Saturday, February 11, 2017

तिलोत्तमा अप्सरा

तिलोत्तमा अप्सरा की गिनती भी श्रेष्ठ अप्सराओं मे होती हैं। यह अप्सरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो ही रुप मे साधक की सहायता करती रहती हैं। यह साधना अनुभुत हैं। इस साधना को करने से सभी सुखो की प्राप्ति होती हैं।

इस साधना को शुरु करते ही एक – दो दिन में धीमी धीमी खुशबू का प्रवाह होने लगता हैं। यह खुशबू तिलोत्तमा के सामने होने की पूर्व सुचना हैं। अप्सरा का प्रत्यक्षीकरण एक श्रमसाध्य कार्य हैं। मेहनत बहुत ही जरुरी हैं। एक बार अप्सरा के प्रत्यक्षीकरण के बाद कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता, इसमे कोई दोराय नहीं हैं। यह प्रक्रिया आपकी सेवा में प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ।

सामान्यतः अप्सरा साधना भी गोपनीयता की श्रेष्णी में आती हैं। सभी को इस प्रकार की साधना जीवन मे एक बार सिद्ध करने की पुरी कोशिश करनी चाहिए क्योंकि कलियुग में जो भी कुछ चाहिए वो सब इस प्रकार की साधना से सहज ही प्राप्त किया जा सकता हैं। इन साधनाओं की अच्छी बात यह हैं कि इन साधनाओं को साधारण व्यक्ति भी कर सकता हैं मतलब उसको को पंडित तांत्रिक बनाने की कोई अवश्यकता नहीं हैं।

साधक स्नान कर ले अगर नही भी कर सको तो हाथ-मुहँ अच्छी तरह धौकर, धुले वस्त्र पहनकर, रात मे ठीक 10 बजे के बाद साधना शुरु करें। रोज़ दिन मे एक बार स्नान करना जरुरी है। मंत्र जाप मे कम्बल का आसन रखे और अप्सरा और स्त्री के प्रति सम्मान आदर होना चाहिए। अप्सरा , गुरु, धार्मिक ग्रंथो और विधि मे पुर्ण विश्वास होना चाहिए, नहीं तो सफलत होना मुश्किल हैं। अविश्वास का साधना मे कोई स्थान नही है। साधना का समय एक ही रखने की कोशिश करनी चाहिए।

एक स्टील की प्लेट मे सारी सामग्री रख ले। साधना करते समय और मंत्र जप करते समय जमीन को स्पर्श नही करते। माला को लाल या किसी अन्य रंग के कपडे से ढककर ही मंत्र जप करे या गौमुखी खरीदे ले। मंत्र जप को अगुँठा और माध्यमा से ही करे । मंत्र जपते समय माला मे जो अलग से एक दान लगा होता हैं उसको लांघना नहीं है मतलब जम्प नहीं करना हैं। जब दुसरी माला शुरु हो तो माला के आखिए दाने/मनके को पहला दान मानकर जप करें, इसके लिए आपको माला को अंत मे पलटना होगा। इस क्रिया का बैठकर पहले से अभ्यास कर लें।

पूजा सामग्री:-

सिन्दुर, चावल, गुलाब पुष्प, चौकी, नैवैध, पीला आसन, धोती या कुर्ता पेजामा, इत्र, जल पात्र मे जल, चम्मच, एक स्टील की थाली, मोली/कलावा, अगरबत्ती,एक साफ कपडा बीच बीच मे हाथ पोछने के लिए, देशी घी का दीपक, (चन्दन, केशर, कुम्कुम, अष्टगन्ध यह सभी तिलक के लिए))

विधि :

