Wednesday, July 8, 2020

अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच









अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच


चेहरे पर निखार, आकर्षक शरीर और एक सेहतमंद शरीर की कामना भला आज कौन नहीं करता है। हर कोई आकर्षक नज़र आना चाहता है। तो इस मनोकामना को पूरा  करने के लिए व्यक्ति आमतौर पर अप्सरा वशीकरण मंत्र  और साधना का इस्तेमाल करता है, जिसे काफी कारगर व असरदार भी माना गया है। 

इसके बारे मे ये भी कहां गया है कि अप्सरा साधना की मदद से अप्सरा के जैसा  सौंदर्य व समृद्धि प्राप्त किया जा सकता है और ऐसा नहीं है की सिर्फ इसका इस्तेमाल स्त्रिया ही कर सकती है, क्यूकी सुंदर शरीर और खूबसूरत चेहरे की लालसा पुरुष भी रखता है।

तो अब हम आपको बताते है अप्सरा साधना के बारे मे की किस प्रकार आप इसे कर सकते है। जैसा की हमेशा से यह मान्यता रही है कि अप्सराओ को गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और रातरानी जैसे फूलों की सुगंध काफी पसंद आती है। 

अप्सरा साधना करने के दौरान उस व्यक्ति को खास तौर पर अपनी यौन भावनाओं पर संयम रखना पड़ता है। ऐसा न कर पाने से साधना सिद्ध नहीं हो पाती है। 

साधक पूरे विश्वास और संकल्प व मंत्र की सहायता से अगर इस साधना को करता है, तो माना गया है कि अप्सरा प्रकट होती है और उस समय वो साधक उसे गुलाब के साथ इत्र भेंट करता है। साथ ही उसे दूध से बनी मिठाई व पान आदि भेंट देता है और उससे  जीवन भर साथ रहने का वचन लेता है।

 इन अप्सराओ मे चमत्कारिक शक्तिया होती है जो साधक की जिंदगी को सुंदर बनाने की योग्यता रखती है।
अब हम आपको रंभा अप्सरा साधना के बारे मे जानकारी देते हुए बताएँगे की इस साधना को करने के लिए आपको इस मंत्र का जप करना होता है, जोकि इस प्रकार है, 

मंत्र:

ऊँ दिव्यायै नमः! ऊँ वागीश्वरायै नमः!

ऊँ सौंदर्या प्रियायै नमः! ऊँ यौवन प्रियायै नमः!

ऊँ सौभाग्दायै नमः! ऊँ आरोग्यप्रदायै नमः!

 ऊँ प्राणप्रियायै नमः! ऊँ उजाश्वलायै नमः! ऊँ देवाप्रियायै  नमः!

 ऊँ ऐश्वर्याप्रदायै नमः! ऊँ धनदायै रम्भायै नमः!

बाकी साधना के जैसे इसमे भी साधक को पूजा-अर्चना के बाद  रम्भेत्किलन यंत्र के सामने बताए मंत्र का जप करना होता है। 

साधना हो जाने के बाद साधक की इक्छा पूर्ण होने के साथ उसके जीवन मे खुशियों आ जाती है।

अप्सरा साधना विधि को करने के लिए साधक के लिए जरूरी होता है कि वो कोई एक शांत जगह चुन ले। फिर उस जगह पर सफ़ेद रंग का एक कपड़ा बिछाकर, पीले चावल के इस्तेमाल से एक यंत्र का निर्माण करे। 

इसके बाद साधक के लिए जरूरी है कि वो अपने वस्त्र पर इत्र लगा ले जिससे वो  सुगन्धित हो जाये और मखमल को अपना आसन बनाए। 

केवल शुक्रवार के दिन, आधी रात को आप इस साधना करे। ध्यान जरूर रखे की साधना करते वक़्त आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो और फिर बनाए हुए यंत्र का पंचोपकर पूजन करे।

 जिस एकांत जगह या कमरे मे साधक बैठा है वो वहाँ गुलाब के इत्र का प्रयोग करे। आस-पास एक सुगन्धित माहोल बना ले।

 इन सबके बाद आप गुरु गणपति का ध्यान करके स्फटिक मणिमाला का मंत्र के साथ 51 जप करे। 

मंत्र:

 “ऊँ उर्वशी प्रियं वशं करी हुं! ऊँ ह्रीं उर्वशी अप्सराय आगच्छागच्छ स्वाहा!!” 

