Wednesday, October 21, 2020

राहु से बनने वाले कुछ योग


 







*राहु से बनने वाले कुछ योग-*


*आज का विषय बहुत ही अच्छा रखा है अच्छा तो हर रोज होता है हर रोज ही महत्वपूर्ण होता है। आज हम बात करते हैं राहु से बनने वाले योगों से लोगों के बारे में ऊपर हमारे विद्वानों ने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है तो मैं भी एक थोड़ा सा और छोटा सा विश्लेषण दे रहा हूं।


 सबसे पहले मुख्य बात है राहु एक पाप ग्रह है और वह जिस स्थान में बैठता है वहां की कुछ ना कुछ हानि जरूर करता है लेकिन वह शुभ ग्रहों के साथ या शुभ राशि में या मित्र राशि में वह बैठता है तो अच्छा फल देता है।


 सिर्फ एक कुंडली से ही पता नहीं चलता उसे नवमांश दशांश गोचर दशा महादशा अंतर्दशा यह सभी देखकर ही सब कुछ पता लगाया जा सकता है कि यह कैसा फल देगा फिर भी कुछ योग बनते हैं।


 जैसे कपट योग, क्रोध योग,अष्ट लक्ष्मी योग, पिशाच बाधा योग, चांडाल योग, अंगारक योग, ग्रहण योग, सर्प शाप योग, परिभाषा योग, अरिष्ट भंग योग, लग्न कारक योग, पायालु योग, और राहु शनि की युति के योग इस तरह से कुछ लोग हैं और भी कई योग हैं।*


*1- कपट योग- 


जब कुंडली के चौथे घर में शनि हो और राहु 12 वे घर में हो तो कपट योग होता है इस योग के कारण कथनी और करनी में अंतर होता है।*


*2-क्रोध योग- 


सूर्य बुध या शुक्र के साथ राहु लग्न में हो तो क्रोध योग होता है। जिसके कारण जातक को लड़ाई झगड़ा,वाद विवाद के परिणाम स्वरूप हानि और दुख उठाना पड़ता है।*


*3- अष्टलक्ष्मी योग- 


जब राहु षष्ठम में और गुरु केंद्र (दशम) मैं हो तो अष्टलक्ष्मी योग होता है। इस योग के कारण व्यक्ति शांति के साथ यशस्वी जीवन जीता है।*


*4- पिशाच बाधा योग-


 चंद्र के साथ राहु लग्न में हो तो पिशाच बाधा योग होता है इस योग के कारण पिशाच बाधा की तकलीफ सहनी पड़ती है और व्यक्ति निराशावादी अपने को घात पहुंचाने की कोशिश करता है।*


*5- मेष कर्क तुला मकर लग्न में अगर चंद्र राहु की युति केंद्र में हो तो शुभ फलदायक होता है ।अगर त्रिकोण (5,9) का स्वामी चंद्र हो उन्हें मैं चंद्र राहु की युति हो तो शुभ फल देती है। अन्य भागों में चंद्र राहु की युति होने से भयंकर आरोपों के द्वारा उत्पन्न मुकदमा वाजी का सामना करना पड़ता है तथा अनेक प्रकार का दुख भोगना पड़ता है।*


*6- चांडाल योग- 


गुरु के साथ राहु की युति होने से चांडाल योग बनता है इस योग के प्रभाव से नास्तिक और पाखंडी होता है लेकिन इसमें अंशौ को देखना बहुत जरूरी है।*


*7- परिभाषा योग- 


लग्न में या 3,6,11 मैं से किसी भी स्थान में राहु हो तो परिभाषा योग होता है इस राहु पर शुभ ग्रह की दृष्टि से यह शुभ फलदायक होता है।*


*8- अरिष्ट भंग योग- 


मेष, वृष, कर्क इन तीनों राशियों में से कोई लग्न हो और राहु 9,10,11 में हो तो अरिष्ट भंग होता है और यह शुभ फलदायक होता है।*


*9- लग्न कारक योग- 


मेष वृष या कर्क लग्न हो और 2,9,10 इन स्थानों को छोड़कर अन्य किसी स्थान में राहु हो तो लगन कारक होता है। यह योग सर्वरिष्ट निवारक होता है।*


*10- पायालू योग- 


जब राहु और लग्नेश दोनों दशम भाव में हो तो जातक मां के गर्भ से पैरों की तरफ से जन्म लेता है इसे पायालु कहते हैं।*


*11- अंगारक योग- 


राहु और मंगल की युति हो तो उसे अंगारक योग कहते हैं जिसमें व्यक्ति को हानि उठानी पड़ती है और सबसे पहले यह देखना होता है कि वह किस भाव में है शुभ है या अशुभ।*


*12- राहु शनि युति योग- 


शनि राहु की युति लग्न में हो तो सेहत ठीक नहीं रहती व्यक्ति हमेशा बीमार रहता है। चतुर्थ स्थान में होने से माता को कष्ट होता है पंचम में होने से संतति के लिए कष्ट होता है सप्तम में पति पत्नी के लिए कष्ट होता है नवम में पिता के लिए कष्ट होता है दशम में व्यापार एवं प्रतिष्ठा की हानि होती है परंतु यदि गुरु की दृष्टि हो तो प्रभाव में कमी आ जाती है।*


और अधिक जानकारी समाधान उपाय विधि प्रयोग या ओरिजिनल रत्न की जानकारी या रत्न प्राप्ति के लिए या कुंडली विश्लेषण कुंडली बनवाने के लिए संपर्क करें


जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की


  परामर्श      दक्षिणा  -  201  मात्र .


Pytam नम्बर -  9958417249


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》


तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान


महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट


(रजि.)


किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :


मोबाइल नं. : - 09958417249


                   


व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

Tuesday, October 20, 2020

जन्मपत्री


 





जन्मपत्री मे गृह दशा व हाथो की रेखा अच्छी होने पर भी कुछ व्यक्ति असहाय होकर कुछ कर नहीं पाते है व दिन प्रतिदिन आर्थिक, मानसिक, शारीरिक, घरेलू परेशानी बढ़ती जाती है. 


ऐसा व्यक्ति का किसी भी कारण से नजर दोष तंत्र मंत्र ऊपरी हवा के प्रभाव मे आने से होता है. जब व्यक्ति तांत्रिक प्रभाव मे होता है तो उसे कुछ शारीरिक परेशानी होती है. जैसे.....


शरीर पर बिना चोट के नीले निशान होना 

सिर के पीछे वाले भाग मे दर्द रहना 

रात्रि मे बुरे / गंदे सपने दिखाई देना

व्यक्ति को गन्दा रहना अच्छा लगना 

बिना किसी कारण के घबराहट रहना

अपने आपसे खुद बात करना 


ज्योतिष उपाय...


ऐसे व्यक्तिओ को रामचरितमानस की चौपाई " मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।" का रोज जाप व एक सुलमानी हकीक रत्न धारण करना चाहिए.    


नोट : 


कुछ व्यक्ति तंत्र मंत्र प्रभाव को ढोंग समझते है, ऐसे व्यक्ति पीपल के पेड़ की छाँव मे रात्रि के समय पेशाब या लघु शंका करे, उन्हे तंत्र मंत्र का प्रभाव महसूस हो जाएगा.    


