Sunday, March 22, 2020

सर्व कार्य सिद्धि हनुमान मन्त्र


सर्व कार्य सिद्धि हनुमान मन्त्र 


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"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमो भगवते हनुमते मम कार्येषु ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल असाध्यं साधय साधय मां रक्ष रक्ष सर्वदुष्टेभ्यो हुं फट् स्वाहा।"


विधिः-

मंगलवार से प्रारम्भ करके इस मन्त्र का प्रतिदिन १०८ बार जप करता रहे और कम-से-कम सात मंगलवार तक तो अवश्य करे। इससे इसके फलस्वरुप घर का पारस्परिक विग्रह मिटता है, दुष्टों का निवारण होता है और बड़ा कठिन कार्य भी आसानी से सफल हो जाता है।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

 बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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मोबाइल नं. : - 09958417249

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भैरव लक्ष्मी अंगूठी






भैरव लक्ष्मी अंगूठी


गोमेद, राहू का रत्‍न है जो व्यापार और शेयर मार्केट में फायदा दिलवाने में मदद करता है वहीं केतु का रत्‍न लहसुनिया अचानक धन लाभ के मार्ग खोलता है।

 इसलिए जो लोग शेयर मार्केट या ऐसे किसी भी क्षेत्र से जुड़े हैं उन्‍हें राहू का रत्न गोमेद और केतु का रत्न लहसुनिया इनके संगम से बनी ये अंगूठी जरूर धारण करनी चाहिए।



विवरण

जेम्स्टोने नाम:

गोमेद + लहसुनियाभार:5.5 रत्तीधातु: त्री धातु 

गोमेद, राहू का रत्‍न है जो व्यापार और शेयर मार्केट में फायदा दिलवाने में मदद करता है वहीं केतु का रत्‍न लहसुनिया अचानक धन लाभ के मार्ग खोलता है।

 इसलिए जो लोग शेयर मार्केट या ऐसे किसी भी क्षेत्र से जुड़े हैं उन्‍हें राहू का रत्न गोमेद और केतु का रत्न लहसुनिया इनके संगम से बनी ये अंगूठी जरूर धारण करनी चाहिए।

यह किसी भी कंगाल को मालामाल कर सकती है क्योकिं इसमें राहू और केतु दो ग्रहों का बल है |

भैरव लक्ष्मी अंगूठी के लाभ

गोमेद और लहसुनिया के संगम से बनी भैरव लक्ष्मी अंगूठी को पहनने से आपकी बौद्धिक क्षमता का विकास होगा और आप अपने व्‍यापार के लिए सही निर्णय ले पाएंगें।

राहू, शेयर मार्केट से संबंधित ग्रह है इसलिए जो भी कोई नया व्यापार करता है, प्रॉपर्टी या शेयर मार्केट में पैसा लगाता है या धन कमाना चाहता है वो इस भैरव लक्ष्मी अंगूठी को जरूर धारण करे।

केतू के प्रभाव में किसी भी व्‍यक्‍ति को धन का नुकसान नहीं हो सकता और राहू धन लाभ का कारक है इसलिए अगर आप दिन रात पैसों का व्‍यापार या शेयर बाज़ार से जुड़े हैं तो आपको लहसुनिया और गोमेद की यह भैरव लक्ष्मी अंगूठी अवश्‍य धारण करनी चाहिए।

शेयर मार्केट और जो लोग व्यापार करते हैं या उस क्षेत्र से जुड़े हैं उन लोगों के लिए यह भैरव लक्ष्मी अंगूठी किसी वरदान से कम नहीं है।

कहां से लें

आप ये भैरव लक्ष्मी अंगूठी     

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

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(रजि ).   से भी प्राप्‍त कर सकते हैं। इस अंगूठी को   महाविद्या आश्रम  द्वारा राहू-केतु के साथ-साथ महालक्ष्‍मी के मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया है जिससे यह आपको जल्‍द ही शुभ फल दे!

भैरव लक्ष्मी अंगूठी दक्षिणा  - 2100

जादा जानकारी और समाधान और उपाय या रत्न विश्लेषण समाधान प्राप्त के लिए सम्पर्क करे।

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दक्षिणा  -  300   मात्र .

