Friday, November 1, 2019

शनिवार के दिन करने वाला उपाय






शनिवार के दिन करने वाला उपाय


शनिवार के दिन एक पीपल का पत्ता लेकर ,पहले इसे आछे से धो ले अब इसे गंगाजल द्वारा पवित्र करे अब इस पीपल के पत्ते के उप्पर दही ओर हल्दी के घोल द्वारा अपने दाएं हाथ की अनामिका उंगली द्वारा  ह्री शब्द लिखे, 

अब इस पत्ते को धूप दीप दिखाकर  अपने पर्स में रख ले  प्रत्येक शनिवार को नया पत्ता प्रयोग करे। पुराने पत्ते को किसी बहते पानी मे प्रवाहित कर दे, इस प्रेयोग करने से पर्स सदा भरा रहेगा अनायास होने वाले खर्चे अपने आप कम हो जायेगें..

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

राजगुरु जी

तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान  अनुसंधान संस्थान

महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट

 (रजि.)

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

मोबाइल नं. : - 09958417249

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पिशाचिनी या पैशाचिनी साधनाएं :



पिशाचिनी या पैशाचिनी साधनाएं :


पिशाची देवी ही पिशाचिनी साधनाओं की अधिष्ठात्री देवी है। यह हमारे हृदय चक्र की देवी है। इसे बहुत ही खतरनाक तरह की साधनाएं माना जाता है। 

किसी भी एक पिशाचिनी की साधना करने के बाद व्यक्ति को चमत्कारिक सिद्धि प्राप्त हो जाती है। पिशाचिनी साधना में कर्ण पिशाचिनी, काम पिशाचिनी आदि का नाम प्रमुख है।

 पिशाच शब्द से यह ज्ञात होता है कि यह किसी खतरनाक भूत या प्रेत का नाम है लेकिन ऐसा नहीं है। यह साधनाएं भी तंत्र के अंतर्गत आती है।

कर्ण पिशाचिनी साधना को सिद्ध करने के बाद साधक में वो शक्ति आ जाती है कि वह सामने बैठे व्यक्ति की नितांत व्यक्तिगत जानकारी भी जान लेता है। 

कर्ण पिशाचिनी साधक को किसी भी व्यक्ति की किसी भी तरह की जानकारी कान में बता देती है। 

इस साधना की सिद्धि के पश्चात् किसी भी प्रश्न का उत्तर कोई पिशाचिनी कान में आकर देती है अर्थात् मंत्र की सिद्धि से पिशाच-वशीकरण होता है। 

मंत्र की सिद्धि से वश में आई कोई आत्मा कान में सही जवाब बता देती है। पारलौकिक शक्तियों को वश में करने की यह विद्या अत्यंत गोपनीय और प्रामाणिक है।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

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Thursday, October 31, 2019

नौवी महाविद्या मातंगी





नौवी महाविद्या मातंगी


सांसारिक रूप में महाविद्या कमला का आराधना से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के बाद किसी भी आदमी को जरूरत होती है, अपने आभामंडल और प्रभाव को बढ़ाने की। इंसान चाहता है कि लोग उसके धन व ऐश्वर्य को समझें और उसे सम्मान दें। 

दूसरी ओर आध्यात्मिक क्षेत्र का साधक कमला की साधना से खुद को अंदर से परिपूर्ण करने के बाद प्रकृति को मोहित कर अपने साधना के स्तर को उठाना चाहता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ती है नौवीं महाविद्या मातंगी की। इनमें पूरे ब्रह्मांड को मोहित करने की शक्ति है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा था कि सभी महाविद्या में सब कुछ प्रदान करने की शक्ति है लेकिन उनके विशेषज्ञता के खास क्षेत्र हैं। 

तंत्र के क्षेत्र में मातंगी की साधना का काफी महत्व है। यह ममता की मूर्ति हैं और सामन्यतया साधकों पर प्रसन्न होने में अधिक देर नहीं लगाती हैं। इनकी प्रसन्नता से ज्ञान वृद्धि, शास्त्राज्ञाता, कवित्व शक्ति एवं संगीत विद्या की भी प्राप्ति संभव है।

 यह सम्मोहन और वशीकरण की अधिष्ठात्री हैं। इनके प्रयोग से भंडार की अक्षयवृद्धि होती है। आवश्यकता सिर्फ श्रद्धा का नियमपूर्वक साधना करने की है। मातंगी की साधना के बारे में संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है। विस्तृत जानकारी के लिए अपने आसपास के किसी योग्य व्यक्ति से या मेल से मुझसे जानकारी ली जा सकती है।

