Sunday, September 2, 2018

आज केवल 5 कुंडली ही देखी जाएगी 201 रु प्रति, की शुल्क से देखी जाएगी केवल आज ही, पेटीएम 9958417249 महाविद्या आश्रम



आज केवल 5 कुंडली ही    देखी जाएगी 201 रु प्रति, की शुल्क से देखी जाएगी केवल आज ही, 

पेटीएम  9958417249
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Saturday, September 1, 2018

कामदेव मंत्र साधना




कामदेव मंत्र साधना

कामदेव को प्रेम सौंदर्य और काम का देव माना गया है। इसलिए परिणय प्रेम-संबंधों में कामदेव मंत्र साधना और आराधना का महत्व बताया गया है। यदि किसी व्यक्ति को किसी से प्रेम हो जाए या वह आसक्त हो गया हो।

 विवाहित स्त्री अथवा पुरुष की अपने जीवनसाथी से संबंधों में कटुता पैदा हो गई हो या किसी युवक या युवती का साथी रूठ गया हो और वह उसे मनाना चाहता हो। किंतु तमाम कोशिशों के बाद भी वह मन के मुताबिक परिणाम नहीं प्राप्त कर पाता। तब उसकी सहायता के लिए तंत्र क्रिया के अंतर्गत कुछ मंत्र के जप प्रयोग बताए गए हैं।

जिससे कोई भी अपने साथी को अपनी भावनाओं के वशीभूत कर सकता है। परंतु ज्योतिष में सुझाए गए सभी मंत्रों, उपासना और अन्य उपायों में मूल में एक ही बात होती है, इन मंत्रों को प्रयोग करने के पीछे व्यक्ति के मन में कलुषित भावना नहीं होनी चाहिए, साफ और निर्मल मन से इनका प्रयोग करना चाहिए।

कामदेव मंत्र साधना

धर्मशास्त्र में कामदेव को प्रेम, सौंदर्य और काम का देव कहा गया है। इसलिए परिणय प्रेम-संबंधों में कामदेव की उपासना और आराधना को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। 

इसी लिए तंत्र विज्ञान में कामदेव वशीकरण मंत्र का जप करने का महत्व बताया गया है। इस मंत्र का जप अचूक होने के साथ-साथ हानिरहित भी माना जाता है। यह मंत्र है –

‘‘ष्ॐ नमः काम-देवाय। सहकल सहद्रश सहमसह लिए वन्हे धुनन जनममदर्शनं उत्कण्ठितं कुरु कुरु दक्ष दक्षु-धर कुसुम-वाणेन हन हन स्वाहा’’

प्रतिदिन कामदेव के इस मन्त्र का सुबह दोपहर और रात्रिकाल में एक-एक माला जाप करें। ऐसा कहा जाता है कि यह जाप एक महीने तक करने पर सिद्ध हो जाता है।

 मंत्र सिद्धि के पश्चात जब आप इस मंत्र का मन में जप कर जिसकी तरफ देखते हैं, वह आपके वशीभूत या वश में हो जाता है। ज्योतिष के अनुसार प्रेम और काम भावनाओं का कारक शुक्र ग्रह है और प्यार का देव कामदेव को माना गया है। यदि आप भी किसी को आकर्षित करना चाहते हैं, तो शुक्र एवं कामदेव को प्रसन्न करना चाहिए।

‘‘ऊँ कामदेवाय विद्महे रति प्रियायै धीमहि तन्नो अनंग प्रचोदयात।’

इस मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से से दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है। मनपसंद सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।

इस संबंध में कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्र इस प्रकार से हैं-

कामदेव मंत्र साधना-

कामदेव का शाबर मंत्र को काम शक्ति बढ़ाने वाला माना गया है, जो इस प्रकार से है-

‘ऊँ नमो भगवते कामदेवाय यस्य यस्य दृश्यो भवामि यस्य यस्य मम मुखं पश्यति तं तं मोहयतु स्वाहा।’

ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के जप से व्यक्ति में आकर्षण शक्ति और यौन क्षमता में वृद्धि होती है।

राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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बगलामुखी साधना और सिद्धि




बगलामुखी साधना और सिद्धि

 मान्यता है, कि सतयुग में एक बार महाविनाशकारी तुफान आया। इस पर नियंत्रण पाने में सभी देवगण असफल रहे। तब भगवान विष्णु हरिद्रा सरोवर के निकट देवी त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर पीत वस्त्रा त्रिपुर सुंदरी पितांबरा के रूप में अवतरित हुई और विश्व को विनाश से बचाया।

