Friday, March 27, 2020

धूमावती साधना एवं कुछ गोपनीय सूत्र





धूमावती साधना एवं कुछ गोपनीय सूत्र


हम हमेशा कई प्रकार की साधनाए करते रहते है।परन्तु सफलता न मिल पाने के कारण हम निराश हो जाते है।और हो भी क्यों न,परिश्रम में सफलता न मिलने से निराशा तो स्वभाविक है।सफलता न मिलने के दो कारण होते है।

प्रथम :

 साधना में उर्जा की कमी होना तथा समर्पण न होना।

द्वितीय :

 साधना के गुप्त सूत्रों का ज्ञान न होना जिससे की सफलता की सम्भावना बढ जाती जाती है।

उर्जा पर हम फिर कभी चर्चा करेंगे।आज हम माँ धूमावती की साधना में प्रयोग होने वाले कुछ गोपनीय सूत्रों पर चर्चा करेंगे।

कई साधक माँ धूमावती की साधनाए करते है,लाखो की संख्या में जाप करते है। किन्तु मंत्र की उर्जा का उन्हें अनुभव नहीं होता है। कार्य सिद्धि के लिये भी कई साधक धूमावती की साधना करते है लेकिन कार्य सिद्ध नहीं हो पाता है। किन्तु कुछ गुप्त प्रयोग है जिन्हें आप संपन्न करके सफलता के निकट पहुच सकते है।

१- साधना के पहले किसी भी दिन शमशान की मिट्टी में शमशान की भस्म मिलायी जाये,ये संभव न हो तो कोई भी भस्म ले और शिव मंदिर की मिट्टी ले।उसमे गुलाब जल और सामान्य जल मिलाकर एक लड्डू की तरह या अंडाकार पिंड का निर्माण कर ले।

और उस पर काजल से बीज मंत्र " धूं " लिखे ये सारी क्रिया आपको रात्रि में करनी है।और एकांत कक्ष में करनी है।हा भस्म और मिट्टी आप दिन में ला सकते है।

परन्तु उसे बाहर ही रखे,प्रयोग के समय कक्ष में लाये।अब दक्षिण मुख होकर बैठ जाये आसन वस्त्र सफ़ेद हो।सामने बजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर पिंड स्थापित करदे।अब पिंड पर अक्षत अर्पण करे निम्न मंत्र बोलते हुए।

ॐ धूम्र शिवाय नमः

अब कोई भी भस्म अर्पण करे निम्न मंत्र बोलते हुए

ॐ धूं धूं ॐ

अक्षत तथा भस्म २१ बार अर्पण करने है मंत्र बोलते हुए।
अब तील के तेल का दीपक प्रज्वलित करे,और किसी भी धुप बत्ती के द्वारा धुआ करे।अब आप धूमावती की जिस साधना में सफलता के लिये ये प्रयोग कर रहे है उसका संकल्प ले।और पिंड की और देखते हुए ३० मिनट तक निम्न मंत्र का जाप करे

ॐ धूं धूं धूमावती फट

इसके बाद उसी कपडे में पिंड को बांधकर शमशान में फेक आये या किसी निर्जन स्थान में रख दे पीछे मुड़कर न देखे।साधना के मध्य कोई अनुभव हो तो डरे नहीं।फिर आप जब चाहे कोई भी धूमावती साधना करे सफलता आपके समक्ष होगी।

२- शमशान से कोई सफ़ेद वस्त्र ले ले,जिसे शव पर ओढाया जाता है।उस पर वही की भस्म या कोयले के द्वारा निम्न मंत्र लिख कर उस कपडे को बहते जल में बहा दे या पीपल वृक्ष के निचे रख दे।

धूं धूं धूमावती ठः ठः

यदि आपको शमशान का कपडा न मिले तो कोई भी नया सफ़ेद वस्त्र लेकर शमशान भूमि से स्पर्श करा ले और उस पर काजल से मंत्र लिखकर ये क्रिया कर ले।

३- यदि आसन के निचे कोए का पंख रख लिया जाये,या सामने रख लिया जाये तो सफलता की सम्भावना बढ जाती है।

यु तो और भी कई गोपनीय सूत्र है परन्तु ये मेरे स्व अनुभूत है।

किसी और के अनुभव मुझसे अलग हो सकते है।द्वितीय प्रयोग आप तब भी कर सकते है जब कोई शत्रु तंग कर रहा हो,या कोई ऐसी इच्छा जो प्रयत्न करने पर भी पूर्ण न हो रही हो तब भी आप वस्त्र को कामना बोलते हुए बहा सकते है।

