Saturday, June 12, 2021

जिन्न मंत्र साधना ( jin mantra sadhna)


 






जिन्न मंत्र साधना ( jin mantra sadhna)


"जिन्न' एक रूप में जादूई शक्तियो में पूर्ण शक्ति का नाम है। यह कभी उन इंसानों के लिए प्रयोग होता है जो मात्र अपनी इच्छा प्रगट करने से अपने जीवन के सभी जरूरी कार्ये को कर सकते है। वह गायब हो सकते है, उड़ सकते हैं, किसी भी जीव या वस्तु का रूप धारण कर सकते है, किसी भी स्थान तक मात्र अपनी इच्छा से पहुच सकते है और किसी भी वस्तु को मात्र अपनी इच्छा प्रगट करने से पा सकते हैं। वह उन सभी कार्यों को जिसे एक इंसान कई सालों की मेहनत से कर पाता है,वह मात्र अपनी इच्छा प्रगट करने से कर सकते हैं।


जिन्न को हक़ है की वो इंसानी दुनिया में दखल-अंदाजी कर सकते है लेकिन इसके लिए उन्हें इंसानो के साथ रिश्ता बनाना पड़ता है।


जिन्नात से इंसान डरते है मगर इसके विपरीत जिन्नात मानवीय आवासों से दूर रहना पसंद करते है। यही वजह है की हमें सुनसान जगहों पर ज्यादा सतर्कता बरतनी चाहिए।


जिन्नात भी इंसानी तौर तरीके से रहते है जैसे शादी करना, बच्चे पैदा करना और मरना पर उनकी दुनिया इंसानी दुनिया से अलग है।


जिन्नात अपने असली रूप में बहुत कम दिखते है ज्यादातर वो मानवीय शक्ल इख़्तियार करते है।

इन्सानी वजूद मिट जायेगा मगर " जिन्नात " कायनात के दिन तक अस्तित्व में रहेंगे।


जिन्नात इंसानों को समझने की ताकत रखते हैं , जिन्नात बहुत ही जल्द इंसानों को अपना दोस्त बना लेते हैं । इसलिए साधना के माध्यम से इन्हें सिद्ध किया जाता है ।


जिन्न मंत्र:-


।। बिस्मिल्लाहिरहिमानीरहिम लाइल्ला लिल्लाह मुहम्मद रसूललिल्ला मुसलमानी अबादानी मरीन खाय परनी छोड़ मुस्लमान बहिस्त को खावे हुआ ईदा का रोज असल कर सैयद नहाजा बाबा तोप नगाड़ा बकतर तोप मंगाय दिया प्याले सहायबा सबचल खाये चौकी पे चौकी चली अम्बर हुआ सेत सैयदो से शरीहुई तरवर तारागढ़ के खेत खिगासा घोडा नहीं मीना सामर्द नहीं जिसने सरवार तारागढ़ तोरा अजयपाल सा देव नहीं जिसने चक्कर चलाया मीरा पड़ी नमाज़ वह का वही ठहराया आतिलकुरसी बंद गकुरात घाटे बाढे तुही समान आकाश बांध पाताल बांध बांधे नदी तलाब देह बांध धड को भी बांधे कहा हुये जार मर घटिया मसान हदिया मसान जहिहिया मसान मिरमिया मसान फलकिया मसान कालका ब्रह्मराक्षस की चुडेल (यहां पर कुछ महत्वपूर्ण शब्द गोपनीय रखे जारहे है) तो सूअर काट सुअर की बोटी दांते तारे दबाएगा सतर नाड़ी बहतर कोठा से बांध बांधकर जायेगा तो चमार के छिले और धोबी की नाद मे पड़े चलतों मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फलो मंत्र ईश्वरी वाचा छूँ मंत्र ।।


विधि :- 


गुरुवार या शुक्रवार की रात को 10 बजे अपने घर से निकले और मोमबत्ती,धूप,जन्नत-ए-फिरदौस अत्तर और ऋतुफल लेके सुनसान जगह या स्मशान मे जाये । हरे रंग के आसन पर बैठे,आसन के नीचे "जिन्न सिद्धि यंत्र" रखे जिससे जिन्न आपके तरफ आकर्षित होकर प्रत्यक्ष हो सके और "आयतुल कुर्सी युक्त रक्षा कवच" धारण करे,बिना रक्षा कवच के साधना करने के बारे मे ना सोचे अन्यथा स्वयं के हानि के आप स्वयं जिम्मेदार माने जाएंगे अथवा रोज 21 बार आयतुल कुर्सी पढ़कर साधना करे । 242 बार मंत्र का जाप इसमे रोज करना जरूरी है, इस तरह 21 दिन तक जाप करे । इस मंत्र के पीर देवता जिनको जीन्न कहते हे,वो साधक के सामने आकर  साधक के सब कार्यो को पूर्णा करेगे परंतु प्रत्यक्ष होते ही साधक मंत्र के देवता से वचन ले ।


 


साधना दक्षिणा === 1500


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Sunday, May 30, 2021

छिन्नमस्ता साधना






छिन्नमस्ता साधना

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          छिन्नमस्ता शब्द दो शब्दों के योग से बना है - प्रथम छिन्न और द्वितीय मस्ता। इन दोनों शब्दों का अर्थ है - छिन्न यानि अलग या पृथक तथा मस्ता अर्थात मस्तक। इस प्रकार जिनका मस्तक देह से पृथक हैं, वह छिन्नमस्ता कहलाती हैं। देवी अपने मस्तक को अपने ही हाथों से काट कर, अपने हाथों में धारण करती हैं तथा प्रचण्ड चण्डिका जैसे अन्य नामों से भी जानी जाती हैं।

 

          

