Wednesday, August 8, 2018

हनुमान चालीसा के.. VISHISHTH PRAYOG



हनुमान चालीसा के.. VISHISHTH PRAYOG

भारतीय आगम तथा निगम में स्तोत्र का एक महत्वपूर्ण स्थान है. सामान्य रूप से स्तोत्र की व्याख्या कुछ इस प्रकार की जा सकती है की स्तोत्र विशेष शब्दों का समूह है जिसके माध्यम से इष्ट की अभ्यर्थना की जाती है.

 वस्तुतः स्तोत्र के भी कई कई प्रकार है लेकिन तंत्र में इन स्तोत्र को सहजता से नहीं लिया जा सकता है, तंत्र वह क्षेत्र है जहां पर पग पग पर अनन्त रहस्य बिखरे पड़े है. चाहे वह शिवतांडव स्तोत्र हो या सिद्ध कुंजिका, सभी अपने आप में कई कई गोपनीय प्रक्रिया तथा साधनाओ को अपने आप में समाहित किये हुवे है. 

कई स्तोत्र, कवच, सहस्त्रनाम, खडगमाल आदि शिव या शक्ति से श्रीमुख से उच्चारित हुवे है जो की स्वयं सिद्ध है और यही स्तोत्र विभिन्न तंत्र के भाग है. इसके अलावा कई महासिद्धो ने भी अपने इष्ट की साधना कर उनको प्रत्यक्ष किया था तथा तदोपरांत स्तोत्र की रचना कर उन स्तोत्र की जनमानस के कल्याण सिद्धि हेतु अपने इष्ट से वरदान प्राप्त किया था.

 ऐसे स्तोत्र निश्चय ही सर्व सिद्धि प्रदाता होते है. उपरोक्त पंक्तियाँ हनुमान चालीसा की है.

 हनुमान चालीसा के बारे में आज के युग में कोन व्यक्ति अनजान है. वस्तुतः हनुमान चालीसा एक विलक्षण साधना क्रम है जिसमे कई सिद्धो की शक्ति कार्य करती है, विविध साबर मंत्रो के समूह सम यह चालीसा अनंत शक्तियों से सम्प्पन है. 

खेर, देखा देखि में आज के युग में हर देवी देवता से सबंधित चालीसा प्राप्त हो जाती है लेकिन तंत्र की द्रष्टि से देखे तो वह मात्र काव्य से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है क्यों की न ही उसमे कोई स्वयं चेतना है और ना ही इष्ट शक्ति. इसके अलावा उसमे कोई महासिद्ध का कोई प्रभाव आदि भी नहीं है. 

एसी चालीसा और दूसरे काव्यों में कोई अन्तर नहीं है उसका पठन करने पर साधक को क्या और केसे कोई उपलब्धि हो सकती है इसका निर्णय साधक खुद ही कर सकता है. निश्चय ही आदी चालीसा अर्थात हनुमान चालीसा के अलावा कोई भी चालीसा का पठन सिद्धि प्रदान करने में असमर्थ है.

अगर सूक्ष्म रूप से अध्ययन किया जाए तो हनुमान जी के मूल शिव स्वरुप के आदिनाथ स्वरुप की ही साबर अभ्यर्थना है, कानन कुंडल, संकर सुवन, तुम्हारो मन्त्र, आपन तेज, गुरुदेव की नाइ, अष्ट सिद्धि आदि विविध शब्द के बारे में साधक खुद ही अध्ययन कर विविध पदों के गूढार्थ समजने की कोशिश करे तो कई प्रकार के रहस्य साधक के सामने उजागर हो सकते है.

कई वर्षों पूर्व साधना जगत में प्रवेश के प्रारंभिक दिनों में ही जूनागढ़ के एक साधक से मुलाकात हुई, जिनका नाम जिज्ञेश था. योग और तांत्रिक साधना में बचपन से ही काफी रुजान था उनका. गिरनार क्षेत्र के सिद्धो के सबंध में खोज में उनकी विशेष रूचि थी.

 सम्मोहन तथा वशीकरण आदि विद्याओ के बारे में काफी अच्छा ज्ञान रखते थे. उनके इष्ट हनुमान थे. तंत्र सबंधित चर्चा में सर्व प्रथम उन्होंने हनुमान चालीसा के बारे में विशेष जानकारी प्रदान की थी. उन्होंने बताया की

“जो सत् बार पाठ करे कोई, छूटही बंदी महासुख होई”

जो हनुमान चालीसा का 100 बार पाठ कर लेता है तो बंधन से मुक्त होता है तथा महासुख को प्राप्त होता है. लेकिन यह सहज ही संभव नहीं होता है, भौतिक अर्थ इसका भले ही कुछ और हो लेकिन आध्यात्मिक रूप से  यहाँ पर बंधन का अर्थ आतंरिक तथा शारीरिक दोनों बंधन से है.

 तथा महासुख अर्थात शांत चित की प्राप्ति होना है. लेकिन कोई भी स्थिति की प्राप्ति के लिए साधक को एक निश्चित प्रक्रिया को करना अनिवार्य है क्यों की एक निश्चित प्रक्रिया ही एक निश्चित परिणाम की प्राप्ति को संभव बना सकती है.

हनुमान चालीसा से सबंधित एक प्रयोग उन्होंने ही मुझे बताया था, उसका उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है. लेकिन उससे पहले इससे सबंधित कुछ अनिवार्य तथ्य भी जानने योग्य है.