 पिताम्बरा माई ही ही देवी बगलामुखी देवी के रूप में पूजित हैं। एकमेव इनकी साधन से समस्त लौकिक सुख प्राप्त किया जा सकता हैं। इनकी उपासना से अनेक भौतिक समस्याओं का समाधान संभव है जैसे –

से दुश्मन से छुटकारा पाना, कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय प्राप्त करना, मनोवांछित साथी से विवाह, आकर्षण,  वशीकरण, यहाँ तक कि आर्थिक सुख समृद्धि भी|

बगलामुखी शत्रु विनाशक मंत्र/ कवच/ बगलामुखी वशीकरण मंत्र प्रयोग/ बगलामुखी तंत्र साधना/बीज मंत्र/कवच –  देवी बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं मानी जाती है।

बगलामुखी साधना और सिद्धि

बगलामुखी तंत्र सांधना/बीज मंत्र/कवच

यह साधना कठिन इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसके विधिविधान जटिल माने जाते हैं। इसलिए इस साधन को करने से पूर्व एक योग्य गुरू अवश्य तलाश लें। पुनः उनसे एक अक्षर वाले बीज मंत्र की दीक्षा लें, तदुपरांत साधना प्रारंभ करें।

बगलामुखी बीज मंत्र

देवी बगलामुखी की साधना एक अक्षर के बीज मंत्र ’ह्नीं’ के बिना संभव नहीं है। अतएव, प्रतिदिन हल्दी की माला पर 21 अथवा 51 माला इस मंत्र का जाप अवश्य करें। बीज मंत्र का अभिप्राय होता है आध्यात्मिक ऊर्जा का मूल। अर्थात जहां से उस दैवी शक्ति की ऊर्जा प्रवाहित हो रही हो। जब साधक के मानस में बीज मंत्र पूरी तरह रच बस जाता है, तब वह साधना की अगली कड़ी के योग्य माना जाता है।  अनुभवी साधकों का कहना है कि बगलामुखी के सच्चे साधक ही प्रत्येक इच्छा बिना मांगे ही पूरी हो जाती है।

साधना प्रारंभ करने से पूर्व दुर्गा सप्तशती से लेकर कवच पाठ कर लेना जरूरी है। इससे साधक का अंग प्रत्यंग सुरक्षा तरंग के घेरे में आ जाता है। तत्पश्चात अपना नाम, गोत्र आदि बोलकर संकल्प लें। पुनः सोलह मातृकाओं की पूजा करें। इसके बाद ध्यान, आवाह्न, षोडषोपचार पूजन, प्रार्थना तत्पश्चात छत्तीस अक्षर के बगलामुखी मंत्र का उतनी ही संख्या में जाप करें, जितने का संकल्प लिया हो। सामान्यतः सवा लाख जाप के बाद मंत्र सिद्ध हो जाता है।

बगलामुखी मंत्र

ॐ  ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं-मुखं-पदम् स्तम्भय

जिह्वाम कीलय, बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:

मंत्र पाठ के बाद 108 आहूतियां दें। यह स्तम्भन मंत्र है। ध्यान से पढ़ने पर इसका अर्थ भी स्पष्ट होता है कि इसमें देवी से शत्रु की वाक शक्ति, जिह्वा आदि को जडवत करते हुए उसके बुद्धि विनाश की प्रार्थना की गई है।

अनुभवी साधकों का मानना है, कि यदि किसी का वशीकरण करना हो तो-

– साधना के दौरान शक्कर और तिल मिलाकर हवन करना चाहिए।

-शहद, घी, शक्कर मं नमक मिलाकर आहूति देने से व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न होता है।

– सिर्फ नमक से हवन करने पर भी आकर्षण होता है|

-नीम के पत्तों में तेल मिलाकर हवन करने से दो परम मित्र के मध्य भी विद्वेशन करवाया जा सकता है।

-नमक, हल्दी और हरताल से हवन करने पर शत्रु जड़वत हो जाता है, अर्थात उसका स्तम्भन हो जाता है।

-चावल, तिल, दूध मिलाकर बने खीर से हवन करने पर धन लाभ होता है|

– तिल और गुग्गल मिलकर हवन करने से जेल से छुटकारा मिलता है|

-करवीर का पत्ता और अशोक के पत्ते से हवन करने पर संतान सुख की प्राप्ति होती है|

-पीले सरसो के दानों से हवन करने पर वशीकरण होता है|

जाप संख्या पूर्ण होने के उपरांत जप संख्या का दशांश हवन करें, हवन का दशांश तर्पण करें, तर्पण का दशांश मारजन करें  और मार्जन संख्या का दशांश ब्रामहण भोजन करवाएं|

