Thursday, July 9, 2015

भैरवी चक्र साधना में साधक-साधिकाओं के लिए निर्देश








1.किसी भी नारी कि उपेक्षा या अपमान न करें।
2.कन्याओं को देवी का रूप समझकर उनकी पूजा करें।
3.कन्याओं-नारियों की शक्ति पर सहायता एवं रक्षा करें।
4.पेड़ न काटे, न कटवाएं।
5.मदिरापान या मांसाहार केवल साधना हेतु है। इसे व्यसन न बनाये।जो मस्तिष्क और विवेक को नष्ट कर दे; उस मदिरापान से भैरव जी कुपित होकर उसका विनाश कर देते है।
6.भैराविमार्ग की अपनी साधना को गुप्त रखें, किसी को न बताएं।
7.दिन में सामान्य पूजा करें।साधना 9 से 1 बजे तक रात्रि में प्रशस्त हैं।
8.नवमी एवं चतुर्दशी को भैरवी में स्थित देवी की पूजा करें।
9.इस मार्ग के आलोचकों से मत उलझे। इस संसार में भांति-भांति के प्राणी रहते है। सब की प्रवृत्ति एवं एवं सोच अलग-अलग होती है। न तो किसी को इस मार्ग कि ओर प्रेरित करे, न ही विरोध करे।
10.यह प्रयास रखे कि भैरवी सदा प्रसन्न रहे।
11.यदि वह मांसाहारी नहीं है; तो वानस्पतिक गर्म और कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन करें और विजया से निर्मित मद का प्रयोग करें।
अन्य जानकारियाँ
11.आसन, वस्त्र लाल होते हैं। एक वस्त्र का प्रयोग करे, जो ढीला हो। कुछ सिले हुए वस्त्र की भी वर्जना करते हैं।
12.पूजा केवल नवमी-चतुर्दशी को होती है। अन्य तिथियों में केवल साधना होती है।
13.साधना के अनेक स्तर है। यहाँ सामान्य स्तर दिया गया है। भैरवी को सामने बैठाकर देवीरुप कल्पना में मंत्र जप करने से मन्त्र सिद्ध होते है।
14.मूलाधार के प्लेट के नीचे से खोपड़ी कि जोड़ तक और सिर के चाँद तक में मुख्य चक्र होते है। साधक-साधिका को इस पर जैतून या चमेली के तेल की मालिश करते रहना चाहिए।
15.इन चक्रों पर नीचे से ऊपर तक होंठ फेरने और चुम्बन लेने से ये शक्तिशाली होते है।
16.एक-दूसरे के आज्ञाचक्र को चूमने से मनासिक शक्ति प्रबल होती है।
17.चषक (पानपात्र) को सम्हाल कर रखें। इनका दिव्य महत्त्व होता है।
18.घट हर बार न्य लें, पूराने को विसर्जित कर दें।
घट के प्रसाद में मध के साथ सुगन्धित पदार्थ और गुलाब –केवड़ा जैसे फूलों को रखने का निर्देश है।
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भैरवी चक्र साधनाओं में मुख्य चक्र की पूजा






सबसे पहले भैरवी का अभिषेक एवं उसका पूजा किया जाता है। इसमें उसे पहले अभिमंत्रित मिट्टी से; फिर पंचामृत से एक-एक करके स्नान करवाया जाता है। किसी किसी गुरु द्वारा पहले मिट्टी, फिर उबटन और इसके बाद पंचामृत का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद भैरवी को देवी के रूप में श्रृंगार करके उससे चक्र के मध्य बैठाकर विधिवत् उस देवी के रूप में पूजा की जाती है, जिसको ईष्ट बनाया है।
इस समय श्रृंगार के बाद चक्र के मध्य देवी रूपा भैरवी होती है। उसके सामने पूजाघट होता है। इसमें मदिरा या मादक शरबत होता है।पूजा विधि विस्तृत है, इसे दूसरे पोस्ट में अलग से दिया जाएगा।
पूजन के बाद प्रसाद अर्पण किया जाता है। ये तामसी पदार्थ होते हैं। पहले इसे पूजित भैरवी ग्रहण करती है; इसके बाद गुरु और तब साधक।किसी-किसी गुरु के समुदाय में भैरवी का जूठा घट में मिला दिया जाता है।
साधक को प्रण लेना पड़ता है कि वह भविष्य में किसी नारी का अपमान नहीं करेगा। पूजन तीन स्तर पर होता है । यही पहली पूजा है। अन्य पूजा साधना क्रम की है।
