Tuesday, February 28, 2017

 प्रेट सिद्धी

हमारे चारों ओर फैला ब्रह्मांड हवा और धुएं का केन्द्र मात्र नहीं है, अपितु इसमें निहित है ऐसे रहस्य और ऐसा ज्ञान जिसका अगर एक अंश मात्र भी यदि किसी की भी समझ में आ जाये तो उसकी जीवन धारा ही बदल जाती है!!!!

 क्योंकि ब्रह्मांडीय ज्ञान कोई कोरी कपोल कल्पना ना हो के इस समस्त चराचर विश्व की उत्पत्ति और विध्वंस का करोडों बार साक्षी बन चुका है और जब तक सृजन और संहार का क्रम चलता रहेगा इस ब्रह्मांडीय ज्ञान में इजाफा होता जायेगा.......पर यह ज्ञान हम किताबों से या बड़े बड़े ग्रंथो को पढ़ कर प्राप्त नहीं कर सकते...किन्तु यह ग्रंथ उस ज्ञान को कुछ हद तक समझने में हमारी संभव सहायता जरूर करते हैं.

परमसत्ता अपना ज्ञान देने में कभी कोई कोताहि नहीं करती पर उसके लिए मात्र एक ही शर्त है की आप में पात्रता होनी चाहिए. ब्रह्मांडीय ज्ञान को हम दो तरह से अर्जित कर सकते हैं



१) आगम स्तर

 २) निगम स्तर

 !!!!

 आगम ६४ तरह के तांत्रिक ज्ञान पर आधारित है और निगम वेदों पर निर्भर करता है.....खैर निगम ज्ञान या वेद शास्त्र यहाँ हमारा विषय नहीं है तो हम बात करते हैं तंत्र ज्ञान की जिसे गुहा ज्ञान या रहस्यमय ज्ञान भी कहते हैं.

 क्योंकि तंत्र कोई चिंतन-मनन करने वाली विचार प्रणाली नहीं है या यूँ कहें की तंत्र कोई दर्शन शास्त्र नहीं है यह शत प्रतिशत अनुभूतियों पर आधारित है.

अब जब अनुभूतियों की बात करते हैं तो एक साधक साधना करते समय तीन तरह की अनुभूतियों का अनुभव करता है –

१) साधना के प्रथम स्तर पर उसे अपनी इन्द्रियों का बोध होता है जिसे हम ऐसे समझते हैं की हाथ पैर दुःख रहे हैं.....आसन पर बैठा नहीं जाता.

२) दूसरे स्तर पर हमें उस दूसरे की अनुभूति होती है जिसे हम सिद्ध कर रहे होते हैं या जिसका आवाहन किया जा रहा होता है.

३) अंतिम अनुभूति होती है उस अलौकिक, अखंड परम सत्ता की जिसे हम समाधि की अवस्था कहते हैं.

पर यहाँ हम बात कर रहे हैं प्रेत सिद्धि की तो वो दूसरे स्तर की अनुभूति है. यदि आप सब को याद होगा तो पिछले लेख में हमने पढ़ा था की प्रेत जिस लोक में रहते हैं उसे वासना लोक कहते हैं और वासना जितनी गहन होगी उतना ही अधिक समय लगेगा आत्मा को प्रेत योनि से मुक्त हो के सूक्ष्म योनि प्राप्त करने में और साथ ही साथ हमने यह भी समझा था की इन प्रेतों और पिशाचों का भू लोक पर आने वाला मार्ग महावासना पथ कहलाता है किसका महादिव्योध मार्ग से एकीकरण पृथ्वी के केन्द्र में होता है.......

पर हमने तब यह तथ्य नहीं समझा था की पृथ्वी के केन्द्र में ही यह दोनों मार्ग क्यों मिलते हैं कहीं और क्यों नहीं तो इसका एक सीधा सरल उत्तर यह है की भू के गर्भ में अर्थात उसके केन्द्र में ऊर्जा का घ्न्तत्व सबसे अधिक मात्रा में होता है या यूँ कहें की केन्द्र में कहीं ओर की तुलना में गुरुत्वाकर्षण की क्रिया सबसे ज्यादा होती है और इसी गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के कारण ही प्रेत योनियाँ भू लोक की तरफ खींची चली आती हैं.

इस प्रयोग के विधान को समझने से पहले या ये प्रयोग करने से पहले आपको दो अति महत्वपूर्ण बातों को अपने ज़हन में रखना होगा –

१) यह साधना प्रेत प्रत्यक्षीकरण साधना है तो हम ये भी जानते हैं की यदि आपने उसे प्रत्यक्ष करके सिद्ध कर लिया तो वो आपके द्वारा दिए गए हर निर्देश का पालन करेगा किन्तु उससे यह सब करवाने के लिए आपको अपने संकल्प के प्रति दृढ़ता रखनी पड़ेगी अर्थात आपको पूरे मन, वचन और क्रम से ये साधना करनी पड़ेगी, क्योंकि जहाँ आप कमजोर पड़े आपकी साधना उसी एक क्षण विशेष पर खत्म हो जायेगी......

