Thursday, July 2, 2020

हम भैरवी साधना करना चाहते है;








हम भैरवी साधना करना चाहते है; 


करवाने से होता है; उसी प्रकार तंत्र और भैरवी मार्ग की साधनायें भी बताने का विषय नहीं है।

भैरवी-साधना के 9 चरण होते है। इनको एक-एक कर करना होता है। पांच सिद्ध करने के बाद साधक वीर कहलाता है, नौ सिद्ध करने के बाद दिव्य। ‘वीर’ को ही अलौकिक शक्तियाँ और ज्ञान पारपत होता है।

इसमें सबसे पहली साधना, जो सामान्य क्रियात्मक प्रयोग होते है, संस्कारों को नष्ट करने की होती है। मनुष्य अपने ही बनाये हुए नियमों से पाशबद्ध होकर उस पशु की तरह विवश हो गया है, जो बंधन में है।

इन संस्कारों से मुक्ति सबसे कठिन काम है। इनमें उत्तीर्ण होने के बाद ही भैरवी चक्र की दीक्षा दी जाती है। मुझे स्वयं भी 10  वर्ष पहले इसमें प्रवेश के लिए कठोर परिक्षण से गुजरना पड़ा था। मुझे ज्ञान और बौद्धिक क्षमता के लिए शिव और सरस्वती का वरदान चाहिए था, जो प्राप्त हुआ।

तीसरी समस्या भैरवी की होती है। हृदय से उत्साह के साथ कोई 18 से 30 वर्ष की युवती भैरवी बनकर साधना की पार्टनर बनना चाहे; तभी इस मार्ग की साधनाएं सफल होती है।

 युवती को ज्ञात होना चाहिए कि यह काम आधारित साधनायें है। दूसरे उसमें अपने पार्टनर से शिव और गुरु से सदाशिव के समान भक्ति और श्रद्धा होना चाहिए।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

(रजि.)

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मोबाइल नं. : - 09958417249

                     

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Wednesday, July 1, 2020

धन प्राप्ति का मंत्र






धन प्राप्ति का मंत्र


मित्रो ! मेरे पास जितनी भी समस्याओं के मेल या मेसेज आते है उनमे 70 % समस्याएं आर्थिक संकट की होती हैं। किसी का उधार वापस नहीं मिल पा रहा है या किसी की आमदनी उसकी ज़रूरतों से कहीं कम है।

चूँकि समय बदलता जा रहा है, सभी की जरूरतें बदल रही हैं, हमारी आदतें बदली है और इनकी पूर्ति के लिए पैसों की चाहत बढ़ती जा रही है। कोई भी व्यक्ति कितना भी धन कमाए परंतु वह उसे कम ही लगता है।

 जरूरतें इतनी बढ़ गई हैं कि पैसों की कमी महसूस होने लगती है। साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है इसलिए अपनी चादर के अनुसार ही हमें पैर फ़ैलाने चाहिए।

 सामान्यत: हमारे कर्मों के आधार पर ही हमें प्रतिफल स्वरूप धन प्राप्त होता है। परन्तु अथक प्रयासों के बाद भी अगर उतना धन प्राप्त नहीं हो रहा है इसका सीधा सा अर्थ है कि आपके ग्रह आपका साथ नहीं दे रहे है। तब आप ईश्वर भक्ति या शक्ति का प्रयोग कर सकते है।

मित्रो !

मंत्रो में अपार शक्ति होती है। अगर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से इनका जप किया जाय तो यह आपके हाथों की लकीरें भी बदल सकते हैं।

यहाँ आप सभी के आग्रह पर मैं एक अति सरल मंत्र आप को बता रहा हूँ जो आपके जीवन से 'आर्थिक तंगी' को जड़ से समाप्त कर देगा -

ऊँ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा।

OM SARASWATI ISHWARI BHAGWATI MATA KRAM KLIM SHRIM SHRIM MAM DHANAM DEHI FAT SWAHA

मंत्र सिद्ध करने की विधि -

किसी भी शुभ मुहूर्त में पूरे विधि-विधान के साथ इस मंत्र का जप करें। मंत्र का जप 40 दिनों तक प्रतिदिन 108 बार करें। मंत्र जप के समय लक्ष्मी और सरस्वती का चित्र अपने सामने रखें।

इस मंत्र के सिद्ध होने के बाद साधक का रुका हुआ पैसा वापस मिल जाएगा और मां सरस्वती की कृपा से बुद्धि और विवेक बढ़ेगा।

यदि साधक की किसी व्यक्ति पर उधारी बाकी है और वह उसे प्राप्त नहीं हो रही है तो इस मंत्र के सिद्ध होने के बाद पैसा वापस आना शुरू हो जाएगा तथा जीवन में नये नये आय के स्रोत खुलते चले जायेंगे।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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ऋण हर्ता गणेश मंत्र प्रयोग