बगलामुखी कवचः

जिस प्रकार बुलेट प्रुफ जैकेट पहन लेने के बाद मनुष्य पर किसी विस्फोटक का असर नहीं होता है उसी प्रकार देवी बगलामुखी के कवच से साधक तमाम बाह्य बाधाओं से मुक्त हो जाता है। सुरक्षा की जरूरत जहां-जहां पड़ती है, वहां यह कवच साधक की रक्षा करती है। 

उदाहरण के लिए -अज्ञात भय, कोर्ट-कचहरी का मामला, घात लगाकर बैठा कोई जानी दुश्मन आदि। इन सबसे बचाव हेतु तीन-चार अक्षरों का अलग अलग मंत्र है। जिनका विवरण इस प्रकार है-

डर दूर करने के लिए

कई बार मनुष्य अज्ञात भय से ग्रस्त हो जाता है। उसे पता ही नहीं होता उसका शत्रु कौन है। यह अत्यंत तकलीफ देह स्थिति होती है। इससे बचने के लिए निम्नलिखित मंत्र दक्षिणाभिमुखी होकर प्रतिदिन छः माला जाप करें-

ओम ह्लीं  ह्लीं बगले-सर्व-भयं-हन

शत्रु से रक्षा के लिए

वर्तमान युग की गलाकाट प्रतियोगिता में कौन मित्र कौन शत्रु पहचान कर पाना कठिन है। इसलिए ज्ञात अज्ञात शत्रुओं से रक्षा के लिए निम्नलिखित मंत्र प्रति दिन 21 माला जपें –

ओम बगलामुखी देव्यै ह्लीं   ह्लीं शत्रुनाश कुरूं।

बगलामुखी वशीकरण मंत्र

देवी बगलामुखी शत्रु स्तंभन के साथ ही वशीकरण की भी शक्तिशाली माध्यम मानी जाती हैं। पूजन विधि की समस्त औपचारिकताओं के पश्चात निम्न मंत्र के सवा लाख जाप का संकल्प लेकर 21 दिनों पूर्ण करें  –

ओम ऐं ह्लीं बगलामुखी देव्यै अमुक स्त्री/पुरूष हृदयम मम वश्य कुरू स्वाहा।

यहां जिसका वशीकरण करना हो उस स्त्री अथवा पुरूष का नाम उच्चारित करें। सवा लाख जाप के उपरांत यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। अपनी प्रेयसी/पे्रयस को उपहार में देने के लिए वस्तु खरीदें तथा उसे हाथ में लेकर उक्त मंत्र का जाप 51 बार करने के उपरांत उसे भेंट कर दें। वह आपसे वशीभूत हो जाएगी/जाएगा।

सावधानियां

बगलामुखी देवी अत्यंत उग्र मानी जाती हैं, अतएव इनकी साधना में लापरवाही बरतने का परिणाम गंभीर भी हो सकता है। इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे-

1- साधना किसी योग्य गुरू के मार्ग दर्शन में करें।

यह साधना कभी भी खुले आसमान के नीचे न करें, परंतु पूजा स्थल पवित्र तथा स्वच्छ हो|साधना के दौरान अधिकतम पीत रंगों का उपयोग करें। जैसे आसन, वस्त्र, प्रसाद आदि।.

 साधना अवधि में ब्रम्हचर्य का पालन करें।हृदय मजबूत हो तभी यह साधना करें क्योंकि साधना के दौरान अनेक ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं, अज्ञात स्पर्श का आभास हो सकता है।

संकल्प लेने के उपरांत पहले दिन जितनी संख्या में मंत्र जपना प्रारम्भ करें उतनी ही संख्या में प्रति दिन करें| समय प्रहर आदि में अपनी मर्जी से फेर बदल न करें.

राजगुरु जी

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क्यों अधिक प्रभावी होता है भोजपत्र निर्मित यन्त्र धारण करना



क्यों अधिक प्रभावी होता है भोजपत्र निर्मित यन्त्र धारण करना

  विभिन्न धर्मो ,समुदायों में यन्त्र रचना और धारण प्राचीन काल से चला आ रहा है ,यन्त्र विभिन्न आकृतियों अथवा अंको के एक विशिष्ट संयोजन होते है ,जिनसे एक विशिष्ट उर्जा विकिरित होती है

 अथवा जिनमे एक विशिष्ट उर्जा संग्रहीत होती है ,जो धारक को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती है ,यंत्रो को देवी देवताओ का निवास भी माना जाता है ,

यह आंकिक भी होते है अथवा न समझ में आने वाली आकृतियों के भी ,फिर भी इनके विशिष्ट अर्थ होते है ,यंत्रो की पूजा भी की जाती है और धारण भी किया जाता है ,अथवा अन्य रूप से भी उपयोग किया जाता है ,