 पूजन के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-सुथरे आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके बैठ जाएं। पूजन सामग्री अपने पास रख लें।
बायें हाथ मे जल लेकर, उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर, शरीर और पूजन सामग्री पर छिड़क लें या पुष्प से अपने को जल से छिडके।
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ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
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(निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए शिखा/चोटी को गांठ लगाये / स्पर्श करे)
ॐ चिद्रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते। तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥
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(अपने माथे पर कुंकुम या चन्दन का तिलक करें)
ॐ चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रं पापनाशनम्। आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥
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(अपने सीधे हाथ से आसन का कोना जल/कुम्कुम थोडा डाल दे) और कहे
ॐ पृथ्वी! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥
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संकल्प:- दाहिने हाथ मे जल ले।
मैं ........अमुक......... गोत्र मे जन्मा,................... यहाँ आपके पिता का नाम.......... ......... का पुत्र .............................यहाँ आपका नाम....................., निवासी.......................आपका पता............................ आज सभी देवी-देव्ताओं को साक्षी मानते हुए देवी तिलोत्त्मा अप्सरा की पुजा, गण्पति और गुरु जी की पुजा देवी तिलोत्त्मा अप्सरा के साक्षात दर्शन की अभिलाषा और प्रेमिका रुप मे प्राप्ति के लिए कर रहा हूँ जिससे देवी तिलोत्त्मा अप्सरा प्रसन्न होकर दर्शन दे और मेरी आज्ञा का पालन करती रहें साथ ही साथ मुझे प्रेम, धन धान्य और सुख प्रदान करें।
जल और सामग्री को छोड़ दे।
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गणपति का पूजन करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः। ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
गुरु पुजन कर लें कम से कम गुरु मंत्र की चार माला करें या जैसा आपके गुरु का आदेश हो।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणि नमोअस्तुते
ॐ श्री गायत्र्यै नमः। ॐ सिद्धि बुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।
ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः। ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।
ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।
ॐ भ्रं भैरवाय नमः का 21 बार जप कर ले।
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अब अप्सरा का ध्यान करें और सोचे की वो आपके सामने हैं।
दोनो हाथो को मिलाकर और फैलाकर कुछ नमाज पढने की तरफ बना लो। साथ ही साथ “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं तिलोत्त्मा अप्सरा आगच्छ आगच्छ स्वाहा” मंत्र का 21 बार उचारण करते हुए एक एक गुलाब थाली मे चढाते जाये। अब सोचो कि अप्सरा आ चुकी हैं।

हे सुन्दरी तुम तीनो लोकों को मोहने वाली हो तुम्हारी देह गोरे गोरे रंग के कारण अतयंत चमकती हुई हैं। तुम नें अनेको अनोखे अनोखे गहने पहने हुये और बहुत ही सुन्दर और अनोखे वस्त्र को पहना हुआ हैं। आप जैसी सुन्दरी अपने साधक की समस्त मनोकामना को पुरी करने मे जरा सी भी देरी नही करती। ऐसी विचित्र सुन्दरी तिलोत्तमा अप्सरा को मेरा कोटि कोटि प्रणाम।
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इन गुलाबो के सभी गन्ध से तिलक करे। और स्वयँ को भी तिलक कर लें।
ॐ अपूर्व सौन्दयायै, अप्सरायै सिद्धये नमः।
मोली/कलवा चढाये : वस्त्रम् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
गुलाब का इत्र चढाये : गन्धम समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
फिर चावल (बिना टुटे) : अक्षतान् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
पुष्प : पुष्पाणि समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
अगरबत्ती : धूपम् आघ्रापयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
दीपक (देशी घी का) : दीपकं दर्शयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
मिठाई से पुजा करें।: नैवेद्यं निवेदयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
फिर पुजा सामप्त होने पर सभी मिठाई को स्वयँ ही ग्रहण कर लें।
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पहले एक मीठा पान (पान, इलायची, लोंग, गुलाकन्द का) अप्सरा को अर्प्ति करे और स्वयँ खाये। इस मंत्र की स्फाटिक की माला से 21 माला जपे और ऐसा 11 दिन करनी हैं।
ॐ क्लीं तिलोत्त्मा अप्सरायै मम वश्मनाय क्लीं फट
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यहाँ देवी को मंत्र जप समर्पित कर दें। क्षमा याचना कर सकते हैं। जप के बाद मे यह माला को पुजा स्थान पर ही रख दें। मंत्र जाप के बाद आसन पर ही पाँच मिनट आराम करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः।
यदि कर सके तो पहले की भांति पुजन करें और अंत मे पुजन गुरु को समर्पित कर दे।
अंतिम दिन जब अप्सरा दर्शन दे तो फिर मिठाई इत्र आदि अर्पित करे और प्रसन्न होने पर अपने मन के अनुसार वचन लेने की कोशिश कर सकते हैं।
पुजा के अंत मे एक चम्मच जल आसन के नीचे जरुर डाल दें और आसन को प्रणाम कर ही उठें।
॥ हरि ॐ तत्सत ॥
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नियम जिनका पालन अधिक से अधिक इस साधना मे करना चाहिए वो सब नीचे लिखे हैं।

