Sunday, January 24, 2016

धन लाभ व कर्जा मुक्ति






प्यारे मित्रो मैं यहाँ केवल उन्ही मंत्रो के बारे मे लिखता हु जिनका प्रभाव मैने और मेर साथियों ने खुद देखा है।
धन लाभ व कर्जा मुक्ति के लिये आप इस मंत्र का केवाल सुबह के समय 30 मिनट तक जाप करे
और सुख की अनुभूति से अभिभूत हों .
मंत्र ..........
ओम नमो चंडी चंडी महा चंडी काली काली महाकाली
दुर्गे दुर्गे महादुर्गे संकट हरो रक्षा करो मनोकामना पूर्ण करो
जो न करो तो दुहाई गुरु गोरख नाथ की
दुहाई ईश्वर महादेव गोरा पार्वती की
महाबलीभैरव की दुहाई .
बस केवल 15 दिन मे एक बार दुर्गा मन्दिर मे एक नारियल चढावें और 21 दिन मे चमतकर देखें
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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ऋण-हरण श्री गणेश-मन्त्र प्रयोग






यह धन-दायी प्रयोग है। यदि प्रयोग नियमित करना हो तो साधक अपने द्वारा निर्धारित वस्त्र में कर सकता है किन्तु, यदि प्रयोग पर्व विशेष मात्र में करना हो, तो पीले रंग के आसन पर पीले वस्त्र धारण कर पीले रंग की माला या पीले सूत में बनी स्फटिक की माला से करे। भगवान् गणेश की पूजा में ‘दूर्वा-अंकुर’ चढ़ाए। यदि हवन करना हो, तो ‘लाक्षा’ एवं ‘दूर्वा’ से हवन करे। विनियोग, न्यास, ध्यान कर आवाहन और पूजन करे। ‘पूजन’ के पश्चात् ‘कवच’- पाठ कर ‘स्तोत्र’ का पाठ करे।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीऋण-हरण-कर्तृ-गणपति-मन्त्रस्य सदा-शिव ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीऋण-हर्ता गणपति देवता, ग्लौं बीजं, गं शक्तिः, गों कीलकं, मम सकल-ऋण-नाशार्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- सदा-शिव ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे, श्रीऋण-हर्ता गणपति देवतायै नमः हृदि, ग्लौं बीजाय नमः गुह्ये, गं शक्तये नमः पादयो, गों कीलकाय नमः नाभौ, मम सकल-ऋण-नाशार्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।
कर-न्यासः- ॐ गणेश अंगुष्ठाभ्यां नमः, ऋण छिन्धि तर्जनीभ्यां नमः, वरेण्यं मध्यमाभ्यां नमः, हुं अनामिकाभ्यां नमः, नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः, फट् कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
षडंग-न्यासः- ॐ गणेश हृदयाय नमः, ऋण छिन्धि शिरसे स्वाहा, वरेण्यं शिखायै वषट्, हुं कवचाय हुम्, नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्, फट् अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
ॐ सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं, लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम्।
ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं, सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम्।।
‘आवाहन’ आदि कर पञ्चोपचारों से अथवा ‘मानसिक पूजन’ करे।
।।कवच-पाठ।।
ॐ आमोदश्च शिरः पातु, प्रमोदश्च शिखोपरि, सम्मोदो भ्रू-युगे पातु, भ्रू-मध्ये च गणाधीपः।
गण-क्रीडश्चक्षुर्युगं, नासायां गण-नायकः, जिह्वायां सुमुखः पातु, ग्रीवायां दुर्म्मुखः।।
विघ्नेशो हृदये पातु, बाहु-युग्मे सदा मम, विघ्न-कर्त्ता च उदरे, विघ्न-हर्त्ता च लिंगके।
गज-वक्त्रो कटि-देशे, एक-दन्तो नितम्बके, लम्बोदरः सदा पातु, गुह्य-देशे ममारुणः।।
व्याल-यज्ञोपवीती मां, पातु पाद-युगे सदा, जापकः सर्वदा पातु, जानु-जंघे गणाधिपः।
हरिद्राः सर्वदा पातु, सर्वांगे गण-नायकः।।
।।स्तोत्र-पाठ।।
सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक्, पूजितः फल-सिद्धये। सदैव पार्वती-पुत्रः, ऋण-नाशं करोतु मे।।१
त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं-शम्भुना सम्यगर्चितः। हिरण्य-कश्यप्वादीनां, वधार्थे विष्णुनार्चितः।।२
महिषस्य वधे देव्या, गण-नाथः प्रपूजितः। तारकस्य वधात् पूर्वं, कुमारेण प्रपुजितः।।३
भास्करेण गणेशो हि, पूजितश्छवि-सिद्धये। शशिना कान्ति-वृद्धयर्थं, पूजितो गण-नायकः।
पालनाय च तपसां, विश्वामित्रेण पूजितः।।४
।।फल-श्रुति।।
इदं त्वृण-हर-स्तोत्रं, तीव्र-दारिद्र्य-नाशनम्, एक-वारं पठेन्नित्यं, वर्षमेकं समाहितः।
दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा, कुबेर-समतां व्रजेत्।।
मन्त्रः- “ॐ गणेश ! ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट्” (१५ अक्षर)
उक्त मन्त्र का अन्त में कम-से-कम २१ बार ‘जप करे। २१,००० ‘जप’ से इसका ‘पुरश्चरण’ होता है। वर्ष भर‘स्तोत्र’ पढ़ने से दारिद्र्य-नाश होता है तथा लक्ष्मी-प्राप्ति होती है।
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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अद्भुत सरस्स्वती साधना –ज्योतिष में रूचि रखने वालो के लिए ..