             यंत्रो का निर्माण वुभिन्न सामग्रियों ,वस्तुओ पर होता है ,कागज़,भोजपत्र ,धातु ,पत्थर ,कपडे आदि पर भी ,,हिन्दू परम्परा के अनुसार भोजपत्र को परम पवित्र माना जाता है ,अन्य माध्यमो की अपेक्षा भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र को प्रमुखता दी जाती है क्योकि इसके साथ कई विशिष्टताये जुड़ जाती है ,जो अन्य माध्यमो में कुछ कम पायी जाती है ,

             भोजपत्र स्वयं एक सकारात्मक उर्जा आकर्षित करने वाला माध्यम होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है ,इस पर यन्त्र निर्माण में प्रयुक्त होने वाले अष्टगंध अथवा पंचगंध  की अपनी अलग विशेषता होती है  ,

इनमे गोरोचन आदि प्रयुक्त होने वाले पदार्थ नकारात्मक शक्तियों को दूर कर सकारात्मकता को आकर्षित करते है ,यन्त्र निर्माण के समय साधक की विशिष्टता ,उसकी एकाग्रता ,आत्मबल ,उसके हाथो से निकलने वाली तरंगे ,उसकी अपनी सिद्धिया /शक्तिया यन्त्र को अलग बल प्रदान करती है ,

निर्माणोंपरांत यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा और उस पर सम्बंधित इष्ट का जप इसे बहुत विशेष बना देता है,यन्त्र निर्माण हेतु निर्दिष्ट और चयनित मुहूर्तो का अपना अलग प्रभाव होता है  ,

इसे विशिष्ट साधक ही बना और प्राण प्रतिष्ठित कर सकता है ,जिसके पास सम्बंधित विषय की क्षमता हो ,,इस प्रकार बना यन्त्र धारक पर  शीघ्र और सकारात्मक प्रभाव डालता है ,

यन्त्र से उत्सर्जित होने वाली तरंगे व्यक्ति और आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है जिससे परिवर्तन होते है और व्यक्ति लाभान्वित होता है 

राज गुरु जी

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योगिनी तंत्र साधना







योगिनी तंत्र साधना 

योगिनी साधना एक बहुत ही प्राचीन तंत्र विद्या की विधि है. इसमें सिद्ध योगिनी या सिद्धि दात्री योगिनी की आराधना की जाती है. इस विद्या को कुछ लोग द्वतीय दर्जे की आराधना मानते हैं लेकिन ये सिर्फ एक भ्रांति है. योगिनी साधना करने वाले साधकों को बहुत ही आश्चर्यजनक लाभ होता है.

चौसठ योगिनी साधना, षोडश/चाँद/मधुमती योगिनी साधना, योगिनी तंत्र साधना मंत्र विधि- योगिनी साधना तंत्र विद्या के अंतर्गत अति महत्वपूर्ण साधना है. योगिनी तंत्र साधना और मन्त्र विधि के विधिवत पालन करने से इसे सिद्ध किया जा सकता है. 

योगिनी साधना में माँ आदि शक्ति को प्रसन्न करने के लिए साधना की जाती है. माँ काली अपनी योगिनियों के माध्यम से अपने भक्तों का कल्याण करती हैं.

 हर तरह के बिगड़े कामों को बनाने में इस साधना से लाभ मिलता है. माँ शक्ति के भक्तों को योगिनी साधना से बहुत जल्द और काफी उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होते हैं. इस साधना को करने वाले साधक की प्राण ऊर्जा में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है. माँ की कृपा से भक्त के जीवन की सारी मुश्किलें हल हो जाती हैं और उसके घर में सुख और सम्रद्धि का आगमन हो जाता है.

योगिनी तंत्र साधना मंत्र विधि इस प्रकार है-

इस साधना को रात्रि ग्यारह बजे के बाद करना चाहिए. इसे करने के लिए कृष्ण पक्ष की अष्ठमी का दिन उचित होता है. इसके अतिरिक्त कोई शुक्रवार या कोई भी नवमी भी इस साधना के लिए उत्तम समय होता है. 

इस साधना में लाल वस्तु का विशेष महत्त्व है, इसलिए अपना आसन, वस्त्र आदि लाल रंग के ही होने चाहिए. आप उत्तर की तरफ मुख करके बैठ जाएँ. अब आपने सामने एक लाल रंग का वस्त्र बिछा दें. इस वस्त्र पर अक्षत को कुमकुम से रंजित करके एक मैथुन चक्र निर्मित करें.