ब्रह्मचरी रहना परम जरुरी होता हैं अगर कुछ विचारना हैं तो केवल अपने ईष्‍ट का या ॐ नमः शिवाय या अप्सरा का ध्यान करें, आप सदैव यह सोचे कि वो सुन्दर सी अप्सरा आपके पास ही मौजुद हैं और आपको देख रही हैं। ऐसी अवस्था मे क्या शोभनीय हैं आप स्वयँ अन्दाजा लगा सकते हैं।

भोजन: मांस, शराब, अन्डा, नशे, तम्बाकू, तामसिक भोजन आदि सभी से ज्यादा से ज्यादा दुर रहना हैं। इनका प्रयोग मना ही हैं। केवल सात्विक भोजन ही करें क्योंकि यह काम भावना को भडकाने का काम करते हैं। मंत्र जप के समय कृपा करके नींद्, आलस्य, उबासी, छींक, थूकना, डरना, लिंग को हाथ लगाना, सेल फोन को पास रखना, जप को पहले दिन निधारित संख्या से कम-ज्यादा जपना, गा-गा कर जपना, धीमे-धीमे जपना, बहुत् ही ज्यादा तेज-तेज जपना, सिर हिलाते रहना, स्वयं हिलते रहना, मंत्र को भुल जाना (पहले से याद नहीं किया तो भुल जाना), हाथ-पैंर फैलाकर जप करना यह सब कार्य मना हैं। मेरा मतलब हैं कि बहुत ही गम्भीरता से मंत्र जप करना हैं। यदि आपको पैर बदलने की जरुरत हो तो माला पुरी होने के बाद ही पैरों को बदल सकते हैं या थोडा सा आराम कर सकते हैं लेकिन मंत्र जप बन्द ना करें।

यदि आपको सिद्धि चाहिए तो भगवन श्री शिव शंकर भगवान के कथन को कभी ना भुलना कि "जिस साधक की जिव्हा परान्न (दुसरे का भोजन खाना) से जल गयी हो, जिसका मन में परस्त्री (अपनी पत्नि के अलावा कोई भी) हो और जिसे किसी से प्रतिशोध लेना हो उसे भला केसै सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं"।

यदि उसे एक बार भी प्रेमिका की तरह प्रेम/पुजा किया तो आने मे कभी देरी नही करती है। साधना के समय वो एक देवी मात्र ही हैं और आप साधक हैं। इनसे सदैव आदर से बात करनी चाहिए। समस्त अप्सराएँ वाक सिद्ध होती हैं।

किसी भी साधना को सीधे ही करने नही बैठना चाहिए। उससे पहले आपको अपना कुछ अभ्यास करना चाहिए। मंत्रो का उचारण कैसे करना है यह भी जान लेना चाहिए और बार बार बोलकर अभ्यास कर लेना चाहिए।

ऐसा करने पर अप्सरा जरुर सिंद्ध होती हैं बाकी जो देवी कालिका की इच्छा क्योंकि होता वही हैं जो देवी जगत जननी चाहती हैं। साधना से किसी को नुकसान पहुँचाने पर साधना शक्ति स्वयँ ही समाप्त होने लगती हैं। इसलिए अपनी साधना की रक्षा करनी चाहिए। किसी को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरुरत नहीं हैं। यहाँ कोई किसी के काम नहीं आता हैं लेकिन फिर भी कभी कभार किसी ना किसी जो बहुत ही जरुरत मन्द हो की सहायता करी जा सकती हैं। वैसे यह साधना साधक का ही ज्यादा भला करने वाले हैं।

मैं तो इतना ही कहुगाँ कि इस साधना को नए साधक और ऐसे आदमी को जरुर करना चाहिए जो देवी देवता मे यकीन ना रखता हो। यदि ऐसे लोगों थोडा सा विश्वास करके भी इस साधना को करते हैं तो उन्हें कुछ ना कुछ अच्छे परिणाम जरुर मिलने चाहिए। यदि किसी को साधना करने मे कोई दिक्कत हो रही हैं तो हमसे भी सम्पर्क (ईमेल का पता सबसे उपर दिया गया हैं) किया जा सकता हैं। यदि पहली बार में साधना मे सिद्धि प्राप्त नहीं हो रही है तो आप सहायता के लिए ईमेल कर सकते हैं। देवी माँ आपको सभी सिद्धि प्रदान करें इस कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Tuesday, February 7, 2017

