Saturday, April 29, 2023

हनुमान जी का दिव्य प्रयोग:


 हनुमान जी का दिव्य प्रयोग:


आज वर्ष का प्रथम मंगलवार है। एक छोटा सा उपाय और पुरे वर्ष मंगलमय जीवन।


https://youtube.com/channel/UCWF8VKQJ_vL4K0-WKrGk-BA


प्रातः काल 9 बजे से पूर्व अथवा सांय 6 से 7 के मध्य इस उपाय को करे। किसी भी हनुमान मंदिर ,जो मंदिर चौराहे के पास हो यदि वो मिल जाये तो अति शुभ है में हनुमान जी को 5 लौंग के बीड़े ( लौंग वाले पान )


5 बारीक़ बूंदी के लड्डू,एवम् 1 किलोग्राम लाल मसूर की दाल अर्पित करे। एक घी का दीपक एवम् धुप कपिराज को प्रदर्शित करें एवम् अपने इष्ट पाठ आदि करे।


आजनन्ये से अपने परिवार की मंगल कामना करे व् घर आ जाये।


श्री रामदूत बालाजी महाराज आपका कल्याण करे।


साधना समाग्री दक्षिणा === 1500


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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》


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Wednesday, February 22, 2023

पित्रों की शांति निवारण हेतु


 



पित्रों की शांति निवारण हेतु -


धर्मशास्त्रों के अनुसार पितरों का निवास चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है। ये आत्माएं मृत्यु के बाद 1 से लेकर 100 वर्ष तक मृत्यु और पुनर्जन्म की मध्य की स्थिति में रहती हैं। पितृलोक के श्रेष्ठ पितरों को न्यायदात्री समिति का सदस्य माना जाता है। 

 

यमराज की गणना भी पितरों में होती है। काव्यवाडनल, सोम, अर्यमा और यम- ये चार इस जमात के मुख्य गण प्रधान हैं। अर्यमा को पितरों का प्रधान माना गया है और यमराज को न्यायाधीश। 

 

इन चारों के अलावा प्रत्येक वर्ग की ओर से सुनवाई करने वाले हैं, यथा- अग्निष्व, देवताओं के प्रतिनिधि, सोमसद या सोमपा-साध्यों के प्रतिनिधि तथा बहिर्पद-गंधर्व, राक्षस, किन्नर सुपर्ण, सर्प तथा यक्षों के प्रतिनिधि हैं। इन सबसे गठित जो जमात है, वही पितर हैं। यही मृत्यु के बाद न्याय करती है

इसलिए पितरों  को तृप्त किया जाना आवश्यक है ।

अगर किशी कारण वश आपके पितरों नाराज हो जाये तो यह आपके कार्य स्वरूप बाधा भी डाल सकते है । आम जीवन से लेकर विवाह में भी बाधा डाल सकते है । एवम गृहकलेश , संतान न होना , 

आस्कमिक नुकसान एवम दुर्घटना । एवम मौत भी शामिल होती है ।

इसलिए इनकी शान्ति के उपाय यम नियम से करवाये।


पित्रों के दोष से बचें ।

पितरों के लिए शान्ति एवं दान के लिए संपर्क करें ।।

पितृ दोष का निवारण के लिये सम्पर्क करें ।


जब व्यक्ति के जीवन मे पित्र दोष का काल होता है ।या समय होता है तो अच्छे अच्छे व्यक्ति का दिमाग भृमित हो जाता है। और परिवार में किसी के एक अलग किस्म की बीमारी भी बन जाती है। और ग्रहस्थ होते हुए भी  निसंतान जीवन व्यतीत करते है । व्यक्ति के विवाह में बाधा हो जाती है । अकारण जी गृहकलेश होता है । और परिवार में भी मौत होती है । आस्कमिक दुर्घटना हो जाती है । इसलिए पितरों को शांति के लिये पूर्ण उपाय करें ।

पित्रों के दोष का निवारण के लिये आप संपर्क करें।


और अधिक जानकारी समाधान उपाय विधि प्रयोग या ओरिजिनल रत्न की जानकारी या रत्न प्राप्ति के लिए या कुंडली विश्लेषण कुंडली बनवाने के लिए संपर्क करें 


जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की 


दक्षिणा  -  351  मात्र .