इन तीन गुप्त प्रयोगों को करने के बाद आप धूमावती साधना करे।माँ की कृपा से सफलता आपको अवश्य मिलेगी।

जय माँ

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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मोबाइल नं. : - 09958417249

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माँ मातंगी ख्याति प्राप्ति साधना




माँ मातंगी ख्याति प्राप्ति साधना


हम  जीवन में सदा मेहनत  करते है।तथा सदा प्रयत्न करते रहते है की हमारा समाज  तथा परिवार हमसे प्रसन्न रहे।परन्तु ऐसा होता नहीं है।उसका सबसे बड़ा कारन  है की हमारे पास बहुतमत नहीं है।यहाँ बहुमत का अर्थ प्रसिद्धि से है।

क्युकी  जब तक हमें जीवन में प्रसिद्धि नहीं मिलती हमारा कोई सम्मान नहीं करता  है।क्युकी दुनिया सर झुकाएगी तो ही परिवार सम्मान देगा .

अन्यथा कहावत तो  सुनी ही होगी घर की मुर्गी दाल बराबर।और यदि आप प्रसिद्ध है तो लक्ष्मी भी  आपके जीवन में आने को आतुर हो उठती है।प्रस्तुत साधना इसीलिये है।कुछ लाभ  यहाँ लिख रहा हु जो इस साधना से आपको प्राप्त होंगे।

1. साधक अपने कार्य क्षेत्र में तथा समाज में ख्याति प्राप्त करता है।

2. साधना माँ मातंगी से सम्बंधित है अतः साधक को पूर्ण गृहस्थ सुख प्राप्त होता है।तथा परिवार में सम्मान होता है।

3.माँ मातंगी में महा लक्ष्मी समाहित है अतः साधक का आर्थिक पक्ष मजबूत होता है।

यह केवल मैंने 3 लाभ लिखे है परन्तु एक साधक होने के नाते आप सभी ये बात बखूबी जानते है की कोई भी साधना मात्र लाभ ही नहीं देती है बल्कि साधक का चहुमुखी विकास करती है।साथ ही धैर्य तथा विश्वास परम आवश्यक है।

अतः साधना साधना कर लाभ उठाये तथा अपने जीवन को प्रगति प्रदान करे।

विधि:

साधना किसी भी शुक्रवार की रात्रि 10 के बाद करे,या ब्रह्मा मुहरत में भी की जा सकती है।आसन,वस्त्र सफ़ेद हो तथा आपका मुख उत्तर की और हो।सामने बजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाये और उस पर अक्षत से बीज मंत्र, "ह्रीं" लिखे फिर उस पर माँ मातंगी का कोई भी यन्त्र या चित्र स्थापित करे।

ये संभव न हो तो एक मिटटी के दीपक में तील का तेल डालकर कर जलाये और उसे स्थापित कर दे।अब दीपक को ही माँ का स्वरुप मानकर पूजन करे।

अगर अपने यन्त्र चित्र स्थापित किया है तो घी का दीपक पूजन में लगाये,सफ़ेद मिठाई अर्पित करे,कोई भी इतर अर्पित करे,यदि अपने तेल का दीपक स्थापित किया है तो घी का दीपक लगाने की कोई जरुरत नहीं है।

बाकि क्रम वैसा ही रहेगा।अब सद्गुरु तथा गणपति पूजन करे।जितना हो सके गुरुमंत्र का जाप करे।फिर मातंगी पूजन करे।तथा माँ से अपनी मनोकामना कहे एवं सफलता तथा आशीर्वाद प्रदान करने की प्रार्थना करे।

अब स्फटिक माला से निम्न मन्त्र की 21 माला करे।माला के बाद अग्नि प्रज्वलित कर घी,तील तथा अक्षत मिलकर 108 आहुति प्रदान करे।अगले दिन दीपक हो तो विसर्जन कर दे।

यन्त्र चित्र हो तो पूजा में रख दे।प्रसाद स्वयं ग्रहण कर ले।इतर संभल कर रख ले प्रति दिन इसे लगाने से आकर्षण पैदा होता है।इस तरह ये एक दिवसीय साधना सम्प्पन होगी।