          छिन्नमस्ता की उपस्थिति दस महाविद्याओं में पाँचवें स्थान पर हैं, देवी एक प्रचण्ड डरावनी, भयंकर तथा उग्र रूप में विद्यमान हैं। समस्त देवी-देवताओं से पृथक देवी छिन्नमस्ता का स्वरूप है। देवी स्वयं ही सात्विक, राजसिक तथा तामसिक तीनों गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं, त्रिगुणमयी सम्पन्न हैं। देवी ब्रह्माण्ड के परिवर्तन चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, सन्पूर्ण ब्रह्माण्ड इस चक्र से चलायमान है। सृजन तथा विनाश का सन्तुलित होना, ब्रह्माण्ड के सुचारु परिचालन हेतु अत्यन्त आवश्यक है। देवी छिन्नमस्ता की आराधना जैन तथा बौद्ध धर्म में भी की जाती हैं तथा बौद्ध धर्म में देवी छिन्नमुण्डा वज्रवराही के नाम से विख्यात हैं।

 

          

          

          देवी योग-साधना के उच्चतम स्थान पर अवस्थित हैं। योग शास्त्रों के अनुसार तीन ग्रन्थियाँ ब्रह्मा ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि तथा रुद्र ग्रन्थि को भेद कर योगी पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर पाता हैं तथा उसे अद्वैतानन्द की प्राप्ति होती है। योगियों का ऐसा मानना हैं कि मणिपुर चक्र के नीचे की नाड़ियों में ही काम और रति का निवास स्थान हैं तथा उसी के ऊपर देवी छिन्नमस्ता आरूढ़ हैं तथा इसका ऊपर की ओर प्रवाह होने पर रुद्रग्रन्थि का भेदन होता है।

           छिन्नमस्ता साधना एक ऐसी साधना है, जिसको सम्पन्न कर सामान्य गृहस्थ भी योगी का पद प्राप्त कर सकता है। वायु वेग से शून्य के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है। ज़मीन से उठ कर हवा में स्थिर हो सकता है, एक शरीर को कई शरीरों में बदल सकता है और अनेक ऐसी सिद्धियों का स्वामी बन सकता है, आश्चर्य की गणना में आती है।

 

साधना विधान :----------

 

          इस साधना को  किसी भी मंगलवार से आरम्भ किया जा सकता है। आप चाहे तो इस साधना को नवरात्रि के प्रथम दिन से भी शुरु कर सकते हैं। यह साधना रात्रि काल में ही सम्पन्न की जाती है, अतः मन्त्र जाप रात्रि में ही किया जाए अर्थात यह साधना रात्रि को दस बजे आरम्भ करके प्रातः लगभग तीन या चार बजे तक समाप्त करनी चाहिए।

 

          इस साधना को पूरा करने के लिए सवा लाख मन्त्र जाप सम्पन्न करना चाहिए और यह साधना ग्यारह या इक्कीस दिनों में पूरी होनी चाहिए।

 

          रात्रि को लगभग दस बजे स्नान करके काली अथवा नीली धोती धारण कर लें। फिर साधना कक्ष में जाकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके काले या नीले ऊनी आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने किसी बाजोट पर काला अथवा नीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरुदेवजी का चित्र या विग्रह और माँ भगवती छिन्नमस्ता का यन्त्र-चित्र स्थापित कर लें। इसके साथ ही गणपति और भैरव के प्रतीक रूप में दो सुपारी क्रमशः अक्षत एवं काले तिल की ढेरी पर स्थापित कर दें।

 

          अब सबसे पहले साधक शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर धूप-अगरबत्ती भी लगा दे। फिर सामान्य गुरुपूजन सम्पन्न करें तथा गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें। फिर गुरुदेवजी से छिन्नमस्ता साधना सम्पन्न करने की अनुमति लें और उनसे साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

 

          इसके बाद साधक संक्षिप्त गणपति पूजन सम्पन्न करें और “ॐ वक्रतुण्डाय हुम्” मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

 

          तत्पश्चात साधक सामान्य भैरवपूजन सम्पन्न करें और “ॐ भ्रं भ्रं हुं हुं विकराल भैरवाय भ्रं भ्रं हुं हुं फट्” मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर भगवान विकराल भैरवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

 

          इसके बाद साधना के पहले दिन साधक को संकल्प अवश्य लेना चाहिए। इसके लिए दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि “मैं अमुक नाम का साधक अमुक गौत्र अमुक गुरुका नाम  शिष्य होकर आज से श्री छिन्नमस्ता साधना का अनुष्ठान प्रारम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य २१ दिनों तक ६० माला मन्त्र जाप करूँगा। हे,  माँ! आप मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे इस मन्त्र की सिद्धि प्रदान करें और इसकी ऊर्जा को आप मेरे भीतर स्थापित कर दें।”

 

          ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल जमीन पर छोड़ देना चाहिए। इसके बाद प्रतिदिन संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं है।

 

          तदुपरान्त साधक माँ भगवती छिन्नमस्ता चित्र और यन्त्र का सामान्य पूजन करे। उस पर कुमकुम, अक्षत और पुष्प चढ़ावें।  किसी मिष्ठान्न का भोग लगाएं। उसके सामने दीपक और लोबान धूप जला लें।

 

          फिर साधक दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र पढ़ें ---

 

विनियोग :-----

 

            ॐ अस्य श्री शिरच्छिन्नामन्त्रस्य भैरव ऋषिः सम्राट् छन्दः श्री छिन्नमस्ता देवता ह्रींकारद्वयं बीजं स्वाहा शक्तिः मम् अभीष्ट कार्य सिध्यर्थे जपे विनियोगः।

 

ऋष्यादिन्यास :-----

 

ॐ भैरव ऋषयै नमः शिरसि।             (सिर को स्पर्श करें)

ॐ सम्राट् छन्दसे नमः मुखे।             (मुख को स्पर्श करें)  

ॐ श्री छिन्नमस्ता देवतायै नमः हृदये।   (हृदय को स्पर्श करें)

ॐ ह्रीं ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये।            (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)

ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयोः।          (पैरों को स्पर्श करें)

ॐ ममाभीष्ट कार्य सिद्धयर्थये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।  (सभी अंगों को स्पर्श करें)

 

करन्यास :-----

 

ॐ आं खड्गाय स्वाहा अँगुष्ठयोः।   (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें)