स्नान का मंत्र
ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं भगवती महामाये अनंग वेग साहसिनी सर्वजन मनोहारिणी सर्ववश शंकरी मोदय –मोदय प्रमोदय-प्रमोदय एह्येह्यागच्छगच्छ कामकला कालिकाये सानिध्यं कुरु-कुरु हूँ हूँ फट फट स्वाहा।
वस्त्रार्पण मंत्र
ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं स्त्रीं स्त्रीं त्रैलोक्याकर्षिणी वस्त्रं गृहण गृहण स्वाहा।
स्नान पूजा मंत्र
आं हूं क्लीं क्लीं सर्व भूत प्रेत पिशाच रक्षसः ग्रस मम जाड्यम च्छेदय स्फ्रें हौं मम शत्रुण दह दह उच्छादय स्तम्भय स्तम्भय विध्वंस्य विध्वंस्य सर्वग्रहभ्य: शान्ति कुरु रक्षा कुरु ऐ ऐ फट ठ: ठ:
श्रृंगार मंत्र
ॐ ह्रीं ॐ क्लूं कामकालिकाये हूं आं भगमालिन्ये ऐ स्त्रीं भगप्रियायै ठ: श्रीं मदनातुरै भैरवं श्रृंगार कुरु कुरु नमः
सिन्दूरार्पण मंत्र
ह्रीं श्रीं क्लीं क्लीं क्रीं क्रीं सिन्दूरार्पण गृहण गृहण कुरु कुरु नमः देवी
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भैरवी चक्र में शरीर की शुद्धि






स्नान विधि- स्नान तलवों से मस्तक, मस्तक से तलवों ता ‘ॐ भैरवाय नमः’ मंत्र के साथ पहले मिट्टी से; फिर पानी से स्नान करके तेल (सरसों) से; फिर सिद्ध उबटन से, फिर गोबर (गाय), फिर गौमूत्र, फिर पानी से धोकर, दही से फिर दूध से, फिर पानी से करें और भैरवी को करायें।
लाल रंग के सूती-रेशमी साड़ी सेट साधक एवं गुरु लाल चोंगे को वस्त्र के रूप में धारण करें। इसके बाद गहनें, पायल आदि जो देवी को पहनाया जाता है, पहनायें जाते हैं। इसके अभाव में कल्पना करके कि आप गहना पहन रहे हैं लाल कलावा और चुनती का प्रयोग किया जाता है। यह श्रृंगार गुरु के द्वारा मन्त्रों से पूरित होता है। गुरु कि उपस्थिति न हो, तो गुरु के नाम संकल्प करके साधक करता है।
तलवों के पंजों के मध्य, पैरों में पृष्ठभाग से वहीँ, हाथोंकी तलहटा के मध्य एवं हाटों के पृष्ठ पर वहीँ और आज्ञा चकरा पर भैरवी चकरा अंकन किया जाता है।
इसके बाद अंकित भैरवी के चारों ओर जल रहे दीपकों के प्रज्वलित मंडल में भैरवी का प्रवेश कराया जाता है।
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माँ बगलामुखी साधना





यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। सामनेवाले विरोधियों को शांत करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा।
मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या किलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है।
हम यहाँ पर सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली, कोर्ट में विजय दिलाने वाली, अपने विरोधियों का मुँह बंद करने वाली माँ बगलामुखी की आराधना का सही प्रस्तुतीकरण दे रहे हैं। हमारे पाठक इसका प्रयोग कर लाभ उठाने में समर्थ होंगे, ऐसी हमारी आशा है।
यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है।
इस साधना में विशेष सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है जिसे हम यहाँ पर देना उचित समझते हैं। इस साधना को करने वाला साधक पूर्ण रूप से शुद्ध होकर (तन, मन, वचन) एक निश्चित समय पर पीले वस्त्र पहनकर व पीला आसन बिछाकर, पीले पुष्पों का प्रयोग कर, पीली (हल्दी) की 108 दानों की माला द्वारा मंत्रों का सही उच्चारण करते हुए कम से कम 11 माला का नित्य जाप 21 दिनों तक या कार्यसिद्ध होने तक करे या फिर नित्य 108 बार मंत्र जाप करने से भी आपको अभीष्ट सिद्ध की प्राप्ति होगी।
