Thursday, November 29, 2018

गोमती चक्र के प्रयोग






गोमती चक्र के प्रयोग


१॰ यदि इस गोमती चक्र को लाल सिन्दूर की डिब्बी में घर में रखे, तो घर में सुख-शान्ति बनी रहती है ।

२॰ यदि घर में भूत-प्रेतों का उपद्रव हो, तो दो गोमती चक्र लेकर घर के मुखिया के ऊपर से घुमाकर आग में डाल दे, तो घर से भूत-प्रेत का उपद्रव समाप्त हो जाता है ।

३॰ यदि घर में बिमारी हो या किसी का रोग शान्त नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र लेकर उसे चाँदी में पिरोकर रोगी के पलंग के पाये पर बाँध दें, तो उसी दिन से रोगी का रोग समाप्त होने लगता है ।

४॰ व्यापार वृद्धि के लिए दो गोमती चक्र लेकर उसे बाँधकर ऊपर चौखट पर लटका दें, और ग्राहक उसके नीचे से निकले, तो निश्चय ही व्यापार में वृद्धि होती है ।

५॰ प्रमोशन नहीं हो रहा हो, तो एक गोमती चक्र लेकर शिव मन्दिर में शिवलिंग पर चढ़ा दें, और सच्चे मन से प्रार्थना करें । निश्चय ही प्रमोशन के रास्ते खुल जायेंगे ।

६॰ पति-पत्नी में मतभेद हो तो तीन गोमती चक्र लेकर घर के दक्षिण में “हलूं बलजाद” कहकर फेंक दें, मतभेद समाप्त हो जायेगा ।

७॰ पुत्र प्राप्ति के लिए पाँच गोमती चक्र लेकर किसी नदी या तालाब में “हिलि हिलि मिलि मिलि चिलि चिलि हुं ” पाँच बार बोलकर विसर्जित करें ।

८॰ यदि बार-बार गर्भ नष्ट हो रहा हो, तो दो गोमती चक्र लाल कपड़े में बाँधकर कमर में बाँध दें ।

९॰ यदि शत्रु अधिक हो तथा परेशान कर रहे हो, तो तीन गोमती चक्र लेकर उन पर शत्रु का नाम लिखकर जमीन में गाड़ दें ।

१०॰ कोर्ट-कचहरी में सफलता पाने के लिये, कचहरी जाते समय घर के बाहर गोमती चक्र रखकर उस पर अपना दाहिना पैर रखकर जावें ।

११॰ भाग्योदय के लिए तीन गोमती चक्र का चूर्ण बनाकर घर के बाहर छिड़क दें ।

१२॰ राज्य-सम्मान-प्राप्ति के लिये दो गोमती चक्र किसी ब्राह्मण को दान में दें ।

१३॰ तांत्रिक प्रभाव की निवृत्ति के लिये बुधवार को चार गोमती चक्र अपने सिर के ऊपर से उबार कर चारों दिशाओं में फेंक दें ।

१४॰ चाँदी में जड़वाकर बच्चे के गले में पहना देने से बच्चे को नजर नहीं लगती तथा बच्चा स्वस्थ बना रहता है ।

१५॰ दीपावली के दिन पाँच गोमती चक्र पूजा-घर में स्थापित कर नित्य उनका पूजन करने से निरन्तर उन्नति होती रहती है ।

१६॰ रोग-शमन तथा स्वास्थ्य-प्राप्ति हेतु सात गोमती चक्र अपने ऊपर से उतार कर किसी ब्राह्मण या फकीर को दें ।

१७॰ 11 गोमती चक्रों को लाल पोटली में बाँधकर तिजोरी में अथवा किसी सुरक्षित स्थान पर सख दें, तो व्यापार उन्नति करता जायेगा ।

दक्षिणा शुल्क 500 रू +डाक व्यय


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Wednesday, November 28, 2018

तीव्र उच्छिष्ट गणपति साधना





तीव्र उच्छिष्ट गणपति साधना


कड़वे नीम की जड़ से कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन अंगूठे के बराबर की गणेश की प्रतिमा बनाकर रात्रि के प्रथम प्रहर में स्वयं लाल वस्त्र धारण कर लाल आसन पर पश्चिम मुख होकर झूठे मुँह से सामने थाली में प्रतिमा को स्थापित कर साधना में सफलता की सदगुरुदेव से प्रार्थना कर संकल्प करें और ततपश्चात गणपति का ध्यान कर उनका पूजन लाल चन्दन,अक्षत,पुष्प के द्वारा पूजन करे और लाल चन्दन की ही माला से झूठे मुँह से ही ५ माला मन्त्र जप करें. 