हनुमान चालीसा का यह प्रयोग सकाम प्रयोग तथा निष्काम प्रकार दोनों रूप में होता है. इस लिए साधक को अनुष्ठान करने से पूर्व अपनी कामना का संकल्प लेना आवश्यक है. अगर कोई विशेष इच्छा के लिए प्रयोग किया जा रहा हो तो साधक को संकल्प लेना चाहिए की

 “ में अमुक नाम का साधक यह प्रयोग ____कार्य के लिए कर रहा हू, भगवान हनुमान मुझे इस हेतु सफलता के लिए शक्ति तथा आशीर्वाद प्रदान करे. ” अगर साधक निष्काम भाव से यह प्रयोग कर रहा है तो संकल्प लेना आवश्यक नहीं है.

साधक अगर सकाम रूप से साधना कर रहा है तो साधक को अपने सामने भगवान हनुमान का वीर भाव से युक्त चित्र स्थापित करना चाहिए. अर्थात जिसमे वह पहाड़ को उठा कर ले जा रहे हो या असुरों का नाश कर रहे हो. लेकिन अगर निष्काम साधना करनी हो तो साधक को अपने सामने दास भाव युक्त हनुमान का चित्र स्थापित करना चाहिए अर्थात जिसमे वह ध्यान मग्न हो या फिर श्रीराम के चरणों में बैठे हुवे हो.

साधक को यह क्रम एकांत में करना चाहिए, अगर साधक अपने कमरे में यह क्रम कर रहा हो तो जाप के समय उसके साथ कोई और दूसरा व्यक्ति नहीं होना चाहिए.

स्त्री साधिका हनुमान चालीसा या साधना नहीं कर सकती यह मात्र मिथ्या धारणा है. कोई भी साधिका हनुमान साधना या प्रयोग सम्प्पन कर सकती है. रजस्वला समय में यह प्रयोग या कोई साधना नहीं की जा सकती है. साधक साधिकाओ को यह प्रयोग करने से एक दिन पूर्व, प्रयोग के दिन तथा प्रयोग के दूसरे दिन अर्थात कुल 3 दिन ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए.

सकाम उपासना में वस्त्र लाल रहे निष्काम में भगवे रंग के वस्त्रों का प्रयोग होता है. दोनों ही कार्य में दिशा उत्तर रहे. साधक को भोग में गुड तथा उबले हुवे चने अर्पित करने चाहिए. कोई भी फल अर्पित किया जा सकता है. साधक दीपक तेल या घी का लगा सकता है. 

साधक को आक के पुष्प या लाल रंग के पुष्प समर्पित करने चाहिए.

यह प्रयोग साधक किसी भी मंगलवार की रात्रि को करे तथा समय १० बजे के बाद का रहे. सर्व प्रथम साधक स्नान आदि से निवृत हो कर वस्त्र धारण कर के लाल आसान पर बैठ जाये. साधक अपने पास ही आक के १०० पुष्प रखले. 

अगर किसी भी तरह से यह संभव न हो तो साधक कोई भी लाल रंग के १०० पुष्प अपने पास रख ले. अपने सामने किसी बाजोट पर या पूजा स्थान में लाल वस्त्र बिछा कर उस पर हनुमानजी का चित्र या यन्त्र या विग्रह को स्थापित करे. 

उसके बाद दीपक जलाये. साधक गुरु पूजन गुरु मंत्र का जाप कर हनुमानजी का सामान्य पूजन करे. इस क्रिया के बाद साधक ‘हं’ बीज का उच्चारण कुछ देर करे तथा उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम करे. प्राणायाम के बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करे तथा अपनी मनोकामना बोले. 

इसके बाद साधक राम रक्षा स्तोत्र या ‘रां रामाय नमः’ का यथा संभव जाप करे. जाप के बाद साधक अपनी तीनों नाडी अर्थात इडा पिंगला तथा सुषुम्ना में श्री हनुमानजी को स्थापित मान कर उनका ध्यान करे. तथा हनुमान चालीसा का जाप शुरू कर दे.

 साधक को उसी रात्रि में १०० बार पाठ करना है. हर एक बार पाठ पूर्ण होने पर एक पुष्प हनुमानजी के यंत्र/चित्र/विग्रह को समर्पित करे. इस प्रकार १०० बार पाठ करने पर १०० पुष्प समर्पित करने चाहिए.

 १०० पाठ पुरे होने पर साधक वापस ‘हं’ बीज का थोड़ी देर उच्चारण करे तथा जाप को हनुमानजी के चरणों में समर्पित कर दे.

इस प्रकार यह प्रयोग पूर्ण होता है. साधक दूसरे दिन पुष्प का विसर्जन कर दे.

 इसके अलावा भी हनुमान चालीसा से सबंधित कई महत्वपूर्ण प्रयोग मुझे उस साधक ने बताये थे जो की कई बार अनुभूत है, वो प्रयोग भी समय समय पर आप के मध्य रखने का प्रयास रहेगा जिससे की समस्त साधकगण लाभान्वित हो सके.

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम  (  राजयोग पीठ  )  फॉउन्डेशन ट्रस्ट 

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Tuesday, August 7, 2018

क्रोध भैरव साधना



क्रोध भैरव साधना               

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तंत्र के क्षेत्र में भगवान भैरव का स्थान तो अपने आप में निराला है, यह देव अपने साधकोको शीघ्र सिद्धि एवं कल्याण प्रदान करने के कारण सदियों से महत्वपूर्ण उपास्य देव रहे है. 

भगवान शिव के स्वरुपसमही उनके ये विविध रूप, सभी स्वरुप अपने आप में निराले तथा विलक्षण, तंत्र के क्षेत्र में भैरव के यूँ तो ५२ रूप प्रचलित है लेकिन ८ रूप मुख्यरूप से ज्ञात है. इनको संयुक्त रूप से अष्ट भैरव के नाम से जाना जाता है. वस्तुतः भगवान भैरव से सबंधित कई कई प्रकार की तांत्रिक साधना विविध मत के अंतर्गत होती आई है. 