मातंगी के कई नाम हैं। इनमें प्रमुख हैं-सुमुखी, लघुश्यामा या श्यामला, उच्छिष्टचांडालिनी, उच्छिष्टमातंगी, राजमातंगी, कर्णमातंगी, चंडमातंगी, वश्यमातंगी, मातंगेश्वरी, ज्येष्ठमातंगी, सारिकांबा, रत्नांबा मातंगी एवं वर्ताली मातंगी।

1-अष्टाक्षर मातंगी मंत्र- कामिनी रंजनी स्वाहा

विनियोग— अस्य मंत्रस्य सम्मोहन ऋषिः, निवृत् छंदः, सर्व सम्मोहिनी देवता सम्मोहनार्थे जपे विनियोकगः।

ध्यान--- श्यामंगी वल्लकीं दौर्भ्यां वादयंतीं सुभूषणाम्। चंद्रावतंसां विविधैर्गायनैर्मोहतीं जगत्।

फल व विधि------ विनियोग से ही मंत्र का फल स्पष्ट 20 हजार जप कर मधुयुक्त मधूक पूष्पों से हवन करने पर अभीष्ट की सिद्धि होती है।
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2-दशाक्षर मंत्र------ ऊं ह्री क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा।

विनियोग— अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिःर्विराट् छंदः, मातंगी देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्लीं कीलकं, सर्वेष्टसिद्धये जपे विनियोगः।

अंगन्यास--- ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः से हृदयादि न्यास करें।

फल व विधि------ साधक छह हजार जप नित्य करते हुए 21 दिन प्रयोग करें। फिर दशांस हवन करें। चतुष्पद श्मसान या कलामध्य में मछली, मांस, खीर व गुगल का धूप दे तो कवित्व शक्ति की प्राप्ति होती है। इससे जल, अग्नि एवं वाणी का स्तंभन भी संभव है।

 इसकी साधना करने वाला वाद-विवाद में अजेय बन जाता है। उसके घर में स्वयं कुबेर आकर धन देते हैं।

3-लघुश्यामा मातंगी का विंशाक्षर मंत्र--------- ऐं नमः उच्छिष्ट चांडालि मांतगि सर्ववशंकरि स्वाहा।

विधि--- 

विनियोग व न्यास आदि के साथ देवी की पूजा कर 11, 21, 41 दिन या पूर्णिमा/आमावास्या से पूर्णिमा/आमावास्या तक एक लाख जप पूर्ण करें। मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इसका जप उच्छिष्ट मुंह किया जाना चाहिए। ऐसा किया भी जा सकता है लेकिन विभिन्न ग्रंथों में इसे पवित्र होकर करने का भी विधान है।

 अतः साधक सुविधानुसार जप करें। जप पू्र्ण होने के बाद महुए के फूल व लकड़ी के दशांस होम कर तर्पन व मार्जन करें।

फल-------

 इसके प्रयोग से डाकिनी, शाकिनी एवं भूत-प्रेत बाधा नहीं पहुंचा सकते हैं। इसकी साधना से प्रसन्न होकर देवी साधक को देवतुल्य बना देती है। उसकी समस्त अभिलाषाएं  पूरी होती हैं। 

चूंकि मातंगी वशीकरण विद्या की देवी हैं, इसलिए इसके साधक की वह शक्ति भी अद्भुत बढ़ती है। राजा-प्रजा सभी उसके वश में रहते हैं।

4-एकोन विंशाक्षर उच्छिष्ट मातंगी तथा द्वात्रिंशदक्षरों मातंगी मंत्र

मंत्र (एक)--- नमः उच्छिष्ट चांडालि मातंगी सर्ववशंकरि स्वाहा।

मंत्र (दो)---- ऊं ह्रीं ऐं श्रीं नमो भगवति उच्छिष्टचांडालि श्रीमातंगेश्वरि सर्वजन वशंकरि स्वाहा।

विधि-----

 विधिपूर्वक दैनिक पूजन के बाद निश्चित (जो साधक जप से पूर्व तय करे) समयावधि (घंटे या दिन) में दस हजार जप कर पुरश्चरण करे। उसके बाद दशांस हवन करे।