सात दिनों तक ऐसे ही पूजन करे और आठवे दिन अर्थात अमावस्या को पञ्च मेवे से ५०० आहुतियाँ करें इससे मंत्र सिद्ध हो जाता है. तब आप इनके विविध प्रयोगों को कर सकते हैं. २ प्रयोग नीचे दिए गए हैं.

१. जिस व्यक्ति का आकर्षण करना हो चाहे वो आपका बॉस हो, सहकर्मी हो, प्रेमी,प्रेमिका या फिर कोई मित्र या शत्रु हो जिससे, आपको अपना काम करवाना हो.उसके फोटो पर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ३ दिनों तक १ माला मन्त्र जप करने से निश्चय ही उसका आकर्षण होता है.

२. अन्न के ऊपर इस सिद्ध प्रतिमा का स्थापन कर ११ दिनों तक नित्य ३ माला मंत्र जप करने से वर्ष भर घर में धन धान्य का भंडार भरा रहता है और यदि इसके बाद नित्य ५१ बार मंत्र को जप कर लिया जाये तो ये भंडार भरा ही रहता है. नहीं तो आपको प्रति ६ माह या वर्ष में करना चाहिए.

ध्यान मन्त्र –


दंताभये चक्र- वरौ दधानं कराग्रग्रम् स्वर्ण-घटं त्रि-नेत्रं ,

धृताब्जयालिंगितमब्धि-पुत्र्या लक्ष्मी-गणेशं कनकाभमीडे.


मंत्र- 


ॐ नमो हस्ति मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने क्रां क्रीं ह्रीं घे घे उच्छिष्ठाय स्वाहा.


दक्षिणा शुल्क 1500 रू +डाक व्यय


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मांगलिक दोष कारन और निवारण :-





मांगलिक दोष कारन और निवारण :- 


जन्मांग चक्र में मंगल 1,4,7,8 और 12 भाव में है तो मांगलिक योग होता है ।विद्वानों का मत है कि लग्न शरीर का, चंद्र मन का और शुक्र रति सुख का, प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए लग्न से, चंद्र लग्न से व शुक्र लग्न से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश में मंगल स्थित होने से मंगल दोष होता है। लग्नस्थ मंगल दोष लग्नस्थ मंगल व्यक्ति को क्रोधी, हठी बनाता है क्योंकि यह उग्र एवं आक्रामक ग्रह है।

लग्नस्थ मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख स्थान पर हो, तो गृहस्थ सुख को बिगाड़ती है।

सप्तम दृष्टि पति के स्थान पर होने से दाम्पत्य सुख को खत्म करती है।

अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि पति-पत्नी दोनों के लिए मारक होती है क्योंकि अष्टम भाव सप्तम से द्वितीय होता है।

चतुर्थ भावस्थ मंगल जातक-जातका के सुख स्थान पर स्थित होता है। इस स्थिति में वह अचल संपत्ति तो देता है किंतु सुख शांति छीन लेता है। मंगल की अशुभ दृष्टि पति के स्थान पर होने से पति से संबंध मधुर नहीं रहता। दोनों के बीच वैचारिक मतभेद बना रहता है। 

चतुर्थ भावस्थ मंगल जीवन साथी को सुख आनंद देने में असमर्थ करता है। मंगल का दोष, क्षीण मंगल दोष माना गया है।

मंगल की दृष्टि सप्तम, दशम व एकादश भाव पर रहती है। ऐसा मंगल पति-पत्नी को पृथक करता है, किंतु यदि पापाक्रांत न हो तो अपनी मारक दृष्टि का संधान नहीं करता। सप्तम भावस्थ मंगल सप्तम स्थान पति-पत्नी का स्थान माना गया है।