जन्मपत्री - 


हस्तरेखा सलाह व नजर दोष रत्न सुलेमानी हकीक कीमत  550/ -  वजन 11 रत्ती अपने घर पर डाक से मंगवाने के लिए, हमे फ़ोन करे. .


और अधिक जानकारी समाधान उपाय विधि प्रयोग या ओरिजिनल रत्न की जानकारी या रत्न प्राप्ति के लिए या कुंडली विश्लेषण कुंडली बनवाने के लिए संपर्क करें


जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की


  परामर्श      दक्षिणा  -  251  मात्र .


Pytam नम्बर -  9958417249


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》


तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान


महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट


(रजि.)


किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :


मोबाइल नं. : - 09958417249


                   


व्हाट्सप्प न०;- 9958417249


सम्भोग सुख वशीकरण






सम्भोग सुख वशीकरण

ऐं सहवल्लरी क्लीं कर क्लीं कर पिसाच
अमुकीं काम ग्राहा, स्वपने मम रूपे नखै
विदारय विदारय, द्रावय, द्रावय रद महेन
बन्धय बन्धय श्रीं फट्

विधि : मध्य रात्रि के समय सारे कपडे उतार कर, उत्तर दिशा कि तरफ मुख कर के इस मंत्र का पाठ करना है।  जप करते समय अमुकी के स्थान पर अभिलाषित लड़की और स्त्री का नाम लें। 

ध्यान रखें: इस जप को जपते समय आपको अपने आप को पूर्ण रूप से कामुक कर लेना है तभी ये सफल होगा।  इस क्रिया से आपको जल्दी ही मनचाही स्त्री प्राप्त होगी। 

अवधि : इस को कुल 21 दिनों तक करना है।  और सूर्यादय से पहले ये करना है।  प्रतिदिन 3 माला  जपना  है।  सफलता आपके हाथ में होगी। 

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

मोबाइल नं. : - 09958417249

                   

व्हाट्सप्प न०;- 9958417249



 

Sunday, October 18, 2020

यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, तो अपना नाम बदलकर उन्नति पा सकते है आइये जानते है केसे -


 




यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, तो अपना नाम बदलकर उन्नति पा सकते है आइये जानते है केसे -


====================================================


यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, आप अपने व्यवसाय में निरंतर नुकसान में चल रहे है या आप अपने नाम से उन्नति या प्रसिद्धि नहीं पा रहे हैं तो अपना नाम बदलकर उन्नति पा सकते हैं। आप अपने व्यावसायिक नाम में मामूली हेर-फेर कर अपने व्यापार को प्रगति की ओर अग्रसर कर सकते हैं और यश-प्रतिष्ठा के भागी बन सकते हैं।


अंक ज्योतिष द्वारा आप किस प्रकार लाभ पाएँ, इसकी जानकारी यहाँ प्रस्तुत आलेख में पाएँगे। यहाँ पर में एक चार्ट दे रही हूँ -अँग्रेजी वर्णमाला जैसे ए से लेकर झेड तक के अक्षरों के अलग-अलग अंक निर्धारित हैं, आप अपने नाम को इस वर्णमाला में देखकर अंक जोड़ें। यदि नामांक प्रतिकूल हो तब नाम में थोड़ा हेर-फेर कर उसे अनुकूल बनाया जा सकता है।


उपरोक्त चार्ट अनुसार अँग्रेजी वर्णमाला ए से झेड के अंक दिए गए हैं। हम अंक विद्या से निम्न प्रश्नों के उत्तर जान सकते हैं।


* वर्तमान में जो नाम है, वह मेरे व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने में सहायक है या नहीं?


* क्या मैं अपना नाम परिवर्तन कर अनुकूल बना सकता हूँ?


* मेरे नाम का योगफल मेरी जन्मतिथि से अनुकूल है या नहीं?


* मैं जिस शहर में रह रहा हूँ, वह मेरे नाम के अनुकूल है या नहीं?


* मेरे पति या मेरी पत्नी का नाम के अंकों अनुसार अनुकूल है या नहीं?


* मेरे और मेरे साझेदार के नाम में मित्रता है या नहीं?


* मेरे से संबंधित व्यापार-व्यवसाय या जिस संस्था में कार्य कर रहा हूँ, अनुकूल है या नहीं?


* मेरे पुत्र या मेरी कन्या का नामांक उसकी जन्म तारीख से संबंधित है या नहीं?


* मेरी संतान के नामांक मेरे नामांक से संबंधित हैं या नहीं?


* मेरे मित्र से मेरा नामांक मिलता है या नहीं?


इस प्रकार के अनेक सवालों का जवाब हमें मिल सकता है, बस थोड़ा-सा गणित करना भर रहता है। हम यहाँ पर कुछ उदाहरण देकर समझाएँगे, जिसकी सहायता से आप अपने नामांक को सुधार सकते हैं एवं उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर पा सकते हैं। 


जैसे किसी का नाम राजेन्द्रकुमार वर्मा है तो इस प्रकार जानेंगे।


इस प्रकार उपरोक्त नाम का टोटल अंक 50 आया, जो मध्यम फल दर्शाता है।


 यदि ये अपना नाम सिर्फ राजेंद्रकुमार लिखेंगे तो टोटल अंक 36 आएगा, जो इनके लिए उत्तम साबित होगा।


 इसी प्रकार एम.एस. पंवार को लें तो...टोटल अंक 30 आया जो पूर्णता का है, ऐसे जातक ऊँचाइयों पर जाते हैं।


 इसी प्रकार किसी भी संस्था का नाम या मित्र आदि को देखकर जान सकते है कि यह अपने लिए लाभकारी रहेंगे या मध्यम या फिर नहीं। 


इसके लिए हम यहाँ पर अंकों के हिसाब से उत्तम, मध्यम व अशुभ अंक में लिखेंगे।


व्यक्ति का एक और अंक होता है जिसे सौभाग्य अंक (Destiny Number/ Lucky Number) कहते हैं.


 यह नम्बर परिवर्तनशील है. व्यक्ति के नाम के अक्षरो के कुल योग से बनने वाले अंक को सौभाग्य अंक कहा जाता है, जैसे कि मान लो किसी व्यक्ति का नाम RAMAN है, तो उसका सौभाग्य अंक R=2, A=1, M=4, A=1, एंव N=5 = 2+1+4+1+5 =13 =1+3 =4 होगा. 


यदि किसी व्यक्ति का सौभाग्य अंक उसके अनुकूल नही है तो उसके नाम के अंको में घटा जोड करके सौभाग्य अंक (Saubhagya Anka) को परिवर्तित कर सकते हैं, जिससे कि वह उस व्यक्ति के अनुकूल हो सके.


 सौभाग्य अंक का सीधा सम्बन्ध मूलांक से होता है. व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव मूलांक का होता है. 


चूंकि मूलांक स्थिर अंक होता है तो वह व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को दर्शाता है तथा मूलांक का तालमेल ही सौभाग्य अंक से बनाया जाता है.