फल----- 

मधुयुक्त महुए के फूल व लकड़ी से हवन करने पर वशीकरण का प्रयोग सिद्ध होता है। मल्लिका फूल के होम से योग सिद्धि, बेल फूल के हवन से राज्य प्राप्ति, पलास के पत्ते व फूल के हवन में जन वशीकरण, गिलोय के हवन से रोगनाश, थोड़े से नीम के टुकड़ों व चावल के हवन से धन प्राप्ति, नीम के तेल से भीगे नमक से होम करने पर शत्रुनाश, केले के फल के हवन से समस्त कामनाओं की सिद्धि होती है।

 खैर की लकड़ी से हवन कर मधु से भीगे नमक के पुतले के दाहिने पैर की ओर हवन की अग्नि में तपाने से शत्रु वश में होता है।

5-सुमुखी मातंगी प्रयोग

इसमें दो मंत्र हैं जिसमें सिर्फ ई की मात्रा का अंतर है पर ऋषि दोनों के अलग-अलग हैं। इसमें फल समान है।

पहला मंत्र---- उच्छिष्ट चांडालिनी सुमुखी देवी महापिशाचिनी ह्रीं ठः ठः ठः।

इसके ऋषि अज, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं।

विधि---- 

देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह आठ हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है। साधक को धन की प्राप्ति होती है और उसका आभामंडल बढ़ता है। हवन की विधि नीचे है।

दूसरा मंत्र-----

 उच्छिष्ट चांडालिनि सुमुखि देवि महापिशाचिनि ह्रीं ठः ठः ठः।

इसके ऋषि भैरव, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं।

विधि---- 

इसकी कई विधियां हैं। एक में एक लाख मंत्र जप का भी विधान वर्णित है। लेकिन मेरा मानना है कि देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह दस हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है और साधक को धन की प्राप्ति होती है तथा उसका आभामंडल बढ़ता है।

हवन विधि------ 

दही से सिक्त पीली सरसो व चावल से हवन करने पर राजा-मंत्री सभी वश में हो जाते हैं। बिल्ली के मांस से हवन करने पर शस्त्र का वसीकरण होता है। बकरे के मांस के हवन से धन-समृद्धि मिलती है। 

खीर के हवन से विद्या प्राप्ति तथा मधु व घी युक्त पान के पत्तों के हवन से महासमृद्धि की प्राप्ति होती है।

 कौवे व उल्लू के पंख के हवन से शत्रुओं का विद्वेषण होता है।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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महाकाली वीर साधना






महाकाली वीर साधना


वीर साधना सदा से साधको के मध्य प्रचलित रही है।वीर कई प्रकार के होते है।उनमे से ही एक है महाकाली वीर।इस वीर की उत्पत्ति महाकाली से ही होती है तथा ये उन्ही में विलीन हो जाता है।

ये कई कार्य संपन्न कर सकता है जैसे साधक को सुरक्षा प्रदान करना,कई प्रकार की जानकारी लाकर देना,कई गोपनीय साधनाओ के विषय में बताना आदि सभी कार्य कर सकता है जो साधक आदेश देता है।

वास्तव में इस वीर की अपनी कोई शक्ति नहीं होती है।ये महाकाली से शक्ति प्राप्त करता है,अतः इससे कभी कोई अनेतिक कार्य नहीं करवाया जा सकता है अन्यथा ये साधक को छोड़कर पुनः महाकाली में समां जाता है,और दुबारा कभी सिद्ध नहीं होता है।

साधना जितनी रोचक है उतनी ही उग्र भी है अतः निडर व्यक्ति ही इसे करे।तथा गुरु आज्ञा से ही साधना की जाये।साधना में यदि कोई हानि होती है तो उसके लिये हम जिमीदार नहीं है,अतः स्वयं के विवेक का प्रयोग करे.

विधि : 

साधना शमशान,निर्जन स्थान,या नदी तट पर करे अगर ये संभव न हो तो किसी ऐसे कक्ष में करे जहा कोई साधना पूर्ण होने तक न आये।आपके आसन वस्त्र काले हो तथा दिशा दक्षिण हो।।

सामने एक नीला वस्त्र बिछाये,उस पर महाकाली का कोई भी चित्र स्थापित करे,गुरु तथा गणेश पूजन संपन्न करे,तथा सुरक्षा घेरा खीच ले।अब महाकाली का सामान्य पूजन करे,सरसों के तेल का दीपक लगाये।लोबान की अगरबत्ती जलाये,भोग में गुलाबजामुन रखे,ये नित्य साधना स्थल पर ही छोड़ कर आ जाना है,यदि आप घर में कर रहे है तो नित्य गाय को खिला दे,उत्तम रहेगा यदि आप नित्य भोग भैरव मंदिर में रख आये।

माँ से प्रार्थना करे की वे अपने वीर को भेजे।और रुद्राक्ष माला या काली हकिक माला से पहले निम्न मंत्र की ११ माला संपन्न करे .