सप्तम स्थान का वैवाहिक दृष्टकोण से अत्यधिक महत्व है। इस भाव से दाम्पत्य सुख, विचारों में सामंजस्य, जीवन साथी की आकृति-प्रकृति, रूप-गुण आदि का विचार किया जाता है।

जिस व्यक्ति के सप्तम भाव में मंगल होता है उसके दाम्पत्य सुख में बाधा आती है, जीवन साथी के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव व स्वभाव में उग्रता रहती है।

 सप्तम भावस्थ मंगल लग्न स्थान, धन स्थान व कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है, जिससे धन हानि, विकृत संतान, दुर्घटना, चारित्रिक पतन तथा व्यवसाय में अवरोध होता है। मंगल की यह स्थिति दाम्पत्य जीवन में कटुता उत्पन्न कर पति-पत्नी को अलग-अलग रहने को बाध्य करती है।

मेष, सिंह, वृश्चिक का मंगल जातक को दुराग्रही व दंभी बनाता है। शोध से पता चला है कि किसी भी राशि का सप्तम भावस्थ मंगल अपना कुप्रभाव देता ही है। अतः मंगल दोष का परिहार कर लेना चाहिए।

सप्तम भावस्थ मंगल जातक जातका को प्रबल मंगली बनाता है। ऐसे मंगल को कांतघाती नाम भी दिया गया है। ऐसा मंगल मृत्यु तुल्य कष्ट देता है या तलाक की स्थिति उत्पन्न कर पति पत्नी को अलग कर देता है।

अष्टम भावस्थ मंगल मंगलदोष की पराकाष्ठा है। अष्टम भाव से हमें जातक के जीवन के विघ्न, बाधा, अनिष्ट, आयु, विषाद, मृत्यु, मृत्यु का कारण एवं मृत्यु का स्थान ज्ञात होता है। स्त्री की जन्म कुंडली में यह स्थान सौभाग्य सूचक माना जाता है। अष्टम भावस्थ मंगल संपूर्ण वैवाहिक सुख का नाश करता है ।

ऋषि-मुनियों व ज्योर्तिविदों ने एक मत से मंगल की इस स्थिति को अत्यंत अशुभ बताया है। इस स्थिति के फलस्वरूप जातक जातका सदैव रोगग्रस्त रहते हैं। फलतः दाम्पत्य सुख का नाश होता है और वे अल्पायु एवं दरिद्र होते हैं।

शास्त्रकारों का मत है


” शुभास्तस्व किं खेचरा कुर्यन्ये विधाने पिचेदष्टमे भूमिसुनूः “

अर्थात मंगल अष्टम भावस्थ हो, तो जातक की कुंडली में शुभ स्थान में बैठे शुभ ग्रह भी शुभ फल नहीं देते। दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है। ऐसे मंगल दोष का परिहार होना बहुत आवश्यक है।

अष्टम भावस्थ मंगल वृष, कन्या, मकर का हो, तो कुछ शुभ होता है, मकर का मंगल संतानहीन बनाता है।
मंगल यदि कर्क, वृश्चिक, मीन का हो, तो जातक की जल में डूबकर मृत्यु का डर रहता है।

उसे परिवार का तिरस्कार सहना पड़ता है।
मंगल द्वादश भाव से भोग, त्याग, शय्या सुख, निद्रा, यात्रा, व्यय, क्रय शक्ति और मोक्ष का विचार किया जाता है।

मंगल द्वादश भावस्थ हो, तो जातक-जातका मंगल दोष से ग्रस्त होते हैं।

फलतः पति-पत्नी में आपस में सामंजस्य नहीं रहता। जीवन टूट कर बिखर जाता है। जातक क्रोधी, कामुक, और दुष्कर्मी हो जाता है। उसे धन का अभाव हो जाता है, उसकी दुर्घटना होती है, वह रक्त विकृति, गुप्त रोग आदि व्याधियों से पीड़ित होता है। वह पत्नी की हत्या भी कर सकता है।

द्वादश मंगल की पूर्ण दृष्टि तृतीय, षष्ठ व सप्तम स्थान पर हो, तो जातक की बंधुओं से शत्रुता होती है और वह रोग से ग्रस्त होता है।

