Saturday, September 5, 2015

आकस्मिक धन प्राप्ति साधना







जीवनकाल मे व्यक्ति को अपनी इच्छाओ की पूर्ति तथा योग्य रूप से जीवन निर्वाह करने के लिए कितने ही कष्ट उठाने पड़ते है. कितने समय तक परिश्रम ग्रस्त भी रहना पड़ता है. और न जाने कितना ही शारीरिक तथा मानसिक रूप से गतिशील रहना पड़ता है. इन सब के मूल मे पूर्ण रूप से भौतिक सुख की प्राप्ति है. और इस पूर्ण सुख प्राप्ति के लिए धन प्राप्ति एक बहोत ही बड़ा अंग है. हर एक व्यक्ति की इच्छा होती है की वह भौतिक द्रष्टि से सम्प्पन हो, वह सुखो का उपभोग करे तथा अपने परिवार को भी कराये. अपनी इछाओ तथा मनोकामनाओ की पूर्ति करे तथा अपना और परिवार का ऐश्वर्य बनाये रखे. लेकिन क्या यह हर व्यक्ति के लिए संभव है? नहीं. क्यों की हमारा जीवन कर्मप्रधान है. हमारे कर्मफल के निमित हमारा भाग्य होता है तथा उसी के अनुरूप हमें भोग तथा सुखो की प्राप्त होती है. लेकिन यह प्रारब्ध यह भाग्य को साधनाओ के माध्यम से परावर्तित किया जा सकता है. किसी भी क्षेत्र मे परिश्रम के साथ ही साथ श्रद्धा तथा विश्वास के साथ साधना कर दीव्य शक्तियो की कृपा प्राप्त कर ली जाए तो सफलता निश्चित रूप से मिलती है. धन प्राप्ति के सबंध मे भी तंत्र शास्त्र मे अनेको साधना है, जिनके द्वारा व्यक्ति अपनी धन प्राप्ति की इच्छा को पूर्ण कर सकता है. लेकिन गुप्त रूप से एसी साधनाओ का प्रचलन भी रहा जिससे व्यक्ति को निश्चित ही अत्यधिक कम समय मे अर्थात शीघ्र ही धन की प्राप्ति हो जाती है. चाहे किसी न किसी रूप मे साधक को कोई भी माध्यम से धन की प्राप्ति होती है. इस प्रकार के प्रयोगों को आकस्मिक धनप्राप्ति प्रयोग कहे जाते है. प्रस्तुत प्रयोग आकस्मिकधनप्राप्ति के प्रयोगों की श्रृंखला मे एक अजूबा है. यह प्रयोग बहोत ही कम समय का है तथा साधक को निश्चित सफलता देने मे पूर्ण समर्थ है. इस प्रकार जिन व्यक्तियो के पास लंबे अनुष्ठान करने का समय नहीं है ऐसे व्यक्तियो के लिए भी यह प्रयोग श्रेष्ट है. प्रयोग की पूर्णता पर साधक को आय के नए स्तोत्र प्राप्त होते है, रुका हुआ धन प्राप्त होता है. या फिर किसी न किसी रूप मे धन की प्राप्ति होती है.
इस साधना को किसी भी शुक्रवार से शुरू किया जा सकता है.
समय रात्री काल मे १० बजे के बाद का हो
साधक के आसान तथा वस्त्र लाल रंग के हो तथा दिशा उत्तर रहे
साधक को यह साधना पलाश वृक्ष के निचे बैठकर करनी चाहिए. अगर किसी भी रूप मे साधक के लिए यह संभव नहीं हो तो साधक जहा पर साधना कर रहा हो वहा पर अपने सामने पलाश वृक्ष की लकड़ी को लाल वस्त्र पर रख दे. साधक अपने सामने देवी महालक्ष्मी का चित्र स्थापित करे. संभव हो तो महालक्ष्मी यन्त्र या श्री यन्त्र स्थापित करे. तथा उसका पूजन करे. उसके बाद साधक देवी महालक्ष्मी को प्रणाम कर साधना मे सफलता के लिए प्रार्थना करे. उसके बाद साधक निम्न लिखित मंत्र का कमलगट्टे की माला से 11 माला जाप करे.