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Friday, January 27, 2023

मैं नर्मदा हूं


 


मैं नर्मदा हूं


मैं नर्मदा हूं। जब गंगा नहीं थी , तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था , तभी भी मै थी। मेरे किनारों पर नागर सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। इसी के कारण आर्य मुझ तक नहीं पहुंच सके। मैं अनेक वर्षों तक आर्यावर्त की सीमा रेखा बनी रही। उन दिनों मेरे तट पर उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था।


https://youtube.com/@user-er1yu6br9z


मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों मे मार्कंडेय, कपिल, भृगु , जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे । यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था । ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए। 


इन्हीं ऋषियों में से एक ने मेरा नाम रखा, " रेवा "। रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम "रेवा" रखा।

एक अन्य ऋषि ने मेरा नाम "नर्मदा " रखा ।"नर्म" यानी आनंद । आनंद देनेवाली नदी।


मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूं । गंगा के बाद मेरा ही महत्व है । पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं । स्कंदपुराण का "रेवाखंड " तो पूरा का पूरा मुझको ही अर्पित है।


"पुराण कहते हैं कि जो पुण्य , गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह मेरे दर्शन मात्र से मिल जाता है।"


मेरा जन्म अमरकंटक में हुआ । मैं पश्चिम की ओर बहती हूं। मेरा प्रवाह आधार चट्टानी भूमि है। मेरे तट पर आदिमजातियां निवास करती हैं । जीवन में मैंने सदा कड़ा संघर्ष किया।


मैं एक हूं ,पर मेरे रुप अनेक हैं । मूसलाधार वृष्टि पर उफन पड़ती हूं ,तो गर्मियों में बस मेरी सांस भर चलती रहती है।

मैं प्रपात बाहुल्या नदी हूं । कपिलधारा , दूधधारा , धावड़ीकुंड, सहस्त्रधारा मेरे मुख्य प्रपात हैं ।


ओंकारेश्वर मेरे तट का प्रमुख तीर्थ है। महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है। वहाँ  के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है ।


मैं स्वयं को भरूच (भृगुकच्छ) में अरब सागर को समर्पित करती हूँ ‌।


मुझे याद आया।

 अमरकंटक में मैंने कैसी मामूली सी शुरुआत की थी। वहां तो एक बच्चा भी मुझे लांघ जाया करता था पर यहां मेरा पाट 20 किलोमीटर चौड़ा है । यह तय करना कठिन है कि कहां मेरा अंत है और कहां समुद्र का आरंभ? पर आज मेरा स्वरुप बदल रहा है। मेरे तटवर्ती प्रदेश बदल गए हैं मुझ पर कई बांध बांधे जा रहे हैं। मेरे लिए यह कष्टप्रद तो है पर जब अकालग्रस्त , भूखे-प्यासे लोगों को पानी, चारे के लिए तड़पते पशुओं को , बंजर पड़े खेतों को देखती हूं , तो मन रो पड़ता है। आखिर में माँ हूं।


मुझ पर बने बांध इनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगें। अब धरती की प्यास बुझेगी । मैं धरती को सुजला सुफला बनाऊंगी। यह कार्य मुझे एक आंतरिक संतोष देता है।

त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे...