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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Saturday, March 21, 2020

शत्रु को नष्ट करने का तंत्र प्रयोग






शत्रु को नष्ट करने का तंत्र प्रयोग


दोेस्तो,इस दुनिया में कोई विरला हीं होगा जिस के कोई शत्रु न हों

इस लिए मेरा ये उपाय सभी की लिए हैं
कहते है की क़ामयाबी की साथ शत्रु फ्री मैं मिलते हैं , हम यदि अच्छा जीवन यपान कर रहे है, तो लोग अनायास हीं शत्रु बन जाते है.

शत्रु चाहें केसा भी हों.., वो आपके विरूद अपना 100% देता हैं ....

कोई तंत्र प्रयोग करता हैं , कोई किसी ना किसी तरह का सडयंत्र रचता हैं

आज की इस प्रयोग से आप अपने शत्रु पर हर तरह से लगाम लगा सकती  हैं

प्रयोग पर आने से पहले एक चेतावनी दे रहा हुँ

" सिर्फ आजमाने वाले.., और  व्यर्थ में किसी को परेशान करने के उद्देस्य से इस प्रयोग को न करे., अन्यथा  भगवती कुपिेत हो कर  उसी का भक्षण  कर लेती हैं

अब प्रयोग पर आते है

बुधवार की रात्रि में ११ नींबू लेकेर माँ के तस्वीर के सामने  सिंदुअर  में सरसो का तेल मिला कर सभी ११ नीम्बुओं पर 
किसी कील  से अपने शत्रु का नाम लिखे ओर  इस मंत्र की ३ माला जाप करें ., जाप के बाद इन नीम्बुओं कों कहि खाली ज़मीन मैं गाड़ देवे

इससे शत्रु आपका कुछ नही बिगाड़ पायेगा 

मंत्र: " ओम क्रीं शत्रु नाशिनी  क्रीं फट "


चेतावनी पुनः याद रहें...

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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Wednesday, March 18, 2020

भैरवी तंत्र भैरवी विद्या





भैरवी तंत्र भैरवी विद्या  


तंत्र का वह मार्ग जिसमे भैरवी को आधार मानकर साधना की जाती है अर्थात जिसमे स्त्री देवी और पुरुष देवता स्वरुप होकर साधना करते हैं अर्थात जिसमे स्त्री भैरवी और पुरुष भैरव स्वरुप होकर साधना करते हैं अर्थात जिसमे स्त्री महामाया का अंश और पुरुष सदाशिव का अंश हो साधना करते हैं ,भैरवी तंत्र कहलाता है|

मूलतः यह कौल मार्ग की साधना है ,पर अन्य मार्गों में भी इसके विविध रूप उपयोग होते हैं |यह कौल मार्ग की भैरवी विद्या है जिसे श्री विद्या भी कहा जाता है |इसके कई रूप विभिन्न मार्गों में विभिन्न स्वरूपों में प्रयोग किये जाते हैं |

यह आध्यात्मिक क्षेत्र की सर्वाधिक विवादास्पद विद्या है |इसके सम्बन्ध में भारी भ्रम फैले हुए हैं और इन भ्रमो के कारण इसकी सर्वाधिक आलोचना भी होती रही है |

इस विद्या के सिद्ध आचार्यों का कथन सत्य है की अज्ञानता में डूबे पशु साधक जो कर्मकाण्ड के नियमों ,आचार संहिता के कठोर नियमों का पालन करके साधना करते हैं ,वे एक कल्पना जगत में जीते हैं ,जिनका निर्माण वे स्वयं करते हैं |

"श्री विद्या" के अतिरिक्त तमाम मार्ग कृत्रिम मानव निर्मित हैं ,केवल यही एक विद्या है ,जो प्राकृतिक है और स्वयं परमात्मा [सदाशिव] द्वारा उत्पादित है |

यह बार सत्य भी है | सृष्टि की उत्पत्ति और उसके विकास के वैज्ञानिक सूत्रों को बताने वाली विद्या केवल यही है |जो लोग अध्यात्म के चरम ज्ञान को प्राप्त कर लेने का दावा करते हैं ,उन्हें भी इस विद्या में बताये गए गोपनीय सृष्टि सूत्र और ऊर्जा सूत्र का ज्ञान नहीं है |

यह केवल इस विद्या के पक्ष में दिया गया तर्क नहीं है ,अपितु इसका ठोस वैज्ञानिक आधार है |अब तक हुए सभी महान साधकों ने किसी न किसी रूप में इस विद्या की साधना अवश्य की है ,,उन्होंने भैरवी का उपयोग किया या नहीं यह एक विवादस्पद विषय है |