महावशीकरण श्यामा मातंगी यन्त्र /कवच और महावशीकरण मन्त्र

मातंगी महाविद्या ,दस महाविद्या में से एक प्रमुख महाविद्या ,,वैदिक सरस्वती का तांत्रिक रूप हैं और श्री कुल के अंतर्गत पूजित हैं |यह सरस्वती ही हैं और वाणी ,संगीत ,ज्ञान ,विज्ञान ,सम्मोहन ,वशीकरण ,मोहन की अधिष्ठात्री हैं |

त्रिपुरा ,काली और मातंगी का स्वरुप लगभग एक सा है |यद्यपि अन्य महाविद्याओं से भी वशीकरण ,मोहन ,आकर्षण के कर्म होते हैं और संभव हैं किन्तु इस क्षेत्र का आधिपत्य मातंगी [सरस्वती] को प्राप्त हैं |

यह जितनी समग्रता ,पूर्णता ,निश्चितता से इस कार्य को कर सकती हैं कोई अन्य नहीं क्योकि सभी अन्य की अवधारणा अन्य विशिष्ट गुणों के साथ हुई है |उन्हें वशीकरण ,मोहन के कर्म हेतु अपने मूल गुण के साथ अलग कार्य करना होगा जबकि मातंगी वशीकरण ,मोहन की देवी ही हैं अतः यह आसानी से यह कार्य कर देती हैं |

मातंगी के तीन विशिष्ट स्वरुप हैं श्यामा मातंगी ,राज मातंगी और वश्य मातंगी |श्यामा मातंगी स्वरुप मातंगी का उग्र स्वरुप है और वशीकरण ,मोहन, आकर्षण को तीब्रता से करता है |

इनका मात्र अति विशिष्ट है ,जिसमे माया [देवी] ,सरस्वती [मातंगी ],लक्ष्मी ,त्रिपुरसुन्दरी[श्री विद्या]और काली के बीज मन्त्रों का विशिष्ट संयोग है जिससे मातंगी की मुख्यता के साथ इन सभी शक्तियों की शक्ति भी सम्मिलित होती है जिससे यह विद्या सब कुछ देने के साथ वशीकरण ,आकर्षण में निश्चित सफलता देती है |

मातंगी ,या श्यामा मातंगी का मंत्र ,मातंगी साधक ही प्रदान कर सकता है ,अन्य किसी महाविद्या का साधक इनके मंत्र को प्रदान करने का अधिकारी नहीं है |

स्वयं मंत्र लेकर जपने से महाविद्याओं के मंत्र सिद्ध नहीं होते ,अतः जब भी मंत्र लिया जाए मातंगी साधक से ही लिया जाए ,यद्यापि मातंगी साधक खोजे नहीं मिलते जबकि अन्य महाविद्या के साधक मिल जाते हैं |

इनके मंत्र और यंत्र का उपयोग अधिकतर प्रवचनकर्ता ,धर्म गुरु ,tantra गुरु ,बौद्धिक लोग करते हैं जिन्हें समाज-भीड़-लोगों के समूह का नेतृत्व अथवा सामन करना होता है ,ज्ञान विज्ञानं की जानकारी चाहिए होती है |मातंगि के शक्ति से इनमे सम्मोहन -वशीकरण की शक्ति होती है |

मातंगी का यन्त्र इसमें अतिरिक्त ऊर्जा का कार्य करता है जिसे मातंगी साधक निर्मित करता है भोजपत्र पर |मातंगी का यन्त्र बाजार में धातु का मिल जाता है किन्तु श्यामा मातंगी का मिलना मुश्किल होता है |

धातु के यन्त्र की प्रभावित भी संदिग्ध होती है जबकि मातंगी साधक द्वारा निर्मित श्यामा मातंगी के यन्त्र में साधक की शक्ति ,मुहूर्त की शक्ति ,भोजपत्र की पवित्रता ,अष्टगंध की विशिष्टता ,मंत्र की शक्ति ,प्राण प्रतिष्ठा की शक्ति सम्मिलित होती है जिससे यह यन्त्र निश्चित प्रभावकारी हो जाता है |

धारण करने पर इससे उत्पन्न विशिष्ट तरंगे व्यक्ति और वातावरण को प्रभावित करती हैं जिससे खुद व्यक्ति में भी परिवर्तन आता है और आसपास के लोग भी प्रभावित होते हैं |इसके वाशिकारक प्रभाव में संपर्क में आने वाले लोग बांध जाते हैं |