मां नर्मदा जयंती की मंगलमय शुभकामनाएं।

नर्मदे सर्वदे

 

{अमृतस्य नर्मदा}


Tuesday, January 24, 2023

भुतिनि साधना


 


भुतिनि साधना


मनुष्य की कल्पना का एक निश्चित दायरा होता है जिसके आगे वह सोच भी नहीं सकता है और तर्क बुद्धि उनको स्व ज्ञान से आगे कुछ स्वीकार करने के लिए हमेशा रोक लगा देती है, लेकिन आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक परिक्षण में भी ऐसे कई तथ्य सामने आये है जिसके माध्यम से यह सिद्ध होता है की मनुष्य की गति सिर्फ जन्म से ले कर मृत्यु तक की यात्रा मात्र नहीं है वरन मृत्यु तो एक पड़ाव मात्र ही है. 


मनुष्य मृत्यु के समय शरीर त्याग के बाद कोई विविध योनी को धारण करता है विविध नाम और उपनाम दिए जाते है.


भले ही आज का विज्ञान उसके अस्तित्व पर अभी भी शोध कर रहा हो लेकिन हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने इस विषय पर सेकडो हज़ारो सालो पहले ही अत्यंत ही प्रगाढ़ अन्वेषण कर के अत्यधिक विस्मय युक्त जानकारी जनमानस को प्रदान की थी. 


मनुष्य के मृत्यु के बाद उसकी निश्चय ही कार्मिक गति होती है तथा इसी क्रम में विविध प्रकार की योनी उसे प्राप्त होती है या उसका पुनर्जन्म होता है. इसके भी कई कई भेद है, लेकिन जो प्रचलित है वह योनी है भुत, प्रेत, पिशाच, राक्षस या ब्रह्मराक्षस आदि है जो की कर्मजन्य होते है. यह विषय अत्यंत ही वृहद है. यहाँ पर हम चर्चा करेंगे तंत्र में इन से जुडी हुई प्रक्रिया की.


विविध योनियो से सबंधित विविध प्रकार के प्रयोग तंत्र में प्राप्त होते है. जिसमे साधनाओ के माध्यम से विविध प्रकार के कार्य इन इतरयोनियो से करवाए जाते है. लेकिन यह साधनाए दिखने में जितनी सहज लगती है उतनी सहज होती नहीं है इस लिए साधक के लिए उत्तम यह भी रहता है की वह इन इतरयोनियों के सबंध में लघु प्रयोग को सम्प्पन करे.


जिस प्रकार भुत एक पुरुषवाचक संज्ञा है उसी प्रकार भुतिनी एक स्त्रीवाचक संज्ञा है. वस्तुतः यह भ्रम ही है की भुतिनियाँ डरावनी होती है तथा कुरुप होती है, वरन सत्य तो यह है की भुतिनि का स्वरुप भी उसी प्रकार से होता है जिस प्रकार से एक सामान्य लौकिक स्त्री का. उसमे भी सुंदरता तथा माधुर्य होता है.


 वस्तुतः यह साधना तथा साध्य के स्वरुप के चिंतन पर उनका रूप हमारे सामने प्रकट होता है, तामसिक साधना में भयंकर रूप प्रकट होना एक अलग बात है लेकिन सभी साधना में ऐसा ही हो यह ज़रुरी नहीं है.


प्रस्तुत  प्रयोग  इक्कीश दिन अचरज पूर्ण प्रयोग है, जिसे सम्प्पन करने पर साधक को भुतिनी को स्वप्न के माध्यम से प्रत्यक्ष कर उसे देख सकता है तथा उसके साथ वार्तालाप भी कर सकता है. साधको के लिए यह प्रयोग एक प्रकार से इस लिए भी महत्वपूर्ण है की इसके माध्यम से व्यक्ति अपने स्वप्न में भुतिनी से कोई भी प्रश्न का जवाब प्राप्त कर सकता है. 


यह प्रयोग भुतिनी के तामस भाव के साधन का प्रयोग नहीं है, अतः व्यक्ति को भुतिनी सौम्य स्वरुप में ही द्रश्यमान होगी.


यह प्रयोग साधक किसी भी अमावस्या को करे तो उत्तम है, वैसे यह प्रयोग किसी भी बुधवार को किया जा सकता है.