ज्योतिष तो वह शास्त्र हैं जिसे दिव्यतम कहा जा सकता हैं और प्राचीन ग्रंथो में इस शास्त्र के पंडितो को .मर्मज्ञों ज्योतिर्विद कहा जाता रहा हैं और यह उचित भी हैं क्योंकि जो आने वाले समय को आपके सामने रख दे पहले से पथ प्रदार्शित कर दे वह एक प्रकाश किरण ही तो हैं जिस भविष्य में अभी पर्दा पड़ा हुआ हैं उसे भी वह अनावृत करने का साहस रखे .. वह हैं ज्ञान ...
और आज परिणाम आपके सामने हैं हजारो की संख्यामे उच्च वर्ग के और पढ़े लिखे वर्ग के लोग भी विज्ञानं के प्रति न केबल दृष्टी कोण बदल रहे हैं बल्कि इसको सीखने के लिए आगे भी आ रहे हैं .
पर यह विज्ञानं चूँकि भविष्य से भी सबंध रखता हैं तो ज्योतिष का एक उच्च आचरण करने वाला हों चाहिए साथ ही साथ उसे कुछ ऐसी साधनों का भी ज्ञान होना चाहिए जो उसके भविष् कथन को बल प्रदान करे ..उसे अपने इष्ट की साधना का भी एक योग्य साधक होना ही चहिये .
एक बात जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैंकि उसे वाक् शक्ति संपन्न होना ही चहिये क्योंकि जो भी कथन उसके मुख से निकले वह निरर्थक न हो और सत्य भी हो .. इसके लिए सस्स्वती साधना से बढकर और क्या होगा ..
पर भगवती सरस्वती के भी अनेको मंत्र हैं और कौन सा मंत्र उसे जयादा खासकर ज्योतिष क्षेत्र में सहयोगी होगा इसका पता कैसे चले ...
हर साधना मंत्र भगवती सस्स्वती का मह्त्वपूर्ण हैं ही क्योंकि उनका ही मंत्र हैं पर यह जो मंत्र आपको दिया जा रहा हैं यह विशेष रूप से ज्योतिष क्षेत्र में काम करने वालो के लिए अद्भुत हैं .
मंत्र :
ओम नमो ब्रह्माणी ब्रह्म पुत्री वद वद वाचा सिद्धिम कुरु कुरु स्वाहा||
साधनात्मक नियम :
ब्रम्ह महूर्त में सरस्स्वती मंत्र का जप मतलब सूर्योदय से दो घंटे पहले का बहुत उपयोगी माना गया हैं .
साधना काल में सफ़ेद वस्त्र और सफ़ेद आसन का ही प्रयोग करे और सफ़ेद हकीक माला से जप कहीं ज्यदा लाभ दायक होगा .
मंत्र जप संख्या १ लाख हैं इसमें दिन निर्धारित नही हैं , किसी भी शुभ महूर्त से मंत्र जप प्रारंभ कर सकते हैं और जब मंत्र जप पूरा हो जाये उसके बाद प्रतिदिन केबल एक माला मन्त्र जप ही पर्याप्त होगा .
यह मंत्र की साधना आपको ज्योतिष क्षेत्र में बहुत प्रवीणता दे सकती हैं अतः इस मंत्र जप को करने में लाभ ही लाभ हैं क्योंकि माँ सरस्वती का क्षेत्र तो बहुत विशाल हैं और उनकी कृपापात्रता मिल जाना कितना न सौभ्ग्दायक होगा .
राजगुरु जी
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महाकाल तंत्र उद्धृत चतुर्भुज तीव्र महाकाल साधना