ऋण हर्ता गणेश मंत्र प्रयोग


कर्ज से मुक्ति हेतु गणेश मंत्र, मन्त्र जप से ऋण मुक्ति,  रिण मुक्ति हेतु मन्त्र, गणपति मन्त्र से कर्ज मुक्ति, गणेश जी का कर्ज मुक्ति मन्त्र,

ऋण हर्ता गणेश मंत्र प्रयोग

यह ऋण हर्ता मंत्र हैं। इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है और साधक का ऋण चुकता होता है। कहा जाता है कि जिसके घर में एक बार भी इस मंत्र का उच्चारण हो जाता है है उसके घर में कभी भी ऋण या दरिद्रता नहीं आ सकती।

मंत्र:

ॐ श्री गणेश ऋण छिन्धि वरेण्य हुं नमः फट ।

विधि: किसी योग्य ब्राह्मण से गणेश प्राण-प्रतिष्ठित करवाले। (विशेष नोट : कर्ज मुक्ति हेतु मंगल गणेश (मूंगा गणेश) प्रतिमा उत्तम फलदायी होती हैं।)

यदि कर्ज से हैं परेशान तो मास की किसी भी चतुर्थी या मंगलवार के दिन प्रातःकाल स्नानआदि नित्यकर्म से शीघ्र निवृत्त होकर। भगवान गणेश की प्राण-प्रतिष्ठित मंत्र सिद्ध गणेश प्रतिमा स्थापित करें। उस मूर्ति का पंचोपचार या षोड़शोपचार पूजन-आरती आदि से विधि-वत पूजन करें।
·    गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं।
·    यदि संभव हो तो गणेशजी का मंत्र बोलते हुए 21 दुर्वा दल चढ़ाएं।
·    श्री गणेशजी को लड्डुओं का भोग लगाएं।

·    स्थापना वाले दिन ब्राह्मण भोजन कराएं और ब्राह्मणों को दक्षिणा प्रदान करने के पश्चात् संध्या के समय स्वयं भोजन ग्रहण करें, यदि ब्राह्मणों को भोजन करवाना संभव न हो तो उसके निमित्त दान किसी भी मंदिर मे कर सकते हैं।
· 
  स्थापना के पश्चयात प्रतिदिन गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं और ऋण मुक्ति हेतु मूंगे की माला से गणेश मंत्र की 1, 3, 5, 7, 11 जप करें।

·    इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और जल्द ही कर्ज मुक्ति के मार्ग प्रसस्थ होने लेगते हैं।

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Monday, June 29, 2020

श्रीविद्या







श्रीविद्या-


साधक की आत्मा व मस्तिष्क इतने शक्तिशाली हो जाते है 

श्रीविद्या - परिचय

एक बार पराम्बा पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि आपके द्वारा प्रकाशित तंत्रशास्त्र की साधना से मनुष्य समस्त आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता से मुक्त हो जायेगा। किंतु सांसारिक सुख, ऐश्वर्य, उन्नति, समृद्धि के साथ जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति कैसे प्राप्त हो इसका कोई उपाय बताईये।

भगवती पार्वती के अनुरोध पर कल्याणकारी शिव ने श्रीविद्या साधना प्रणाली को प्रकट किया। श्रीविद्या साधना भारतवर्ष की परम रहस्यमयी सर्वोत्कृष्ट साधना प्रणाली मानी जाती है। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म आदि समस्त साधना प्रणालियों का समुच्चय (सम्मिलित रूप) ही श्रीविद्या-साधना है।

श्रीविद्या साधना की प्रमाणिकता एवं प्राचीनता
जिस प्रकार अपौरूषेय वेदों की प्रमाणिकता है उसी प्रकार शिव प्रोक्त होने से आगमशास्त्र (तंत्र) की भी प्रमाणिकता है। सूत्ररूप (सूक्ष्म रूप) में वेदों में, एवं विशद्रूप से तंत्र-शास्त्रों में श्रीविद्या साधना का विवेचन है।

शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासक बताये गये है- मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, शिव और दुर्वासा ये श्रीविद्या के द्वादश उपासक है।

श्रीविद्या के उपासक आचार्यो में दत्तात्रय, परशुराम, ऋषि अगस्त, दुर्वासा, आचार्य गौडपाद, आदिशंकराचार्य, पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ, भास्कराय, उमानन्द नाथ प्रमुख है।

इस प्रकार श्रीविद्या का अनुष्ठान चार भगवत् अवतारों दत्तात्रय, श्री परशुराम, भगवान ह्यग्रीव और आद्यशंकराचार्य ने किया है। श्रीविद्या साक्षात् ब्रह्मविद्या है।

(श्री विद्या साधना)

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

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महायोगी  राजगुरु जी  《  अघोरी  रामजी  》

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भविष्य को एक ही ग्रह बदल सकता है,नवग्रह नही.






भविष्य को एक ही ग्रह बदल सकता है,नवग्रह नही.