ॐ श्रीं शीघ्र सिद्धिं तीव्र फलं पूरय पूरय देहि देहि श्रीं श्रीं श्रीं नमः
मंत्र जाप पूरा होने पर साधक को गाय के घी से १०१ आहुति इसी मंत्र के साथ अग्नि मे समर्पित करनी है. इसके बाद साधक नमस्कार कर सफलता प्राप्ति के लिए प्रार्थना करे.
यह क्रम व्यक्ति को 11 दिन तक रखना है. 11 दिन बाद साधक माला को तथा अगर पलाश की लकड़ी को उपयोग मे लाया है तो वह भी पानी मे प्रवाहित कर दे. साधक की शीघ्र धनप्राप्ति की इच्छा जल्द ही पूर्ण होती है.
राजगुरुजी
महाविद्या आश्रम
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Wednesday, September 2, 2015

हाथाजोडी साधना





हाथाजोडी की साधना में लौंग अवश्य चढाये . इसके साथ ही महाकाली जी के मंत्र की प्रतिदिन ७ या ११ माला जपें . धयान रहे कि हाथाजोडी में देवी चामुण्डा जी का वास रहता हैं . जो देवी महाकाली का ही प्रतिरूप हैं . अतः महाकाली का मंत्र जपने से उनकी कृपा अवस्य प्राप्ति होती हैं . महाकाली का सब से सरल मंत्र इस प्रकार हैं .
मंत्र
"" ॐ किलि किलि स्वाहा """
इस मंत्र को नित्य ११ माला जापे . जप के पूरा होने पर हाथाजोडी कि लौंग , धूप , डीप से पूजा करे और कोई सिक्का भी चढ़ाये . यह प्रयोग आपकी आर्थिक दशा अवस्य सुधर देगा
राजगुरुजी
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पंचांगुली साधना







गुरु की आज्ञा, गुरु की कृपा के बिना कोई भी मन्त्र या तंत्र या सिद्धि संभव नहीं अतः प्रथम गुरु पूजन, और मानसिक रूप से आशीर्वाद लेकर ही किसी भी साधना में प्रवर्त होना चाहिए, यही शिष्य या साधक का कर्म और धर्म होना चाहिए.
भाइयो बहनों आप सभी को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ही साधना की सफलता हेतु भी शुभकामनाएं------
ये साधना गुरु द्वारा प्रदत्त है, कई लोगों ने किया, और इसके आश्चर्यजनक परिणाम भी प्राप्त किया, और मेरा भी स्वयं का अनुभूत है, भाइयो बहनों इसमें एक शंका लोगों को रहती है और वो है की यंत्र, तो इसका सलुशन भी है किन्तु इस ‘शुक्ल पक्ष की पंचमी, नवरात्री की पंचमी’ अतः इसका लाभ तो उठाना ही चाहिए, क्योंकि इस साधना का आगाज इस दिन किया तो निश्चित ही आगे आने वाले समय में एक बार में ही परिणाम भी प्रत्यक्ष होंगे.
इस दिन की जाने वाली साधना में कोई सामग्री या विशेस विधान की आवश्यकता नहीं है मात्र पीले वस्त्र, पीला आसन उत्तर दिशा और आदि शक्ति का चित्र, और गुरु चित्र तो अनिवार्य है ही.......
रात १० बजे स्नान करे और उत्तर दिशा की ओर मुह करके बैठ जाएँ, गुरु पूजन गणेश और भैरव पूजन करने के बाद संकल्प लें और पंचान्गुली ध्यान कर, निम्न मन्त्र का ५१ बार जप कर लें....