मंत्र : 

||जंत्र काली मंत्र काली तंत्र काली||

अब निचे दिए गए मंत्र को लगातार माँ के चित्र की और देखते हुए एक घंटे तक जाप करे बिना किसी माला के।

मंत्र : 

||वीर वीर महाकाली को वीर,आवो टूटे मेरो धीर,महाकाली की दुहाई दू,तुझको काली मिठाई दू,मेरो हुकुम पूरण करो,जो यहाँ न आओ तो महाकाली को खडग पड़े,तू चटक कुआँ में गिर मरे ,आदेश आदिनाथ को आदेश आदेश आदेश||

साधना ४१ दिन करे,वीर माँ के चित्र से ही प्रत्यक्ष होता है।जब सामने आये तो डरे नहीं भोग की मिठाई उसे दे दे,और वचन ले ले की में जब तुम्हे बुलाऊंगा तब आना और मेरे कार्य पूर्ण करना।

स्मरण रहे कोई गलत कार्य न करवाना अन्यथा सिद्धि समाप्त,और पुनः कभी सिद्ध होगी भी नहीं अतः सावधान रहे।कभी कभी वीर साधना पूर्ण होने के पहले ही आ जाता है,तब भी उससे बोले नहीं जाप करते रहे।

यदि जाप के बाद भी वो वही रहे और आपसे बात करे तो मिठाई देकर वचन ले ले।और साधना को वही समाप्त कर दे।माँ आपका कल्याण करे

जय माँ



विशेष -

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अघोर पंथियों के 10 तांत्रिक पीठ





अघोर पंथियों के 10 तांत्रिक पीठ




अघोर पंथ को शैव और शाक्त संप्रदाय की एक तांत्रिक शाखा माना गया है। अघोर पंथ की उत्पत्ति काल के बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, लेकिन इन्हें कपालिक संप्रदाय के समकक्ष मानते हैं। वाराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं।

मान्यता है कि भगवान शिव ने स्वयं की इस पंथ की स्थापना की थी। अघोर पंथ का प्रारंभिक गढ़ शिव की नगरी काशी को माना गया है, लेकिन आगे चलकर यह शक्तिपीठों में साधना करने लगे। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख अघोर तीर्थ के बारे में...

सबसे कठिन साधना का स्थल, 




तारापीठ :

 तारापीठ को तांत्रिकों, मांत्रिकों, शाक्तों, शैवों, कापालिकों, औघड़ों आदि सबमें समान रूप से प्रमुख और पूजनीय माना गया है। इस स्थान पर सती पार्वती की आंखें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर गिरी थीं इसलिए यह शक्तिपीठ बन गया।

यह स्थल तारा साधन के लिए जगत प्रसिद्ध रहा है। यहां सती के रूप में तारा मां का मंदिर है और पार्श्व में महाश्मशान। सबसे पहले इस मंदिर की स्थापना महर्षि वशिष्ठ ने की थी। पुरातन काल में उन्होंने यहां कठोर साधना की थी।

मान्यता है कि वशिष्ठजी मां तारा को प्रसन्न नहीं कर पाए थे। कारण कि चीनाचार को छोड़कर अन्य किसी साधना विधि से भगवती तारा प्रसन्न नहीं होतीं। माना जाता है कि यह साधना भगवान बुद्ध जानते थे। बौधों में वज्रयानी साधक इस विद्या के जानकार बतलाए जाते हैं। अघोर साधुओं को भी इस विद्या की सटीक जानकारी है।

प्रमुख अघोराचार्य में बामा चट्टोपाध्याय का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इन्हें बामाखेपा कहा जाता था।

शताब्दियों से साधकों, सिद्धों में प्रसिद्ध यह स्थल पश्चिम बंगाल के बीरभूम अंचल में रामपुर हाट रेलवे स्टेशन के पास द्वारका नदी के किनारे स्थित है। कोलकाता से तारापीठ की दूरी लगभग 265 किलोमीटर है। यह स्थल रेल एवं सड़क मार्ग दोनों से जुड़ा है।

दूसरा प्रमुख तीर्थ 'नानी का हज', 





हिंगलाज धाम :