और हाँ एक बात और अब चूंकी ये योनियाँ मंत्राकर्षण की वजह से आपकी तरफ आकर्षित होती है तो यथा संभव कोशिश करें की यदि आपने आसन सिद्ध किया हुआ है तो आप उसी आसन पर बैठ कर इस प्रयोग को करें... क्योंकि वो आसन भू के गुरुत्व बल से आपका सम्पर्क तोड़ देता है.

२) हम में से बहुत कम लोग यह बात जानते है की दिन के २४ घंटों में एक क्षण ऐसा भी होता है जब हमारी देह मृत्यु का आभास करती है अर्थात यह क्षण ऐसा होता है जब हमारी सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती है और ह्रदय की गति रुक जाती है....

रोज मरा की दिनचर्या में यह पल कौन सा होता है और कब आता है यह तो बहुत आगे का विधान है पर इस प्रयोग को करते समय यह पल तब आएगा जब आप साधना सम्पूर्णता की कगार पर होंगे तो आपको उस समय खुद के डर पर नियंत्रण करते हुए उस मूक संकेत को समझना है......वो जिसका कोई अस्तित्व नहीं है उसके अस्तित्व को पहचानते हुए उसकी मूल पद ध्वनि को सुनना है.

विधान –

मूलतः ये साधना मिश्रडामर तंत्र से सम्बंधित है.
अमावस्या की मध्य रात्रि का प्रयोग इसमें होता है,अर्थात रात्रि के ११.३० से ३ बजे के मध्य इस साधना को किया जाना उचित होगा.

वस्त्र व आसन का रंग काला होगा.

दिशा दक्षिण होगी.

वीरासन का प्रयोग कही ज्यादा सफलतादायक है.

नैवेद्य में काले तिलों को भूनकर शहद में मिला कर लड्डू जैसा बना लें,साथ ही उडद के पकौड़े या बड़े की भी व्यवस्था रखें और एक पत्तल के दोनें या मिटटी के दोने में रख दें..

दीपक सरसों के तेल का होगा.

बाजोट पर काला ही वस्त्र बिछेगा,और उस पर मिटटी का पात्र स्थापित करना है जिसमें यन्त्र का निर्माण होगा.

रात्रि में स्नान कर साधना कक्ष में आसन पर बैठ जाएँ.

 गुरु पूजन,गणपति पूजन,और भैरव पूजन संपन्न कर लें. रक्षा विधान हेतु कवच का ११ पाठ अनिवार्य रूप से कर लें.

अब उपरोक्त यन्त्र का निर्माण अनामिका ऊँगली या लोहे की कील से उस मिटटी के पात्र में कर दें और उसके चारों और जल का एक घेरा मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए कर बना दें,अर्थात छिड़क दें.

और उस यन्त्र के मध्य में मिटटी या लोहे का तेल भरा दीपक स्थापित कर प्रज्वलित कर दें.और भोग का पात्र जो दोना इत्यादि हो सकता है या मिटटी का पात्र हो सकता है.उस प्लेट के सामने रख दें.

अब काले हकीक या रुद्राक्ष माला से ५ माला मंत्र जप निम्न मंत्र की संपन्न करें.मंत्र जप में लगभग ३ घंटे लग सकते हैं.

मंत्र जप के मध्य कमरे में सरसराहट हो सकती है,उबकाई भरा वातावरण हो जाता है,एक उदासी सी चा सकती है.

कई बार तीव्र पेट दर्द या सर दर्द हो जाता है और तीव्र दीर्घ या लघु शंका का अहसास होता है.

दरवाजे या खिडकी पर तीव्र पत्रों के गिरने का स्वर सुनाई दे सकता है,इनटू विचलित ना हों.किन्तु साधना में बैठने के बाद जप पूर्ण करके ही उठें.

क्यूंकि एक बार उठ जाने पर ये साधना सदैव सदैव के लिए खंडित मानी जाती है और भविष्य में भी ये मंत्र दुबारा सिद्ध नहीं होगा.

जप के मध्य में ही धुएं की आकृति आपके आस पास दिखने लगती है.

जो जप पूर्ण होते ही साक्षात् हो जाती है,और तब उसे वो भोग का पात्र देकर उससे वचन लें लें की वो आपके श्रेष्ट कार्यों में आपका सहयोग ३ सालों तक करेगा,और तब वो अपना कडा या वस्त्र का टुकड़ा आपको देकर अदृश्य हो जाता है,और जब भी भाविओश्य में आपको उसे बुलाना हो तो आप मूल मंत्र का उच्चारण ७ बार उस वस्त्र या कड़े को स्पर्श कर एकांत में करें,वो आपका कार्य पूर्ण कर देगा.

 ध्यान रखिये अहितकर कार्यों में इसका प्रयोग आप पर विपत्ति ला देगा.जप के बाद पुनः गुरुपूजन,इत्यादि संपन्न कर उठ जाएँ और दुसरे दिन अपने वस्त्र व आसन छोड़कर,वो दीपक,पात्र और बाजोट के वस्त्र को विसर्जित कर दें.

 कमरे को पुनः स्वच्छ जल से धो दें और कवच का उच्चारण करते हुए गंगाजल छिड़क कर गूगल धुप दिखा दें.