अब इस मैथुन चक्र के बीचों बीच ‘दिव्यकर्षण गोलक’ सिंदूर से रंजित करके स्थापित कर दें. आप ‘दिव्यकर्षण गोलक’ नही होने पर सुपारी का उपयोग भी कर सकते हैं. इस तरह से ‘दिव्यकर्षण गोलक’ स्थापित करने के बाद अपने गुरुदेव या भगवान गणेश की आराधना करें. अब गोलक या सुपारी को योगिनी स्वरूप मानकर पूजन करें. पूजन के लिए लाल रंग के पुष्प, हल्दी, कुमकुम, अक्षत आदि अर्पित करें और तिल्ली के तेल का दीपक जलाएं. अब गुड़ का भोग लगायें और अनार रस भी अर्पित करें.

अब एक रुद्राक्ष की माला लेकर “ओम रं रुद्राय सिद्धेस्वराय नम:” इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए एक माला जप पूरा करें. अब थोड़ा सा अक्षत लेकर उसमे कुमकुम मिला लें और नीचे दिए गए मन्त्रों का उच्चारण करते हुए स्थापित गोलक या सुपारी पर थोड़ा-थोड़ा अर्पित करते जाएँ. इस दौरान इन मन्त्रों का जप करें.

मन्त्र-
ओम ह्रीं सिद्धेस्वरी नम:
ओम ऐं ज्ञानेश्वरी नम:
ओम क्रीं योनि रूपाययै नम:
ओम ह्रीं क्रीं भ्रं भैरव रूपिणी नम:
ओम सिद्ध योगिनी शक्ति रूपाययै नम:

इस तरह से मन्त्र जाप पूरा होने पर आप इस एक दूसरे

 मन्त्र – 

“ओम ह्रीं क्रीं सिद्धाययै सकल सिद्धि दात्री ह्रीं क्रीं नम:”

 का इक्कीस बार रुद्राक्ष की माला से माला जप करें. जब आपका माला जप पूर्ण हो जाए तो अनार के दानों में थोड़ा सा घी मिलाकर अग्नि में 108 बार आहुति दें. इस तरह से योगिनी साधना करने पर अंतिम दिन एक अनार लेकर उसे जमीन पर जोर से पटके और उसका रस सीधे अग्नि को अर्पित करें. रस अर्पित करते हुए ‘सिद्ध योगिनी प्रसन्न हो’ यह जपते जाएँ. 

इस तरह से साधना संपन्न होने के अगले दिन पूजन और हवन आदि सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें. रोज पूजा में अर्पित अनार और गुड़ को साधक ग्रहण कर सकता है. पूजा में रखी गई सुपारी या गोलक को पोंछ कर साधक को अपने पास ही रखना चाहिए लेकिन वस्त्र आदि को प्रवाहित कर देना चाहिए.

योगिनी साधना के संपन्न होने पर कन्याओं को भोजन कराना भी उत्तम होता है. इसके अलावा माँ के मंदिर में मिठाई और दक्षिणा भी देना चाहिए. इस साधना के संपन्न होने पर साधक को कई शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं.

योगिनी साधना में सभी योगिनियों में सुरसुन्दरी को सबसे प्रमुख माना जाता है. भूत डामर तंत्र में सुरसुन्दरी की साधना के महत्व को बताया गया है. सुरसुन्दरी की साधना करने वाला साधक अपने हर तरह की मनोकामना की पूर्ति कर सकता है. सुरसुन्दरी के आराधना के लिए सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ आसन पर बैठ जाएँ. इस बाद ‘ओम हौं’ इस मन्त्र से आजमन कर लें. इसके बाद ‘ओम हूँ फट’ मन्त्र जप करते हुए दिग्बंध करें. अब प्राणायाम करें और करऩ्गन्यास करें.

अब चौकी पर अष्ट दल कमल का मिर्माण करके सुरसुन्दरी का मनन करें. इस दौरान सुरसुन्दरी के ध्यान मन्त्र का जाप करें. यह मन्त्र इस प्रकार है – 

“पूर्ण चन्द्र निभां गौरीं विचित्राम्बर धारिणीम, पीनोतुंगकुचां वामां सर्वेषाम् अभयप्रदाम”

मन्त्र जप पूर्ण करने के बाद गुलाब के फूल, धूप, दीप, नैवेद से पूजा पूरी करें और मूल मन्त्र – ‘ओम ह्रीं आगच्छ सुरसुन्दरी स्वाहा’ का जप करें. इस तरह से इस साधना को दिन में तीन बार प्रात:, दोपहर और सायंकाल करना चाहिए.

