Monday, July 4, 2016

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महाविद्या आश्रम

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Sunday, June 26, 2016

सर्व दोष NASHAK भगवती दुर्गा PRAYOG

भगवती दुर्गा का रूप अपने आप मे साधको के मध्य हमेशा से ही अत्याधिक प्रचलित रहा है. बुराई पर अच्छाई की जित का प्रतीक है देवी. दुर्गा के कई रूपों की साधना तन्त्र ग्रंथो मे निहित है. देवी नित्य कल्याणमई है तथा अपने साधको पर अपनी अमी द्रष्टि सदैव रखती है. भगवती की साधना करना जीवन का एक अत्यधिक उच्च सोपान है. व्यक्ति अपने कर्म दोषों से जब तक मुक्त नहीं होता तब तक उन्नति की गति मंद रूप से ही चलती है चाहे वह भौतिक क्षेत्र हो या आध्यात्मिक क्षेत्र हो. भौतिक रूप मे चाहे हम कर्मफलो को प्राप्त कर दोषों का निवारण एक बार कर भी ले लेकिन मानसिक दोषों तथा मन मे जो उन दोषों का अंश रह गया है उसका शमन भी उतना ही ज़रुरी है जितना भौतिक दोषों का निवारण. कई बार व्यक्ति अपने अत्यधिक परिश्रमो के बाद भी सफलता को प्राप्त नहीं कर सकता है. या फिर कोई न कोई बाधा व्यक्ति के सामने आ जाती है, या फिर परिवारजनो से अचानक ही अनबन होती रहती है. इन सब के पीछे कही न कही व्यक्ति के वे दोष शामिल होते है जो की पाप कर्मो के आचरण से उन पर हावी हो जाते है. चाहे वह इस जन्म से सबंधित हो या पूर्व जन्म के संदर्भ मे. कर्म की गति न्यारी है लेकिन साधना का भी अपने आप मे एक विशेष महत्व है, साधना के माध्यम से हम अपने दोषों की समाप्ति कर सकते है, निवृति कर सकते है. इस प्रकार की साधनाओ मे भगवती की साधनाए आधार रूप रही है. भगवती की साधना मात्रु स्वरुप मे ही ज्यादातर की जाती है. इस महत्वपूर्ण साधना को सम्प्पन करने पर साधक की भौतिक तथा आध्यात्मिक गति मंद से तीव्र हो जाती है, समस्त बाधाओ का निराकारण होता है तथा व्यक्ति अपने दोषों से मुक्त हो कर निर्मल चित युक्त बन जाता है. आगे के सभी कार्यों मे देवी साधक की सहायता करती है तथा साधक का सतत कल्याण होता रहता है.
इस साधना को करने के लिए साधक के पास शुद्ध पारद दुर्गा विग्रह हो तो ज्यादा अच्छा है, लेकिन यह संभव नहीं हो तो साधक को देवी दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति को अपने सामने स्थापित करना चाहिए. साधक इस साधना को रविवार से शुरू करे. रात्री काल मे ११ बजे के बाद इस साधना को शुरू करना चाहिए. साधक लाल वस्त्र पहन कर लाल आसान पर बैठ कर देवी का पूजन करे तथा उसके बाद निम्न मंत्र की मूंगामाला से २१ माला जाप करे. साधक चाहे तो ५१ माला भी जाप कर सकता है. दिशा उत्तर रहे.

ओम दुं सर्वदोष शमनाय सिंहवासिनि नमः

यह क्रम ११ दिनों तक रहे. संभव हो तो ११ वे दिन साधक को मंत्रजाप के बाद शुद्ध घी की १०८ आहुति यही मन्त्र से अग्नि मे प्रदान करे. साधना काल मे कमल की सुगंध आने लगती है तथा सौभाग्यशाली साधको को देवी बिम्बात्मक रूप से दर्शन भी देती है. साधना के दिनों मे ही उत्तरोत्तर साधक का चित निर्मलता की और अग्रसर होता रहता है जिसे साधक स्पष्ट रूप से अनुभव कर पाएगा.