आज बात ज्योतिष के विषय पर करते है और वैसे भी हमारे देश मे यह विषय प्राचीन है,यह एक ऐसा विषय है जिस पर हमेशा से ही नये नये शोध होते रहते है । ज्योतिष शास्त्र एक अपूर्ण शास्त्र है और यह शास्त्र पूर्ण तरह से कभी भी लिखा नही जा सकता है ।

मैं आज आपको यह लेख ग्रहों के नाम पर डराने हेतु नही लिख रहा हु,यह लेख आपको जीवन मे सहाय्यक है । हमेशा से मेरा एक लक्ष्य रहा है,मुझे अपने क्षेत्र में हमेशा नई नई खोज करने का अवसर प्राप्त हुआ और यह अवसर प्राप्त करने हेतु बहोत से विद्वानों की मुझे मदत मिली है । 

कोई भी ज्योतिषी आपको प्रैक्टिकल करके यह नही बता सकता के आपका कौनसा ग्रह आपको शुभ फल दे रहा है और कौनसा ग्रह आपको अशुभ फल दे रहा है? परंतु माँ भगवती की असीम कृपा से मैं आपको प्रैक्टिकली बता नही बल्कि दिखा सकता हु के आपका कौनसा ग्रह कुंडली मे शुभ और अशुभ फल दे रहा है । यह क्रिया तो आपको आमने-सामने बिठाकर दिखाना मेरे लिए कोई बड़ी बात नही है और जो भी यह प्रैक्टिकल देखना चाहे वह व्यक्ति आकर मुझसे मिल सकते है ।

सभी लोग जानते है मैं सीधी बात करना पसंद करता हु,मुझे घुमा फिराकर बात करना अच्छा नही लगता । प्रैक्टिकल क्रिया से देखा जाए तो किसी भी व्यक्ति के जन्म विवरण की आवश्यकता नही होती है परंतु कुंडली के अध्ययन हेतु जन्म विवरण आवश्यक है ।

हमारा मुख्य धेय इस लेख का यही है के "ऐसा कौनसा ग्रह हमारे कुंडली मे है जिसका उपासना और उपाय हमारे जीवन को पूर्णतः बदल दे?" । कुंडली मे नव ग्रह होते है जो व्यक्ति के जीवन का आधार है अपितु उन्ही से हमारे भूत भविष्य वर्तमान को हम जान सकते है और उन्ही नवग्रहों में एक ग्रह ऐसा भी होता है जो हमारे सम्पूर्ण जीवन को शुभता में बदल सकता है ।

ज्योतिषविदों के अनुसार लगभग 144 प्रकार की कुंडलिया बनती है,लेकिन ज्यादातर ज्योतिषी चन्द्र और लग्न कुंडली को ज्यादा महत्व देते है और सर्वोत्तम सटीक फलादेश हेतु यही कुंडलिया महत्वपूर्ण होती है । नवग्रहों में उस एक ग्रह का अध्ययन करना जो हमारे सम्पूर्ण जीवन को बदलकर हमे खुशिया प्रदान करे इसके लिए चन्द्र-सूर्य कुंडली से ज्यादा अन्य कुंडलियों का अध्ययन करना आवश्यक होता है । 

चंद्र और सूर्य कुंडली के साथ-साथ नवमांश कुंडली, वर्ग कुंडली, गोचर कुंडली के अध्ययन से हमे समझ मे आता है कि ऐसा कौनसा ग्रह कुंडली मे है जिसके मंत्र जाप करने के माध्यम से हमे जीवन मे उच्चता प्राप्त हो सकती है ।

जो व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए नवग्रहों में से उस एक ग्रह को अपने जीवन मे समर्पित होकर उनकी उपासना करना चाहते है उनको यह जानना अत्यधिक महत्वपूर्ण है के किसी एक ही ग्रह के उपाय और उपासना से जीवन को बेहतर बनाया जाए । 

आप किसी भी ज्योतिषी के पास जाओ तो वो लोग 2-3 ग्रह का उपाय बता देंगे और उससे भी कुछ फायदा नही हुआ तो कुछ नये उपाय किसी अन्य ग्रहों के बता देंगे परंतु मैं आपको आपकी कुण्डली को पाँच प्रकार से बनाकर सिर्फ एक ही ग्रह का उपाय,मंत्र और उपासना बताऊंगा जिससे जीवन मे फायदा ही होगा नुकसान नही ।

मुझसे किसी भी प्रकार का फलादेश जानने की इच्छा ना रखे क्योके मैं आपको 501/-रुपये दक्षिणा लेकर पाँच कुण्डलीयो का अध्ययन करके बता दूँगा के कौनसे ग्रह का जाप करने से आप जीवन के सभी कष्ट,बाधा,दोष को दूर करके सफलता प्राप्त कर सकते हो और मैं फलित ज्योतिष हेतु अन्य ज्योतिषविदों से ज्यादा दक्षिणा लेता हु इसलिए मुझसे कुंडली का फलित ना पूछे । मुझसे सिर्फ इतना ही जाने के कौनसे ग्रह का जाप-उपाय आपके लिए लाभदायक है ।

