Saturday, July 4, 2020

भूत, भविष्य और वर्तमान की जानकारी देती है आपकी हस्तरेखा, जानें 15 विशेष बातें





भूत, भविष्य और वर्तमान की जानकारी देती है आपकी हस्तरेखा, जानें 15 विशेष बातें...


हस्तरेखा में अंगुलियों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। किसी भी व्यक्ति के हाथ के गहन अध्ययन द्वारा उस व्यक्ति के भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों के बारे में आसानी से बताया जा सकता है।  

हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार अंगुलियों के द्वारा व्यक्ति का पूरी तरह एक्स-रे किया जा सकता है। अंगुलियां छोटी-बड़ी, मोटी-पतली, टेढ़ी-मेढ़ी, गांठ वाली तथा बिना गांठ वाली कई प्रकार की होती हैं। 

आइए जानें कुछ विशेष बातें... 

* प्रत्येक अंगुली तीन भागों में बंटी होती है, जिन्हें पोर कहते हैं। 

* पहली अंगुली को तर्जनी, दूसरी अंगुली को मध्यमा, तीसरी अंगुली को अनामिका तथा चौथी अंगुली को कनिष्ठा कहा जाता है। 

* ये अंगुलियां क्रमशः बृहस्पति, शनि, सूर्य तथा बुध के पर्वतों पर आधारित होती हैं।

* प्रत्येक अंगुली की अलग-अलग परीक्षा की जाती है। 

* यदि अंगुलियों के अग्र भाग नुकीले हों और अंगुलियों में गांठ दिखाई न दे तो व्यक्ति कला और साहित्य का प्रेमी तथा धार्मिक विचारों वाला होता है। काम करने की क्षमता इनमें कम होती है। सांसारिक दृष्टि से ये निकम्मे होते हैं। 

* लम्बाई के हिसाब से अधिक लम्बी अंगुलियों वाला व्यक्ति दूसरे के काम में हस्तक्षेप अधिक करता है। 

* लम्बी और पतली अंगुलियों वाला व्यक्ति चतुर तथा नीतिज्ञ होता है। 

* छोटी अंगुलियों वाला व्यक्ति अधिक समझदार होता है। 

* बहुत छोटी अंगुलियों वाला व्यक्ति सुस्त, स्वार्थी तथा क्रूर प्रवृति का होता है। 

* जिस व्यक्ति की पहली अंगुली यानी अंगूठे के पास वाली अंगुली बहुत बड़ी होती है वह व्यक्ति तानाशाही अर्थात् लोगों पर अपनी बातें थोपने वाला होता है। 

* यदि अंगुलियों मिलाने पर तर्जनी और मध्यमा के बीच छेद हो तो व्यक्ति को 35 वर्ष की उम्र तक धन की कमी रहती है। 

* यदि मध्यमा और अनामिका के बीच छिद्र हो तो व्यक्ति को जीवन के मध्य भाग में धन की कमी रहती है। 

* अनामिका और कनिष्का के बीच छिद्र बुढ़ापे में निर्धनता का सूचक है। 

* जिस व्यक्ति की कनिष्ठा अंगुली छोटी तथा टेड़ी-मेड़ी हो तो वह व्यक्ति जल्दबाज तथा बेईमान होता है। 

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राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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Friday, July 3, 2020

आपकी हाथ की रेखाएं बताएंगी आपका भविष्य, जानिए किस लकीर से मिलेगा कितना पैसा ....






आपकी हाथ की रेखाएं बताएंगी आपका भविष्य, जानिए किस लकीर से मिलेगा कितना पैसा ....


हाथ की रेखाएं बताएंगी भविष्य: किसी भी व्यक्ति की हस्तरेखा यानी हाथ की रेखा उसके भविष्य से जुड़ी बहुत सारी जानकारियां बता सकती हैं. सरल शब्दों में कहा जाए तो हस्तरेखा भविष्य बताने का एक प्राचीन तरीका है.

 हम किसी भी व्यक्ति के हाथ की रेखाओं को अध्ययन करके उसके कल, आज और भविष्य के बारे में पता लगा सकते हैं. हर व्यक्ति की हथेली की रेखाओं की बनावट अलग-अलग होती है ..