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Saturday, June 25, 2016

मुकदमे मे विजय प्राप्ति यन्त्र प्रयोग)

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इस  गुप्त शत्रुता   वाले  युग   मे  कौन सा  शत्रु कब  घात प्रतिघात  कर दे कहा नही जा सकता हैं  एक बार सामने के आघात  तो सहन किये जा सकते हैं  पर  छुप कर या विभिन्न षडयंत्र बनाकर किये गए आघात के बारे  मे क्या कहा जाए  ... यह  सब  तो आज  के  युग की निशानी हैं   इन्ही मे  एक  तरीका   जो सर्वाधिक  उपयोग होता हैं  वह हैं सामने वाले  को किसी भीझूठे   मुकदमो मे फसवा  दो , अब  व्यक्ति कितना भी निर्दोष  हो  इस चक्कर से निकलते निकलते  उसका  बहुत संमय उर्जा और धन नष्ट  हो जाता हैं मानसिक प्रताडना  जो झेलनी पड़ती हैं  वह तो  बिलकुल ही अलग  होती हैं.

यूँ तो गुप्तशत्रुओं और समस्त प्रकार के  षड्यंत्रो को निष्फल करने मे  भगवती बल्गामुखी  और अन्य महाविद्याओ का नाम आता  हैं पर इनकी साधनाए इतनी सरल भी  तो नही   हैं , इनसे सबंधित प्रयोग अवश्य किये जा सकते हैं  पर व्यक्ति  भी कुछ संशय की अवस्था  मे  रहता   हैं की  कहीं कुछ  गलत न  हो जाए   या  उसे पूरा विधान ठीक  से मालुम  भी नही होता ,  इस  समय   यंत्र विज्ञान के   सरलतम तरीके  जिन पर भले  ही एक पल  विस्वास न हो पर बहुत लाभदायक सिद्ध  हुये हैं .
वेसे भी कानूनी  जब लड़ाई प्रारंभ होती हैं   तो  एक व्यक्ति ,कानूनी दाव  पेंच  से  उसका कोई वास्ता   नही होता  और  वह परेशां   होता जाता हैं  और  किसी तरह मुकदमो मे  विजय भी  चाहता हैं की फिर से  व ह  आरामदायक जीवन   व्यतीत  कर सके .

यह कहा भी  गया हैं की कमजोरी  ही पाप  हैं और बलयुक्त होना   ही पुण्य हैं और जीवन ऐसे  रो रो कर   घिसट घिसट  कर तो काटा  नही जा सकता  हैं यह तो आप हम सभी जानते हैं की  आज के  युग  मेसाधना के लिए  समय  न मिल पाना   एक बहुत बड़ी समस्या हैं ,हलाकि सदगुरुदेव जी ने यह भी कहा हैं की अगर ध्यान से देखें   तो स्वयं ही पता  चल जाएगा की   दिन का  कितना समय   यूँ ही  बेकार  के कामो मे जा ता हैं अगर वहां  समय बचाया जा सके  तो.

अगर भौतिक जीवन मे उच्चता प्राप्त  कर ली  हैं  तो  इस  तंत्र जगत मे  भी कुछ  उपलब्धिया  भी प्राप्त करें यही  तो  जीवन की उच्चता   हैं .तो इसके लिए समय निकालना ही पड़ेगा .ठीक इसी तरह अगर समस्या  बहुत गंभीर  न हुयी  हो तो आप  इस प्रयोग को करें  और पुरे मनो योग से करने मे   सफलता आपको प्राप्त होगी  बशर्ते आपका पक्ष   सही होना चहिये .इतना   तो व्यक्ति का  स्वयं के लिए  निष्पक्ष  आकलन होना ही चाहिये.

यन्त्र  विज्ञानं   का यह बहुत ही सरल  सा प्रयोग हैं अनेको  द्वारा   प्रशंशित भी हैं .

आप  सभी को यंत्र विधान  के सामन्य नियम ज्ञात हैं ही , अनेको बार लिखे  जा  चुके हैं तो बार बार उन्ही का उल्लेख उचित  नही   हैं , इस यंत्र को भोजपत्र पर   कुकुम से बना ले . जिस व्यक्ति  के विरुद्ध  आपका मुकदमा  हो  उसका  नाम यंत्र के मध्य  मे पहले से लिखना  न भूले ,यंत्र का  पूजन और अन्य सामान्य विधान जो की यन्त्र सबंधित विगत कई पोस्ट मे  दिए जा चुके हैं आप उन्हें करे  और   जिस  दिन आपका मुकदमा  हो कोर्ट मे  जाना  हो इस यन्त्र को त्रिलोह   धातु के तावीज़ मे बंद करके   दूध मे डा ल  दे .. बस इतना  विधान हैं .