जिन्हें एक ग्रह के संबंध में जानना है जिस ग्रह के जाप-उपाय से कल्याण होगा वह व्यक्ति मेरे व्हाट्सएप पर अपना जन्म तारीख, जन्म समय और जन्म स्थान के बारे में लिखकर भेजे और साथ मे 501/-रुपये धनराशि देने का बैंक स्लिप या paytm का स्क्रीनशॉट भेजिए ।

Paytm numbar 9958417249

 है और बैंक एकाउंट डिटेल्स आपको व्हाट्सएप पर दिया जाएगा । आपको ग्रह का मंत्र और उपाय भी दिया जाएगा,साथ में यह भी बताया जाएगा के जीवन मे यह उपाय कब तक करना है ।

बिना दक्षिणा लिए और दिए ज्योतिष के संबंध में जानना शुभ नही होता है,इसलिए मैं दक्षिणा लेने हेतु बाध्य हु इसलिए जो लोग दक्षिणा देने में असमर्थ हो वह लोग मुझे माफ़ कर दे परंतु ज्योतिषीय कार्य बिना दक्षिणा के संभव नही है इसलिए बहोत कम धनराशि रखी है ।

निशुल्क में कुछ भी बता भी दु तो आपको उसका कोई महत्व नही रहेगा,यह मैं भली भाति जानता हूं ।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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नवग्रहों के सभी प्रकार के मंत्र, रत्न और धारण विधि






नवग्रहों के सभी प्रकार के मंत्र, रत्न और धारण विधि


नवग्रहों के मूल मंत्र -
सूर्य : ॐ सूर्याय नम:
चन्द्र : ॐ चन्द्राय नम:
गुरू : ॐ गुरवे नम:
शुक्र : ॐ शुक्राय नम:
मंगल : ॐ भौमाय नम:
बुध : ॐ बुधाय नम:
शनि : ॐ शनये नम: अथवा ॐ शनिचराय नम:
राहु : ॐ राहवे नम:
केतु : ॐ केतवे नम:
नवग्रहों के बीज मंत्र -
सूर्य : ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
चन्द्र : ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्राय नम:
गुरू : ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:
शुक्र : ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:
मंगल : ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
बुध : ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:
शनि : ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:
राहु : ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:
केतु : ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:

नवग्रहों के वेद मंत्र -

सूर्य : ॐ आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मतर्य च
हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन॥
इदं सूर्याय न मम॥
चन्द्र : ॐ इमं देवाSसपत् न ग्वं सुवध्वम् महते क्षत्राय महते ज्येष्ठयाय
महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय इमममुष्य पुत्रमुष्यै पुत्रमस्यै विश एष
वोSमी राजा सोमोSस्माकं ब्राह्मणानां ग्वं राजा॥ इदं चन्द्रमसे न मम॥
गुरू : ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अहार्द् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यददीदयच्छवस ॠतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम॥
इदं बृहस्पतये, इदं न मम॥
शुक्र : ॐ अन्नात् परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय:।
सोमं प्रजापति: ॠतेन सत्यमिन्द्रियं पिवानं ग्वं
शुक्रमन्धसSइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोSमृतं मधु॥ इदं शुक्राय, न मम।
मंगल : ॐ अग्निमूर्द्धा दिव: ककुपति: पृथिव्या अयम्।
अपा ग्वं रेता ग्वं सि जिन्वति। इदं भौमाय, इदं न मम॥
बुध : ॐ उदबुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहित्वमिष्टापूर्ते स ग्वं सृजेथामयं च।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत॥
इदं बुधाय, इदं न मम॥

शनि : ॐ शन्नो देविरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:। इदं शनैश्चराय, इदं न मम॥
राहु : ॐ कयानश्चित्र आ भुवद्वती सदा वृध: सखा।
कया शचिंष्ठया वृता॥ इदं राहवे, इदं न मम॥
केतु : ॐ केतुं कृण्वन्न केतवे पेशो मर्या अपेशसे।
समुषदभिरजा यथा:। इदं केतवे, इदं न मम॥
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नवग्रहों के रत्न -

भारतीय ज्योतिष में मान्यता प्राप्त नवग्रहों के रत्न निम्नलिखित हैं :—–

माणिक्य : यह रत्न ग्रहों के राजा माने जाने वाले सूर्य महाराज को बलवान बनाने के लिए पहना जाता है। इसका रंग हल्के गुलाबी से लेकर गहरे लाल रंग तक होता है। धारक के लिए शुभ होने की स्थिति में यह रत्न उसे व्यवसाय में लाभ, प्रसिद्धि, रोगों से लड़ने की शारीरिक क्षमता, मानसिक स्थिरता, राज-दरबार से लाभ तथा अन्य प्रकार के लाभ प्रदान कर सकता है। किन्तु धारक के लिए अशुभ होने की स्थिति में यह उसे अनेक प्रकार के नुकसान भी पहुंचा सकता है। माणिक्य को आम तौर पर दायें हाथ की कनिष्का उंगली में धारण किया जाता है। इसे रविवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण करना चाहिए।