जो कि जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है. इन रेखाओं में भाग्य रेखा, प्रेम रेखा, जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा आदि रेखाएं प्रमुख रेखाएं हैं.

आज के इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसी रेखाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो सभी लोगों की हथेली में नहीं होती. यह रेखाएं केवल उन लोगों की हथेली में पाई जाती हैं 

जो कि अपनी लव लाइफ के लिए संवेदनशील और असुरक्षित हैं और जिनके पास धन की प्राप्ति होने वाली है. दरअसल इन रेखाओं को देखकर आप पता लगा सकते हैं कि आपको जीवन में धन लाभ के योग है या नहीं.

हथेली में “X” रेखाएं मौजूद होना ..

ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके हाथों में एक रेखा दूसरी रेखा को काटती है जोकि x का चिन्ह बनाती है. अगर आपके घर में भी किसी के हाथ में ऐसी रेखा है तो समझ लीजिए कि वह व्यक्ति बहुत ही किस्मत वाला है. 

ऐसे व्यक्ति को जिंदगी में कभी भी पैसे की कमी नहीं झेलनी पड़ती. वह जो भी चाहता है उसे वह जरूर मिलता है. ऐसी रेखाएं वाले लोग बेहद शांत स्वभाव के होते हैं और भूल से भी किसी का बुरा नहीं सोच सकते. 

इन लोगों को परिवार और साथी का भी भरपूर प्यार मिलता है. इनके पास जमीन एवं जायदाद की कोई कमी नहीं रहती.

हाथ की लकीरों में “M” चिन्ह बनना ...

अधिकतर लोगों के हाथ में एम निशान की रेखाएं बनी होती हैं. ऐसे लोग बाकी व्यक्तियों की तुलना में काफी अलग किस्म के होते हैं.

 यह काफी जिद्दी स्वभाव के होते हैं और केवल अपनी सुनते हैं और खुद के बनाए हुए रास्ते पर चलना पसंद करते हैं. यह लोग काफी बहादुर होते हैं और हर चुनौती को पार करने की क्षमता रखते हैं. 

यह अपनी जिद और दिमाग के अभाव में 1 दिन सफल जरुर होते हैं. यह काफी रोमांटिक किस्म के होते हैं. यह अपने बलबूते पर धन हासिल करना चाहते हैं और 1 ना एक दिन इन्हे अपनी मंजिल मिल ही जाती है.

हाथ की हथेली में त्रिकोण चिन्ह बनना ...
जिन व्यक्तियों की जीवन रेखा सही जुलाई में हो और मस्तिष्क रेखा दो भागों में बटी हुई हो, ऐसे लोगों की हथेली में त्रिकोण का चिन्ह बना होता है. त्रिकोण चिन्ह वाले व्यक्ति भविष्य में ढेर सारा धन कमाते हैं. 

यह आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं और समय समय पर इन्हें धन की प्राप्ति होती रहती है. यह अपने परिवार और साथी से बेहद प्रेम करते हैं और उनका अच्छे से ख्याल रखना चाहते हैं.

हथेली में शनि पर्वत बनना ...

बहुत सारे लोगों की हथेली में शनि पर्वत यानि मध्य उंगलियों के पास दो या दो से अधिक रेखाएं होती हैं ऐसे व्यक्तियों को धन और सुख दोनों ही प्राप्त होते हैं.

 यह काफी दयालु किस्म के होते हैं और उनका दान पुण्य में अधिक विश्वास होता है. यह किसी का दिल नहीं दुखाते और सब की इज्जत करते हैं.

जानिए अंगूठे के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव और भविष्य से जुड़ी खास बातें...

