Wednesday, December 26, 2018

योनि मुद्रा......






योनि मुद्रा.........


            यौगिक दृष्टि से मनुष्य के अंदर कई प्रकार के रहस्यमयी शक्ति छिपी हूई है । इन शक्ति को शरीर के अन्तर छिपाकर रखने वाली मुद्रा का नाम ही ‘योनि मुद्रा’ है । तत योग के अनुसार केवल हाथों की उंगलियों से महाशक्ति भगवती की प्रसन्नता के लिए योनि मुद्रा प्रदर्शित करने की आज्ञा है ।

 प्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव लंबी योग साधना के अंतर्गत तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना से भी दृष्टिगोचर होता है । इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से साधक की प्राण-अपान वायु को मिला देने वाली मूलबंध क्रिया को भी साथ करने से जो स्थिति बनती है, उसे ही योनि मुद्रा की संज्ञा दी गयी है । यह एक बड़ी चमत्कारी मुद्रा है ।

                पद्मासन की स्थिति में बैठकर, दोनों हाथों की उंगलियों से योनि मुद्रा बनाकर और पूर्व मूलबंध की स्थिति में सम्यक् भाव से स्थित होकर प्राण-अपान को मिलाने की प्रबल भावना के साथ मूलाधार स्थान पर यौगिक संयम करने से कई प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं । 

ऋषिमुनियों के अनुसार जिस योगी को उपरोक्त स्थिति में योनि मुद्रा का लगातार अभ्यास करते-करते सिद्धि प्राप्त हो गई है । उसका शरीर साधनावस्था में भूमि से आसन सहित ऊपर अधर में स्थित हो जाता है । 

इस मुद्रा का प्रयोग साधना में शाक्ति को द्रवित किये जाने के लिये किया जाता है । भगवती की साधना में उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस मुद्रा का प्रदर्शन उनके सम्मुख किया जाता है । पंचमकार साधना में मुद्रा का अति आवश्यक स्थान होता है ।

               योग तन्त्र का पूरा आधार गुढ़ रहस्यमयी है । जिसको समझना बहूत कठीन है । इस के जितने गहराई में जाये उतनी ही उलझने सामने आती रहती है । जितना भी समज आये कम ही है ।

 सदियों से साधक ने इस आधार को समझाने की कोशिश की है और अत्यधिक से अत्यधिक ज्ञान प्राप्त करने पर भी उसके सभी पक्षों की खोज नही कर पाये है । वह आधार है कुण्डलिनी शक्ति जागरण की । कुण्डलिनी के जितने भी पक्ष अब तक विविध साधकों, ऋषिमुनी ने सामने रखे है । 

वह मनुष्यों को उसकी शक्ति के परिचय के लिए पर्याप्त है । सामान्य रूप मे साधको के मध्य कुण्डलिनी का षट्चक्र जागरण ही प्रचलित है । लेकिन उच्चकोटि के योगियों का कथन है की सहस्त्रारजागरण तो कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत मात्र है । 

उसके बाद ह्रदयचक्र, चित चक्र, मस्तिस्क चक्र, सूर्यचक्र जागरण जैसे कई चक्रों की अत्यधिक दुस्कर सिद्धिया है । जिन के बारे मे सामान्य मनुष्यों को भले ही ज्ञान न हो लेकिन इन एक एक चक्रों के जागरण के लिए उच्चकोटि के साधकों एवं ऋषिमुनी बर्षो तक साधना करते रहते है

 । इस प्रकार यह कभी न खत्म होने वाला एक अत्यधिक गुढ़ विषय है । इसी क्रम मे आज हमारे तंत्र के धरातल पे अलग अलग बहूत से विधान प्रचलित है ।

                योग तन्त्र के मध्य कायाकल्प के लिए एक अत्यधिक महत्वपूर्ण विधान है । कायाकल्प और सौंदर्य का सही अर्थ क्या है ? यह मात्र काया को सुन्दर बनाने की कोई विधि मात्र नही है ।

 यह आत्मा की निर्मलता से ले के पाप मुक्त हो के आनंद प्राप्ति की क्रिया है । अगर साधक आतंरिक चक्रों के दर्शन की प्रक्रिया कुण्डलिनी के वेग मार्ग से करता है । तब उसे मूलाधार से आगे बढ़ते ही एक त्रिकोण द्रष्टिगोचर होता है । जो की आतंरिक योनी है । 

