Sunday, May 31, 2015

धूत विजय करक प्रयोग





जो लोग जुआ , सट्टा , मटका , रेसकोर्स , इत्यादि खेलने के शौक़ीन हों अथवा जिन्होंने इस शौक को ही अपना व्यापार बना रखा हो तो जुए इत्यादि में निरंतर सफलता प्राप्त के लिए उन्हें इस प्रयोग को अवशय ही सम्पन्न कर के लाभ उठाना चाहिए .
सामग्री ;;----- स्वर्णाकर्षण गुटिका ( मंत्र सिद्धि प्राण - प्रतिष्ठित ) तेल का दीपक
माला ;-- विद्दुत माला ( मंत्र सिद्धि चैतन्य )
समय ;-- रात का कोई भी समय
दिन ;;--- शुक्रवार
धारणीय वस्त्र ;;---- सफ़ेद रंग की धोती
आसन ;;-- सफ़ेद रंग का सूती आसन
दिशा ;;--- उत्तर
जाप संख्या ;;-- इक्कीस हजार ( २१००० )
अवधि -- इस्क्किस दिन
मंत्र ;;-----
'' ॐ नमो वीर बैताल आकस्मिक धन देहि देहि नमः '''
प्रयोग विधि ;;---
किसी भी शुक्रवार की रात्रि को यह प्रयोग करें . अपने दाहिने हाथ में स्वर्णाकर्षण गुटिका लेकर उसे पहले भली प्रकार से देखें , फिर सामने रख कर तेल का दीपक लगाकर उपरोक्त मंत्र का इक्कीस हजार जाप करें , जप के बाद इक्कीस दिनों में वह स्वर्णाकर्षण गुटिका गुटिका सिद्धि हो जाती हैं . जब यह गुटिका सिद्धि हो जाये तो जब भी किसी जुए में जावें अथवा जुआ खेले या रेसकोर्स में जाये तो इस स्वर्णाकर्षण गुटिका को अपनी जेब में रखकर ले जाने से सफलता प्राप्त हो सकती हैं ,
नोट - साधको को सूचित किया जाता हैं की हर चीज की अपनी एक सीमा होती हैं , इसलिए किसी भी साधना का प्रयोग उसकी सीमा में ही रहकर करे , और मानव होकर मानवता की सेवा करे अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाएँ ,.


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मोबाइल नं. : - 09958417249
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बंधी हुई दुकान खोलने हेतु प्रयोग






यदि आप की दुकान अथवा व्यापर को किसी ने ईर्ष्या वश अथवा देषवश तांत्रिक अभिचारकर्म के माध्यम से बांध दिया हो , तो इस बंधन को समाप्त करने तथा दुकान को पुनः सुचारू रूप से चलाने हेतु इस प्रयोग को अवश्य ही सम्पन्न करके लाभ उठाना चाहिए .

सामग्री ;- कपूर कचरी , गोरोचन , गुलाल , छारछबीला .
माला ;- मंत्र सिद्धि चैतन्य रुद्द्राक्ष माला
समय ;- दिन अथवा रात्रि
दिन ;- रविवार
धारणीय वस्त्र ;- पीले रंग की धोती
आसन ;- पीले रंग का
दिशा ;- दक्षिण दिशा
जाप संख्या ;- प्रतिदिन १०८ बार
अवधि ;- ११ दिन
मंत्र ;-
''' ॐ दक्षिण भैरवाय भूत - प्रेत बंध , तंत्र बंध , निग्रहनी , सर्व शत्रु संहारिणी मम कार्य सिद्धिम कुरु - कुरु स्वहा'''
प्रयोग विधि - उपरोक्त वर्णित चारो सामग्री ( यथा - गोरोचन , कपूर कचरी , गुलाल , और छार -छबीला )
को सामान मात्र में उन्हें पीसकर तथा आपस में मिललर एक मिशरण तैयार कर ले . तत्पश्चात इस मिशरण को उपरोक्त मंत्र से १०८ बार अम्भीमंत्रित करे .
अब इस अभिमंत्रित मिश्रण को उपरोक्र्त मंत्र का ही निरंतर जाप करते हुए प्रातः दुकान खोलने से पूर्व दुकान के सामने बिखेर कर दुकान खोले .ले .
किसी भी रविवार से आरम्भ करके यह प्रयोग लगातार ११ दिनों तक करना चाहियें प्रतिदिन प्रयोग विधि एक सामान रहेगा .