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Thursday, July 2, 2020

ऊपरी हवा पहचान और निदान





ऊपरी हवा पहचान और निदान


प्रायः सभी धर्मग्रंथों में ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि का उल्लेख है। कुछ ग्रंथों में इन्हेंबुरी आत्मा कहा गया है तो कुछ अन्य में भूत-प्रेत और जिन्न।

यहां ज्योतिष के आधार पर नजर दोष का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार गुरु पितृदोष, शनि यमदोष, चंद्र व शुक्र जल देवी दोष, राहुसर्प व प्रेत दोष, मंगल शाकिनी दोष, सूर्य देव दोष एवं बुध कुल देवता दोष का कारकहोता है। राहु, शनि व केतु ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह हैं। जब किसी व्यक्ति के लग्न(शरीर), गुरु (ज्ञान), त्रिकोण (धर्म भाव) तथा द्विस्वभाव राशियों पर पाप ग्रहों का प्रभावहोता है, तो उस पर ऊपरी हवा की संभावना होती है।

 लक्षण

नजर दोष से पीड़ित व्यक्ति का शरीर कंपकंपाता रहता है। वह अक्सर ज्वर, मिरगीआदि से ग्रस्त रहता है।
कब और किन स्थितियों में डालती हैं ऊपरी हवाएं किसी व्यक्ति पर अपना प्रभाव?

* जब कोई व्यक्ति दूध पीकर या कोई सफेद मिठाई खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तबऊपरी हवाएं उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गंदी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है,इसीलिए ऐसी जगहों पर जाने वाले लोगों को ये हवाएं अपने प्रभाव में ले लेती हैं। 

इनहवाओं का प्रभाव रजस्वला स्त्रियों पर भी पड़ता है। कुएं, बावड़ी आदि पर भी इनका वासहोता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्यों के अवसर पर ये हवाएं सक्रिय होती हैं। इसकेअतिरिक्त रात और दिन के १२ बजे दरवाजे की चौखट पर इनका प्रभाव होता है।

* दूध व सफेद मिठाई चंद्र के द्योतक हैं। चौराहा राहु का द्योतक है। चंद्र राहु का शत्रु है।अतः जब कोई व्यक्ति उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है, तो उस पर ऊपरीहवाओं के प्रभाव की संभावना रहती है।

* कोई स्त्री जब रजस्वला होती है, तब उसका चंद्र व मंगल दोनों दुर्बल हो जाते हैं। येदोनों राहु व शनि के शत्रु हैं। रजस्वलावस्था में स्त्री अशुद्ध होती है और अशुद्धता राहु कीद्योतक है। ऐसे में उस स्त्री पर ऊपरी हवाओं के प्रकोप की संभावना रहती है।

* कुएं एवं बावड़ी का अर्थ होता है जल स्थान और चंद्र जल स्थान का कारक है। चंद्र राहुका शत्रु है, इसीलिए ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।

* जब किसी व्यक्ति की कुंडली के किसी भाव विशेष पर सूर्य, गुरु, चंद्र व मंगल का प्रभावहोता है, तब उसके घर विवाह व मांगलिक कार्य के अवसर आते हैं। ये सभी ग्रह शनि वराहु के शत्रु हैं, अतः मांगलिक अवसर
पर ऊपरी हवाएं व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं।

* दिन व रात के १२ बजे सूर्य व चंद्र अपने पूर्ण बल की अवस्था में होते हैं। शनि व राहुइनके शत्रु हैं, अतः इन्हें प्रभावित करते हैं। दरवाजे की चौखट राहु की द्योतक है। अतःजब राहु क्षेत्र में चंद्र या सूर्य को बल मिलता है, तो ऊपरी हवा सक्रिय होने की संभावनाप्रबल होती है।

* मनुष्य की दायीं आंख पर सूर्य का और बायीं पर चंद्र का नियंत्रण होता है। इसलिएऊपरी हवाओं का प्रभाव सबसे पहले आंखों पर ही पड़ता है।

यहां ऊपरी हवाओं से संबद्ध ग्रहों, भावों आदि का विश्लेषण प्रस्तुत है।

राहु-केतु – 

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, शनिवत राहु ऊपरी हवाओं का कारक है।यह प्रेत बाधा का सबसे प्रमुख कारक है। इस ग्रह का प्रभाव जब भी मन, शरीर, ज्ञान,धर्म, आत्मा आदि के भावों पर होता है, तो ऊपरी हवाएं सक्रिय होती हैं।

शनि –

 इसे भी राहु के समान माना गया है। यह भी उक्त भावों से संबंध बनाकर भूत-प्रेतपीड़ा देता है।