मंत्र: 

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महा मातंगी प्रचिती दायिनी,लक्ष्मी दायिनी नमो नमः।

कुछ दिनों में आप साधना का प्रभाव स्वयं अनुभव करने लग जायेंगे।तो देर किस बात की साधना करे तथा जीवन को पूर्णता प्रदान करे।

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भुवनेश्वरी दरिद्रता नाशक साधना





भुवनेश्वरी दरिद्रता नाशक साधना


(  अचूक प्रयोग )

नाम से ही स्पष्ट है की ये साधना कितनी महत्वपूर्ण है,जिस पर माँ भुवनेश्वरी की कृपा हो जाये,वो कभी दरिद्र नहीं रह सकता,क्युकी माँ कभी अपनी संतान को दुखी नहीं देख सकती है।अतः ज्यादा न लिखते हुए विधान दे रहा हु।

***********

स्नान कर सफ़ेद वस्त्र धारण करे,और उत्तर की और मुख कर सफ़ेद आसन पर बैठ जाये।सामने ज़मीन पर सफ़ेद वस्त्र बिछाये और उस पर,अक्षत से बीज मंत्र " ह्रीं " लिखे और उस पर एक कोई भी रुद्राक्ष स्थापित करे,गुरु तथा गणेश पूजन संपन्न करे,

अब रुद्राक्ष का सामान्य पूजन करे,तथा निम्न मंत्र को २१ बार पड़े और अक्षत अर्पण करते जाये,अक्षत भी २१ बार अर्पण करने होंगे।

मंत्र :

||ॐ ह्रीं भुवनेश्वरी इहागच्छ इहतिष्ठ इहस्थापय मम सकल दरिद्रय नाशय नाशय ह्रीं ॐ||

अब पुनः रुद्राक्ष का सामान्य पूजन कर मिठाई का भोग लगाये,तील के तेल का दीपक लगाये।और बिना किसी माला के निम्न मंत्र का लगातार २ घंटे तक जाप करे,जाप करते वक़्त लगातार अक्षत रुद्राक्ष पर अर्पण करते रहे।साधना के बाद भोग स्वयं खा ले,और रुद्राक्ष को स्नान कराकर लाल धागे में पिरो ले और गले में धारण कर ले।

और सारे अक्षत उसी वस्त्र में बांध कर कुछ दक्षिणा के साथ देवी मंदिर में रख आये और दरिद्रता नाश की प्रार्थना कर ले।

मंत्र :

||हूं हूं ह्रीं ह्रीं दारिद्रय नाशिनी भुवनेश्वरी ह्रीं ह्रीं हूं हूं फट||

यह साधना अद्भूत है,अतः स्वयं कर अनुभव प्राप्त करे।
सभी बीजाक्षरों मे मकार का उच्चारन होग।

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Tuesday, March 24, 2020

तारा महाविद्या की साधना जीवन का सौभाग्य है






तारा महाविद्या की साधना जीवन का सौभाग्य है ।


यह महाविद्या साधक की उंगली पकडकर उसके लक्ष्य तक पहुंचा देती है।

गुरु कृपा से यह साधना मिलती है तथा जीवन को निखार देती है ।

यह प्रयोग साधक किसी भी शुभ दिन शुरू कर सकता है. साधक को यह प्रयोग रात्री काल में ही संपन्न करना चाहिए.

साधक को स्नान कर साधना को शुरू करना चाहिए. साधक लाल रंग के वस्त्र को धारण करे तथा लाल रंग के आसन पर बैठे. साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए.

साधक प्रथम गुरुपूजन करे तथा गुरु मन्त्र का जाप करे. इसके बाद साधक गणपति एवं भैरव देव का पंचोपचार पूजन करे. अगर साधक पंचोपचार पूजन न कर पाए तो साधक को मानसिक पूजन करना चाहिए.

साधक अपने सामने ‘पारद तारा’ विग्रह को स्थापित करे तथा निम्न रूप से उसका पूजन करे.

ॐ श्रीं स्त्रीं गन्धं समर्पयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं पुष्पं समर्पयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं धूपं आध्रापयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं दीपं दर्शयामि |

ॐ श्रीं स्त्रीं नैवेद्यं निवेदयामि |

साधक को पूजन में तेल का दीपक लगाना चाहिए तथा भोग के रूपमें कोई भी फल या स्वयं के हाथ से बनी हुई मिठाई अर्पित करे. इसके बाद साधक निम्न रूप से न्यास करे. इसके अलावा इस प्रयोग के लिए साधक देवी विग्रह का अभिषेक शहद से करे.