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रुका हुआ धन प्राप्ति हेतु प्रयोग





यदि किसी को आपने रुपया उधर दिया हुआ हो और वह व्यक्ति आप का धन वापिस करने में आनाकानी कर रहा हो अथवा उधर दिया धन डूबने की स्थिति में हो तो निम्नांकित प्रयोग को पूर्ण श्रद्धा के साथ सम्पन्न करके रुका हुआ धन वसूल करने में सफलता प्राप्त की जा सकती हैं
सामग्री ;- मंत्र सिद्धि प्राण - प्रतिष्ठित युक्त , '' पारद शिवलिंग '' , जलपात्र , लकड़ी का बाजोट , सफ़ेद रंग का वस्त्र , आक , धतूरा , अष्टरागंध , विल्वपत्र , पंचामृत , घी का दीपक , धुप , अगरबत्ती , चमेली का इत्र , , गंगा जल , , साबुत चावल , , थाली आदि ,
माला ;-- मंत्र सिद्धि चैतन्य , शुद्ध रुद्राक्ष माला .
धारणीय वस्त्र ;-- पीले रंग की धोती .
आसन ;-- काले रंग का ऊनी कम्बल
दिशा ;-- दक्षिण दिशा
दिन ;- मंगलवार
समय ;;-- रात्रि के समय
जाप संख्या ;--- इक्कीस हजार ( २१००० )
अवधि ;-- ग्यारह दिन ( ११ )

मंत्र ;----
'' ॐ नमः क्लीं कालिके कालिकाय काली महाकाली कालिके भूताय क्लीं नमः ''
प्रयोग ;---
सर्वप्रथम मंगलवार को रात्रि के समय स्नान - ध्यान करके पीले रंग की धोती पहनकर किसी एकांत स्थान में दक्षिणमुखी हो कर काले रंग के ऊनी कम्बल पर बैठ जाये . लकड़ी के बाजोट पर सफ़ेद रंग का वस्त्र बिछाकर थाली रखे और थाली में अष्टरागंध से स्वास्तिक चिन्ह अंकित करके मंत्र सिद्धि चैतन्य प्राण - प्रतिष्ठा युक्त '' पारद शिवलिंग '' को स्थापित करके जलाभिषेक करें . ततपश्चात पंचामृत से अभिषेक करें और आक , धतूरे के पुष्प , बिल्व पत्र अर्पित करके धूप - दीप जलावें . फिर मंत्र सिद्धि चैतन्य '' रुद्राक्ष माला '' से उपरोक्त मंत्र का ११ दिनों में २१००० हजार जाप पूर्ण करें . साधना कल के दौरान सात्विक आहार - विहार तथा पूर्ण ब्रम्हचर्य का पालन करना आवश्यक हैं ( साधना कल में घर से बहार कतई भी नहीं निकले ) प्रयोग समाप्त के पश्चात बारहवे ( १२ ) दिन ग्यारह (११ ) कुंवारी कन्याओ को भोजन कराकर भेट पूजा देकर विदा करें और '' पारद शिवलिंग '' को घर के पूजा - स्थल में स्थापित कर देवें . शेष पूजन सामग्री को शिव मंदिर में अर्पित कर देवें . इस प्रकार से यह अद्भुत प्रयोग प्रयोग विधिपूर्वक सम्पन्न हो जाता हैं .