चंद्र – 

मन पर जब पाप ग्रहों राहु और शनि का दूषित प्रभाव होता है और अशुभ भावस्थित चंद्र बलहीन होता है, तब व्यक्ति भूत-प्रेत पीड़ा से ग्रस्त होता है।

गुरु – 

गुरु सात्विक ग्रह है। शनि, राहु या केतु से संबंध होने पर यह दुर्बल हो जाता है।इसकी दुर्बल स्थिति में ऊपरी हवाएं जातक पर अपना प्रभाव डालती हैं।

लग्न – 

यह जातक के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। इसका संबंध ऊपरी हवाओं केकारक राहु, शनि या केतु से हो या इस पर मंगल का पाप प्रभाव प्रबल हो, तो व्यक्ति केऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की संभावना बनती है।

पंचम –

 पंचम भाव से पूर्व जन्म के संचित कर्मों का विचार किया जाता है। इस भाव परजब ऊपरी हवाओं के कारक पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, तो इसका अर्थ यह है कि व्यक्तिके पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों में कमी है। अच्छे कर्म अल्प हों, तो प्रेत बाधा योग बनता है।

अष्टम – 

इस भाव को गूढ़ विद्याओं व आयु तथा मृत्यु का भाव भी कहते हैं। इसमें चंद्र औरपापग्रह या ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह का संबंध प्रेत बाधा को जन्म देता है।

नवम – 

यह धर्म भाव है। पूर्व जन्म में पुण्य कर्मों में कमी रही हो, तो यह भाव दुर्बल होताहै।

राशियां –

 जन्म कुंडली में द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या और मीन पर वायु तत्व ग्रहोंका प्रभाव हो, तो प्र्रेत बाधा होती है।

वार – 

शनिवार, मंगलवार, रविवार को प्रेत बाधा की संभावनाएं प्रबल होती हैं।

तिथि – 

रिक्ता तिथि एवं अमावस्या प्रेत बाधा को जन्म देती है।

नक्षत्र –

 वायु संज्ञक नक्षत्र प्रेत बाधा के कारक होते हैं।

योग – 

विष्कुंभ, व्याघात, ऐंद्र, व्यतिपात, शूल आदि योग प्रेत बाधा को जन्म देते हैं।

करण – 

विष्टि, किस्तुन और नाग करणों के कारण व्यक्ति प्रेत बाधा से ग्रस्त होता है।

दशाएं – 

मुख्यतः शनि, राहु, अष्टमेश व राहु तथा केतु से पूर्णतः प्रभावित ग्रहों कीदशांतर्दशा में व्यक्ति के भूत-प्रेत बाधाओं से ग्रस्त होने की संभावना रहती है।

 युति

किसी स्त्री के सप्तम भाव में शनि, मंगल और राहु या केतु की युति हो, तो उसके पिशाचपीड़ा से ग्रस्त होने की संभावना रहती है।

गुरु नीच राशि अथवा नीच राशि के नवांश में हो, या राहु से युत हो और उस पर पाप ग्रहोंकी दृष्टि हो, तो जातक की चांडाल प्रवृत्ति होती है।

पंचम भाव में शनि का संबंध बने तो व्यक्ति प्रेत एवं क्षुद्र देवियों की भक्ति करता है।

ऊपरी हवाओं के कुछ अन्य मुख्य ज्योतिषीय योग

* यदि लग्न, पंचम, षष्ठ, अष्टम या नवम भाव पर राहु, केतु, शनि, मंगल, क्षीण चंद्रआदि का प्रभाव हो, तो जातक के ऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की संभावना रहती है। 

यदिउक्त

* ग्रहों का परस्पर संबंध हो, तो जातक प्रेत आदि से पीड़ित हो सकता है।

* यदि पंचम भाव में सूर्य और शनि की युति हो, सप्तम में क्षीण चंद्र हो तथा द्वादश में गुरुहो, तो इस स्थिति में भी व्यक्ति प्रेत बाधा का शिकार होता है।

* यदि लग्न पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो, लग्न निर्बल हो, लग्नेश पाप स्थान में हो अथवाराहु या केतु से युत हो, तो जातक जादू-टोने से पीड़ित होता है।