मंगल दोष परिहार:-


 सर्वमान्य नियम यह है कि मंगल दोष से ग्रस्त कन्या का विवाह मंगल दोष से ग्रस्त वर से किया जाए, तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है। कन्या की कुंडली में मंगल दोष हो और वर की कुंडली में उसी स्थान पर शनि हो, तो मंगल दोष का परिहार स्वयमेव हो जाता है।

यदि जन्मांक में मंगल दोष हो किंतु शनि मंगल पर दृष्टिपात करे, तो मंगल दोष का परिहार होता है।
मकर लग्न में मकर राशि का मंगल व सप्तम स्थान में कर्क राशि का चंद्र हो, तो मंगल दोष नहीं होता।

कुछ ज्योतिर्विद कहते हैं कि मंगल गुरु से युत या दृष्ट हो, तो दोष प्रभावहीन होता है। किंतु अध्ययन व शोध के आधार पर ज्ञात हुआ है कि गुरु की राशि में स्थित मंगल अत्यंत कष्टकारक होता है और पापाक्रांत मंगल अपना कुप्रभाव डालता ही है। 

मंगल दोष से दूषित जातकों का जन्मपत्री मिलान करके व मंगल दोष का यथासंभव परिहार करके विवाह करें, तो दाम्पत्य जीवन सुखद होगा है।

वृश्चिक राशि में न्यून किंतु मेष राशि में मंगल प्रबल घातक होता है।

मंगल दोष परिहार के कुछ अन्य नियम इस प्रकार है।
यदि मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्थ हो किंतु किसी क्रूर ग्रह से युत या दृष्ट न हो और इन भावों में मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि हो, तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।

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आज कल लोग फालतू के सवाल बोहोत कर ते है








आज कल लोग फालतू के सवाल बोहोत कर ते है 1 दिन में काम हो जाएगा क्या या , किसी किसी को चमत्कार देखना होता है , तो भाइयो मैं कोई बाबाजी नही हूँ  जो पेपर में या कही ट्रेन बस में पोस्टर लगा कर बोलू के 24 घण्टे में काम कर दुगा .


,ये वो फलाना ढिमका ,  हर चीज में समय लगता है , दूसरी बात के ये मैं कोई दुकानदार नही हु जो मेरे पास जिन , भूत, प्रेत, परी, अप्सरा, मिल जाएगी अगर कुछ शक्ति पाना है तो खुद हासिल करना पड़ता है मेहनत करनी पड़ती है , 

मैं सिर्फ साधना बाता सकता हु लोगो को मेहनत नही करनी है एक दिन में सब कुछ चाहिए, आज कल अरे चूतियों एक दिन में तो बच्चा भी पैदा नही होता है , ओर तुमको , सिद्धि चाहिए, मेरी बात जिसको बुरी लगे मुझे unfrnd कर सकते हो,, सब्र करोगे तो सब होगा वरना कुछ नही हो सकता ,

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Monday, November 26, 2018

स्वप्नेश्वरी साधना - ------








स्वप्नेश्वरी साधना - ------


मनुष्य के शरीर की आतंरिक रचना बहोत ही पेचीदा है और आधुनिक विज्ञान भी इसे अभी तक पूर्ण रूप से समजने के लिए प्रयासरत है.

वस्तुतः हमारे पुरातन महापुरुषों ने साधनाओ के माध्यम से ब्रम्हांड की इस जटिल संरचना को समजा था और इसके ऊपर शोधकार्य लगातार किया था जिससे की मानव जीवन पूर्ण सुखो की प्राप्ति कर सके.

 कालक्रम में उनकी शोध की अवलेहना कर हमने उनके निष्कर्षों को आत्मसार करने की वजाय उसे भुला दिया और इसे कई सूत्र लुप्त हो गए जो की सही अर्थो में मनुष्य जीवन की निधि कही जा सकती है.

 मनुष्य के अंदर का ऐसा ही एक भाग है मन. मन ऐसा भाग है जो मनुष्य को अपने आतंरिक और बाह्य ब्रम्हांड को जोड़ सकता है. क्यों की ब्रम्हांड और मन दोनों ही अनंत है.

