Saturday, April 1, 2017

अष्ट यक्षिणी साधना

बहुत से लोग यक्षिणी का नाम सुनते ही डर जाते हैं कि ये बहुत भयानक होती हैं, किसी चुडैल कि तरह, किसी प्रेतानी कि तरह, मगर ये सब मन के वहम हैं। यक्षिणी साधक के समक्ष एक बहुत ही सौम्य और सुन्दर स्त्री के रूप में प्रस्तुत होती है।

देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर स्वयं भी यक्ष जाती के ही हैं। यक्षिणी साधना का साधना के क्षेत्र में एक निश्चित अर्थ है। यक्षिणी प्रेमिका मात्र ही होती है, भोग्या नहीं, और यूं भी कोई स्त्री भोग कि भावभूमि तो हो ही नहीं सकती, वह तो सही अर्थों में सौन्दर्य बोध, प्रेम को जाग्रत करने कि भावभूमि होती है।

यद्यपि मन का प्रस्फुटन भी दैहिक सौन्दर्य से होता है किन्तु आगे चलकर वह भी भावनात्मक रूप में परिवर्तित होता है या हो जाना चाहिए और भावना का सबसे श्रेष्ठ प्रस्फुटन तो स्त्री के रूप में सहगामिनी बना कर एक लौकिक स्त्री के सन्दर्भ में सत्य है तो क्यों नहीं यक्षिणी के संदर्भ में सत्य होगी? वह तो प्रायः कई अर्थों में एक सामान्य स्त्री से श्रेष्ठ स्त्री होती है।

तंत्र विज्ञान के रहस्य को यदि साधक पूर्ण रूप से आत्मसात कर लेता है, तो फिर उसके सामाजिक या भौतिक समस्या या बाधा जैसी कोई वस्तु स्थिर नहीं रह पाती। तंत्र विज्ञान का आधार ही है, कि पूर्ण रूप से अपने साधक के जीवन से सम्बन्धित बाधाओं को समाप्त कर एकाग्रता पूर्वक उसे तंत्र के क्षेत्र में बढ़ने के लिए अग्रसर करे।

साधक सरलतापूर्वक तंत्र कि व्याख्या को समझ सके, इस हेतु तंत्र में अनेक ग्रंथ प्राप्त होते हैं, जिनमे अत्यन्त गुह्य और दुर्लभ साधानाएं वर्णित है। साधक यदि गुरु कृपा प्राप्त कर किसी एक तंत्र का भी पूर्ण रूप से अध्ययन कर लेता है, तो उसके लिए पहाड़ जैसी समस्या से भी टकराना अत्यन्त लघु क्रिया जैसा प्रतीत होने लगता है।

साधक में यदि गुरु के प्रति विश्वास न हो, यदि उसमे जोश न हो, उत्साह न हो, तो फिर वह साधनाओं में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। साधक तो समस्त सांसारिक क्रियायें करता हुआ भी निर्लिप्त भाव से अपने इष्ट चिन्तन में प्रवृत्त रहता है।

ऐसे ही साधकों के लिए 'उड़ामरेश्वर तंत्र' मे एक अत्यन्त उच्चकोटि कि साधना वर्णित है, जिसे संपन्न करके वह अपनी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकता है तथा अपने जीवन में पूर्ण भौतिक सुख-सम्पदा का पूर्ण आनन्द प्राप्त कर सकता है।

'अष्ट यक्षिणी साधना' के नाम से वर्णित यह साधना प्रमुख रूप से यक्ष की श्रेष्ठ रमणियों, जो साधक के जीवन में सम्पूर्णता का उदबोध कराती हैं, की ये है।

ये प्रमुख यक्षिणियां है -

1. सुर सुन्दरी यक्षिणी २. मनोहारिणी यक्षिणी 3. कनकावती यक्षिणी 4. कामेश्वरी यक्षिणी
5. रतिप्रिया यक्षिणी 6. पद्मिनी यक्षिणी 6. नटी यक्षिणी 8. अनुरागिणी यक्षिणी