यद्यपि यन्त्र किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए भी बनाया जा सकता है किन्तु व्यक्ति केन्द्रित न रखा जाए तो यह सब पर प्रभाव डालता है |

श्यामा मातंगी का मंत्र और यन्त्र प्रकृति की सभी शक्तियों में सर्वाधिक शक्तिशाली वाशिकारक और मोहक प्रभाव रखता है क्योकि यह इसी की शक्ति हैं ही |यद्यपि इनका यन्त्र काफी महंगा पड़ जाता है ,जबकि अन्य वशीकरण के यन्त्र बाजार में बहुत सस्ते मिल जाते हैं ,यह अलग है की अन्य भले असफल हो जाए इनका यन्त्र प्रभाव जरुर देता है |

उदाहरण के लिए ,श्यामा मातंगी का मंत्र केवल इनका साधक ही जप सकता है और वाही अभिमंत्रित कर सकता है यन्त्र को जबकि अगर वह दिन में 5 घंटे लगातार जप करे तो भी तीन हजार मंत्र से अधिक जप नहीं कर सकता ,कारण मंत्र बड़ा और क्लिष्ट होता है |

ऐसे में यन्त्र को २१ हजार अभिमंत्रित करने के लिए कम से कम 7 दिन चाहिए ,पूजा प्राण प्रतिष्ठा और बाद में हवन के लिए दो दिन अतिरिक्त चाहिए अर्थात ९ दिन लगेंगे एक यन्त्र बनाने में अर्थात 2000 /- रु ,,500 अन्य पूजा पाठ और हवन आदि के खर्च अर्थात कुल 2500 रु. |

इस प्रकार केवल २१ हजार मंत्र से अभिमंत्रित यन्त्र भी 2500 रु. का पड़ जाता है |कम से कम अभिमंत्रित यन्त्र भी 7000 से कम में नहीं आएगा यदि वास्तविक प्रभाव लानी है ,क्योकि बहुत कम अभिमन्त्रण अपेक्षित परिणाम नहीं देगा |

इस तरह सबके लिए तो नहीं किन्तु जरूरतमंद के लिए यह यन्त्र लाभदायक होता है |

श्यामा मातंगी यन्त्र का प्रभाव और उपयोग

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१. यन्त्र धारण करने से वशीकरण की शक्ति बढती है |व्यक्तित्व का प्रभाव बढ़ता है |

२. अधिकारी वर्ग को अपने कर्मचारियों पर नियंत्रण और उन्हें वशीभूत रखने में आसानी होती है |

३.कर्मचारी को अपने अधिकारियों को अनुकूल रखने में मदद मिलती है |

४.पति को पत्नी की और पत्नी को पति की अनुकूलता अपने आप प्राप्त होती है और धारण करने वाले का पति या पत्नी वशीभूत होता है |

५.सेल्स ,मार्केटिंग ,पब्लिक रिलेसन का कार्य करने वालों को लोगों का अपेक्षित सहयोग मिलता है |

६.व्यवसायी को ग्राहकों की अनुकूलता मिलती है और अपरोक्त उन्नति में सहायत मिलती है |

७.रुष्ट परिवार वालों को इससे अनुकूल करने में मदद मिलती है |

८.वाद-विवाद ,मुकदमे ,बहस ,समूह वार्तालाप ,आपसी बातचीत में सामने वाले की अनुकूलता प्राप्त होती है |

९. चूंकि यह महाविद्या यन्त्र है और काली की शक्ति से संयुक्त है अतः नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है |

१०. किसी पर पहले से कोई वशीकरण की क्रिया है तो यन्त्र भरे हुए चांदी कवच को सुबह शाम कुछ दिन एक गिलास जल में डुबोकर वह जल व्यक्ति को पिलाने से वशीकरण का प्रभाव उतरता है |

११.किसी भी तरह के इंटरव्यू में परीक्षक पर सकारात्मक प्रभाव देता है |

१२. व्यक्ति विशेष के लिए बनाया गया यन्त्र धारण और मंत्र जप निश्चित रूप से सम्बंधित व्यक्ति को वशीभूत करता है |

१३.दाम्पत्य कलह ,पारिवारिक कलह ,मनमुटाव ,विरोध में लोगों को प्रभावित करता है और व्यक्ति के अनुकूल करता है |