मनुष्यका ह्रदय पक्ष और स्त्री भाव इस त्रिकोण पर निर्भर करता है । और उसके ऊपर मणिपुर चक्र के पास एक लिंग ठीक उस त्रिकोण अर्थात योनी के ऊपर स्थिर रहता है । जो की व्यक्ति के मस्तिष्क पक्ष और पुरुष भाव से सबंधित होता है ।       

             यह त्रिकोण और लिंग से एक पूर्ण शिवलिंग का निर्माण होता है । जिसे योग-तन्त्र मे आत्मलिंग कहा गया है । इस लिंग के दर्शन करना अत्यधिक सौभाग्य सूचक और सिद्धि प्रदाता है । शिवलिंग के अभिषेक के महत्व के बारे मे हर व्यक्ति जनता ही है ।

 इसी क्रम मे साधक इस लिंग का भी अभिषेक करे तो आत्मलिंग से जो उर्जा व्याप्त होती है । वह पुरे शरीर मे फ़ैल कर आतंरिक शरीर का कायाकल्प कर देती है ।

 उसके बाद साधक निर्मल रहता है । उसके चेहरे पर और वाणी मे एक विशेष प्रभाव आ जाता है । साधक एक हर्षोल्लास और आनंद मे मग्न रहता है और कई सिद्धिया उसे स्वतः प्राप्त हो जाती है ।

             योगतन्त्र मे इस दुर्लभ विधान की प्रक्रिया निम्न दी गयी है । यथा संभव इस अभ्यास को साधक ब्रम्ह मुहूर्त मे ही करे । अगर यह संभव न हो तो कोई ऐसे समय का चयन करे जब शान्ती हो और अभ्यास के मध्य कोई विघ्न ना आये ।

 साधक पहले अपनी योग्यता से सोऽहं बीज के साथ अनुलोम विलोम की प्रक्रिया करे । उसके बाद भस्त्रिका करे । अनुभव मे आया है की जब साधक २ मिनट मे १२० बार पूर्ण भस्त्रिका करे तब उसे कुछ समय आँखे बांध करने पर कुण्डलिनी का आतंरिक मार्ग कुछ क्षणों तक दिखता है । 

इस समय मे साधक को

 "।। ॐ आत्मलिंगायै हूं ।।"

 का सतत जाप करते रहना चाहिए । नियमित रूप से जाप करते रहने से वह लिंग धीरे धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगता है । जब वह पूर्ण रूप से दिखाई देने लग जाए तब आत्मलिंग के ऊपर अपनी कल्पना के योग्य

 "।। ॐ आत्मलिंगायै सिद्धिं फट ।।"  

मंत्र द्वारा अभिषेक करे । जिसे आँखों के मध्य हम बहार देखते है । चित के माध्यम से शरीर उसे अंदर देख सकता है । 
              चित, द्रष्टि के द्वारा पदार्थो का आतंरिक सर्जन करता है और उसे ही मस्तिक के माध्यम से बिम्ब का रूप समज कर हम बहार देखकर महसूस करते है ।  

इस प्रक्रिया मे चित का सूक्ष्म सर्जन ही मूल सर्जन की भाव भूमि का निर्माण करता है । इस लिए अभिषेक करते वक्त चित मे से निकली हुयी अभिषेक की कल्पना सूक्ष्मजगत मे मूल पदार्थ की रचना करती ही है । 

जिससे साधक जो भी अभिषेक विधान की प्रक्रिया करता है वो साधक के लिए भले ही कल्पना हो । सूक्ष्म जगत मे उसका बराबर अस्तित्व होता ही है । अभिषेक का अभ्यास शुरू होते ही साधक का कायाकल्प भी शुरू हो जाता है । "लिंग" का सामान्य अर्थ "चिन्ह" होता है । इस अर्थ में लिंग पूजन, शिव के चिन्ह या प्रतीक के रूप में ही होता है । 

             अब मानसपटल पे सवाल उठता है कि लिंग पूजन केवल शिव का ही क्यों होता है ? अन्य देवताओं का क्यों नहीं ? कारण यह है कि शिव को आदि शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है । जिसकी कोई आकृति नहीं है । 

इस रूप में शिव निराकार है । लिंग का अर्थ ओंकार ( ॐ ) बताया गया है । “प्रणव तस्य लिंग ” उस ब्रह्म का चिन्ह प्रणव, ओंकार है । 

अतः  "लिंग" का अर्थ शिव की जननेन्द्रिय से नहीं है । उनके पहचान चिह्न से है । जो अज्ञात तत्त्व का परिचय देता है । यह पुराण प्रधान प्रकृति को ही लिंग रूप मानता है ।

साधना काल के दौरान आपको कुछ आश्चर्य जनक अनुभव हो सकते हैं, पर इनसे न परेशान या बिचलित न हो , ये तो साधना सफलता के लक्षण हैं .