करन्यास

ॐ श्रीं स्त्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः

ॐ महापद्मे तर्जनीभ्यां नमः

ॐ पद्मवासिनी मध्यमाभ्यां नमः

ॐ द्रव्यसिद्धिं अनामिकाभ्यां नमः

ॐ स्त्रीं श्रीं कनिष्टकाभ्यां नमः

ॐ हूं फट करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

हृदयादिन्यास

ॐ श्रीं स्त्रीं हृदयाय नमः

ॐ महापद्मे शिरसे स्वाहा

ॐ पद्मवासिनी शिखायै वषट्

ॐ द्रव्यसिद्धिं कवचाय हूं

ॐ स्त्रीं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्

ॐ हूं फट अस्त्राय फट्

न्यास के बाद साधक को देवी तारा का ध्यान करना है.

ध्यायेत कोटि दिवाकरद्युति निभां बालेन्दु युक् शेखरां

रक्ताङ्गी रसनां सुरक्त वसनांपूर्णेन्दु बिम्बाननाम्

पाशं कर्त्रि महाकुशादि दधतीं दोर्भिश्चतुर्भिर्युतां

नाना भूषण भूषितां भगवतीं तारां जगत तारिणीं

इस प्रकार ध्यान के बाद साधक देवी के निम्न मन्त्र की 125  माला मन्त्र जाप करे. साधक यह जाप शक्ति माला, मूंगामाला से या तारा माल्य से करे तो उत्तम है. अगर यह कोई भी माला उपलब्ध न हो तो साधक को स्फटिक माला या रुद्राक्ष माला से जाप करना चाहिए.

॥ ऐं ऊं ह्रीं स्त्रीं हुं फ़ट ॥

॥ ॐ तारा तूरी स्वाहा ॥

 

  ॥   ऐं   ॐ   ह्रीं  क्रीं    हुं   फ़ट   ॥

किसी भी एक मंत्र का जाप रात्रि काल में ९ से ३ बजे के बीच करना चाहिये.

साधना से पहले गुरु से तारा दीक्षा लेना लाभदायक होता है.

साधक यह क्रम 9 दिन तक करे. 9 दिन जाप पूर्ण होने पर साधक शहद से इसी मन्त्र की १०८ आहुति अग्नि में समर्पित करे. इस प्रकार यह प्रयोग 9 दिन में पूर्ण होता है.

साधक की धनअभिलाषा की पूर्ति होती है

चेतावनी -

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Monday, March 23, 2020

भैरवी कल्पुद्धरित त्रैलोक्य विजय काली साधना






भैरवी कल्पुद्धरित त्रैलोक्य विजय काली साधना


गुप्त तंत्र ग्रंथो मे हमारे ऋषियो ने जो विधान दिये थे वह अपने आप मे रहस्यों से परिपूर्ण थे. तंत्र जगत का साहित्य कई रूप से गुढ़ रहा है तथा उसमे जो विधान दिये है वह भी अत्यधिक गुप्त रूप से लिखे गए थे ताकि अनाधिकारी व्यक्ति उसका दुरूपयोग ना कर सके. 

इस प्रकार जब यह साहित्य को समजने वाले लोग ही नहीं रहे तब तंत्र साधनाओ की अवलेहना हुई और इस प्रकार तंत्र साहित्य का एक बहोत ही बड़ा भाग लुप्त हो गया. और इन सब साहित्य को मिथ्या नाम दे दिया गया.

 ज़रा तटस्थ भाव से सोचे की जब नोट या कलम नहीं थि, उस समय ताड़पत्री, विविध पदार्थो के पर्ण, चर्म, धातु जेसे विविध पदार्थो पर अत्यधिक कष्ट और श्रमसाध्य लेखन कई प्रकार की स्याही बना कर हमारे ऋषियो ने लिखा. उसके पीछे उन लोगो का क्या व्यक्तिगत चिंतन हो सकता है?

 लेकिन पाश्चात्य संस्कृति से चकाचौंध हो कर हमने खुद का पतन करना शुरू कर दिया. खेर, लेकिन कई ग्रन्थ काल के थपेडो से भी सुरक्षित बचाए गए जो की कई तांत्रिक मठो और तंत्र ज्ञाताओ के पास सुरक्षित रहे.