निम्‍नानुसार जो उत्तम है, वो उत्तम सहायक व उन्नतिदायक प्रसिद्धि के अंक हैं। मध्यम अंक मिली-जुली स्थिति वाले अंक हैं एवं अशुभ वाले अंक यदि आपके जोड़ में आते हों तो फेरबदल कर उत्तम लाभ पा सकते हैं।


और अधिक जानकारी समाधान उपाय विधि प्रयोग या ओरिजिनल रत्न की जानकारी या रत्न प्राप्ति के लिए या कुंडली विश्लेषण कुंडली बनवाने के लिए संपर्क करें


जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की


  परामर्श      दक्षिणा  -  251  मात्र .


Pytam नम्बर -  9958417249


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》


तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान


महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट


(रजि.)


किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :


मोबाइल नं. : - 09958417249


                   


व्हाट्सप्प न०;- 9958417249


योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है



 





योनि मुद्रा (ज्योति मुदा)-योनि का अर्थ है


-अधिष्ठान(निवास स्थान)।यही वह अधिष्ठान है जहाँ योगी स्थिर हो कर आदि शक्ति में लीन होता है।आदि शक्ति,ललिताम्बा,त्रिपुरसुंदरी यहाँ अधिष्ठात्री हैं।

"योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिपुराम्बा त्रिकोणगा"


कतिपय साधकों के अनुसार,लाहिड़ी महाशय कहते थे कि योनि मुद्रा का अभ्यास रात्रि में ही करना चाहिए।परंतु इसे सत्य नही माना जा सकता।योनि मुद्रा ध्यान की अवस्था में एक विशिष्ठ सोपान है तथा क्रिया के अभ्यास के पहले तथा बाद में भी माता की कृपा होती है।


योनि मुद्रा एक स्वयम्भू मुद्रा है तथा इस मुद्रा के संदर्भ में,यद्यपि साधक को अभ्यास करना होता है,अभ्यास शब्द उचित प्रतीत नही होता।यही बात महा मुद्रा तथा खेचरी मुद्रा के संदर्भ में भी सत्य है।ये मुद्राएं योगी की उन्नत क्रमविकास की पराकाष्टा की ओर संकेत करती हैं।अंतः अभ्यास शब्द के स्थान पर मै "प्रणाम" शब्द का प्रयोग करता हूँ।


आज्ञा चक्र के माध्यम से भ्रूमध्य में योनि(त्रिकोण) का दर्शन माता की कृपा से ही सम्भव होता है।वर्षों की साधना के बाद ही योगी पात्र हो पाता है।योगी को कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं।


विधि-


1-आरम्भ में खेचरी मुद्रा के बिना भी योनि मुद्रा को प्रणाम कर सकते हैं।


2-आँखे तथा मुख बन्द कर क्रिया प्राणायाम की तरह ही प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर खींचना शरू करें तथा बिंदु(मेडुला) तक ले कर आएं।


साथ ही अपने दोनों हाथों की कुहनियों को ऊपर उठाते हुए अँगुलियों को चेहरे के समीप लाएं।यहाँ उद्देश्य है कि हमारी आँखे,मुख, कान तथा नासिकॉ छिद्र अँगुलियों द्वारा पूर्ण रूपेण बन्द किये जाएं।


लेखकों ने नियम भी बना दिए हैं,जैसे कानों को अंगूठों से,होठों को अनामिका से इत्यादि।


मेरा सुझाव है कि आप अपनी सुविधा से अँगुलियों का प्रयोग करें।कालांतर में नासिका छिद्र एवम् होठों के लिए अँगुलियों के प्रयोग की आवश्यकता ही नही पड़ती।संक्षेप में,समस्त द्वार जहाँ से ऊर्जा बाहर जा सकती है,बन्द होने चाहिए।


ध्यान रहे,नासिका छिद्र बन्द करने के पूर्व आपका ऊर्जा आरोहण(inhalation) पूर्ण हो जाना चाहिए।


3-ऊर्जा का आरोहण पूर्ण है;समस्त द्वार बन्द हैं,ऊर्जा मस्तक में घनीभूत है तथा इन्द्रिय संयम का प्रकाश रुपी ओज भ्रूमध्य की ओर जा रहा है।


इस अवस्था में ऊर्जा स्वतः भ्रूमध्य की ओर गमन करेगी।कुछ ही क्षणों में साधक को प्रकाशमयी अखण्ड मंडल के दर्शन होंगे।साधक तब तक उस अवस्था में स्थिर रहे जहाँ तक वह सहज हो।श्वास को रोके रखना है तब तक कि साधक सहज रह सके।कूटस्थ के दर्शन की अवस्था में भ्रूमध्य में ॐ का जप करें।


4-अब साधक को श्वास(प्राण ऊर्जा) छोड़नी है(क्रिया प्राणायाम की तरह मूलाधार तक)।


यह एक प्रणाम हुआ।ऐसे तीन प्रणाम करें।प्रत्येक प्रणाम के पश्चात् साधक अपने हाथों को यथास्थान रख सकता है तथा उन्हें वापस भी ला सकता है।यथास्थान ही रखना श्रेयस्कर होगा जिससे संचित ऊर्जा बाहर न जा सके एवम् साधक अंतर्मुखी बना रहे।


अतः आप योनि मुद्रा में भी तीन क्रिया प्राणायाम करते हैं।


जैसा मैंने कहा कि ये मुद्राएं स्वयम्भू हैं।अतः साधक की अनुभूति जो कुछ भी लिखा गया है,उसकी तुलना में अलग एवम् अद्वितीय हो सकती है।कुछ साधकों को ॐ का नाद भी सुनाई पड़ता है।


प्रणाम के पश्चात् भी कूटस्थ ज्योति ललाट में मंडराती हैं।साधक को पूर्ण निष्ठा के साथ ज्योति को प्रणाम कर अगाध शांति में डूबे रहना चाहिए।यह शांति ध्यान आसन से उठने के बाद भी साधक के हर क्रिया कलाप में परिलक्षित होती है।


दक्षिणा शुल्क 1500 रू +डाक व्यय


चेतावनी -


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।


 


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


राजगुरु जी


तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान


महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट


(रजि.)


.

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :


मोबाइल नं. : - 08601454449


                    


व्हाट्सप्प न०;- 8601454449

 

Saturday, October 17, 2020

सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना विधि

 






सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना विधि 



सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना विधि ,सुर सुन्दरी यक्षिणी साधना मंत्र और अनुभव के बारे मे हम यहां पर बात करेंगे । दोस्तों सुर सुंदरी भी एक यक्षिणी  होती है।हालांकि इनके बारे मे हमको ज्यादा जानकारी नहीं है कि यह किस प्रकार से काम करती हैं। लेकिन जहां तक जानकारी है कि इस ब्रह्रामांड के अंदर अनेक प्रकार के लोक और लोकांतर हैं। लेकिन वहां पर भौतिक देहधारी प्राणी नहीं रहते हैं। ‌‌‌वरन वहां पर कुछ ऐसे प्राणी रहते हैं जिनकी कोई भौतिक देह नहीं होती है। यानी वे सूक्ष्म शरीर के अंदर होते हैं।

सुरसुन्दरी यक्षिणी भी यक्षिणी का एक प्रकार है जो अभौतिक देह के अंदर रहती है। माना जाता है कि यक्ष का लोक धरती के सबसे निकट है और यक्ष के पास काफी अधिक शक्तियां होती हैं।

सुरसुन्दरी यक्षिणी कौन होती है ? 