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Thursday, May 21, 2015

मेरे जीवन का अद्भुत पल - उर्वशी साधना







जीवन को आरोग्यवर्धक बनाने के लिए , पौरुसवान , शकितशाली बनाने के लिए तथा साधना मार्ग में निष्कंटक चलने के लिए , ये अपशरये ही साथ देती हैं . जो मात्र एक बार ही सीधी होकर प्रेमिका के रूप में जीवन भर सत्ता देती हैं . इस जीवन को ऐश्वर्य पूर्ण , भैभवशाली बनाने के लिए एक मात्र साधन है , और वह हैं अप्सरा साधना .
ये अप्सराये एक बार सिद्धि हो जाने पर जीवन भर हीरे - मोती , स्वर्णभूषण उपहार स्वरूप अपने प्रेमी को प्रदान करती रहती हैं . इसे मात्र प्रेमिका के रूप में और लड़कियाँ सहेली के रूप में सिद्धि कर सकती हैं . सिद्धि प्राप्त हो जाने पर जब भी उनको याद करो उपस्थित होकर मनोवांछित कार्य करती हैं .
अप्रैल का महीना था . गंगोत्री से हरिद्वार आने के लिए चार अप्रैल को रास्ता साफ होने वाला था . पूज्य गुरु जी से से कुछ दिन के लिए घर वापस लौटने का आदेश मिला था . मैं मार्ग साफ होने की प्रतीक्षा कर रहा था , बस चलने में चार दिन की देरी थी और इस चार दिन के अमूल्य समय को मैं ऐसे ही नहीं खोना चाहता था . मेरी रोज की दिनचर्या थी नित्यकर्म से निवृत होकर पहाड़ो मैं कुछ दूर तक विचरण करना . इकत्तीश मार्च की सुबह नौ बजे गुरुदेव से आज्ञा प्राप्त कर अकेले ही गंगोत्री होते हुए भैरव टीला तक जाने का विचार कर निकला . उस दिन मेरे साथ कुछ आलौकिक घटना घटी जिसे याद कर मैं रोमांचित हो जाता हूँ .
गंगोत्री से आगे सड़क पर कुछ दूर चलने पर मुझे सामने से एक साधु आता दिखाई दिया गेरुवा वस्त्र धारण किये , वह साधु मुझे बड़ा ही विचित्र लगा . इतने कड़ाके की ठंड थी कि चलने में मुश्किल हो रहा था , परन्तु वह साधु एक लंगोट में था . नंगे बदन उस साधु के निकट आने पर मैंने उसे प्रणाम किया . उसने मेरे प्रणाम का कोई उत्तर नहीं दिया और मुझे घूर - घूरकर देखने लगा . प्रणाम करने के पश्चात जब उधर से कोई उत्तर नहीं मिला तो मैंने नजर उठाकर देखा . धवल केश , गेहुँआ बदन , बलिष्ट भुजा , लाल - लाला लपलपाती आँखों को देख कर मैं डर गया . बाल सफ़ेद थे , परन्तु उसका पूरा शरीर मात्र २० वर्ष के नौजवान जैसा था . मुझे महान आश्चर्य लगा . अचानक उसकी आँख मैं मेरी नजर पड़ गई . मुझे अपने शरीर के अंदर सनसनाहट और जलन महसूस हुई . मैंने डरकर अपनी नजर हटानी चाही पर हटा नहीं सका . ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे बांध कर धीरे - धीरे खीच रहा हैं . मैं अपने गुरुदेव को मन ही मन याद करने लगा .
मेरी भावना को जानकर वे मुस्कराये . उनकी मुस्कराहट भी बड़ी विचित्र थी . पूरे चेहरे से क्रोध टपक रहा था और क्रोधाग्नि में जलते हुए मुस्कराना बड़ी विचित्र बात थी . दस फ़ीट कि दुरी से भी उसके शरीर कि आभा मंडल से निकलने वाली गर्मी का मुझे अहसास हो रहा था . मेरी ठंड भी समाप्त हो चुकी थी . हल्का - हल्का पसीना आ रहा था . पांच मिनट तक यही स्थित रही , फिर वे पलटे और धीरे - धीरे चलने लगे . पता नहीं मैं किस बंधन मैं बंधा हुआ था कि दस फ़ीट कि दुरी बनाकर उनके पीछे - पीछे चलने लगा . शनैः - शनैः उनकी रफ़्तार बढ़ रही थी , साथ ही मैं भी न चाहते हुए उनके लपकता जा रहा था .