१४.सामाजिक संपर्क रखने वालों को लोगों की अनुकूलता प्राप्त होती है |

१५.ज्ञान-विज्ञानं-अन्वेषण-परीक्षा

-प्रतियोगिता ,प्रवचन ,भाषण से समबन्धित लोगों को सफल होने में मदद करता है |

इस प्रकार ऐसा कोई क्षेत्र लगभग नहीं जहाँ इस यन्त्र से लाभ न मिलता हो क्योकि लोगों की अनुकूलता की जरुरत सबको होती है और लोग या व्यक्ति प्रभावित हो अनुकूल हों ,वशीभूत हों तो व्यक्ति को लाभ अवश्य होता है |

अतः श्यामा मातंगी साधक द्वारा बनाया गया श्यामा मातंगी यन्त्र ,अन्य किसी यन्त्र से अधिक लाभकारी होता है |यदि कोई श्यामा मातंगी साधक श्यामा यन्त्र को रविपुष्य योग में

राजगुरु जी

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Monday, February 6, 2017

परकाया प्रवेश सिद्धि योगा, जानिए

 ‘नाथ सम्प्रदाय’ के आदि गुरु मुनिराज ‘मछन्दरनाथ’ के विषय में भी कहा जाता है कि उन्हें परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। सूक्ष्म शरीर से वे अपनी इच्छानुसार गमनागमन विभिन्न शरीरों में करते थे। एकबार अपने शिष्य गोरखनाथ को स्थूल शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर एक मृत राजा के शरीर में उन्होंने सूक्ष्म शरीर से प्रवेश किया था। 'महाभारत के शान्ति पर्व' में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक न था।

‘अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारण वश ऋषि देवशर्मा पर कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचाया।

‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है।

मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जाग्रत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योगा में पारंगत हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह कि खुद के शरीर पर आपका कितना कंट्रोल है? योग अनुसार जब तक आप खुद के शरीर को वश में करन नहीं जानते तब तक दूसरे के शरीर में प्रवेश करना मुश्किल होगा।

दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या को परकाय प्रवेश योग विद्या कहते हैं। आदि शंकराचार्य इस विद्या में अच्छी तरह से पारंगत थे। नाथ संप्रदाय के और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है। क्यों?

योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है 'चित्त की वृत्तियां'। इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है- योगस्य चित्तवृत्ति निरोध:। इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।

यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।

(1)क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है।

(2)मूढ़ : मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है।

(3)विक्षिप्त : विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है।

(4)एकाग्र : एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है।

(5)निरुद्व : निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है।

सूक्ष्म शरीर के होने का आभास

*ध्यान योग का सहारा : निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है।

*ज्ञान योग का सहारा : चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में ज्ञानयोग का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।

कैसे होगा यह संभव : चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।

*योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है।

राजगुरु जी

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नवग्रह दोष निवारण (छिन्नमस्ता साधना).










नाथ पंथ सहित बौद्ध मताब्लाम्बी भी देवी की उपासना करते हैं, भक्त को इनकी उपासना से भौतिक सुख संपदा वैभव की प्राप्ति, बाद विवाद में विजय, शत्रुओं पर जय, सम्मोहन शक्ति के साथ-साथ अलौकिक सम्पदाएँ प्राप्त होती है, इनकी सिद्धि हो जाने पर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता, दस महाविद्यायों में प्रचंड चंड नायिका के नाम से व बीर रात्रि कह कर देवी को पूजा जाता है



देवी के शिव को कबंध शिव के नाम से पूजा जाता है छिन्नमस्ता देवी शत्रु नाश की सबसे बड़ी देवी हैं,भगवान् परशुराम नें इसी विद्या के प्रभाव से अपार बल अर्जित किया था,गुरु गोरक्षनाथ की सभी सिद्धियों का मूल भी देवी छिन्नमस्ता ही है.देवी नें एक हाथ में अपना ही मस्तक पकड़ रखा हैं  और
दूसरे हाथ में खडग धारण किया है देवी के गले में मुंडों की माला है व दोनों और
सहचरियां हैं देवी आयु, आकर्षण,धन,बुद्धि मे वृद्धि एवं रोगमुक्ति व शत्रुनाश विशेष रूप से करती है.

देवी की स्तुति से देवी की अमोघ कृपा प्राप्त होती है.