निःसंदेह यह विद्या गोपनीय है और इसकी साधनाओं एवं क्रिया कलापों के बारे में बहुत विशेष विवरण नहीं मिलता |

यह केवल गुरु-शिष्य परंपरा में प्रतिपादित मार्ग है और इसके साधक अपना व्यक्तित्व तक गुप्त रखते हैं |वे साधना रहस्यों को प्रकाशित करने की सोच भी नहीं सकते |जो शास्त्रों में वर्णित है ,वह अपर्याप्त है और अनेक भ्रम भी उत्पन्न करता है |

सामाजिक आवरणों से लिप्त है अथवा मिथकों -कथाओं के रूप में वर्णित है |

यह सोचना निहायत ही अवैज्ञानिक और अज्ञानता है की शक्ति ,सिद्धि और ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग कठोर आचरण संहिता का पालन करके ही प्राप्त किया जा सकता है |

आधुनिक विज्ञान भी इस प्रकृति की ही शक्ति प्राप्त करके मनुष्य के लिए असंभव कृत्यों को संभव बनाता जा रहा है |यही कार्य साधना द्वारा भी होता है और सिद्धि अर्थात शक्ति प्राप्त की जाती है इसी प्रकृति के ऊर्जा सूत्रों और नियमों से |

आध्यात्मिक मार्ग की शक्तियां सूक्ष्म अवश्य हैं ,पर वे प्रकृति की ही शक्तियां हैं ,जिन्हें हम अपने शरीर को यन्त्र बनाकर प्राप्त करते हैं |इसके लिए कठोर आचरण संहिता और विशालतम विधि विधान का पालन आवश्यक नहीं है |

जरुरत है मूल सूत्र को ,मूल नियम को पकड़कर शक्ति प्राप्त और नियंत्रित करने की |यह इस विद्या का मूल सूत्र है |जिस प्रकार धन और ऋण के संयोग से यह समस्त प्रकृति की उत्पत्ति है ,उसी प्रकार धन-ऋण के आपसी सहयोग से शक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है ,यह विद्या उस मार्ग का रास्ता दिखता है | इस प्रकृति का सार सूत्र है ऊर्जा ,अर्थात शक्ति |

इन्ही शक्तियों को विभिन्न वर्गों के रूप में हम देवियों या देवताओं के रूप में जानते हैं |जिन स्वरूपों की हम आराधना करते हैं वे भाव रूप हैं और इनकी कल्पना की जाती है |

इस समस्त रहस्यों को भी यह विद्या स्पष्ट बताती है ,पौराणिक कथाओं की तरह भ्रम में नहीं डालती |कथाएं इसमें भी होती हैं ,पर यह बताया जाता है की इन कथाओं में गूढ़ रहस्य छिपे हैं |

कथा महत्व पूर्ण नहीं है ,इनमे छिपा रहस्य सार सबकुछ है |जबकि होता है समाज में उल्टा ,कथाओं को ही सच्चाई मानकर कल्पना लोक में लोग जीते रहते हैं |

प्रकृति का समस्त ऊर्जा चक्र ,यहाँ तक की कृत्रिम भी धनात्मक और ऋणात्मक के मध्य चल रहा है |सभी आविष्कारों का भी सार सूत्र यही होता है ,क्योकि इस ऊर्जा रूप प्रकृति की उत्पत्ति ही इसी सार सूत्र पर होती है |

श्री विद्या या भैरवी विद्या या भैरवी तंत्र इस समस्त सार सूत्र के रहस्य की एक एक परत हटाकर बताता है की हमारा ऋणात्मक नारी है |नारी के स्पर्श ,क्रीडा ,केलि ,रतिक्रीड़ा के मध्य हमारा ऊर्जा प्रवाह आठ से पच्चीस गुना बढ़ जाता है |

यदि इसे हम शक्ति ,सिद्धि ,समाधि आदि में प्रयोग करें ,तो सब कुछ अत्यंत सरल हो जाता है ,शून्य समाधि भी |यही इस मार्ग का सूत्र है ,मार्ग की शक्ति है |

अर्थात स्त्री और पुरुष की शारीरिक -मानसिक ऊर्जा का उपयोग कर आध्यात्मिक लक्ष्य और ईष्ट प्राप्त करना अथवा परम ऊर्जा का साक्षात्कार इस मार्ग का मूल मंत्र है |

धनात्मक और ऋणात्मक के शार्ट सर्किट से उत्पन्न तीब्र उर्जा को नियंत्रित कर ईष्ट प्राप्ति अथवा लक्ष्य प्राप्ति की और मोड़कर लक्ष्य प्राप्त करना यह मार्ग बताता है |.