इस अनुष्ठान को आप कुल 7, 11 या 21 दिनों तक करे और आखिरी दिन 10 माल का जाप करे। बताए मंत्र के नीचे अपना नाम लिखकर उर्वशी माला की मदद से बताए मंत्र का 101 बार जप करे,

 मंत्र:  

“ऊँ ह्रीं उर्वशी मम प्रिय मम चित्तानुरंजन करि करि फट”।

अप्सरा वशीकरण साधना से जुड़े एक शाबर मंत्र के बारे मे भी हम आपको बताते है। जिसको करने के लिए जरूरी है की आप एक बाजोट पर लाल रंग का कपड़ा बिछा ले और उस पर एक चावल से ढेरी बना ले, जो कुम्कुम से रंगे हो।

 आप जिस आसान पर बैठे वो भी लाल रंग का ही हो। इसके बाद उन चावल पर “पुष्पदेहा आकर्षण सिद्धि यंत्र” स्‍थापित कर दे और स्फटिक की माला से मंत्र जाप करे।

 मंत्र: 

“ॐ आवे आवे शरमाती पुष्पदेहा प्रिया रुप आवे आवे हिली हिली मेरो कह्यौ करै,मनचिंतावे,कारज करे वेग से  आवे आवे,हर क्षण साथ रहे हिली हिली पुष्पदेहा अप्सरा फट् ॐ ”।

 शुक्रवार के दिन इस साधना को शुरू करे जो 7 दिनों तक चलती है। आपका मुख उत्तर दिशा की ओर हो इसका खास ध्यान रखे और मंत्र का रोज 11 माला जप करना होगा। बनाए हुए यंत्र पर रोज गुलाब का इत्र चढाये और 5 गुलाब भी चढा दे।

 घी का दीपक जला दे, जो साधना विधि के समय जलता रहे। आप जो धूप इस्तेमाल करे वो गुलाब का ही हो। जब मंत्र का जप किया जा रहा हो उस समय नजर  यंत्र की ओर होनी चाहिए। इसी यंत्र के माध्यम से साधक को अप्सरा से वचन प्राप्त करने का मंत्र प्राप्त होता है।

तो यकीन है की रूप-रंग व यौवन की चाहत रखने वाले लोगों के लिए ऊपर बताई गई बाते मददगार होंगी, जिनके उपयोग से साधक अपनी मनोकामना को पूर्ण कर सकता है।

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Tuesday, July 7, 2020

उर्वशी अप्सरा साधना





उर्वशी अप्सरा साधना


प्राचीन काल से ही भारतीय साधना पद्धति में सौन्दर्य की साधना करना भी एक आवश्यक गुण माना गया है।

 सौन्दर्य शब्द को लेकर के समाज में आज जो भी धारणा हो, उसके विषय में तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता, किंतु प्राचीन काल में ऋषियों के मन में सौन्दर्य को लेकर के न तो कोई द्वन्द्व था, न उनके मन में कोई ऐसी धारणा थी कि सौन्दर्य की उपासना अपने आपमें कोई अश्लील धारणा है ।

यही कारण है, कि प्राचीन ग्रंथों में सौन्दर्य का मूर्त रूप अप्सरा को
मान कर प्रकारान्तर से सौन्दर्य की ही उपासना करने का प्रयास किया है, क्योंकि सौन्दर्य नारी के माध्यम से अपने सर्वोतकृष्ट रूप में स्पष्ट हो सकता है ... और संसार की तीन अद्वितीय सुंदरियां मानी गई हैं, जिनके नाम उर्वशी, रम्भा, और मेनका हैं, इनमें भी उर्वशी का नाम सर्वोपरि है