मंत्र:-

इरिया रे चिरिया,काला प्रेत रे चिरिया.पितर की शक्ति,काली को गण,कारज करे सरल,धुंआ सो बनकर आ,हवा के संग संग आ,साधन को साकार कर,दिखा अपना रूप,शत्रु डरें कापें थर थर,कारज मोरो कर रे काली को गण,जो कारज ना करें शत्रु ना कांपे तो दुहाई माता कालका की.काली की आन.

मुझे आशा है की आप इस अहानिकर प्रयोग के द्वारा लाभ और हितकर कारों को सफलता देंगे. भय को त्याग कर तीव्रता को आश्रय दें

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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अष्ट यक्षिणी साधना

जीवन में रस आवश्यक है,जीवन में सौन्दर्य आवश्यक है,जीवन में आहलाद आवश्यक है,जीवन में सुरक्षा आवश्यक है,ऐसे श्रेष्ठ जीवन के लिए संपन्न करें———-

बहुत से लोग यक्षिणी का नाम सुनते ही डर जाते हैं कि ये बहुत भयानक होती हैं, किसी चुडैल कि तरह, किसी प्रेतानी कि तरह, मगर ये सब मन के वहम हैं। यक्षिणी साधक के समक्ष एक बहुत ही सौम्य और सुन्दर स्त्री के रूप में प्रस्तुत होती है।

देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर स्वयं भी यक्ष जाती के ही हैं। यक्षिणी साधना का साधना के क्षेत्र में एक निश्चित अर्थ है। यक्षिणी प्रेमिका मात्र ही होती है, भोग्या नहीं, और यूं भी कोई स्त्री भोग कि भावभूमि तो हो ही नहीं सकती, वह तो सही अर्थों में सौन्दर्य बोध, प्रेम को जाग्रत करने कि भावभूमि होती है।

यद्यपि मन का प्रस्फुटन भी दैहिक सौन्दर्य से होता है किन्तु आगे चलकर वह भी भावनात्मक रूप में परिवर्तित होता है या हो जाना चाहिए और भावना का सबसे श्रेष्ठ प्रस्फुटन तो स्त्री के रूप में सहगामिनी बना कर एक लौकिक स्त्री के सन्दर्भ में सत्य है तो क्यों नहीं यक्षिणी के संदर्भ में सत्य होगी? वह तो प्रायः कई अर्थों में एक सामान्य स्त्री से श्रेष्ठ स्त्री होती है।

तंत्र विज्ञान के रहस्य को यदि साधक पूर्ण रूप से आत्मसात कर लेता है, तो फिर उसके सामाजिक या भौतिक समस्या या बाधा जैसी कोई वस्तु स्थिर नहीं रह पाती। तंत्र विज्ञान का आधार ही है, कि पूर्ण रूप से अपने साधक के जीवन से सम्बन्धित बाधाओं को समाप्त कर एकाग्रता पूर्वक उसे तंत्र के क्षेत्र में बढ़ने के लिए अग्रसर करे।

साधक सरलतापूर्वक तंत्र कि व्याख्या को समझ सके, इस हेतु तंत्र में अनेक ग्रंथ प्राप्त होते हैं, जिनमे अत्यन्त गुह्य और दुर्लभ साधानाएं वर्णित है। साधक यदि गुरु कृपा प्राप्त कर किसी एक तंत्र का भी पूर्ण रूप से अध्ययन कर लेता है, तो उसके लिए पहाड़ जैसी समस्या से भी टकराना अत्यन्त लघु क्रिया जैसा प्रतीत होने लगता है।

साधक में यदि गुरु के प्रति विश्वास न हो, यदि उसमे जोश न हो, उत्साह न हो, तो फिर वह साधनाओं में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। साधक तो समस्त सांसारिक क्रियायें करता हुआ भी निर्लिप्त भाव से अपने इष्ट चिन्तन में प्रवृत्त रहता है।

ऐसे ही साधकों के लिए ‘उड़ामरेश्वर तंत्र’ मे एक अत्यन्त उच्चकोटि कि साधना वर्णित है, जिसे संपन्न करके वह अपनी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकता है तथा अपने जीवन में पूर्ण भौतिक सुख-सम्पदा का पूर्ण आनन्द प्राप्त कर सकता है।

‘अष्ट यक्षिणी साधना’ के नाम से वर्णित यह साधना प्रमुख रूप से यक्ष की श्रेष्ठ रमणियों, जो साधक के जीवन में सम्पूर्णता का उदबोध कराती हैं, की ये है।

ये प्रमुख यक्षिणियां है -

1. सुर सुन्दरी यक्षिणी २. मनोहारिणी यक्षिणी 3. कनकावती यक्षिणी 4. कामेश्वरी यक्षिणी

5. रतिप्रिया यक्षिणी 6. पद्मिनी यक्षिणी 6. नटी यक्षिणी 8. अनुरागिणी यक्षिणी

प्रत्येक यक्षिणी साधक को अलग-अलग प्रकार से सहयोगिनी होती है, अतः साधक को चाहिए कि वह आठों यक्षिणियों को ही सिद्ध कर लें।