 हिंगलाज धाम अघोर पंथ के प्रमुख स्थलों में शामिल है। हिंगलाज धाम वर्तमान में विभाजित भारत के हिस्से पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में स्थित है। यह स्थान सिंधु नदी के मुहाने से 120 किलोमीटर और समुद्र से 20 किलोमीटर तथा कराची नगर के उत्तर-पश्चिम में 125 किलोमीटर की दूरी पर हिंगोल नदी के किनारे स्थित है।

माता के 52 शक्तिपीठों में इस पीठ को भी गिना जाता है। यहां हिंगलाज स्थल पर सती का सिरोभाग कट कर गिरा था। यह अचल मरुस्थल होने के कारण इस स्थल को मरुतीर्थ भी कहा जाता है। इसे भावसार क्षत्रियों की कुलदेवी माना जाता है।

अब यह क्षेत्र मुसलमानों के अधिकार में चला गया है। यहां के स्थानीय मुसलमान हिंगलाज पीठ को 'बीबी नानी का मंदर' कहते हैं। अप्रैल के महीने में स्थानीय मुसलमान समूह बनाकर हिंगलाज की यात्रा करते हैं और इस स्थान पर आकर लाल कपड़ा चढ़ाते हैं, अगरबत्ती जलाते है और शिरीनी का भोग लगाते हैं। वे इस यात्रा को 'नानी का हज' कहते हैं।

हिंगलाज देवी की गुफा रंगीन पत्थरों से निर्मित है। माना जाता है कि इस गुफा का निर्माण यक्षों द्वारा किया गया था, इसीलिए रंगों का संयोजन इतना भव्य बन पड़ा है। पास ही एक भैरवजी का भी स्थान है। भैरवजी को यहां पर 'भीमालोचन' कहा जाता है।

* यह हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से में चले जाने के बाद वाराणसी की एक गुफा क्रीं कुण्ड में बाबा कीनाराम हिंगलाज माता की प्रतिमूर्ति स्थापित की गई है।

* इन दो स्थलों के अलावा हिंगलाज देवी एक और स्थान पर विराजती हैं, वह स्थान उड़ीसा प्रदेश के तालचेर नामक नगर से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

जनश्रुति की मानें तो विदर्भ क्षेत्र के राजा नल माता हिंगलाज के परम भक्त थे। अतः माता हिंगलाज अग्नि रूप में जगन्नाथ मंदिर के रंधनशाला में भी विराजमान हैं। उन्हीं अग्निरूपा माता हिंगलाज का मंदिर तालचेर के पास स्थापित है।

 महिषासुर के वध के बाद जहां ठहरी थी माता...





विंध्याचल :

 विंध्याचल की पर्वत श्रृंखला जगप्रसिद्ध है। यहां पर विंध्यवासिनी माता का एक प्रसिद्ध मंदिर है। इस स्थल में तीन मुख्य मंदिर हैं- विंध्यवासिनी, कालीखोह और अष्टभुजा। इन मंदिरों की स्थिति त्रिकोण यंत्रवत है। इनकी त्रिकोण परिक्रमा भी की जाती है।

यहां छोटे-बड़े सैकड़ों मंदिर हैं और तीन प्रमुख कुंड हैं। प्रथम है सीताकुंड जहां से ऊपर सीढ़ियों से यात्रा शुरू होती है। यात्रा में पहले अष्टभुजा मंदिर है, जहां माता सरस्वती की मूर्ति विराजमान है। उससे ऊपर कालीखोह है, जहां माता काली विराजमान हैं। फिर आता है और ऊपर विंध्याचल का मुख्य मंदिर माता विंध्यवासिनी मंदिर।

स्थान का महत्व : कहा जाता है कि महिषासुर वध के पश्चात माता दुर्गा इसी स्थान पर निवास हेतु ठहर गई थीं। भगवान राम ने यहां तप किया था और वे अपनी पत्नी सीता के साथ यहां आए थे। इस पर्वत में अनेक गुफाएं हैं जिनमें रहकर साधक साधना करते हैं। आज भी अनेक साधक, सिद्ध, महात्मा, अवधूत, कापालिक आदि से यहां भेंट हो सकती है।

भैरवकुंड के पास यहां की एक गुफा में अघोरेश्वर रहते थे। गुफा के भीतर भक्तों, श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ अघोरेश्वर की चरण पादुका एक चट्टान में जड़ दी गई है। यहां कई साधक आकर नाना प्रकार की साधनाएं करते और अघोरेश्वर की कृपा से सिद्धि पाकर कृतकृत्य होते हैं।

विंध्याचल पर्वत से किलोमीटर की दूरी पर मिरजापुर में रेलवे स्टेशन है। सड़क मार्ग से यह स्थान बनारस, इलाहाबाद, मऊनाथभंजन, रीवा और औरंगाबाद से जुड़ा हुआ है। बनारस से 70 किलोमीटर तथा इलाहाबाद से 83 किलोमीटर की दूरी पर विंध्याचल धाम स्थित है।

 भगवान दत्तात्रेय की जन्म स्थली...