एक किलोमीटर चलने के पश्चात वे पहाड़ी पर चढ़ने लगे . बर्फ से भरे पहाड़ में वे ऐसे चढ़ रहे थे जैसे डामर कि सड़क हो , ऊपर पहुचने पर मुझे सामने एक स्फटिक शिला दिखाई दी , जिसकी लम्बाई - चौड़ाई लगभग दस - पंद्रह मीटर के आस - पास रही होगी . वे सन्यासी वही पर शिला के एक किनारे बैठ कर कुछ मुद्रा बनाने लगे . मैं बगल में खड़ा होकर इस कौतुहल का नजारा देख रहा था .वे मुद्रा बनाकर धीरे - धीरे कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे . मुश्किल से दो तीन मिनट पश्चात आसमान में गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी , मैंने सिर उठाकर आसमान कि तरह देखा ऊपर बदली नाम कि कोई चीज ही नहीं थी . चारो तरफ नीला आकाश ही दिखाई दे रहा था , परन्तु गड़गड़ाहट धीरे - धीरे बढ़ती जा रही थी . मैं कौतुहल वश ऊपर को ही तकता रहा .
मात्र एक मिनट बाद आसमान में हंस के आकर कि धवल वस्तु उड़ती हुई दिखाई दी . वह धीरे - धीरे नीचे आ रही थी . कुछ नीचे आने पर साफ दृष्टि गोचर होने लगा , वह कोई स्त्री थी ,. श्वेत वस्त्र , श्वेत कंचुकी , धारण किये हुए सोलह श्रृंगार से सुसज्जित वह कन्या इतनी सुन्दर थी कि मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता ,
इतनी सुन्दर कन्या मैंने जीवन मैं पहले कभी नहीं देखी. काली घटा के सामान लम्बे लहराते हुए केश , कमल के सामान बड़ी - बड़ी आँखे , मोटे और गुलाबी होठ , बलखाती पतली कमर , षोडष वर्षीय शरीर यौवन से भरपूर मात्र एक कंचुकी और साड़ी मैं नहीं समां पा रहा था . वह धीरे से स्टफिक शिला के ऊपर आकर खड़ी हो गई , और धीरे - धीरे बलखाती हुई योगी के तरफ बढ़ने लगी . चलने पर उसके पैर के घुँघरू कि आवाज मानो बसंत बहार कि कलरव के सामान थी . नाभि और नितम्ब का धिरकन समुद्र के हिलोर के सामान था . वह बड़ी - बड़ी पलकों को झुकाये ऐसे चल रही थी , जैसे नववधु अपने प्रीतम के आने पर सुहाग शैया से उतारकर धीरे - धीरे उसकी ओऱ बढ़ रही हो .
वह चलती हुई योगी कि गोद में जाकर बैठ गई और उनकर गले में माला कि तरह अपनी बहे पिरोकर कहने लगी कि आपने मुझे क्यों बुलाया . कोयल कि आवाज भी उस आवाज के सामने फीकी थी . इतना सब देखने के बाद पता नहीं कैसे मेरी सुधबुध जाती रही / मैं कितने समय तक अपने होशोहवास खोये खड़ा रहा इसका कोई पता नहीं .
अचानक मेरे शरीर में पानी की बौछार पड़ी , तो मेरी चेतना लौटी , मैंने आखे फाड़ - फाड़ कर आस पास चारो तरफ देखा , उस साधु के आलावा नवयौवना कन्या का कही भी कोई पता तक नहीं था . मुझे अहसास हो चूका था कि वह अवश्य कोई अप्सरा थी . मैं उस साधना को प्राप्त करने के लिए तत्काल साधु के श्रीचरणों में गिर गया . आप लोगो के लाभार्थ मैं उसी अप्सरा कि अर्थात उर्वशी अप्सरा कि साधना बताने जा रहा हूँ ,
यह साधना मात्र २१ दिन कि हैं , साधक यदि पूर्ण विस्वाश के साथ एकाग्रचित होकर करे तो पहली बार में ही सफलता मिल जाती हैं .