गोपनीय तंत्र ग्रंथो मे महाकाल तंत्र का नाम प्रसिद्द है. ५० पटलो मे यह ग्रन्थ अपने आप मे अद्भुत है. जिसमे मुख्य रूप से महाकाल से सबंधित साधनाए, देवी साधनाए तथा तंत्र चिकित्सा के ऊपर लिखा गया है. यह ग्रन्थ मे निहित ज्यदातर साधनाए बौद्ध वज्रयान पद्धति पर ही आधारित है. मूल रूप से देखा जाए तो यह पद्धति भारतीय वाममार्ग पद्धति पर आधारित है. लेकिन समयानुसार इसमें परिवर्तन होता गया जो की तिब्बती लामाओ की शोध तथा अनुभवगम्य रहा होगा. भगवान महाकाल जिस प्रकार भारतीय साधना पद्धति मे एक उग्र देव के रूप मे प्रचलित है ठीक उसी प्रकार तिब्बती वज्रयानी साधना मे भी उनका स्थान उतना ही महत्वपूर्ण रहा है. वज्रयान मे महाकाल से सबंधित मंडल को ब्स्कांगग्सो कहा जाता है जिसमे कई उपासक एक साथ महाकाल की साधना मे प्रवृत होते है. लेकिन इस ग्रन्थ मे मंत्र तिब्बती भाषा मे न हो कर संस्कृत मे दिये है जो की इसका मूल आधार भारतीय पद्दति को ही दर्शाता है. खैर, भगवान महाकाल नित्यकल्याणमय है. महाकाल आदि शिव का ही रूप है
और अघोर पंथ मे महाकाल का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है. उग्र देवता की श्रेणी मे होने से इनकी साधनाए महत्तम तीक्ष्ण ही होती है. इस ग्रन्थ मे महाकाल के विविध मंत्रो को दिया गया है. जिसमे से एक रूप हे चतुर्भुज रूप. भगवान महाकाल स्मशानाधिस्थ बेठे है जिनकी चार भुजाए है. यह साधना मूल रूप से साधक मे आत्मिक शक्ति का विकास करती है तथा साधक मे साधना के विषयक मुख्य गुणों का विकास कराती है. जेसे की निर्भयता एवं एकाग्रता. इस चतुर्भुज महाकाल मंत्र को साधक सोमवार की रात्री मे ११.३० के बाद जपना शुरू करे. इससे पहले भगवान महाकाल का चित्र अपने सामने स्थापित करे और पूजन करे. उसके बाद रुद्राक्ष माला से निम्न चतुर्भुज महाकाल मंत्र का २१ माला जाप करे. यह क्रम अगले सोमवार तक जारी रहे. वस्त्र तथा आसान काले रंग का हो. दिशा उत्तर रहे.
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं फट स्वाहा
इस मंत्र के प्रभाव से साधक को शरीर मे तापमान बढ़ता हुआ लग सकता है लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है, इस साधना मे यह सफलता का ही एक लक्षण है.
राजगुरु जी
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Saturday, January 23, 2016