सुरसुन्दरी यक्षिणी के बारे मे अधिक जानकारी नहीं है लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह सबसे सुंदर स्त्री होती है। संभव है आपको  वैसी स्त्री कहीं पर भी ना मिले ।सुरसुन्दरी यक्षिणी के दर्शन यदि आप कर लेते हैं तो यह आपके लिए सौभाग्य की बात होगी और इसकी सुंदरता के बारे ‌‌‌वे ही अधिक बता सकते हैं जिन्होंने यह साधना की होगी ।लेकिन इतना माना जाता है कि यह सुंदरता मे सबसे अच्छी होती है।

 आपको बतादें कि यह भौतिक सुंदरता नहीं होती है। क्योंकि यक्षिणी का कोई ‌‌‌सुंदरता की वजह से ही इसको सुरसुन्दरी यक्षिणी कहा गया है। भौतिक शरीर नहीं होता है। इनका शरीर अपंचिक्रत होता है। सुरसुन्दरी यक्षिणी आदि के बारे मे सम्पूर्ण रहस्य को बताया नहीं गया है। और बताया गया है तो संभव है वह विलुप्त हो चुका हो । कुछ योगी ही अब बचे हैं जो इसके रहस्य को अच्छे से जानते हैं।

सुरसुन्दरी यक्षिणी की साधना किस रूप मे की जा सकती है ?

दोस्तों सुरसुंदरी यक्षिणी की साधना आप माता ,बहन या प्रेमिका के रूप मे कर सकते हैं लेकिन कहा जाता है कि आप इसको एक प्रेमिका के जैसे उपयोग कर सकते हैं यह आपको एक रियल स्त्री के अनुभव दिला सकती है लेकिन इस प्रयोग के अंदर भोग का कोई ‌‌‌स्थान नहीं होता है। कुछ साधक सोचते हैं कि वे यक्षिणी को सिद्व करके उनके साथ भोग कर सकते हैं तो यह उनकी गलत फैमी है।

सुरसुन्दरी यक्षिणी की साधना यदि आप प्रेमिका के रूप मे करें तो अधिक अच्छा होगा ।ऐसा माना जाता है कि यह एक रियल प्रेमिका के जैसा व्यवहार कर सकती है या आपकी मन की बात को पढ़ सकती है और आप इससे बात भी कर सकते हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि आप इसको कहीं पर भी बुला सकते हैं।

‌‌‌सुना जाता है कि कि सुरसुंदरी को पत्नी के रूप मे कभी भी सिद्व नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि वह किसी दूसरी स्त्री को स्पर्श करता है तो साधक की मौत हो जाती है। हालांकि इसकी सही जानकारी कोई योग्य गुरू ही बता सकते हैं। ‌‌‌सबसे अच्छी बात है कि आप उसे एक मित्र की तरह सिद्व कर सकते हैं । यह सबसे अच्छा तरीका है।

‌‌‌सुर सुंदरी यक्षिणी साधना करने का तरीका

‌‌‌दोस्तों आपको कोई भी साधना यहां पर देखकर नहीं करनी चाहिए ।यहां पर हम जो तरीका बता रहे हैं वह मात्र जानकारी है। कुछ लोग किताबों से पढ़कर यक्षिणी साधना करने बैठ जाते हैं तो अंत मे उनको नुकसान होता है। ‌‌‌यह साधना रात को 10 से 12 बजे के बीच आरम्भ करनी होती है।हालांकि अलग अलग गुरूओं के अलग अलग नियम हो सकते हैं। उसके बाद माला स्फटिक की लेनी होती है। यह पूरी तरह से सिद्व होनी चाहिए ।

‌‌‌आपको स्नान करके गुलाबी और लाल वस्त्र पहनने होंगे ।और गुलाब का इत्र लगाएं और लाल रंग के आसन पर बैठना होगा ।अपने सामने एक चोकी लगाएं और लाल और गुलाबी कपड़ा बिछाएं ।उसके बाद उसके उपर सुरसुंदरी की फोटो रखें और चमेली का दीपक जलाएं ।
भोग मे दुध से वनी मिठाई और ड्राई फ्रूट रखे एक प्याले मे शराब रखे सुगन्धित धुप जलाये और चारो तरफ ईत्र छिड़के फिर एक माला गणेशजी के मन्त्र की करे

 ॐ गं गणपतये नमः। 

उसके बाद
‌‌‌उसके बाद एक माला भैरवजी के मंत्र की करें उसके बाद एक माला अपने गुरू मंत्र की करनी होगी ।यह सारी प्रोससे रोज ही करनी होती है। उसके बाद 108 माला रोज सुर सुंदरी यक्षिणी की करनी होगी और उसके बाद यह क्रिया 21 दिन तक करनी होगी ।

ॐ ऐं ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा

22 वे दिन हवन करे 1008 आहुतियां दे हवन शुद्ध घी मे चमेली का इत्र और गुलाब की पत्ती मिला कर करना है। और ऐसा करने से सुर सुंदरी प्रसन्न हो जाएगी और आपको दर्शन देगी ।

‌‌‌सुर सुंदरी दर्शन भी देती है ?

जब कोई सुर सुंदरी की साधना को विधि पूर्वक सम्पन्न करता है तो वह साधक को दर्शन भी देती है और ऐसी स्थिति के अंदर सुर सुंदरी को प्रणाम करना चाहिए । वह इस समय पूछे कि आप ने उसे क्यों याद किया तो आप इसके लिए वचन ले सकते हैं। कि आप मेरी सखा बनना स्वीकार कीजिए।

सुर सुंदरी साधना करने के फायदे

जैसा कि दोस्तों हर यक्षिणी साधना के अपने फायदे होती हैं। इसी प्रकार से सुर सुंदरी को  ऐश्वर्य, धन, संपत्ति देने वाली बताया गया है। यदि कोई इसको माता के रूप मे सिद्व करता है तो यह साधक का एक माता की भांति पूरा ख्याल रखती है।‌‌‌इसी प्रकार से यदि कोई सुर सुंदरी को बहन के रूप मे सिद्व करता है तो फिर उसके प्रति उसी प्रकार के भावों को रखना चाहिए । वह एक बहन की तरह साधक के साथ व्यवहार करती है।

सुरसुन्दरी यक्षिणी साधना अनुभव

दोस्तों हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि हम कोई साधक नहीं हैं। बस हम मात्र जानकारी एकत्रित करते हैं। और उसको यहां पर प्रकाशित कर देते हैं। यह मात्र ज्ञान के लिए ही होता है। ‌‌‌कुछ लोग इससे अच्छा मनोरंजन कर लेते हैं।कुछ लोगों के लिए यह काल्पनिक हो सकती है।
‌‌‌मेरा नाम  जगदिश कुमार है । साधना के क्षेत्र मे मेरी रूचि हमेशा से ही रही है। हालांकि मैंने पहले भी कई साधना की थी और उसके अंदर मुझे अच्छी सफलता मिली थी। सुन रखा था कि सुरसुंदरी यक्षिणी काफी सुंदर होती है और यदि कोई उसकी साधना कर लेता है तो उसके रूप का पान किया जा सकता है।

