने वाले साधको को तो सिद्ध योगिनी कि साधना करनी ही चाहिए,क्युकी योगिनी साधना के बाद भगवती कि कोई भी साधना कि जाये उसमे सफलता के अवसर बड़ जाते है.साथ ही इन योगिनी कि कृपा से साधक का गृहस्थ जीवन सुखमय हो जाता है.


जिन साधको के जीवन में अकारण निरंतर कष्ट आते रहते हो वे स्वतः इस साधना के करने से पलायन कर जाते है.आइये जानते है इस साधना कि विधि।

आप ये साधना किसी भी कृष्ण पक्ष कि अष्टमी से आरम्भ कर सकते है.


इसके अलावा किसी भी नवमी या शुक्रवार कि रात्रि भी उत्तम है इस साधना के लिए.साधना का समय होगा रात्रि ११ के बाद का.आपके आसन तथा वस्त्र लाल होना आवश्यक है.इस साधना में सभी वस्तु लाल होना आवश्यक है.


अब आप उत्तर कि और मुख कर बैठ जाये और भूमि पर ही एक लाल वस्त्र बिछा दे.वस्त्र पर कुमकुम से रंजीत अक्षत से एक मैथुन चक्र का निर्माण करे.इस चक्र के मध्य सिंदूर से रंजीत कर े सुपारी का प्रयोग करे.इसके बाद सर्व प्रथम गणपति तथा अपने सद्गुरुदेव का पूजन करे.इसके बाद गोलक या सुपारी को योगिनी स्वरुप मानकर उसका पूजन करे,कुमकुम,हल्दी,कुमकुम मिश्रित अक्षत अर्पित करे,लाल पुष्प अर्पित करे.भोग में गुड का भोग अर्पित करे,साथ ही एक पात्र में अनार का रस अर्पित करे.


तील के तेल का दीपक प्रज्वलित करे.इसके बाद एक माला नवार्ण मंत्र कि करे.जाप में मूंगा माला का ही प्रयोग करना है या रुद्राक्ष माला ले.नवार्ण मंत्र कि एक माला सम्पन करने के बाद,एक माला निम्न मंत्र कि करे,


ॐ रं रुद्राय सिद्धेश्वराय नमः


इसके बाद कुमकुम मिश्रित अक्षत लेकर निम्न लिखित मंत्र को एक एक करके पड़ते जाये और थोड़े थोड़े अक्षत गोलक पर अर्पित करते जाये।


ॐ ह्रीं सिद्धेश्वरी नमः

ॐ ऐं ज्ञानेश्वरी नमः

ॐ क्रीं योनि रूपाययै नमः

ॐ ह्रीं क्रीं भ्रं भैरव रूपिणी नमः

ॐ सिद्ध योगिनी शक्ति रूपाययै नमः


इस क्रिया के पूर्ण हो जाने के बाद आप निम्न मंत्र कि २१ माला जाप करे.


ॐ ह्रीं क्रीं सिद्धाययै सकल सिद्धि दात्री ह्रीं क्रीं नमः


जब आपका २१ माला जाप पूर्ण हो जाये तब घी में अनार के दाने मिलाकर १०८ आहुति अग्नि में प्रदान करे.ये सम्पूर्ण क्रिया आपको नित्य करनी होगी नो दिनों तक.आहुति के समय मंत्र के अंत में स्वाहा अवश्य लगाये।अंतिम दिवस आहुति पूर्ण होने के बाद एक पूरा अनार जमीन पर जोर से पटक कर फोड़ दे और उसका रस अग्नि कुंड में निचोड़ कर अनार उसी कुंड में डाल दे.अनार फोड़ने से निचोड़ने तक सतत जोर जोर से बोलते रहे,


सिद्ध योगिनी प्रसन्न हो।


साधना समाप्ति के बाद अगले दिन गोलक को धोकर साफ कपडे से पोछ ले और सुरक्षित रख ले.कपडे का विसर्जन कर दे.नित्य अर्पित किया गया अनार का रस और गुड साधक स्वयं ग्रहण करे.सम्भव हो तो एक कन्या को भोजन करवाकर दक्षिणा दे,ये सम्भव न हो तो देवी मंदिर में दक्षिणा के साथ मिठाई का दान कर दे.इस प्रकार ये दिव्य साधना पूर्ण होती है.