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है 

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राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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हनुमान सिद्धि





हनुमान सिद्धि 


कलयुग में माता काली, भेरव बाबा और हनुमान जी को ही जागृत देवता माना जाता है ! इस युग में एक मात्र हनुमान जी ही ऐसे देवता है ! जो बहुत जल्दी प्रसन्न होते है !

 बाबा को इसलिए ही संकट मोचन कहा जाता है कि हनुमान जी सभी के संकट हर लेते है ! हनुमान जी कृपया दृष्टी, प्राप्त होने से सभी ग्रह शांत हो जाते है !

 कोई भी ग्रह उस व्यक्ति का अहित नहीं कर सकता ! इसलिए आज हम आप के लिए हनुमान जी कि सिद्धि हेतु ! शाबर मन्त्र ले कर आये है !

हनुमान सिद्धि शाबर मन्त्र !


अजरंग पहनू ! बजरंग पहनू ! सब रंग रखु पास ! दाये चले भीमसेन ! बाये हनुमंत ! आगे चले काजी साहब !! पीछे कुल बलारद ! आतर चौकी कच्छ कुरान ! आगे पीछे तुं रहमान ! धड़ खुदा, सिर राखे सुलेमान !! लोहे का कोट, ताम्बे का ताला !! करला हंसा बीरा ! करतल बसे समुंदर तीर ! हांक चले हनुमान कि ! निर्मल रहे शरीर !!

विधि -

 किसी शुभ मंगलवार से हनुमान जी के सभी नियम मानते हुए ! ११ माला प्रतिदिन जपे ! ११ दिन पुरे होने पर ! हनुमान जी के नाम पर हवन करे ! गरीब बच्चो और कन्याओ को दान-दक्षिणा दे कर, आशीर्वाद प्राप्त करे !

 हनुमान जी के स्वप्न में दर्शन होगे ! बाद में भी प्रतिदिन १ माला जपते रहे ! हनुमान जी कि कृपया बनी रहेगी !

नोट- 

यदि ११ दिन से पहले ही हनुमान जी का आशीर्वाद मिल जाये तो भी  ११ दिन अवश्य पुरे करे ! जाप बीच में न छोड़े ! जितना विश्वास और श्रध्दा होगी ! उतनी जल्दी बाबा का आशीर्वाद प्राप्त होगा !

साधना काल के दौरान आपको कुछ आश्चर्य जनक अनुभव हो सकते हैं, पर इनसे न परेशान या बिचलित न हो , ये तो साधना सफलता के लक्षण हैं .

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

दक्षिणा शुल्क 1500 रू +डाक व्यय

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वशीकरण साधना





-------------------------------वशीकरण साधना



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यह साधना बहुत ही उच्च कोटि की साधना हैं वशीकरण की, इसमें कोई दो मत हैं ही नहीं ,जिसके माध्यम से आप किसी को भी अपने नियंत्रण में ला कर अनुकूल बना सकते हैं 

इस साधना को किसी भी सोमबार की रात्रि में ११ बजे के बाद प्रारंभ किया जा सकता हैं ,साधना प्रारंभ करने से पूर्व स्नान करके लाल वस्त्र धारण करले .

कोई एक प्लेट ले ,जो लोहे या स्टील की बनी हो .| इसके अंदर पूरी तरह काजल लगा दे, और निम्नाकित मंत्र लिखे (काजल को इस प्रकार से हटा हैं की ) 

" ॐ अघोरेभ्यों घोरेभ्यों नमः "

उस प्लेट के उपर जिस व्यक्ति का वशीकरण करना हैं उसका एक वस्त्र का टुकड़ा विछा दें | यदि ये किसी भी प्रकार से संभव न हो तो ,तो कोई भी नया कपडे का टुकड़ा उस पूरी प्लेट पर बिछा दें. |उस के ऊपर उस व्यक्ति का नाम लिख दे, जिस पर ये प्रयोग करना हैं ये नाम लेखन की प्रक्रिया ,सिन्दूर से ही की जाना चाहिए | 
. अपने सामने भगवान् शिव का कोई भी चित्र जो भी आपके पास हो और उस व्यक्ति का भी (जिस पर ये प्रयोग किया जाना हैं ) रखे.

इसके बाद पूर्ण मनोयोग से उसी रात्रि में , काली हकीक या रुद्राक्ष माला से ५१ माला निम्नाकित मंत्र जप करें.