मोती : यह रत्न सब ग्रहों की माता माने जाने वाले ग्रह चन्द्रमा को बलवान बनाने के लिए पहना जाता है। मोती सीप के मुंह से प्राप्त होता है। इसका रंग सफेद से लेकर हल्का पीला, हलका नीला, हल्का गुलाबी अथवा हल्का काला भी हो सकता है। ज्योतिष लाभ की दृष्टि से इनमें से सफेद रंग उत्तम होता है तथा उसके पश्चात हल्का नीला तथा हल्का पीला रंग भी माननीय है। धारक के लिए शुभ होने की स्थिति में यह उसे मानसिक शांति प्रदान करता है तथा विभिन्न प्रकार की सुख सुविधाएं भी प्रदान कर सकता है। मोती को आम तौर पर दायें हाथ की अनामिका या कनिष्का उंगली में धारण किया जाता है। इसे सोमवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण करना चाहिए।

पीला पुखराज : यह रत्न समस्त ग्रहों के गुरु माने जाने वाले बृहस्पति को बल प्रदान करने के लिए पहना जाता है। इसका रंग हल्के पीले से लेकर गहरे पीले रंग तक होता है। धारक के लिए शुभ होने की स्थिति में यह उसे धन, विद्या, समृद्धि, अच्छा स्वास्थय तथा अन्य बहुत कुछ प्रदान कर सकता है। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाथ की तर्जनी उंगली में गुरुवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है।

हीरा ( सफेद पुखराज ) : यह रत्न शुक्र को बलवान बनाने के लिए धारण किया जाता है तथा धारक के लिए शुभ होने पर यह उसे सांसरिक सुख-सुविधा, ऐशवर्य, मानसिक प्रसन्नता तथा अन्य बहुत कुछ प्रदान कर सकता है। हीरे के अतिरिक्त शुक्र को बल प्रदान करने के लिए सफेद पुखराज भी पहना जाता है। शुक्र के यह रत्न रंगहीन तथा साफ़ पानी या साफ़ कांच की तरह दिखते हैं। इन रत्नों को आम तौर पर दायें हाथ की मध्यामा उंगली में शुक्रवार की सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है।

लाल मूंगा : यह रत्न मंगल को बल प्रदान करने के लिए पहना जाता है तथा धारक के लिए शुभ होने पर यह उसे शारीरिक तथा मानसिक बल, अच्छे दोस्त, धन तथा अन्य बहुत कुछ प्रदान कर सकता है। मूंगा गहरे लाल से लेकर हल्के लाल तथा सफेद रंग तक कई रगों में पाया जाता है, किन्तु मंगल ग्रह को बल प्रदान करने के लिए गहरा लाल अथवा हल्का लाल मूंगा ही पहनना चाहिए। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाथ की कनिष्का अथवा तर्जनी उंगली में मगलवार को सुबह स्नान करने के बाद पहना जाता है।

पन्ना : यह रत्न बुध ग्रह को बल प्रदान करने के लिए पहना जाता है तथा धारक के लिए शुभ होने पर यह उसे अच्छी वाणी, व्यापार, अच्छी सेहत, धन-धान्य तथा अन्य बहुत कुछ प्रदान कर सकता है। पन्ना हल्के हरे रंग से लेकर गहरे हरे रंग तक में पाया जाता है। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाथ की अनामिका उंगली में बुधवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है।

नीलम : शनि महाराज का यह रत्न नवग्रहों के समस्त रत्नों में सबसे अनोखा है तथा धारक के लिए शुभ होने की स्थिती में यह उसे धन, सुख, समृद्धि, नौकर-चाकर, व्यापरिक सफलता तथा अन्य बहुत कुछ प्रदान कर सकता है किन्तु धारक के लिए शुभ न होने की स्थिती में यह धारक का बहुत नुकसान भी कर सकता है। इसलिए इस रत्न को किसी अच्छे ज्योतिषि के परामर्श के बिना बिल्कुल भी धारण नहीं करना चाहिए। इस रत्न का रंग हल्के नीले से लेकर गहरे नीले रंग तक होता है। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाध की मध्यमा उंगली में शनिवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है।

गोमेद : यह रत्न राहु महाराज को बल प्रदान करने के लिए पहना जाता है तथा धारक के लिए शुभ होने की स्थिति में यह उसे अक्समात ही कही से धन अथवा अन्य लाभ प्रदान कर सकता है। किन्तु धारक के लिए अशुभ होने की स्थिति में यह रत्न उसका बहुत अधिक नुकसान कर सकता है और धारक को अल्सर, कैंसर तथा अन्य कई प्रकार की बिमारियां भी प्रदान कर सकता है। इसलिए इस रत्न को किसी अच्छे ज्योतिषि के परामर्श के बिना बिल्कुल भी धारण नहीं करना चाहिए। इसका रंग हल्के शहद रंग से लेकर गहरे शहद रंग तक होता है। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाथ की मध्यमा अथवा अनामिका उंगली में शनिवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है।