 ऐसे अप्रकाशित ग्रंथो मे से एक है “भैरवी तंत्र” कई हज़ार श्लोको का यह ग्रन्थ अपने आप मे देवी साधनाओ के लिए बेजोड है. इसके कई पटल अपने आप मे पूर्ण तंत्र है जिसमे से एक पटल या भाग है “काली कल्प”. यह कल्प देवी काली की उपासना के लिए बेजोड है. 

जिसमे देवी सबंधित साधन एवं कवच दिया गया है. लेकिन यह कवच भी अपने आप मे अत्यधिक रहस्यों से परिपूर्ण है. यह कवच मात्र कवच नहीं लेकिन विविध ध्यान मंत्र तथा साधन मंत्रो का समूह है. जिसमे एक से एक बेजोड मंत्र है. 

उसी मे से एक मंत्र पद्धति है त्रैलोक्य विजय काली मंत्र. ग्रन्थ के अनुसार इस का उपयोग करने वाले व्यक्ति का देवता भी अहित करने की सोचते नहीं. फिर सामान्य शत्रु की तो बात ही क्या है. साधक शत्रुओ के ऊपर हावी हो जाता है तथा समस्त षड्यंत्रो से पार उतर कर सर्वत्र विजयी होता है.

 इस साधना को करने के बाद साधक मे एक अत्यधिक तीव्र मोहन शक्ति का भी विकास होता है जिससे सभी व्यक्ति उसके अनुकूल रहना ही योग्य समजते है. इस कल्याण प्रदाता गुढ़ साधना को साधक करे तो देवी काली का आशीर्वाद सदैव साधक पर बना रहता है.

साधक को चाहिए की वह यह साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू करे. सुबह उठ कर देवी महाकाली की पूजा करे तथा देवी दक्षिण काली का ध्यान करे. 

अगर साधक अपने सामने काली यन्त्र तथा चित्र रखे तो उत्तम है. इसके पश्च्यात साधक निम्न मन्त्र की १० माला सुबह, १० माला दोपहर तथा १० माला शाम को (सूर्यास्त के बाद रात्री काल मे सोने से पहले) मंत्र जाप करे. यह २१ दिन की साधना है. रोज ३ समय मंत्र जाप होना चाहिए.

 इसमें दिशा पूर्व रहे. वस्त्र आसान सफ़ेद रहे तथा माला काले हकीक या रुद्राक्ष की हो. जाप से पहले विनियोग निम्न मंत्र से करे. हाथ मे जल ले कर विनियोग बोलने के बाद जल को भूमि पर छोड़ दे.

विनियोग :

अस्य श्री काली कल्पे जगमंगला कवच गुढ़ मन्त्रान त्रैलोक्य विजय मन्त्रस्य शिव ऋषि अनुष्टुप् छन्दः दक्षिण कालिका देवता मम त्रैलोक्य विजय त्रैलोक्य मोहन सर्व शत्रु बाधा निवारार्थाय जपे विनियोग

उसके बाद दक्षिण कालिका का ध्यान कर निम्न मंत्र का जाप करे.

हूं ह्रीं दक्षिण कालिके खड्गमुण्ड धारिणी नमः

साधक पूजा और विनियोग सुबह करे, दोपहर और शाम को विनियोग या पूजन की ज़रूरत नहीं है ध्यान के बाद सीधे मंत्र जाप शुरू कर सकते है.

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आकस्मिक धन प्राप्ति केलिए ..(शेयर मार्केट या अन्य में लाभदायक )




आकस्मिक धन प्राप्ति केलिए ..(शेयर मार्केट या अन्य में लाभदायक )


धन प्राप्ति तो एक ऐसी क्रिया हैं जो सबके मन को भांति हैं जीवन मे धन के बिना किसी भी चीज का वैसा अस्तित्व नही हैं जैसा की होना ही चाहिए .आधिन्काश आवश्यकताए तो केबल धन के माध्यम से कहीं जायदा सुचारू रूप से पूरी हो जाती हैं ..

पर धन का आगमन भी तो एक अनिवार्य आवश्यकता हैं पर जो एक बंधी बंधाई धन राशि हर महीने मिलती हैं वह तो एक निश्चित रूप से खर्च होती हैं.. पर कहीं से यदि कोई आकस्मिक धन यदि हमें मिल जाता हैं तो वह बहुत ही प्रसन्नता दायक होता हैं .