राजगुरु जी

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Monday, June 20, 2016

महाकाली सबंधित पूर्ण काल ज्ञान के लिए

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निकटत्तम भविष्य को जानने के लिए एक सामान्य विधान इस रूप से है जो की व्यक्ति को भविष्य के ज़रोखे मे जांक कर देखने के लिए शक्ति प्रदान करता है
किसीभी शुभदिन से यह साधना शुरू की जा सकती है ।

इसमें महाकाली का विग्रह या चित्र अपने सामने स्थापित करे और रात्री काल मे उसका सामान्य पूजन कर के निम्न मंत्र की २१ माला २१ दिन तक करे । यानि रोज 21 माला प्रतिदिन जाप करना हे ।

मंत्र :-

काली कंकाली प्रत्यक्ष क्रीं क्रीं क्रीं हूं

साधना काल मे लोहबान का धुप व् घी का दीपक जलते रहना चाहिए ।

यह जाप रुद्राक्ष या काली हकीक माला से किया जा सकता है ।

साधना के कुछ दिनों मे साधको को कई मधुर अनुभव हो सकते है.

राजगुरु जी

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Tuesday, February 16, 2016


धन प्राप्ति साधना








जीवन में धन की आवश्यकता को कौन नकार सकता है, आज के युग में किसी भी क्षेत्र की सफलता का आधार धन ही तो है. एक व्यक्ति के जीवन में वह आध्यात्मिक तथा भौतिक उन्नति के लिए ही तो हमेशा कार्य करता रहता है. पढ़ाई तथा विविध कार्यमें निपूर्ण बनने में व्यक्ति शारीरिक तथा मानसिक श्रम कर जीवन के बहुमूल्य दिन और बहुमूल्य समय को व्यय करता है, या फिर विविध कार्यों से अनुभव एकत्रित करता है. और यह सब वह करता है एक सुखी भविष्य के लिए जिसमे उसे पूर्ण सुख की प्राप्ति हो सके, पूर्ण भोग की प्राप्ति हो सके तथा समाज में एक आदर्श व्यक्ति बन पूर्ण मान सन्मान को अर्जित कर सके. लेकिन इन सब के मूल में क्या धन नहीं है? धन की अनिवार्यता को निर्विवादित रूप से आज के युग में स्वीकार करना ही पड़ता है. चाहे वह समृद्धि हो, विविध वास्तुओ का उपभोग हो या फिर उच्चतम शिक्षा को अर्जित करना हो. इन सब का आधार धन ही तो है. लेकिन कई बार भाग्य से वंचित व्यक्ति के ऊपर कुदरत अपनी महेरबानी नहीं दिखाती. और एसी स्थिति में व्यक्तिको अपने कई कई स्वप्नों का त्याग करना पड़ता है तथा कई प्रकार के सुख भोग से वंचित रहना पड़ता है. जीवन के इन्ही बोजिल क्षणों में उसका आत्मबल धीरे धीरे क्षीण होने लगता है तथा भविष्य में भी वह अपनी स्थिति को स्वीकार कर जीवन को इसी प्रकार बोज पूर्ण रूप से आगे बढाने लगता है. यह किसी भी प्रकार से श्रेयकर स्थिति तो नहीं है. खास कर जब हमारे पास साधनाओ का बल हो, हमारे पूर्वजो का आशीर्वाद उनके ज्ञान के रूप में हमारे चारों तरफ साधना विज्ञान बन कर बिखरा हुआ हो.
तंत्र साधनाओ में एक से एक विलक्षण प्रयोग धन की प्राप्ति में साधक को सहायता प्रदान करने के लिए है जिसके माध्यम से साधक के सामने नए नए धन के स्त्रोत खुलने लगते है, रुके हुवे धन को प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है तथा नाना प्रकार से उसको धन की प्राप्ति हो सकती है, और फिर अगर यह सब अचानक या आकस्मिक रूप से हो तो उसकी तो बात ही क्या. ऐसे ही दुर्लभ आकस्मिक धन प्राप्ति के प्रयोग में से एक प्रयोग है स्वर्णमाला प्रयोग. जिसमे पारद के संयोग