सुर सुन्दरी यक्षिणी

यह सुडौल देहयष्टि, आकर्षक चेहरा, दिव्य आभा लिये हुए, नाजुकता से भरी हुई है। देव योनी के समान सुन्दर होने से कारण इसे सुर सुन्दरी यक्षिणी कहा गया है। सुर सुन्दरी कि विशेषता है, कि साधक उसे जिस रूप में पाना चाहता हैं, वह प्राप्त होता ही है – चाहे वह माँ का स्वरूप हो, चाहे वह बहन का या पत्नी का, या प्रेमिका का। यह यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक को ऐश्वर्य, धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है।

मनोहारिणी यक्षिणी

अण्डाकार चेहरा, हरिण के समान नेत्र, गौर वर्णीय, चंदन कि सुगंध से आपूरित मनोहारिणी यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहन बना देती है, कि वह कोई भी, चाहे वह पुरूष हो या स्त्री, उसके सम्मोहन पाश में बंध ही जाता है। वह साधक को धन आदि प्रदान कर उसे संतुष्ट कराती है।

कनकावती यक्षिणी

रक्त वस्त्र धारण कि हुई, मुग्ध करने वाली और अनिन्द्य सौन्दर्य कि स्वामिनी, षोडश
वर्षीया, बाला स्वरूपा कनकावती यक्षिणी है। कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने के पश्चात साधक में तेजस्विता तथा प्रखरता आ जाती है, फिर वह विरोधी को भी मोहित करने कि क्षमता प्राप्त कर लेता है। यह साधक की प्रत्येक मनोकामना को पूर्ण करने मे सहायक होती है।

कामेश्वरी यक्षिणी

सदैव चंचल रहने वाली, उद्दाम यौवन युक्त, जिससे मादकता छलकती हुई बिम्बित होती है। साधक का हर क्षण मनोरंजन करती है कामेश्वरी यक्षिणी। यह साधक को पौरुष प्रदान करती है तथा पत्नी सुख कि कामना करने पर पूर्ण पत्निवत रूप में साधक कि कामना करती है। साधक को जब भी द्रव्य कि आवश्यकता होती है, वह तत्क्षण उपलब्ध कराने में सहायक होती है।

रति प्रिया यक्षिणी

स्वर्ण के समान देह से युक्त, सभी मंगल आभूषणों से सुसज्जित, प्रफुल्लता प्रदान करने वाली है रति प्रिया यक्षिणी। रति प्रिया यक्षिणी साधक को हर क्षण प्रफुल्लित रखती है तथा उसे दृढ़ता भी प्रदान करती है। साधक और साधिका यदि संयमित होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य कि उपलब्धि होती है।

पदमिनी यक्षिणी

कमल के समान कोमल, श्यामवर्णा, उन्नत स्तन, अधरों पर सदैव मुस्कान खेलती रहती है, तथा इसके नेत्र अत्यधिक सुन्दर है। पद्मिनी यक्षिणी साधना साधक को अपना सान्निध्य नित्य प्रदान करती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यह अपने साधक में आत्मविश्वास व स्थिरता प्रदान कराती है तथा सदैव उसे मानसिक बल प्रदान करती हुई उन्नति कि और अग्रसर करती है।

नटी यक्षिणी

नटी यक्षिणी को ‘विश्वामित्र’ ने भी सिद्ध किया था। यह अपने साधक कि पूर्ण रूप से सुरक्षा करती है तथा किसी भी प्रकार कि विपरीत परिस्थितियों में साधक को सरलता पूर्वक निष्कलंक बचाती है।

अनुरागिणी यक्षिणी

अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है। साधक पर प्रसन्न होने पर उसे नित्य धन, मान, यश आदि प्रदान करती है तथा साधक की इच्छा होने पर उसके साथ उल्लास करती है।

अष्ट यक्षिणी साधना को संपन्न करने वाले साधक को यह साधना अत्यन्त संयमित होकर करनी चाहिए। समूर्ण साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है। साधक यह साधना करने से पूर्व यदि सम्भव हो तो ‘अष्ट यक्षिणी दीक्षा’ भी लें। साधना काल में मांस, मदिरा का सेवन न करें तथा मानसिक रूप से निरंतर गुरु मंत्र का जप करते रहे। यह साधना रात्रिकाल में ही संपन्न करें। साधनात्मक अनुभवों की चर्चा किसी से भी नहीं करें, न ही किसी अन्य को साधना विषय में बतायें। निश्चय ही यह साधना साधक के जीवन में भौतिक पक्ष को पूर्ण करने मे अत्यन्त सहायक होगी, क्योंकि अष्ट यक्षिणी सिद्ध साधक को जीवन में कभी भी निराशा या हार का सामना नहीं करना पड़ता है। वह अपने क्षेत्र में अद्वितीयता प्राप्त करता ही है।

साधना विधान

इस साधना में आवश्यक सामग्री है –

८ अष्टाक्ष गुटिकाएं तथा अष्ट यक्षिणी सिद्ध यंत्र एवं ‘यक्षिणी माला’। साधक यह साधना किसी भी शुक्रवार को प्रारम्भ कर सकता है। यह तीन दिन की साधना है। लकड़ी के बजोट पर सफेद वस्त्र बिछायें तथा उस पर कुंकुम से निम्न यंत्र बनाएं।