चित्रकूट : अघोर पथ के अन्यतम आचार्य दत्तात्रेय की जन्मस्थली चित्रकूट सभी के लिए तीर्थस्थल है। औघड़ों की कीनारामी परंपरा की उ‍त्पत्ति यहीं से मानी गई है। यहीं पर मां अनुसूया का आश्रम और सिद्ध अघोराचार्य शरभंग का आश्रम भी है।

यहां का स्फटिक शिला नामक महाश्मशान अघोरपंथियों का प्रमुख स्थल है। इसके पार्श्व में स्थित घोरा देवी का मंदिर अघोर पंथियों का साधना स्थल है। यहां एक अघोरी किला भी है, जो अब खंडहर बन चुका है।

पांचवां प्रसिद्ध अघोर तीर्थ...





कालीमठ : 

हिमालय की तराइयों में नैनीताल से आगे गुप्तकाशी से भी ऊपर कालीमठ नामक एक अघोर स्थल है। यहां अनेक साधक रहते हैं। यहां से 5,000 हजार फीट ऊपर एक पहाड़ी पर काल शिला नामक स्थल है, जहां पहुंचना बहुत ही मुश्किल है। कालशिला में भी अघोरियों का वास है।

माना जाता है कि कालीमठ में भगवान राम ने एक बहुत बड़ा खड्ग स्थापित किया है।

जगन्नाथ पुरी...





जगन्नाथ पुरी :

 जगतप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर और विमला देवी मंदिर, जहां सती का पाद खंड गिरा था, के बीच में एक चक्र साधना वेदी स्थित है जिसे वशिष्ठ कहते हैं।

इसके अलावा पुरी का स्वर्गद्वार श्मशान एक पावन अघोर स्थल है। इस श्मशान के पार्श्व में मां तारा मंदिर के खंडहर में ऋषि वशिष्ठ के साथ अनेक साधकों की चक्रार्चन करती हुई प्रतिमाएं स्थापित हैं।

जगन्नाथ मंदिर में भी श्रीकृष्णजी को शुभ भैरवी चक्र में साधना करते दिखलाया गया है।

मदुरई का कपालेश्वर मंदिर...




मदुरई : 

दक्षिण भारत में औघड़ों का कपालेश्वर का मंदिर है। आश्रम के प्रांगण में एक अघोराचार्य की मुख्य समाधि है और भी समाधियां हैं। मंदिर में कपालेश्वर की पूजा औघड़ विधि-विधान से की जाती है।

सबसे प्रसिद्ध कोलकाता का काली मठ...




कोलकाता का काली मंदिर :

 रामकृष्ण परमहंस की आराध्या देवी मां कालिका का कोलकाता में विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास स्थित इस मंदिर को दक्षिणेश्वर काली मंदिर कहते हैं। इस पूरे क्षेत्र को कालीघाट कहते हैं। इस स्थान पर सती देह की दाहिने पैर की 4 अंगुलियां गिरी थीं इसलिए यह सती के 52 शक्तिपीठों में शामिल है।

यह स्थान प्राचीन समय से ही शक्तिपीठ माना जाता था, लेकिन इस स्थान पर 1847 में जान बाजार की महारानी रासमणि ने मंदिर का निर्माण करवाया था। 25 एकड़ क्षेत्र में फैले इस मंदिर का निर्माण कार्य सन् 1855 पूरा हुआ।

नेपाल में अघोर कुटी...




नेपाल : 

नेपाल में तराई के इलाके में कई गुप्त औघड़ स्थान पुराने काल से ही स्थित हैं। अघोरेश्वर भगवान राम के शिष्य बाबा सिंह शावक रामजी ने काठमांडू में अघोर कुटी स्थापित की है।

उन्होंने तथा उनके बाद बाबा मंगलधन रामजी ने समाजसेवा को नया आयाम दिया है। कीनारामी परंपरा के इस आश्रम को नेपाल में बड़ी ही श्रद्धा से देखा जाता है।

अफगानिस्तान में लालजी पीर...


