Friday, June 26, 2020

शनिदेव को प्रसन्न कैसे करें







शनिदेव को प्रसन्न कैसे करें,, 


ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए।

शनिवार के दिन शनि देव की विशेष पूजा होती है। शहर के हर छोटे बड़े शनि मंदिर में सुबह ही आपको शनि भक्त देखने को मिल जाएंगे।

* शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवंती का फूल, तिल, तेल, गु़ड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।

* शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने-अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

* शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।

* इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।

* शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।

* शनि की शांति के लिए नीलम को तभी पहना जा सकता है।

* शनिश्वर के भक्तों को संध्या काल में शनि मंदिर में जाकर दीप भेंट करना चाहिए और उड़द दाल में खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को भोग लगाना चाहिए। शनिदेव का आशीर्वाद लेने के पश्चात आपको प्रसाद स्वरूप खिचड़ी खाना चाहिए।

* सूर्यपुत्र शनिदेव की प्रसन्नता हेतु इस दिन काली चींटियों को गु़ड़ एवं आटा देना चाहिए।

* इस दिन काले रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए।

* श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करना अति मंगलकारी माना जाता है।

इस प्रकार भक्ति एवं श्रद्धापूर्वक शनिवार के दिन शनिदेव का व्रत एवं पूजन करने से शनि का कोप शांत होता है और शनि की दशा के समय उनके भक्तों को कष्ट की अनुभूति नहीं होती है।

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सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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Thursday, June 25, 2020

मुकदमे मे विजय प्राप्ति यन्त्र प्रयोग





मुकदमे मे विजय प्राप्ति यन्त्र प्रयोग)


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इस  गुप्त शत्रुता   वाले  युग   मे  कौन सा  शत्रु कब  घात प्रतिघात  कर दे कहा नही जा सकता हैं  एक बार सामने के आघात  तो सहन किये जा सकते हैं  पर  छुप कर या विभिन्न षडयंत्र बनाकर किये गए आघात के बारे  मे क्या कहा जाए  ...

 यह  सब  तो आज  के  युग की निशानी हैं   इन्ही मे  एक  तरीका   जो सर्वाधिक  उपयोग होता हैं  वह हैं सामने वाले  को किसी भीझूठे   मुकदमो मे फसवा  दो , अब  व्यक्ति कितना भी निर्दोष  हो  इस चक्कर से निकलते निकलते  उसका  बहुत संमय उर्जा और धन नष्ट  हो जाता हैं मानसिक प्रताडना  जो झेलनी पड़ती हैं  वह तो  बिलकुल ही अलग  होती हैं.

यूँ तो गुप्तशत्रुओं और समस्त प्रकार के  षड्यंत्रो को निष्फल करने मे  भगवती बल्गामुखी  और अन्य महाविद्याओ का नाम आता  हैं पर इनकी साधनाए इतनी सरल भी  तो नही   हैं ,

 इनसे सबंधित प्रयोग अवश्य किये जा सकते हैं  पर व्यक्ति  भी कुछ संशय की अवस्था  मे  रहता   हैं की  कहीं कुछ  गलत न  हो जाए   या  उसे पूरा विधान ठीक  से मालुम  भी नही होता ,  इस  समय   यंत्र विज्ञान के   सरलतम तरीके  जिन पर भले  ही एक पल  विस्वास न हो पर बहुत लाभदायक सिद्ध  हुये हैं .

वेसे भी कानूनी  जब लड़ाई प्रारंभ होती हैं   तो  एक व्यक्ति ,कानूनी दाव  पेंच  से  उसका कोई वास्ता   नही होता  और  वह परेशां   होता जाता हैं  और  किसी तरह मुकदमो मे  विजय भी  चाहता हैं की फिर से  व ह  आरामदायक जीवन   व्यतीत  कर सके .

यह कहा भी  गया हैं की कमजोरी  ही पाप  हैं और बलयुक्त होना   ही पुण्य हैं और जीवन ऐसे  रो रो कर   घिसट घिसट  कर तो काटा  नही जा सकता  हैं 

यह तो आप हम सभी जानते हैं की  आज के  युग  मेसाधना के लिए  समय  न मिल पाना   एक बहुत बड़ी समस्या हैं ,हलाकि सदगुरुदेव जी ने यह भी कहा हैं की अगर ध्यान से देखें   तो स्वयं ही पता  चल जाएगा की   दिन का  कितना समय   यूँ ही  बेकार  के कामो मे जा ता हैं अगर वहां  समय बचाया जा सके  तो.