पर यह आकस्मिक धन आये कहाँ से ..यह सबसे बड़ा प्रश्न अब हर किसी को तो गडा धन नही मिल सकता हैं . तो व्यक्ति नए नए माध्यम देखता हैं कि कैसे इसकी सम्भावनए बनायी जाए या हो पाए .

और सबसे ज्यादा हर व्यक्ति का रुझान हैं तो वह् हैं शेयर मार्केट की ओर ..रो ज जोभी सुचनाये आती हैं वह होती हैं शेयर मार्केट की.. की उसने इतना फायदा लिया या वह पूरी तरह से बर्बाद हो गया ..फिर भी लोग धनात्मक पक्ष कहीं जयादा देख्ते हैं .मतलब की फायदा होता ही हैं . अब जो लंबी अवधि के लिए अपना धन लगाते हैं वह कहीं ज्यादा लाभदायक होते हैं और जो कम अवधि के लिए उनके लिए क्या कहा जाए यह बहुत ही ज्यादा जोखिम भरा सौदा हैं .

पर एक साधना ऐसी भी हैं जिसके सफलता पूर्वक करने से व्यक्ति का जोखिम बहुत कम हो जाता हैं .. और व्यक्ति को लाभ की सम्भावनाये कहीं अधिक होती हैं

जप संख्या –

११ हज़ार हैं दिन् निर्धारित नही हैं जब जप समाप्त हो जाये तो १०८ आहुति इस मन्त्र से कर दे. और आप देखेंगे की स्वयं ही नए नए स्त्रोत से घनागम की अवश्यकताए पूरी होती जाएँगी.

वस्त्र पीले और आसन भी पीला रहेगा.
जप प्रातः काल कहीं जयादा उचित होगा .
दिशा पूर्व या उत्तर उचित रहेगी .

किसी भी माला से जप किया जा सकता हैं .
सदगुरुदेव पूजन , जप समर्पण और संकल्प कि क्यों कर रहे हैं यह साधना ..यह तो एक हमेशा से अनिवार्य अंग हैं ही .

मंत्र :

आकाश चारिणी यक्षिणी सुंदरी आओ धन लाओ मेरी झोलो भर जाओ |वर्षा करो धन की जैसे बादल वर सै जल की |कुबेर की रानी यक्षिणी महरानी कसम तेरे पति की लाज रख जन की | सच्चे गुरु का चेला बांटू प्रसाद मेवा करूँ तेरी जय सेवा जय यक्षिणी देवा ||

मन्त्र सिद्ध करने के बाद जो भी आप व्यापर या शेयर में अपन धन लगते हैं उसमे से जो आपको लगता हैं की आपका अधिक प्रोफिट हैं उस धन के कुछ हिस्से को ...मतलब जो धन पाए ..उसमे अपने गुरु का और देवीके नाम का कुछ भाग निकाल ले .... या उस धन के हिस्से को .... गुरु को दे कर यक्षिणी को मेवा आदि अर्पित कर दे .

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

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Sunday, March 22, 2020

मकान_कीलन_विधि





मकान_कीलन_विधि


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ऊं_हूँ_स्फारय_स्फारय_मारय_मारय_शत्रुवर्गान_नाशय नाशय_स्वाहा ।


उपरोक्त_मंत्र को दस हजार जप करके ।

घर के अंदर के चारों कोने की मिट्टी अपने अभिभावक के एक बलिस्त नीचे की मिट्टी की वेदी बना कर उस पर
बैर की लकडी में काला नमक,पीली सरसों , काली मिर्च , ताल मखाना , सरसो का तेल मिश्रित हवन करके ।

पुनः हवन की हुई भस्म के साथ एक बलिस्त ( बित्ता ) पलाश की लकडी चारो किनारो के गड्ढे में पुनः रख दें ।

इससे मकान का कीलन होता है मकान में मौजूद आत्माये भाग खडी होती हैं । तथा कीलन करने के पश्चात
कोई भी आत्मा घर में प्रवेश नहीं कर सकती
दक्षिण पश्चिम के कोने को 24 घंटे के बाद कीलें जिससे की घर में मौजूद आत्मायें बाहर निकल जायें

ये प्रत्यंगिरा का मकान कीलन विधि है।।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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