आँखों में तेज बढ़ेगा, आपकी ओर कोई निगाह नहीं मिला पाएगा एवं आपके सभी उचित कार्य सहज होते जाएँगे। खाने में पीला खाना व सोने के बिछौने को भी पीला रखना साधना काल में आवश्यक होता है वहीं नियम-संयम रखकर ब्रह्मचारीय होना भी आवश्यक है।
ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा।
हमने उपर्युक्त सभी बारीकियाँ बता दी हैं। अब यहाँ पर हम इसकी संपूर्ण विधि बता रहे हैं। इस छत्तीस अक्षर के मंत्र का विनियोग ऋयादिन्यास, करन्यास, हृदयाविन्यास व मंत्र इस प्रकार है--
विनियोग
अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।

आवाहन
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
ध्यान
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।
मंत्र इस प्रकार है-- ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा।
मंत्र जाप लक्ष्य बनाकर किया जाए तो उसका दशांश होम करना चाहिए। जिसमें चने की दाल, तिल एवं शुद्ध घी का प्रयोग होना चाहिए एवं समिधा में आम की सूखी लकड़ी या पीपल की लकड़ी का भी प्रयोग कर सकते हैं। मंत्र जाप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर के करना चाहिए।
साधनाकाल की सावधानियाँ
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- पीले वस्त्र धारण करें।
- एक समय भोजन करें।
- बाल नहीं कटवाए।
- मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें।
- दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें।
- साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्‍ठ फलदायी होता है।
- साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए।
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पंचांगुली साधना





गुरु की आज्ञा, गुरु की कृपा के बिना कोई भी मन्त्र या तंत्र या सिद्धि संभव नहीं अतः प्रथम गुरु पूजन, और मानसिक रूप से आशीर्वाद लेकर ही किसी भी साधना में प्रवर्त होना चाहिए, यही शिष्य या साधक का कर्म और धर्म होना चाहिए.
भाइयो बहनों आप सभी को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ही साधना की सफलता हेतु भी शुभकामनाएं------
ये साधना गुरु द्वारा प्रदत्त है, कई लोगों ने किया, और इसके आश्चर्यजनक परिणाम भी प्राप्त किया, और मेरा भी स्वयं का अनुभूत है, भाइयो बहनों इसमें एक शंका लोगों को रहती है और वो है की यंत्र, तो इसका सलुशन भी है किन्तु इस ‘शुक्ल पक्ष की पंचमी, नवरात्री की पंचमी’ अतः इसका लाभ तो उठाना ही चाहिए, क्योंकि इस साधना का आगाज इस दिन किया तो निश्चित ही आगे आने वाले समय में एक बार में ही परिणाम भी प्रत्यक्ष होंगे.
इस दिन की जाने वाली साधना में कोई सामग्री या विशेस विधान की आवश्यकता नहीं है मात्र पीले वस्त्र, पीला आसन उत्तर दिशा और आदि शक्ति का चित्र, और गुरु चित्र तो अनिवार्य है ही.......
रात १० बजे स्नान करे और उत्तर दिशा की ओर मुह करके बैठ जाएँ, गुरु पूजन गणेश और भैरव पूजन करने के बाद संकल्प लें और पंचान्गुली ध्यान कर, निम्न मन्त्र का ५१ बार जप कर लें....