अगर भौतिक जीवन मे उच्चता प्राप्त  कर ली  हैं  तो  इस  तंत्र जगत मे  भी कुछ  उपलब्धिया  भी प्राप्त करें यही  तो  जीवन की उच्चता   हैं .तो इसके लिए समय निकालना ही पड़ेगा .

ठीक इसी तरह अगर समस्या  बहुत गंभीर  न हुयी  हो तो आप  इस प्रयोग को करें  और पुरे मनो योग से करने मे   सफलता आपको प्राप्त होगी  बशर्ते आपका पक्ष   सही होना चहिये .इतना   तो व्यक्ति का  स्वयं के लिए  निष्पक्ष  आकलन होना ही चाहिये.

यन्त्र  विज्ञानं   का यह बहुत ही सरल  सा प्रयोग हैं अनेको  द्वारा   प्रशंशित भी हैं .  

आप  सभी को यंत्र विधान  के सामन्य नियम ज्ञात हैं ही , अनेको बार लिखे  जा  चुके हैं तो बार बार उन्ही का उल्लेख उचित  नही   हैं , इस यंत्र को भोजपत्र पर   कुकुम से बना ले . 

जिस व्यक्ति  के विरुद्ध  आपका मुकदमा  हो  उसका  नाम यंत्र के मध्य  मे पहले से लिखना  न भूले ,यंत्र का  पूजन और अन्य सामान्य विधान जो की यन्त्र सबंधित विगत कई पोस्ट मे  दिए जा चुके हैं .

आप उन्हें करे  और   जिस  दिन आपका मुकदमा  हो कोर्ट मे  जाना  हो इस यन्त्र को त्रिलोह   धातु के तावीज़ मे बंद करके   दूध मे डा ल  दे .. बस इतना  विधान हैं .

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सर्व दोष नाशक भगवती दुर्गा साधना प्रयोग




सर्व दोष नाशक  भगवती दुर्गा साधना प्रयोग 


भगवती दुर्गा का रूप अपने आप मे साधको के मध्य हमेशा से ही अत्याधिक प्रचलित रहा है. बुराई पर अच्छाई की जित का प्रतीक है देवी. दुर्गा के कई रूपों की साधना तन्त्र ग्रंथो मे निहित है. देवी नित्य कल्याणमई है तथा अपने साधको पर अपनी अमी द्रष्टि सदैव रखती है. 

भगवती की साधना करना जीवन का एक अत्यधिक उच्च सोपान है. व्यक्ति अपने कर्म दोषों से जब तक मुक्त नहीं होता तब तक उन्नति की गति मंद रूप से ही चलती है चाहे वह भौतिक क्षेत्र हो या आध्यात्मिक क्षेत्र हो. 

भौतिक रूप मे चाहे हम कर्मफलो को प्राप्त कर दोषों का निवारण एक बार कर भी ले लेकिन मानसिक दोषों तथा मन मे जो उन दोषों का अंश रह गया है उसका शमन भी उतना ही ज़रुरी है जितना भौतिक दोषों का निवारण.

 कई बार व्यक्ति अपने अत्यधिक परिश्रमो के बाद भी सफलता को प्राप्त नहीं कर सकता है. या फिर कोई न कोई बाधा व्यक्ति के सामने आ जाती है, या फिर परिवारजनो से अचानक ही अनबन होती रहती है. 

इन सब के पीछे कही न कही व्यक्ति के वे दोष शामिल होते है जो की पाप कर्मो के आचरण से उन पर हावी हो जाते है. चाहे वह इस जन्म से सबंधित हो या पूर्व जन्म के संदर्भ मे. 

कर्म की गति न्यारी है लेकिन साधना का भी अपने आप मे एक विशेष महत्व है, साधना के माध्यम से हम अपने दोषों की समाप्ति कर सकते है, निवृति कर सकते है.

 इस प्रकार की साधनाओ मे भगवती की साधनाए आधार रूप रही है. भगवती की साधना मात्रु स्वरुप मे ही ज्यादातर की जाती है. 

इस महत्वपूर्ण साधना को सम्प्पन करने पर साधक की भौतिक तथा आध्यात्मिक गति मंद से तीव्र हो जाती है, समस्त बाधाओ का निराकारण होता है तथा व्यक्ति अपने दोषों से मुक्त हो कर निर्मल चित युक्त बन जाता है.