ॐ ईं सुखदगाय स्वाहा तर्जन्योः।    (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)

ॐ ऊं वज्राय स्वाहा मध्यमयोः।     (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)

ॐ ऐं पाशाय स्वाहा अनामिकयोः।   (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)

ॐ औं अंकुशाय स्वाहा कनिष्ठयोः।  (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)

ॐ अ: सुरक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं स्वाहा करतलकर पृष्ठयोः।  (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें)

 

हृदयादिन्यास :-----

 

ॐ आं खड्गाय हृदयाय नमः स्वाहा।        (हृदय को स्पर्श करें)

ॐ ईं सुखदगाय शिरसे स्वाहा स्वाहा।       (सिर को स्पर्श करें)

ॐ ऊं वज्राय शिखायै वषट् स्वाहा।          (शिखा को स्पर्श करें)

ॐ ऐं पाशाय कवचाय हूं स्वाहा।            (भुजाओं को स्पर्श करें)

ॐ औं अंकुशाय नेत्रत्रयाय वौषट् स्वाहा।     (नेत्रों को स्पर्श करें)

ॐ अ: सुरक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं अस्त्राय फट् स्वाहा। (सिर से घूमाकर तीन बार ताली बजाएं)

 

व्यापक न्यास :-----

 

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवेरोचनियै ह्रींह्रीं फट् स्वाहा मस्तकादि पादपर्यन्तम्।

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवेरोचनियै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा पादादि मस्तकान्तम्।

 

                इससे तीन बार न्यास करें।

                इसके बाद साधक हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मन्त्र से भगवती छिन्नमस्ता का ध्यान करें ---

 

ध्यान :-----

 

ॐ भास्वन्मण्डलमध्यगां निजशिरश्छिन्नं विकीर्णालकम्

     स्फारास्यं प्रपिबद्गलात् स्वरुधिरं वामे करे बिभ्रतीम्।

     याभासक्तरतिस्मरोपरिगतां सख्यौ निजे डाकिनी

     वर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे॥

 

              इसके बाद साधक भगवती छिन्नमस्ता के मूलमन्त्र का रद्राक्ष माला से ६० माला जाप करें ---

 

मन्त्र :----------

 

        ॥ ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा ॥

 

OM SHREEM HREEM HREEM KLEEM AIM VAJRA VAIROCHANEEYEI HREEM HREEM PHAT SWAAHA.

 

              मन्त्र जाप के उपरान्त साधक निम्न सन्दर्भ का उच्चारण करने के बाद एक आचमनी जल छोड़कर सम्पूर्ण जाप भगवती छिन्नमस्ता को समर्पित कर दें।

 

ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं।

     सिद्धिर्भवतु मे देवि! त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥

 

              इस प्रकार यह साधना क्रम साधक नित्य २१ दिनों तक निरन्तर सम्पन्न करें।

 

              जब पूरे सवा लाख मन्त्र जाप हो जाएं,  तब पलाश के पुष्प अथवा बिल्व के पुष्पों से दशांश हवन करें। ऐसा करने पर यह साधना सिद्ध हो जाती है।

 

साधना नियम :----------

 

१. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।

२. एक समय फलाहार लें,  अन्न लेना वर्जित है।

३. मन्त्र जाप समाप्ति के बाद उसी स्थान पर सो जाएं।

४. साधना काल में साधक अन्य कोई  कार्य, नौकरी, व्यापार आदि न करे।

 

              छिन्नमस्ता साधना सौम्य साधना है और आज के भौतिक युग में इस साधना की नितान्त आवश्यकता है। इस साधना के द्वारा साधक जहाँ पूर्ण भौतिक सुख प्राप्त कर सकता है, वहीं वह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी पूर्णता प्राप्त करने में समर्थ होता है। साधक कई साधनाओं में स्वतः सफलता प्राप्त कर लेता है और इस साधना के द्वारा कई-कई जन्मों के पाप कटकर वह निर्मल हो जाता है। यह साधना अत्यधिक सरल, उपयोगी और आश्चर्यजनक सफलता देने में समर्थ है।

 

              आपकी साधना सफल हो और माँ भगवती छिन्नमस्ता का आपको आशीष प्राप्त हो

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Saturday, March 27, 2021

15 पंद्रहवाँ यंत्र इस यंत्र से मोहन वशीकरण स्तंभन। उच्चाटन मारण सभी तंत्र रूप में ले। सकते है,


 




15  पंद्रहवाँ  यंत्र इस  यंत्र  से  मोहन  वशीकरण  स्तंभन। उच्चाटन मारण  सभी  तंत्र  रूप  में  ले। सकते  है,

 


मित्रो  ये  मेरे  घर  का  दरवाजा  हे

लकड़ी  का  जिस  में  चतुर्भुज  काठ

आकृति  हे इसे  मेने  ध्यान  से  देखा

तो  मेरे। सामने  यंत्र  की। आकृति  आ गयी  स्पष्ट  नो  खानो  में  सही  सही

रिक्त  स्थान। 


जिस  में  मेने  यहाँ  यंत्र

स्वरुप  15  पंद्रहवाँ  यंत्र  की। रचना

की  हे  जो  की  हम  कई  तरह  से  कई  कार्यो। के  लिए  कर। सकते  हे  यही  इस  यंत्र  की  खासियत  हे  इस  यंत्र  से  मोहन  वशीकरण  स्तंभन। उच्चाटन

मारण  सभी  तंत्र  रूप  में  ले। सकते  हे  यहाँ  शुभ  लाभ  अमृत  स्वरुप  इस की रचना  की  हे ।


यन्त्र  दक्षिणा ==501 


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Wednesday, March 24, 2021

पंचांगुली साधना


 



पंचांगुली साधना


भविष्य ज्ञान के लिए यह एक सात्विक साधना है। परन्तु इसके वाममार्गी रूप भी हैं। यहां हम कहना चाहते हैं कि भविष्य के ज्ञान हेतु कर्णपिशाचनी साधना एवं इन साधनाओं में उद्देश्य ही समान है। शक्तियां समान नहीं हैं।