साधक को यह प्रयोग रात्री काल में १० बजे के बाद करे. सर्व प्रथम साधक को स्नान आदि से निवृत हो कर लाल वस्त्र पहेन कर लाल आसान पर बैठ जाए. गुरु पूजन तथा गुरु मंत्र का जाप करने के बाद दिए गए यन्त्र को सफ़ेद कागज़ पर बनाना चाहिए. 


इसके लिए साधक को केले के छिलके को पिस कर उसका घोल बना कर उसमे कुमकुम मिला कर उस स्याही का प्रयोग करना चाहिए. साधक वट वृक्ष के लकड़ी की कलम का प्रयोग करे. यन्त्र बन जाने पर साधक को उस यन्त्र को अपने सामने किसी पात्र में रख देना है तथा तेल का दीपक लगा कर मंत्र जाप शुरू करना चाहिए.


साधक को निम्न मंत्र की ११ माला मंत्र जाप करनी है इसके लिए साधक को रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए.


भ्रं भ्रं भ्रं भुतेश्वरी भ्रं भ्रं भ्रं फट्


(bhram bhram bhram bhuteshwari bhram bhram bhram phat)


मंत्र जाप पूर्ण होने पर जल रहे दीपक से उस यन्त्र को जला देना है. यन्त्र की जो भष्म बनेगी उस भष्म से ललाट पर तिलक करना है तथा तिन बार उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करना है. इसके बाद साधक अपने मन में जो भी प्रश्न है उसके मन ही मन ३ बार उच्चारण करे तथा सो जाए. साधक को रात्री काल में भुतिनी स्वप्न में दर्शन देती है तथा उसके प्रश्न का जवाब देती है. 


जवाब मिलने पर साधक की नींद खुल जाती है, उस समय प्राप्त जवाब को लिख लेना चाहिए अन्यथा भूल जाने की संभावना रहती है. साधक दीपक को तथा माला को किसी और साधना में प्रयोग न करे लेकिन इसी साधना को दुबारा करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता है.  


जिस पात्र में यन्त्र रखा गया है उसको धो लेना चाहिए. उसका उपयोग किया जा सकता है. अगर यन्त्र की राख बची हुई है तो उस राख को तथा जिस लकड़ी से यन्त्र का अंकन किया गया है उस लकड़ी को भी साधक प्रवाहित कर दे. साधक दूसरे दिन सुबह उठ कर उस तिलक को चेहरा धो कर हटा सकता है लेकिन तिलक को सुबह तक रखना ही ज़रुरी है.


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Saturday, January 14, 2023

महाकृत्या मन्त्र साधना


 




महाकृत्या मन्त्र साधना


यह साधना अत्यंत गोपनीय,दुर्लभ और प्राचीन है।यह कृत्या शरीर से उत्पन्न होती है।


https://youtu.be/G4h0-DtaWzE


यह वशीकरण ,मोहन,मारण,उच्चाटन का प्रबल अस्त्र है।जब भगवान् शिव को क्रोध आया और उनके सैनिक परास्त होकर आ गए थे तब उन्होंने अपने शरीर से कृत्या का निर्माण किया था और यज्ञ का नाश किया था,


बड़े बड़े ऋषि मुनियो के तंत्र मन्त्र भी कृत्या शक्ति के आगे काम नही कर पाये अर्थात फैल हो गए।कृत्या मानव शरीर से उत्पन्न एक देवी शक्ति है।जिस तरह मनुष्य अपने शरीर से मन्त्र साधना से अपने तीन हमजाद सिद्धि करता है उसी तरह कृत्या सिद्ध हो जाती है। 


मन्त्र की कृत्या तंत्र की कृत्या से 100 गुना ज्यादा तीव्र कार्य करती है।कुछ ही सेकंडो में मात्र। प्राचीन काल में महा कृत्या गुरुदेव शुक्राचार्य जी को सिद्ध थी।यह कृत्या तीनो लोको के कार्य संपन्न करती है।