कापालिक, नाथ, अघोर इत्यादि साधना मत में तो भगवान भैरव का स्थान बहोत ही उच्चतम माना गया है.

 तंत्र में जहां एक और गणपति को विघ्न निवारक के रूप में पूजन करना अनिवार्य क्रम है तो साथ ही साथ सिद्धो के मत से किसी भी साधना के लिए भैरव पूजन भी एक अनिवार्य क्रम है क्यों की यह रक्षात्मक देव है जो की साधक तथा साधक के साधना क्रम की सभी रूप में रक्षा करते है. 

वस्तुतः भैरव को संहारात्मक देवता के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है जिसके कारण सामान्य जनमानस के मध्य इनको भय की द्रष्टि से देखा जाता है लेकिन इनकी संहारात्मक प्रकृति साधक के लिए नहीं वरन साधक के शत्रु तथा कष्टों के लिए होती है तथा इसी तथ्य का अनुभव तो कई महासिद्धो ने अपने जीवन में किया है,

 आदि शंकराचार्य गोरखनाथ से ले कर सभी अर्वाचीन प्राचीन सिद्धोने एक मत में भगवान भैरव की साधना को अनिवार्य तथा जीवन का एक अति आवश्यक क्रम माना है.

 यूँ तो भगवान भैरव से सबंधित कई कई प्रकार के प्रयोग साधको के मध्य है ही तथा इसमें भी बटुकभैरव एवं कालभैरव स्वरुप तो तंत्र साधको के प्रिय रहे है लेकिन साथ ही साथ भैरव के अन्य स्वरुप भी अपनी एक अलग ही विलक्षणता को लिए हुवे है. 

भगवान क्रोध भैरव के सबंध में भी ऐसा ही है. यह स्वरुप क्रोध का ही साक्षात स्वरुप है अर्थात पूर्ण तमस भाव से युक्त स्वरुप. यह स्वरुप पूर्ण तमस को धारण करने के कारण साधक को अत्यधिक तीव्र रूप से तथा तत्काल परिणाम की प्राप्ति होती है.

 इनकी उपासना शत्रुओ के मारण, उच्चाटन, सेना मारण आदि अति तीक्ष्ण क्रियाओं के लिए होती आई है. वस्तुतः इनकी साधना इतनी प्रचलित नहीं है इसके पीछे भी कई कारण है, खास कर इनकी संहारात्मक प्रकृति. 

इसी लिए भयवश भी इनकी साधना साधक नहीं करते है, साक्षात् तमस का रूप होने के कारण इनके प्रयोग असहज भी है तथा थोड़े कठिन भी. 

प्रस्तुत साधना भगवान के इसी स्वरुप की साधना है जिसको पूर्ण कर लेने पर साधक इसका प्रयोग अपने किसी भी शत्रु पर कर उसको जमींन चटा सकता है, शत्रु के पुरे घर परिवार को भी तहस महस कर सकता है, यह प्रयोग भी सिर्फ सिद्धो के मध्य ही प्रचलित रहा है क्यों की भले ही यह प्रयोग उग्र है लेकिन इसमें ज्यादा समय नहीं लगता है तथा एक बार साधना सम्प्पन कर लेने पर साधक उससे जीवन भर लाभ उठा सकता है. 

आज के युग में जहां एक तरफ असुरक्षा सदैव ही साधक पर हावी रहती है तथा पग पग पर ज्ञात अज्ञात शत्रुओ का जमावडा लगा हुआ है तब एसी स्थिति में इस प्रकार के प्रयोग अनिवार्य ही है, इस लिए उग्र प्रयोग होने के कारण भी इस प्रयोग को यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे की आवश्यकता पड़ने पर साधक अपने जीवन की तथा अपने परिवार की गरिमा को रख सके तथा पूर्ण सुरक्षा को प्राप्त कर सके.     

यह प्रयोग अत्यधिक तीव्र प्रयोग है अतः साधक अपनी विवेक बुद्धि के अनुसार स्वयं की हिम्मत आदि के बारे में सोच कर ही प्रयोग करे, प्रयोग के मध्य साधक को तीव्र अनुभव हो सकते है.

साधक को अगर कोई व्यक्ति अत्यधिक परेशान कर रहा हो तथा बिना कारण अहित किये जा रहा हो तब यह प्रयोग करना उचित है लेकिन सिर्फ किसी को बेवजह परेशान करने के उद्देश्यआदि को मन में रख कर यह प्रयोग नहीं करना चाहिए वरना साधक को इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है. 

साधक को इस प्रयोग को रक्षात्मक रूप से लेना चाहिए तथा अपनी तथा घर परिवार की सुरक्षा के लिए साधक यह प्रयोग कर सकता है.

यह प्रयोग साधक किसी भी अमावस्या या कृष्ण पक्ष अष्टमी को स्मशान में या निर्जन स्थान में करे. समय रात्रि में १० बजे के बाद का रहे

साधक काले रंग के वस्त्र को धारण करे तथा काले रंग के आसन पर बैठे. साधक का मुख दक्षिण दिशा की तरफ होना चाहिए.

साधक अपने सामने भैरव का कोई विग्रह या चित्र स्थापित करे, उस पर सिन्दूर अर्पित करे. साधक गुरु पूजन कर चित्र या विग्रह का पूजन करे. साधक लाल रंग के पुष्प का प्रयोग करे. साधक को किसी पात्र में मदिरा भी अर्पित करनी चाहिए.

इसके बाद साधक को गुरु मंत्र का जाप करना चाहिए. जाप के बाद साधक न्यास करे.