* लग्न में राहु के साथ चंद्र हो तथा त्रिकोण में मंगल, शनि अथवा कोई अन्य क्रूर ग्रहहो, तो जातक भूत-प्रेत आदि से पीड़ित होता है।

* यदि षष्ठेश लग्न में हो, लग्न निर्बल हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातकजादू-टोने से पीड़ित होता है। यदि लग्न पर किसी अन्य शुभ ग्रह की दृष्टि न हो, तोजादू-टोने से पीड़ित होने की संभावना प्रबल होती है। 

षष्ठेश के सप्तम या दशम में स्थितहोने पर भी जातक जादू-टोने से पीड़ित हो सकता है।

* यदि लग्न में राहु, पंचम में शनि तथा अष्टम में गुरु हो, तो जातक प्रेत शाप से पीड़ितहोता है।

ऊपरी हवाओं के सरल उपाय     

ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु शास्त्रों में अनेक उपाय बताए गए हैं। अथर्ववेद में इस हेतुकई मंत्रों व स्तुतियों का उल्लेख है। आयुर्वेद में भी इन हवाओं से मुक्ति के उपायों काविस्तार से वर्णन किया गया है। यहां कुछ प्रमुख सरल एवं प्रभावशाली उपायों काविवरण प्रस्तुत है।

* ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवनकरना चाहिए। इसके अतिरिक्त अग्नि तथा लाल मिर्ची जलानी चाहिए।

* रोज सूर्यास्त के समय एक साफ-सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो कच्चा दूध लेकरउसमें शुद्ध शहद की नौ बूंदें मिला लें। फिर स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर मकान कीछत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तकआएं और बचे हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें।

 क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरणकरते रहें। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी ऊपरी हवाएंदूर हो जाएंगी।

* रविवार को बांह पर काले धतूरे की जड़ बांधें, ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी।

* लहसुन के रस में हींग घोलकर आंख में डालने या सुंघाने से पीड़ित व्यक्ति को ऊपरीहवाओं से मुक्ति मिल जाती है।

* ऊपरी बाधाओं से मुक्ति हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए।

  ष् ओम नमो भगवते रुद्राय नमः कोशेश्वस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रुद्रायनमः सिद्धि स्वाहा।श्श्

* घर के मुख्य द्वार के समीप श्वेतार्क का पौधा लगाएं, घर ऊपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।

* उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी की विशिष्ट वस्तुएं डालें और उससेउत्पन्न होने वाला धुआं पीड़ित व्यक्त्ि को सुंघाएं। यह क्रिया किसी ऐसे व्यक्ति सेकरवाएं जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।

* प्रातः काल बीज मंत्र झ्क्लींश् का उच्चारण करते हुए काली मिर्च के नौ दाने सिर परसे घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें, ऊपरी बला दूर हो जाएगी।

* रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपड़े की छोटी थैली में तुलसी के आठपत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेई की जड़ बांधकर गले में धारण करें, नजर दोष बाधा सेमुक्ति मिलेगी।

* निम्नोक्त मंत्र का १०८ बार जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उससेपीड़ित व्यक्ति के शरीर पर मालिश करें, व्यकित पीड़ामुक्त हो जाएगा।

मंत्र – ओम नमो काली कपाला देहि देहि स्वाहा।

* ऊपरी हवाओं के शक्तिषाली होने की स्थिति में शाबर मंत्रों का जप एवं प्रयोग कियाजा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मंत्रों का दीपावली की रात को अथवा होलिका दहनकी रात को जलती हुई होली के सामने या फिर श्मषान में १०८ बार जप कर इन्हें सिद्धकर लेना चाहिए।

 यहां यह उल्लेख कर देना आवष्यक है कि इन्हें सिद्ध करने के इच्छुकसाधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।

* निम्न मंत्र से थोड़ा-सा जीरा ७ बार अभिमंत्रित कर रोगी के शरीर से स्पर्श कराएंऔर उसे अग्नि में डाल दें। रोगी को इस स्थिति में बैठाना चाहिए कि उसका धूंआ उसकेमुख के सामने आये। इस प्रयोग से भूत-प्रेत बाधा की निवृत्ति होती है।