प्रत्येक यक्षिणी साधक को अलग-अलग प्रकार से सहयोगिनी होती है, अतः साधक को चाहिए कि वह आठों यक्षिणियों को ही सिद्ध कर लें।

सुर सुन्दरी यक्षिणी

यह सुडौल देहयष्टि, आकर्षक चेहरा, दिव्य आभा लिये हुए, नाजुकता से भरी हुई है। देव योनी के समान सुन्दर होने से कारण इसे सुर सुन्दरी यक्षिणी कहा गया है। सुर सुन्दरी कि विशेषता है, कि साधक उसे जिस रूप में पाना चाहता हैं, वह प्राप्त होता ही है - चाहे वह माँ का स्वरूप हो, चाहे वह बहन का या पत्नी का, या प्रेमिका का। यह यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक को ऐश्वर्य, धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है।

मनोहारिणी यक्षिणी

अण्डाकार चेहरा, हरिण के समान नेत्र, गौर वर्णीय, चंदन कि सुगंध से आपूरित मनोहारिणी यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहन बना देती है, कि वह कोई भी, चाहे वह पुरूष हो या स्त्री, उसके सम्मोहन पाश में बंध ही जाता है। वह साधक को धन आदि प्रदान कर उसे संतुष्ट कराती है।

कनकावती यक्षिणी

रक्त वस्त्र धारण कि हुई, मुग्ध करने वाली और अनिन्द्य सौन्दर्य कि स्वामिनी, षोडश वर्षीया, बाला स्वरूपा कनकावती यक्षिणी है। कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने के पश्चात साधक में तेजस्विता तथा प्रखरता आ जाती है, फिर वह विरोधी को भी मोहित करने कि क्षमता प्राप्त कर लेता है। यह साधक की प्रत्येक मनोकामना को पूर्ण करने मे सहायक होती है।

कामेश्वरी यक्षिणी

सदैव चंचल रहने वाली, उद्दाम यौवन युक्त, जिससे मादकता छलकती हुई बिम्बित होती है। साधक का हर क्षण मनोरंजन करती है कामेश्वरी यक्षिणी। यह साधक को पौरुष प्रदान करती है तथा पत्नी सुख कि कामना करने पर पूर्ण पत्निवत रूप में साधक कि कामना करती है। साधक को जब भी द्रव्य कि आवश्यकता होती है, वह तत्क्षण उपलब्ध कराने में सहायक होती है।

रति प्रिया यक्षिणी

स्वर्ण के समान देह से युक्त, सभी मंगल आभूषणों से सुसज्जित, प्रफुल्लता प्रदान करने वाली है रति प्रिया यक्षिणी। रति प्रिया यक्षिणी साधक को हर क्षण प्रफुल्लित रखती है तथा उसे दृढ़ता भी प्रदान करती है। साधक और साधिका यदि संयमित होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य कि उपलब्धि होती है।

पदमिनी यक्षिणी

कमल के समान कोमल, श्यामवर्णा, उन्नत स्तन, अधरों पर सदैव मुस्कान खेलती रहती है, तथा इसके नेत्र अत्यधिक सुन्दर है। पद्मिनी यक्षिणी साधना साधक को अपना सान्निध्य नित्य प्रदान करती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यह अपने साधक में आत्मविश्वास व स्थिरता प्रदान कराती है तथा सदैव उसे मानसिक बल प्रदान करती हुई उन्नति कि और अग्रसर करती है।

नटी यक्षिणी

नटी यक्षिणी को 'विश्वामित्र' ने भी सिद्ध किया था। यह अपने साधक कि पूर्ण रूप से सुरक्षा करती है तथा किसी भी प्रकार कि विपरीत परिस्थितियों में साधक को सरलता पूर्वक निष्कलंक बचाती है।

अनुरागिणी यक्षिणी

अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है। साधक पर प्रसन्न होने पर उसे नित्य धन, मान, यश आदि प्रदान करती है तथा साधक की इच्छा होने पर उसके साथ उल्लास करती है।