 सुंदरता के बारे ‌‌‌मे बहुत कुछ जाना जा सकता है।खैर मेरे गुरू के पास मैं गया और उनके चरण छूकर बोला ……गुरूजी मैं चाहता हूं कि आप मुझे यक्षिणी सुरसुंदरी की साधना के बारे मे बताएं और उसके करने की आज्ञा प्रदान करें ।

‌‌‌………… मैं चाहता हूं कि तुम इन फालतू की साधनाओं के चक्कर मे ना पड़ो और अपने मोक्ष के बारे मे सोचो और उसी के उपर काम करो ।

………. क्या सुर सुंदरी यक्षिणी साधना बुरी होती है ?
……… नहीं बुरी नहीं होती है यदि आपका मन मैला है तो आप उस शक्ति से वैसी ही आसा रखोगे । हर साधना मे मन ‌‌‌को साफ रखना बहुत ही जरूरी होता है।यदि मन मैला होगा तो बुरी गति होगी । वरना तो भूतों से भी सही काम करवाए जा सकते हैं।वैसे मैंने यह साधना नहीं की है लेकिन विधि बता सकता हूं ।

‌‌‌उसके बाद गुरू ने मुझे इसकी पूरी विधि बताई । जिसका उल्लेख मे यहां पर नहीं कर सकता हूं ।मैंने उस विधि को अपनी एक बुक के अंदर नोट कर लिया था। उसके बाद गुरू का आशीर्वाद लेकर आ गया । गुरू ने बोला था कि कोई भी गलत इच्छा मत करना वरना नष्ट हो जाओगे ।
‌‌‌मुझे बोला गया था कि इस साधना को एकांत के अंदर ही करना है।

 मेरे खेत के अंदर एक मकान था और वहां पर मैं कुछ सामान ले गया और यह साधना 22 दिन की थी। घरवालों को नहीं पता था कि मैं कहां जा रहा हूं । पहले ही दिन आसन लगाया और  ‌‌‌इससे पहले कपड़ों के उपर इत्र लगाया नए कपड़े पहने पूरे कमरे मे इत्र की सुगंध आ रही थी। और आस पास सारी चीजें रखी जो इस साधना के लिए आवश्यक थी। सबसे पहले गणेश की मंत्र की एक माला की और उसके बाद भैरव की और फिर गुरू मंत्र की एक माला की । 

उसके बाद
‌‌‌मैंने यक्षिणी की 108 माला लगभग 5 घंटे के अंदर पूरी करदी थी। हालांकि मैं बड़े आराम से जप रहा था। इस दिन मुझे कुछ भी अनुभव नहीं हुआ हालांकि लगातार 5 घंटे बैठे रहने से सिर थोड़ा भारी हुआ । उसके बाद वहीं पर लैट गया । ‌‌‌इसी प्रकार से होते हुए लगभग 3 दिन और गुजर गए ।

मुझे किसी भी प्रकार का अनुभव नहीं हो रहा था। हालांकि मन मे यह संशय भी था कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो रहा है। उसके बाद 5 दिन मैंने वही प्रक्रिया दौहराई और जैसे ही एक माला जपी मेरे मन के अंदर बैचेनी होने लगी ।

‌‌‌यक्षिणी मन के उपर काफी प्रभाव डाल रही थी।मन के अंदर काफी बेचेनी थी और बार बार मन कह रहा था कि माला जप छोड़दे । लेकिन मुझे पहले ही बताया जा चुका था कि यदि माला जप बीच मे छोड़ दिया तो सुरसुंदरी मौत देगी । ‌‌‌मैं पहले ही कई साधनाओं को कर चुका था तो अनुभव था। उस दिन बड़ी ही बैचेनी के साथ 108 माला को पूरा किया । हालांकि कुछ भी अनुभव नहीं हुआ बस मन बैचेन रहा । माला को पूरा करने मे 5 घंटे से अधिक समय लग गया ।

‌‌‌मैं आपको बतादूं कि मैं दिन के अंदर सुरसुंदरी यक्षिणी साधना मे सोता नहीं था । गुरू ने इसके लिए मना किया था।उसके बाद 6 दिन भी कुछ खास नहीं हुआ । और इसी प्रकार से लगभग 10 दिन बीत गए नोर्मल चीजे ही हुई। उसके बाद 11 वे दिन मैं जैसे ही माला जपने के लिए बैठा । मैंने देखा कि मेरे सामने एक बहुत ‌‌‌ही भयंकर राक्षस आकर खड़ा हो गया है।और उसके एक हाथ के अंदर तलवार है। उसे देखकर मेरा कलेजा सूख रहा था। मुंह के अंदर आवाज भी नहीं निकल रही थी। वह अपनी तेजी से मेरे उपर प्रहार करता है लेकिन मेरा कुछ नहीं हुआ । बाद मे वह अचानक से गायब हो गया ।

‌‌‌इस समय मेरी हालत बहुत खराब थी। और बहुत ही मुश्किल से 100 माला जप की । उसके बाद अगली माला जप करने बैठा तो देखा कि सामने एक विशाल आग का गोला मेरी ओर आ रहा है । और वह जल्दी ही मुझे जलाकर रखा कर देगा । हालांकि मेरी मानसिक एकाग्रता काफी अधिक थी। इसकी ‌‌‌वजह से मैं इस साधना के अंदर टिका रहा । 

यदि कोई दूसरा होता तो वह इस साधना मे टिकना काफी मुश्किल हो जाता ।जब आग का गोला मेरे समीप आया तो वह रूक गया । कुछ देर वह ऐसे ही मेरे पास रहा । मुझे काफी अधिक गर्म लग रही थी। शरदी के मौसम के अंदर भी काफी तपन महसूस कर हरा था।

‌‌‌मैं मंत्र जप करता रहा और वह आग का गोला मेरे सामने वैसे ही स्थिर रहा । जैसे ही मंत्र जप समाप्त हुआ वह चला गया । इस दौरान मेरे शरीर से बहुत अधिक पसीना निकल रहा था।

‌‌‌इस प्रकार से से मुझे अनुभव होते रहे और मे साधना के मार्ग मे आगे बढ़ता रहा ।लगभग इसी तरीके के डरावने अनुभव को झेलते हुए मुझे 19 दिन बीत गए । 19 वे दिन जब माला जप करने के लिए नहाया धोया और इत्र लगाकर बैठा तो 10 माला जपने के बाद अनुभव हुआ जैसे कोई स्त्री मेरे चारो ओर घूम रही है। ‌‌‌और वातावरण के अंदर बहुत अधिक मादक सुगंध आ रही थी। और मन इतना बैचेन हो गया कि इस साधना को छोड़ दिया जाए । मन की बैचेनी काफी तेजी से बढ़ रही थी। और 100 माला जपते जपते मुझे लगा जैसे की कोई स्त्री मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई है।