 । ये सुंदर स्त्रियां देवताओं के राजा इन्द्र की सभा में अद्वितीय नृत्य और सुर्य के समान प्रखर सौन्दर्य रश्मियों से सबको अभिभूत करती रहती हैं।

उर्वशी के बारे में ग्रंथों में कहा गया है, कि वह चिरयौवना है, हजारों वर्ष बीतने पर भी वह 18 वर्ष की उम्र की युबती के समान अन्नहड़ मदमस्ति और यौवन रस से परिपूर्ण रहती है।

सारा शरीर एक अद्वितीय सुन्दरता से परिपूर्ण रहता है, जिसको देखकर व्यक्ति तो क्या, देवता भी ठगे रह जाते हैं।

विश्वामित्र संहिता के अनुसार गोरा अण्डाकार चेहरा, लम्बे और एडियों को छूते हुए घने श्यामल केश, जैसे कोई बादलों को घटा उमड़ आई हो, गौरा रंग ऐसा, कि जैसे स्वच्छ दुध में केसर मिला दी हो, बड़ी-बड़ी खजन पक्षी की तरह आखें जो हर क्षण
गहन जिज्ञासा लिए हुए इधर उधर देखती है, छोटी चुम्बक, सुंदर और गुलाबी होठ, आकर्षक चेहरा और अद्वितीय आाभा मे युक्त शरीर सब मिल कर एक ऐसा सौन्दर्य जो उंगली लगने पर मैला हो जाए ।

 ऐसी ही सौन्दर्य की सम्राजी उर्वशी संसार की अद्वितीय सौन्दर्य सम्राजञी है, जो अपने यौवन व सौन्दर्य के माध्यम मे पूरे संसार को मोहित किए हुए है ।

विश्वामित्र ने जब यह सुना कि उर्वशी इन्द्र के दरबार की उज्जवल सौन्दर्यमयी नृल्यांगना है जिसके नृत्य से मनुष्य तो क्या बहुता हुआ पानी भी ठिठक कर रुक जाता है, तो उन्होंने आज्ञा दी कि उर्वशी मेरे आश्रम में भी नृत्य करे।

 विश्वामित्र ने अपना संदेश इन्द्र तक पहुंचा दिया और इन्द्र ने हाथो - हाथ मना कर कहला दिया कि यह किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं है। विश्वामित्र तो हठी योगी रहे हैं, उन्होंने मंत्र बल से उर्वशी को अपने आश्रम तुम्हें ठीक वैसा ही नृत्य मेरे शिष्यों के सामने इस आश्रम में करना है, जैसा इन्द्र की सभा में तुम करती हो।

"उर्वशी ने यौवन के नशे में चूर दम्भ से मना कर दिया और इठलाती हुई पुनः
इन्द्रलोक चली गई ।       
   
विश्वामित्र तिलमिला कर रह गए । उन्होंने उसी क्षण प्रतिज्ञा की कि मैं सर्वथा नये तंत्र की रचना करूंगा और तंत्र बल से इसे अपने आश्रम में बुलाऊंगा, एक बार नहीं जब भी चाहे नृत्य करवाऊंगा और इसी जिद्द और क्रोध का परिणाम हुआ 'उर्वशी तंत्र'।

किसी भी अप्सरा की साधना चार रूपी में की जा सकती है। मां, बहन, पत्नी और प्रेमिका के रूप में साधना सम्पन्न करना श्रेष्ठ माना गया है।

विश्वामित्र ने प्रेमिका रूप से तंत्र रचना की और इसी तंत्र के माध्यम से उ्वशी को अपने आश्रम में आने के लिए बाध्य किया और उसे अद्वितीय नृत्य करना पड़ा।

 गौरखनाथ ने भी इस साधना के माध्यम से चिरयौवन प्राप्त किया और गोरक्षपुर में उन्होंने हजारों शिष्यो के सामने सदेह उवशी को बुलाकर अद्वितीय नृत्य सम्पन्न करवाया।