ध्यान मन्त्र:


'ॐ पंचागुली महादेवी श्री सीमन्धर शासने।

अधिष्ठात्री करस्यासौ शक्तिः श्री त्रिदशेशितुः॥'


मन्त्र:


'ॐ नमो पंचागुंली परशरी परशरी माताय

मंगल वशीकरणी लोहमय दण्डमाणिनी चौंसठ काम-

विहडनी रणमध्ये राउलमध्ये दीवानमध्ये भूतमध्ये

प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोरिंगमध्ये डाकिनीमध्ये

शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषेणीमध्ये, शेरनीमध्ये

गुणीमध्ये गारुणीमध्ये विवारीमध्ये दोषमध्ये दोषा-

शरणमध्ये दुष्टमध्ये घोरकष्ट मुझ उपरे बुरो जो कोई

करावे जड़े जड़ावे तत चित्ते तस माथे श्री माता

श्री पंचागुंली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े ॐ ठं ठंठं स्वाहा।'


विधि-


यह साधना किसी भी शुभ तिथि से प्रारम्भ करनी चाहिए। वैसे हस्त, मार्गशीर्ष एवं फाल्गुन नक्षत्र निर्देशित हैं। इस मन्त्र का सुबह, दोपहर, अर्धरात्रि में निर्भय होकर जाप करें 


पंचांगली देवी को एक पान का पत्ता, उसके ऊपर कपूर, कपूर के ऊपर बताशा एवं दो रखकर कपुर में आग लगायें एवं मां भगवती को समर्पित करें। ऐसा करने में पंचांगली प्रसन्न होकर साधक को भूत, भविष्य, वर्तमान बताने की सिद्धि प्रदान करती हैं और या किसी के भी चेहरे को देख, भूत, भविष्य बताने में सम्पूर्णता, सफलता हासिल कर लेता है। विधि प्रतिदिन की है। 108 दिन में सफलता मिलती है।


पंचांगुली साधना (द्वितीया)

साधना विधि:


1. इस विधि में 'पंचांगुली यन्त्र' एवं 'स्फटिक माला'  या रुद्राक्ष माला में विधि से प्राण-प्रतिष्ठा का अनुष्ठान करें।


2. पंचांगुली साधना ब्रह्ममुहूर्त से ही करनी चाहिए।


3. पंचांगुली साधना 108 दिन की साधना है। स्थान शान्त, पवित्र, निर्जीव होना चाहिए।


4. मुख पूर्व दिशा में और आसन तथा वस्त्र पीले धारण करने चाहिए।


5. फिर पंचांगुली देवी का यन्त्र स्थापित कर दें एवं इसे किसी ताम्र प्लेट में रखें।


6. यन्त्र पर कुमकुम से 'स्वस्तिक' का चिह्न बनायें।


7. गणपति पूजन के उपरान्त षोडशोपचार विधि से यन्त्र का विधिवत् पूजन करें।


ध्यान मन्त्र:


ॐ भूर्भुवः स्वः श्री पंचांगुली देवीं ध्यायामि।


आवाहन मन्त्र:


ॐ आगच्छागच्छ देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे।

क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तमे॥


ॐ भूर्भुवः स्वः श्री पंचांगुली देवताभ्यो नम: आवाहनं समर्पयामि।


आसन मन्त्र:


रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्यं करं शुभम्।

आसनंच मया दत्तं गृहाण परमेश्वरि॥

ॐ भूर्भुव: स्व: श्री पंचांगुली देवताभ्यो नमः आसनं समर्पयामि।


स्नान मन्त्र:


गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदा जलैः।

स्नापिताऽसि मया देवि तथा शान्तिं कुरुष्व मे॥


पयस्नान मन्त्र:


कामधेनु समुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम्।

पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम्॥


दधिस्नान मन्त्र:


पयसस्तु समुदभूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।

दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥


मधुस्नान मन्त्र:


तरुपुरुष समुदभूत सुस्वादु मधुर मधु।

तेजः पुष्टिकर दिव्यं स्नानार्थ प्रति गृह्यताम्॥


घृतस्नान मन्त्र:


नवनीत समुत्पन्नं सर्वसन्तोष कारकम्।

घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥


शर्करास्नान मन्त्र:


इक्षुसार समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका।

मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥


वस्त्र मन्त्र:


सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे।

मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रति गृह्यताम्।।


गन्ध मन्त्र:


श्रीखण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।

विलेपनं सुरश्रेष्ठि चन्दनं प्रति गृह्यताम्॥


अक्षत मन्त्र:


अक्षताश्च सुरश्रेष्ठि कुकुमाक्ता सुशोभिता।

मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ॥


पुष्प मन्त्र:


ॐ माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै विभे।

मयोपनीतानि पुष्पाणि पीत्यर्थं प्रति गृह्यताम्॥


दीप मन्त्र:


साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिना योजितं मया।

दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे॥


नैवेद्य मन्त्र:


नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्तिं मे चला कुरु।

ईप्सितं मे वरं देहि परत्रेह परां गतिम्॥


दक्षिणा मन्त्र:


हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभाविसोः।

अनन्त पुण्य फलदमतः शांतिं प्रयच्छ मे॥


विशेषार्थ्य मन्त्र:


नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते धरणीधरे।

नमस्ते जगदाधारे अर्घ्यं च प्रति गृह्यताम्।

वरदत्वं वरं देहि वांछितं वांछितार्थदं।

अनेन सफलार्धेण फलादऽस्तु सदा मम।

गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्रयमेव च।

आगता सुख सम्पत्तिः पुण्योऽहं तव दर्शनात्॥

हाथ में जल लेकर मन्त्र जप करने का संकल्प करें। आगे दिये गये पंचांगुली मन्त्र का 'स्फटिक

माला' या रुद्राक्ष माला  से 7 दिन तक जप करें।


मन्त्र:


ॐ ठं ठं ठं पंचांगुलि भूत भविष्यं दर्शय ठं ठं ठं स्वाहा।


साधना समाग्री दक्षिणा  - 1100


चेतावनी -


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Monday, February 15, 2021

बगलामुखी देवी


 






बगलामुखी देवी


दश महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या का नाम से उल्लेखित है । वैदिक शब्द ‘वल्गा’ कहा है, जिसका अर्थ कृत्या सम्बन्ध है, जो बाद में अपभ्रंश होकर बगला नाम से प्रचारित हो गया । बगलामुखी शत्रु-संहारक विशेष है अतः इसके दक्षिणाम्नायी पश्चिमाम्नायी मंत्र अधिक मिलते हैं ।


 नैऋत्य व पश्चिमाम्नायी मंत्र प्रबल संहारक व शत्रु को पीड़ा कारक होते हैं । इसलिये इसका प्रयोग करते समय व्यक्ति घबराते हैं । वास्तव में इसके प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिये ।


 ऐसी बात नहीं है कि यह विद्या शत्रु-संहारक ही है, ध्यान योग में इससे विशेष सहयता मिलती है । यह विद्या प्राण-वायु व मन की चंचलता का स्तंभन कर ऊर्ध्व-गति देती है, इस विद्या के मंत्र के साथ ललितादि विद्याओं के कूट मंत्र मिलाकर भी साधना की जाती है ।


 बगलामुखी मंत्रों के साथ ललिता, काली व लक्ष्मी मंत्रों से पुटित कर व पदभेद करके प्रयोग में लाये जा सकते हैं । इस विद्या के ऊर्ध्व-आम्नाय व उभय आम्नाय मंत्र भी हैं, जिनका ध्यान योग से ही विशेष सम्बन्ध रहता है । त्रिपुर सुन्दरी के कूट मन्त्रों के मिलाने से यह विद्या बगलासुन्दरी हो जाती है, जो शत्रु-नाश भी करती है तथा वैभव भी देती है ।


महर्षि च्यवन ने इसी विद्या के प्रभाव से इन्द्र के वज्र को स्तम्भित कर दिया था । आदिगुरु शंकराचार्य ने अपने गुरु श्रीमद्-गोविन्दपाद की समाधि में विघ्न डालने पर रेवा नदी का स्तम्भन इसी विद्या के प्रभाव से किया था ।


 महामुनि निम्बार्क ने एक परिव्राजक को नीम के वृक्ष पर सूर्य के दर्शन इसी विद्या के प्रभाव से कराए थे । इसी विद्या के कारण ब्रह्मा जी सृष्टि की संरचना में सफल हुए ।

श्री बगला शक्ति कोई तामसिक शक्ति नहीं है, बल्कि आभिचारिक कृत्यों से रक्षा ही इसकी प्रधानता है । इस संसार में जितने भी तरह के दुःख और उत्पात हैं, उनसे रक्षा के लिए इसी शक्ति की उपासना करना श्रेष्ठ होता है । 


शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन संहिता के पाँचवें अध्याय की २३, २४ एवं २५वीं कण्डिकाओं में अभिचारकर्म की निवृत्ति में श्रीबगलामुखी को ही सर्वोत्तम बताया है । शत्रु विनाश के लिए जो कृत्या विशेष को भूमि में गाड़ देते हैं, उन्हें नष्ट करने वाली महा-शक्ति श्रीबगलामुखी ही है ।

त्रयीसिद्ध विद्याओं में आपका पहला स्थान है ।


 आवश्यकता में शुचि-अशुचि अवस्था में भी इसके प्रयोग का सहारा लेना पड़े तो शुद्धमन से स्मरण करने पर भगवती सहायता करती है । लक्ष्मी-प्राप्ति व शत्रुनाश उभय कामना मंत्रों का प्रयोग भी सफलता से किया जा सकता है ।


देवी को वीर-रात्रि भी कहा जाता है, क्योंकि देवी स्वम् ब्रह्मास्त्र-रूपिणी हैं, इनके शिव को एकवक्त्र-महारुद्र तथा मृत्युञ्जय-महादेव कहा जाता है, इसीलिए देवी सिद्ध-विद्या कहा जाता है । 


विष्णु भगवान् श्री कूर्म हैं तथा ये मंगल ग्रह से सम्बन्धित मानी गयी हैं ।


शत्रु व राजकीय विवाद, मुकदमेबाजी में विद्या शीघ्र-सिद्धि-प्रदा है । शत्रु के द्वारा कृत्या अभिचार किया गया हो, प्रेतादिक उपद्रव हो, तो उक्त विद्या का प्रयोग करना चाहिये । यदि शत्रु का प्रयोग या प्रेतोपद्रव भारी हो, तो मंत्र क्रम में निम्न विघ्न बन सकते हैं –


१॰ जप नियम पूर्वक नहीं हो सकेंगे ।


२॰ मंत्र जप में समय अधिक लगेगा, जिह्वा भारी होने लगेगी ।


३॰ मंत्र में जहाँ “जिह्वां कीलय” शब्द आता है, उस समय स्वयं की जिह्वा पर संबोधन भाव आने लगेगा, उससे स्वयं पर ही मंत्र का कुप्रभाव पड़ेगा ।


४॰ ‘बुद्धिं विनाशय’ पर परिभाषा का अर्थ मन में स्वयं पर आने लगेगा ।


सावधानियाँ –


१॰ ऐसे समय में तारा मंत्र पुटित बगलामुखी मंत्र प्रयोग में लेवें, अथवा कालरात्रि देवी का मंत्र व काली अथवा प्रत्यंगिरा मंत्र पुटित करें । तथा कवच मंत्रों का स्मरण करें । सरस्वती विद्या का स्मरण करें अथवा गायत्री मंत्र साथ में करें ।


२॰ बगलामुखी मंत्र में


 “ॐ ह्ल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाश ह्ल्रीं ॐ स्वाहा ।” 


इस मंत्र में ‘सर्वदुष्टानां’ शब्द से आशय शत्रु को मानते हुए ध्यान-पूर्वक आगे का मंत्र पढ़ें ।