‌‌‌मैं उसकी सुंगध को महसूस कर सकता था।वाकाई मे उसके जैसी सुंगध कहीं और नहीं थी। इस दिन मुझे किसी प्रकार के डरावने अनुभव नहीं हुए । उसके बाद ‌‌‌20 वा दिन जब माला जप करने बैठा तो एक बहुत ही सुंदर स्त्री जो मेरे पास आई और बैठ गई। इतनी सुंदर की उसकी सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता था। वह मुझसे चिपकी हुई थी और आराम से बैठी थी।

‌‌‌हालांकि इस दिन उसने मुझसे कोई बात नहीं की और मंद मंद मुस्कुराती हुई मंत्रजप करने के बाद चली गई।
अंतिम दिन भी कुछ इसी प्रकार का अनुभव हुआ और उसके बाद जब मैंने हवन वैगरह किया तो वही सुंदर स्त्री मेरे सामने प्रकट हुई और बोली की आपकी साधना से मैं प्रसन्न हुं आपकी क्या सहायता मैं कर सकती हूं।

‌‌‌उसके बाद मैंने उसको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोला ……… कि आप मेरी सखा बनकर रहे और जब भी मैं आपको बुलाउं तभी आप आएं और मेरे साथ वक्त गुजारें ।उसके बाद सुरसुंदरी ने अपना वचन दिया और मेरे पास बैठ गई। मुझे पहली बार एहसास हुआ कि वह बहुत अधिक सुंदर थी। स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर थी।  ‌‌‌इस प्रकार की सुंदर स्त्री को मैंने आज तक घरती के उपर नहीं देखा था।इतनी सुंदर होने की वजह से ही इसको सुर सुंदरी नाम से पुकारा जाता है। वह सिर्फ मानसिक रूप  से मेरे साथ कुछ बात की और उसके बाद चली गई।

‌‌‌सुर सुंदरी यक्षिणी की साधना का अनुभव काफी अच्छा रहा । पहले तो मैं यक्षिणी कोई बार बुलाता था और उसका सहाचर्य प्राप्त करता था लेकिन बाद मे मुझे महसूस होने लगा कि मेरा मन उसकी ओर काफी अधिक आकर्षित हो चुका है। वह अपने रस्ते से भटक सकता है

 तो मैंने उसे बुलाना बंद कर दिया और अपनी जरूरी दूसरी
‌‌‌साधना के बारे मे ध्यान देने लगा ।यह साधना हर कोई नहीं कर सकता है। और करनी भी नहीं चाहिए । जिस इंसान ने मन की एक खास एकाग्रता को विकसित कर लिया है। वही इसके अंदर सफल हो सकता है।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

मोबाइल नं. : - 09958417249

                   

व्हाट्सप्प न०;- 9958417249



मातंगी राजमातंगी साधना

 मातंगी  राजमातंगी  साधना


          


महाविद्याओं में मातंगी महाविद्या नवम् स्थान पर अवस्थित है। एक कथा के अनुसार एक बार मतंग मुनि ने सभी जीवों को वश में करने के उद्देश्य से नाना प्रकार के वृक्षों से परिपूर्ण कदम्ब वन में देवी श्रीविद्या त्रिपुरा की आराधना की। 


मतंग मुनि के कठिन साधना से सन्तुष्ट होकर देवी त्रिपुरसुन्दरी ने अपने नेत्रों से एक श्याम वर्ण की सुन्दर कन्या का रूप धारण किया, जिन्हें राजमातंगिनी कहा गया एवं जो देवी मातंगी का ही एक स्वरूप हैं। यह दक्षिणाम्नाय तथा पश्चिमाम्नाय की देवी हैं। राजमातंगी, सुमुखी, वश्यमातंगी तथा कर्णमातंगी इनके नामान्तर हैं। मातंगी के भैरव का नाम मतंग हैं। ब्रह्मयामल इन्हें मतंग मुनि की कन्या बताता है।


          भगवती मातंगी की साधना करने वाला उत्तम पुरुष शास्त्र, वेद-वेदांग का ज्ञाता, दैवज्ञ, संगीत एवं सर्व विद्याओं से सम्पन्न हो जाता है। इनके मन्त्रों से वशीकरण एवं सम्मोहन कार्यों में शीघ्र सफलता मिलती है। देवताओं से पूजित यह विद्या किसी भी कन्या के विवाह में उत्पन्न दोषों को समाप्त करती है। इस विद्या के प्रभाव से अन्न-धन की वृद्धि, वाक् सिद्धि एवं परम सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवती मातंगी के कई स्वरूपों की उपासना प्रचलित है।


          नारदपंचरात्र के अनुसार कैलाशपति भगवान शिव को चाण्डाल तथा देवी शिवा को ही उच्छिष्ट चाण्डालिनी कहा गया हैं। माँ मातंगी को ही उच्छिष्ट चाण्डालिनी भी कहते हैं, इस रूप में माँ साधक के समस्त शत्रुओ एवं विघ्नों का नाश करती है, फिर साधक के जीवन में ग्रह या अन्य बाधा का कोई असर नहीं होता । 


जिसे संसार में सब ठुकरा देते हैं, जिसे संसार में कहीं पर भी आसरा नहीं मिलता, उसे माँ उच्छिष्ट चाण्डालिनी अपनाती है और साधक को वो शक्ति प्रदान करती है, जिससे ब्रह्माण्ड की समस्त सम्पदा साधक के सामने तुच्छ-सी नजर आती है।


          यहाँ पर माँ मातंगी हृदय साधना प्रस्तुत की जा रही है, जो कि पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी प्रदत्त ही है। माँ मातंगी अपने भक्त के सभी दुःखों व दरिद्रता का नाश कर समस्त सुखों को देने वाली देवी है और यह मातंगी हृदय साधना द्वारा ही सम्भव है। इसे सम्पन्न करने के बाद मातंगी उस साधक के हृदय में निवास करने लगती है और उसके भौतिक जीवन के समस्त दुःखों का निराकरण कर उसके जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करने में सहायक होती है ।


          चूँकि दस महाविद्याएँ भोग और मोक्ष दोनों को प्रदान करने वाली है और मातंगी उन दस महाविद्याओं में से एक हैं, जिनकी साधना करना अपने आप में श्रेष्ठ कहा जाता है। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है -----


"मातंगी मेवत्वं पूर्ण, मातंगी पूर्णत्व उच्चते"


          इससे यह स्पष्ट होता है कि मातंगी एकमात्र श्रेष्ठतम साधना है और एकमात्र मातंगी ही पूर्णता दे सकती है। महर्षि विश्वामित्र ने यहाँ तक कहा है कि बाकी नौ महाविद्याओं का भी समावेश मातंगी साधना में स्वतः ही हो गया है। चाहे हम बाकी नौ साधनाएँ नहीं भी करें और केवल मातंगी साधना को ही सम्पन्न कर लें तो भी अपने आप में पूर्णता प्राप्त हो सकती है। इसलिए शास्त्रों में मातंगी साधना को सर्वोच्चता और श्रेष्ठता दी गई है।