अफगानिस्तान : 

अफगानिस्तान के पूर्व शासक शाह जहीर शाह के पूर्वजों ने काबुल शहर के मध्य भाग में कई एकड़ में फैला जमीन का एक टुकड़ा कीनारामी परंपरा के संतों को दान में दिया था। इसी जमीन पर आश्रम, बाग आदि निर्मित हैं। औघड़ रतनलालजी यहां पीर के रूप में आदर पाते हैं। उनकी समाधि तथा अन्य अनेक औघड़ों की समाधियां इस स्थल पर आज भी श्रद्धा-नमन के लिए स्थित हैं।

उपरोक्त स्थलों के अलावा अन्य जगहों पर भी जैसे रामेश्वरम, कन्याकुमारी, मैसूर, हैदराबाद, बड़ौदा, बोधगया आदि अनेक औघड़, अघोरेश्वर लोगों की साधना स्थली, आश्रम, कुटिया पाई जाती हैं।



चेतावनी -

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Wednesday, October 30, 2019

क्या आप धन की बचत नहीं कर पाते ?







क्या आप धन की बचत नहीं कर पाते ?


धनदायक लक्ष्मी कुबेर यन्त्र का पूजन करे और अपने मनोकामना पूर्णकरे

प्रथम श्री लक्ष्मी कुबेर यन्त्र को वेद की दीक्षा लिया हुए पंडित से संपूर्ण मंत्रो से चैतन्य युक्त करवा ले मंत्र की संख्या कमसे कम ( सवा लाख ) होनी चाहिए, उसके बाद शुक्ला पक्ष की सप्तमी के दिन शाम के ६-३० से ०७-०० बजे के बिच में घर के इशान कोने में पूर्व या उत्तर में उनी आशन बिछाकर बैठे और यह मंत्र से चैतन्य युक्त श्री लक्ष्मी कुबेर यंत्र को अपने सामने लाल वस्त्र पर स्थापन करे बाद में एक शुद्ध घी का दीपक जलाये और हो शके तो धुप भी जलाये, बाद में एक हाथ में थोड़ा जल ले कर धन प्राप्ति के उद्येश के साथ संकल्प करे बाद में प्रथम पूज्य श्री गणेशजी का मंत्र " ॐ गंग गणपतये नमः २१ बार करे

अब सर्वप्रथम धनप्रदायिनी महालक्ष्मी की पूजा करे और निचे दिए गए मंत्र की स्फटिक की माला से एक माला जप करे ....

मंत्र:

 ॐ महादेव्ये च विद्महे विष्णु पत्नये च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात ....

महालक्ष्मी के पूजन के बाद धन को आपके घर में स्थाई करने लिए धन को संग्रह करने वाले देव श्री कुबेर का पूजन करे और निचे दिए गए मंत्र की एक माला करे

मंत्र: ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः

राजगुरु जी

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क्रोध मंत्र साधना :





क्रोध मंत्र साधना :


भैरव शब्द का संक्षिप्त भावार्थ : 

जिससे क्लेश भयभीत रहता है , जिसके भय से वायु चलती है , सूर्य तपता है , इन्द्र जल वृष्टि करता है , लोकपाल भयभीत होते हैं , जो विश्व का भरण - पोषणकर्ता और संहारकर्ता है तथा जो महाभयंकर शब्दकारी है , उसका नाम भैरव है । भगवान् भैरव सबके ग्रहीता , दाता एवं कर्ता हैं । मास , पक्ष भैरव के शरीर हैं , दिनरात्रि वस्त्र हैं , ऋतुएं इन्द्रियां हैं । 

यही कालसंज्ञक ब्रहम है । योगवसिष्ठ में भगवान् राम मुनि वसिष्ठ से कहते हैं कि ' सर्व पदार्थों से महाभयंकर यह काल ही संहारकर्ता नहारुद्र है । यह काल बड़े - बड़े बुद्धिमानों और बलवानों की भी क्षणभर प्रतिक्षा नहीं करता , अपितु तत्काल मार देता है ।

 अतिरमणीय सुब्दाराकृति वाले सुमेरु जैसे बड़े - बडे पदार्थों को भी यह काल ऐसे निगल जाता है , जैसे गरुड़जी सर्पो को । हरण करना , नाश करना , भक्षण करना , मारना तथा अन्य प्रकार की क्रियाओं को करना - यह सब काल के आधीन है ।

क्रोधराज की सिद्धि होने पर मनुष्य क्रोधराज के समान अतुल बल प्राप्त करता है । विशेष संख्या में जप कर लेने के पश्चात् साधक समस्त प्रकार की दुर्लभ सिद्धियों को स्वतः प्राप्त कर लेता है । 