शिवे वश्ये हुं वश्ये अमुक वश्ये हुं वश्ये शिवे वश्ये वश्य्मे वश्य्मे वश्य्मे फट 

इस मंत्र में अमुक की जगह उस व्यक्ति का नाम उच्चारित करें जिसे आपको वश में करना हैं .

जब ये मंत्र जप पूर्ण हो आप ऋषि मुंड केश और भगवान् अघोरेश्वर से इस साधना में सफलता के लिए प्राथना करें.

साधना काल के दौरान आपको कुछ आश्चर्य जनक अनुभव हो सकते हैं, पर इनसे न परेशान या बिचलित न हो , ये तो साधना सफलता के लक्षण हैं .

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Tuesday, December 25, 2018

योनि पुजा ही तंत्र का मेरूदणड






योनि पुजा ही तंत्र का मेरूदणड....


                 समाज में आज योनी पुजा की बात करे तो मनुष्य उसको नकारात्मक दृष्टी से देखना शुरू कर देते है । जो मनुष्य  योनि पूजा को नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं, परमात्मा उन्हें सदवुद्धी दे । कृपा करे यैसे अज्ञानीओं पे ।

 उन्हें पता ही नहीं कि वह जननी शक्ति, श्रृष्टि शक्ति को नकारात्मक दृष्टि से देख रहे हैं । देवो के देव महादेव उनपर कृपा बरसाये रखे जो योनि पूजा का महत्व जानते हीं नही हैं । उन्हें इस सत्यता का पत्ता ही नहीं हैे की योनी पूजा के बिना कोई भी साधना पूर्ण नहीं है । 

शक्ती और शव की बहूत बडी कृपा है की हमें ये अति महत्वपूर्ण ज्ञान दिया और हमे शक्ति साधक बनाया ।

 योनिपूजा से ही हम भैरवी साधना, शक्ति साधना, कुंडलिनी साधना और भी बहूत साधना मार्ग पर अग्रसर हो सकते है र सफलता प्राप्त कर सकते है । 

                लिंग पूजा पूरे विश्व में होती है । सभी बड़ी ख़ुशी के साथ करते हैं, पर योनिपूजा के नाम पर नाक भौं सिकुड़ता है । जबकि सम्पूर्ण विश्व का मूल उत्पत्ति कारक यही योनी है । आज हम मनुष्य सत्यता को अनदेखा कर रहे है । इसे मूर्खता और छुद्र मानसिकता नहीं कहेगे तो और क्या कहेंगे ।

                जो मनुष्य काम भावना से परेशान हैं ।

 कामुकता से पीड़ित हैं । ना चाहते हुए भी दिमाग काम वासना की ओर ही जाता है । पूजा पाठ में भी भावना शुद्ध नहीं तह पाती । कामुकता जगती है । अपराधबोध उपजता है ।

 यैसे मनुष्य इन सब से मुक्ति चाहते है तो इनको साधना करना बहूत जरूरी है । कामुक्ता से मुक्ती और शक्ति प्राप्ती के लिए भैरवी तंत्र मार्ग सर्वोत्तम मार्ग है ।

 प्राकृतिक नियमो पर आधारित ये साधना मनुष्य को काम उर्जा मोक्ष तक पहुचा सकती है । अन्य कोई साधना मार्ग से काम बासना मुक्ति का रास्ता बहूत ही कठीन है । 

                स्कन्द पुराण में भगवान् शिव ने ऋषि नारद को नाद ब्रह्म का ज्ञान दिया था और मनुष्य देह में स्थित चक्रों और आत्म ज्योति रूपी परमात्मा के साक्षात्कार का मार्ग बताया था । स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर प्रत्येक मनुष्य के अस्तित्व में हैं । सूक्ष्म शारीर में मन और बुद्धि हैं । 

मन सदा संकल्प -विकल्प में लगा रहता है । बुद्धि अपने लाभ के लिए मन के सुझावों को तर्क -वितर्क से विश्लेषण करती रहती है । कारण या लिंग शरीर ह्रदय में स्थित होता है जिसमें अहंकार और चित्त मंडल के रूप में दिखाई देते हैं । 

अहंकार अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है और चित्त पिछले अनेक जन्मों के घनीभूत अनुभवों को संस्कार के रूप में संचित रखना चाहाता है ।
                   आत्मा जो एक ज्योति है । इस से परे है किन्तु आत्मा के निकलते ही स्थूल शरीर से सूक्ष्म और कारण शरीर अलग हो जाते हैं । कारण शरीर को लिंग शरीर भी कहा गया हैं । क्योंकि इसमें निहित संस्कार ही आत्मा के अगले शरीर का निर्धारण करता हैं । आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति महादेव ने बतायी है ।    