से तीव्र आकर्षण के वशीभूत हो कर इस देव योनी को साधक की सहायता करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, लेकिन विवशता पूर्ण नहीं, प्रशन्नता पूर्वक ही तो. क्यों की जहां तांत्रिक प्रक्रिया के साथ साथ विशुद्ध पारद के चैतन्यता का संयोग होता है, वहाँ तो साधक की तरफ देव योनी का भी आकर्षित होना स्वाभाविक ही है. प्रस्तुत प्रयोग ऐसा ही एक गुढ़ विधान है, जिसे पूर्ण मनोयोग के साथ सम्प्पन करने पर साधक को उपरोक्त लाभों की प्राप्ति होती है तथा शीघ्र ही धन सबंधी समस्याओ का निराकरण प्राप्त होता है.
यह प्रयोग साधक किसी भी पूर्णिमा की रात्री में कर सकता है.
साधक यह प्रयोग किसी वटवृक्ष के निचे करे
साधक रात्री में १० बजे के बाद स्नान आदि से निवृत हो कर किसी भी सुसज्जित वस्त्रों को धारण करे तथा वटवृक्ष के निचे पीले आसन पर बैठ जाए. साधक को उत्तर दिशा की तरफ मुख कर बैठना चाहिए.
साधक को इस प्रयोग में सुगन्धित अगरबत्ती लगानी चाहिए, अपने वस्त्रों पर भी इत्र लगाना चाहिए. साधक को कोई मिठाई का भोग अपने पास रख सकता है. इसके अलावा साधक को खाने वाला पान जिसमे कत्था सुपारी तथा इलाइची डाली हुई हो उसको भी समर्पित कर सकता है.
सर्व प्रथम साधक गुरुपूजन तथा गुरुमन्त्र का जाप करे. उसके बाद साधक विशुद्ध पारद से निर्मित यक्षिणी गुटिका को अपने सामने किसी पात्र में स्थापित करे तथा उसका पूजन करे. यक्षिणी गुटिका की अनुपलब्धि में साधक सौंदर्य कंकण पर भी यह प्रयोग कर सकता है. पूजन के बाद साधक देवी स्वर्णमाला को वंदन करे तथा आकस्मिक धन प्राप्ति के लिए सहाय करने के लिए विनंती करे. इसके बाद साधक यथा संभव मृत्युंजय मन्त्र का जाप करे.
इसके बाद साधक स्फटिकमाला से या रुद्राक्ष माला से निम्न मन्त्र की २१ माला मन्त्र जाप करे.
ॐ श्रीं श्रीं स्वर्णमाले द्रव्यसिद्धिं हूं हूं ठः ठः
(om shreem shreem swarnamaale dravyasiddhim hoom hoom thah thah)
मन्त्र जाप पूर्ण होने पर साधक स्वर्णमाला यक्षिणी को वंदन करे तथा मिठाई/पान स्वयं ग्रहण करे. माला का विसर्जन साधक को नहीं करना है साधक इस माला का भविष्य में भी इस प्रयोग हेतु उपयोग कर सकता है.
राजगुरु जी
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अग्नि सूर्य साधना
(पारिवारिक सुख समृद्धि के लिए )
भगवान आदित्य सूर्य का महत्त्व समस्त जीव के लिए कितना और क्या है यह बात तो हर कोई व्यक्ति जानता ही है. समस्त जिव को प्राण उर्जा प्रदान करने वाले तथा पृथ्वी की सुनिश्चित गति के लिए भगवान सूर्य देव हमेशा ही कार्यरत रहते है.
भगवान सूर्य को आदि देव कहा गया है, वेदोक्त तथा तंत्रोक्त दोनों द्रष्टि से इनका उच्चतम महत्त्व विविध साधना पद्धति तथा आदि ग्रंथो के आधार पर प्राप्त होता है. सूर्य विज्ञान तथा सूर्य विज्ञान तंत्र जेसी गुढ़ और अत्यंत ही रहस्यमय विद्या भी तो इन्ही देव की कृपा द्रष्टि से सम्प्पन हो पाती है. समस्त जिव को आधार शक्ति, प्रकाश, प्राण ऊर्जा आदि प्रदान करते हुवे जिव मात्र को सहज रूप से अपना वर प्रदान करते ही रहते है. ज्योतिष के क्षेत्र में भी भगवान सूर्य का अमूल्य स्थान है, वहीँ दूसरी तरफ पारद विज्ञान में भी इनका सहयोग प्राप्त होना आवश्यक ही है.