 आगे के सभी कार्यों मे देवी साधक की सहायता करती है तथा साधक का सतत कल्याण होता रहता है.

इस साधना को करने के लिए साधक के पास शुद्ध पारद दुर्गा विग्रह हो तो ज्यादा अच्छा है, लेकिन यह संभव नहीं हो तो साधक को देवी दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति को अपने सामने स्थापित करना चाहिए. 

साधक इस साधना को रविवार से शुरू करे. रात्री काल मे ११ बजे के बाद इस साधना को शुरू करना चाहिए. 

साधक लाल वस्त्र पहन कर लाल आसान पर बैठ कर देवी का पूजन करे तथा उसके बाद निम्न मंत्र की मूंगामाला से २१ माला जाप करे. 

साधक चाहे तो ५१ माला भी जाप कर सकता है. दिशा उत्तर रहे.

ओम दुं सर्वदोष शमनाय सिंहवासिनि नमः

यह क्रम ११ दिनों तक रहे. संभव हो तो ११ वे दिन साधक को मंत्रजाप के बाद शुद्ध घी की १०८ आहुति यही मन्त्र से अग्नि मे प्रदान करे.

 साधना काल मे कमल की सुगंध आने लगती है तथा सौभाग्यशाली साधको को देवी बिम्बात्मक रूप से दर्शन भी देती है. साधना के दिनों मे ही उत्तरोत्तर साधक का चित निर्मलता की और अग्रसर होता रहता है जिसे साधक स्पष्ट रूप से अनुभव कर पाएगा.

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व्यक्तित्व विकास तंत्र साधना प्रयोग






व्यक्तित्व विकास तंत्र  साधना प्रयोग    




कोई भी व्यक्ति के जीवन किस प्रकार से आगे बीतेगा उसका एक अति महत्वपूर्ण आधार उसका व्यक्तित्व है.

 हमारे जन्म से ले कर हमारी मृत्यु तक हमारे सारे क्रिया कलापों का एक बड़ा आधार हमारा ही व्यक्तित्व होता है, वस्तुतः व्यक्तित्व शब्द भले ही छोटा हो लेकिन इसका वृहद वृत्तांत हो सकता है जो की हर एक व्यक्ति के जीवन में महद रूप से सभी कार्यमें असरकरता है. 

हमारे अंदर की भावनात्मक एवं व्यवहारात्मक प्रक्रिया को ही हमारा व्यक्तित्व कहते है. निःसंदेह एक उच्चतम व्यक्तित्व का धनि व्यक्ति जीवन में ज्यादा से ज्यादा सफलता की प्राप्ति कर सकता है, वहीँ दूसरी तरफ नकारात्मक व्यक्तित्व अर्थात अपने मानस में हिन् भावनाओं को ले कर चलने वाले व्यक्तित्व पूर्ण व्यक्ति अपने जीवन में सफलता का उतना स्वाद नहीं ले पाते है.

देखा जाए तो हमारे मानस के विचार एवं विचार पर होने वाली प्रतिक्रिया ही हमारे सारे कार्यों की सफलता या असफलता का निर्धारण करती है क्यों की कहीं न कहीं सकारात्मक एवं नकारात्मक विचारों का असर हमारे मस्तिस्क से हमारे शरीर एवं शरीर से हमारे कार्यों के ऊपर एक निश्चित ऊर्जा का आघात तो करता ही है. 

हमारे अंदर जितनी ही ज्यादा नकारात्मक उर्जा का संग्रह होगा उतना ही हमारे व्यक्तित्व के ऊपर उसका नकारात्मक प्रभाव होगा. हम तनाव में रहें या अवसाद से घिरे रहें तो निश्चय ही हमारे कार्य योग्य रूप से नहीं होते, वहीँ कई बार आत्मविश्वास की कमी के कारण भी कई प्रकार के कार्य हम कर नहीं पाते है.

प्रस्तुत साधना प्रयोग व्यक्तित्व के विकास के सन्दर्भ में है जहां पर साधना के माध्यम से नकारात्मक उर्जा को दूर कर हमारे अंदर स्पष्ट एवं पूर्ण उर्जा को भरा जा सके.

 यह साधना यूँ तो सभी साधको के लिए उपयोगी ही है क्यों की इस साधना से कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते है जो की न सिर्फ भौतिक परन्तु अध्यात्मिक जीवन के लिए भी आवश्यक है.