करन्यास

भ्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
भ्रीं तर्जनीभ्यां नमः
भ्रूं मध्यमाभ्यां नमः
भ्रैं अनामिकाभ्यां नमः
भ्रौं कनिष्टकाभ्यां नमः
भ्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

हृदयादिन्यास

भ्रां हृदयाय नमः
भ्रीं शिरसे स्वाहा
भ्रूं शिखायै वषट्
 भ्रैं कवचाय हूं
भ्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्
भ्रः अस्त्राय फट्

न्यास के बाद साधक रुद्राक्ष माला से निम्न मन्त्र की ५१ माला मन्त्र जाप करे.

 ॐ भ्रं भ्रं भ्रं क्रोधभैरवाय अमुकं उच्चाटय भ्रं भ्रं भ्रं फट्  

(OM BHRAM BHRAM BHRAM KRODHBHAIRAVAAY AMUKAM UCCHAATAY BHRAM BHRAM BHRAM PHAT)

मन्त्र जाप पूर्ण होने पर साधक वहीँ पर किसी पात्र में आग प्रज्वलित कर के १०८ आहुति बकरे के मांस में शराब को मिला कर अर्पित करे. 

भोग के लिए अर्पित की गई मदिरा वहीँ छोड़ दे. दूसरे दिन किसी श्वान को दहीं या कुछ भी अन्य खाध्य प्रदार्थ खिलाएं.

इसके बाद साधक को जब भी प्रयोग करना हो तो साधक को रात्री काल में १० बजे के बाद उपरोक्त क्रियाओं अनुसार ही पूजन आदि क्रिया कर इसी मन्त्र की १ माला मन्त्र का जाप कर १०१ आहुति शराब तथा बकरे के मांस को मिला कर देनी चाहिए. 

मन्त्र में अमुकं की जगह सबंधित व्यक्ति या शत्रुका नाम लेना चाहिए जिसके ऊपर प्रयोग किया जा रहा हो, इस प्रकार करने से उस व्यक्ति का उच्चाटन हो जाता है तथा वह साधक के जीवन में कभी परेशानी नहीं डालता.

 अगर साधक प्रयोग की आहुति देने के बाद निर्माल्य या भष्म को उठा कर शत्रु के घर के अंदर दाल देता है तो शत्रु का पूरा घर परेशान हो जाता है, घर के सभी सदस्यों को दुःख एवं  कष्ट का सामना करना पड़ता है तथा शत्रु पूर्ण घर परिवार सहित बरबाद हो जाता है.

राजगुरु जी

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रावण को भगवान शिव द्वारा दिया गया विशिष्ट तंत्र ज्ञान





     रावण    को भगवान शिव द्वारा दिया गया विशिष्ट

तंत्र ज्ञान

तंत्र शास्त्र भी अन्य विज्ञान-विधाओं की तरह सिद्धांत और प्रयोग इन दोनों ही पक्षों की व्याख्या करता है। तंत्र क्योंकि प्रक्रिया प्रधान शास्त्र है, इसलिए इसकी साधना में गुरु-शिष्य परंपरा की अपेक्षा होती है।

परंपरा भेद से एक ही साधना प्रक्रिया प्रयोगों के संदर्भ में दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो जाती है। लेकिन प्रत्येक संप्रदाय शिव को अपना आचार्य मानने में एकमत है। इतना ही नहीं सुर हों या असुर सभी पर शिव की कृपा एक समान बरसती है। आचार्य और गुरु में ऐसा निष्पक्ष भाव होना ही चाहिए।

भगवान शिव ने लंकापति रावण को जो तंत्र ज्ञान दिया, उसमें सात्विक साधनाओं के साथ ही तामसी साधनाओं का भी समावेश है। परोक्ष रूप से इनका उद्देश्य तमोगुण की उपेक्षा करते हुए उसका परिष्कार करना है।

ये साधनाएं जहां शीघ्र सिद्धि प्रदान करने वाली हैं, वहीं इनकी प्रक्रिया भी सरल-सुगम है। जटिलता न होने के कारण इनकी साधना सामान्य साधक भी कर सकता है। तंत्र शास्त्र की इस विधा में बिना किसी परिश्रम के प्राप्त होने वाली जड़ी-बूटियों एवं सामग्री के प्रयोग का भी विधान है, जिससे सुनिश्चित रूप से इष्ट की सिद्धि होती है।

वैसे तो ज्ञान का मार्ग प्रत्येक जिज्ञासु के लिए खुला है और आचार्य अपने प्रत्येक शिष्य को बिना किसी पक्षपात के ज्ञान देता है। लेकिन गुह्य विधाओं का ज्ञान देते समय आचार्य को शिष्य की परख करनी होती है,

 यह निश्चित हो जाने के बाद कि जिसे शक्ति दी जा रही है, वह उसका प्रयोग जनहित में ही करेगा, आचार्य उस विद्या के गुप्त रहस्यों को खोलता है। भगवान शिव ने तंत्रशास्त्र के गुप्त रहस्यों का लंकाधिपति रावण को ज्ञान क्यों दिया,

 इस बारे में साधारण मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है। लेकिन फिर यह विचार कर मौन रहना पड़ता है कि शिष्य की अंतरात्मा को गुरु के सिवाय और कौन जान सकता है। जिसे हम राक्षसराज रावण कहते हैं, उसके भीतरी व्यक्तित्व-श्रीविष्णु के पार्षद रूप को देखकर भगवान सदाशिव ने ही संभवतया यह ज्ञान दिया होगा।

समुद्र के समान विशाल है भारतीय तंत्र ! इसमें लौकिक और पारलौकिक समुन्नति के वे सभी साधन उपलब्ध हैं, जिनसे सामान्य बुद्धि वाले तथा गहन शास्त्रों के ज्ञाता दोनों ही अपनी-अपनी रुचि के अनुसार इच्छित वस्तुओं अथवा फल की प्राप्ति के मार्ग-निर्देशन प्राप्त कर सकते हैं।