सुरसुन्दरी की साधना किसी महीने के कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से शुरू करके लगातार पूर्णिमा तक करना चाहिए. जब सुरसुन्दरी प्रसन्न होकर साधक को दर्शन देती है तब साधक अपना वरदान मांग सकता है. साधक सुरसुन्दरी को किसी भी रूप में दर्शन कर सकता है. साधक माँ, बहन या पत्नी के रूप में सुरसुन्दरी को मान सकता है और उसी के अनुरूप संबोधित कर सकता है.

साधना के दौरान यदि साधक को सुरसुन्दरी दर्शन देती है तो साधक को पुष्प, चन्दन का अर्घ्य देना चाहिए. जब साधक सुरसुन्दरी को माता या बहन कहके बुलाता है तो वह उसे कई दिव्य चीज़ों का वरदान देती है और साधक को भूत भविष्य की समझ देती है. 

इसके अलावा माता मानने पर सुरसुन्दरी साधक का पुत्र मानकर रक्षा करती है. जब साधक सुरसुन्दरी को पत्नी मानकर संबोधित करता है तो उसे सुरसुन्दरी बहुत शक्तिशाली बना देती है और तीनों लोगों में उसका आगमन का मार्ग खोल देती हैं. ऐसी स्थिति में सुरसुन्दरी से साधक शारीरिक संबंध का सुख भी पाता है. लेकिन इसके बाद उसे किसी दूसरी स्त्री के ख्याल से भी परहेज करना होता है नही तो ये देवी कुपित हो जाती हैं.

योगिनी साधना के अंतर्गत चौसठ योगिनी साधना का भी विशेष महत्व चौसठ योगिनी साधना में देवी के चौसठ रूपों की आराधना की जाती है. इसके करने से साधक अपने जीवन के सभी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों से मुक्ति मिलती है. 

योगिकी साधना का तंत्र शास्त्र में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और साधक इस महत्वपूर्ण विद्या का लाभ लेकर अपने जीवन को मंगलमय कर सकता है.

राजगुरु जी

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भैरवी साधना में ‘लिंग’ और ‘योनि’ की पूजा




भैरवी साधना में ‘लिंग’ और ‘योनि’ की पूजा

भैरवी मार्ग के साधक ‘योनि’ को आद्याशक्ति मानते हैं क्योंकि सृष्टि का प्रथम बीजरूप उत्पत्ति यही है। ‘लिंग’ का अवतरण इसकी ही प्रतिक्रिया में होता है। 

इन दोनों के मिलने से सृष्टि का आदि परमाणु रूप उत्पन्न होता है। इन दोनों संरचनाओं के मिलने से ही इस ब्रह्माण्ड का या किसी भी इकाई का शरीर बनता है और इनकी क्रिया से ही उसमें जीवन और प्राणतत्व ऊर्जा का संरचना होता है।

 यह योनि  एवं लिंग का संगम प्रत्येक के शरीर में चल रहा है। इसी से चाँद से शिवसार (बिंदु/अमृत/सावित्री/सती) अंदर  जाता है और हमारा जीवन तत्व यही है ।

भैरवी मार्ग का आधार सूत्र है कि मूलाधार में छिपे ऊर्जा रूप योनी-लिंग का प्रत्यक्ष रूप नर-मादा  में योनि लिंग के रूप में प्रकट होता है। 

यह पृथ्वी नामक ग्रह के आकर्षण शक्ति का प्रभाव है कि ये उसकी ओर प्रकट होता है। इनकी प्रकृति ही उत्तेजनात्मक है। इनकी पूजा करके इन पर जपा गया मंत्र शीघ्र ही सिद्ध होता है।

राजगुरु जी

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(तंत्र स्थापना - हमारा प्रयास)




(तंत्र स्थापना - हमारा प्रयास)

आत्मा की सर्वज्ञता को मात्र दो ही तत्वों से जाना जा सकता है गुरु और शिव | और ये दोनों दो तत्व ना होकर वस्तुतः एक ही हैं | और गुरु की व्यापकता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हैं और व्यापकता है परा जगत में तभी तो विश्व के सम्पूर्ण मन्त्रों को धारण करने की क्षमता मात्र द्गरु की कृपा से ही प्राप्त की जा सकती है |

जीवन के विविध आयामों की प्राप्ति का ज्ञान मात्र सद्गुरु की कृपा दृष्टि से ही संभव है | और यदि समर्थ गुरु ने तुम्हे हुमस कर अपने गले से लगाया हो तो,फिर भला क्या है जो प्राप्त नहीं किया जा सकता है |

 यदि हम निर्माण की प्रक्रिया को समझे तो मात्र योजना,सम्बंधित उपकरण व माध्यम और निर्धारित व्यवस्था का आपस में योग कर हम निर्माण की क्रिया को सफलता पूर्वक संपन्न कर सकते हैं | अर्थात......