निश्चय ही अगर साधना पूर्ण मनोभाव और समर्पण के साथ कि जाये तो साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते है.और जीवन को एक नविन दिशा मिलती ही है.इस साधना को यदि 21 दिनों तक किया जाए और साधना स्थल सुनसान वीरान जंगल या श्मशान हो अथवा ऐसा शिवमंदिर जो पुराना हो तो अद्भुत सफलता मिल सकती है ।


💀चेतावनी-बिना गुरु मार्गदर्शन और सुरक्षा कवच के साधना न करें 


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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Saturday, January 2, 2021

प्रेम विवाह के बाद कैसी होगा आगे का वैवाहिक जीवन, जानें ज्योतिष की नज़र से*



 




*प्रेम विवाह के बाद कैसी होगा आगे का वैवाहिक जीवन, जानें ज्योतिष की नज़र से*


*विवाह को लेकर अक्सर दो तरह के विचार सामने आते हैं। कुछ लोग तो प्रेम विवाह को सफल मानते हैं, वहीं कुछ लोग तयशुदा विवाह को अधिक सफल मानते हैं।*


*कुंडली में कुछ ऐसे योग होने से प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती हैं। राहू के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती हैं।*


*राहू का संबंध विवाह भाव से होने पर व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने की सोचता है। राहू का स्वभाव संस्कृति से हटकर कार्य करने की प्रवृत्ति का माना जाता है।*


*जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहू या केतु स्थित हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते हैं।*


*जन्म कुंडली में मंगल का शनि अथवा राहू से संबंध या युति हो रही हो तो भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती हैं। इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब विवाह भाव या भावेश से संबंध बनाता है तो जातक अपने परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करता है।*


*जिस व्यक्ति की कुंडली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहू की दृष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की संभावना अधिक बनती है।*


*व्यक्ति की कुंडली में मंगल अथवा चन्द्र पंचम भाव के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब/अथवा सप्तम भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते हैं। जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द्रमा लग्न से पंचम भाव में स्थित हो तो भी प्रेम विवाह की संभावना बनती है।*


*जब पंचम भाव में मंगल हो तथा पंचमेश व एकादेश का राशि परिवर्तन अथवा दोनों कुंडली के किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में भी प्रेम विवाह होने के पूर्ण योग बनते हैं। पंचम व सप्तम भाव के स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ स्थित हों उस स्थिति में भी प्रेम विवाह कि संभावना बनती है।*


*जब सप्तम भाव में शनि व केतु की स्थिति हो तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है। कुंडली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम विवाह की संभावना बनती है।*


*व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र व सप्तम भाव के स्वामी एक-दूसरे से दृष्टि संबंध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती हैं। सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हो तब प्रेम विवाह का भाव बली होता है।*


*पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति, स्थिति अथवा दृष्टि संबंध हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो रहा हो तब भी प्रेम विवाह के योग बनते हैं।*


*यदि सप्तमेश की दृष्टि, युति व स्थिति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हो तो प्रेम विवाह होता है। द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश की युति हो व भाग्येश इनसे दृष्टि संबंध बना रहा हो, तो भी प्रेम विवाह की संभावना बनती है।*


*तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रेम विवाह करने से पहले लड़के और लड़की को एक-दूसरे को जानने का पर्याप्त समय मिल जाता है।*


*इसके फलस्वरूप दोनों एक-दूसरे की रुचि, स्वभाव व पसंद-नापसंद को अधिक कुशलता से समझ पाते हैं, इसलिए इसके साथ ही समय रहते प्रेम विवाह करने से पहले लड़का और लड़की को अपने-अपने ग्रह नक्षत्रों की दिशा का भी बोध कर लेना और यह जान लेना चाहिए कि क्या प्रेम विवाह के उपरांत उन दोनों की वैवाहिक जिंदगी खुशनुमा रह पाएगी भी या नहीं।


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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...