अगर साधक अपने दोनों हाथ ऊपर की तरफ आकाश में करके कृत्या का मन्त्र जप कर कार्य कहे तो स्वर्ग में हा हा कार हो जाय, पृथ्वी पर करे तो मानव में हलचल हो जाये,भूमि की तरफ देखकर करे तो पाताल लोक में।


 अर्थात कृत्या साधक किसी भी देव देवी ,अप्सराआदि को वशीभूत कर सकता है।घर बैठे उनको दण्डित कर सकता है,इतर योनि को मारण कर सकता है।इसी शक्ति मन्त्र के बल पर रावण ने लंका में बैठे हुए ही स्वर्गलोक में नृत्य करने वाली अप्सरा का शक्ति उच्चाटन किया था जिससे वह बेहोश होकर गिर गयी थी।


 जब कृत्या देवी आती है तब मारण के लिये तो भूत प्रेत,ब्रह्म राक्षस ,पिशाच,जिन,कर्णपिशाचिनी आदि शक्तियाँ भाग जाती है नही तो कृत्या कालग्रास बना देती है सबको और एक बबूले अर्थात बवंडर में लपेटकर सबको अंतरिक्ष में विलीन हो जाती हैं। 


कृत्या सिद्ध होने पर साधक मन्त्र से जल पड़कर रोगी को पिलाय तो रोगी रोगमुक्त हो जाता है।कोई तंत्र साधक को हानि नही पहुंचा सकता है।साधक मन में असीम बल धारण कर लेता है।चार कर्म सिध्द हो जाते हैं।


वर्तमान में 26 योग्य साधको को कृत्या प्रदान करायी गयी है।जो सफलता पूर्वक मानव भलाई के कार्य कर रहे हैं। कृत्या एक सात्विक साधना है।मांस मदिरा का सेवन वर्जित है। कृत्या साधना गुरुकृपा ,शिवकृपा से ही प्राप्त होती है।कृत्या साधना का पूर्ण विधान यहाँ नही दिया गया है,केवल साधको के ज्ञानार्थ है। 


कृत्या सिद्धि किसी भी मंगलवार या अमावस्या से शुरू की जा सकती है।काले वस्त्र धारण करके तेल का दिया जलाकर सिद्ध की जाती है,इसमें सभी कर्म बांये हाथ से करने होते है जैसे दिशाबन्धन,देह रक्षा आदि। 


कृत्या सिद्ध साधक सेकड़ो अधर्मी तांत्रिको पर भारी पड़ जाता है।(यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब कोई मारण ,बन्धन,तांत्रिक परयोग का शिकार आदमी हमारे पास आता है और इलाज के लिये बोलता है,तब ऑनलाइन माध्यम से उस का फ़ोटो ,माता का नाम पिता का नाम,पूरा पता लिया जाता है,,


तब पीड़ित को आत्मिक रूप से संपर्क करके यदि उसके ऊपर तांत्रिक प्रयोग होता है तो उसको उच्चाटन कर दिया जाता है।किसी भी तरह की आत्मा होती है तो उसका मारण या मुक्ति कर दिया जाता है 


या कोई चोकी लाट देवी या देवता की होती है तो उसको वापस् उठा कर उसके स्थान पर भेज दिया जाता है जिससे रोगी के प्राण बच जाते है।अपना शेष जीवन व्यतीत करता है ।उस तांत्रिक को शक्तिहीन कर दिया जाता है बन्धन से ,,


यदि वो अपने गुरुओ के पास जाता है और उनके गुरु भी उसकी गलती नही मानते ,उसकी हेल्प करते है तो उनको भी बंधन कर दिया जाता है।) 