साधना विधान

इस साधना में आवश्यक सामग्री है -

८ अष्टाक्ष गुटिकाएं

अष्ट यक्षिणी सिद्ध यंत्र

'यक्षिणी माला

'। साधक यह साधना किसी भी शुक्रवार को प्रारम्भ कर सकता है। यह तीन दिन की साधना है। लकड़ी के बजोट पर सफेद वस्त्र बिछायें तथा उस पर कुंकुम से निम्न यंत्र बनाएं।

फिर उपरोक्त प्रकार से रेखांकित यंत्र में जहां 'ह्रीं' बीज अंकित है वहां एक-एक अष्टाक्ष गुटिका स्थापित करें। फिर अष्ट यक्षिणी का ध्यान कर प्रत्येक गुटिका का पूजन कुंकूम, पुष्प तथा अक्षत से करें।

धुप तथा दीप लगाएं। फिर यक्षिणी से निम्न मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमानुसार दिए गए हुए आठों यक्षिणियों के मंत्रों की एक-एक माला जप करें।

 प्रत्येक यक्षिणी मंत्र की एक माला जप करने से पूर्व तथा बाद में मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें। उदाहरणार्थ पहले मूल मंत्र की एक माला जप करें, फिर सुर-सुन्दरी यक्षिणी मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमशः प्रत्येक यक्षिणी से सम्बन्धित मंत्र का जप करना है। ऐसा तीन दिन तक नित्य करें।

मूल अष्ट यक्षिणी मंत्र

॥ ॐ ऐं श्रीं अष्ट यक्षिणी सिद्धिं सिद्धिं देहि नमः ॥

सुर सुन्दरी मंत्र

॥ ॐ ऐं ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा ॥

मनोहारिणी मंत्र

॥ ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहारी स्वाहा ॥

कनकावती मंत्र

॥ ॐ ह्रीं हूं रक्ष कर्मणि आगच्छ कनकावती स्वाहा ॥

कामेश्वरी मंत्र॥

 ॐ क्रीं कामेश्वरी वश्य प्रियाय क्रीं ॐ ॥

रति प्रिया मंत्र॥

 ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ रति प्रिया स्वाहा ॥

पद्मिनी मंत्र॥

 ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ पद्मिनी स्वाहा ॥

नटी मंत्र॥

 ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ नटी स्वाहा ॥

अनुरागिणी मंत्र॥

ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥

मंत्र जप समाप्ति पर साधक साधना कक्ष में ही सोयें। अगले दिन पुनः इसी प्रकार से साधना संपन्न करें, तीसरे दिन साधना साधना सामग्री को जिस वस्त्र पर यंत्र बनाया है, उसी में बांध कर नदी में प्रवाहित कर दें।

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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“उर्वशी-यन्त्र” साधना

वशीकरण, सम्मोहन व आकर्षण हेतु

इस यन्त्र को चमेली की लकड़ी की कलम से, भोजपत्र पर कुंकुम या कस्तुरी की स्याही से निर्माण करे।इस यन्त्र की साधना पूर्णिमा की रात्री से करें।

रात्री में स्नानादि से पवित्र होकर एकान्त कमरे में आम की लकड़ी के पट्टे पर सफेद वस्त्र बिछावें, स्वयं भी सफेद वस्त्र धारण करें, सफेद आसन पर ही यन्त्र निर्माण व पूजन करने हेतु बैठें। पट्टे पर यन्त्र रखकर धूप-दीपादि से पूजन करें। सफेद पुष्प चढ़ाये। फिर पाँच माला

“ॐ सं सौन्दर्योत्तमायै नमः।”

नित्य पाँच रात्रि करें। पांचवे दिन रात्री में एक माला देशी घी व सफेद चन्दन के चूरे से हवन करें। हवन में आम की लकड़ी व चमेली की लकड़ी का प्रयोग करें।

राज गुरु जी

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Friday, March 31, 2017

भुताकर्षण गोलक निर्माण विधि

सामग्री: पीपल के निचे की मिट्टी,लाल चन्दन,सिंदूर,काले तील,गुलाबजल और सादा जल।

विधि:

 निर्माण आपको अमावस्या की रात्रि में करना है. समय रात्रि दस बजे के बाद हो,दिशा दक्षिण हो ,आसन वस्त्र लाल या काले हो. अपने सामने एक पात्र में मिटटी रखे और और उसमे लाल चन्दन मिलाये,याद रखे मिटटी में कंकर न हो इसलिये उसे पहले ही सुखाकर छान कर रखे.