 आतंरिक ब्रम्हांड की पृष्ठभूमि मन ही है क्यों की शरीर के अंदर ही सही लेकिन मन अनंत है. और आतंरिक ब्रम्हांड भी बाह्य ब्रम्हांड की तरह अनंत भूमि पर स्थित होना चाहिए इस लिए इसका पूर्ण आधार मन है. मन के भी कई प्रकार के भेद हमारे ऋषियोने कहे है उसमे से प्रमुख है,

 जागृत, अर्धजागृत और सुषुप्त मन. यहाँ पर एक तथ्य ध्यान देने योग्य है की आतंरिक और बाह्य ब्रम्हांड की गति समान और नितांत है.

इस लिए जो भी घटना बाह्य ब्रम्हांड में होती है वही घटना आतंरिक ब्रम्हांड में भी होती है. साधको की कोशिश यही रहती है की वह किसी युक्ति से इन दोनों ब्रम्हांड को जोड़ दे तो वह प्रकृति पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता है.

 वह ब्रम्हांड में घटित कोई भी घटना को देख सकता है तथा उसमे हस्तक्षेप भी कर सकता है. लेकिन यह सफर बहोत ही लंबा है और साधक में धैर्य अनिवार्य होना चाहिए. लेकिन इसके अलावा इन्ही क्रमो से सबंधित कई लघु प्रयोग भी तंत्र में निहित है. स्वप्न एक एसी ही क्रिया है जो मन के माध्यम से सम्प्पन होती है.

 निंद्रा समय में अर्धजागृत मन क्रियावान हो कर व्यक्ति को अपनी चेतना के माध्यम से जो द्रश्य दिखता तथा अनुभव करता है वही स्वप्न है. चेतना ही वो पूल है जो आतंरिक और बाह्य ब्रम्हांड को जोडता है, मनुष्य की चेतना से सबंधित होने के कारण स्वप्न भी एक धागा है जो की इस कार्य में अपना योगदान करता है.

 यु इसी तथ्य को ध्यान में रख कर हमारे ऋषिमुनि तथा साधको ने इस दिशा में शोध कार्य कर ये निष्कर्ष निकला था की हर एक स्वप्न का अपना ही महत्त्व है तथा ये मात्र द्रश्य न हो कर मनुष्य के लिए संकेत होते है लेकिन इसका कई बार अर्थ स्पष्ट तो कई बार गुढ़ होता है.

 इसी के आधार पर स्वप्नविज्ञान, स्वप्न ज्योतिष, स्वप्न तंत्र आदि स्वतंत्र शाखाओ का निर्माण हुआ. स्वप्न तंत्र के अंतर्गत कई प्रकार की साधना है जिनमे स्वप्नों के माध्यम से कार्यसिद्ध किये जाते है.

इस तंत्र में मुख्य देव स्वप्नेश्वर है तथा देवी स्वप्नेश्वरी. देवी स्वप्नेश्वरी से सबंधित कई इसे प्रयोग है जिससे व्यक्ति स्वप्न में अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त कर सकता है. व्यक्ति के लिए यह एक नितांत आवश्यक प्रयोग है क्यों की जीवन में आने वाले कई प्रश्न ऐसे होते है जो की बहोत ही महत्वपूर्ण होते है लेकिन उसका जवाब नहीं मिलने पर जीवन कष्टमय हो जाता है.

 लेकिन तंत्र में ऐसे विधान है जिससे की स्वप्न के माध्यम से अपने किसी भी प्रकार के प्रश्नों का समाधान प्राप्त हो सकता है. ऐसा ही एक सरल और गोपनीय विधान है देवी स्वप्नेश्वरी के सबंध में. अन्य प्रयोगों की अपेक्षा यह प्रयोग सरल और तीव्र है.

इस साधना को साधक किसी भी सोमवार की रात्रिकाल में ११ बजे के बाद शुरू करे.

साधक के वस्त्र आसान वगेरा सफ़ेद रहे. दिशा उत्तर.
साधक को अपने सामने सफ़ेदवस्त्रों को धारण किये हुए देवी स्वप्नेश्वरी का चित्र या यन्त्र स्थापित करना चाहिए.

 प्रश्न का उतर देने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए. उसके बाद साधक अपने प्रश्न को साफ़ साफ़ अपने मन ही मन ३ बार दोहराए. उसके बाद मंत्र जाप प्रारंभ करे. इस साधना में ११ दिन रोज ११ माला मंत्र जाप करना चाहिए.