मन्त्र 


ॐ ब्रह्मसूत्रसमस्त मम देह आवद्ध आवद्ध वज्र देह फट् ॐ ऐम् क्लीम् ह्रीम् क्रीम ॐ फट ॐ शिवकृत्या प्रयोगाय दस दिशा बंधाये क्रीम क्रोम फट् ॐ रम् देहत्व रक्षा य फट्। 


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Friday, January 13, 2023

आर्थिक संकट समाप्त करने हेतु छिन्नमस्ता शाबर मंत्र साधना--


 


आर्थिक संकट समाप्त करने हेतु छिन्नमस्ता शाबर मंत्र साधना---


Chhinnamasta Shabar Mantra to Be Rich---


छिन्नमस्तिका एक महाविद्या है और स्वभाव से उग्र है परन्तु अपने भक्तों का सदैव ध्यान रखती है | 


छिन्नमस्तिका शाबर मंत्र का उपयोग जीवन में प्रचुरता और समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह शाबर मंत्र गुरु गोरखनाथ द्वारा प्रणीत मंत्र है और यह साधक के आर्थिक संकट को खत्म करने के लिए एक प्रभावी मंत्र है।


How To Do The Chhinnamasta Shabar Mantra to Be Rich---


इस छिन्नमस्तिका शाबर मंत्र का प्रयोग किसे गुरूवार अथवा किसी शुभ मुहूर्त से प्रारम्भ किया जाता है |


यह साधना अपने गुरुदेव से शाबर दीक्षा प्राप्त कर ही करनी चाहिए |


साधक विशुद्ध होकर विशुद्ध वस्र पहन कर पीले रंग के आसन के ऊपर बैठे |


अपने गुरु का संक्षिप्त पूजन करें |


सरसों के तेल का दीपक जलाएं |


प्राण प्रतिष्ठित रुद्राक्ष माला से या पीली हकीक माला से इस मंत्र को 1008 बार जपें |


ऐसा 41 दिन तक करें |


अनुष्ठान पूर्ण होने पर शुद्ध घी के पकवान या घृत, कमलगट्टा और गुग्गल से 1008 बार हवन में आहुति प्रदान कर अनुष्ठान संपन्न करें |


इसके पश्चात् निरंतर 1 माला इस मंत्र की नित्य जाप करते रहे|


इस अनुष्ठान के प्रभाव से 1 वर्ष के भीतर सारे आर्थिक संकट दूर होते ही हैं और धन की वृद्धि होती है |


Chhinnamasta Shabar Mantra


छिन्नमस्तिका ने महल बनाया, धन के कारन करम कराया तारा आई बैठकर बोली, यह रही दुर्गा माँ की टोली गोरखनाथ कहत सुन छिन्नी, मैं मच्छेन्द्रनाथ की भाषा बोली|


chhinnamastika ne mahal banaaya dhan ke kaaran karam karaaya taara aaee baithakar bolee, yah rahee durga maan kee tolee gorakhanaath kahat sun chhinnee main machchhendranaath kee bhaasha bolee.


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Wednesday, November 23, 2022

पारद (PARAD) : ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली तांत्रिक धातु

पारद (PARAD) : ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली तांत्रिक धातु

https://youtube.com/channel/UCWF8VKQJ_vL4K0-WKrGk-BA

https://youtu.be/Yiz9eKnosyY

पारद (PARAD) : रसराज रससिद्ध पारद सभी धातुओं में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। भगवान शंकर के शक्ति रूप होने के कारण सभी देवी-देवताओं के द्वारा वंदनीय एवं स्पृहनीय है।

यह अनेक चैतन्य मंत्रात्मक क्रियाओं से संस्कारित होकर जिस किसी भी घर में भगवान शिव का प्रतीक शिवलिंग, लक्ष्मी प्रतिमा, गणेश प्रतिमा तथा दुर्गा प्रतिमा के रूप में स्थापित होता है, वह घर, वह परिवार, सर्वत्र मंगलमय सुखद एवं शांति का अनुभव करता है।

parad shivling, parad shriyantra, parad sanskar
PARAD

सत्य तो यह है कि पारद (PARAD) पूर्ण संसार का एक आधारभूत तत्व है, इसिलिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का मूलभूत साधन भी है।