लहसुनिया : यह रत्न केतु महारा

ज को बल प्रदान करने के लिए पहना जाता है तथा धारक के लिए शुभ होने पर यह उसे व्यसायिक सफलता, आध्यात्मिक प्रगति तथा अन्य बहुत कुछ प्रदान कर सकता है किन्तु धारक के लिए अशुभ होने की स्थिति में यह उसे घोर विपत्तियों में डाल सकता है तथा उसे कई प्रकार के मानसिक रोगों से पीड़ित भी कर सकता है। इसलिए इस रत्न को किसी अच्छे ज्योतिषि के परामर्श के बिना बिल्कुल भी धारण नहीं करना चाहिए। इसका रंग लहसुन के रंग से लेकर गहरे भूरे रंग तक होता है किन्तु इस रत्न के अंदर दूधिया रंग की एक लकीर दिखाई देती है जो इस रत्न को हाथ में पकड़ कर धीरे-धीरे घुमाने के साथ-साथ ही घूमना शुरू कर देती है। इस रत्न को आम तौर पर दायें हाथ की मध्यमा उंगली में शनिवार को सुबह स्नान करने के बाद धारण किया जाता है।

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रत्न धारण करने की विधि -

अपने लिए उपयुक्त रत्न जान लेने के पश्चात आपके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि इन रत्नों को धारण करने की सही विधि क्या है। तो आइए आज इसी विषय पर चर्चा करते हैं कि किसी भी रत्न को धारण करते समय किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले यह जान लें कि प्रत्येक रत्न को धारण करने के लिए सबसे बढ़िया दिन कौन सा है। प्रत्येक रत्न को धारण करने के लिए उत्तम दिन इस प्रकार हैं :

माणिक्य : रविवार
मोती : सोमवार
पीला पुखराज : गुरुवार
सफ़ेद पुखराज : शुक्रवार
लाल मूंगा : मंगलवार
पन्ना : बुधवार
नीलम : शनिवार
गोमेद : शनिवार
लहसुनिया : शनिवार

आइए अब इन्हें धारण करने की विधि पर विचार करें। सबसे पहले यह जान लेते हैं कि किसी भी रत्न को अंगूठी में जड़वाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। जिस अंगूठी में आप रत्न को जड़वाना चाहते हैं, उसका नीचे का तला खुला होना चाहिए तथा आपका रत्न उस खुले तले में से हलका सा नीचे की तरफ निकला होना चाहिए जिससे कि वह आपकी उंगली को सही प्रकार से छू सके तथा अपने से संबंधित ग्रह की उर्जा आपकी उंगली के इस सम्पर्क के माध्यम से आपके शरीर में स्थानांतरित कर सके। 

इसलिए अपने रत्न से जड़ित अंगूठी लेने पहले यह जांच लें कि आपका रत्न इस अंगूठी में से हल्का सा नीचे की तरफ़ निकला हुआ हो। अंगूठी बन जाने के बाद सबसे पहले इसे अपने हाथ की इस रत्न के लिए निर्धारित उंगली में पहन कर देखें ताकि अंगूठी ढीली अथवा तंग होने की स्थिति में आप इसे उसी समय ठीक करवा सकें।

अंगूठी को प्राप्त कर लेने के पश्चात इसे धारण करने से 24 से 48 घंटे पहले किसी कटोरी में गंगाजल अथवा कच्ची लस्सी में डुबो कर रख दें। कच्चे दूध में आधा हिस्सा पानी मिलाने से आप कच्ची लस्सी बना सकते हैं किन्तु ध्यान रहे कि दूध कच्चा होना चाहिए अर्थात इस दूध को उबाला न गया हो। गंगाजल या कच्चे दूध वाली इस कटोरी को अपने घर के किसी स्वच्छ स्थान पर रखें।

 उदाहरण के लिए घर में पूजा के लिए बनाया गया स्थान इसे रखने के लिए उत्तम स्थान है। किन्तु घर में पूजा का स्थान न होने की स्थिति में आप इसे अपने अतिथि कक्ष अथवा रसोई घर में किसी उंचे तथा स्वच्छ स्थान पर रख सकते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस कटोरी को अपने घर के किसी भी शयन कक्ष में बिल्कुल न रखें। रत्न धारण करने के इस चरण को रत्न के शुद्धिकरण का नाम दिया जाता है।

इसके पश्चात इस रत्न को धारण करने के दिन प्रात उठ कर स्नान करने के बाद इसे धारण करना चाहिए। वैसे तो प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व का समय रत्न धारण करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है किन्तु आप इसे अपने नियमित स्नान करने के समय पर भी धारण कर सकते हैं। स्नान करने के बाद रत्न वाली कटोरी को अपने सामने रख कर किसी स्वच्छ स्थान पर बैठ जाएं तथा रत्न से संबंधित ग्रह के मूल मंत्र, बीज मंत्र अथवा वेद मंत्र का 108 बार जाप करें। 