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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स्वप्नेश्वर साधना







स्वप्नेश्वर साधना


शाबर मंत्रो के साहित्य में कुछ ऐसे करिश्मे भी हे कि जिनके बारे में जितना भी कहे , कम ही हे. तंत्र क्षेत्र में मेरे प्रवेश के साथ ही मुझे सर्व प्रथम जो साधना प्राप्त हुयी उसी दुर्लभ साधना को आज आप सब लोगो के समक्ष रख रहा हू. इस साधना को किये हुए आज कितने साल हो गए, न जीने कितनी साधनाए इस अवधि में कि हे लेकिन आज इतने समय के बाद भी इसका प्रभाव अचूक है . 

स्वप्न तंत्र के अनुसार शिव को स्वप्नेश्वर और शक्ति को स्वप्नेश्वरी कि संज्ञा दी गयी है. आदि देव एवं देवी स्वप्नों के अधिष्ठाता हैं.

हमारे स्वप्न मात्र स्वप्न न हो के भविष्यके संकेत होते हे ये तो कई लोगो का अनुभव रहा ही होगा. यदा कदा साधनाओ के दर्मिया ऐसे कई अनुभव और संकेत मिलना, देव दर्शन करना , मृत परिचितों को देखना, समश्या का समाधान मिलना , पूर्व जन्म देखना , आदि से सहज ही समजा जा सकता हे कि साधक के जीवन में स्वप्न कि मह्हता क्या हे. हमारे महर्षियोने इस विषय पर पूर्ण शोध करके स्वप्नों का विष्लेषण करके कई नए साधनात्मक एवं भौतिकता सबंधी रहस्य प्रकट किये हे.

 स्वप्नों में दिखाई देने वाली घटाने, स्थल, स्वप्नों का समय, उसके अनुसार नक्षत्र आदि सभी को जोडके निश्चित रूप से ये जाना जा सकता हे कि आखिर स्वप्न के द्रश्य का सही और सचोट संकेत किस घटना पर हे. इसी विज्ञान के साथ जब तंत्र को जोड़ा गया तो इसी में ही उदभव् हुआ स्वप्न तंत्र का. 

स्वप्न तंत्र के द्वारा हम तांत्रिक प्रक्रियाओ और साधनाओ के द्वारा कई ऐसे कार्य कर सकते हे जिसे आश्चर्य ही कहा जा सकता हे. जेसे कि स्वप्न के माध्यम से प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करना, स्वप्नों के संकेतों को समजना, स्वप्नों के द्वारा देव दर्शान करना आदि.

 तांत्रिक ग्रंथो में कई एसी साधनाए दी गयी हे जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति ये सब कर सकता है. विभ्भिन साधनाओ का प्रयोजन विभ्भिन रूप से होता आया हे. जेसे कोई साधना के द्वारा प्रश्नों का उत्तर जाना जा सकता हे. या फिर कोई साधना के द्वारा स्वप्न में देव दर्शन संभव हे
.                                                  

पर क्या कोई एसी भी साधना है जिसके द्वारा पुरे स्वप्न शास्त्रों को एक ही बार में समझा जाए 

जब प्रयोग होता हे तब रात्रि में स्वप्नावस्थामें भोलेनाथ दर्शन देते हे और आगे कोन सी साधना, साधक को फलीभूत होगी उस विषय पर मार्ग दर्शन करते हे. ये स्वप्न सिर्फ गुरु के सामने ही बताया जाता हे और गुरु उस स्वप्न के संकेत से साधक को आगे कि साधनाए प्रदान करता हे. 