    मंत्र –  

जीरा जीरा महाजीरा जिरिया चलाय। जिरिया कीशक्ति से फलानी चलिजाय॥ जीये तो रमटले मोहे तो मशान टले। हमरे जीरा मंत्र से अमुख अंग भूत चले॥ जायहुक्म पाडुआ पीर की दोहाई॥

* एक मुट्ठी धूल को निम्नोक्त मंत्र से ३ बार अभिमंत्रित करें और नजर दोष से ग्रस्तव्यक्ति पर फेंकें, व्यक्ति को दोष से मुक्ति मिलेगी।

   मंत्र –

 तह कुठठ इलाही का बान। कूडूम की पत्ती चिरावन। भाग भाग अमुक अंक सेभूत। मारुं धुलावन कृष्ण वरपूत। आज्ञा कामरु कामाख्या। हारि दासीचण्डदोहाई।

* थोड़ी सी हल्दी को ३ बार निम्नलिखित मंत्र से

 अभिमंत्रित करके अग्नि में इसतरह छोड़ें कि उसका धुआं रोगी के मुख की ओर जाए। इसे हल्दी बाण मंत्र कहते हैं।

मंत्र –

 हल्दी गीरी बाण बाण को लिया हाथ उठाय। हल्दी बाण से नीलगिरी पहाड़थहराय॥ यह सब देख बोलत बीर हनुमान। डाइन योगिनी भूत प्रेत मुंड काटौ तान॥आज्ञा कामरु कामाक्षा माई। आज्ञा हाड़ि की चंडी की दोहाई॥

*जौ, तिल, सफेद सरसों, गेहूं, चावल, मूंग, चना, कुष, शमी, आम्र, डुंबरक पत्ते औरअषोक, धतूरे, दूर्वा, आक व ओगां की जड़ को मिला लें और उसमें दूध, घी, मधु और गोमूत्रमिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। फिर संध्या काल में हवन करें और निम्न मंत्रों का १०८बार जप कर इस मिश्रण से १०८ आहुतियां दें।

  मंत्र –

 मंत्र रू ओम नमः भवे भास्कराय आस्माक अमुक सर्व ग्रहणं पीड़ा नाशनं कुरु-कुरु स्वाहा।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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भैरवी चक्र साधना में साधक-साधिकाओं के लिए निर्देश




भैरवी चक्र साधना में साधक-साधिकाओं के लिए निर्देश


1.किसी भी नारी कि उपेक्षा या अपमान न करें।

2.कन्याओं को देवी का रूप समझकर उनकी पूजा करें।

3.कन्याओं-नारियों की शक्ति पर सहायता एवं रक्षा करें।

4.पेड़ न काटे, न कटवाएं।

5.मदिरापान या मांसाहार केवल साधना हेतु है। इसे व्यसन न बनाये।जो मस्तिष्क और विवेक को नष्ट कर दे; उस मदिरापान से भैरव जी कुपित होकर उसका विनाश कर देते है।

6.भैराविमार्ग की अपनी साधना को गुप्त रखें, किसी को न बताएं।

7.दिन में सामान्य पूजा करें।साधना 9 से 1 बजे तक रात्रि में प्रशस्त हैं।

8.नवमी एवं चतुर्दशी को भैरवी में स्थित देवी की पूजा करें।

9.इस मार्ग के आलोचकों से मत उलझे। इस संसार में भांति-भांति के प्राणी रहते है। सब की प्रवृत्ति एवं एवं सोच अलग-अलग होती है। न तो किसी को इस मार्ग कि ओर प्रेरित करे, न ही विरोध करे।

10.यह प्रयास रखे कि भैरवी सदा प्रसन्न रहे।



11.यदि वह मांसाहारी नहीं है; तो वानस्पतिक गर्म और कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन करें और विजया से निर्मित मद का प्रयोग करें।

अन्य जानकारियाँ

11.आसन, वस्त्र लाल होते हैं। एक वस्त्र का प्रयोग करे, जो ढीला हो। कुछ सिले हुए वस्त्र की भी वर्जना करते हैं।

12.पूजा केवल नवमी-चतुर्दशी को होती है। अन्य तिथियों में केवल साधना होती है।

13.साधना के अनेक स्तर है। यहाँ सामान्य स्तर दिया गया है। भैरवी को सामने बैठाकर देवीरुप कल्पना में मंत्र जप करने से मन्त्र सिद्ध होते है।