 इतिहास साक्षी है कि स्वामी शंकराचार्य ने इसी साधना को सम्पन्न कर अपने शिष्य पदमपाद को अंतुलनीय वैभव का स्वामी बना दिया, यहाँ नहीं अपितु भंडन मिश्र से शास्त्रार्थ के दिनों में शंकराचार्य ने उर्वशी को तंत्र के माध्यम से उसे अपने सामने बुलाकर उससे काम कला की वे बारीकिया समझी जो सन्यासी होने की वजह से उनके लिए असंभव थी,

इसी साधना के बल पर आज से सौ साल पहले म्वामी विशुद्धानंद जी ने बनारस में नवमुण्डी आश्रम में अभिनव नृत्य कराकर अंग्रेजों को आश्चर्वचकित कर दिया था, और उस समय के तत्कालीन कलेक्टर ब्लासिम ने तो कहा था, कि मैंने अपनी जिन्दगी में ऐसी सुंदरी नहीं देखी, वह अचानक आई और जो नृत्य उसने किया वह आश्चर्यचकित करने वाला था।

उर्वशी साधना कोई भी साधक सम्पन्न कर सकता है। साश्त्र के अनुसार भी उर्वशी की साधना पत्नी का प्रेमिका के रूप में ही सम्पन्न करनी चाहिए।

साधना विधि

यह साधना 49 दिनों की है, किसी भी पूर्णमासी की रात्रि से यह साधना प्रारम्भ की जाती है, धर के किसी कोने में सफेद आसन बिछाकर उत्तर की तरक मुह कर बैठ जांए, सानने घी का अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित करें और स्वयं पानी में गुलाब का थोड़ा सा इत्र मिलाकर स्नान कर स्वच्छ सफ़ेद वर्त्र धारण कर आसन पर बेठ जाए, और सामने उ्वशी यंत्र और चित्र रखकर मोती की माला से मंत्र जप करे।

।। ॐ श्री क्ली आगच्छागच्छस्वाहा ।।

मंत्र जप समाप्ति के बाद उसी स्थान पर सो जाएं। इन 49 दिनों में वह न तो किसी से बात कर, और न कमरे से बाहर जा केवल शौच आदि क्रिया करने के लिए बाहर जा सकता है। सातवे दिन पक्का ही घुंगरुओ को मधुर आवाज सुनाई देती है,

 मगर साधक को चाहिए कि वह अविचलित भाव से मंत्र जप करता रहे। इक्कीसवे दिन बिल्कुल ऐसा लगेगा कि जैसे अपूर्व सी
सुगंध फैल गई है, इसके बाद नित्य ऐसी सुगन्ध और ऐसा आभास होगा। 36 वें दिन बिल्कुल ऐसा लगेगा कि जैसे कोई अद्वितीय सुन्दरी आसन के पास आकर बैठ गई है,

 मगर साधक अविचलित न हो और मंत्र जप करता रहे, 47 वें दिन साधक की परीक्षा आरम्भ होती है, और वह सशरीर उपस्थित होकर साधक की गोदी में बैठ जाती है, फिर भी साधक को चाहिए कि वह न तो विचलितहो और न कामोत्तेजक हो।

 49 वें दिन वह अपूर्व श्रृंगार कर साधक से सट कर बैठ
जाएगी और पूछेगी कि मेरे लिए क्या आज्ञा है, तब साधक कहे कि मेरी पत्नी बन प्रेमिका की तरह प्रसन्न करो, तब वह सिद्ध हो जाती है, और जीवन भर सुख, काम, द्रव्य प्रदान करती रहती है।यह आजमाया हुआ तंत्र है, और अपने आप में प्रामाणिक सिद्ध प्रयोग है, एक बार सिद्ध करने पर फिर जीवन में बार-बार प्रयोग करने की जरूरत नहीं रहती,

इस साधना में तीन बातें आवश्यक हैं

1.साधनाकाल में 49 दिन तक किसी से भी कुछ भी न बोले।

2.साधना के बाद उशी सिद्ध होने पर परस्त्रीगमन न करे I
3.उर्वशी तंत्र सिद्ध होने पर उसके साथ रमण करे, जो कुछ भी चाहे प्राप्त करें, पर द्रव्य का दुरुयोपयोग न करे।