अस्तु, ये प्रयोग इतना अधिक महत्त्व रखता हे ये तो इसी से ही समझा जा सकता हे. इस साधना के द्वारा कोई भी व्यक्ति अपने स्वप्न के माध्यम से प्रश्नों के जवाब प्राप्त कर शकता हे, भोलेनाथ का स्वप्नेश्वर स्वरुप में दर्शन भी इसी के द्वारा संभव हे. इस साधना कि विशेषता ये भी हे कि इसको करने से अपने आप ही स्वप्न के संकेतों को समझने का ज्ञान हो जाता हे और भविष्य में वो उसके हर एक स्वप्नों को समजते हुवे सचेत होता हुआ अपने मार्ग पर गतिशील रहता हे. 

  

ये साधना तीन चरणों में सम्प्पन होती हे 

स्वप्नेश्वर दर्शन हेतु : ११ माला मंत्रो को ११ रात्रि तक जाप करे. 

पूर्ण सिद्धि के लिए (स्वप्न शाश्त्र के ज्ञान के लिए): उपरोक्त पद्धति से ११ माला ११ दिन का एक अनुष्ठान होता हे , ऐसे तीन अनुष्ठान करने से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती हे. 

स्वप्न में प्रश्न का जवाब प्राप्त करने के लिए : १०८ (१ माला) मंत्रो को ११ रात्रि तक जाप करे 

यह साधना सोमवार से शुरू करे . सिर्फ रुद्राक्ष माला का ही प्रयोग होता हे. रात्रि के ११ बजे बाद स्नान करके ही ये प्रयोग करे. आसन कोई भी हो . दिशा उत्तर रहे. 
मानसिक रूप से गुरु पूजन करके भगवन शिव एवं गुरु को शाक्षी मानके उनसे आज्ञा लेकर साधना शुरू करे. 

       मंत्र : 

ओम नमो त्रिनेत्राय पिंगलाय महात्मने वामाय विश्वरूपाय स्वप्नाधिपतये नमः मम स्वप्ने कथयमे तथ्यम सर्व कार्य स्वशेषत: त्रिया सिद्धि विद्या स्वामी तत प्रसादाना महेश्वरे 
                                                                                                                       

अगर स्वप्न में कोई प्रश्न का उत्तर जानना चाहे तो उस रोज जाप सम्प्पन करने के बाद उस प्रश्न को मानसिक रूप से दोहराए और स्वप्नेश्वर से जवाब प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करे. 

इस साधना के दरम्यान रात्रि में एक बार नींद उड़ जाती हे और कुछ मिनिटे नींद नहीं आती हे और पूर्ण निंद्रा का आभाष होता हे पर कुछ ही समय में नींद आ जाती हे. ऐसा निश्चित रूप से होता ही हे. प्रश्न का जवाब मिले तो इस कार्य काल में लिख ले वर्ना सुबह तक वो जवाब भूल जायेंगे. 

मेरी ये हार्दिक इच्छा रहेगी कि सभी गुरु भाई एक न एक बार इस साधना को सम्प्पन ज़रूर करे.

चेतावनी -

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Tuesday, March 17, 2020

सूर्य के मीन राशि में आने के बाद मंगल, गुरु और शुक्र भी करेंगे राशि परिवर्तन






सूर्य के मीन राशि में आने के बाद मंगल, गुरु और शुक्र भी करेंगे राशि परिवर्तन


मार्च में 14 तारीख को सूर्य ने राशि बदली है। जो कि अब मीन राशि में है। इसके बाद इसके बाद 3 अन्य ग्रह भी इसी महीने राशि बदलेंगे। जबकि बुध, शनि और राहु-केतु की राशियों में बदलाव नहीं होगा। 

इस महीने सूर्य पहले बुध की चाल में बदलाव हुआ है। पिछले महीने यानी 17 फरवरी से वक्री चल रहा बुध 10 मार्च को मार्गी हो गया है। काशी के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्रा के अनुसार इस महीने हो रही ग्रहों की उथल-पुथल का असर सभी राशियों पर होगा।

4 ग्रहों के राशि परिवर्तन से हो सकते हैं बड़े बदलाव

सूर्य के मीन राशि में आ जाने से जहां खरमास शुरू हो गया है और शुभ काम नहीं किए जाएंगे। वहीं देश की प्रशासन व्यवस्था और सरकार से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। बुध के मार्गी हो जाने से अर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है। वहीं इसी महीने मंगल के राशि बदलने से रक्षा व्यवस्था और देश में कानून व्यवस्था मजबूत होगी।