 अब गुलाब जल और सादा जल मिलाये।यह सब प्रक्रिया करते वक़्त" भ्रं भ्रं भूतेश्वराय " का जाप करते रहे.जब सारी सामग्री मिल जाए ,तब उसका एक गोला बना ले लड्डू की तरह।और उसे सुखा ले.जब वो सुख जाये तो उस पर सिंदूर का लेप कर दे.

अब किसी भी शनिवार की रात्रि में सामने लाल वस्त्र बिछा कर,उसपर ताम्र पात्र स्थापित करे. और उसमे सिंदूर या शमशान भस्म से बीज मंत्र ' हूं ' लिखे. और उस पर गोलक को स्थापित करे. और उसका सामान्य पूजन करे.

 भोग में गुड रखे. अब निरंतर बिना किसी माला के, मंत्र जाप करते जाये और काले तील गोलक पर अर्पण करते जाये।याद रखे इसमें तील के तेल का दीपक जलता रहे जब तक क्रिया पूर्ण न हो जाये .

अगर कोई अनुभव हो तो डरे नहि. सदगुरुदेव रक्षक है तो कैसा डर ?अगले दिन गोलक को संभाल कर रख ले.

 जब भी आप भूत साधना करे इसे सामने रखे और इसका पूजन कर मंत्र का एक सौ आठ बार जाप करे और साधना शुरू करे. लाल कपडा ,तील, भोग का गुड सभी को शमशान में फेक दे.

ताम्र पात्र को धो ले उसे उपयोग किया जा सकता है.एक बात और याद रखे आपको जिस दिन भी भूत साधना में सफलता मिल जाएगी,ये गोलक उसी वक़्त तेज हिन हो जायेगा,तब इसे अपने पास न रखे इसे भी शमशान में फेक दे कुछ दक्षिणा के साथ।जब तक सफलता न मिले इसका उपयोग किया जा सकता है. उसके बाद नहीं।जय माँ

मंत्र:

 ॐ हूं भ्रं भ्रं भ्रं भूतेश्वराय भूताकर्षण कुरु कुरु भ्रं भ्रं भ्रं हूं फट

राज गुरु जी

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Tuesday, March 28, 2017

सम्मोहन काजल निर्माण विधि-

यह प्रयोग दिवाली की रात्रि को करे। रात्रि 9 बजे के माँ के सामने एक घी का दीपक जलाये और उसकी लो को देकते हुए निम्न मंत्र की 11 माला रुद्राक्ष माला से करे।

 11 माला हो जाने के बाद उस दीपक पर एक कटोरी को इस तरह सेट कर दे की सारा काजल उस कटोरी में आ जाये। याद रखे ये दीपक रात्रि 9 से सुबह 4 बजे तक जलना चाहिए।

फिर सुबह सरे काजल को किसी शीशी में रख ले। और जब भी आपको सम्मोहन करना हो तब मंत्र का 11 बार जाप करके काजल को आँख में लगा ले। इस काजल से सभी आपके अनुकूल हो जायेंगे।

यहाँ तक जब आप कोई देवी देवता की साधना करे तब भी आप इसे आँखों में लगा ले ये दिव्या काजल उन्हें भी आपकी और आकर्षित करेगा। नोकरी के इंटरव्यू में जाना हो तब भी लगा सकते है।

रोज़ चाहे तो रोज़ लगाये इससे हर मिलने वाला व्यक्ति आपके अनुकूल हो जायेगा। मात्र एक दिवस का प्रयोग आपके लिए अत्यंत ही लाभकारी होगा।

मेरा अनुभूत है ये प्रयोग,ये काजल खासकर अप्सरा साधना में बहुत अच्छे परिणाम देता है।ऐसा कई साधको का अनुभव रहा है।अतः आप भी इससे लाभान्वित हो