साधना विधान;
सर्व प्रथम, गुरु मन्त्र जो भी आपका हो या ‘ॐ परम तत्वाय गुरुभ्यो नमः’ की चार माला करें |
‘ह्रीं’( HREEM) बीज का ७ बार जप करे | इससे मन्त्र प्राणमय हो जायेगा |
इसके बाद एंग(AING) बीज का सात बार जप करें-----
ध्यान मन्त्र---
पंचांगुली महादेवी श्री सीमंधर शासने,
अधिष्ठात्री करस्यासौ शक्ति: श्री त्रिदशेषितु: |
मन्त्र:_
‘ॐ नमो पंचांगुली -पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भुतमध्ये प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेखिनी मध्ये गुणीमध्ये गारूणीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषाशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपरे बुरो जो कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते चिंतावे तस माथे श्री पंचांगुली देवी तणों वज्र निर्धार पड़े ॐ ठं ठं ठं स्वाहा’ |
‘OM NAMO PANCHAANGULI –PANCHAAGULI PARSHARI PARSHARI MATA MAYNGAL VASHIKARNI LOHMAY DANDMARNI CHAUSHATHA KAAM VIHDANI RANMADHYE RAULMADHYE SHATRUMADHYE DEEVANMADHYE BHUTMADHYE PRETMADHYE PISHACHMADHYE JHOTINGMADHYE DAKINIMADHYE SHANKHINIMADHYE YAKSHINIMADHYE SHEKANIMADHYE GUNI MADHYE GARUNI MADHYE VINARIMADHYE DOSHMADHYE DOSHAASHARAN MADHYE DUSHT MADHYE GHOR KASHT MUJH UPARE BURO JO KOI KARE KARAVE JADE JADAVE TAT CHINTE CHINTAVE TAS MATHE SHREE MATA SHREE PANCHAANGULI DEVI TANO VAJRA NIRDHAR PADE OM THAM-THAM THAM SWAHA’|
मन्त्र पूर्ण होने के बाद मन्त्र गुरु को समर्पित करें पांच दिनों तक प्रतिदिन यही क्रम होगा पांच दिनों के बाद, माँ पंचान्गुली देवी का पूर्ण पूजन कर खीर का भोग लगा कर किसी कन्या को भोजन करा देना चाहिए और सफलता की कामना करना चाहिए |
मन्त्र आपके सामने है और अभी समय भी है जो इसे करना चाहें तो १०, बजे,११ बजे, ११: ३०बजे भी आप बैठ सकते हैं, किन्तु करके देखें जरुर, क्योंकि साधना का प्रतिफल तो करने पर ही देख पाएंगे न, अतः साधना करें जरुर.
भाइयो बहनों, जो भी यंत्र के साथ ही साधना करना चाहें तो भी परेशान न हों यंत्र भी आपको मिल जायेगा किन्तु इसके लिए आपको अगले माह की पंचमी का इन्तजार करना पड़ेगा और इसके साथ ही तब यंत्र और चित्र की भी व्यवस्था कर लीजिए, किन्तु तब तक आप इस मन्त्र को प्रतिदिन करके न केवल याद कर लीजिए और अपने प्राणों में समाहित भी, क्योंकि जब मन्त्र की क्रमशः पुनरावृत्ति होती है तो मन्त्र और साधक दोनों ही एक होने की क्रिया प्रारम्भा हो जाती है और मन्त्र प्राणमय होने लगता है और तब सिद्धि की स्तिथि बनने लगती है, तो आप सब तैयार हो जाइये, साधना के महासागर से एक और मोती चुनने हेतु-----
आप सभी को मेरी शुभकामनाएं साधना करें साधनामय बनें......
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पंचांगुली साधना







गुरु की आज्ञा, गुरु की कृपा के बिना कोई भी मन्त्र या तंत्र या सिद्धि संभव नहीं अतः प्रथम गुरु पूजन, और मानसिक रूप से आशीर्वाद लेकर ही किसी भी साधना में प्रवर्त होना चाहिए, यही शिष्य या साधक का कर्म और धर्म होना चाहिए.
भाइयो बहनों आप सभी को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ही साधना की सफलता हेतु भी शुभकामनाएं------
ये साधना गुरु द्वारा प्रदत्त है, कई लोगों ने किया, और इसके आश्चर्यजनक परिणाम भी प्राप्त किया, और मेरा भी स्वयं का अनुभूत है, भाइयो बहनों इसमें एक शंका लोगों को रहती है और वो है की यंत्र, तो इसका सलुशन भी है किन्तु इस ‘शुक्ल पक्ष की पंचमी, नवरात्री की पंचमी’ अतः इसका लाभ तो उठाना ही चाहिए, क्योंकि इस साधना का आगाज इस दिन किया तो निश्चित ही आगे आने वाले समय में एक बार में ही परिणाम भी प्रत्यक्ष होंगे.