                    पिछले कर्म द्वारा प्रेरित जीव आत्मा, वीर्य जो की खाए गए भोजन का सूक्ष्मतम तत्व है, के रूपप में परिणत हो कर माता के गर्भ में प्रवेश करता है । जहाँ मान के स्वभाव के अनुसार उसके नए व्यक्तित्व का निर्माण होता है ।

 गर्भ में स्थित शिशु अपने हाथों से कानों को बंद करके अपने पूर्व कर्मों को याद करके पीड़ित होता है । और अपने को धिक्कार कर गर्भ से मुक्त होने का प्रयास करता है । जन्म लेते ही बाहर की वायु का पान करते ही वह अपने पिछले संस्कार से युक्त होकर पुरानी स्मृतियों को भूल जाता है । 

                  शरीर में सात धातु हैं । त्वचा, रक्त, मांस वसा, हड्डी, मज्जा और वीर्य (नर शरीर में ) या रज (नारी शरीर में ) । देह में नो छिद्र हैं । दो कान, दो नेत्र, दो नासिका, मुख, गुदा और लिंग । स्त्री शरीर में दो स्तन और एक भग यानी गर्भ का छिद्र अतिरिक्त छिद्र हैं ।

 स्त्रियों में बीस पेशियाँ पुरुषों से अधिक होती हैं । उनके वक्ष में दस और भग में दस और पेशियाँ होती हैं ।

 योनी में तीन चक्र होते हैं तीसरे चक्र में गर्भ शैय्या स्थित होती है । लाल रंग की पेशी वीर्य को जीवन देती है । शरीर में एक सौ सात मर्म स्थान और तीन करोड़ पचास लाख रोम कूप होते हैं । जो व्यक्ति योग अभ्यास में निरत रहता है वह नाद ब्रह्म और तीनों लोकों को सुखपूर्वक जानता और भोगता है । 

मूल आधार स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार नामक सात ऊर्जा केंद्र शरीर में है । जिन पर ध्यान का अभ्यास करने से देवीय शक्ति प्राप्त होती है ।

 सहस्रार में प्रकाश दीखने पर वहां से अमृत वर्षा का सा आनंद प्राप्त होता है । जो मनुष्य शरीर की परम उपलब्धि है । जिसको अपने शरीर में दिव्य आनंद मिलने लगता है । वह फिर चाहे भीड़ में रहे या अकेले में, चाहे इन्द्रियों से विषयों को भोगे या आत्म ध्यान का अभ्यास करे । उसे सदा परम आनंद और मोह से मुक्ति का अनुभव होता है ।

 मनुष्य का शरीर अनु, परमाणुओं के संघटन से बना है । जिस तरह अणु, परमाणु सदा गति शील रहते हैं । किन्तु प्रकाश एक ऊर्जा मात्र है जो कभी तरंग और कभी कण की तरह व्यवहार करता है । 

उसी तरह आत्म सूर्य के प्रकाश से भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है । यह इस तरह सिद्ध होता है की सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक आने में कुछ मिनट लगते हैं । जब की मनुष्य उसे आँख खोलते ही देख लेता है । 

अतः आत्मा प्रकाश से भी सूक्ष्म है । जिसका अनुभव और दर्शन केवल ध्यान के माध्यम से ही होता है । जब तक मन उस आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर लेता उसे मोह से मुक्ति नहीं मिल सकती ।

 मोह मनुष्य को भय भीत करता है । क्योंकि जो पाया है उसके खोने का भय उसे सताता रहता है । जबकि आत्म दर्शन से दिव्य प्रेम की अनुभूति होती है । जो व्यक्ति को निर्भय करती है क्योंकि उसे सब के अस्तित्व में उसी दिव्य ज्योति का दर्शन होने लगता है ।

नोटः-

शुद्ध उच्चारण के साथ किसी साधक के मार्गदर्शन में इन मंत्रों का प्रयोग करना ही लाभकर होगा।यदि किसी भी प्रकार की दिक्कते हो,तो मुझसे सम्पर्क कर सकते है।

आप सभी को मेरी शुभकामनाएं साधना करें साधनामय बनें......

साधको को सूचित किया जाता हैं की हर चीज की अपनी एक सीमा होती हैं , इसलिए किसी भी साधना का प्रयोग उसकी सीमा में ही रहकर करे , और मानव होकर मानवता की सेवा करे अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाएँ ,.

.चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

विशेष -

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चंद्रज्योत्सना अप्सरा साधना





चंद्रज्योत्सना अप्सरा साधना प्रयोग 


उच्चकोटि कि अप्सराओं कि श्रेणी में चंद्रज्योत्सना  का प्रथम स्थान है, जो शिष्ट और मर्यादित मणि जाती है, सौंदर्य कि दृष्टि से अनुपमेय कही जा सकती है |

 शारीरिक सौंदर्य वाणी कि मधुरता नृत्य, संगीत, काव्य तथा हास्य और विनोद यौवन कि मस्ती, ताजगी, उल्लास और उमंग ही तो चंद्रज्योत्सना है | जिसकी साधना से वृद्ध व्यक्ति भी यौवनवान होकर सौभाग्यशाली बन जाता है |

जिसकी साधना से योगी भी अपनी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करता है | अभीप्सित पौरुष एवं सौंदर्य प्राप्ति के लिए प्रतेक पुरुष एवं नारी को इस साधना में अवश्य रूचि लेनी चाहिए | सम्पूर्ण प्रकृति सौंदर्य को समेत कर यदि साकार रूप दिया तो उसका नाम चंद्रज्योत्सना होगा |

सुन्दर मांसल शारीर, उन्नत एवं सुडौल वक्ष: स्थल, काले घने और लंबे बाल, सजीव एवं माधुर्य पूर्ण आँखों का जादू मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान दिल को गुदगुदा देने वाला अंदाज यौवन भर से लदी हुई चंद्रज्योत्सना बड़े से बड़े योगियों के मन को भी विचिलित कर देती है | जिसकी देह यष्टि से प्रवाहित दिव्य गंध से आकर्षित देवता भी जिसके सानिध्य के लिए लालायित देखे जाते हैं |

सुन्दरतम वर्स्त्रलान्कारों से सुसज्जित, चिरयौवन, जो प्रेमिका या प्रिय को रूप में साधक के समक्ष उपस्थित रहती है | साधक को सम्पूर्ण भौतिक सुख के साथ मानसिक उर्जा, शारीरिक बल एवं वासन्ती सौंदर्य से परिपूर्ण कर देती है |

इस साधना के सिद्ध होने पर वह साधक के साध छाया के तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रहती है तथा उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती है |

चंद्रज्योत्सना साधना सिद्ध होने पर सामने वाला व्यक्ति स्वंय खिंचा चला आये यही तो चुम्बकीय व्यक्तिव है|

साधना से साधक के शरीर के रोग, जर्जरता एवं वृद्धता समाप्त हो जाती है |

यह जीवन कि सर्वश्रेष्ठ साधना है | जिसे देवताओं ने सिद्ध किया इसके साथ ही ऋषि मुनि, योगी संन्यासी आदि ने भी सिद्ध किया इस सौम्य साधना को |

इस साधना से प्रेम और समर्पण के कला व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुरित होती है | क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों में बिमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जायेगा | 

प्रेम को अभिव्यक्त करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है चंद्रज्योत्सना साधना | जिन्होंने चंद्रज्योत्सना  साधना नहीं कि है, उनके जीवन में प्रेम नहीं है, तन्मयता नहीं है, प्रस्फुल्लता भी नहीं है |

साधना विधि

सामग्री – प्राण प्रतिष्ठित चंद्रज्योत्सनात्कीलन यंत्र, चंद्रज्योत्सना माला, सौंदर्य गुटिका  |

यह रात्रिकालीन २७ दिन कि साधना है | इस साधना को किसी भी पूर्णिमा को, शुक्रवार को अथवा किसी भी विशेष दिन प्रारम्भ करें | 

साधना प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि स्नान आदि से निवृत होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीला या सफ़ेद किसी भी आसान पर बैठे, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें | 

पूर्व दिशा कि ओर मुख करके बैठें | घी का दीपक जला लें | सामने चौकी पर एक थाली या पलते रख लें, दोनों हाथों में गुलाब कि पंखुडियां लेकर रम्भा का आवाहन करें |

|| ओम ! चंद्रज्योत्सने अगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते ||

यह आवश्यक है कि यह आवाहन कम से कम १०१ बार अवश्य हो प्रत्येक आवाहन मन्त्र के साथ एक गुलाब के पंखुड़ी थाली में रखें | इस प्रकार आवाहन से पूरी थाली पंखुड़ियों से भर दें |