शुक्र के प्रभाव से महिलाओं से जुड़े बड़े फैसले या बड़ी घटनाएं हो सकती हैं। वहीं बृहस्पति का राशि परिवर्तन होने से देश में धार्मिक मामलों से जुड़े बड़े फैसले और बदलाव देखने को मिल सकते हैं। देश की सीमाओं से जुड़े मामले भी सामने आ सकते हैं।
कब कौन सा ग्रह बदलेगा राशि
सूर्य
फरवरी के दूसरे सप्ताह की शुरुआत से सूर्य ग्रह कुंभ राशि में स्थित था। शनिवार को ये मीन राशि में प्रवेश कर चुका है। इसके साथ ही खरमास शुरू हो गया है।
चंद्र

ये ग्रह हर ढाई दिन में राशि बदल रहा है।

मंगल

अभी मंगल धनु राशि में स्थित है। 22 मार्च को धनु से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेगा।

बुध
इस माह बुध ग्रह राशि नहीं बदलेगा। यह कुंभ राशि में है और 10 मार्च को मार्गी हो गया है।

गुरु

ग्रहों के गुरु बृहस्पति अभी धनु राशि में है। यह ग्रह 29 मार्च को राशि बदलकर धनु से मकर में प्रवेश करेगा।

शुक्र

मार्च की शुरुआत से शुक्र मेष राशि में स्थित है। 28 मार्च को शुक्र राशि बदलेगा और मेष से वृष राशि में प्रवेश करेगा।

शनि और राहु-केतु

मार्च में शनि मकर राशि में ही रहेगा। राहु मिथुन राशि में और केतु धनु राशि में रहेगा।

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लिंगपुराण - योनी तंत्र सन्देश






लिंगपुराण - योनी तंत्र सन्देश


लिंग पुराण में सृष्टि के नैसर्गिक सामंजस्य का तात्विक ज्ञान भगवान् शिव ने दिया है. सभी ग्रन्थ मनुष्य मात्र के लिए ध्यान योग के अभ्यास से ही आत्मज्ञान पाने का सहज मार्ग दिखलाते हैं .

लिंग पुराण में कहा गया है की क्रिया की साधना के द्वारा गृहस्थ भी साधू है, धारण करने योग्य कर्म ही धर्म है और धारण न करने योग्य कर्म ही अधर्म है . मैं लिंग में ही ध्यान करने योग्य हूँ .मुझ से उत्पन्न यह भगवती जगत की योनी है,प्रकृति है . 

लिंग वेदी महादेवी हैं और लिंग स्वयं भगवान् शिव हैं. पुर अर्थात देह में शयन करने के कारण ब्रह्म को पुरुष कहा जाता है. मैं पुरुष रूप हूँ और अम्बिका प्रकृति है, सब नरोंके शरीर में दिव्य रूप से शिव विराजमान हैं ,इसमें संदेह नहीं करना चाहिए. 

सब मनुष्यों का शरीर शिव का दिव्य शरीर है .शुभ भावना से युक्त योगियों का शरीर तो शिव का साक्षात् शरीर है. जब समरस में स्थित योगी ध्यान यज्ञ में रत होता है तो शिव उसके समीप ही होते हैं”.

योनी तंत्र के अनुसार (जो माता पारवती और भगवान् शिव का संवाद है ) ब्रह्मा ,विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का निवास प्रत्येक नारी की योनी में है क्योंकि हर स्त्री देवी भगवती का ही अंश है .दश महाविद्या अर्थात देवी के दस पूजनीय रूप भी योनी में निहित है. 

अतः पुरुष को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिए मन्त्र उच्चारण के साथ देवी के दस रूपों की अर्चना योनी पूजा द्वारा करनी चाहिए . योनी तंत्र में भगवान् शिव ने स्पष्ट कहा है की श्रीकृष्ण .श्रीराम और स्वयं शिव भी योनी पूजा से ही शक्तिमान हुए हैं . भगवान् राम ,शिव जैसे योगेश्वर भी योनी पूजा कर योनी तत्त्व को सादर मस्तक पर धारण करते थे ऐसा योनी तंत्र में कहा गया है क्योंकि बिना योनी की दिव्य उपासना के पुरुष की आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है .

 सभी स्त्रियाँ परमेश्वरी भगवती का अंश होने के कारण इस सम्मान की अधिकारिणी हैं”. अतः अपना भविष्य उज्जवल चाहने वाले पुरुषों को कभी भी स्त्रियों का तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए .

यह वैज्ञानिक सत्य है की पुरुष शरीर में निर्मित होने वाले शुक्राणु किसी अज्ञात शक्ति से चालित होकर अंडाणु से संयोग करने के लिए गुरुत्वाकर्षण के नियम का उल्लंघन करके आगे बढ़ते हैं. योग और अध्यात्म विज्ञान के अनुसार शुक्राणु जीव आत्मा होते हैं जो शरीर पाने के लिए अंडाणु से संयोग करने केलिए भागते हैं. 

इस सत्य से यह सिद्ध होता है की अरबों खरबों शुक्राणुओं में से किसी दुर्लभ को ही मनुष्य शरीर प्राप्त होता है . इस भयानक संग्राम में विजयी होना निश्चय ही जीव आत्मा की सब से बड़ी उपलब्धि है जो हमारी समरण शक्ति में नहीं टिकती.

योग शास्त्र के अनुसार मानव शरीर प्रकृति के चौबीस तत्वों से बना है जो हैं - पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, जीभ व त्वचा ),पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हाथ ,पैर ,जननेद्रिय ,मलमूत्र द्वार और मूंह ),पञ्च कोष(अन्नमय ,प्राण मय,मनोमय ,विज्ञानमय और आनंदमय ),पञ्च प्राण ( पान ,अपान,सामान ,उदान,व्यादान ),मन ,बुद्धि ,चित्त और अहंकार . 

आत्मा इनका आधार और दृष्टा है और ईश्वर का ही प्रतिबिम्ब है जो दिव्य प्रकाश स्वरूप है जिसका दर्शन ध्यान और समाधि में किसी को भी हो सकता है. जब तक कोई भी व्यक्ति स्वयं आत्मज्ञान पाने के लिए आत्म ध्यान नहीं करता तब तक कोई ग्रन्थ और गुरु उसका कल्याण नहीं कर सकते यह भगवान् शिव ने स्पष्ट रूप से ज्ञान संकलिनी तंत्र में कहा है ,-"यह तीर्थ है वह तीर्थ है ,,ऐसा मान कर पृथ्वी के तीर्थों में केवल तामसी व्यक्ति ही भ्रमण करते हैं. 

आत्म तीर्थ को जाने बिना मोक्ष कहाँ संभव है?" भीष्म पितामह ने भी महाभारत के युद्ध में शर शैय्या पर युद्धिष्ठिर को यही उपदेश दिया की सब से श्रेष्ठ तीर्थ मनुष्य का अंतःकरण और सब से पवित्र जल आत्मज्ञान ही है . इस ज्ञान को धारण कर जब पति पत्नी आध्यात्मिक तादात्म्य स्थापित कर दैहिक सम्बन्ध द्वारा किसी अन्य जीव आत्मा का आव्हान संतान के रूप में करते हैं तो वह सृष्टि के कल्याण के लिए महान यग्य संपन्न करते हैं .

 इसी ज्ञान को चरितार्थ करने के लिए भगवान् शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश ने जब विश्व की परिक्रमा करने का आदेश अपने पिताश्री से पाया तो चुप चाप अपने मूषक पर बैठ कर माता -पिता की परिक्रमा कर ली क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार माता पृथ्वी से अधिक गौरवशालिनी और पिता आकाश के सामान व्यापक कहा जाता है .

स्कन्द पुराण में भगवान् शिव ने ऋषि नारद को नाद ब्रह्म का ज्ञान दिया है और मनुष्य देह में स्थित चक्रों और आत्मज्योति रूपी परमात्मा के साक्षात्कार का मार्ग बताया है .स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर प्रत्येक मनुष्य के अस्तित्व में हैं .

सूक्ष्म शारीर में मन और बुद्धि हैं .मन सदा संकल्प -विकल्प में लगा रहता है ;बुद्धि अपने लाभ के लिए मन के सुझावों को तर्क -वितर्क से विश्लेषण करती रहती है .कारण या लिंग शरीर ह्रदय में स्थित होता है जिसमें अहंकार और चित्त मंडल के रूप में दिखाई देते हैं .