इस दिन की जाने वाली साधना में कोई सामग्री या विशेस विधान की आवश्यकता नहीं है मात्र पीले वस्त्र, पीला आसन उत्तर दिशा और आदि शक्ति का चित्र, और गुरु चित्र तो अनिवार्य है ही.......
रात १० बजे स्नान करे और उत्तर दिशा की ओर मुह करके बैठ जाएँ, गुरु पूजन गणेश और भैरव पूजन करने के बाद संकल्प लें और पंचान्गुली ध्यान कर, निम्न मन्त्र का ५१ बार जप कर लें....
साधना विधान;
सर्व प्रथम, गुरु मन्त्र जो भी आपका हो या ‘ॐ परम तत्वाय गुरुभ्यो नमः’ की चार माला करें |
‘ह्रीं’( HREEM) बीज का ७ बार जप करे | इससे मन्त्र प्राणमय हो जायेगा |
इसके बाद एंग(AING) बीज का सात बार जप करें-----
ध्यान मन्त्र---
पंचांगुली महादेवी श्री सीमंधर शासने,
अधिष्ठात्री करस्यासौ शक्ति: श्री त्रिदशेषितु: |
मन्त्र:_
‘ॐ नमो पंचांगुली -पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भुतमध्ये प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेखिनी मध्ये गुणीमध्ये गारूणीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषाशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपरे बुरो जो कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते चिंतावे तस माथे श्री पंचांगुली देवी तणों वज्र निर्धार पड़े ॐ ठं ठं ठं स्वाहा’ |
‘OM NAMO PANCHAANGULI –PANCHAAGULI PARSHARI PARSHARI MATA MAYNGAL VASHIKARNI LOHMAY DANDMARNI CHAUSHATHA KAAM VIHDANI RANMADHYE RAULMADHYE SHATRUMADHYE DEEVANMADHYE BHUTMADHYE PRETMADHYE PISHACHMADHYE JHOTINGMADHYE DAKINIMADHYE SHANKHINIMADHYE YAKSHINIMADHYE SHEKANIMADHYE GUNI MADHYE GARUNI MADHYE VINARIMADHYE DOSHMADHYE DOSHAASHARAN MADHYE DUSHT MADHYE GHOR KASHT MUJH UPARE BURO JO KOI KARE KARAVE JADE JADAVE TAT CHINTE CHINTAVE TAS MATHE SHREE MATA SHREE PANCHAANGULI DEVI TANO VAJRA NIRDHAR PADE OM THAM-THAM THAM SWAHA’|
मन्त्र पूर्ण होने के बाद मन्त्र गुरु को समर्पित करें पांच दिनों तक प्रतिदिन यही क्रम होगा पांच दिनों के बाद, माँ पंचान्गुली देवी का पूर्ण पूजन कर खीर का भोग लगा कर किसी कन्या को भोजन करा देना चाहिए और सफलता की कामना करना चाहिए |
मन्त्र आपके सामने है और अभी समय भी है जो इसे करना चाहें तो १०, बजे,११ बजे, ११: ३०बजे भी आप बैठ सकते हैं, किन्तु करके देखें जरुर, क्योंकि साधना का प्रतिफल तो करने पर ही देख पाएंगे न, अतः साधना करें जरुर.