अब अप्सरा माला को पंखुड़ियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसान पर ओर अपने ऊपर इत्र छिडके | चंद्रज्योत्सनात्कीलन यन्त्र को माला के ऊपर आसान पर स्थापित करें | गुटिका को यन्त्र के दाँयी ओर तथा  यन्त्र के बांयी ओर स्थापित करें | सुगन्धित अगरबती एवं घी का दीपक साधनाकाल तक जलते रहना चाहिए |

सबसे पहले गुरु पूजन ओर गुरु मन्त्र जप कर लें | फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्री का पंचोपचार से पूजन सम्पन्न करें |स्नान, तिलक, धुप, दीपक एवं पुष्प चढावें |

इसके बाद बाएं हाथ में गुलाबी रंग से रंग हुआ चावल रखें, ओर निम्न मन्त्रों को बोलकर यन्त्र पर चढावें

|| ॐ दिव्यायै नमः ||

|| ॐ प्राणप्रियायै नमः ||

|| ॐ वागीश्वये नमः ||

|| ॐ ऊर्जस्वलायै नमः ||

|| ॐ सौंदर्य प्रियायै नमः ||

|| ॐ यौवनप्रियायै नमः ||

|| ॐ ऐश्वर्यप्रदायै नमः ||

|| ॐ सौभाग्यदायै नमः ||

|| ॐ धनदायै चंद्रज्योत्सने नमः ||

|| ॐआरोग्य प्रदायै नमः ||

इसके बाद उपरोक्त चंद्रज्योत्सना माला से निम्न मंत्र का ११ माला प्रतिदिन जप करें |

मंत्र : 

||ॐ हृीं चंद्रज्योत्सने ! आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांछितं देहि ऐं ॐ नमः ||

प्रत्येक दिन अप्सरा आवाहन करें, ओर हर शुक्रवार को दो गुलाब कि माला रखें, एक माला स्वंय पहन लें, दूसरी माला को रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगन्ध एक दम बढने लगे अप्सरा का बिम्ब नेत्र बंद होने पर भी स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने यन्त्र पर पहना दें |

२७ दिन कि साधना प्रत्येक दिन नये-नये अनुभव होते हैं, चित्त में सौंदर्य भव भाव बढने लगता है, कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है | स्त्रियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने पर चेहरे पर झाइयाँ इत्यादि दूर होने लगती हैं |

साधना पूर्णता के पश्चात मुद्रिका को अनामिका उंगली में पहन लें, शेष सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें | यह सुपरिक्षित साधना है | पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर अवश्य मनोकामना पूर्ण होती ही है |

नोटः-

शुद्ध उच्चारण के साथ किसी साधक के मार्गदर्शन में इन मंत्रों का प्रयोग करना ही लाभकर होगा।यदि किसी भी प्रकार की दिक्कते हो,तो मुझसे सम्पर्क कर सकते है।

आप सभी को मेरी शुभकामनाएं साधना करें साधनामय बनें......

साधको को सूचित किया जाता हैं की हर चीज की अपनी एक सीमा होती हैं , इसलिए किसी भी साधना का प्रयोग उसकी सीमा में ही रहकर करे , और मानव होकर मानवता की सेवा करे अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाएँ ,.

.चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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Sunday, December 23, 2018

योनि तंत्र.....





योनि तंत्र.....


         सृष्टि का प्रथम बीज रूप उत्पत्ति योनि से ही होने के कारण तंत्र मार्ग के सभी साधक ‘योनि’ को आद्याशक्ति मानते हैं । लिंग का अवतरण इसकी ही प्रतिक्रिया में होता है । लिंग और योनि के घर्षण से ही सृष्टि आदि का परमाणु रूप उत्पन्न होता है ।

 इन दोनों संरचनाओं के मिलने से ही इस ब्रह्माण्ड और सम्पुर्ण इकाई का शरीर बनता है और इनकी क्रिया से ही उसमें जीवन और प्राणतत्व ऊर्जा का संरचना होता है । यह योनि एवं लिंग का संगम प्रत्येक के शरीर में चल रहा है ।       
         
         शक्तिमन्त्रमुपास्यैव यदि योनिं न पुजयेत् ।

    तेषा दीक्षाश्चय मन्त्रश्चय ठ नरकायोपेपधते ।। ७ ।।

        अहं मृत्युञ्जयो देवी तव योनि प्रसादतः ।
    तव योनिं महेशनि भाव यामि अहर्निशम् ।। ८ ।।