योजना – मंत्र

सम्बंधित उपकरण,माध्यम – यन्त्र

निर्धारित व निश्चित व्यवस्था – तंत्र

यदि हम इस सूत्र को भली भांति आत्मसात कर लें तो असफलता कोसो कोसो दूर ही रहती है हमसे | जीवन की आपाधापी में लगातार हो रहे आघात,टूटते स्वप्न,विश्वासघात, अनजाने डर के मध्य भला कैसे सफलता पायी जा सकती है ???

साधना मार्ग का आश्रय लेकर अपने स्वप्न को टूटने से ना सिर्फ बचाया जा सकता है अपितु मन की कसक .....जो कही बहुत गहरे पैठ बना चुकी है हमारी आत्मा में,उसे भी दूर किया जा सकता है |

 साधना अकर्मण्य हो जाने का क्षेत्र नहीं है,बल्कि जिसमें असीम प्राण ऊर्जा हो,दृढ संकल्प शक्ति हो और परिश्रम से ना भागने की मानसिकता हो,वो सफलता पा ही लेता है | क्यूंकि १० मिनट एकाग्र होकर बिना हिले डुले,स्थिर मन से बैठना सहज संभव नहीं है |

 हम सभी अपने लक्ष्य को पाना चाहते हैं | अपना नाम सफल व्यक्ति की श्रेणी में रखना चाहते हैं, किन्तु क्या ये इतना सहज है ......

 नहीं ना | जैसे ही हम अपने लक्ष्य की और गतिशील होते हैं तो कोई ना कोई अड़चन हमारा मार्ग रोकने को आतुर ही खड़ी रहती है |

कभी संतान का स्वास्थ्य

कभी आर्थिक परेशानी

कभी घरेलु विवाद

कभी अकाल दुर्घटना का भय

कभी कमजोर आत्मबल

कभी स्थिरता का अभाव

कभी अनजाना भय

कभी विश्वास घात

कभी तंत्र बाधा

कभी अनजाने रोगों से सामना

कभी मानसिक तनाव

कभी गुप्त या प्रकट शत्रुओं का मकडजाल

कभी शासन का या अधिकारी का अनचाहा हस्तक्षेप

कभी घर पर किसी ना किसी सदस्य का रोगग्रस्त रहना

   ऐसे  सैकडो “कभी” हैं जो हमें जीवन पथ पर ना सिर्फ विचलित कर देते हैं,अपितु हमारी प्रगति को ही रोक देते हैं....और हम जहाँ से चले थे..उससे भी कई गुना पिछड़ जाते हैं..

तब जीवन के उत्तरार्ध में मात्र यही बाकी रह जाता है की “मैं चाह कर भी कुछ ना कर पाया और,यदि परिस्थितियाँ मेरे अनुकूल होती तो मैं आज यहाँ नहीं होता |”

तंत्र को लेकर जितनी भ्रांतियां समाज में प्रचलित हैं,शायद उतनी किसी और विषय को लेकर कदापि नहीं हैं |

 जबकि मैंने ऊपर लिखा भी है की निश्चित व्यवस्था के अनुसार जीवन यापन करना या क्रिया करना ही तंत्र है | हमारा पुरातन इतिहास बहुत ही समृद्ध रहा है और वो समृद्धि मात्र इसी ज्ञान की वजह से हमारे पूर्वजों के पास थी | हमें तो ये भी नहीं पता है की हम स्वर्णयुग से लोह्युग की ओर आयें है | 

जिस विकास पर आज हम इतरा रहे हैं वो मात्र थोथा है | और इसका कारण मात्र यही है की हमें उन पद्धतियों का ज्ञान नहीं है जिनके द्वारा सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है |
  
जब भी एक आम व्यक्ति या साधक कष्टों में फंसता है तो सीधा दौडकर तथाकथित तांत्रिकों,या ज्योतिषों के पास जाता है और फिर शुरू होता है उसके कष्टों के बढ़ने का सिलसिला...

.एक के बाद एक मनमाने उपायों पर धन लुटाते लुटाते उसकी मानो कमर ही टूट जाती है,और जब तक उसकी वापसी होती है वो पूरी तरह बर्बाद हो जाता है | और अंत में वो इस पूरे कांड का ठीकरा तंत्र के नाम पर फोड कर उसे कपोल-कल्पित घोषित कर देता है | 

आधा ज्ञान एक शत्रु से भी खतरनाक शत्रु है जो तबाही के अलावा कुछ भी नहीं देता है | अतः जो भी करो उसका पूर्ण ज्ञान तो कम से कम हमें हो......
   