भाइयो बहनों, जो भी यंत्र के साथ ही साधना करना चाहें तो भी परेशान न हों यंत्र भी आपको मिल जायेगा किन्तु इसके लिए आपको अगले माह की पंचमी का इन्तजार करना पड़ेगा और इसके साथ ही तब यंत्र और चित्र की भी व्यवस्था कर लीजिए, किन्तु तब तक आप इस मन्त्र को प्रतिदिन करके न केवल याद कर लीजिए और अपने प्राणों में समाहित भी, क्योंकि जब मन्त्र की क्रमशः पुनरावृत्ति होती है तो मन्त्र और साधक दोनों ही एक होने की क्रिया प्रारम्भा हो जाती है और मन्त्र प्राणमय होने लगता है और तब सिद्धि की स्तिथि बनने लगती है, तो आप सब तैयार हो जाइये, साधना के महासागर से एक और मोती चुनने हेतु-----
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श्री हनुमान भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन करने हेतु अनुष्ठान







हर व्यक्ति की यही इच्छा रहती है की उसे अपने जीवन में किसी न किसी रूप में ईश्वर के दर्शन हो जाएँ। आज आप सब के लाभार्थ एक अनुपम हनुमान साधना का विवरण कर रहा हूँ। यदि इस अनुष्ठान को पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के साथ नियम-पालन करते हुए किया जाये तो हनुमान जी किसी न किसी भेष में आपको दर्शन दे देंगे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
साधना सामग्री : हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठित पारद मूर्ति, मूंगे की माला, लकड़ी का बाजोट, गुड-चने का प्रसाद, स्टील या तांबे की थाली, सिन्दूर, धुप, अगरबत्ती, घी का दीपक, लाल वस्त्र (सवा मीटर ), जनेऊ, फल, दक्षिणा।
साधना समय : किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के शनिवार या मंगलवार से आरम्भ करके ११ दिन लगातार
साधना विधि : मंगलवार या शनिवार को सुबह उठकर नहाधोकर लाल रंग के वस्त्र पहने। सर्वप्रथम घर के पूजा-स्थान में रखी हनुमान मूर्ति या चित्र के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करें। उठने के बाद आपको मौन धारण करना है किसी से बात नहीं करनी है और पूरे दिन मौन रहना है। अब अपने पूजा स्थान में बैठ जाएँ और सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करके "ॐ गं गणपतये नमः " इस मन्त्र को १०८ बार जाप करके गणेश जी को प्रणाम करें एवं उनसे विनती करें की जो अनुष्ठान आप करने जा रहे हो उसमे कोई विघ्न न आये व उसमे आपको सफलता प्राप्त हो।
इसके पश्चात अपने सामने लकड़ी का बाजोट रख लें। इस बाजोट के ऊपर लाल रंग का कपडा बिछा दें व उससे मोली से बाजोट के चारों तरफ से बाँध दे। एक स्टील या तांबे की थाली लें उससे बाजोट पर रख दें। इसके बाद इस थाली में गुलाब के पुष्प की पंखुड़ियाँ बिछा दें। उस पर श्री हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठित पारद मूर्ति रख दें। मूर्ति को पहले गंगाजल से उसके बाद पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण ) से स्नान कराएं। इसके बाद एक दूसरी थाली में सिन्दूर के घोल से ॐ का चिन्ह बनायें और उस पर पुनः लाल पुष्प की पंखुड़ियाँ रख कर पारद हनुमान मूर्ति स्थापित कर दें। इसके बाद मूर्ति के ऊपर हनुमान जी के लाल सिन्दूर के घोल से लेप कर दें। अब घी का दीपक जलाएं, धुप अगरबत्ती जलाएं और हनुमान जी को दिखाएँ।
इसके पश्चात लाल पुष्प अर्पित करें, जनेऊ चढ़ाएं, और गुड-चने के प्रसाद और फल का भोग लगाएं। अब दक्षिणा भी अर्पित करें।
इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर आँखे बंद करकर हनुमान जी का ध्यान करें और इस अनुष्ठान को करने की अपनी मनोकामना या इच्छा को मन ही मन दोहराएं। जल को दाहिनी और जमीन पर छोड़ दें।
अब मूंगे की माला से इस मन्त्र के आपको १५१ जाप करने हैं। मन में हनुमान जी का चिंतन करें।
मन्त्र : ॐ नमो हनुमंताय आवेशय आवेशय स्वाहा । ।
मन्त्र जाप के पश्चात पुनः हनुमान जी को प्रणाम करें व अपनी मनोकामना उनके सामने रखे। बाजोट व समस्त सामग्री को वहीँ रखा रहने दें। प्रसाद उठाकर थोड़ा स्वयं ग्रहण करें एवं बाकि घर के सदस्यों में बाँट दें।
दिनभर आपको मौन धारण करते हुए हनुमान जी का ही ध्यान करना है। व किसी भी प्रकार के बुरे विचारों को अपने मन में न आने दें। दिन में एक बार आपको बिना नमक और हल्दी का भोजन करना है।
ऐसा ११ दिन तक लगातार करना है। ११ दिन के बाद यह अनुष्ठान पूर्ण हो जायेगा और आपको हनुमान जी किसी न किसी रूप में दर्शन देने अवश्य आएंगे।
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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...