इसके बाद अंगूठी को कटोरी में से निकालें तथा इसे अपनी उंगली में धारण कर लें। उदाहरण के लिए यदि आपको माणिक्य धारण करना है तो रविवार की सुबह स्नान के बाद इस रत्न को धारण करने से पहले आपको सूर्य के मूल मंत्र, बीज मंत्र अथवा वेद मंत्र का जाप करना है। रत्न धारण करने के लिए किसी ग्रह के मूल मंत्र का जाप माननीय होता है तथा आप इस ग्रह के मूल मंत्र का जाप करने के पश्चात रत्न को धारण कर सकते हैं। 

किन्तु अपनी मान्यता तथा समय की उपलब्धता को देखकर आप इस ग्रह के बीज मत्र या वेद मंत्र का जाप भी कर सकते हैं। रत्न धारण करने के इस चरण को रत्न की प्राण-प्रतिष्ठा का नाम दिया जाता है। नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह से संबंधित मूल मंत्र, बीज मत्र तथा वेद मंत्र जानने के लिए नवग्रहों के मंत्र नामक लेख पढ़ें।

कृप्या ध्यान दें :

 कुछ ज्योतिषि किसी विशेष रत्न जैसे कि नीलम को रात के समय धारण करने की सलाह देते हैं किन्तु रत्नों को केवल दिन के समय ही धारण करना चाहिए। कई बार कोई रत्न धारण करने के कुछ समय के बाद ही आपके शरीर में कुछ अवांछित बदलाव लाना शुरू कर देता है तथा उस स्थिति में इसे उतारना पड़ता है। 

दिन के समय रत्न धारण करने से आप ऐसे बदलावों को महसूस करते ही इस रत्न को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान पहुंचाने से पहले ही उतार सकते हैं किन्तु रात के समय रत्न धारण करने की स्थिति में अगर यह रत्न ऐसा कोई बदलाव लाता है तो सुप्त अवस्था में होने के कारण आप इसे उतार भी नहीं पाएंगे तथा कई बार आपके प्रात: उठने से पहले तक ही यह रत्न आपको कोई गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचा देता है। इसलिए रत्न केवल सुबह के समय ही धारण करने चाहिएं।

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जन्मकुंडली के ये 10 घातक योग, तुरंत करें ये उपाय









जन्मकुंडली के ये 10 घातक योग, तुरंत करें ये उपाय



जन्म कुंडली में 2 या उससे ज्यादा ग्रहों की युति, दृष्टि, भाव आदि के मेल से योग का निर्माण होता है। ग्रहों के योगों को ज्योतिष फलादेश का आधार माना गया है।

 अशुभ योग के कारण व्यक्ति को जिंदगीभर दु:ख झेलना पड़ता है। आओ जानते हैं कि कौन-कौन से अशुभ योग होते हैं और क्या है उनका निवारण?


1. चांडाल योग

* कुंडली के किसी भी भाव में बृहस्पति के साथ राहु या केतु का होना या दृष्टि आदि होना चांडाल योग बनाता है।

* इस योग का बुरा असर शिक्षा, धन और चरित्र पर होता है। जातक बड़े-बुजुर्गों का निरादर करता है और उसे पेट एवं श्वास के रोग हो सकते हैं।

* इस योग के निवारण हेतु उत्तम चरित्र रखकर पीली वस्तुओं का दान करें। माथे पर केसर, हल्दी या चंदन का तिलक लगाएं।

* संभव हो तो एक समय ही भोजन करें और भोजन में बेसन का उपयोग करें। अन्यथश प्रति गुरुवार को कठिन व्रत रखें।


2. अल्पायु योग

* जब जातक की कुंडली में चन्द्र ग्रह पाप ग्रहों से युक्त होकर त्रिक स्थानों में बैठा हो या लग्नेश पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो और वह शक्तिहीन हो तो अल्पायु योग का निर्माण होता है। 

* अल्पायु योग में जातक के जीवन पर हमेशा हमेशा संकट मंडराता रहता है, ऐसे में खानपान और व्यवहार में सावधानी रखनी चाहिए।

* अल्पायु योग के निदान के लिए प्रतिदिन हनुमान चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र पढ़ना चाहिए और जातक को हर तरह के बुरे कार्यों से दूर रहना चाहिए।


3. ग्रहण योग

* ग्रहण योग मुख्यत: 2 प्रकार के होते हैं- सूर्य और चन्द्र ग्रहण। यदि चन्द्रमा पाप ग्रह राहु या केतु के साथ बैठे हों तो चन्द्रग्रहण और सूर्य के साथ राहु हो तो सुर्यग्रहण होता है।

* चन्द्रग्रहण से मानसिक पीड़ा और माता को हानि पहुंचती है। सूर्यग्रहण से व्यक्ति कभी भी जीवन में स्टेबल नहीं हो पाता है, हड्डियां कमजोर हो जाती है, पिता से सुख भी नहीं मिलता।

* ऐसी स्थिति में 6 नारियल अपने सिर पर से वार कर जल में प्रवाहित करें। आदित्यहृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करें। सूर्य को जल चढ़ाएं। एकादशी और रविवार का व्रत रखें। दाढ़ी और चोटी न रखें।