यह साधना आज भी जीवित है, और वर्तमान में भी कई तांत्रिकों ने इसे सिद्ध कर रखा है। वस्तुत: यह जीवन की एक अद्भुत और पूर्ण सुखोपभोग देने वाली सौन्दर्यमयी साधना है, जिसे सिद्ध करने में शास्त्रीय दृष्टि से भी किसी प्रकार का बन्धन या दोष नहीं है।

प्रत्येक्ष रूप से देखने पर यह साधना लम्बी प्रतीत होती है कितु इसके मंत्र पर ध्यान दें तो यह अन्य साधना की अपेक्षा सरल की कही जा सकती है। साथ ही महार्षि विश्वामित्र के द्वारा प्रणीत होने के कारण इसकी प्रामाणिकता स्वयं सिद्ध है ।

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इस तरह पूजा करने से होते हैं हनुमानजी के दर्शन




इस तरह पूजा करने से होते हैं हनुमानजी के दर्शन


       

हनुमानजी को रूद्रावतार भी कहा जाता है। वह भगवान शिव की तरह ही जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्त की हर इच्छा पूरी करते हैं। यूं तो हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए कई तरीके हैं फिर भी कुछ विशेष तांत्रिक प्रयोगों के द्वारा उनके न केवल दर्शन किए जा सकते हैं वरन उनसे मनचाहा वरदान भी पाया जा सकता है।

हनुमान प्रत्यक्ष दर्शन साधना भी ऎसी ही एक तांत्रिक विधि है जिसके द्वारा हनुमानजी के दर्शन होते हैं। इस साधना को किसी मंदिर या गुप्त स्थान पर ही किया जाता है। यदि किसी नदी के कि नारे एकांत स्थान या पर्वत पर स्थित मंदिर में किया जाए तो ज्यादा बेहतर होता है। कुल मिलाकर साधना का स्थान पूर्णतया पवित्र, शांत और शुद्ध होना चाहिए।

पूजा के पहले करें ये तैयारियां

इस पूजा के लिए आपको सबसे पहले सफेद या लाल वस्त्र ले लेने चाहिए। बिना सिले वस्त्र जैसे धोती अधिक उपयुक्त है परन्तु अनिवार्य नहीं है। साथ ही आसन भी सफेद या लाल ही होना चाहिए। पूजा के लिए लड्डू, सिंदूर, केले, दीपक, धूप, गंगाजल, जल का लोटा दूध, माचिस तथा लाल या सफेद फूल ले लें।

मंगलवार को उपवास रखें। इसके साथ ही जल के लोटे में दूध मिला दें और उसे जाप करने के बाद पीपल के पेड़ में चढ़ा दे और हनुमानजी के मंदिर में घी का दीपक जला कर साधना के लिए आज्ञा दें। आपको जल्दी ही स्वप्न में या अन्य किसी संकेत द्वारा हनुमानजी की पूजा की आज्ञा मिल जाएगी। यदि नहीं मिलती है तो इस पूजा को न करें।

ऎसे करें पूजा

ऊपर बताए अनुसार किसी शांत, शुद्ध और एकान्त स्थान पर जाकर गंगा जल छिड़क कर जगह को पवित्र कर लें। वहां गाय के गोबर लीप कर एक चौका बनालें। उस पर स्वास्तिक का चिन्ह बना कर फूल बिछाएं और उस पर हनुमानजी की मूर्ति, चित्र या यंत्र रखें। इसके बाद आसन पर विराजमान होकर मन ही मन भगवान गणेश और अपने गुरू से पूजा आरंभ करने की आज्ञा लें। इसके बाद आप अपनी साधना आरंभ करें।

दीपक जलाकर, पुष्प अर्पण कर भगवान राम के नाम की एक माला का जाप कर भलीभांति हनुमानजी की पूजा-अर्चना कर नीचे दिए मंत्र का मूंगे की माला से 11 माला जाप करें और हनुमानजी को भोग अर्पण करें। भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य होना चाहिए। ध्यान रहें प्रतिदिन फल और पुष्प ताजा ही लाने चाहिए। इसके साथ ही अपने आसन और हनुमानजी के चारों तरफ राम नाम का जाप करते हुए एक गोल घेरा बना लें। यह घेरा आपकी सभी विध्नों से रक्षा करेगा। जाप के लिए मंत्र इस प्रकार है