मैं बहुधा सोचा करता था की यदि मुझे सफलता मिली तो मेरे अन्य भाई-बहनों को क्यूँ नहीं मिली ?? फिर जब देखा तो समझ में आया की मेरा जूनून मात्र गुरु आज्ञा ही थी और उनके द्वारा प्रदत्त साधनाओं के लिए कभी भी मेरे मन में किन्तु-परंतु नहीं आया| 

नतीजा एक बार में नहीं दो बार में नहीं किन्तु कई बार के बाद सफलता मिली और जब एक बार मिल तो वो कुंजी भी समझ में आई की कैसे एक बार में ही सफलता पायी जा सकती है | मेरा प्रयास मात्र साधनाओं और इस विज्ञान को प्रमाणिकता दिलाना है | 

कोई इस नाम से ठगा ना जाए,और ना ही आर्थिक,मानसिक या शारीरिक कष्टों को इस निमित्त बर्दाश्त करे,बस यही मेरा और ” अर्थात “

  महाविद्या पराविज्ञान शोध इकाई” का लक्ष्य है |
  
आप मात्र साधनाएं करिये और अपने परिवार के सपनों को अपने परिश्रम और सकारात्मक ऊर्जा से सार्थकता दीजिए | 

साधनाएं कीजिये किन्तु मात्र कल्पना जगत में डूबकर नहीं,अपितु उसके साथ साथ भौतिक जीवन के सुख संसाधनों से भी अपने परिवार को तृप्त रखिये | २४ में से ५ घंटे तो हम खुद के लिए निकाल ही सकते हैं ना .....
  
 किसी तांत्रिक के पास मत भटकिए अपितु द्गुरु प्रदत्त ज्ञान पर श्रृद्धा रखिये...उन्होंने हमें सत्य मार्ग का अनुसरण करना सिखाया है | यदि हम सफलता से वंचित हैं तो मात्र हमारी त्रुटियों और ज्ञानाभाव के कारण |

आप साधनाएं कर सके और,इस हेतु हम ने अब ये प्रयास किया है की आपका जीवन सुचारू रूप से चल सके और आप ऊपर जो ढेर सारे कभी लिखे हुए हैं...उन कभी में ना उलझ कर  मात्र साधनाएं कर सकें,तथा उनके निवारण हेतु किसी ढोंगी के चक्कर में फंसकर अपना समय,सुकून और धन बर्बाद ना करे |

 इस हेतु मेरे भाई बहनों के लिए हमारीअन्य साधनात्मक योजनाओं के साथ साथ विभिन्न कवच का निर्माण कार्य प्रारंभ किया है | ये पूरी तरह निशुल्क है | क्यूंकि मेरे बहुत से भाई बहन ऐसे हैं जो गुप्त सहयोग कर अन्य भाई बहनों के लिए मार्ग प्रशस्त करने में हमारा सहयोग लगातार कर रहे हैं |

 उनके सहयोग से हमारी कई योजनाओं ने साकारता प्राप्त की है | और मैं आपको ये बता देना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ की आप इन कवच का “औरा मंडल” परिक्षण करवा सकते हैं | और इसे देखकर आपको स्वतः ज्ञात हो ही जायेगा की कवचों या सामग्रियों पर प्रामाणिक प्राण प्रतिष्ठा,चैतन्यता और मंत्र का प्रभाव कैसे दिखाई पडता है | 

साथ ही गुरु के द्वारा प्रदत्त ज्ञान से कुछ औषधियों का भी वितरण जैसे – सिद्धद्रव्य (साधनाकाल की शिथिलता निवारक  और आसन सिद्धि में सहायक),श्वित्र कुष्ठ हरलेप, मधुर्मेहविनासिनी, दमा रोग निवारक,वात-पित्त-क्फदोष नाशक,श्वेत प्रदर नाशक, पुंसत्व प्राप्ति योग आदि  भाई बहनों के लिए होगा,जो दैनिक जीवन के कुछ रोग और साधनात्मक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगी | 

इनका निर्माण हमारे वे  भाई बहन कर रहे हैं जो बकायदा आयुर्वेद में चिकित्सक का प्रमाण पत्र प्राप्त किये हुए हैं,तथा रजिस्टर्ड हैं | 

काल गर्त में ये औषधियाँ विलुप्त ही हो गयी थी,किन्तु अब परिश्रम करके हम उन्हें आपके सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं और ये भी पूरी तरह हमारे भाई बहनों के लिए निशुल्क है |

 इन कवचों पर अभी कार्य चल रहा है और श्रावण के बाद इन्हें वांछित व्यक्तियों के पास भेज दिया जायेग.

राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

 (रजि.)

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...