साधना विधान;
सर्व प्रथम, गुरु मन्त्र जो भी आपका हो या ‘ॐ परम
तत्वाय गुरुभ्यो नमः’ की चार माला करें |
‘ह्रीं’( HREEM) बीज का ७ बार जप करे | इससे मन्त्र प्राणमय हो जायेगा |
इसके बाद एंग(AING) बीज का सात बार जप करें-----
ध्यान मन्त्र---
पंचांगुली महादेवी श्री सीमंधर शासने,
अधिष्ठात्री करस्यासौ शक्ति: श्री त्रिदशेषितु: |
मन्त्र:_
‘ॐ नमो पंचांगुली -पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भुतमध्ये प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेखिनी मध्ये गुणीमध्ये गारूणीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषाशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपरे बुरो जो कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते चिंतावे तस माथे श्री पंचांगुली देवी तणों वज्र निर्धार पड़े ॐ ठं ठं ठं स्वाहा’ |
‘OM NAMO PANCHAANGULI –PANCHAAGULI PARSHARI PARSHARI MATA MAYNGAL VASHIKARNI LOHMAY DANDMARNI CHAUSHATHA KAAM VIHDANI RANMADHYE RAULMADHYE SHATRUMADHYE DEEVANMADHYE BHUTMADHYE PRETMADHYE PISHACHMADHYE JHOTINGMADHYE DAKINIMADHYE SHANKHINIMADHYE YAKSHINIMADHYE SHEKANIMADHYE GUNI MADHYE GARUNI MADHYE VINARIMADHYE DOSHMADHYE DOSHAASHARAN MADHYE DUSHT MADHYE GHOR KASHT MUJH UPARE BURO JO KOI KARE KARAVE JADE JADAVE TAT CHINTE CHINTAVE TAS MATHE SHREE MATA SHREE PANCHAANGULI DEVI TANO VAJRA NIRDHAR PADE OM THAM-THAM THAM SWAHA’|
मन्त्र पूर्ण होने के बाद मन्त्र गुरु को समर्पित करें पांच दिनों तक प्रतिदिन यही क्रम होगा पांच दिनों के बाद, माँ पंचान्गुली देवी का पूर्ण पूजन कर खीर का भोग लगा कर किसी कन्या को भोजन करा देना चाहिए और सफलता की कामना करना चाहिए |
मन्त्र आपके सामने है और अभी समय भी है जो इसे करना चाहें तो १०, बजे,११ बजे, ११: ३०बजे भी आप बैठ सकते हैं, किन्तु करके देखें जरुर, क्योंकि साधना का प्रतिफल तो करने पर ही देख पाएंगे न, अतः साधना करें जरुर.
भाइयो बहनों, जो भी यंत्र के साथ ही साधना करना चाहें तो भी परेशान न हों यंत्र भी आपको मिल जायेगा किन्तु इसके लिए आपको अगले माह की पंचमी का इन्तजार करना पड़ेगा और इसके साथ ही तब यंत्र और चित्र की भी व्यवस्था कर लीजिए, किन्तु तब तक आप इस मन्त्र को प्रतिदिन करके न केवल याद कर लीजिए और अपने प्राणों में समाहित भी, क्योंकि जब मन्त्र की क्रमशः पुनरावृत्ति होती है तो मन्त्र और साधक दोनों ही एक होने की क्रिया प्रारम्भा हो जाती है और मन्त्र प्राणमय होने लगता है और तब सिद्धि की स्तिथि बनने लगती है, तो आप सब तैयार हो जाइये, साधना के महासागर से एक और मोती चुनने हेतु-----
आप सभी को मेरी शुभकामनाएं साधना करें साधनामय बनें......