ओम नमो हनुमान बाराह वर्ष के जवान हाथ में लड्डू मुख में पान,
हो के मारू आवन मेरे बाबा हनुमान ये नम:।

पूजा में इन नियमों का पालन अवश्य करें

मंत्र प्रतिदिन शाम को 7 से 11 बजे के बीच ही करना है। भोग लगाकर प्रसाद स्वयं खाएं या छोटे लड़कों को बांट दें।

साधना 41 दिन चलती है और इसे मंगलवार या गुरूवार को ही शुरू करें।

पूरे 41 दिनों के दौरान किसी महिला के संपर्क में न आएं। स्वयं का खाना भी खुद ही बना कर खाएं।

मन-मस्तिष्क में किसी भी तरह का कोई विकार न आने दें और अपने आपको पूरी तरह से भगवान के चरणों में समर्पित कर दें।

ये भी पढ़ेः हनुमान जी के इन 5 मंत्रों के जाप से सभी अमंगल होंगे मंगल

सिर्फ 14 दिन में ही हो सकते हैं आपको दर्शन

साधना का असर 14 दिन के अंदर ही दिखने लगता है। आपको शुरू में धरती हिलती हुई अनुभव होगी। आपको बड़े ही डरावने और भयावह अनुभव होने लगेंगे परन्तु किसी बात से डरना नहीं है। आप चुपचाप हनुमानजी में ध्यान एकाग्र कर अपने मंत्र जाप करते हैं। भगवान रोजाना आकर अपना प्रसाद लेंगे और खा लेंगे। 41वें दिन भगवान साक्षात प्रकट होकर आपको दर्शन देंगे और मनचाहा वरदान मांगने को कहेंगे। आप उस दौरान उनसे कुछ भी मांग कर अपनी इच्छा पूरी कर सकते हैं।

सावधानियां

यह एक अत्यन्त प्रचंड और विलक्षण सिद्धी है। इसे करते समय व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होना चाहिए। जरा सा भी डर या कमजोरी आदमी को पागल कर सकती है या उसे मार सकती है। इसीलिए यह प्रयोग हर किसी को नहीं करना चाहिए वरन अपने गुरू की आज्ञा और आर्शीवाद लेकर ही करना चाहिए।

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Monday, July 6, 2020

माँ बगलामुखी साधना




माँ बगलामुखी साधना

    

यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। 

सामनेवाले विरोधियों को शांत करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा। 
   
 मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या किलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है।

   हम यहाँ पर सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली, कोर्ट में विजय दिलाने वाली, अपने विरोधियों का मुँह बंद करने वाली माँ बगलामुखी की आराधना का सही प्रस्तुतीकरण दे रहे हैं। हमारे पाठक इसका प्रयोग कर लाभ उठाने में समर्थ होंगे, ऐसी हमारी आशा है। 

  यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। 

   इस साधना में विशेष सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है जिसे हम यहाँ पर देना उचित समझते हैं। 

इस साधना को करने वाला साधक पूर्ण रूप से शुद्ध होकर (तन, मन, वचन) एक निश्चित समय पर पीले वस्त्र पहनकर व पीला आसन बिछाकर, पीले पुष्पों का प्रयोग कर, पीली (हल्दी) की 108 दानों की माला द्वारा मंत्रों का सही उच्चारण करते हुए कम से कम 11 माला का नित्य जाप 21 दिनों तक या कार्यसिद्ध होने तक करे या फिर नित्य 108 बार मंत्र जाप करने से भी आपको अभीष्ट सिद्ध की प्राप्ति होगी। 

आँखों में तेज बढ़ेगा, आपकी ओर कोई निगाह नहीं मिला पाएगा एवं आपके सभी उचित कार्य सहज होते जाएँगे। खाने में पीला खाना व सोने के बिछौने को भी पीला रखना साधना काल में आवश्यक होता है वहीं नियम-संयम रखकर ब्रह्मचारीय होना भी आवश्यक है। 

ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा।

हमने उपर्युक्त सभी बारीकियाँ बता दी हैं। अब यहाँ पर हम इसकी संपूर्ण विधि बता रहे हैं। इस छत्तीस अक्षर के मंत्र का विनियोग ऋयादिन्यास, करन्यास, हृदयाविन्यास व मंत्र इस प्रकार है--

विनियोग

अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि। 
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये। 
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:। 
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।  


आवाहन

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।

ध्यान 

सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम् 
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै 
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्। 

मंत्र इस प्रकार है-- ऊँ ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ऊँ स्वाहा। 

मंत्र जाप लक्ष्य बनाकर किया जाए तो उसका दशांश होम करना चाहिए। जिसमें चने की दाल, तिल एवं शुद्ध घी का प्रयोग होना चाहिए एवं समिधा में आम की सूखी लकड़ी या पीपल की लकड़ी का भी प्रयोग कर सकते हैं। मंत्र जाप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर के करना चाहिए।

साधनाकाल की सावधानियाँ 

- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- पीले वस्त्र धारण करें। 
- एक समय भोजन करें। 
- बाल नहीं कटवाए। 

- मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें। 

- दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें। 

- साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्‍ठ फलदायी होता है।

- साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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जानिए मूंगा पहनने के फायदे और नुकसान ....








जानिए मूंगा पहनने के फायदे और नुकसान ....


मूंगा समुद्र में पायी जानी वाली एक वनस्पति है, जिसे मंगल का रत्न कहा जाता है। जिन लोगों की कुण्डली में मंगल पापी होकर अशुभ फल दे रहा होता है, 

उसे नियंत्रित करने के लिए मूंगा धारण करना चाहिए। मूंगा एक ऐसा रत्न है, जिसे धारण करने से अनेको प्रकार के लाभ प्राप्त होते है।

मंगल रत्न मूंगा से मंगलमय हो जाता है जीवन
आईये जानते है कि मूंगा पहनने के क्या-क्या फायदे हैंं...
मूंगा पहनने के लाभ 

इस रत्न को सोने/चॉदी या तॉबे में पहनने से बच्चों को नजर नहीं लगती एंव भूत-प्रेत व बाहरी हवा का भय खत्म हो जाता है। मूंगा धारण करने से ईर्ष्या दोष समाप्त होता है, साहस व आत्म-विश्वास में वृद्धि होती है।

मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों को मूंगा पहनने से अत्यन्त लाभ होता है। उदासी व मानसिक अवसाद पर काबू पाने के लिए मूॅगा रत्न अवश्य धारण करना चाहिए।

 किसी बच्चे को आलस्य बहुत सता रहा है तो...
पुलिस, आर्मी, डाक्टर, प्रापर्टी का काम करने वाले, हथियार निर्माण करने वाले, सर्जन, कम्प्यूटर साप्टवेयर व हार्डवेयर इन्जीनियर आदि लोगों को मूॅगा पहनने से विशेष लाभ होता है।

अगर किसी बच्चे को आलस्य बहुत सता रहा है तो उसे मूॅगा पहनाने से उसका आलस्य दूर भाग जाता है।यदि किसी व्यक्ति को रक्त से सम्बन्धित कोई दिक्कत है तो उसे मूंगा पहनने से फायदा मिलता है।

मिर्गी तथा पीलिया रोगियों के लिए मूंगा पहनना अत्यन्त हितकारी साबित होता है।

मेष, वृश्चिक, सिंह, धनु व मीन राशि वाले
शुगर रोगी अगर मूंगा धारण करेंगे तो उनका शुगर कंट्रोल में बना रहेगा।जिनके मॉसपशियों में दिक्कत रहती है, उन्हें मूॅगा पहनने से फायदा मिलता है। 

मेष, वृश्चिक, सिंह, धनु व मीन राशि वाले लोग मूंगा धारण कर सकते है। सूर्य और मंगल आपस में मित्र है। सूर्य का रत्न माणिक्य है, इसलिए मूंगा के साथ माणिक्य पहना जा सकता है।मूंगा रत्न पोखराज और मोती के साथ भी पहना जा सकता है।