इस साधना के लिए एकांत कमरे का चयन कीजिए . सामने सफ़ेद वस्त्र बिछाकर पीले चावल से निम्न यन्त्र का निर्माण करे , तत्पश्चात शुद्ध होकर सुगन्धित वस्त्र धारण कर गुलाब का इत्र लगाकर मखमल के आसन मैं उत्तर दिशा की ओऱ मुखकर सिंहासन पर बैठे . यन्त्र का पंचोपकर पूजन कर गुलाब के इत्र को पूरे कमरे में छिड़के . अपने चरोतरफ सुगंध का वातावरण बनाये रखे . गुरु , गणपति का ध्यान कर स्टफिक मणिमाला से निम्न मंत्र का ५१ माला जप करे . याद रहे यह साधना अर्धरात्रि मैं ही करनी हैं किसी भी माह के शुक्रवार को प्रारम्भ किया जाता हैं . वैसे चंद्रग्रहण इस साधना के लिए अभीष्ट फलदायी होता हैं . जप पूर्ण होने पर वही सो जाये . दूसरे दिन निर्धारित समय पर पुनः यही क्रिया को दोहराये . साधना काल तक घी का दीपक जलाकर रखे .कुछ दिन की साधना के पश्चात कुछ अनुभव होना शुरू हो जाता हैं . अचानक पूरे कमरे में गुलाब की खुशबु गुलाबी फ़ैल जाती हैं . साथ ही साथ घुँगरू की आवाज सुनाई देती हैं ,. माला पूर्ण किये बिना ध्यान विचलित नहीं करना हैं .
अंतिम दिन साधना शुरू करने से पहले गुलाब पुष्प की माला तैयार रखे . दस - ग्यारह माला फेरने के बाद अप्सरा गोद में आकर बैठ जाती हैं , साथ ही ध्यान विचलित करने के लिए शरारत करनी शुरू कर देती हैं , याद रहे साधक उसकी तरह बिलकुल ही ध्यान न दे . कठोरता से ब्रम्हचर्य का पालन करे .
माला पूर्ण होने के पश्चात गुलाब पुष्प की माला को उठाकर उसके गले में पहना दे . तब उर्वशी लता की भांति आप से लिपट जाएगी और अपने गले से मोती का माला उतारकर आप के गले में पहना देगी , और कहेगी - हे प्रियतम आज से मैं तुम्हारे वश में हूँ , . तुम मुझे जब भी जहा भी याद करोगे मैं उपस्थित होकर तुम्हारा मनोवांछित कार्य पूर्ण करुँगी . इतना कहकर वह अदृश्य हो जायेगी . और फिर आप जब भी निम्न मंत्र का मात्र सात बार मन ही मन उच्चारण करेंगे , तब तब उर्वशी अप्सरा उपस्थित होगी .
सामग्री – प्राण प्रतिष्ठित उर्वशीत्कीलन यंत्र, उर्वशी माला, सौंदर्य गुटिका तथा साफल्य मुद्रिका |
किसी भी शुक्रवार से प्रारम्भ किया जा सकता है। यह रात्रिकालीं साधना है। स्नान आदि कर पीले आसन पर उत्तर की ओर मुंह कर बैठ जाएं। सामने पीले वस्त्र पर 'उर्वशी यंत्र' (ताबीज) स्थापित कर दें तथा सामने पांच गुलाब के पुष्प रख दें। फिर पांच घी के दीपक लगा दें और अगरबत्ती प्रज्वलित कर दें।
॥ ॐ उर्वशी प्रिय वशं करी हुं ॥
इस मंत्र के नीचे केसर से अपना नाम अंकित करें। फिर उर्वशी माला से निम्न मंत्र की 51 माला जप करें -
मंत्र
॥ ॐ ह्रीं उर्वशी अप्सराय आगच्छागच्छ स्वाहा ॥
यह मात्र 21 दिन की साधना है और प्रति दिन 51 माला जाप करना हैं . और 21 दिन अत्यधिक सुंदर वस्त्र पहिन यौवन भार से दबी हुई उर्वशी प्रत्यक्ष उपस्थित होकर साधक के कानों में गुंजरित करती है कि जीवन भर आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसका पालन करूंगी।
तब पहले से ही लाया हुआ गुलाब के पुष्पों वाला हार अपने सामने मानसिक रूप से प्रेम भाव उर्वशी के सम्मुख रख देना चाहिए। इस प्रकार यह साधना सिद्ध हो जाती है और बाद में जब कभी उपरोक्त मंत्र का तीन बार उच्चारण किया जाता है तो वह प्रत्यक्ष उपस्थित होती है तथा साधक जैसे आज्ञा देता है वह पूरा करती है।
साधना समाप्त होने पर 'उर्वशी यंत्र (ताबीज)' को धागे में पिरोकर अपने गलें में धारण कर लेना चाहिए। सोनवल्ली को पीले कपड़े में लपेट कर घर में किसी स्थान पर रख देना चाहिए, इससे उर्वशी जीवन भर वश में बनी रहती है।