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तंत्र-मंत्र -पूजा-अनुष्ठान चमत्कार नहीं सब प्रकृति के विज्ञानं और नियम हैं








यह ब्रह्माण्ड कुछ विशिष्ट नियमों से संचालित होता है ,जिसे प्रकृति के नियम कहते हैं |इन्ही नियमो के अन्वेषण के आधार पर आधुनिक भौतिक विज्ञान के चमत्कारिक समझे जाने वाले आविष्कारों का संसार खड़ा है |जिस कार्य ,घटना या प्रभाव के कारणों और उसके पीछे के नियमों का हमें पता होता है ,वे हमें सामान्य और तर्कसंगत लगती हैं ,,पर जिन नियमो का हमें ज्ञान नहीं होता और हम उन नियमो के अंतर्गत कुछ घटता हुआ देखते हैं ,तो उन घटनाओं के कारणों का हमें ज्ञान नहीं हो पाता और हम उन्हें चमत्कार मान लेते हैं |
आज चल रही कारें ,मोटरें ,वायुयान ,राकेट कल तक लोगों के लिए चमत्कार थे या जो जंगलों में रहते हैं उनके लिए आज भी चमत्कार ही हैं ,,कम्प्यूटर ,कैलकुलेटर ,टेलीविजन इनसे अनजान व्यक्ति के सामने आ जाएँ तो यह उसे चमत्कार लगेंगे पर हमारे लिए सामान्य बातें हैं ,क्योकि हम इनकी तकनिकी ,नियम को जानते हैं |यह सब भौतिक विज्ञान के खोजों द्वारा संभव हुआ है जो प्रकृति के नियमो के अनुसार ही संचालित होते हैं |अचानक बिजली चमकना ,इन्द्रधनुष बनना, तूफ़ान ,चक्रवात सब प्रकृति के नियमो अथवा उनमे विक्षोभ के प्रतिक्रिया के परिणाम होते है |
तंत्र-मंत्र, टोन-टोटके ,गंडे- ताबीज ,यन्त्र-मंत्र ,पूजा-अनुष्ठान ,आदि में जो भी शक्ति काम करती है ,वह प्रकृति के नियमो से ही करती है |यहाँ नियमविहीन और अकारण पत्ता तक नहीं हिलता |उस परमात्मा की यह सृष्टि उसके द्वारा निर्धारित नियमो से बंधी हुई है |अतः यह सोचना भ्रम है की गंडे -ताबीजों या तंत्र-मंत्र में कोई चमत्कार काम करता है |इसी प्रकार भूत-प्रेत ,वायव्य शक्तियां यहाँ तक की ईश्वरीय अवतरण तक सब प्रकृति के नियमो के अनुसार ही बनते है या अवतरित होते हैं ,हमें उस तकनिकी की जानकारी नहीं है ,अतः हम उसे चमत्कार मानते हैं |
वस्तुतः तंत्र-मंत्र ,योग ,पूजा -अनुष्ठान ,यज्ञ ,यन्त्र ,टोन-टोटके ,गंडे-ताबीज ,आदि में एक बृहद उर्जा विज्ञानं काम करता है ,जो ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना ,उसकी उत्पत्ति ,क्रिया ,उसकी ऊर्जा तरंगों और उनसे निर्मित होनेवाली भौतिक ईकाइयों की उर्जा संरचना का विज्ञानं है |दुसरे शब्दों में यह प्राचीन भारतीय परमाणु विज्ञानं और सुपर सोनिक तरंगों का विज्ञान है |जहाँ तक आज का विज्ञानं अभी पहुच नहीं सका है और आधुनिक युग में इस विज्ञानं को जानने वाले नहीं हैं |पुस्तकों में इस विज्ञानं के गूढ़ विवरण रूपकों के रूप में लिखी गयी कथाओं में छिटपुट रूप से व्यक्त किये गए हैं |कुछ तकनीकियाँ पुस्तकों में रह गयी हैं जो आधुनिक विज्ञानं द्वारा परिभाषित नहीं हो पा रही हैं ,इसलिए उन्हें अंधविश्वास समझ लिया गया है ,जबकि सच्चाई यह है की अभी आधुनिक विज्ञान इतना सक्षम ही नहीं हुआ की वह उन्हें परिभाषित कर सके और उनके पीछे की तकनीकियों और नियमो को बता सके |जब अबतक अन्वेषित सभी कुछ प्रकृति के नियमो से संचालित होता है तो यह कैसे अलग हो सकते हैं |कल तक तो आज की खोजें भी अंधविश्वास थे |२०० वर्ष पूर्व अचानक रेडियो की ध्वनि की जाती तो लोगों को आकाशवाणी और चमत्कार ही तो लगते
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सम्मोहन