स्तुति:-

ll छिन्न्मस्ता करे वामे धार्यन्तीं स्व्मास्ताकम, प्रसारितमुखिम भीमां लेलिहानाग्रजिव्हिकाम, पिवंतीं रौधिरीं धारां निजकंठविनिर्गाताम,
विकीर्णकेशपाशान्श्च नाना पुष्प समन्विताम, दक्षिणे च करे कर्त्री मुण्डमालाविभूषिताम, दिगम्बरीं महाघोरां प्रत्यालीढ़पदे स्थिताम, अस्थिमालाधरां देवीं नागयज्ञो पवीतिनिम, डाकिनीवर्णिनीयुक्तां वामदक्षिणयोगत: ll

देवी की कृपा से साधक मानवीय सीमाओं को पार कर देवत्व प्राप्त कर लेता है.गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए देवी योगमयी हैं ध्यान समाधी द्वारा भी इनको प्रसन्न किया जा सकता है.

इडा पिंगला सहित स्वयं देवी सुषुम्ना नाड़ी हैं जो कुण्डलिनी का स्थान हैं.देवी के भक्त को मृत्यु भय नहीं रहता वो इच्छानुसार जन्म ले सकता है.देवी की मूर्ती पर रुद्राक्षनाग केसर व रक्त चन्दन चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है.महाविद्या छिन्मस्ता के मन्त्रों से होता है आधी व्यादी सहित बड़े से बड़े दुखों का नाश कर देती है.


श्रीभैरवतन्त्र में कहा गया है कि इनकी आराधना से साधक जीवभाव से मुक्त होकर शिवभाव को प्राप्त कर लेता है.

साधना विधि:-

सर्वप्रथम देवी का प्रचंड चंडिका मंत्र "ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा" को बोलते हुए अपने शरीर पर साधना मे बैठकर पानी के छीटे लगाये.
फिर नवग्रह दोष निवारण हेतु माँ से प्रार्थना करे और दीये हुए मंत्र का जाप मंगलवार से नित्य नौ दिनो तक ग्यारह माला (रुद्राक्ष माला) जाप करे.दिशा-उत्तर,आसन-वस्त्र-लाल रंग के,समय रात्री मे 9 बजे के बाद और दसवे दिन 108 बार घी की आहुति  मंत्र बोलकर देना है.
यह विधान पूर्ण होते-होते ही साधक को कई अनुभुतिया होती है परंतु घबराना नही चाहिये.साधना समाप्ती के बाद नवग्रह दोष का निवारण होता है.

माँ छिन्नमस्ता नवग्रहदोष निवारण मंत्र:-

llॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वं वज्रवैरोचिनिये हुमll

(om shreem hreem aim kleem vam vajravairochiniye hoom)

मंत्र जाप के बाद देवी की स्तुती करे जो दि हुयी है.मंत्र का सही उच्चारण करने से ही लाभ प्राप्त होगा अन्यथा नही होगा.साधना काल मे ज्यादा से ज्यादा मौन रहेने से तीव्र अनुभुतिया प्राप्त होती है,हवन के समय मंत्र के आखरी मे "स्वाहा" लगाना नही भूलना चाहिये.

माँ चिंतापुरिनी आपका भला करे.....

राज गुरु जी

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Sunday, February 5, 2017

विकटमुखी वशिकरण मंत्र

यह मंत्र अद्भुत है स्वयं सिद्ध है आप सिद्ध करने कि जरुरत नही सिधे प्रयग मे लाय। प्रतिदिन इस मत्र से अन्न के सात ग्रास अभिमत्रित कर साध्य के रुप.

 नाम चिँनता कर भजन करे वो साध्य आपके वश मेँ होगा। इसमे सदेह करने का कई कारण नही है।लेकिन आप कुछ दिन तक आगर पाँच माल जाप कर यह प्रयग करे तो लाभ दोगुना होगा

मंत्र-

ॐ नमः कट् विकट घोररुपिणी स्वाहा

राजगुरु जी

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Saturday, February 4, 2017

देवी अनंग माला साधना

शिव में ही तो हु परम शक्ति भद्र काली ,जो तुम्हारे ह्रदय में अनंग माला  रूप से निवास करती हु. मेरा यही स्वरुप तुम्हे आकर्षण प्रदान करता है।इस  आकर्षण के आगे संसार का सारा आकर्षण व्यर्थ है,आकर्षण की सारी साधनाए  व्यर्थ है. संसार का परम आकर्षण में हु। में ही हु वो अनंग माला जो कामदेव  को भी आकर्षित कर लेती है. ये मेरा ही आकर्षण है जिसके फल स्वरूप,संसार की  हर