३॰ यही संपूर्ण मंत्र जप समय ‘सर्वदुष्टानां’ की जगह काम, क्रोध, लोभादि शत्रु एवं विघ्नों का ध्यान करें तथा ‘वाचं मुखं …….. जिह्वां कीलय’ के समय देवी के बाँयें हाथ में शत्रु की जिह्वा है तथा ‘बुद्धिं विनाशय’ के समय देवी शत्रु को पाशबद्ध कर मुद्गर से उसके मस्तिष्क पर प्रहार कर रही है, ऐसी भावना करें ।


४॰ बगलामुखी के अन्य उग्र-प्रयोग वडवामुखी, उल्कामुखी, ज्वालामुखी, भानुमुखी, वृहद्-भानुमुखी, जातवेदमुखी इत्यादि तंत्र ग्रथों में वर्णित है । समय व परिस्थिति के अनुसार प्रयोग करना चाहिये ।


५॰ बगला प्रयोग के साथ भैरव, पक्षिराज, धूमावती विद्या का ज्ञान व प्रयोग करना चाहिये ।


६॰ बगलामुखी उपासना पीले वस्त्र पहनकर, पीले आसन पर बैठकर करें । गंधार्चन में केसर व हल्दी का प्रयोग करें, स्वयं के पीला तिलक लगायें । दीप-वर्तिका पीली बनायें । पीत-पुष्प चढ़ायें, पीला नैवेद्य चढ़ावें । हल्दी से बनी हुई माला से जप करें । अभाव में रुद्राक्ष माला से जप करें या सफेद चन्दन की माला को पीली कर लेवें । तुलसी की माला पर जप नहीं करें ।


।। बगला उत्पत्ति ।।


एक बार समुद्र में राक्षस ने बहुत बड़ा प्रलय मचाया, विष्णु उसका संहार नहीं कर सके तो उन्होंने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप महा-त्रिपुर-सुन्दरी की आराधना की तो श्रीविद्या ने ही ‘बगला’ रुप में प्रकट होकर राक्षस का वध किया । मंगलवार युक्त चतुर्दशी, मकर-कुल नक्षत्रों से युक्त वीर-रात्रि कही जाती है । इसी अर्द्ध-रात्रि में श्री बगला का आविर्भाव हुआ था ।


 मकर-कुल नक्षत्र – भरणी, रोहिणी, पुष्य, मघा, उत्तरा-फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, श्रवण तथा उत्तर-भाद्रपद नक्षत्र है ।


।। बगला उपासनायां उपयोगी कुल्कुलादि साधना ।।


बगला उपासना व दश महाविद्याओं में मंत्र जाग्रति हेतु शापोद्धार मंत्र, सेतु, महासेतु, कुल्कुलादि मंत्र का जप करना जरुरी है । 


अतः उनकी संक्षिप्त जानकारी व अन्य विषय साधकों के लिये आवश्यक है ।


नाम – बगलामुखी, पीताम्बरा, ब्रह्मास्त्र-विद्या ।


आम्नाय – मुख आम्नाय दक्षिणाम्नाय हैं इसके उत्तर, ऊर्ध्व व उभयाम्नाय मंत्र भी हैं ।


आचार – इस विद्या का वामाचार क्रम मुख्य है, दक्षिणाचार भी है ।


कुल – यह श्रीकुल की अंग-विद्या है ।


शिव – इस विद्या के त्र्यंबक शिव हैं ।


भैरव – आनन्द भैरव हैं । कई विद्वान आनन्द भैरव को प्रमुख शिव व त्र्यंबक को भैरव बताते हैं ।


गणेश – इस विद्या के हरिद्रा-गणपति मुख्य गणेश हैं । स्वर्णाकर्षण भैरव का प्रयोग भी उपयुक्त है ।


यक्षिणी – विडालिका यक्षिणी का मेरु-तंत्र में विधान है ।


 प्रयोग हेतु अंग-विद्यायें -मृत्युञ्जय, बटुक, आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, पार्जन्यास्त्र, संमोहनास्त्र, पाशुपतास्त्र, कुल्लुका, तारा स्वप्नेश्वरी, वाराही मंत्र की उपासना करनी चाहिये ।


कुल्लुका – “ॐ क्ष्रौं” अथवा “ॐ हूँ क्षौं” शिर में १० बार जप करना ।


सेतु – कण्ठ में १० बार “ह्रीं” मंत्र का जप करें ।


महासेतु – “स्त्रीं” इसका हृदय में १० बार जप करें ।


निर्वाण – हूं, ह्रीं श्रीं से संपुटित करे एवं मंत्र जप करें ।


 दीपन पुरश्चरण आदि में “ईं” से सम्पुटित मंत्र का जप करें ।


जीवन – मूल मंत्र के अंत में ” ह्रीं ओं स्वाहा” १० बार जपे । नित्य आवश्यक नहीं है ।


मुख-शोधन – (दातून) करने के बाद “हं ह्रीं ऐं”


 जलसंकेत से जिह्वा पर अनामिका से लिखें एवं १० बार मंत्र जप करें ।


शापोद्धार – “ॐ ह्लीं बगले रुद्रशायं विमोचय विमोचय ॐ ह्लीं स्वाहा” १० बार जपे ।


उत्कीलन – “ॐ ह्लीं स्वाहा” मंत्र के आदि में १० बार जपे ………


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


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Wednesday, February 10, 2021

भुवनेश्वरी मंत्र साधना


 



भुवनेश्वरी मंत्र साधना


भुवनेश्वरी महाविद्या  । भुवनेश्वरी देवी, दस महाविद्याओं में से एक है, जो चौथे स्थान में विराजित है,भुवनेश्वरी देवी के अवतार आदि शक्ति का रूप है, जो शक्ति का आधार है । इन्हें ओम शक्ति भी कहा जाता है,भुवनेश्वरी देवी को प्रकति की माँ माना जाता है, जो समस्त प्रकति को संभालती है । 