साधक के अंदर ही हिन् भावना का शमन होता है फल स्वरुप उसे जीवन सबंधित नयी द्रष्टि की प्राप्ति होती है तथा जीवन को पूर्ण रूप से जीने की एक उमंग व्याप्त होती है.

साधक के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है फल स्वरुप उसे हमेशा प्रगतिमय रहने के लिए आतंरिक प्रेरणा मिलती रहती है.

कई साधक भाई बहेनो को संकोच की समस्या होती है, इसी कारण उनका व्यक्तित्व उभर कर सब के मध्य नहीं आ पता है इस साधना से साधक के अंदर के संकोच आदि से धीरे धीरे मुक्ति मिलती है.

इस प्रकार यह प्रयोग सभी के लिए एक पूर्ण लाभदायक प्रयोग है. यूँ तो यह एक दिवसीय प्रयोग है लेकिन साधक इसको अपने सामर्थ्य अनुसार एवं अपनी स्थिति के अनुसार जितने दिन करना चाहे कर सकता है.

यह साधना साधक किसी भी शुभ दिन शुरू कर सकता है. साधक यह विधान दिन या रात्रि के किसी भी समय में कर सकता है.

साधक को स्नान कर सफ़ेद वस्त्र को धारण कर सफ़ेद आसन पर बैठना चाहिए.  साधक का मुख पूर्व दिशा की और हो.

सर्व प्रथम साधक गुरु पूजन सम्प्पन करे तथा सदगुरु से साधना में सफलता के लिए आशीर्वाद प्राप्त करे.

साधक सर्व प्रथम एक भोजपत्र पे या सफ़ेद कागज़ पे त्रिगंध से (केसर, कुमकुम, कपूर) उपरोक्त यंत्र का निर्माण करे. साधक किसी भी कलम का प्रयोग कर सकता है. अनार की कलम श्रेष्ठ है.

इस यंत्र को साधक अपने सामने स्थापित करे तथा अक्षत, पुष्प आदि समर्पित करे. पूजन में साधक को तेल का दीपक प्रज्वालित्त करना चाहिए.  

इसके बाद साधक गणेश पूजन आदि सम्प्पन कर न्यास करे.

करन्यास

ऐं क्लीं श्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
ऐं क्लीं श्रीं तर्जनीभ्यां नमः
ऐं क्लीं श्रीं मध्यमाभ्यां नमः
ऐं क्लीं श्रीं अनामिकाभ्यां नमः
ऐं क्लीं श्रीं कनिष्टकाभ्यां नमः
ऐं क्लीं श्रीं करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

हृदयादिन्यास

ऐं क्लीं श्रीं हृदयाय नमः
ऐं क्लीं श्रीं शिरसे स्वाहा
ऐं क्लीं श्रीं शिखायै वषट्
ऐं क्लीं श्रीं कवचाय हूं
ऐं क्लीं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्
ऐं क्लीं श्रीं अस्त्राय फट्

न्यास के बाद साधक निम्न मन्त्र का जाप करे. साधक को २१ माला मन्त्र का जाप करना है.
 ॐ ऐं ऐं क्लीं क्लीं श्रीं श्रीं नमः

(OM AING AING KLEEM KLEEM SHREEM SHREEM NAMAH)
साधक को यह जाप स्फटिक माला से करना चाहिए. अगर साधक के पास स्फटिक माला उपलब्ध न हो तो साधक रुद्राक्ष माला से या कर माला से यह मन्त्र जाप करे.

इस प्रकार यह सात  दिवसीय प्रयोग पूर्ण होता है. साधक ने जिस यंत्र का निर्माण किया है उसे पूजा स्थान में स्थापित कर दे. माला का विसर्जन नहीं करना है, यह माला आगे भी साधनाओ में मन्त्र जाप के लिए उपयोग की जा सकती है.

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इच्छित व्यक्ति स्तम्भनं प्रयोग






 इच्छित व्यक्ति स्तम्भनं प्रयोग




घात प्रतिघात   तो  जीवन का खासकर आज के ,  तो एक   अंग  वह भी आवश्यक    बन गयी  हैं  वह  समय  कहीं   कोसों दूर  चला  गया   जब  लोग सामने  चुनौती दे कर लड़ना   पसंद करते थे .

  अब तो  गुप्त रूप  से   आपको  नुक्सान पहुचना   ही एक मात्र मकसद  रह गया   हैं,  यूँ  तो शास्त्रों  मे  लोगों  की अनेक  प्रकार  की श्रेणियाँ   उल्लेखित   हैं . उनमे से कुछ   ये भी हैं की  अकारण  ही  दूसरे को परेशां  करने  वाले ...