भगवान सूर्य की तंत्रोक्त एवं वेदोक्त दोनों ही रूप से उपासना होती आई है. आदि देव सूर्य के कई स्वरुप साधको के मध्य प्रचलित है तथा उनके विशेष रूप तथा शक्तियों के आधार पर उनसे सबंधित कई कई साधना पद्धतियाँ प्रचलन में है. अग्नि तत्व की पूर्ण प्रधानता को अपने अंदर समेटे हुवे भगवान सूर्य का प्रतिक अग्नि को भी माना गया है. सम्पूर्ण सृष्टि को अग्नि अर्थात ऊष्मा और प्राण उर्जा प्रदान करने वाले भगवान सूर्य के इस स्वरुप को अग्नि सूर्य कहा जाता है. भगवान सूर्य के इस स्वरुप की उपासना करने पर साधक के पाप कर्मो का नाश होता है, तथा कई कार्मिक दोषों की निवृति होती है. सूर्य ग्रह से सबंधित समस्याओ में राहत मिलती है. तथा घर परिवार में उन्नति प्राप्त होती है. आज हर एक व्यक्ति का स्वप्न होता है की उनके घर में परिवार में खुशहाली का वातावरण रहे तथा सभी सदस्य मिल जुल कर शान्ति पूर्वक तो रहे ही, इसके साथ ही साथ सभी अपने अपने कार्यों में उन्नति को प्राप्त करे, घर तथा परिवार का नाम रोशन करे. सभी को अपने जीवन में सफलता की प्राप्ति हो. प्रस्तुत प्रयोग भी भगवान श्री सूर्य देव से सबंधित एक ऐसा ही प्रयोग है जिसे सम्प्पन करने पर साधक के जीवन में तथा परिवारजनो के जीवन में उपरोक्त वर्णित लाभों की प्राप्ति होती है, वैसे तो यह प्रयोग एक दिवसीय प्रयोग है लेकिन साधक के लिए उत्तम रहता है की वो इस प्रयोग को समय तथा सुभीता के अनुसार करते रहे.
यह प्रयोग साधक किसी भी रविवार या कोई भी शुभदिन कर सकता है.
समय दिन का रहे. साधक सूर्योदय से ले कर दोपहर तक के समय के मध्य यह प्रयोग सम्प्पन करे तो उत्तम है.
साधक सर्व स्नान आदि से निवृत सफ़ेद वस्त्र धारण करे.
साधक सूर्य को अर्ध्य प्रदान करे तथा उसके बाद सफ़ेद आसन पर बैठ जाए. साधक का मुख पूर्व दिशा की तरफ होना चाहिए.
इसके बाद साधक गुरुपूजन तथा गुरु मन्त्र का जाप करे. इसके बाद साधक गायत्री मन्त्र का भी यथा संभव जाप करे.
इसके बाद साधक निम्न मन्त्र की ११ माला मन्त्र जाप करे. यह जाप स्फटिक माला से होना चाहिए.
इसके बाद साधक अपने सामने अग्नि को प्रज्वलित करे तथा शुद्ध घी से इस मन्त्र की १०८ आहुति अग्नि में समर्पित करे.
मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः अग्नये जातवेद ईहावह सर्वकर्माणि साधय स्वाहा
राजगुरु जी
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Monday, February 15, 2016