जिस घर में पारद से निर्मित प्रतिमा स्थापित करके, उसका पूजन एवं साधना की जाती है, उस घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होता एवं सारा वातावरण आध्यात्ममय बन जाता है।

पारद धातु अपने आप में पूर्णता का प्रतीक है। सदियों से पारद (PARAD) पर शोध होते आए हैं। जहाँ यह भौतिक समृद्धि का परिचायक है, वहीं यह आयुर्वेद की पूर्णता भी है।

पारद ही एक ऐसी धातु है जिसमें अनेकों आयुर्वेदिक गुण समाए हुए है। पारद अनेक रूपों में उपयोगी है, आयुर्वेद के अलावा तंत्र जगत में भी इसका बहुत योगदान है।

पारद संस्कार : PARAD SANSKAR

आयुर्वेदिक रस-शास्त्र के अनुसार अठारह प्रकार के विशेष संस्कार करने के उपरान्त पारे के सभी दोष दूर हो जाते हैं, किन्तु इसके लिए सद्गुरु की कृपा एवं देख-रेख में ही रसायन सिद्धि प्राप्त हो सकती है, मात्र किताबी ज्ञान से कुछ नहीं मिलने वाला।

धरणीधर संहिता के अनुसार इन सभी संस्कारों जैसे- स्वेदन संस्कार, मर्दन संस्कार, मुर्च्छन संस्कार, उत्थापन संस्कार, रोधन संस्कार, पात्तन संस्कार, बोधन संस्कार, गगन ग्रास संस्कार (अभ्रक अथवा स्वर्ण भक्षण), चारण संस्कार, गर्भदुति संस्कार, ब्राह्यदुति संस्कार, जारण संस्कार, रंजन संस्कार, सारण संस्कार, क्रमण संस्कार, वैघ संस्कार के पूर्ण होने पर ही प्राकृतिक द्रव्य पारद (PARAD) किसी भी आकृति में परिवर्तित हो जाता है।

ठोस रूप कथित पारद (PARAD) से जो सामग्री बनती है, वह अमूल्य एवं चमत्कारिक होती है। मनुष्य को ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति कराती है। शारीरिक एवं मानसिक शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति का विकास करने में पूर्णतया सक्षम है, तथा आर्थिक व्यवधान को दूर कर कारोबार में वृद्धि करती है।

किसी भी तांत्रिक क्रिया में कवच की भांति मनुष्य की रक्षा करती है एवं तांत्रिक क्रियाओं को प्रभावहीन कर देती है।

मंत्रों से आबद्ध स्वर्णग्रास युक्त पारद (PARAD) से निर्मित प्रतिमा तो अपने आप में चैतन्य होती ही है, इसकी उपस्थिति भी अपने आप में पूर्णता का द्योतक माना गया है। इसलिए यह प्रयास करना चाहिए कि मंत्रों से आबद्ध पारद मूर्ति ही अपने घर में स्थापित हो।

बिना मंत्र पूरित एवं बिना शोधित पारद प्रतिमा से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है।

आजकल पारद से बने शिवलिंग एवं मूर्ति आपको बाजार में आसानी से मिल जाते हैं, परन्तु वे सभी बिना शोधन संस्कार किये एवं अपवित्रता के साथ दूषित तरीके से निर्मित होते है। इसलिए पारद से निर्मित कोई भी वस्तु खरीदने से पहले उसकी उत्कृष्टता की परख अवश्य कर लें।

पारद (PARAD) से निर्मित देव प्रतिमा शोधित एवं प्राण-प्रतिष्ठा युक्त होना चाहिए और यह काम कोई सक्षम एवं दिव्य आत्मा साधक ही कर सकता है जो कि आज के युग में बड़ा दुर्लभ है।