सम्मोहन को अंग्रेजी में हिप्नोटिज्म कहा जाता है ,जिसका शाब्दिक अर्थ है निद्रा ,,किन्तु यह निद्रा प्राकृतिक एवं स्वाभाविक निद्रा नहीं होती है ,,इसे एक एक विशेष प्रकार की तंत्रिका की निद्रा या प्रेरित निद्रा भी कह सकते हैं |प्राकृतिक निद्रा में व्यक्ति बेखबर होकर सोता है जबकि सम्मोहित निद्रा या अवस्था में व्यक्ति सम्मोहनकर्ता के आदेशों और निर्देशों के प्रति सजग होता है |खुद भी साधक अपने पर यह प्रयोग कर सकता है |
सम्मोहन मानव मन की उस दशा का नाम है जिसमे पहुचकर उसका मन सम्मोहनकर्ता अथवा स्वयं को दी गयी आज्ञाओं या निर्देशों का पालन करने लगता है |इस अवस्था में मानव मन प्रयोगकर्ता के निर्देशों द्वारा निद्रा अवस्था में आ जाता है |यह ठीक वैसी अवस्था होती है जैसी निद्रागमन के समय मन की होती है |उस समय मनुष्य की बुद्धि तेजी से काम करने लगती है और उसकी कल्पनाशक्ति उच्चतम शिखर पर पहुच जाती है |
स्वसम्मोहन या आत्म सम्मोहन एक ऐसी विशिष्ट अवस्था है जिसके माध्यम से साधक स्वयं कृत्रिम निद्रा में सो जाता है |इस अवस्था में साधक अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर ,अपने अचेतन व् निष्क्रिय शरीर के भीतर छिपे हुए चेतन मन ,प्राण शक्ति एवं संकल्प के द्वारा असाध्य कार्यों को भी सिद्ध कर जाता है |योग निद्रा की इस अवस्था में साधक पर काल प्रक्रिया निष्प्रभावी हो जाती है |सम्मोहन कई तरह का होता है ,व्यक्ति सम्मोहन ,स्वसम्मोहन ,समूह सम्मोहन आदि |
सम्मोहन का इतिहास बहुत पुराना है ,वैदिक काल में ऋषियों के आश्रमों में सम्मोहन विद्या पराकाष्ठ पर थी ,विदेशी इसे
इजिप्सियन ,पर्सियन ,ग्रीक एवं रोमन सभ्यता की दें मानते हैं ,,कणव् ऋषि के आश्रम में शेर व् बकरी एक घाट पर पानी पीते थे ,नेवला व् सर्प एक वृक्ष की छाया में बैठते थे ,सम्मोहन की इस अवस्था में हिंसक प्राणियों का नैसर्गिक बैरभाव भी नष्ट हो जाता था ,,तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो वासुदेव कृष्ण सम्मोहन विद्या के आदि अवतार थे ,,इन्होने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक दृष्टि से इसके अनेक प्रयोग किये |कृष्ण ने सारे गोकुल- मथुरा- वृन्दावन को सम्मोहित कर रखा था |कृष्ण बंसी के मधुर संगीत के माध्यम से सार्वजनिक सम्मोहन कर देते थे |स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो के स्प्रिंगफील्ड मैदान में प्रवचन करते हुए समूह सम्मोहन के माध्यम से आधा मील दूर तक श्रोताओं को खींच ले गए जब उन्होंने कृष्ण के सम्मोहन प्रभाव के बारे में प्रश्न किया तो |इस सम्मोहन शक्ति को हमारे प्राचीन ग्रंथों में माया या निशाचरी माया का नाम दिया गया है |कुम्भकरण ,मेघनाद आदि ने राम की सेना को निशाचरी माया से मूर्छित कर दिया था ,यह एक प्रकार का सम्मोहन ही था ,,,वैज्ञानिकों के गहन अनुसन्धान -अध्ययन से यह सिद्ध हो गया है की मनुष्य के शरीर में एक विद्युतीय आवेश ,विद्युतीय गंघ [चुम्बकीय आकर्षण शक्ति ]निरंतर प्रवाहित होती रहती है |यह गंध उसके द्वारा प्रयोग की हुई वस्तुओं में भी प्रवाहित हो जाती है और वातावरण में भी फैलती है और काफी समय तक विद्यमान रहती है |यह औरा और फेरोमोंन होते हैं आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में |यह आसपास के व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं स्वयमेव |म्मंसिक शक्ति के साथ इनका विस्तार व्यक्ति को सम्मोहित कर सकता है |