धन-संमृद्धि ,ऐश्वर्य प्रदायक कमला [[लक्ष्मी]] साधना








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जीवन में समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति तथा भौतिक उन्नति के इच्छुक व्यक्तियों को सर्व सुख प्रदायक चमत्कारी कमला [लक्ष्मी] साधना प्रयोग एक बार अवश्य ही संपन्न कर लेना चाहिए |इस प्रयोग को विधि पूर्वक संपन्न कर लेने से साधक को अपने जीवन में धन-धान्य ,सुख -संमृद्धि ,यश -कीर्ति ,पराक्रम ,भवन ,वाहन सुख तथा संतान सुख आदि भौतिक सुखों की निरंतर प्राप्ति रहती है |
सामग्री
----------- मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त महालक्ष्मी या कमला यन्त्र ,पारद लक्ष्मी ,घी का दीपक ,अगरबत्ती ,जल पात्र ,कमलगट्टे की माला [मंत्र सिद्ध चैतन्य],पीले रंग का आसन ,पीले रंग की धोती ,
मंत्र
------- ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं हसौ: जगतप्रसुत्यै नमः |
साधना विधि
---------------- शुभ मुहूर्त अथवा गुरूवार के दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त हो पवित्र हो पीली धोती धारण कर ,पीले आसन पर स्थान ग्रहण करें |पवित्री करण आदि करके उत्तर दिशा की और मुह रखके सामने बाजोट या चौकी पर पीला कपडा बिछा कर उस पर अष्टदल बनाकर पारद लक्ष्मी और यन्त्र स्थापित करें |संकल्प करें निश्चित संख्या जप की निश्चित दिनों में ,कम से कम साधना २१ दिन चलेगी और मंत्र जप सवालाख होने चाहिए ,इस तरह अधिकतम एक दिन में ६००० से अधिक अर्थात ६० माला से अधिक जप नहीं होने चाहिए ,कम जप हों और अधिक दिनों में हों तो और अच्छा ,पर जप अनुष्ठान पूर्वक सारे नियम पालन करते हुए ही होने चाहिए |तांत्रिक साधना है अतः त्रुटी न हो इस बात का ध्यान रखें |इसके बाद पारद लक्ष्मी की प्राण प्रतिष्ठा करें ,तत्पश्चात यन्त्र और मूर्ती की विधिवत पूजन करें |केसर का उनपर और खुद भी तिलक करें |इसके बाद पूजन समाप्त करें अब जप रोज रात्री में ही होंगे |रात्री में शुद्ध हो मंत्र सिद्ध कमलगट्टे की माला से धीमे वारों में और शुद्ध उच्चारण के साथ मंत्र जप आरम्भ करें |मंत्र जप समाप्त होने पर जप को भगवती के बाएं हाथ में समर्पित करें |क्षमा मांगे गलतियों हेतु और आरती करें |यह क्रम प्रतिदिन अनुष्ठान समाप्ति तक चलेगा |अंतिम दिन के जप के अगले दिन हवन करें |और यंत्र तथा मूर्ती का तर्पण करें |
प्रयोग समाप्त होने पर किसी कुँवारी कन्या को भोजन वस्त्रादि देकर संतुष्ट कर उससे आशीर्वाद लें |अब इस यन्त्र और मूर्ती को घर अथवा दूकान के पूजा स्थल में स्थापित करें और नित्य प्रति पूजा देते रहें |आपकी उन्नति और संमृद्धि वृद्धि होती रहेगी |क्योकि इतने दिन में मूर्ती और यन्त्र इतना चैतन्य हो जाता है की वह आपकी उन्नति में सहायक रहता है जब तक की उसकी पूजा होती रहे |पारद और यंत्र एक तांत्रिक वस्तु हैं और तीब्र प्रभावी होते हैं ,तंत्र के अंतर्गत आते हैं अतः शीघ्र लाभ होता है |
विशेष
--------- प्रयोग से पूर्व किसी योग्य से मार्गदर्शन और सहायता उत्तम रहता है और त्रुटियों की संभावना नहीं रहती |मंत्र सिद्ध चैतन्य माला अथवा प्राण प्रतिष्ठित यंत्र रखने का तात्पर्य यह होता है की यह तांत्रिक क्रियाओं द्वारा संपन्न की जाती हैं और सामान्य लोगों के लिए मुश्किल है इनकी जानकारी होना |यदि समस्त क्रिया खुद न कर सकें तो किसी योग्य इक अथवा जानकार से सम्पूर्ण अनुष्ठान कराकर उनसे प्राण प्रतिष्ठित पारद लक्ष्मी और यन्त्र तथा माला प्राप्त कर उसे अपने पूजा स्थान में स्थापित कर रोज पूजा दें ,प्रभाव और लाभ मिलेंगे
राजगुरु जी
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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...