फिर उपरोक्त प्रकार से रेखांकित यंत्र में जहां ‘ह्रीं’ बीज अंकित है वहां एक-एक अष्टाक्ष गुटिका स्थापित करें। फिर अष्ट यक्षिणी का ध्यान कर प्रत्येक गुटिका का पूजन कुंकूम, पुष्प तथा अक्षत से करें। धुप तथा दीप लगाएं। फिर यक्षिणी से निम्न मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमानुसार दिए गए हुए आठों यक्षिणियों के मंत्रों की एक-एक माला जप करें। प्रत्येक यक्षिणी मंत्र की एक माला जप करने से पूर्व तथा बाद में मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें। उदाहरणार्थ पहले मूल मंत्र की एक माला जप करें, फिर सुर-सुन्दरी यक्षिणी मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमशः प्रत्येक यक्षिणी से सम्बन्धित मंत्र का जप करना है। ऐसा तीन दिन तक नित्य करें।

मूल अष्ट यक्षिणी मंत्र

॥ ॐ ऐं श्रीं अष्ट यक्षिणी सिद्धिं सिद्धिं देहि नमः ॥

सुर सुन्दरी मंत्र

॥ ॐ ऐं ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा ॥

मनोहारिणी मंत्र

॥ ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहारी स्वाहा ॥

कनकावती मंत्र

॥ ॐ ह्रीं हूं रक्ष कर्मणि आगच्छ कनकावती स्वाहा ॥

कामेश्वरी मंत्र

॥ ॐ क्रीं कामेश्वरी वश्य प्रियाय क्रीं ॐ ॥

रति प्रिया मंत्र

॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ रति प्रिया स्वाहा ॥

पद्मिनी मंत्र

॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ पद्मिनी स्वाहा ॥

नटी मंत्र

॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ नटी स्वाहा ॥

अनुरागिणी मंत्र

॥ ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥

मंत्र जप समाप्ति पर साधक साधना कक्ष में ही सोयें। अगले दिन पुनः इसी प्रकार से साधना संपन्न करें, तीसरे दिन साधना साधना सामग्री को जिस वस्त्र पर यंत्र बनाया है, उसी में बांध कर नदी में प्रवाहित कर दें।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Monday, February 27, 2017

भैरवी साधना:-

भैरवी साधना एक उचकोटी का साधना है।सस्त्र मे 64 भैरवी का उलेख मिलता है।हर भैरवी आलग आलग सक्ति का आधिकारी है।साधक आगर भैरवी का साधना करता है तो जिवन मेँ वह हर तारफ सफलता का डंका वाजाता है।मेरा मानोँ तो भैरवी साधना से बाढकार कोई और साधना नही है।

 दुनिया मेँ जिधार भी देखोँ भैरव के साथ एक भैरवी होति है।आपनी माता पिता को देखो।भैरव का जिवन तब तक पुर्ण नही है जब तक एक भैरवी उसकि साथ ना हो। एक बार मेँ चाय के दुकान मेँ मेरे मित्र के साथ चाय पि राहा था।बात करते करते मिरा मित्र मुझकोँ बोला तंत्रकिक आज हम फलना के घर चालते है, मेने बोल कियु बो बोला यार चाल तो हम दोनो मेरे दोस्त का दोस्त के घर कुछ समय बाद चाले गाये।

कुछ दिन बाद मे फिर से बह चाय के दिकान मे चाय पिने गया तो एक आंजान लडका मिला बह मुझ से बात करते करते बोला किया आपके पास दस मिनिँट है कुछ बात करना था।मेने बोला है ,किया बात है बोलो ,बो बोला मांदिर चालते है बाहा बात करते है .मेने हा बोला चालो।मिरा और उसका चाय का पैसा वो लडका चाय बाला को चुकुता किया।

मांदिर मेँ एक पेड के नेचे दोनो बेठ गाये और मेने बोला आब बोलो किया बात है।बह बोला मे उसदिन आप दोनो का बाते सुन राहा था किया आप जादु जानते है।मेने बोला लागभाग थडा बहुत।उसके बाद उसने आपना दु:ख भारे दास्तान सुनाया और बोला किया आप मुझको ईससे मुक्ति दे साकते है, मेने बोला ना फिर भी तुम चाह तो एक तारिका मेरे पास है, किया तुम कर साकते हो ।वो बोला कुछ भी करुगा आप बाताए किया करना है।

मेने सिद्ध भैरबी का मंत्र दिया और बोला केसे करना है। कुछ दिन के बाद बो लडका को नौकरी मिल गया ईसके साथ छोटि वाहेन और छोटा भाई को भी नौकरी बैँक मेँ मिला।आज उनके पास एक आलिशान घर है कार दोलोत सब है। जाब वो लडका मुझसे मिलता है बो रो पाडता है और बोलता है आप मेरे जिंदेगी बादल दिया, मे बोलता हु ए तुमहरा मेहनत का नातिजा है।आज वो तिनो बिवाह कर चुके हे और तोनो के दो दो बाच्चे भी है। सिद्ध भैरवी साधना ए आसान साधना है।