सृष्टि के मूल में सम्मोहन है |जड़ -चेतन सभी किसी न किसी रूप में एक-दुसरे के प्रति सम्मोहित होते हैं ,आकर्षित होते हैं ,,वे जाने-अनजाने अपने आपको किसी न किसी के प्रति समर्पित करने के लिए तैयार रहते हैं ,जुड़ने को तैयार रहते है ,आकर्षित होते हैं ,खींचते हैं | यह सामान्य सम्मोहन -आकर्षण है |मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है ,वह सम्मोहित ही नहीं होता अपितु दूसरों को भी सम्मोहित करके उनसे अपने मनोनुकूल कार्य करना चाहता है |यह प्राणी में किसी न किसी के प्रति सम्मोहित होने की भावना जानता है |इसी मानवीय भावना को समझकर बुद्धिमान व्यक्तियों ने अन्य व्यक्तियों ,अपने को ,समूह को प्रयत्नपूर्वक अपने वश में करने का प्रयत्न किया है और उपाय सोचे हैं ,इसका मुख्य रूप सम्मोहन है| सम्मोहन से लोगो से मनचाहे कार्य कराये जा सकते हैं ,उनको असाध्य रोगों -दुर्व्यसनों से मुक्ति दिलाई जा सकती है ,रोग दूर किये जा सकते हैं ,मानसिक भय दूर किया जा सकता है ,मनोविकार दूर किये जा सकते हैं, मन में नए उत्साह-ऊर्जा का संचार किया जा सकता है ,हीन भावना समाप्त की जा सकती है ,भावों -सोचों में परिवर्तन किया जा सकता है ,सफ़लता बधाई जा सकती है ,ईष्ट तक की प्राप्ति हो सकती है |सम्मोहन उपचार को हिप्रोथेरैपी नाम दिया गया है जिससे ह्रदय रोग ,स्वाशनली में सूजन ,उच्च रक्त चाप ,गर्भावस्था की उलटी ,प्रसव
पीड़ा ,अनिद्रा ,अंधापन ,मनोरोग ,फोबिया ,धूम्रपान ,वजन में कमी आदि रोग दूर करने में सहायता मिली है ,मानसिक बल और जीवनी शक्ति बढ़ाकर असाध्य रोगों में भी अच्छी सफलता प्राप्त होती है |
सम्मोहन की शक्ति प्राप्त करने की पहली सीढ़ी त्राटक है ,अर्थात ध्यान का केन्द्रीकरण अर्थात मन का एकाग्रीकरण ,इसकी अनेक प्रारम्भिक विधियाँ हैं जो बाद में एक दुसरे में समायोजित होती चली जाती हैं |यह क्रियाएं क्रमिक रूप से चलती है चरणबद्ध रूप से |.........................................
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कैसे होता है आपके आराध्य देवता [ईष्ट] का दर्शन [प्रत्यक्षीकरण ]आपको






ईष्ट या देवता का प्रत्यक्षीकरण या प्रकटीकरण एक ऐसी घटना होती है ,जिसे लक्ष्यकर प्रत्येक साधक -आराधक अपने पूजा-अनुष्ठान-साधना शुरू करता है |उसका परम लक्ष्य उस ईष्ट या देवता का साक्षात्कार करना होता है |सामान्य साधक या आस्थावान कभी यह नहीं सोचता यह कैसे होता है ,कहा से आते है देवी-देवता ,इसके पीछे कौन सी उर्जा-तकनीक काम करती है |,क्या सचमुच वह ईष्ट हमारे सामने कही से आकर खड़ा हो जाता है ,जिसे हम बुला रहे होते है ,क्या वास्तव में ऐसे देवता कही किसी लोक में रहते है | क्षमा कीजियेगा यदि आस्थावानो की भावना को ठेस लगे ,किन्तु यदि आप समझते है की देवी-देवता की आकृतियों के विलक्षण प्राणी इस ब्रह्माण्ड में कही रहते है तो आप भारी भ्रम में है |