क्रोधमंत्र भगवान् भैरव का अत्यन्त घातक एवं उग्र मंत्र है जिसके समुचित प्रयोग करने पर तत्काल शत्रुकुल , महाभयंकर परप्रयोग , व्याधिदुःख ,असाध्यरोग,सभी इतर योनिया  भूत , प्रेत , पिशाच , राक्षस , ब्रह्मराक्षस , देव , यक्ष , गन्धर्व , किन्नर , पितृ , अप्सरा , परि , जिन्नात,मसान,वेताल,कच्चा कलुआ आदि,आदि भगवान् क्रोधराज की ज्वाला से विनष्ट हो जाते हैं । सर्व मंत्रों में यह मारक मंत्र है , जो महाप्रबल दुर्भाग्य का विनाश करने में सक्षम हैं ,यह प्रयोग केवल उच्चकोटि साधक ही कर सकते हैं । 

साधारण साधक इससे विरक्त रहें । इस प्रयोग में भूलचूक होने पर साधक को भगवान् भैरव के महाक्रोध का सामना करना पड़ सकता है । 

अतः यह महाक्रोध मंत्र अनुभवी गुरु के संरक्षण में ही करने का प्रावधान है । 

इस साधना को करने से पहले गुरु और इष्ट मंत्र (62500/125000 से अधिक) और महाविद्या साधना करना जरुरी है

किसी परलौकिक सक्ती पे प्रयोग करने से पहले उस सक्ती की कम से कम 2-3 बार साधना करने पर भी वह ना आवे तो ही इस मंत्र का प्रयोग किया जा सक्ता है अन्यथा स्वं का विनाश होना तय है 

एक दिवसीय साधना विधि-विधान :

विधि-विधा

इस मंत्र की साधना के प्रारम्भ में साधक में क्रोध एवं आवेश की अधिकता रहती है , जो कि देवता के स्वभाव से प्राप्त होती है ।

साधना वाले दिन खप्पर दिया जाता है 

खप्पर सामाग्री:

ताम्सिक खप्पर

बकरे की कलेजी, तम्बाकू(सिगरेट),चमेली का इत्र,शराब,2 अण्डे .

सात्विक खप्पर सामग्री :

4 केले ,4 बूंदी के लड्डू, 1 बर्फी , 
अनार  या नीम्बू (बली के तोर पे दिया जाता है ) ,
1-सिगरेट, चमेली का इत्र ,
लोंग का जोडा (बर्फी पे और लड्डू पे)

खप्पर को सिन्दूर से तिलक करना है 
खप्पर मंत्र 21 बार पढ के खप्पर समसान मे रख के आना है.

समसान मे जातें वक़्त सुरक्षा जरुर रखे
सुरक्षा मंत्र - औम हुं महाविकराल कपाल कालभैरवाय रक्ष रक्ष  हुं फट् ।।

देह-दिशा बन्धन- 

औम हुं महाविकराल कपाल कालभैरवाय रक्ष रक्ष  हुं फट् ।।(इस मंत्र को 11 बार पढ के छाती पे फुक मारे 3 बार)
इस मन्त्र को पढ के ही साधना समय मे 11 बार पढके दसो दिसा मे जल फेके .

आसन बंदन मंत्र - 

औम रं अग्नी प्रकाराय नमः
 सात बार पढ के किल से घेरा बनाये .

स्थान : परिस्थिति एवं साधक की योग्यतानुसार  जंगल,साधना कक्ष , शिवालय (एकान्त)
अथवा श्मशान में साधना की जाती है ।

तिथी: 

चतुर्दशी , शनिवार , रविवार , सोमवार , अमावस्या अथवा पूर्णिमा तिथि को साधना कर सकते है ।

मंत्र संख्या 8000 (80  माला) 
दीपक- चोमुखा दीपक तेल का
दिशा -दक्षिण
आसन -काला
वस्त्र- काला (काले वस्त्र को  निर्वस्त्र की संज्ञा दी गई हैं)
माला-रुद्राक्ष 
गूगल की धुणी 
समय -9 बजे बाद
क्रोध मुद्रा मे मन्त्र जाप होता है 
(क्रोध से जोर जोर से बोलके )

मन्त्र यहा नही दिया जा रहा है वियक्ती विशेश को जान कर ही मंत्र दिया जायेगा ,

यह महाक्रोध मंत्र अनुभवी गुरु के संरक्षण में ही करने का प्रावधान है.

मंत्र निसुल्क दिया जायेगा ।।

चेतावनी -

सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ ।

विशेष -

किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...