4. वैधव्य योग

*वैधव्य योग बनने की कई स्थितियां हैं। वैधव्य योग का अर्थ है विधवा हो जाना। सप्तम भाव का स्वामी मंगल होने व शनि की तृतीय, सप्तम या दशम दृष्टि पड़ने से भी वैधव्य योग बनता है। सप्तमेश का संबंध शनि, मंगल से बनता हो व सप्तमेश निर्बल हो तो वैधव्य का योग बनता है।

*जातिका को विवाह के 5 साल तक मंगला गौरी का पूजन करना चाहिए, विवाह पूर्व कुंभ विवाह करना चाहिए और यदि विवाह होने के बाद इस योग का पता चलता है तो दोनों को मंगल और शनि के उपाय करना चाहिए।

5. दारिद्रय योग

*यदि किसी जन्म कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दारिद्रय योग बन जाता है।

*दारिद्रय योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवनभर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को अपने जीवन में अनेक बार आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।

6. षड्यंत्र योग

*यदि लग्नेश 8वें घर में बैठा हो और उसके साथ कोई शुभ ग्रह न हो तो षड्यंत्र योग का निर्माण होता है।

*जिस स्त्री-पुरुष की कुंडली में यह योग होता है वह अपने किसी करीबी के षड्यंत्र का शिकार होता है। इससे उसे धन-संपत्ति व मान-सम्मान आदि का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

*इस दोष को शांत करने के लिए प्रत्येक सोमवार भगवान शिव और शिव परिवार की पूजा करनी चाहिए। प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते रहना चाहिए।



7. कुज योग

*यदि किसी कुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो कुज योग बनता है। इसे मांगलिक दोष भी कहते हैं।

*जिस स्त्री या पुरुष की कुंडली में कुज दोष हो, उनका वैवाहिक जीवन कष्टप्रद रहता है इसीलिए विवाह से पूर्व भावी वर-वधू की कुंडली मिलाना आवश्यक है। यदि दोनों की कुंडली में मांगलिक दोष है तो ही विवाह किया जाना चाहिए।

*विवाह होने के बाद इस योग का पता चला है तो पीपल और वटवृक्ष में नियमित जल अर्पित करें। मंगल के जाप या पूजा करवाएं। प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें।

8. केमद्रुम योग

*यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा के अगले और पिछले दोनों ही घरों में कोई ग्रह न हो तो या कुंडली में जब चन्द्रमा द्वितीय या द्वादश भाव में हो और चन्द्र के आगे और पीछे के भावों में कोई अपयश ग्रह न हो तो केमद्रुम योग का निर्माण होता है।

*इस योग के चलते जातक जीवनभर धन की कमी, रोग, संकट, वैवाहिक जीवन में भीषण कठिनाई आदि समस्याओं से जूझता रहता है।

*इस योग के निदान हेतु प्रति शुक्रवार को लाल गुलाब के पुष्प से गणेश और महालक्ष्मी का पूजन करें। मिश्री का भोग लगाएं। चन्द्र से संबंधित वस्तुओं का दान करें।


9. अंगारक योग

*यदि किसी कुंडली में मंगल का राहु या केतु में से किसी के साथ स्थान अथवा दृष्टि से संबंध स्थापित हो जाए तो अंगारक योग का निर्माण हो जाता है।

*इस योग के कारण जातक का स्वभाव आक्रामक, हिंसक तथा नकारात्मक हो जाता है तथा ऐसा जातक अपने भाई, मित्रों तथा अन्य रिश्तेदारों के साथ कभी भी अच्छे संबंध नहीं रखता। उसका कोई कार्य शांतिपूर्वक नहीं निपटता।

*इसके निदान हेतु प्रतिदिन हनुमानजी की उपासना करें। मंगलवार के दिन लाल गाय को गुड़ और प्रतिदिन पक्षियों को गेहूं या दाना आदि डालें। अंगारक दोष निवारण यंत्री भी स्थापित कर सकते हैं।


10.विष योग :

*शनि और चंद्र की युति या शनि की चंद्र पर दृष्टि से विष योग बनता है। कर्क राशि में शनि पुष्य नक्षत्र में हो और चंद्रमा मकर राशि में श्रवण नक्षत्र में हो अथवा चन्द्र और शनि विपरीत स्थिति में हों और दोनों अपने-अपने स्थान से एक दूसरे को देख रहे हों तो तब भी विष योग बनता है।

 यदि 8वें स्थान पर राहु मौजूद हो और शनि मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक लग्न में हो तो भी यह योग बनता है।

*इस योग से जातक को जिंदगीभर कई प्रकार की विष के समान कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पूर्ण विष योग माता को भी पीड़ित करता है।

*इस योग के निदान हेतु संकटमोचक हनुमानजी की उपासना करें और प्रति शनिवार को छाया दान करते रहें। सोमवार को शिव की आराधना करें या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

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