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Tuesday, May 19, 2015

ये हैं बगलामुखी देवी के दुर्लभ मंत्र
ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम: इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे...
मधु. शर्करा युक्त तिलों से होम करने पर मनुष्य वश में होते है।
मधु. घृत तथा शर्करा युक्त लवण से होम करने पर आकर्षण होता है।
तेल युक्त नीम के पत्तों से होम करने पर विद्वेषण होता है।
हरिताल, नमक तथा हल्दी से होम करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।
भय नाशक मंत्र
अगर आप किसी भी व्यक्ति वस्तु परिस्थिति से डरते है और अज्ञात डर सदा आप पर हावी रहता है तो देवी के भय नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए…
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हन
पीले रंग के वस्त्र और हल्दी की गांठें देवी को अर्पित करें।
पुष्प,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें।
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें।
दक्षिण दिशा की और मुख रखें।
पढ़ें : जानिए मां बगलामुखी की कथा
शत्रु नाशक मंत्र
अगर शत्रुओं नें जीना दूभर कर रखा हो, कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्करों से तंग हो गए हों, शत्रु चैन से जीने नहीं दे रहे, प्रतिस्पर्धी आपको परेशान कर रहे हैं तो देवी के शत्रु नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए।
ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु
नारियल काले वस्त्र में लपेट कर बगलामुखी देवी को अर्पित करें
मूर्ती या चित्र के सम्मुख गुगुल की धूनी जलाये
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करे
मंत्र जाप के समय पश्चिम कि ओर मुख रखें
जादू टोना नाशक मंत्र
यदि आपको लगता है कि आप किसी बुरु शक्ति से पीड़ित हैं, नजर जादू टोना या तंत्र मंत्र आपके जीवन में जहर घोल रहा है, आप उन्नति ही नहीं कर पा रहे अथवा भूत प्रेत की बाधा सता रही हो तो देवी के तंत्र बाधा नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए।
ॐ ह्लीं श्रीं ह्लीं पीताम्बरे तंत्र बाधाम नाशय नाशय
आटे के तीन दिये बनाये व देसी घी ड़ाल कर जलाएं।
कपूर से देवी की आरती करें।
रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें।
मंत्र जाप के समय दक्षिण की और मुख रखें।
पढ़ें : कुछ ऐसे करें मां बगलामुखी की आराधना होगा लाभ
प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता का मंत्र
आपने कई बार इंटरव्‍यू या प्रतियोगिताओं को जीतने की कोशिश की होगी और आप सदा पहुँच कर हार जाते हैं, आपको मेहनत के मुताबिक फल नहीं मिलता, किसी क्षेत्र में भी सफल नहीं हो पा रहे, तो देवी के साफल्य मंत्र का जाप करें
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं बगामुखी देव्यै ह्लीं साफल्यं देहि देहि स्वाहा:
बेसन का हलवा प्रसाद रूप में बना कर चढ़ाएं।
देवी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख एक अखंड दीपक जला कर रखें।
रुद्राक्ष की माला से 8 माला का मंत्र जप करें।
मंत्र जाप के समय पूर्व की और मुख रखें।
बच्चों की रक्षा का मंत्र
यदि आप बच्चों की सुरक्षा को ले कर सदा चिंतित रहते हैं, बच्चों को रोगों से, दुर्घटनाओं से, ग्रह दशा से और बुरी संगत से बचाना चाहते हैं तो देवी के रक्षा मंत्र का जाप करना चाहिए।
ॐ हं ह्लीं बगलामुखी देव्यै कुमारं रक्ष रक्ष
देवी माँ को मीठी रोटी का भोग लगायें।
दो नारियल देवी माँ को अर्पित करें।
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें।
मंत्र जाप के समय पश्चिम की ओर मुख रखें।
लम्बी आयु का मंत्र
यदि आपकी कुंडली कहती है कि अकाल मृत्यु का योग है, या आप सदा बीमार ही रहते हों, अपनी आयु को ले कर परेशान हों तो देवी के ब्रह्म विद्या मंत्र का जाप करना चाहिए…
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं ब्रह्मविद्या स्वरूपिणी स्वाहा:
पीले कपडे व भोजन सामग्री आता दाल चावल आदि का दान करें।
मजदूरों, साधुओं,ब्राह्मणों व गरीबों को भोजन खिलायें।
प्रसाद पूरे परिवार में बाँटे।
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें।
मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें।
बल प्रदाता मंत्र
यदि आप बलशाली बनने के इच्छुक हो अर्थात चाहे देहिक रूप से, या सामाजिक या राजनैतिक रूप से या फिर आर्थिक रूप से बल प्राप्त करना चाहते हैं तो देवी के बल प्रदाता मंत्र का जाप करना चाहिए…
ॐ हुं हां ह्लीं देव्यै शौर्यं प्रयच्छ
पक्षियों को व मीन अर्थात मछलियों को भोजन देने से देवी प्रसन्न होती है
पुष्प सुगंधी हल्दी केसर चन्दन मिला पीला जल देवी को को अर्पित करना चाहिए
पीले कम्बल के आसन पर इस मंत्र को जपें.
रुद्राक्ष की माला से 7 माला मंत्र जप करें
मंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखें
सुरक्षा कवच का मंत्र
प्रतिदिन प्रस्तुत मंत्र का जाप करने से आपकी सब ओर रक्षा होती है, त्रिलोकी में कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता ।
ॐ हां हां हां ह्लीं बज्र कवचाय हुम
देवी माँ को पान मिठाई फल सहित पञ्च मेवा अर्पित करें
छोटी छोटी कन्याओं को प्रसाद व दक्षिणा दे
रुद्राक्ष की माला से 1 माला का मंत्र जप करें
मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें
ये स्तम्भन की देवी भी हैं। कहा जाता है कि सारे ब्रह्मांड की शक्ति मिलकर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रु नाश, वाक सिद्धि, वाद-विवाद में विजय के लिए देवी बगलामुखी की उपासना की जाती है।
बगलामुखी देवी को प्रसन्न करने के लिए 36 अक्षरों का बगलामुखी महामंत्र
‘ऊं हल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिहवां कीलय बुद्धिं विनाशय हल्रीं ऊं स्वाहा’ का जप करें। हल्दी की माला पर करना चाहिए।
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माँ बगलामुखी का प्रभावशाली मंत्र