मंत्र:

||ॐ ह्री सर्व सम्मोहिनी स्वाहा ||

||om hreem sarva sammohini swahaa||

राज गुरु जी

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Monday, March 27, 2017

विजय प्राप्ति बगलामुखी साधना (न्यायालय में विजय प्राप्ति हेतु )

अक्सर विरोधी हमें कोर्ट के चक्कर में उलझा देते है।अकारण ही हम उसमे इतना उलझते जाते है की,सम्पूर्ण जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है।और हम चाहकर भी उस परेशानी से निकल नहीं पाते है।

तब आवश्यकता है की हम साधना कर जगदम्बा से सहायता प्राप्त करे।माँ पीताम्बरा अत्यंत करुणामयी है। आप अपनी प्यारी माँ से सहायता मांगे और माँ आप पर कृपा न करे ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता है।

प्रस्तुत साधना इसी विषय पर है,जिसे संपन्न करने पर मुक़दमे से सम्बंधित परेशानियों में शीघ्र ही लाभ मिलता है।जिस पर भी केस चल रहा हो वो इस प्रयोग को कर सकता है अन्यथा उस व्यक्ति के लिये संकल्प लेकर कोई भी इसे कर सकता है।

साधना किसी भी रविवार रात्रि १० के बाद आरम्भ करे,आसन वस्त्र पीले हो,दिशा उत्तर या पूर्व हो।सामने बजोट पर पिला वस्त्र बिछा दे,और उस पर बगलामुखी यन्त्र या चित्र स्थापित करे।

अब भोज पत्र पर हल्दी की स्याही से बीज मंत्र

" ह्लीं "

लिखे और उसे यन्त्र के सामने रख दे।अब सरसों के तेल का दीपक जलाये और यन्त्र तथा भोज पत्र का सामान्य पूजन करे।भोग में कोई पिली वस्तु अर्पण करे जिसे केस वाले व्यक्ति को नित्य खा लेना है।

अब निम्न मंत्र पड़ते हुए एक चुटकी हल्दी यन्त्र तथा भोज पत्र पर अर्पण करे।इसी प्रकार हर मंत्र को ३६ बार पड़ना है और हल्दी अर्पण करना है।याद रखे एक मंत्र को ३६ बार पड़े और एक चुटकी हल्दी अर्पण करे।

ॐ बगलामुखी देव्ययी नमः

ॐ पीताम्बरा देव्ययी नमः

ॐ पीतवर्णा देव्ययी नमः

ॐ सर्व स्तंभिनी देव्ययी नमः

ॐ सर्व शत्रु नाशिनी देव्ययी नमः

ॐ सर्व उपद्रव नाशिनी देव्ययी नमः

ॐ सर्व रक्षिणी बगला देव्ययी नम:

इसके बाद निम्न मंत्र की हल्दी माला पिली हकिक माला या रुद्राक्ष माला से ११ माला जाप करे।इस प्रकार साधना नित्य ११ दिनों तक करे।

संकल्प अवश्य ले की आप ये साधना क्यों कर रहे है।साधना के बाद भोज पत्र को किसी तावीज़ में धारण कर ले।

जो हल्दी का चूर्ण नित्य अर्पण किया था उसे एकत्र करके रख ले और मस्तक पर लगाये माँ आपको अपनी गोद में उठाकर बचा लेगी।बस माँ के समक्ष करुण पुकार करना न भूले।

मंत्र:

 ॐ हूं ह्लीं हूं फट

 ( OM HOOM HLEEM HOOM PHAT)

जय पीताम्बरा

राज गुरु जी

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Friday, March 24, 2017

!! प्रचंड वीरभद्र साधना !!

हम चाहे कितना भी सावधानी से जीवन व्यतीत करे.किन्तु जाने अनजाने हमारे शत्रु बन ही जाते है.इसका कोई भी कारण हो सकता है.परन्तु शत्रुता कैसी भी हो वो कष्ट का कारण बनती ही है.

शत्रु के कारण सतत मानसिक,तथा आर्थिक कष्ट का अनुभव होता रहता है.