आस्तिक जगत् में व्याप्त आस्था की मूल धरोहर तंत्रशास्त्र ही है। यों तंत्रशास्त्र के अनेक विभाग हैं, उन विभागों में से एक हमारी इस पुस्तक का विषय है।

 वस्तुत: प्रत्येक तंत्र में साधना के शिखर पर पहुंचना अत्यंत आवश्यक है। केवल मानसिक उल्लास और विशेष उत्साह मात्र से काम नहीं चलता है।

 अत: तंत्र की साधना में आगे बढ़कर अपनी मनवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए पूरी जानकारी प्राप्त कर लेना बहुत आवश्यक है।

तंत्र की जिस साधना को करना है, उस पर पूरी श्रद्धा होना बहुत आवश्यक है। इससे किसी भी प्रकार की विघ्न-बाधा का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि श्रद्धा और विश्वास यही फल देने वाले हैं।

 पूर्व महर्षियों ने बिना किसी छल अथवा स्वार्थ के इस विद्या का मार्ग प्रकाशित किया है। यह विद्या श्रीशिव की आराधना से परिपूर्ण है तथा कल्याण का मार्ग है। इस प्रकार विचारों की दृढ़ता से कर्म करने में शिथिलता नहीं आती, बल्कि निर्भीकता आती है।

इसलिए जिस कर्म या कृत्य को करना चाहते हैं, उसकी जानकारी पहले से प्राप्त करना बहुत ही आवश्यक है।

तंत्रशास्त्र एक महान वैज्ञानिक देन है, जिसके द्वारा बताए गए मार्ग का आलंबन लेकर साधक बड़ी से बड़ी कामनाओं को सहज रूप में साध सकता है।

इस विद्या को प्रारंभ में गुप्त रखने का निर्देश था। गुरुजन शिष्य की अनेक प्रकार से परीक्षाएं लेकर तथा क्रमश: उसे अपने पास रखकर ही इस विद्या का ज्ञान देते थे, शिष्य में धैर्य, साहस, शक्ति, परंपरा का ज्ञान आदि को परख कर आत्मकल्याण और लोककल्याण के निमित्त तंत्र-साधना के रहस्य बतलाए जाते थे।

 परिस्थिति और उसकी आवश्यकता का पूरा बलाबल देखकर, बहुत आवश्यक होने पर शिष्य गुरु की आज्ञानुसार ही प्रयोग करते थे। असमय में छोटी-सी बात पर उग्र हो जाने अथवा प्रतिपक्षी के सामर्थ्य का ज्ञान किए बिना उतावले होकर प्रयोग करना शास्त्रों में पूर्णत: निषिद्ध है।

तंत्रशास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नित्य नैमित्तिकयोः पूर्तो काम्य कर्म विधीयते। अर्थात् नित्य कर्म और नैमित्तिक कर्मों की पूर्णता होने पर ही काम्य कर्म करना चाहिए।

 कहने का अर्थ यह है कि जो नित्य कर्म करता है, उसे नैमित्तिक कर्म करने का अधिकार होता है तथा जो नित्य एवं नैमित्तिक कर्म नियमित करता है, उसे काम्य कर्म संपादन का अधिकार होता है। यह अधिकार प्रायः हर किसी को आसानी से नहीं मिल पाता।

तंत्र-साधना करने वाले साधक को नित्य कर्म की दृष्टि से आचार और विचारों से पवित्र रहते हुए अपनी परंपरा के अनुसार पवित्रता से स्नान, संध्या, देवपूजन, स्तुति पाठादि करते रहना आवश्यक है। अपनी मर्यादा में रहते हुए शास्त्रों की आज्ञा का पालन करना धर्ममार्ग का प्रथम सोपान है।

प्रात: बिस्तर से उठते ही गुरु-स्मरण, इष्टदेव-स्मरण, भूमिवंदन, करतलदर्शन करके सर्वप्रथम अपना दाहिना पांव भूमि पर रखकर दैनिक क्रिया करें। शौच-स्नान से निवृत्त होकर स्वच्छ धुले हुए रेशमी वस्त्र धारण कर पूजा-स्थल पर जाएं। आसन की भूमि को पवित्र करके वहां जल से त्रिकोण बनाकर प्रणाम करें और आसन बिछाकर बैठें।

प्राय: सभी प्रकार की तंत्र-साधनाओं के मूल में गुरु के प्रति पूर्ण निष्ठा, भक्ति और कृतज्ञता भाव के बिना कितना ही प्रयास करें, सफलता दूर ही रहती है। गुरु का महत्त्व सर्वोपरि है। जब भी साधना, पूजा, जप, प्रयोग आदि आरंभ करें, तब पहले निम्न मंत्र से गुरुवंदन अवश्य करें।

ॐ गुं गुरुभ्यो नमः इस मंत्र का जप करने से गुरु, परमगुरु और परमेष्ठी गरु अत्यंत प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं, जिससे साधना अथवा प्रयोग का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। साधना में विघ्न भी बहुत आते हैं, अत: ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का एक माला जप करना भी आवश्यक होता है।

जिस साधक को गुरु द्वारा मंत्र की दीक्षा न मिली हो, उसके लिए यह सरलतम उपाय है। गुरु और गणपति के मंत्र जप से साधना अथवा प्रयोग में कोई त्रुटि नहीं रह जाती। तंत्रों में विधि की प्रधानता पर बहुत बल दिया गया है।