किसी की जमीन पर  या किसी  को सिर्फ  कुछ धन  के लिए  नुक्सान पहुचने  वाले .  या आपकी उन्नति से  जल कर आपके लिए   तरह तरह  के  षड्यंत्र  का निर्माण करने वाले .

 तंत्र  क्षेत्र का  साधक   इन सभी  समस्यायों  को  कैसे  निपटा जाये   यह भली भांति  जानता   हैं पर  जानने  और करने मे  कोसो  की  दुरी होती  हैं  ,षट्कर्म मे से  एक  कर्म स्तम्भंन्न भी  हैं   और स्तम्भनं   की प्रमुख देवी   भगवती  बल्गामुखी  के  स्वरुप   से  कौन नही परिचित  होगा  , जिसे कोई भी उपाय  ना  सूझे  तो  विधिवत ज्ञान ले कर इस विद्या का प्रयोग  अपने  रक्षार्थ   करें   निश्चय  ही  उसे लाभ होगा .

पर न  तो इस विद्या का  ज्ञान  देने  वाले  और  न ही   उचित प्रकार से प्रयोग करने वाले  आज  प्राप्त हैं .और् सबसे बड़ी समस्या  यह हैं की इन प्रयोगों   को करने के लिए  कैसे  समय   निकाला  जाए .आज  समय  की  कितनी कमी हैं यह तो हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं   ही .     

साधना  क्षेत्र  मे  दोनों  तरह   के विधान  हैं लंबे  समय वाले  और  कम समय वाले  भी ..साधारणतः यह  कहा  जाता   हैं की सबसे पहले कम समय वाले  विधानों की तरफ गंभीरता  से देखा जाना   चाहिये और  जब  परिणाम  उतने  अनुकूल ना हो जितनी  आवशयकता हैं तब  बृहद   साधना   पर  ध्यान   दे  यह  उचित भी है  क्योंकि जहाँ    सुई का काम  हो वहां तलवार   की क्या  उपयोगिता ..

और  तंत्र   मंत्र  के आधारमे  एक महत्वपूर्ण   अंग या विज्ञानं हैं  यन्त्र विज्ञानं ..अभी  भी इसका    एक अंश मात्र   भी सामने   नही आया   हैं .  एक से एक अद्भुत  गोपनीय   और दाँतों तले  अंगुली  दवा लेने  वाले  रहस्यों से ओत  प्रोत रहा हैं यह विज्ञानं.

हमारे  द्वारा  अनेक प्रयोग   जो दिए जाते रहे हैं  वह  अनेको   मनिशियों   ,तंत्र आचार्यों   और  उच्च तांत्रिक ग्रंथो मे  बहुत प्रशंषित   रहे हैं  और सैकडो ने  उनके  प्रयोग किये  हैं  और लाभ भी उठाया   हैं , आवश्यकता  बस  इस  बात   की हैं की  यदि समय हो तो क्यों न  इन  प्रयोगों  की   करके   भी  देखा  जाये  जो  अनुभूत  और सटीक रहे  हैं .

इन सरलतम  विधानों का अपना   एक महत्त्व हैं.इस यन्त्र  का निर्माण करें .

·        किसी भी शुभ  दिन प्रातः  काल मे कर सकते हैं .
·        यन्त्र   निर्माण  के लिए  अनार   या  जो भी उचित  लकड़ी प्राप्त  हो उसका  उपयोग कर सकते  हैं .

·        यन्त्र  लेखन  मे  स्याही सिर्फ   कुकुम और गोरोचन  को मिलाकर बना ना   हैं .

·        वस्त्र   पीले  और आसन का रंग पीला   हो तो  कहीं जयादा   उचित होगा .

·        प्रयोग  के शुरुआत  मे  संकल्प   ले .

·        यह ध्यान रखे  की यन्त्र के बीच मे  उस व्यक्ति का नाम लिखे  जिसने आपको  परेशां कर्  रखा   हो
·        यन्त्र   निर्माण मतलब  उस व्यक्ति का नाम लिखने के बाद   पुरे  एक  दिन इस  यंत्र को एक मिटटी के वर्तन मे  रखना   हैं  और धूप दीप और   नैवेद्य  अर्पित करना   हैं .