          मातंगी शब्द जीवन के प्रत्येक पक्ष को उजागर करने की क्रिया के का नाम है और जीवन के सैकड़ों पक्ष हैं, जहाँ भौतिक पक्ष हैं - स्वास्थ्य, आय, धन, कुटुम्ब-सुख, पत्नी, पुत्र, पुत्रियाँ, गृहस्थ सुख, पूर्णायु, भवन सुख, अकाल मृत्यु निवारण, शत्रु निवारण, भाग्योदय, राज्य सुख, यात्राएँ और सैकड़ों प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति। वैसे ही आध्यात्मिक पक्ष भी है - कुण्डलिनी जागरण, ध्यान, धारणा, समाधि, अपने इष्ट के दर्शन, आने वाले भविष्य को देख सकने की क्षमता, किसी भी व्यक्ति के भूतकाल को परखने की पहचान और अन्त में सिद्धाश्रम की प्राप्ति।


          ये सभी क्रियाएँ, ये सभी स्थितियाँ केवल मातंगी साधना की सिद्धि से ही प्राप्त हो सकती है। यदि हम मातंगी साधना को भली प्रकार से सम्पन्न कर लें तो निश्चय ही ये सारी स्थितियाँ स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।


          जिस प्रकार गरुड़ सर्पों का नाश करता है, उसी प्रकार मातंगी देवी की उपासना के फलस्वरूप साधक भी अपने शत्रुओं का नाश करने में समर्थ होता है। मातंगी साधना कई विधियों से सम्पन्न की जाती है, किन्तु श्रेष्ठ मातंगी हृदय साधना सम्पन्न कर अपने शत्रुओं पर पूर्ण विजय तथा पूर्ण मान-सम्मान, प्रतिष्ठा व ऐश्वर्य प्राप्त किया जा सकता है।


          मातंगी हृदय साधना को सम्पन्न करने के बाद ही शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक तीनों ही दृष्टियों से पूर्ण स्वस्थ, सुखी और सम्पन्नता युक्त जीवन प्राप्त किया जा सकता है और गृहस्थ जीवन भी पूर्णतः सुखमय बनाया जा सकता है। अतः इस साधना के माध्यम से साधक सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति करने में सक्षम हो सकता है।


साधना विधान :------------


          यह एक ऐसी साधना है, जो कि पूरे जीवन को बदल कर रख देती है, इसलिए इस साधना को अक्षय तृतीया से वैशाख पूर्णिमा के मध्य सम्पन्न करना श्रेष्ठ माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन ''मातंगी जयन्ती'' होती है और वैशाख पूर्णिमा के दिन ''मातंगी सिद्धि दिवस'' होता हैै। इन १२ दिनों में आप चाहे जितना मन्त्र जाप कर सकते हैं। समय का अपने आप में विशेष महत्व होता है,  इसलिए साधक को विशेष क्षणों का लाभ अवश्य उठाना चाहिए।


          यदि किसी कारणवश साधक इस समयावधि में यह साधना सम्पन्न न कर सके तो तो किसी भी नवरात्रि के प्रथम दिन अथवा किसी भी रविवार के दिन से यह साधना आरम्भ कर सकता है। इस साधना को कोई भी स्त्री या पुरुष सिद्ध कर सकता है।


          साधक को चाहिए कि वह प्रातःकाल या रात्रि नौ बजे बाद स्नानादि से निवृत्त होकर लाल वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुँह करके लाल आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र या गुरु यन्त्र और मातंगी यन्त्र या मातंगी चित्र का स्थापन कर दें।


          सबसे पहले साधक संक्षिप्त गुरुपूजन सम्पन्न करें और गुरुमन्त्र का पाँच माला जाप करें। फिर पूज्यपाद सद्गुरुदेवजी से मातंगी हृदय साधना सम्पन्न करने के लिए मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लें और उनसे साधना की पूर्णता एवं सफलता के लिए निवेदन करें।


          इसके बाद सामान्य गणपति पूजन करके एक माला "ओम् वक्रतुण्डाय हुम्" मन्त्र का जाप करें और गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।


          तत्पश्चात साधक भगवान भैरवनाथजी का स्मरण करके एक माला "ॐ हूं भ्रं हूं मतंग भैरवाय नमः" मन्त्र का जाप करें और भैरवनाथजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए निवेदन करें।


          इसके बाद साधक को चाहिए कि वह साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लें। साधक दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि  “मैं अमुक नाम का साधक गोत्र अमुक आज से श्री मातंगी हृदय साधना का अनुष्ठान आरम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य ११ दिनों तक ११ माला मन्त्र जाप करूँगा। माँ ! मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे मन्त्र की सिद्धि प्रदान करे तथा इसकी ऊर्जा को मेरे भीतर स्थापित कर दे।”


          संकल्प लेने के बाद माँ भगवती मातंगी का पूजन कुमकुम, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से सामान्य पूजन करें।


          फिर निम्न विनियोग मन्त्र का उच्चारण करके एक आचमनी जल भूमि पर छोड़ दें -----


विनियोग :-----


 ॐ अस्य श्रीमातंगीहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य


दक्षिणामूर्तिर्ऋषिर्विराट्छन्दो मातंगी देवता ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्लीं कीलकं सर्ववांछितार्थसिद्धये पाठे विनियोगः।


ऋष्यादिन्यास :-----


ॐ दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि।      (सिर को स्पर्श करें)


विराट् छन्दसे नमः मुखे।              (मुख को स्पर्श करें)


मातंगी देवतायै नमः हृदि।            (हृदय को स्पर्श करें)


ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये।                (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)


हूं शक्तये नमः पादयोः।              (पैरों को स्पर्श करें)


क्लीं कीलकाय नमः नाभौ।            (नाभि को स्पर्श करें)


विनियोगाय नमः सर्वांगे।             (सभी अंगों को स्पर्श करें)


कर-न्यास :-----


ॐ ह्रीं ऐं श्रीं अँगुष्ठाभ्याम् नमः।

     (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें)


नमो भगवति तर्जनीभ्याम् नमः।

     (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)


उच्छिष्ट चाण्डालि मध्यमाभ्याम् नमः।

 (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)


श्रीमातंगेश्वरि अनामिकाभ्याम् नमः।

 (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)


सर्वजनवशंकरि कनिष्ठिकाभ्याम् नमः।

 (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)


स्वाहा करतलकर पृष्ठाभ्याम् नमः।

     (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें)


हृदयादि-न्यास :-----


ॐ ह्रीं ऐं श्रीं हृदयाय नमः।

     (हृदय को स्पर्श करें)


नमो भगवति शिरसे स्वाहा।

     (सिर को स्पर्श करें)


उच्छिष्ट चाण्डालि शिखायै वषट्।

      (शिखा को स्पर्श करें)


श्रीमातंगेश्वरि कवचाय हुम्।

       (भुजाओं को स्पर्श करें)


सर्वजनवशंकरि नेत्रत्रयाय वौषट्।

      (नेत्रों को स्पर्श करें)


स्वाहा अस्त्राय फट्।      (सिर से घूमाकर तीन बार ताली बजाएं)