कोई भी आराम से कर साकता है।

विधि-

सिद्ध भैरवी यंत्र।सिद्ध भैरवी मुद्रिका।सिद्ध भैरवी माला।गाले मे रुद्राक्ष माला धारण करना है।शुक्रवार से साधना आरंभ करना है।साफेद कपडा परिधान कर के यंत्र को धुप, दिप, फुल,संदुर और अक्षत से पुजा करना है।

 सफेद आसान मे वैठ कर दक्षिण दिशा मे मुख कर मंत्र को 21 माला जाप करे।

 मंत्र-

ॐ हुं फट वज्र सिद्ध भैरवी आलकिक आलकिक सक्ति सक्ति सिद्धि सिद्धि प्रविश प्रविश हु फट।

यह मंत्र कुछ ही समय मे आसार दिखाना सुरु कर देता है।माथे मे दर्द होता है।यह ईसलिय होता है, आज्ञाचक्र जागुत होना प्रथम दिन से आरंभ हो जाता है।

 आप पायगे कुछ दिन मे आपका हर काम ठिक होता जाएगा। जो पाने का कामना हो वह सपना शाच होने लागगे। माला को कामना पुरी होने पर नदि पर विर्शजित कर दे या फिर देवि भैरवी के दर्शन देने तक रख ले।

जाप प्रतिदिन करते राहे।य मेरा रचना मंत्र है ईस मंत्र का गुरु मे हु।ए सिद्ध मंत्र है।

दुसरा विधि-

विना माला के सिर्फ एक घंटा जाप करते राहे और ईसका दिव्यता देखे।

राज गुरु जी

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Friday, February 24, 2017

हाजरात साधना

यह विधान सनातन धर्म पर आधारित है। जैसे आज तक आपने सुना होगा सुलेमानी हाजरात जो इस्लाम पर अाधारित है। पर यह साधना हिन्दू देवी/देवता से सम्बंधित है। इस मे मेहनत बहोत है,परन्तु फल प्राप्ति अवश्य  है।

 यह विधान चन्द्र/सूर्य ग्रहण पर करने से पूर्ण सफलता मिलती है। हाजरात एक क्रिया है, जिस के माध्यम से हम भूत भविष्य की  घटना देख सकते है। और अदृश्य शक्तियोको भी देख सकते है। बहोत से ऐसे कार्य होते है,जिनमे हमे भूतकाल और भविषयकाल मे होनेवाली घटना का ज्ञान होना आवश्यक होता है। यह साधना ग्रहण काल  मे सम्पन करना  है।

आज कल लोगो ने हाजरात के नाम पर लूटना शुरू कर दिया है, और जिनको सिद्ध हुवा है,उनकी तो रोजी रोटी बन गया है।
यह विधान यह विषय उत्तम है, इसे अन्य भाषा मे " कजली लगाना " कहते है, कुछ लोग " अंजन " भी बोलते है।

पर यह विधान हाजरात नाम से प्रचलित है,इस क्रिया से आप स्वयम अपने आँखों मे या अंगूठे पर काजल लगाकर देख सकते है और देवता का आवाहन भी कर सकते है,ताकि आपकी परेशानिया दूर हो। यह मेरे तरफ  से साधना गिफ्ट है।

 नवरात्रि के शुभ अवसर पर। इसमे सबसे खास है हाजरात सुमेरु मंत्र जिसके माध्यम से आप हाजरात साधना मे सफल हो जाये। परन्तु आप की मेहनत ,विश्वास और धैर्य जरुरी है,वैसे तो यह प्रत्येक साधनामे जरुरी है इसमे दूसरा मंत्र हाजरात  सिद्धि का होता है।

यह एक  दुर्लभ साधना है, जिसे प्राप्त करना ही उत्तम माना जाता है। इस साधना का पूर्ण विधान नवरात्री  बाद इसी लेख मे मिलेंगा  अब नवरात्री चल रही है,और मै नहीं चाहता हु अभी आपके  साधना मे व्यत्यय आये।

बस थोडासा इन्तेजार करे, और यह महत्वपूर्ण साधना  सभी करे। ऐसा साधना पहिले बार प्रामाणिक विधान के साथ दिया जा रहा है। यह साधना सभी के लिए जरुरी है, और आप प्रत्यक्ष लाभ उठाये यही मैं कामना करता हु।

सब्र का फल मीठा होता है।

हाजरात मेरु मंत्र :-

॥ ओम ह्रीं श्रीं क्लीं हाजरात सिद्धि कुरू कुरू स्वाहा ॥


साधना विधि :-

ग्रहण मे १० माला जप और १०८ आहुति घी का देने से मंत्र सिद्ध होता है

हाजरात भराने का मंत्र :-

॥ ॐ नम: उमा महेश गणेश,गुरु ब्रम्हा ,विष्णु फणीश,विष्णु-रूप हिए धारु धारु धारु धारु शिवजी को ध्यान,हाजरात कुरु नाम: हाजरात कुरु नाम: हाजरात कुरु नम:॥

साधना विधि:-

ग्रहण काल मे १० माला जाप से सिद्धि मिलती है। काजल बनाने के लीये कोई समय चुने जैसे अमावश्या