भैरवी कल्पुद्धरित त्रैलोक्य विजय काली साधना









गुप्त तंत्र ग्रंथो मे हमारे ऋषियो ने जो विधान दिये थे वह अपने आप मे रहस्यों से परिपूर्ण थे. तंत्र जगत का साहित्य कई रूप से गुढ़ रहा है तथा उसमे जो विधान दिये है वह भी अत्यधिक गुप्त रूप से लिखे गए थे ताकि अनाधिकारी व्यक्ति उसका दुरूपयोग ना कर सके. इस प्रकार जब यह साहित्य को समजने वाले लोग ही नहीं रहे तब तंत्र साधनाओ की अवलेहना हुई और इस प्रकार तंत्र साहित्य का एक बहोत ही बड़ा भाग लुप्त हो गया. और इन सब साहित्य को मिथ्या नाम दे दिया गया. ज़रा तटस्थ भाव से सोचे की जब नोट या कलम नहीं थि, उस समय ताड़पत्री, विविध पदार्थो के पर्ण, चर्म, धातु जेसे विविध पदार्थो पर अत्यधिक कष्ट और श्रमसाध्य लेखन कई प्रकार की स्याही बना कर हमारे ऋषियो ने लिखा. उसके पीछे उन लोगो का क्या व्यक्तिगत चिंतन हो सकता है? लेकिन पाश्चात्य संस्कृति से चकाचौंध हो कर हमने खुद का पतन करना शुरू कर दिया. खेर, लेकिन कई ग्रन्थ काल के थपेडो से भी सुरक्षित बचाए गए जो की कई तांत्रिक मठो और तंत्र ज्ञाताओ के पास सुरक्षित रहे. ऐसे अप्रकाशित ग्रंथो मे से एक है “भैरवी तंत्र” कई हज़ार श्लोको का यह ग्रन्थ अपने आप मे देवी साधनाओ के लिए बेजोड है. इसके कई पटल अपने आप मे पूर्ण तंत्र है जिसमे से एक पटल या भाग है “काली कल्प”. यह कल्प देवी काली की उपासना के लिए बेजोड है. जिसमे देवी सबंधित साधन एवं कवच दिया गया है. लेकिन यह कवच भी अपने आप मे अत्यधिक रहस्यों से परिपूर्ण है. यह कवच मात्र कवच नहीं लेकिन विविध ध्यान मंत्र तथा साधन मंत्रो का समूह है. जिसमे एक से एक बेजोड मंत्र है. उसी मे से एक मंत्र पद्धति है त्रैलोक्य विजय काली मंत्र. ग्रन्थ के अनुसार इस का उपयोग करने वाले व्यक्ति का देवता भी अहित करने की सोचते नहीं. फिर सामान्य शत्रु की तो बात ही क्या है. साधक शत्रुओ के ऊपर हावी हो जाता है तथा समस्त षड्यंत्रो से पार उतर कर सर्वत्र विजयी होता है. इस साधना को करने के बाद साधक मे एक अत्यधिक तीव्र मोहन शक्ति का भी विकास होता है जिससे सभी व्यक्ति उसके अनुकूल रहना ही योग्य समजते है. इस कल्याण प्रदाता गुढ़ साधना को साधक करे तो देवी काली का आशीर्वाद सदैव साधक पर बना रहता है.
साधक को चाहिए की वह यह साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरू करे. सुबह उठ कर देवी महाकाली की पूजा करे तथा देवी दक्षिण काली का ध्यान करे. अगर साधक अपने सामने काली यन्त्र तथा चित्र रखे तो उत्तम है. इसके पश्च्यात साधक निम्न मन्त्र की १० माला सुबह, १० माला दोपहर तथा १० माला शाम को (सूर्यास्त के बाद रात्री काल मे सोने से पहले) मंत्र जाप करे. यह २१ दिन की साधना है. रोज ३ समय मंत्र जाप होना चाहिए. इसमें दिशा पूर्व रहे. वस्त्र आसान सफ़ेद रहे तथा माला काले हकीक या रुद्राक्ष की हो. जाप से पहले विनियोग निम्न मंत्र से करे. हाथ मे जल ले कर विनियोग बोलने के बाद जल को भूमि पर छोड़ दे.
विनियोग :
अस्य श्री काली कल्पे जगमंगला कवच गुढ़ मन्त्रान त्रैलोक्य विजय मन्त्रस्य शिव ऋषि अनुष्टुप् छन्दः दक्षिण कालिका देवता मम त्रैलोक्य विजय त्रैलोक्य मोहन सर्व शत्रु बाधा निवारार्थाय जपे विनियोग
उसके बाद दक्षिण कालिका का ध्यान कर निम्न मंत्र का जाप करे.
हूं ह्रीं दक्षिण कालिके खड्गमुण्ड धारिणी नमः
साधक पूजा और विनियोग सुबह करे, दोपहर और शाम को विनियोग या पूजन की ज़रूरत नहीं है ध्यान के बाद सीधे मंत्र जाप शुरू कर सकते है.
राजगुरु जी
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* पिशाच सिद्धि *








यह भी भूत की तरह ही एक
योनि होती है,पर अत्यंत बलिष्ठ,अत्यंत
मजबूत और द्र्ढ निच्छय युक्त,अगर साधक इसे सिद्ध करले और इसे आज्ञा दे दे तो सामने चाहे पचास शत्रु,बंदूक या पिस्तोल लाठी या भाले लिय हुए खड़े हो तो उसे पाच मिनट मे ही
भगा देता है,इसका क्षमता बहोत भयंकर
होता है..........यह साधक को 24 घंटे
अदृश्य रूप मे मित्र के तरहा रहेता है और
बुलाने पर हर आज्ञा का पालन करता ही है.......
साधना विधि-
कृष्ण पक्ष के शुक्रवार को साधक दक्षिण
को मुख करके गुरु जी से आज्ञा लेकर
नग्न अवस्था मे साधना मे बैठे,आसन काले रंग
का हो और सामने स्टील या तांबे के
प्लेट मे सिंदूर मे चमेली का तेल मिलाकर पुरुष
आकृति बनाये,पुरुष आकृति मे
हृदय का पूजन करे.इस साधना मे रुद्राक्ष
या काले हकीक का माला आवश्यक है,गुरुमंत्र
के जाप होने के बाद साधक पिशाच
मंत्र का 21 माला जाप करे,येसा 3 शुक्रवार
तक रात्रि मे 10 बजे के बाद साधना
करने से पिशाच साधक के सामने प्रत्यक्ष
होता है और वचन मांगता है,पिशाच सिद्धि सिर्फ 3-4 शुक्रवार करने से पिशाच सिद्ध होकर हमारा मनचाहा कार्य सम्पन्न करता है.
॥ ऐं क्रीं क्रीं ख्रिं ख्रिं खिचि खिचि पिशाच
ख्रिं ख्रिं फट ॥
राजगुरु जी
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आकस्मिक धन प्राप्ति केलिए ..(शेयर मार्केट या अन्य में लाभदायक )