ये भगवान शिव की अभिव्यक्ति है, इन्हें सभी देवियों से कोमल एवं उज्जवल माना जाता है । भुवनेश्वरी देवी ने चंद्रमा को अपने माथे में सजाया हुआ है, और इसके श्वेत प्रकाश से वे समस्त धरती को प्रकाशमय करती है । इन्हें सभी देविओं में उत्तम माना जाता है, जिन्होंने समस्त धरती की रचना की और दानव शक्तियों को मार गिराया । जो इस देवी शक्ति की पूजा करता है, उसे शक्ति, बुद्धि और धन की प्राप्ति होती है ।


भुवनेश्वरी साधना:-


1. सब पहले आपके सामने देवी का कोई भी चित्र या यंत्र या मूर्ति हो। इनमेसे कुछ भी नही तो आपके रत्न या रुद्राक्ष पर पूजन करे ।


2. घी का दीपक या तेल का दीपक या दोनों दीपक जलाये। धुप अगरबत्ती जलाये। बैठने के लिए आसन हो। जाप के लिए रुद्राक्ष माला या काली हकीक माला हो ।


3. एक आचमनी पात्र , जल पात्र रखे। हल्दी,कुंकुम,

चन्दन,अष्टगंध और अक्षत पुष्प ,नैवेद्य के लिए

मिठाई या दूध या कोई भी वस्तु ,फल भी एकत्रित करे। अगर यह सामग्री नहीं है तो मानसिक पूजन करे ।


4. सबसे पहले गुरु का स्मरण करे। अगर आपके गुरु नहीं है तो भी गुरु स्मरण करे। गणेश का स्मरण करे-


ॐ गुं गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री गणेशाय नमः

ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नम:

क्रीं कालिकायै नमः

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम :


फिर आचमनी या चमच से चार बार बाए हाथ से दाहिने हाथ पर पानी लेकर पिए -

(अगर जल नहीं है तो मानसिक ग्रहण करे )


ह्रीं आत्मतत्वाय स्वाहा

ह्रीं विद्या तत्वाय स्वाहा

ह्रीं शिव तत्वाय स्वाहा

ह्रीं सर्व तत्वाय स्वाहा


उसके बाद पूजन के स्थान पर पुष्प अक्षत अर्पण करे -(अगर पूजन सामग्री नहीं है तो मानसिक करे )


ॐ श्री गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः

ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नमः


उसके बाद अपने आसन का स्पर्श करे और पुष्प अक्षत अर्पण करे-


ॐ पृथ्वीव्यै नमः


अब तीन बार सर से पाँव तक हाथ फेरे -


।।बॐ श्री दुर्गा भुवनेश्वरी सहित महाकाल्यै नमः आत्मानं रक्ष रक्ष ।।


अब जल के पात्र को गंध लगाकर अक्षत पुष्प अर्पण करे-

।। ॐ कलश मण्डलाय नमः ।।


अब दाहिने हाथ में जल पुष्प अक्षत लेकर संकल्प करे -


"मन में यह बोले की मैं (अपना नाम और गोत्र ) भुवनेश्वरी जयंती (or भुवनेश्वरी पुंजन) पर् भगवती भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त होने हेतु तथा अपनी समस्या निवारण हेतु या अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु यथा शक्ति साधना कर रहा हूँ " और जल को जमीन पर छोड़े ।


अब गणेशजी का ध्यान करे -


वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ

निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा

ॐ श्री गणेशाय नमः का 11 या 21 बार जाप करे ।


फिर भैरव जी का स्मरण करे -


।।ॐ भं भैरवाय नमः।।


भगवती भुवनेश्वरी पूजन-


अब आप भगवती भुवनेश्वरी जी का ध्यान का जो मंत्र है उसे पढे और उनका आवाहन करे-


ध्यान मंत्र :-


उदत दिन द्युतिम इंदुं किरिटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम ।

स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशाभितिकरां प्रभजे भुवनेशीम ।।

ह्रीम भुवनेश्वर्यै नम: माँ भगवती राजराजेश्वरी भुवनेश्वरी आवाहयामि मम पूजा स्थाने मम हृदये स्थापयामि पूजयामि नम: ।।


अब आवाहनादि मुद्राये आती हो तो प्रदर्शित करे-


ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: आवाहिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: संस्थापिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निधापिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निरुद्धा भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सम्मुखी भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: अवगुंठिता भव

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: वरदो भव सुप्रसन्नो भव ।


फिर भुवनेश्वरी देवी का पंचोपचार पूजन करे-


ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: गंधं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: पुष्पं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: धूपं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: दीपं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: नैवेद्यं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: तांबूलं समर्पयामि

ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सर्वोपचारार्थे पुन: गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।


इसके बाद अगर आवरण पूजन करना हो तो करे या फिर नीचे दिये हुये भुवनेश्वरी खडगमाला स्तोत्र का पाठ करे और भगवती भुवनेश्वरी के साथ चलनेवाली समस्त आवरण देवताओं के पुजन हेतु पुष्पाक्षत अर्पण करे,खडगमाला के पाठ से आवरण देवताओं का पूजन अपने आप होता है  ।


श्री भुवनेश्वरी खडगमाला स्तोत्र :-


ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं भुवनेश्वरी - हृदयदेवि- शिरोदेवि- शिखादेवि- कवचदेवि -नेत्रदेवि - अस्त्रदेवि - कराले विकराले उमे सरस्वती श्री दुर्गे उषे लक्ष्मि श्रूति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कांति आर्ये श्री भुवनेश्वरी - दिव्यौघ गुरुरुपिणी - सिद्धौघ गुरुरुपिणी - मानवौघ गुरुरुपिणी - श्री गुरु रुपिणी - परम गुरु रुपिणी - परात्पर गुरु रुपिणी - पारमेष्ठी गुरु रुपिणी - अमृतभैरव सहित श्री भुवनेश्वरी - हृदय शक्ति - शिर शक्ति - शिखा शक्ति - कवच शक्ति - नेत्र शक्ति - अस्त्र शक्ति - हृल्लेखे गगने रक्ते करालिके महोच्छुष्मे - सर्वानंदमय चक्रस्वामिनी !