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Thursday, February 23, 2017

इतर योनि अवलोकन साधना

मित्रों !!!! इस अनन्त ब्रह्मांड में मनुष्य अकेला नहीं है जिसका निर्माण भगवान द्वारा किया गया है । पेड़-पौधे, पशु- पक्षियों के इलावा कोई और भी है जो हमारी ही दुनिया में रहतीं हैं पर हमें दिखतीं नहीं । उनका हमें ज्ञान तो है पर प्रमाण नहीं । परंतु!! यदा-कदा वो किसी के सामने आ भी जाएँ , तो कौन यकीन करता है भाई!! क्योंकि दुनिया कहती है आँखों से देखी बात ही सत्य है ।

 लेकिन आज की प्रस्तुत साधना आपको पूरा यकीन दिलाने के लिए है की हमारे इलावा और भी कोई है जो अगर हमारे वश में हो जाए तो वो अपनी शक्तिओं द्वारा पूरा जहान हमारे कदमों में लाकर रख सकती हैं । वो हैं इतर योनिआँ । मनुष्य को भगवान ने उसके कर्मों के अनुसार मृत्यु उपरांत कई योनिओं मे विभक्त किया है

जैसे : -

भूत , प्रेत , पिशाच , राक्षस , ब्रह्मराक्षस , देव , यक्ष , गन्धर्व , किन्नर , पितृ , अप्सरा , परि , जिन्नात आदि ॥
साधकों के लिए इन्हें सिद्ध करना किसी भयंकर चुनौती से कम नहीं होता क्योंकि इस संसार में कोई किसी का गुलाम बनकर नहीं रहना चाहता । हर कोई अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहता है तो ये योनिआँ कैसे यूं ही आपके वश में हो जाएँ ।

ये योनिआँ खुद को आपके वश से बचाने के लिये किसी भी हद तक जा सकतीं हैं । परंतु!! एक बार साधक इन्हें सिद्ध करले तो ये आजीवन साधक को वो सब कुछ देतीं रहती हैं जो साधक चाहता है । आपका वफ़ादार कुत्ता आपको एक बार काट सकता है पर ये योनिआँ अपनी शक्ति का प्रयोग आपके खिलाफ कभी नहीं करतीं । ये अपनी जान पर खेलकर भी आपके उपर आई मुसीबत खुद पर ले लेती हैं ।

परंतु कई मेरे भाई साधक एसे भी हैं जो लाख कोशिश करते हैं किसी इतर योनि को वश में करने की और अन्य साधनाएँ भी करते हैं और बाद में थक हार कर बैठ जाते हैं जब उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती ।

 पर आज की यह साधना इतर योनिओं के दर्शन करने के लिए है जिसे अगर कोई नास्तिक भी करे तो वो भी इतर योनिओं के दर्शन कर अपना विश्वास इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की इन गुप्त शक्तिओं पे दृढ़ कर सकता है ।

 आप खुद इस साधना को करके देखिए और अवलोकन कीजिए उन शक्तिओं का जिनका अस्तित्व अति दिव्य होने के साथ - साथ गोपनीय भी है । पूरी कर लीजिए अपने मन की कामना विभिन्न प्रकार की इतर योनिओं के दर्शन करके क्योंकि तंत्र में शंका का कोई स्थान नहीं है ।

" तंत्र निर्मल है , स्वच्छ है और सबसे महत्वपूर्ण बात कि तंत्र प्रत्यक्ष है । जो भी इसका अनुसरण करेगा वो निश्चित ही समस्त भौतिक सुखों को भोगते हुए अंततः मुझमें विलीन हो जाएगा "॥ एसा भगवान शिव ने कहा है ।

इन योनिओं से आपको भय खाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो खुद भगवान शिव के सान्निधय में रहती हों और बेचैन होकर और किसी के बस में होकर अपनी मुक्ति के लिए तत्पर हों उनसे भय कैसा!!!!!

॥ साधना विधि ॥

दिन - अमावस्या

साधना अवधि - 16 दिन
दिशा - उत्तर
वस्त्र एवं आसन - सफेद
माला - रूद्राक्ष की
साधना समय - रात 10 बजे

साधक को चाहिये कि वो वट वृक्ष की थोड़ी सी जटा जो लमक रही होती है तोड़कर ले आए और उसे अपने साधना कक्ष में बाजोट पर रख दे । याद रखिए उसे धोना बिल्कुल नहीं है । इसके बाद स्नान करे और अपने साधना कक्ष में उत्तर की ओर मुख करके बैठे ।

गुरु पूजन एवं गणेश पूजन सम्पन्न करके उस जटा को अपने बाएँ हाथ में और माला दायें हाथ में पकड़ कर निम्न मंत्र की 11 माला संपन्न करे । इसके बाद किसी से बात किए बिना उस जटा को अपने तकिए के नीचे रखिए और सो जाइये । इससे आपको सपने में एसी - एसी इतर योनिओं के दर्शन होंगे जिनके बारे में आपने किसी किताब में ही पढ़ा या किसी से सिर्फ सुना होगा ॥

॥ मन्त्र ॥

ॐ हूं हूं फट

( OM HOOM HOOM PHAT )