तो क्या हम शत्रु से हार मान  ले ?

नहीं कदापि नहीं 

जो हार मान  जाये वो साधक नहीं हो सकता।साधक तो पाषाण को तोड़कर जलधार प्रगट करने की क्षमता रखता है.

शत्रु आपको विचलित कर सकता है किन्तु परास्त नहीं।क्युकी आपके पास साधना की शक्ति है.इस विषय पर आपके समक्ष वीरभद्र साधना प्रस्तुत है.

इस साधना के माध्यम से आप शत्रु के हर षड़यंत्र को विफल कर सकते है.साथ ही उसे स्वयं से दूर जाने पर विवश कर सकते है.

प्रस्तुत साधना से केवल आप शत्रु पर विजय प्राप्त करे,किसी का अनर्थ करने की चेष्टा न करे अन्यथा प्रयोग की तीव्रता से आपका अनिष्ट हो सकता है.अतः संकल्प केवल विजय प्राप्ति का हो इसके सिवा और कोई नहीं।

साधना आप किसी भी रविवार या अमावस्या की रात्रि ११ के बाद आरम्भ कर सकते है.आपका मुख दक्षिण की और हो.अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर शिवलिंग स्थापित करे.

वीरभद्र शिव का ही रौद्र रूप है अतः आपको किसी अन्य विग्रह आदि की आवश्यकता नहीं है.आपके आसन वस्त्र लाल होना आवश्यक है। भगवान  शिव का सामान्य पूजन करे.तील के तेल का दीपक लगाये।तथा भोग में कोई भी मिठाई अर्पण करे.

भगवान  शिव के समक्ष प्रार्थना करे वे वीरभद्र रूप धारण कर हमारे जीवन से शत्रु का नाश करे तथा उसे पराजित करे.इसके बाद वीरभद्र मंत्र की २१ माला जाप रुद्राक्ष माला से करे.

मंत्र में जहा अमुक आया है वहा  शत्रु का नाम ले। जाप के बाद पूर्ण ह्रदय से प्रार्थना करे तथा प्रसाद स्वयं ग्रहण करे.यह क्रम तीन दिनों तक अवश्य करे.

अंतिम दिन अग्नि प्रज्वलित कर घी तथा काली  मिर्च को मिलाकर  १०८ आहुति प्रदान करे.बाद में यज्ञ की भस्म को जल प्रवाह कर दे,थोड़ी सी भस्म संभाल  कर रख ले,और शत्रु के द्वार पर मंत्र पड़कर भस्म फेक आये.

अगर ये संभव न हो तो उसके घर की और मुख करके भस्म फुक मारकर मंत्र पडत हुए उड़ा  दे.इस प्रकार ये साधना पूर्ण होती है,तथा साधक को शत्रु से मुक्ति प्रदान कर सुखी करती है.

मंत्र : ॐ ह्रौं हूं वीरभद्राय अमुक शत्रु नाशय नाशय हूं ह्रौं फट 

OM HROUM HOOM VEERBHADRAAY AMUK SHATRU NAASHAY NAASHAY HOOM HROUM PHAT

माँ आप  सबका कल्याण करे तथा आप सभी को साधना में सफलता प्रदान करे,इसी कामना के साथ 

राज गुरु जी

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Thursday, March 23, 2017

शिव शक्ति महाअघोर कवच

और लघु प्रयोग

मित्रो जिन साधको ने " शिव शक्ति महाअघोर कवच " मंगवाए थे,कवच निर्मित होते ही उन्हें कवच भेजने कि क्रिया आरम्भ कर दी जायेगी।

आपको कवच प्राप्ति के बाद साधना के लिए अधिक प्रतीक्षा न करना पड़े इसलिए यहाँ महाअघोर कवच पर किये जाने वाले कुछ लघु प्रयोग दिए जा रहे है,ताकि आप कवच प्राप्त होते ही उस पर प्रयोग कर सके.अतः आपकी सेवा में कुछ लघु प्रयोग प्रस्तुत है.