विधि की अपूर्णता, सम-विषमता, न्यूनाधिक अथवा कर्म-विपर्ययता आदि से दोष हो जाता है। कार्य सफल नहीं होते तथा शरीर और मन में विकार आने लगते हैं। इसलिए पूरी विधि समझ लेने के बाद ही कर्म करना चाहिए। जिन कर्मों का निषेध किया गया है, उस निषेध का भी पूर्णतया पालन करना चाहिए।

तंत्र-साधक को चाहिए कि वह साधना में प्रथम सोपान के रूप में गायत्री मंत्र का जप करे और प्रयोग के अंत में महामृत्युंजय मंत्र का जप अवश्य करे। इससे दोष शमन तथा प्रायश्चित शमन होता है और सफलता मिलती है।

 महामृत्युंजय मंत्र श्रीशिव का है। सृष्टि के समापन की व्यवस्था करने वाली तीसरी ईश्वरी शक्ति का नाम शिव है। ब्रह्मा (उत्पत्ति) और विष्णु (पालन) की भांति इस तीसरी शक्ति को "शिव" की संज्ञा से अभिहित किया गया है।

 शिव के अन्य नाम भी हैं-शंकर, शंभु, महादेव, कपर्दी, महेश्वर, महेश, त्रिलोचन, कापालिक और भूतेश आदि। सृष्टि का अंतिम आयाम (समाप्ति) शिव के द्वारा नियंत्रित होता है।

तंत्रशास्त्र के मुख्य आचार्य श्रीशिव ही हैं। शिव ने ही प्राणियों का अल्प सामर्थ्य देखकर थोड़े परिश्रम से ही भक्तों की कार्यसिद्धि के निमित्त तंत्रशास्त्र का उपदेश दिया है।

 उड्डीश तंत्र का उपदेश भगवान शिव ने लंकाधिपति रावण को दिया था, इसी से इस तंत्र की महत्ता बहुत अधिक मानी गई है। इसमें मंत्र और औषधि (वनस्पति) का प्रयोग मुख्य रूप से होता है।

 यह तंत्र-साधना अपने मूल रहस्यों से सराबोर है और अपने आप में अत्यंत दुर्लभ और गोपनीय है।

राजगुरु जी

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Saturday, August 4, 2018

सिद्धि श्री बीसा यंत्र



सिद्धि श्री बीसा यंत्र

कहावत प्रसिद्ध है कि जिसके पास हो बीसा उसका क्या करे जगदीशा,अर्थात साधकों ने इस यंत्र के माध्यम से दुनिया की हर मुश्किल आसान होती है,और लोग मुशीबत में भी मुशीबत से ही रास्ता निकाल लेते हैं। इसलिये ही इसे लोग बीसा यंत्र की उपाधि देते हैं। 

नवार्ण मंत्र से सम्पुटित करते हुये इसमे देवी जगदम्बा का ध्यान किया जाता है। यंत्र में चतुष्कोण में आठ कोष्ठक एक लम्बे त्रिकोण की सहायता से बनाये जाते हैं,त्रिकोण को मन्दिर के शिखर का आकार दिया जाता है,अंक विद्या के चमत्कार के कारण इस यंत्र के प्रत्येक चार कोष्ठक की गणना से बीस की संख्या की सिद्धि होती है।

 इस यंत्र को पास रखने से ज्योतिषी आदि लोगों को वचन सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। भूत प्रेत और ऊपरी हवाओं को वश में करने की ताकत मिलती है,जिन घरों में भूत वास हो जाता है उन घरों में इसकी स्थापना करने से उनसे मुक्ति मिलती है।

आपकी कुंडली से आपको कौन सा यंत्र फ़ायदा देगा
आप हमसे पूछ सकते है .