14.मूलाधार के प्लेट के नीचे से खोपड़ी कि जोड़ तक और सिर के चाँद तक में मुख्य चक्र होते है। साधक-साधिका को इस पर जैतून या चमेली के तेल की मालिश करते रहना चाहिए।

15.इन चक्रों पर नीचे से ऊपर तक होंठ फेरने और चुम्बन लेने से ये शक्तिशाली होते है।

16.एक-दूसरे के आज्ञाचक्र को चूमने से मनासिक शक्ति प्रबल होती है।

17.चषक (पानपात्र) को सम्हाल कर रखें। इनका दिव्य महत्त्व होता है।

18.घट हर बार न्य लें, पूराने को विसर्जित कर दें।
घट के प्रसाद में मध के साथ सुगन्धित पदार्थ और गुलाब

 –केवड़ा जैसे फूलों को रखने का निर्देश है।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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हम भैरवी साधना करना चाहते है;








हम भैरवी साधना करना चाहते है; 


करवाने से होता है; उसी प्रकार तंत्र और भैरवी मार्ग की साधनायें भी बताने का विषय नहीं है।

भैरवी-साधना के 9 चरण होते है। इनको एक-एक कर करना होता है। पांच सिद्ध करने के बाद साधक वीर कहलाता है, नौ सिद्ध करने के बाद दिव्य। ‘वीर’ को ही अलौकिक शक्तियाँ और ज्ञान पारपत होता है।

इसमें सबसे पहली साधना, जो सामान्य क्रियात्मक प्रयोग होते है, संस्कारों को नष्ट करने की होती है। मनुष्य अपने ही बनाये हुए नियमों से पाशबद्ध होकर उस पशु की तरह विवश हो गया है, जो बंधन में है।

इन संस्कारों से मुक्ति सबसे कठिन काम है। इनमें उत्तीर्ण होने के बाद ही भैरवी चक्र की दीक्षा दी जाती है। मुझे स्वयं भी 10  वर्ष पहले इसमें प्रवेश के लिए कठोर परिक्षण से गुजरना पड़ा था। मुझे ज्ञान और बौद्धिक क्षमता के लिए शिव और सरस्वती का वरदान चाहिए था, जो प्राप्त हुआ।

तीसरी समस्या भैरवी की होती है। हृदय से उत्साह के साथ कोई 18 से 30 वर्ष की युवती भैरवी बनकर साधना की पार्टनर बनना चाहे; तभी इस मार्ग की साधनाएं सफल होती है।

 युवती को ज्ञात होना चाहिए कि यह काम आधारित साधनायें है। दूसरे उसमें अपने पार्टनर से शिव और गुरु से सदाशिव के समान भक्ति और श्रद्धा होना चाहिए।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

मोबाइल नं. : - 09958417249

                     

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Wednesday, July 1, 2020

धन प्राप्ति का मंत्र






धन प्राप्ति का मंत्र


मित्रो ! मेरे पास जितनी भी समस्याओं के मेल या मेसेज आते है उनमे 70 % समस्याएं आर्थिक संकट की होती हैं। किसी का उधार वापस नहीं मिल पा रहा है या किसी की आमदनी उसकी ज़रूरतों से कहीं कम है।

चूँकि समय बदलता जा रहा है, सभी की जरूरतें बदल रही हैं, हमारी आदतें बदली है और इनकी पूर्ति के लिए पैसों की चाहत बढ़ती जा रही है। कोई भी व्यक्ति कितना भी धन कमाए परंतु वह उसे कम ही लगता है।

 जरूरतें इतनी बढ़ गई हैं कि पैसों की कमी महसूस होने लगती है। साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है इसलिए अपनी चादर के अनुसार ही हमें पैर फ़ैलाने चाहिए।

 सामान्यत: हमारे कर्मों के आधार पर ही हमें प्रतिफल स्वरूप धन प्राप्त होता है। परन्तु अथक प्रयासों के बाद भी अगर उतना धन प्राप्त नहीं हो रहा है इसका सीधा सा अर्थ है कि आपके ग्रह आपका साथ नहीं दे रहे है। तब आप ईश्वर भक्ति या शक्ति का प्रयोग कर सकते है।

मित्रो !