१ निरंतर धन लाभ हेतु

आप ये प्रयोग अपनी नित्य पूजा में सम्मिलित कर सकते है.अपने सामने " शिव शक्ति महाअघोर कवच " को स्थापित करे और आपको कवच के साथ जो " सिद्धिप्रद रुद्राक्ष " दिया जा रहा है.उस रुद्राक्ष को कवच के ऊपर रखे या कवच के पास उससे सटाकर रख दे रुद्राक्ष इस प्रकार रखे कि वो कवच से स्पर्श होता रहे.अब सिद्धिप्रद रुद्राक्ष पर त्राटक करते हुए,

हूंहूं धनलक्ष्मी आकर्षय आकर्षय हूंहूं

मंत्र का जाप करे त्राटक आपको नित्य ५ मिनट  तक करना है,या आप रुद्राक्ष माला से जाप करते हुए एक माला करे और त्राटक करते रहे.इस प्रयोग से आपके जीवन में कभी भी धन कि रूकावट नहीं आएगी।

२  तंत्र बाधा निवारण

किसी भी समय ये प्रयोग किया जा सकता है.अपने बाये हाथ में कवच और रुद्राक्ष को रखकर मुट्ठी बांध ले.मुट्ठी जितनी हो सके कसकर बांधे।और अपने सामने एक पात्र में थोडा जल रखे.अब रुद्राक्ष माला से

रं रं हूं हूं फट

५ माला जाप करे.इसके बाद जल में फुक मार दे और कवच तथा रुद्राक्ष को पात्र से स्पर्श कराते  हुए ११ बार पुनः उपरोक्त मंत्र का जाप करे.फिर ये जल जिसे पिलाया जायेगा उस पर किया गया तंत्र प्रयोग तुरंत नष्ट हो जायेगा।आप इस जल को घर में भी छिट सकते है इससे घर नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित हो जायेगा।

३ बुरे सपनो के नाश हेतु

बाये हाथ में कवच और एक सुपारी रखे और दाये हाथ से ह्रदय मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए. " ॐ हूं वज्रेश्वर हूं " मंत्र का २१ बार जाप करे.इसके बाद इस सुपारी को जिसे बुरे स्वप्न  आते हो उसके तकिये के निचे रात  को सोते समय रख दे.और अगले दिन इस सुपारी को घर के बाहर फिकवा दे.समस्या का निवारण हो जायेगा।

४ उदर रोग नाश हेतु

किसी लाल वस्त्र पर एक पात्र स्थापित करे और उसे भस्म से भर दे.इस भस्म पर कवच स्थापित कर दे.और बाये हाथ में सिद्धिप्रद रुद्राक्ष रखे,अब

" ॐ ह्रीं शूलधारिणी ह्रीं फट "

मंत्र का रुद्राक्ष माला से २१ माला जाप करे प्रत्येक माला के बाद रुद्राक्ष को कवच से स्पर्श कराये।जब जाप पूर्ण हो जाये रुद्राक्ष और कवच संभाल  कर रख दे.और भस्म जिसे उदर रोग हो उसे नित्य एक चुटकी  सेवन कराये तथा कुछ भस्म पेट पर भी लगाये धीरे धीरे उदर रोग समाप्त होने लगेगा।

५ विपदा नाश हेतु

कभी कभी जीवन में एक के बाद एक विपदा आती रहती है.ऐसी समस्या के निवारण हेतु रविवार रात्रि १० के बाद कवच को लाल वस्त्र पर स्थापित करे.कवच का सामान्य  पूजन करे.और ११ माला रुद्राक्ष माला से

" ॐ हूं ह्लीं हूं फट "

 मंत्र कि ११ माला संपन्न करे.जाप के बाद अग्नि प्रज्वलित कर,सरसो के तेल और काली मिर्च से २५१ आहुति प्रदान करे.

इन प्रयोगो में सभी जाप वाचिक या उपांशु होंगे।मित्रो भविष्य में भी कई प्रयोग समय समय पर दिए जायेंगे।साधनाओ से सम्बंधित किसी भी प्रश्न के उत्तर हेतु आप सादर आमंत्रित है.

राज गुरु जी

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...