राज गुरु जी

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Friday, August 3, 2018

व्यापार बन्धन - कर्ज मुक्ति पोटली

व्यापार बन्धन - कर्ज मुक्ति पोटली व्यापारी, कारोबारी या दुकानदार हर कोई व्यापार में उतार चढ़ाव से परेशान है। कभी कभी ये मार्किट की मंदी से भी होता है जो समझ में आता है किंतु कई बार अच्छी मार्किट होने पर भी धंधा बिलकुल मन्दा या ठप हो जाता है जो अक्सर व्यापार बन्धन होने से ही होता है। दुकान या बिजनेस चाहे छोटा हो या बड़ा हर कोई इज़से परेशान है छोटे से किराना व्यापारी, ब्यूटी पार्लर वाले से लेकर बड़े बड़े प्रोपेर्टी डीलर और बिल्डर तक। ये व्यापार का बन्धन सबसे पहले आपके विरोधी कराते हैं जो आपके ही धंधे में होते हैं, जब वो देखते हैं कि आपके अच्छे सामान, काम और व्यवहार के कारण उनका धंधा ठप हो रहा है। दूसरे आपके पास पड़ोस के दुकानदार या लोग जो आपकी बढ़ती दुकानदारी और तरक्की देख नहीं पाते। जलने लगते हैं। तीसरे आपके ही कोई सगे सम्बन्धी, मित्र, रिश्तेदार जो आपकी समृद्धि और तरक्की से जलते हैं। ये बन्धन कई प्रकार के हो सकते हैं, भस्म भभूत, उड़द, सरसों, राई, छोटे से लाल, हरे, नीले या काले धागेसे, किसी यंत्र ताबीज़ से, छोटे सादे कागज से भी। ये सब उस तांत्रिक पर निर्भर है कि वो क्या और कैसे कर के देता है। कुछ चीजें आपकी पीठ पीछे दुकान ऑफिस के शटर के बाहर डाल दी जाती है, कुछ शटर गेट पर रख दी जाती हैं तो कुछ आपकी नजरो के सामने ही कर दी जाती हैं और आपको पता भी नहीं चलता। व्यापार बन्धन होता है तो कमाई ठप और फिर उधार का चक्र चलता है। पहले हुए माल की रकम भी नहीं दे पाते और नया लेने पुराना चुकाने को कर्ज लेते हैं। कभी व्यापार बढ़ाने को कर्ज लेते हैं माल लाते हैं और माल बिकता नहीं बस डंप हो जाता है। कभी कभी इज़से उबरने को सट्टे में भी पैसा लगाते हैं कि शायद किस्मत साथ दे जाये और सब निपट जाये किंतु दांव उलटे पड़ते हैं और कर्ज उधारी घटने के बजाए बढ़ जाती है। कभी कभी तो दोगुनी और उससे भी ज्यादा हो जाती है। इन सभी चीजों से निपटने के लिए मैं पहले भी कई उपाय दे चुका हूँ। कर्ज मुक्ति व्यापार वृद्धि जुएं सट्टे लॉटरी में सफलता हेतु व्यापार बन्धन खोलने हेतु किंतु इतना सब कर पाना , क्रमशः कई पाठ नियमित रूप से करना, जप करना आदि लोगों से सम्भव नहीं हो पाता। कहीं कहीं कुछ दुर्लभ चीजें भी चाहिए जो पहले तो मिलती नहीं, मिले भी तो महंगी और असली नकली का संशय भी बना रहता है। इसीलिए इस नवरात्रि में परम् आदरणीय गुरुदेव के निर्देशन में हम एक विशेष लक्ष्मी गणपति यंत्र पोटली तैयार कर रहे हैं, जो सभी प्रकार के व्यापार बन्धन चाहे हिन्दू तंत्र से हो या मुस्लिम खोलने में सक्षम है। लक्ष्मी का आकर्षण करेगी अतः कर्ज से मुक्ति दिलाएगी। जुएं सट्टे में भी विजय दिलवायेगी। (जेब में ले जाएं) जब किसी विशेष डीलिंग के लिए जाएँ तो दिया धूप दिखाकर इसे अपने साथ जेब या बैग में ले जाएं। सबसे बड़ी बात ये की इसमें आपको कोई विशेष जप, पाठ आदि नहीं करना है। सिर्फ नित्य पूजन की तर्ज पे दिया और धूप भर दिखानी है। बाकि सब काम भगवान गणेश और माँ लक्ष्मी के सिद्ध यंत्रों से युत ये पोटली स्वयं कर देगी। जिसका पता आपको शीघ्र ही इसका असर देख के चल जायेगा। अधिक जानकारी, समस्या समाधान और "श्रीलक्ष्मी गणपति व्यापार बन्धन कर्ज मुक्ति पोटली "मंगवाने हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।. राज गुरु जी महाविद्या आश्रम ( राज योग पीठ ) ट्रस्ट . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Wednesday, August 1, 2018