 यह मंत्रजाप सफ़ेदहकीक, स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से किया जाना चाहिए.

ॐ स्वप्नेश्वरी स्वप्ने सर्व सत्यं कथय कथय ह्रीं श्रीं ॐ नमः


मन्त्र जाप के बाद साधक फिर से प्रश्न का तिन बार मन ही मन उच्चारण कर जितना जल्द संभव हो सो जाए. निश्चित रूप से साधक को साधना के आखरी दिन या उससे पूर्व भी स्वप्न में अपना उत्तर मिल जाता है और समाधान प्राप्त होता है. जिस दिन उत्तर मिल जाए साधक चाहे तो साधना उसी दिन समाप्त कर सकता है.

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Friday, November 23, 2018

"महाकाल बटुक भैरव" साधना. महर्षि कालाग्नि रूद्र प्रणीत







"महाकाल बटुक भैरव" साधना.  महर्षि कालाग्नि रूद्र


 प्रणीत  

भगवान भैरव को शब्दमय रूप में वर्णित करने का कारण सिर्फ इतना है कि अन्य देव कि अपेक्षा पूरे ब्रहांड में सर्वत्र विद्दमान हैं, जिस प्रकार शब्द को किसी भी प्रकार के बंधन में नहीं बाँधा जा सकता उसी प्रकार भैरव भी किसी भी विघ्न या बाधा को सहन नहीं कर पाते और उसे विध्वंश कर साधक को पूर्ण अभय प्रदान करते हैं, 

उनकी इसी शक्ति को साधक अनेक रूपों वर्णित कर साधनाओं के द्वारा प्राप्त कर अपने जीवन के दुःख और कष्टों से मुक्ति प्राप्त करते हैं, 

वस्तुतः भैरव साधना भगवान शिव कि ही साधना है क्योंकि भैरव तो शिव का ही स्वरुप है उनका ही एक नर्तनशील स्वरुप. भैरव भी शिव की ही तरह अत्यन्त भोले हैं, एक तरफ अत्यधिक प्रचंड स्वरूप जो पल भर में प्रलय ला दे और एक तरफ इतने दयालु की आपने भक्त को सब कुछ दे डाले, 

इसके बाद भी समाज में भैरव के नाम का इतना भय कि नाम सुनकर ही लोग काँप जाते हैं, उससे तंत्र मन्त्र या जादू टोने से जोड़ने लगते हैं,

भैरव की उन अनेक साधनाओं में एक साधना है महर्षि कालाग्नि रूद्र प्रणीत "महाकाल बटुक भैरव" साधना. इस साधना की विशेषता है की ये भगवान् महाकाल भैरव के तीक्ष्ण स्वरुप के बटुक रूप की साधना है जो तीव्रता के साथ साधक को सौम्यता का भी अनुभव कराती है और जीवन के सभी अभाव,प्रकट वा गुप्त शत्रुओं का समूल निवारण करती है.विपन्नता,गुप्त शत्रु,ऋण,मनोकामना पूर्ती और भगवान् भैरव की कृपा प्राप्ति,इस १ दिवसीय साधना प्रयोग से संभव है. 

बहुधा हम प्रयोग की तीव्रता को तब तक नहीं समझ पाते हैं जब तक की स्वयं उसे संपन्न ना कर लें,इस प्रयोग को आप करिए और परिणाम बताइयेगा.

   ये प्रयोग रविवार की मध्य रात्रि को संपन्न करना होता है.स्नान आदि कृत्य से निवृत्त्य होकर पीले वस्त्र धारण कर दक्षिण मुख होकर बैठ जाएँ. गुरुदेव और भगवान् गणपति का पंचोपचार पूजन और मंत्र का सामर्थ्यानुसार जप कर लें तत्पश्चात सामने बाजोट पर पीला वस्त्र बिछा लें,जिस के ऊपर काजल और कुमकुम मिश्रित कर ऊपर चित्र में दिया यन्त्र बनाना है और यन्त्र के मध्य में काले तिलों की ढेरी बनाकर चौमुहा दीपक प्रज्वलित कर उसका पंचोपचार पूजन करना है,पूजन में नैवेद्य उड़द के बड़े और दही का अर्पित करना है .पुष्प गेंदे के या रक्त वर्णीय हो तो बेहतर है.अब अपनी मनोकामना पूर्ती का संकल्प लें.और उसके बाद विनियोग करें.