माँ बगलामुखी का माहात्म्य
प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। 1. काली 2. तारा 3. षोड़षी 4. भुवनेश्वरी 5. छिन्नमस्ता 6. त्रिपुर भैरवी 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातंगी 10. कमला। माँ भगवती श्री बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है।
माँ बगलामुखी यंत्र मुकदमों में सफलता तथा सभी प्रकार की उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कहते हैं इस यंत्र में इतनी क्षमता है कि यह भयंकर तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है।
माहात्म्य- सतयुग में एक समय भीषण तूफान उठा। इसके परिणामों से चिंतित हो भगवान विष्णु ने तप करने की ठानी। उन्होंने सौराष्‍ट्र प्रदेश में हरिद्रा नामक सरोवर के किनारे कठोर तप किया। इसी तप के फलस्वरूप सरोवर में से भगवती बगलामुखी का अवतरण हुआ। हरिद्रा यानी हल्दी होता है। अत: माँ बगलामुखी के वस्त्र एवं पूजन सामग्री सभी पीले रंग के होते हैं। बगलामुखी मंत्र के जप के लिए भी हल्दी की माला का प्रयोग होता है।
साधनाकाल की सावधानियाँ
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- पीले वस्त्र धारण करें।
- एक समय भोजन करें।
- बाल नहीं कटवाए।
- मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें।
- दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें।
- साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्‍ठ फलदायी होता है।
- साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए।
मंत्र- सिद्ध करने की विधि
- साधना में जरूरी श्री बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है।
- अगर सक्षम हो तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करवाए।
- बगलामुखी यंत्र एवं इसकी संपूर्ण साधना यहाँ देना संभव नहीं है। किंतु आवश्‍यक मंत्र को संक्षिप्त में दिया जा रहा है ताकि जब साधक मंत्र संपन्न करें तब उसे सुविधा रहे।
प्रभावशाली मंत्र माँ बगलामुखी
विनियोग -
अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।
आवाहन
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
ध्यान
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।
मंत्र
ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां
वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय
बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा।
इन छत्तीस अक्षरों वाले मंत्र में अद्‍भुत प्रभाव है। इसको एक लाख जाप द्वारा सिद्ध किया जाता है। अधिक सिद्धि हेतु पाँच लाख जप भी किए जा सकते हैं। जप की संपूर्णता के पश्चात् दशांश यज्ञ एवं दशांश तर्पण भी आवश्यक है।
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Monday, May 18, 2015

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