गायत्रीसहित ब्रम्हमयि - सावित्रीसहित विष्णुमयि - सरस्वतीसहित रुद्रमयि - लक्ष्मीसहित कुबेरमयि - रतिसहित काममयि - पुष्टिसहित विघ्नराजमयि - शंखनिधि सहित वसुधामयि - पद्मनिधि सहित वसुमतिमयि - गायत्र्यादिसह श्री भुवनेश्वरी ! ह्रां हृदयदेवि - ह्रीं शिरोदेवि - ह्रैं कवचदेवि - ह्रौं नेत्रदेवि - ह्र: अस्त्रदेवि - सर्वसिद्धप्रदचक्रस्वामिनि !

अनंगकुसुमे - अनंगकुसुमातुरे - अनंगमदने - अनंगमदनातुरे - भुवनपाले - गगनवेगे - शशिरेखे - अनंगवेगे - सर्वरोगहर चक्रस्वामिनि !

कराले विकराले उमे सरस्वति श्री दुर्गे उषे लक्ष्मी श्रूति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कांति आर्ये सर्वसंक्षोभणचक्रस्वामिनि !

ब्राम्हि माहेश्वरी कौमारि वैष्णवी वाराही इंद्राणी चामुंडे महालक्ष्म्ये - अनंगरुपे - अनंगकुसुमे - अनंगमदनातुरे - भुवनवेगे - भुवनपालिके - सर्वशिशिरे - अनंगमदने - अनंगमेखले - सर्वाशापरिपूरक चक्रस्वामिनि !

इंद्रमयि - अग्निमयि - यममयि- नैर्ऋतमयि - वरुणमयि - वायुमयि - सोममयि - ईशानमयि - ब्रम्हमयि- अनंतमयि - वज्रमयि - शक्तिमयि - दंडमयि - खडगमयि- पाशमयि - अंकुशमयि - गदामयि- त्रिशूलमयि - पद्ममयि - चक्रमयि - वरमयि - अंकुशमयि - पाशमयि - अभयमयि - बटुकमयि- योगिनिमयि - क्षेत्रपालमयि - गणपतिमयि - अष्टवसुमयि - द्वादशआदित्य मयि - एकादशरुद्रमयि - सर्वभूतमयि - अमृतेश्वरसहित भुवनेश्वरी - त्रैलोक्यमोहन चक्रस्वामिनि - नमस्ते नमस्ते नमस्ते स्वाहा श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ ।।


मंत्र :-

।। ॐ ह्रीम नम: ।।


फिर मंत्र जाप भगवती को समर्पित करे और एक आचमनी जल मे कुंकुम या अष्टगंध मिलाकर भगवती को अर्घ्य दे "ह्रीं भुवनेश्वर्यै विद्महे रत्नेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात् "


फिर आप अपनी बाधा समस्या का स्मरण करे या कोइ समस्या नही है तो फिर कोइ समस्या बाधा घर मे ना आये ऐसा स्मरण कर एक निंबु काटे,फिर उस निंबु को पानी बहा दे या मिट्टी मे गाडे या ऐसी कोइ सुविधा ना हो तो कचरे मे डाले । अगर आप निंबु ना काटे तो भी चलेगा इसकी जगह नारियल भी फोड सकते है ।


यह बहुत संक्षिप्त पूजन है , इस साधना से घर मे कोइ नकारात्मक बाधा नही होगी , रोग नही आयेंगे ,शत्रू बाधा या काम मे कोइ रुकावट आ रही है तो वो दूर होगी ,भगवती दुर्गा महाकाली एवं भुवनेश्वरी की कृपा से जीवन मे कोइ किसी प्रकार की नकारात्मक बाधा नही होगी । पुजन के बाद माँ से मन ही मन क्षमा प्रार्थना भी अवश्य करे ।


"जय जय माँ भुवनेश्वरी"


राज गुरु जी


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गुप्त नवरात्रि 12 फरवरी से प्रारंभ हो रहे है,


 



*गुप्त नवरात्रि 12 फरवरी से प्रारंभ हो रहे है, 



जाने घट स्थापना का शुभ मुहूर्त*


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🇮🇳हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्रि का विशेष महत्व होता है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि तंत्र-मंत्र को सिद्ध करने वाली मानी गई है। कहा जाता है कि गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली पूजा से कई कष्टों से मुक्ति मिलती है , गुप्त नवरात्रि में तांत्रिक महाविद्याओं को भी सिद्ध करने के लिए मां दुर्गा जी की उपासना की जाती है।


*घट स्थापना शुभ मुहूर्त:-* नवरात्रि प्रारंभ 12 फरवरी 2021 दिन शुक्रवार से 21 फरवरी 2021 दिन रविवार तक रहेगे।


*कलश स्थापना मुहूर्त:-* सुबह 08 बजकर 34 मिनट से 09 बजकर 59 मिनट तक।


*अभिजीत मुहूर्त:-* दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 58 मिनट तक। 


*मां दुर्गा जी के इन स्वरूपों की होती है, पूजा:-*

 मां कालिके, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता चित्रमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूम्रवती, माता बगलामुखी, मातंगी, कमला देवी यह दस महाविद्याओं की पूजन होती है।


*मां दुर्गा की गुप्त नवरात्रि में ऐसे करें पूजा:-* कहते हैं कि गुप्त नवरात्रि के दौरान तांत्रिक और अघोरी मां दुर्गा जी की आधी रात में पूजा करते हैं। मां दुर्गा जी की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर लाल रंग का सिंदूर और सुनहरे गोटे वाली चुनरी अर्पित की जाती है।

इसके बाद मां के चरणों में पूजा सामग्री को अर्पित किया जाता है। मां दुर्गा को लाल पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है साधक अनेक प्रकार से माँ को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह की साधनाये करते है।


🙏धन्यवाद।🙏

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...