धन प्राप्ति तो एक ऐसी क्रिया हैं जो सबके मन को भांति हैं जीवन मे धन के बिना किसी भी चीज का वैसा अस्तित्व नही हैं जैसा की होना ही चाहिए .आधिन्काश आवश्यकताए तो केबल धन के माध्यम से कहीं जायदा सुचारू रूप से पूरी हो जाती हैं ..
पर धन का आगमन भी तो एक अनिवार्य आवश्यकता हैं पर जो एक बंधी बंधाई धन राशि हर महीने मिलती हैं वह तो एक निश्चित रूप से खर्च होती हैं.. पर कहीं से यदि कोई आकस्मिक धन यदि हमें मिल जाता हैं तो वह बहुत ही प्रसन्नता दायक होता हैं .
पर यह आकस्मिक धन आये कहाँ से ..यह सबसे बड़ा प्रश्न अब हर किसी को तो गडा धन नही मिल सकता हैं . तो व्यक्ति नए नए माध्यम देखता हैं कि कैसे इसकी सम्भावनए बनायी जाए या हो पाए .
और सबसे ज्यादा हर व्यक्ति का रुझान हैं तो वह् हैं शेयर मार्केट की ओर ..रो ज जोभी सुचनाये आती हैं वह होती हैं शेयर मार्केट की.. की उसने इतना फायदा लिया या वह पूरी तरह से बर्बाद हो गया ..फिर भी लोग धनात्मक पक्ष कहीं जयादा देख्ते हैं .मतलब की फायदा होता ही हैं . अब जो लंबी अवधि के लिए अपना धन लगाते हैं वह कहीं ज्यादा लाभदायक होते हैं और जो कम अवधि के लिए उनके लिए क्या कहा जाए यह बहुत ही ज्यादा जोखिम भरा सौदा हैं .
पर एक साधना ऐसी भी हैं जिसके सफलता पूर्वक करने से व्यक्ति का जोखिम बहुत कम हो जाता हैं .. और व्यक्ति को लाभ की सम्भावनाये कहीं अधिक होती हैं
जप संख्या – ११ हज़ार हैं दिन् निर्धारित नही हैं जब जप समाप्त हो जाये तो १०८ आहुति इस मन्त्र से कर दे. और आप देखेंगे की स्वयं ही नए नए स्त्रोत से घनागम की अवश्यकताए पूरी होती जाएँगी.
वस्त्र पीले और आसन भी पीला रहेगा.
जप प्रातः काल कहीं जयादा उचित होगा .
दिशा पूर्व या उत्तर उचित रहेगी .
किसी भी माला से जप किया जा सकता हैं .
सदगुरुदेव पूजन , जप समर्पण और संकल्प कि क्यों कर रहे हैं यह साधना ..यह तो एक हमेशा से अनिवार्य अंग हैं ही .
मंत्र :
आकाश चारिणी यक्षिणी सुंदरी आओ धन लाओ मेरी झोलो भर जाओ |वर्षा करो धन की जैसे बादल वर सै जल की |कुबेर की रानी यक्षिणी महरानी कसम तेरे पति की लाज रख जन की | सच्चे गुरु का चेला बांटू प्रसाद मेवा करूँ तेरी जय सेवा जय यक्षिणी देवा ||
मन्त्र सिद्ध करने के बाद जो भी आप व्यापर या शेयर में अपन धन लगते हैं उसमे से जो आपको लगता हैं की आपका अधिक प्रोफिट हैं उस धन के कुछ हिस्से को ...मतलब जो धन पाए ..उसमे अपने गुरु का और देवीके नाम का कुछ भाग निकाल ले .... या उस धन के हिस्से को .... गुरु को दे कर यक्षिणी को मेवा आदि अर्पित कर दे .
राजगुरु जी
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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...