ध्यान :-----


          हाथ जोड़कर माँ भगवती मातंगी का ध्यान करें -----


ॐ घनश्यामलांगीं स्थितां रत्नपीठे शुकस्योदितं श्रृण्वतीं रक्त वस्त्राम्।


    सुरापानमत्तां सरोजस्थितां श्रीं भजे वल्लकीं वादयन्तीं मतंगीम्।।


          तत्पश्चात मातंगी हृदय स्तोत्र का पाठ करें -----


मातंगी हृदय स्तोत्रम्


एकदा कौतुकाविष्टा भैरवं भूतसेवितम्।


भैरवी परिपप्रच्छ सर्वभूतहिते रता।।१।।


श्रीभैरव्युवाच


भगवन्सर्वधर्मज्ञ भूतवात्सल्यभावन।


अहं तु वेत्तुमिच्छामि सर्वभूतोपकारम्।।२।।


केन मन्त्रेण जप्तेन स्तोत्रेण पठितेन च।


सर्वथा श्रेयसाम्प्राप्तिर्भूतानां भूतिमिच्छताम्।।३।।


श्रीभैरव उवाच


श्रृणु देवि तव स्नेहात्प्रायो गोप्यमपि प्रिये।


कथयिष्यामि तत्सर्वं सुखसम्पत्करं शुभम्।।४।।


पठतां श्रृण्वतां नित्यं सर्वसम्पतित्तदायकम्।


विद्यैश्वर्यसुखावाप्ति मंगलप्रदमुत्तमम्।।५।।


मातंग्या हृदयं स्तोत्र दुःखदारिद्रयभंजनम्।                                                                        मंगलं मंगलानां च अस्ति सर्वसुखप्रदम्।।६।।


ध्यान :----------


ॐ श्यामां शुभ्रांशुभालां त्रिकमलनयनां रत्नसिंहासनस्थां


भक्ताभीष्टप्रदात्रीं सुरनिकरकरा सेव्यकञ्जांघ्रियुग्माम्।


नीलाम्भोजां सुकान्तिं निशिचर निकरारण्य दावाग्निरूपां


पाशं खड्गं चतुर्भिर्वर कमलकरैः खेटकं च अंकुश्च।।


मातंगीमावहन्तीमभिमत फलदां मोदिनीं चिन्तयामि।


मूल स्तोत्रम् :----------


ॐ नमस्ते मातंग्यै मृदुमुदिततन्वै तनुमतां परश्रेयोदायै कमलचरण ध्यान मनसाम्।


सदा सं सेव्यायै सदसि पिबुधैर्द्दिव्यधिषणैर्द्दयार्द्रायै देव्यै दुरितदलनोद्दण्डमनसे।।१।।


परं मातस्ते यो जपति मनुमव्यग्रहृदयः कवित्वं कल्पानां कलयति सुकल्पः प्रतिपदम्।


अपि प्रायो रम्यामृतमयपदा तस्य ललिता नटीं मन्या वाणी नटति रसनायां चपलिता।।२।।


तव ध्यायन्तो ये वपुरनुजपन्ति प्रवलितं सदा मन्त्रं मातर्न हि भवति तेषां परिभवः।


कदम्बानां मालाः शिरसि तव युञ्जन्ति सदये भवन्ति प्रायस्ते युवतिजनयूथस्व वशगाः।।३।।


सरोजैस्साहस्रैस्सरसिजपद द्वन्द्वमपि ये सहस्त्र नामोक्त्वा तदपि तव ङेन्तं मनुमितम्।


पृथङनाम्ना तेनायुत कलितमर्चन्ति खलु ते सदा देवव्रात प्रणमित पदांभोजयुगलाः।।४।।


तव प्रीत्यै मातर्द्ददति बलिमाधाय बलिना समत्स्यं माँसं वा सुरुचिरसितं राजरुचितम्।


सुपुण्या ये स्वान्तस्तव चरणमोदैक रसिका अहो भाग्यं तेषां त्रिभुवनमलं वश्यमखिलम्।।५।।


लसल्लोल श्रोत्राभरण किरणक्रान्तिकलितं मितस्मितत्यापन्न प्रतिभितममन्नं विकरितम्।


मुखाम्भोजं मातस्तव परिलुठद्भ्रूमधुकरं रमा ये ध्यायन्ति त्यजति न हि तेषां सुभवनम्।।६।।


परः श्रीमातंग्या जयति हृदयाख्यस्सुमनसामयं सेव्यस्सद्योभिमत फलदश्चाति ललितः।


नरा ये श्रृण्वन्ति स्तवमपि पठन्तिममनिशं न तेषां दुःप्राप्यं जगति यदलभ्यं दिविषदाम्।।७।।


फलश्रुति 


धनार्थी धनमाप्नोति दारार्थी सुन्दरीं प्रियाम्।


सुतार्थी लभते पुत्रं स्तवस्यास्य प्रकीर्तनात्।।१।।


विद्यार्थी लभते विद्यां विविधां विभवप्रदाम्।


जयार्थी पठनादस्य जयं प्राप्नोति निश्चितम्।।२।।


नष्टराज्यो लभेद्राज्यं सर्वसम्पत्समाश्रितम्।


कुबेरसम सम्पत्तिः स भवेद्धृदयं पठन्।।३।।


किमन्त्र बहुनोक्तेन यद्यदिच्छति मानवः।


मातंगीहृदयस्तोत्र पाठात्तत्सर्वमाप्नुयात्।।४।।


          स्तोत्र पाठ के उपरान्त निम्न मन्त्र का ११ माला जाप मूँगा माला या रुद्राक्ष माला से सम्पन्न करें -----


मन्त्र :----------


।। ॐ ह्रीं ऐं श्रीं नमो भगवति उच्छिष्ट चाण्डालि श्रीमातंगेश्वरि सर्वजनवशंकरि स्वाहा ।।


OM HREEM AYIEM SHREEM NAMO BAGWATI UCHCHHISHT CHAANDAALI SHRIMAATANGESHWARI SARVAJANVASHANKARI SWAAHAA.


          मन्त्र जाप के बाद पुनः मातंगी हृदय स्तोत्र का पाठ करें।


          स्तोत्र पाठ के बाद समस्त जाप एक आचमनी जल छोड़कर माँ भगवती मातंगी को ही समर्पित कर दें।


          इस साधना क्रम को नित्य ग्यारह दिनों तक सम्पन्न करना चाहिए।


          साधना समाप्ति के पश्चात यन्त्र एवं माला को विसर्जित कर दें। चित्र को पूजा स्थल में ही स्थापित रहने दें।


          इस प्रकार यह साधना पूर्ण हो जाती है और साधक को ३-४ महीने के अन्दर-अन्दर ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगते हैं, आवश्यकता है तो साधना में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से साथ मन्त्र जाप सम्पन्न करने की।


          आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो!


चेतावनी - 


सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है 


विशेष -


किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें


राजगुरु जी


तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान


महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट


(रजि.)


किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :


मोबाइल नं. : - 09958417249


व्हाट्सप्प न०;- 9958417249


महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...