अस्य महाकाल वटुक भैरव मंत्रस्य कालाग्नि रूद्र ऋषिः अनुष्टुप छंद आपदुद्धारक देव बटुकेश्वर देवता ह्रीं बीजं भैरवी वल्लभ शक्तिः दण्डपाणि कीलक सर्वाभीष्ट प्राप्तयर्थे समस्तापन्निवाराणार्थे जपे विनियोगः  
इसके बाद न्यास क्रम को संपन्न करें.

ऋष्यादिन्यास –


कालाग्नि रूद्र ऋषये नमः शिरसि
अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे
आपदुद्धारक देव बटुकेश्वर देवताये नमः हृदये
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये
भैरवी वल्लभ शक्तये नमः पादयो
सर्वाभीष्ट प्राप्तयर्थे समस्तापन्निवाराणार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे

करन्यास -


 ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
 ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
 ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः
 ह्रैं  अनामिकाभ्यां नमः
 ह्रौं  कनिष्टकाभ्यां नमः
 ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

अङ्गन्यास-  


ह्रां हृदयाय नमः
ह्रीं शिरसे स्वाहा
ह्रूं शिखायै वषट्
ह्रैं कवचाय हूम
ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्
ह्रः अस्त्राय फट्

अब हाथ में कुमकुम मिश्रित अक्षत लेकर निम्न मंत्र का ११ बार उच्चारण करते हुए ध्यान करें और उन अक्षतों को दीप के समक्ष अर्पित कर दें.

नील जीमूत संकाशो जटिलो रक्त लोचनः 
दंष्ट्रा कराल वदन: सर्प यज्ञोपवीतवान |

दंष्ट्रायुधालंकृतश्च कपाल स्रग विभूषितः 
हस्त न्यस्त किरीटीको भस्म भूषित विग्रह: ||

इसके बाद निम्न मूल मंत्र की रुद्राक्ष,मूंगा या काले हकीक माला से ११ माला जप करें 

ॐ ह्रीं वटुकाय क्ष्रौं क्ष्रौं आपदुद्धारणाय कुरु कुरु वटुकाय ह्रीं वटुकाय स्वाहा ||


Om hreeng vatukaay kshroum kshroum aapduddhaarnaay kuru kuru vatukaay hreeng vatukaay swaha ||


 प्रयोग समाप्त होने पर दूसरे  दिन आप नैवेद्य,पीला कपडा और दीपक को किसी सुनसान जगह पर रख दें और उसके चारो और लोटे से पानी का गोल घेरा बनाकर और प्रणाम कर वापस लौट जाएँ तथा मुड़कर ना देखें.

  ये प्रयोग अनुभूत है,आपको क्या अनुभव होंगे ये आप खुद बताइयेगा,मैंने उसे यहाँ नहीं लिखा है. तत्व विशेष के कारण हर व्यक्ति का नुभव दूसरे  से प्रथक होता है. सदगुरुदेव आपको सफलता दें और आप इन प्रयोगों की महत्ता समझ कर गिडगिडाहट भरा जीवन छोड़कर अपना सर्वस्व पायें यही कामना मैं करत हूँ.

दक्षिणा शुल्क 1500 रू +डाक व्यय


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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मोबाइल नं. : - 09958417249'

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श्मशान काली सिद्धि दिवस






श्मशान काली सिद्धि दिवस


श्मशान काली सिद्धि को सभी वर्ग के साधक अत्यंत श्रेष्ठ मुहूर्त मानते है,येसे पावन पर्व पे अगर श्मशान काली साधना किया जाये तो यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात होगी.........

इसी दिवस पर श्रेष्ठ साधक सुरक्षा कवच का निर्माण करते है जो उन्हे वर्ष तक सहाय्यक होता है,परंतु आज हम बात करेगे श्मशान काली जी का जिनका रूप अत्यंत भव्य है जिसका कोई स्तुति नहीं कर सकता है,परम पूजनीय आदिगुरु शंकराचार्य जी ने श्मशान काली जी की स्तुति पूर्ण चैतन्ययुक्त शब्दो मे कियी है जिसका नाम है “काली श्मशानालयवासिनीम स्तोत्र”मे किया है,इस स्तोत्र का पाठ करने से माँ भक्तो को जहा दर्शन देती है वही सभी समस्याओ से मुक्त भी करती है............