रम्भा साधना

रम्भा साधना उच्चकोटि कि अप्सराओं कि श्रेणी में रम्भा का प्रथम स्थान है, जो शिष्ट और मर्यादित मणि जाती है, सौंदर्य कि दृष्टि से अनुपमेय कही जा सकती है | शारीरिक सौंदर्य वाणी कि मधुरता नृत्य, संगीत, काव्य तथा हास्य और विनोद यौवन कि मस्ती, ताजगी, उल्लास और उमंग ही तो रम्भा है | जिसकी साधना से वृद्ध व्यक्ति भी यौवनवान होकर सौभाग्यशाली बन जाता है | जिसकी साधना से योगी भी अपनी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करता है | अभीप्सित पौरुष एवं सौंदर्य प्राप्ति के लिए प्रतेक पुरुष एवं नारी को इस साधना में अवश्य रूचि लेनी चाहिए | सम्पूर्ण प्रकृति सौंदर्य को समेत कर यदि साकार रूप दिया तो उसका नाम रम्भा होगा | सुन्दर मांसल शारीर, उन्नत एवं सुडौल वक्ष: स्थल, काले घने और लंबे बाल, सजीव एवं माधुर्य पूर्ण आँखों का जादू मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान दिल को गुदगुदा देने वाला अंदाज यौवन भर से लदी हुई रम्भा बड़े से बड़े योगियों के मन को भी विचिलित कर देती है | जिसकी देह यष्टि से प्रवाहित दिव्य गंध से आकर्षित देवता भी जिसके सानिध्य के लिए लालायित देखे जाते हैं | सुन्दरतम वर्स्त्रलान्कारों से सुसज्जित, चिरयौवन, जो प्रेमिका या प्रिय को रूप में साधक के समक्ष उपस्थित रहती है | साधक को सम्पूर्ण भौतिक सुख के साथ मानसिक उर्जा, शारीरिक बल एवं वासन्ती सौंदर्य से परिपूर्ण कर देती है | इस साधना के सिद्ध होने पर वह साधक के साध छाया के तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रहती है तथा उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती है | रम्भा साधना सिद्ध होने पर सामने वाला व्यक्ति स्वंय खिंचा चला आये यही तो चुम्बकीय व्यक्तिव है| साधना से साधक के शरीर के रोग, जर्जरता एवं वृद्धता समाप्त हो जाती है | यह जीवन कि सर्वश्रेष्ठ साधना है | जिसे देवताओं ने सिद्ध किया इसके साथ ही ऋषि मुनि, योगी संन्यासी आदि ने भी सिद्ध किया इस सौम्य साधना को | इस साधना से प्रेम और समर्पण के कला व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुरित होती है | क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों में बिमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जायेगा | प्रेम को अभिव्यक्त करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है रम्भा साधना | जिन्होंने रम्भा साधना नहीं कि है, उनके जीवन में प्रेम नहीं है, तन्मयता नहीं है, प्रस्फुल्लता भी नहीं है | साधना विधि सामग्री – प्राण प्रतिष्ठित रम्भोत्कीलन यंत्र, रम्भा माला, सौंदर्य गुटिका तथा साफल्य मुद्रिका | यह रात्रिकालीन २७ दिन कि साधना है | इस साधना को किसी भी पूर्णिमा को, शुक्रवार को अथवा किसी भी विशेष दिन प्रारम्भ करें | साधना प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि स्नान आदि से निवृत होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीला या सफ़ेद किसी भी आसान पर बैठे, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें | पूर्व दिशा कि ओर मुख करके बैठें | घी का दीपक जला लें | सामने चौकी पर एक थाली या पलते रख लें, दोनों हाथों में गुलाब कि पंखुडियां लेकर रम्भा का आवाहन करें | || ओम ! रम्भे अगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते || यह आवश्यक है कि यह आवाहन कम से कम १०१ बार अवश्य हो प्रत्येक आवाहन मन्त्र के साथ एक गुलाब के पंखुड़ी थाली में रखें | इस प्रकार आवाहन से पूरी थाली पंखुड़ियों से भर दें | अब अप्सरा माला को पंखुड़ियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसान पर ओर अपने ऊपर इत्र छिडके | रम्भोत्कीलन यन्त्र को माला के ऊपर आसान पर स्थापित करें | गुटिका को यन्त्र के दाँयी ओर तथा साफल्य मुद्रिका को यन्त्र के बांयी ओर स्थापित करें | सुगन्धित अगरबती एवं घी का दीपक साधनाकाल तक जलते रहना चाहिए | सबसे पहले गुरु पूजन ओर गुरु मन्त्र जप कर लें | फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्री का पंचोपचार से पूजन सम्पन्न करें |स्नान, तिलक, धुप, दीपक एवं पुष्प चढावें | इसके बाद बाएं हाथ में गुलाबी रंग से रंग हुआ चावल रखें, ओर निम्न मन्त्रों को बोलकर यन्त्र पर चढावें || ॐ दिव्यायै नमः || || ॐ प्राणप्रियायै नमः || || ॐ वागीश्वये नमः || || ॐ ऊर्जस्वलायै नमः || || ॐ सौंदर्य प्रियायै नमः || || ॐ यौवनप्रियायै नमः || || ॐ ऐश्वर्यप्रदायै नमः || || ॐ सौभाग्यदायै नमः || || ॐ धनदायै रम्भायै नमः || || ॐआरोग्य प्रदायै नमः || इसके बाद उपरोक्त रम्भा माला से निम्न मंत्र का ११ माला प्रतिदिन जप करें | मंत्र : ||ॐ हृीं रं रम्भे ! आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांछितं देहि ऐं ॐ नमः || प्रत्येक दिन अप्सरा आवाहन करें, ओर हर शुक्रवार को दो गुलाब कि माला रखें, एक माला स्वंय पहन लें, दूसरी माला को रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगन्ध एक दम बढने लगे अप्सरा का बिम्ब नेत्र बंद होने पर भी स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने यन्त्र पर पहना दें | २७ दिन कि साधना प्रत्येक दिन नये-नये अनुभव होते हैं, चित्त में सौंदर्य भव भाव बढने लगता है, कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है | स्त्रियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने पर चेहरे पर झाइयाँ इत्यादि दूर होने लगती हैं | साधना पूर्णता के पश्चात मुद्रिका को अनामिका उंगली में पहन लें, शेष सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें | यह सुपरिक्षित साधना है | पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर अवश्य मनोकामना पूर्ण होती ही है |. राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

चंद्रहासिनी --- साधना

चंद्रहासिनी --- साधना भगवान महादेव ने रावण को उसके तप से प्रसन्न होकर एक अमोघ अस्त्र प्रदान किया थें। ★चंद्रह्रास खड़ग★ इसकी विशेषता यह था कि यह सामने वाले शत्रु वर्ग का चंद्र बल नष्ट कर देता था । चंद्र का प्रभुत्व पृथ्वी वासियों में इतना अधिक है कि उसके हटते ही सामने वाला यूं ही अधमरा हैं। जिनके चंद्र क्षीण हों , या कुंडली में चंद्र के आगे और पीछे के घर खाली हों, या पाप ग्रह युक्त (दरिद्र) हो, या केमद्रुम हो या निम्न/नीच राशी का हो, अथवा 10 डिग्री से कम / 22 से अधिक हो ये सभी स्थितियों का परिणाम दरिद्रता और दुर्भाग्य के रूप में दृष्टिगत होता है जीवन में... वो सभी चाहे चंद्र उनका त्रिकोणेश हो या नहीं हो वो इस प्रकार का चंद्र कवच चांदी में सुनार से बनवाकर उस पर प्राणप्रतिष्ठा करके, चंद्रमौलीश्वर की एवं चंद्र बीज मंत्र की यथा गुरु निर्दिष्ट जप करें (न्यूनतम 51-51 माला) और धारण करें । जिन्हें ज्यादा बैठने के अभ्यास नहीं हो वो 21दिनों तक कर लें। 【 चंद्र मौलीश्वर - ॐ शं चं चंद्र मौलिश्वराय नमः चंद्र बीज - ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः 】 और तंत्र एवं पाखंड में वास्तव में कितना अंतर है उसको प्रत्यक्ष देख सकते हैं। 100% प्रायोगिक प्रयोग हैं। आरम्भ सोमवार से, माला कोई भी, दिशा आग्नेय (दक्षिण पूर्व का कोण) रहेगा बाकी कोई नियम विशेष की आवश्यकता नहीं। राजगुरु जी महाविद्या आश्रम ( राजयोग पीठ ) फॉउन्डेशन ट्रस्ट किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...