साधक को अगले दिन उस जटा को जल में प्रवाहित कर देना चाहिए और माला को पुनः प्राण प्रतिष्ठित कर देना चाहिए ताकि भविष्य में अन्य साधनाओं में इसका उपयोग किया जा सके ।

॥ मेरा अनुभव ॥

जब मैंने ये साधना की थी तब एसी - एसी इतर योनिआँ मेरे सामने आ रहीं थी जिनमें से कई के मुँह में से आग निकल रही थी और कई एक छोटे Pipe के समान मुख में लगातार खून और मांस डालतीं जा रहीं थी । इसके पश्चात मुझे अप्सरा , परि और यक्ष एवं अन्य योनिओं के भी दर्शन हुए जो उग्र के साथ - साथ सौम्य भी थीं ।
राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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यदि आप मुझसे कुछ सीखना चाहते है तो परिश्रम तो करना ही होगा। किसी को दो दिन में तारा चाहिए,तो किसी को ९ दिन में छिन्नमस्ता,किसी को ५ दिन में मातंगी सिद्ध करना है तो,किसी को ११ दिन में भुवनेश्वरी। कितनी बचकानी बात है.

हर साधना कि एक विशेष प्रक्रिया होती है जिससे होकर प्रत्येक साधक को गुजरना ही पड़ता है. और अगर बात महाविद्या कि हो तो ये कार्य और भी कठिन हो जाता है.

इसमें तो और भी अधिक परिश्रम करना होता है. कई कई मंत्रो को क्रमशः सिद्ध करना होता है,कई कई अनुष्ठान करने होते है.जब हम आपको ये प्रक्रिया बताते है तो आपको लगता है कि हम टाल रहे है.इस बात पर में कोई सफाई नहीं दूंगा।यदि महाविद्या सिद्धि कि और बढ़ना है तो परिश्रम करना सीखे।

अन्यथा जो दो या तीन दिन में सिद्ध करवा दे आलसी लोग उनके पास जा सकते है.कम से कम मेरा कार्य भार कम होगा। और मुझे भी पता चल जायेगा कि तारा २ दिन में और काली ११ दिन में कैसे सिद्ध होती है.मेरा उद्देश्य किसी के ह्रदय को पीड़ित करना नहीं है.अगर किसी को दुःख हुआ हो तो हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थी हु.

परन्तु कभी कभी व्यर्थ का रोग मिटाने के लिए कड़वे वचनो कि औषधि आवश्यक हो जाती है.

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Wednesday, February 22, 2017

बगुलामुखी कवच यन्त्र

आज के इस भागदौड़ के युग में श्री बगलामुखी यंत्र
की साधना अन्य किसी भी साधना से अधिक
उपयोगी है। यह एक परीक्षित और अनुभवसिद्ध
तथ्य है। इसे गले में पहनने के साथ-साथ पूजा घर में
भी रख सकते हैं।

इस यंत्र की पूजा पीले दाने, पीले
वस्त्र, पीले आसन पर बैठकर निम्न मंत्र को
प्रतिदिन जप करते हुए करनी चाहिए। अपनी
सफलता के लिए कोई भी व्यक्ति इस यंत्र का
उपयोग कर सकता है।

इसका वास्तविक रूप में
प्रयोग किया गया है। इसे अच्छी तरह से अनेक
लोगों पर उपयोग करके देखा गया है।

शास्त्रानुसार और वरिष्ठ सड़कों के अनुभव के
अनुसार जिस घर में यह महायंत्र स्थापित होता
है, उस घर पर कभी भी शत्रु या किसी भी
प्रकार की विपत्ति हावी नहीं हो सकती।

 न
उस घर के किसी सदस्य पर आक्रमण हो सकता है, न
ही उस परिवार में किसी की अकाल मृत्यु हो
सकती है। इसीलिए इसे महायंत्र की संज्ञा दी
गई है। इससे दृश्य/अदृश्य बाधाएं समाप्त होती
हैं। यह यंत्र अपनी पूर्ण प्रखरता से प्रभाव
दिखाता है।

 उसके शारीरिक और मानसिक
रोगों तथा ऋण, दरिद्रता आदि से उसे मुक्ति
मिल जाती है। वहीं उसकी पत्नी और पुत्र सही
मार्ग पर आकर उसकी सहायता करते हैं। उसके
विश्वासघाती मित्र और व्यापार में
साझीदार उसके अनुकूल हो जाते हैं।

शत्रुओं के शमन (चाहे बाहरी हो या घरेलू कलह ,
दरिद्रता या शराब / नशे व्यसन रूप में भीतरी
शत्रु ),रोजगार या व्यापार आदि में आनेवाली
बाधाओं से मुक्ति, मुकदमे में सफलता के लिए ,
टोने टोटकों के प्रभाव से बचाव आदि के लिए
किसी साधक के द्वारा सिद्ध मुहूर्त में
निर्मित, बगलामुखी तंत्र से अभिसिंचित तथा
प्राण प्रतिष्ठित श्री बगलामुखी यंत्र घर में
स्थापित करना चाहिए या कवच रूप में धारण
करना चाहिए।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...