कभी इन देवियों की पूजा पहाड़ काटकर मूर्ति जैसा बनाकर ,कभी फूस तो कभी मिटटी की पिंडी जैसी बनाकर की जाती थी ,,आज इनकी सुन्दर मुर्तिया बनी हुई है |आप इनमे से किस आकृति की देवी को अलौकिक प्राणी मानेगे?देवता तो वैदिक ऋषियों के प्रतीक थे और वे मूर्ति पूजक थे ही नहीं |यदि देवी-देवता जैसे प्राणी है तो वे केवल मूर्ति पूजको को ही मिलने चाहिए |फिर जो मूर्ति पूजक नहीं है ,मुसलमान या ईसाई है ,या जो गुरु परम्परा के है अथवा जो गुरु को ही ईश्वर मानते है ,तो क्या उन्हें ईश्वर नहीं मिलता या वे ईश्वरीय उर्जा अथवा कृपा से वंचित होते है |नहीं ऐसा नहीं है ,ईश्वर उर्जा स्वरुप है ,सर्वत्र विद्यमान है ,,मुर्तिया वस्तुतः भाव मुर्तिया है ,जो मानसिक एकाग्रता के लिए होती है ,एक विशेष प्रकार की ऊर्जा -गुण और भाव जाग्रत करने वाली आकृति होती है मुर्तिया |सामने एक आकृति है और उसका भाव है तो उस भाव को गहन करना सरल हो जाता है |
जब भाव गहन होता है ,तो एक समय ऐसा आता है ,जब साधक अनुभूत करता है की वह आकृति प्रकट हो गयी |वह आकृति प्रत्यक्ष उससे बातें कर रही है |यह कल्पना का साकार हो जाना है |वह आकृति सचमुच साधक के सामने सजीव हो जाती है और उसके प्रत्येक प्रश्न के उत्तर देती है या आशीर्वाद देकर दर्शन देती है |
यह साधना की एक दुर्लभ अवस्था है ,इस अवस्था में पंहुचा साधक ही वास्तविक सिद्ध है |...........परन्तु क्षमा कीजियेगा यह भी एक भावात्मक अनुभूति है वहा कोई प्राणी नहीं आया होता है अपितु ऊर्जा समूह आकृति में आया होता है और वहा व्याप्त होता है |साधक जब उस आकृति को प्रत्यक्ष करता है तो वहा का वातावरण उस भाव से संतृप्त हो जाता है ,फलतः वहा अन्य जो भी होगा उसे लगेगा एकाएक कुछ परिवर्तन हो गया और वह चौंकेगा ,किन्तु उस आकृति को केवल साधक अनुभव कर सकेगा और बातें कर सकेगा ,अन्य व्यक्ति को वह दृष्टिगत नहीं होगी ,क्योकि वह साधक के भाव की आकृति
है ,वास्तव में उसका वहा कोई अवतरण नहीं होता |
होता यह है की जब साधक किसी विशेष
भाव-गुण-आकृति पर एकाग्र होता है तो उसके भाव की गहनता उसके आतंरिक ऊर्जा चक्र में सम्बंधित गुण -भाव के चक्र को स्पंदित करने लगते है [[ज्ञातव्य है की शरीर में ही समस्त गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाले चक्र उपस्थित होते है ,तभी तो कहा जाता है की सभी देवी देवता इसी शरीर में है ]]फलतः चक्र से सामान्य से अधिक उर्जा और तरंगे उर्सर्जित होने लगती है ,यह तरंगे शारीरिक -रासायनिक परिवर्तन के साथ ही विशिष्ट आभामंडल भी बनाने लगती है |इस प्रकार एक निश्चित मानसिक उर्जा बनती और अंतरिक्ष में प्रक्षेपित होने लगती है ,जिसके बल से सौरमंडल में उपस्थित उसी प्रकार की उर्जा और भाव तरंगे वहाँ खिचने [आकर्षित होने] लगती है और वह क्षेत्र उन तरंगों और उर्जा से घनीभूत हो जाता है |इससे वहा उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का आतंरिक उर्जा परिपथ प्रभावित होता है |साधक में मानसिक रूप से स्थिर आकृति के अनुसार यह ऊर्जा परिवर्तित हो उसके सामने प्रत्यक्ष हो जाती है ,और साधक को सिद्ध हो उसके मानसिक तरंगों की क्रिया से संचालित होने लगती है |
यह सब ब्रह्मांडीय ऊर्जा तरंगों का खेल है |जिसके सामने प्रत्यक्षीकरण होता है केवल वही उसे देख पाता है ,दूसरों को केवल अनुभूति होती है की वातावरण में परिवर्तन हो गया है |प्रत्यक्षीकरण \दर्शन समाप्त होने के बाद भी उन ऊर्जा तरंगों का प्रभाव उस स्थान पर रहता है ,पर देवता के आने का कोई भौतिक चिन्ह नहीं होता |प्राकृतिक रूप से कोई देवता -देवी कोई भौतिक चिन्ह नहीं छोड़ते ,क्योकि उनका भौतिक शरीर होता ही नहीं |वह तो साधक की भावना के अनुरूप रूप धारण कर प्रत्यक्ष होते है |जो भौतिक चिन्ह छोड़ने की बात करता है वह झूठ बोलता है |