         योनी तंत्र के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों 
शक्तियों का निवास प्रत्येक नारी की योनी में है । क्योंकि 
हर स्त्री देवी भगवती का ही अंश है ।

 दश महाविद्या



अर्थात देवी के दस पूज्नीय रूप भी योनी में निहित है ।अतः पुरुष को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिए मन्त्र उच्चारण के साथ देवी के दस रूपों की अर्चना योनी 
पूजन द्वारा करनी चाहिए ।

 योनी तंत्र में भगवान् शिव ने 

स्पष्ट कहा है की श्रीकृष्ण, श्रीराम और स्वयं शिव भी 
योनी पूजा से ही शक्तिमानहुए हैं । भगवान् राम, शिव 
जैसे योगेश्वर भी योनी पूजा कर योनीतत्त्वको सादर मस्तक पर धारण करते थे । 

योनी तंत्र में कहा गया है क्यों कि बिना योनी की दिव्य उपासना के पुरुषकीआध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है । सभी स्त्रियाँ परमेश्वरी भगवती
का अंश होने के कारण इस सम्मान की अधिकारिणी हैं ।      
          अतः तंत्र साधक हो या फीर आम मनुष्य कभी 
भी स्त्रियों का तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए ।

नोटः-


शुद्ध उच्चारण के साथ किसी साधक के मार्गदर्शन में इन मंत्रों का प्रयोग करना ही लाभकर होगा।यदि किसी भी प्रकार की दिक्कते हो,तो मुझसे सम्पर्क कर सकते है।

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साधको को सूचित किया जाता हैं की हर चीज की अपनी एक सीमा होती हैं , इसलिए किसी भी साधना का प्रयोग उसकी सीमा में ही रहकर करे , और मानव होकर मानवता की सेवा करे अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाएँ ,.

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

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Saturday, December 22, 2018

कुछ अचूक उपाय






कुछ अचूक उपाय


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चाहे कोई प्रयोग कितना भी छोटा या बड़ा हो पर यदि वह आपके जीवन को आरामदायक बनाने में सहयोगी सा होता हैं तो उसे निश्चय ही जीवन में स्थान देना चाहिए . इसी तरह के कुछ प्रयोग आपके लिए …......

1. यदि हर बुधवार , एक पीला केला गाय को खिलाया जाये तो यह धन दायक होता हैं .

2. यदि धतूरे की जड़ को अपने कमर में बाँध लिया जाये तो यह जो व्यक्ति विशेष स्वपन दोष से पीड़ित हैं उनके लिए लाभदायक होगा.

3. सूर्योदय के पहले किसी भी चोराहे पर जाकर थोडा सा गुड चवा कर थूक दे फिर बिना किसी से बात करे बिना , नहीं पीछे देखे ओरअपने घर आ जाये , आपकी सिरदर्द की बीमारी में यह लाभदायक होगा .

4. अपने व्यापारिक स्थल को यदि वह उन्नति नहीं दे रहा हैं तो एक नीबू लेकर उसे अपने प्रतिष्ठान के चारों ओर घुमाएँ तथा बहार लाकर चार भाग में काट दे ओर फ़ेंक दे. आपकी उन्नति के लिए यही भी लाभदायक होगा.

5. किसी भी शुक्रवार को यदि तेल में थोडा सा गाय का गोबर मिला कर मालिश अपने शरीर की जाये फिर स्नान कर लिया जाये , तो यह व्यक्ति के विभिन्न दोषों को दूर करने में सहयोगी होता हैं .

6. सुबह उठ कर यदि थोडा सा आटा यदि चीटीयों के सामने डाल दे तो यह भी एक पूरे दिन का रक्षाकारक प्रयोग होता हैं .

7. यदि रवि पुष्प के दिन अपामार्ग के पौधे को विधि विधान से उखाड़ लाये ओर फिर तीन माला नवार्ण मंत्र जप करें, इसे पूजा स्थान या अपने व्यापारिक स्थान पर रखे आपके यहाँ धनागम में वृद्धि होगी .

8. परिवार में दोषों को समाप्त करने के लिए कुछ मीठा या मिठाई ओर उसके ऊपर थोडा सा मीठा पानी भी पीपल के वृक्ष की जड़ में अर्पित करे .

9. रविवार के दिन पीपल का वृक्ष नाछुये .

10. यदि व्यक्ति दोपहर के बाद यही पीपल के वृक्ष को स्पर्श करे तो व्यक्ति की अनेको बीमारी स्वतः ही नष्ट होती जाती हैं .

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जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की

दक्षिणा  -  201 मात्र .

विशेष

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...