मंत्रो में अपार शक्ति होती है। अगर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से इनका जप किया जाय तो यह आपके हाथों की लकीरें भी बदल सकते हैं।

यहाँ आप सभी के आग्रह पर मैं एक अति सरल मंत्र आप को बता रहा हूँ जो आपके जीवन से 'आर्थिक तंगी' को जड़ से समाप्त कर देगा -

ऊँ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा।

OM SARASWATI ISHWARI BHAGWATI MATA KRAM KLIM SHRIM SHRIM MAM DHANAM DEHI FAT SWAHA

मंत्र सिद्ध करने की विधि -

किसी भी शुभ मुहूर्त में पूरे विधि-विधान के साथ इस मंत्र का जप करें। मंत्र का जप 40 दिनों तक प्रतिदिन 108 बार करें। मंत्र जप के समय लक्ष्मी और सरस्वती का चित्र अपने सामने रखें।

इस मंत्र के सिद्ध होने के बाद साधक का रुका हुआ पैसा वापस मिल जाएगा और मां सरस्वती की कृपा से बुद्धि और विवेक बढ़ेगा।

यदि साधक की किसी व्यक्ति पर उधारी बाकी है और वह उसे प्राप्त नहीं हो रही है तो इस मंत्र के सिद्ध होने के बाद पैसा वापस आना शुरू हो जाएगा तथा जीवन में नये नये आय के स्रोत खुलते चले जायेंगे।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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(रजि.)

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ऋण हर्ता गणेश मंत्र प्रयोग





ऋण हर्ता गणेश मंत्र प्रयोग


कर्ज से मुक्ति हेतु गणेश मंत्र, मन्त्र जप से ऋण मुक्ति,  रिण मुक्ति हेतु मन्त्र, गणपति मन्त्र से कर्ज मुक्ति, गणेश जी का कर्ज मुक्ति मन्त्र,

ऋण हर्ता गणेश मंत्र प्रयोग

यह ऋण हर्ता मंत्र हैं। इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है और साधक का ऋण चुकता होता है। कहा जाता है कि जिसके घर में एक बार भी इस मंत्र का उच्चारण हो जाता है है उसके घर में कभी भी ऋण या दरिद्रता नहीं आ सकती।

मंत्र:

ॐ श्री गणेश ऋण छिन्धि वरेण्य हुं नमः फट ।

विधि: किसी योग्य ब्राह्मण से गणेश प्राण-प्रतिष्ठित करवाले। (विशेष नोट : कर्ज मुक्ति हेतु मंगल गणेश (मूंगा गणेश) प्रतिमा उत्तम फलदायी होती हैं।)

यदि कर्ज से हैं परेशान तो मास की किसी भी चतुर्थी या मंगलवार के दिन प्रातःकाल स्नानआदि नित्यकर्म से शीघ्र निवृत्त होकर। भगवान गणेश की प्राण-प्रतिष्ठित मंत्र सिद्ध गणेश प्रतिमा स्थापित करें। उस मूर्ति का पंचोपचार या षोड़शोपचार पूजन-आरती आदि से विधि-वत पूजन करें।
·    गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं।
·    यदि संभव हो तो गणेशजी का मंत्र बोलते हुए 21 दुर्वा दल चढ़ाएं।
·    श्री गणेशजी को लड्डुओं का भोग लगाएं।

·    स्थापना वाले दिन ब्राह्मण भोजन कराएं और ब्राह्मणों को दक्षिणा प्रदान करने के पश्चात् संध्या के समय स्वयं भोजन ग्रहण करें, यदि ब्राह्मणों को भोजन करवाना संभव न हो तो उसके निमित्त दान किसी भी मंदिर मे कर सकते हैं।
· 
  स्थापना के पश्चयात प्रतिदिन गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं और ऋण मुक्ति हेतु मूंगे की माला से गणेश मंत्र की 1, 3, 5, 7, 11 जप करें।

·    इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और जल्द ही कर्ज मुक्ति के मार्ग प्रसस्थ होने लेगते हैं।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...