यह सब ऊर्जा का प्रत्यक्षीकरण और मानसिक ऊर्जा द्वारा उनका नियंत्रण है ,इसी के बल पर बिना मूर्ति पूजा या साकार आराधना के भी बहुत से धर्म-सम्प्रदाय ईश्वरीय ऊर्जा और कृपा प्राप्त करते रहते है ,गुरु को ईष्ट या ईश्वर मानने वाले को गुरु के दर्शन होते हैं ,निराकार शक्ति को मानने वाले को शक्ति का बिना रूप के भी आभास होता है ,क्योकि ऊर्जा का केन्द्रीकरण आसपास हो चूका होता है ,जिस रूप पर मानसिक शक्ति एकाग्र होती है शक्ति वाही भाव ग्रहण कर लेती है |,.......[एक चिंतन ].......................................................
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क्यों अधिक प्रभावी होता है भोजपत्र निर्मित यन्त्र धारण करना






विभिन्न धर्मो ,समुदायों में यन्त्र रचना और धारण प्राचीन काल से चला आ रहा है ,यन्त्र विभिन्न आकृतियों अथवा अंको के एक विशिष्ट संयोजन होते है ,जिनसे एक विशिष्ट उर्जा विकिरित होती है अथवा जिनमे एक विशिष्ट उर्जा संग्रहीत होती है ,जो धारक को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती है ,यंत्रो को देवी देवताओ का निवास भी माना जाता है ,यह आंकिक भी होते है अथवा न समझ में आने वाली आकृतियों के भी ,फिर भी इनके विशिष्ट अर्थ होते है ,यंत्रो की पूजा भी की जाती है और धारण भी किया जाता है ,अथवा अन्य रूप से भी उपयोग किया जाता है ,
यंत्रो का निर्माण वुभिन्न सामग्रियों ,वस्तुओ पर होता है ,कागज़,भोजपत्र ,धातु ,पत्थर ,कपडे आदि पर भी ,,हिन्दू परम्परा के अनुसार भोजपत्र को परम पवित्र माना जाता है ,अन्य माध्यमो की अपेक्षा भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र को प्रमुखता दी जाती है क्योकि इसके साथ कई विशिष्टताये जुड़ जाती है ,जो अन्य माध्यमो में कुछ कम पायी जाती है ,
भोजपत्र स्वयं एक सकारात्मक उर्जा आकर्षित करने वाला माध्यम होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है ,इस पर यन्त्र निर्माण में प्रयुक्त होने वाले अष्टगंध अथवा पंचगंध की अपनी अलग विशेषता होती है ,इनमे गोरोचन आदि प्रयुक्त होने वाले पदार्थ नकारात्मक शक्तियों को दूर कर सकारात्मकता को आकर्षित करते है ,यन्त्र निर्माण के समय साधक की विशिष्टता ,उसकी एकाग्रता ,आत्मबल ,उसके हाथो से निकलने वाली तरंगे ,उसकी अपनी सिद्धिया /शक्तिया यन्त्र को अलग बल प्रदान करती है ,निर्माणोंपरांत यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा और उस पर सम्बंधित इष्ट का जप इसे बहुत विशेष बना देता है,यन्त्र निर्माण हेतु निर्दिष्ट और चयनित मुहूर्तो का अपना अलग प्रभाव होता है ,इसे विशिष्ट साधक ही बना और प्राण प्रतिष्ठित कर सकता है ,जिसके पास सम्बंधित विषय की क्षमता हो ,,इस प्रकार बना यन्त्र धारक पर शीघ्र और सकारात्मक प्रभाव डालता है ,यन्त्र से उत्सर्जित होने वाली तरंगे व्यक्ति और आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है जिससे परिवर्तन होते है और व्यक्ति लाभान्वित होता है
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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...