 अप्सरा,यक्षिणी,डाकिनी,शाकिनी,तथा  सामान्य स्त्री शिव पर मोहित होती है.यदि में नहीं तो संसार में आकर्षण  नहि. शिव तू कह तो सही संसार की ऐसी कोनसी  वस्तु है जो तुझसे दूर है।में  क्षण भर में उसका आकर्षण तेरे ऊपर कर दूंगी

ये है भगवती अनंग माला जो की महाकाली का ही एक स्वरूप है.तन्त्र में आकर्षण की इससे श्रेष्ट साधना कोई और नहीं है.और न ही होगि. जो शिव को भी आकर्षण प्रदान करने वाली है,जरा सोचे वो अपने भक्त के लिये क्या कुछ नहीं कर सकती है

अनंग माला साधना मंत्र :

॥ॐ ऐं आं ह्रीं हूं क्रों क्षों  क्रीं क्रौं फ्रें अनंगमाले स्त्रीयमाकर्षय त्रुट त्रुट छेदय छेदय  हूं हूं फट फट स्वाहा॥

विधि:

 साधना किसी भी शुभ दिन से शुरू कर सकते है. आसन वस्त्र लाल,दिशा  उत्तर होगि. समय रात्रि दस के बाद का हो.सामने बजोट पर लाल वस्त्र बिछा कर  उसपर शक्ति रुद्राक्ष स्थापित करे. गुरु पूजन तथा गणेश पूजन करे. अब  रुद्राक्ष पूजन करे सामान्य,कोई भी मिठाई का भोग अर्पण करे।तील के तेल का  दीपक लगाये।और रुद्राक्ष माला से मंत्र की ५ माला जाप करे. साधना दस दिनों  तक करे आखरी दिन यथा संभव हवन करे,घी में पञ्च मेवा मिलाकर। इस तरह देवी  अनंग माला की ये लघु साधना पूर्ण होती है जो साधक में पूर्ण आकर्षण भर देती  है.

जिससे संसार की हर स्त्री साधक की और आकर्षित होती है,यहाँ तक की जब  आप यक्षिणी या अप्सरा की साधना करे तब एक माला मंत्र की करके शक्ति  रुद्राक्ष को अपने बाजु पर बांध ले लाल धागे से।तो ये मंत्र अप्सरा तथा  यक्षिणी का भी आकर्षण करता है.

साधना  के बाद पुनः रुद्राक्ष को स्नान कराके  सुरक्षित रख ले.यदि पत्नी रात  दिन कलह करती है तो उसके नाम से संकल्प  लेकर मात्र एक माला करे और भगवती काली को एक नारियल अर्पण कर दे. पत्नी  आपकी और आकर्षित होकर आपके अनुकूल हो जयेगि. निसंदेह ये साधना अद्भूत है  अतः आप सभी इससे लाभ ले.

जय माँ .

राजगुरु जी

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पुष्पदेहा अप्सरा साधना





किसी भी शुक्रबार से प्रारंभ कर अगले १४ दिनों तक की साधना है ( कुल १५ दिन की )... इसमें पुष्पदेहा अप्सरा यन्त्र और पुष्पदेहा अप्सरा माला प्रयोग मे लानी चाहिए! उत्तम वस्त्र पहनने चाहिए एवं दिशा उत्तर मुख होनी चाहिए ! मंत्र जप के समय शुद्ध घी का दीपक जलते रहना चाहिए उसमे कुछ इत्र की बूंदे भी डाल दें ! साधना का समय और स्थान बदलना नहीं चाहिए ! स्थान साफ़ सुथरा और सुसजित होना चाहिए !

यह रात्रि कालीन साधना है अतः १० बजे के बाद ही प्रारंभ करे ! यन्त्र एवं माला का कुमकुम अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें और निम्न मंत्र का १५ दिन तक ५ माला जप करें !

!! ॐ ह्रीं पुष्पदेहा आगच्छ प्रत्यक्षं भव ॐ फट !!

मंत्र जप के बाद हो सके तो वहीँ पर विश्राम करें ! १५ दिन के बाद यन्त्र और माला को किसी पवित्र नदी या सरोवर या देवालय मे विसर्जित कर दें !
साधना काल मे गुरु मंत्र और गुरु पर पूर्ण विशवास रखें


राजगुरु जी

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...