अहंकार अपने को श्रेष्ठ और दूसरों के नीचा दिखने का प्रयास करता है और चित्त पिछले अनेक जन्मोंके घनीभूत अनुभवों,को संस्कार के रूप में संचित रखता है .आत्मा जो एक ज्योति है इससे परे है किन्तु आत्मा के निकलते ही स्थूल शरीर से सूक्ष्म और कारण शरीर अलग हो जाते हैं .कारण शरीर को लिंग शरीर भी कहा गया हैं क्योंकि इसमें निहित संस्कार ही आत्मा के अगले शरीर का निर्धारण करते हैं .

आत्मा से आकाश ;आकाश से वायु ;वायु से अग्नि 'अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति शिवजी ने बतायी है .पिछले कर्म द्वारा प्रेरित जीव आत्मा, वीर्य जो की खाए गए भोजन का सूक्ष्मतम तत्व है, के र्रूप में परिणत हो कर माता के गर्भ में प्रवेश करता है जहाँ मान के स्वभाव के अनुसार उसके नए व्यक्तित्व का निर्माण होता ह. गर्भ में स्थित शिशु अपने हाथों से कानों को बंद करके अपने पूर्व कर्मों को याद करके पीड़ित होता और और अपने को धिक्कार कर गर्भ से मुक्त होने का प्रयास करता है .जन्म लेते ही बाहर की वायु का पान करते ही वह अपने पिछले संस्कार से युक्त होकर पुरानी स्मृतियों को भूल जाता है . शरीर में सात धातु हैं

 त्वचा ,रक्त ,मांस ,वसा ,हड्डी ,मज्जा और वीर्य(नर शरीर में ) या रज(नारी शरीर में ). देह में नो छिद्र हैं ,-दो कान ,दो नेत्र ,दो नासिका ,मुख ,गुदा और लिंग .स्त्री शरीर में दो स्तन और एक भग यानी गर्भ का छिद्र अतिरिक्त छिद्र हैं .स्त्रियों में बीस पेशियाँ पुरुषों से अधिक होती हैं . उनके वक्ष में दस और भग में दस और पेशियाँ होती हैं .

योनी में तीन चक्र होते हैं ,तीसरे चक्र में गर्भ शैय्या स्थित होती है .लाल रंग की पेशी वीर्य को जीवन देती है .शरीर में एक सो सात मर्म स्थान और तीन करोड़ पचास लाख रोम कूप होते हैं .जो व्यक्ति योग अभ्यास में निरत रहता है वह नाद ब्रह्म और तीनों लोकों को सुखपूर्वक जानता और भोगता है . मूल आधार ,स्वाधिष्ठान ,मणिपूरक ,अनाहत ,विशुद्ध ,आज्ञा और सहस्त्रार नामक साथ ऊर्जा केंद्र शरीर में हैं जिन पर ध्यान का अभ्यास करने से देवीय शक्ति प्राप्त होती है .

सहस्रार में प्रकाश दीखने पर वहां से अमृत वर्षा का सा आनंद प्राप्त होता है जो मनुष्य शरीर की परम उपलब्धि है .जिसको अपने शरीर में दिव्य आनंद मिलने लगता है वह फिर चाहे भीड़ में रहे या अकेले में ;चाहे इन्द्रियों से विषयों को भोगे या आत्म ध्यान का अभ्यास करे उसे सदा परम आनंद और मोह से मुक्ति का अनुभव होता है .

 मनुष्य का शरीर अनु -परमाणुओं के संघटन से बना है . जिस तरह इलेक्ट्रौन,प्रोटोन ,सदा गति शील रहते हैं किन्तु प्रकाश एक ऊर्जा मात्र है जो कभी तरंग और कभी कण की तरह व्यवहार करता है उसी तरह आत्म सूर्य के प्रकाश से भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है . 

यह इस तरह सिद्ध होता है की सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक आने में कुछ मिनट लगे हैं जब की मनुष्य उसे आँख खोलते ही देख लेता है .अतः आत्मा प्रकाश से भी सूक्ष्म है जिसका अनुभव और दर्शन केवल ध्यान के माध्यम से होता है . 

जब तक मन उस आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर लेता उसे मोह से मुक्ति नहीं मिल सकती . मोह मनुष्य को भय भीत करता है क्योंकि जो पाया है उसके खोने का भय उसे सताता रहता है जबकि आत्म दर्शन से दिव्य प्रेम की अनुभूति होती है जो व्यक्ति को निर्भय करती है क्योंकि उसे सब के अस्तित्व में उसी दिव्य ज्योति का दर्शन होने लगता है.

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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