·        बाद मे मतलब दूसरे   दिन  इसके  ऊपर  (मिटटी के  वर्तन) जिसमे  यह  यन्त्र निर्माण के बाद  रखा  हैं किसी  अन्य मिटटी की प्लेट  उसके  ऊपर रख दे और  अच्छी तरह से  इस पात्र कोकिसी  कपडे से  बाँध कर .किसी दूर  निर्जन स्थान पर  रख दे .

ऐसा करने  से  वह व्यक्ति  फिर आपके लिए  कोई हानि का रक  योजना नही बना  पाता   हैं .

इसके बाद  गुरुजी का पूजन और गुरू मंत्र  का जप  यथाशक्ति  करे  औरसफलता  के लिए प्रार्थना  करें ...

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Wednesday, June 24, 2020

नायिका साधना :





नायिका साधना : 


यक्षिणियां तथा अप्सराओं की उपजाति में नायिकाएं आती हैं।

 यह भी यक्षिणियों और अप्सराओं की तरह मन मुग्ध करने वाले सौन्दर्य से परिपूर्ण होती है। इनकी साधना वशीकरण तथा सुंदरता प्राप्ति हेतु की जाती हैं।

माना जाता है कि नारियों को आकर्षित करने का हर उपाय इनके पास हैं।

 ये मुख्यतः 8 हैं-

 1. जया 2. विजया 3. रतिप्रिया 4. कंचन कुंडली 5. स्वर्ण माला 6. जयवती 7. सुरंगिनी 8. विद्यावती।

 इन नायिकाओं का भी इस्तेमाल देवता लोग ऋषि-मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए किया करते थे।

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किन्नर और किन्नरियां साधना प्राचीनकाल में देवाताओं के साथ जहां गंधर्व रहते थे वहीं एक दूसरे क्षेत्र में किन्नर जाति के लोग भी रहते थे। किन्नर जाति के लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे। ये लोग अपने अनुपम तथा मनमोहक सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं। किन्नरों को मृदुभाषी तथा गायन में निपुण माना गया है। हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती है। गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं। परिणामस्वरूप प्राचीन काल से किन्नरियों की साधना ऋषि मुनियों द्वारा की जाती हैं। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं। माना जाता है कि प्रमख रूप से छह किन्नरियों का समूह है- 1. मनोहारिणी किन्नरी 2. शुभग किन्नरी 3. विशाल नेत्र किन्नरी 4. सुरत प्रिय किन्नरी 5. सुमुखी किन्नरी और 6. दिवाकर मुखी किन्नरी। चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट (रजि.) किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249






किन्नर और किन्नरियां साधना


 


प्राचीनकाल में देवाताओं के साथ जहां गंधर्व रहते थे वहीं एक दूसरे क्षेत्र में किन्नर जाति के लोग भी रहते थे। किन्नर जाति के लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे।


 ये लोग अपने अनुपम तथा मनमोहक सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं।

 

किन्नरों को मृदुभाषी तथा गायन में निपुण माना गया है। हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती है।


 गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं। 


परिणामस्वरूप प्राचीन काल से किन्नरियों की साधना ऋषि मुनियों द्वारा की जाती हैं। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं।

 

माना जाता है कि प्रमख रूप से छह किन्नरियों का समूह है- 


1. मनोहारिणी किन्नरी


 2. शुभग किन्नरी


 3. विशाल नेत्र किन्नरी 


4. सुरत प्रिय किन्नरी


 5. सुमुखी किन्नरी और


 6. दिवाकर मुखी किन्नरी। 


   


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》


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प्राचीनकाल में देवाताओं के साथ जहां गंधर्व रहते थे वहीं एक दूसरे क्षेत्र में किन्नर जाति के लोग भी रहते थे। किन्नर जाति के लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे।

 ये लोग अपने अनुपम तथा मनमोहक सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं।

किन्नरों को मृदुभाषी तथा गायन में निपुण माना गया है। हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती है।

 गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं।

परिणामस्वरूप प्राचीन काल से किन्नरियों की साधना ऋषि मुनियों द्वारा की जाती हैं। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं।

माना जाता है कि प्रमख रूप से छह किन्नरियों का समूह है-

1. मनोहारिणी किन्नरी

 2. शुभग किन्नरी

 3. विशाल नेत्र किन्नरी

4. सुरत प्रिय किन्नरी

 5. सुमुखी किन्नरी और

 6. दिवाकर मुखी किन्नरी।

 

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

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