मेरा नम्र निवेदन है आपसे इस स्तोत्र को आप प्राप्त कीजिये और कम से कम रोज एक पाठ इस दिवस से शुरू करते हुये एक वर्ष तक कीजिये तो आपको तंत्र शक्ति प्राप्त होगा जिसके माध्यम से आप गुरुकार्य कर सकते हो और अपना साधनात्मक कद भी आगे बढ़ा सकते हो...........

इसी विषय को समजते हुये तंत्र के महान साधकोने श्मशान काली साधना करके अपने जीवन को बाधामुक्त,भयमुक्त एवं दोषमुक्त बनाया जिसके बाद उन्हे प्रत्येक साधना मे निच्छित सफलता मिला,यह कोई आम बात नहीं येसे तांत्रिको को हमे सदैव धन्यवाद करना चाहिये जिन्होने श्मशान तंत्र को भी जीवित रखा नहीं तो आज हम लोग येसे मंत्र प्राप्त नहीं कर पाते॰

आज यहा मै सौम्य श्मशान काली साधना दे रहा जिसके माध्यम से बहोत सारे भौतिक और आध्यात्मिक सफलताये प्राप्त होती है,इस साधना से हर समस्या का समाधान प्राप्त होता है इसीलिये मुजे लगता है के ज्यादा कुछ लिखने का आवश्यकता नहीं है...........

विनियोग:-


        अस्य श्मशानकाली मंत्रस्य भृगुऋषी: । त्रिवृच्छन्द: । श्मशानकाली देवता । ऐं बीजम । ह्रीं शक्ति: । क्लीं किलकम । मम सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोग: ।

ध्यान:-


                   अन्जनाद्रिनिभां देवी श्मशानालय वासीनीं ।
                   रक्तनेत्रां मुक्तकेशीं शुष्कमांसातिभैरवां ॥
                   पिंगलाक्षीं वामहस्तेन मद्दपूर्णा समांसकाम ।
                   सद्द: कृ तं शिरो दक्ष हस्तेनदधतीं शिवाम ॥
                   स्मितवक्त्रां सदा चाम मांसचर्वणतत्पराम ।
                   नानालंकार भूशांगीनग्नाम मत्तां सदा शवै: ॥
  
 माँ को हृदय मे स्थापित करना है इसलिये यहा सिर्फ हृदयादि षडंगन्यास दे रहा हु

 हृदयादि षडंगन्यास:-


                      ऐं हृदयाय नम: ।
                      ह्रीं शिरसे स्वाहा: ।
                      श्रीं शिखायै वषट ।
                      क्लीं कवचाय हुं ।
                      कालिके नेत्रत्रयाय वौषट ।
                      ऐं श्रीं क्लीं कालिके ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं अस्त्राय फट ।
                             इति हृदयादि षडंगन्यास: ॥

मंत्र:-


          ॥ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॥

Aim hreem shreem  kleem kaalike kleem shreem  hreem aim


यह साधना 3 दिन का है और इसमे रुद्राक्ष माला से 11 माला मंत्र जाप करना आवश्यक है,तीसरे दिन साधना समाप्ती के बाद हवन मे काले तिल से 374 बार मंत्र मे स्वाहा लगाकर आहूती दीजिये मंत्र इस प्रकार होगा 

“ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं स्वाहा”,


आहुती के बाद नींबू का बलि देना है और नींबू का थोड़ा सा रस हवनकुंड मे निचौड दीजिये,समय रात्री मे 10 बजे के बाद,दिशा दक्षिण,आसन-वस्त्र लाल/काले,भोग मे तिल और गुड के लड्डू जो मार्केट मे आसानी से मिलते है परंतु प्रयत्न कीजिये घर पर लड्डू बनाने का,महाकाली जी के चित्र पर रोज लाल रंग का पुष्प चढ़ाना मत भूलीयेगा॰

यह साधना विधि पूर्ण प्रामाणिक है और शीघ्र फलदायी भी है...............इस साधना का असर साधक को एक वर्ष तक प्राप्त होता रहता है...........

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...