पारद (PARAD) की महिमा

पारद (PARAD) शब्द में ”प” – विष्णु, ”अ” (अकार) – कालिका, ”र” – शिव और ”द” – ब्रह्मा के प्रतीक हैं। जो पारद लिंग का पूजन करता है उसे तीनों लोकों में स्थित शिवलिंगों के पूजन का फल मिलता है।

इसके दर्शन से 100 अश्वमेघ यज्ञ करने, करोड़ों गौ दान करने एवं सहस्त्रों मन स्वर्ण दान करने का फल मिलता है। पारद (PARAD) से अधिक गुण वाला पदार्थ न हुआ है, न होगा।

पारद (PARAD) से पायें सुख समृद्धि

सुख-संपत्ति, श्री संपदा तथा वैभव प्राप्ति के लिए माँ लक्ष्मी की कृपा परम आवश्यक है। उनकी कृपा के बिना धन-संपत्ति, श्री समृद्धि की प्राप्ति संभव नहीं है।
आज के युग में धन और सम्पत्ति के अभाव में लोगों की क्या दशा-दुर्गति होती है, इसके हजारों उदाहरण देखने को मिलते हैं। तंत्र शास्त्र में भी सरल विधान को व्यक्त करते हुए स्पष्ट रूप से कहा गया है कि-

धन शिवेन बिना देवी न देव्या च बिना शिवः।
नानयोरन्तर किम् चिन्चंद्र चंद्रिका योरिव।।

अर्थात शिव के बिना देवी (अन्नपूर्णा लक्ष्मी) नहीं और देवी (शक्ति) के बिना शिव नहीं। इन दोनों में अंतर नहीं है, जिस प्रकार चंद्र और चन्द्रिका में कोई अंतर नहीं होता।
इसलिए तंत्र शास्त्र के देवता भगवान शिव को आधार मानकर श्री विद्या तथा श्री यंत्र की उपासना धन-धान्य एवं समृद्धि प्राप्ति के लिए की जाती है।

जहां शिव हैं, वहीं श्री सम्पन्नता है। माँ पार्वती शक्ति स्वरुपा जगदम्बा हैं जो शिव के ही स्वरुप हैं। माता गौरी स्वयं अन्नपूर्णा हैं, लक्ष्मी स्वरूपा हैं।

भगवान भोलेनाथ की पूजा साधना करने पर लक्ष्मी साधना का ही फल प्राप्त होता है और सभी देवताओं में अग्रपूज्य भगवान गणपति तो साक्षात ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी शिवपुत्र हैं, जो सभी प्रकार के विघ्न बाधाओं को समाप्त करने वाले देव हैं।

शिव साधना करने से गणपति साधना का भी साक्षात फल प्राप्त होता है। इसलिए कहा गया है कि जहां शिव है, वहां सब कुछ है और जिसने शिवत्व प्राप्त कर लिया, उसने अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लिया। उसके लिए कठिन से कठिन कार्य भी सरल बन जाता है।

शिव साधना-उपासना करने के बाद फिर साधक को किसी वस्तु की न्युनता नहीं हो सकती। भगवान शिव कुबेराधिपति हैं, उनका यह स्वरूप साधक को अतुलनीय धन-धान्य प्रदान कर देता है।

शिव भक्त रावण को शिव कृपा से ही सोने की लंका प्राप्त हुआ था। भगवान शंकर तंत्र के स्वामी हैं, तंत्र के जन्मदाता हैं और पारद (PARAD) शिव का प्रिय धातु है। इसलिए पारदेश्वर शिवलिंग को तंत्र सामग्री में गिना जाता है और इसी की पूजा श्रेष्ठ मानी गयी है।

इस प्रकार देखा जाये तो पारद (PARAD) आध्यात्मिक क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण धातु है। सभी तरह की पूजा-अर्चना में इसको अग्रणी माना गया है।

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