 सिर्फ मंगलवार के दिन
मूंगा तर्जनी और अनामिका अंगुली में धारण किया जा सकता है।मूंगा गोमेद, लहसुनिया, हरी व नीलम के साथ पहनना हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

मूंगा सिर्फ मंगलवार के दिन चित्रा व मृगशिरा नक्षत्र में ही धारण करना चाहिए।मूंगा धारण करने के पश्चात नानवेज नहीं धारण करना चाहिए और मंगलवार व शनिवार को तो कदापि नानवेज नहीं ग्रहण करना चाहिए।

 मूंगा धारण करने की विधि
सोमवार, मंगलवार व बुधवार धूम्रपान व नानवेज कादपि न करें। सोमवार के दिन प्रातःकाल स्नान ध्यान करके कच्चे दूध व गंगाजल में मूंगे को डाल दें।

 मंगलवार की सुबह 108 बार ‘ऊॅ भौमाय नमः' मन्त्र का जाप करें एंव हनुमान जी के चरणों में रखकर प्रार्थना करें। हे हनुमान जी हम आपकी कृपा से मूंगा रत्न धारण कर रहें है। 

अतः इसको धारण करने से हमारे मनोरथ पूर्ण हो। तत्पश्चात मूंगा को तर्जनी या अनामिका उंगली में धारण कर लें।

रत्न चाहिए तो संपर्क करे.और प्राप्त करे।

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 जन्म  कुंडली  देखने और समाधान बताने  की 

दक्षिणा  -  201 मात्र .

Pytam नम्बर -  9958417249

विशेष

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राजगुरु जी

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Saturday, July 4, 2020

दूसरों के मन के विचारों को जानना-







दूसरों के मन के विचारों को जानना- 


     कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी व्यवसायिक संबंध, रिश्ते नाते, प्रेम संबंध, मे  हम असमंजस मैं होते हैं कि सामने वाले के मन में उस विषय में क्या विचार है? 

 कृत्रिम जीवन ने मनुष्य के विचारों पर अनेकों बंधन लाद रखें है।   वह जिस व्यवहार  को करता है,जो वह बोलता है , वह अधिकतर  वास्तविक नहीं होता।  यह पाखंड आज हर ओर व्याप्त है। 

     नारियों में अपनी भावना को व्यक्त न करने के प्रबृति होती है । वह घुटती रहेगी ,लेकिन अपने मन के भावों को ब्यक्त नहीं करेगी । कभी कभी वह जो ब्यक्त करती है , वह उसकी आंतरिक भावना के सर्वथा विपरीत होता है। 

 इसका कारण उसकी प्रकृति भी  है  और उस पर  लादे गए सामाजिक एवं नैतिक नियमों के बंधन भी।  ऐसी स्थिति में यह जानना अत्यंत कठिन हो जाता है उसका वास्तविक रूप क्या है। ?

  उदाहरण स्वरूप कोई युवक किसी युवती से प्रेम करता है या कोई युवती किसी युवक से प्रेम करती है; किंतु  युवक को यह नहीं मालूम है  कि युवती भी उसे प्रेम करती है या  नही; क्योंकि वह अपने मन के भाव को व्यक्त नहीं करती।  

युवती को यह नहीं मालूम कि जिस युवक से वह प्रेम करती है, वह वास्तव में उससे प्रेम करता है  या उससे छल कर रहा है।   के लिए मैं कुछ प्रयोग दे रहा हूं जो आप करेंगे आपको अवश्य सफलता मिलेगी यह प्रयोग आधी रात के समय  करें।  इस प्रयोग को जानने के लिए हमें पर्सनल मैसेज करें । 

       विशेष जानकारी और किसी भी प्रकार की आर्थिक मानसिक और शारीरिक समस्याओं के समाधान हेतु और अपने घर बैठे ही आत्म सम्मोहन साधना,सम्मोहन साधना सीखने के लिए आप संपर्क करें ।

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...