Saturday, October 7, 2017

शाबर रक्षा नारियल

शाबर रक्षा नारियल








आपने देखा होगा की लगभग सभी दुकानों में लाल कपडे में नारियल बांधकर लटकाया जाता है, कई घरों में भी ऐसा किया जाता है. यह स्थान देवता की पूजा और गृह रक्षा के लिए किया जाता है.

नवरात्रि पर अपने घर मे गृह शांति और रक्षा के लिए एक विधि प्रस्तुत है जिसके द्वारा आप अपने घर पर पूजन करके नारियल बाँध सकते हैं.

आवश्यक सामग्री :-

लाल कपडा सवा मीटर
नारियल
सामान्य पूजन सामग्री
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यदि आर्थिक रूप से सक्षम हों तो इसके साथ रुद्राक्ष/ गोरोचन/केसर भी डाल सकते हैं.
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वस्त्र/आसन लाल रंग का हो तो पहन लें यदि न हो तो जो हो उसे पहन लें.

सबसे पहले शुद्ध होकर आसन पर बैठ जाएँ. हाथ में जल लेकर कहें " मै [अपना नाम ] अपने घर की रक्षा और शांति के लिए यह पूजन कर रहा हूँ मुझपर कृपा करें और मेरा मनोरथ सिद्ध करें."

इतना बोलकर हाथ में रखा जल जमीन पर छोड़ दें. इसे संकल्प कहते हैं.

नारियल पर मौली धागा [अपने हाथ से नापकर तीन हाथ लम्बा तोड़ लें.] लपेट लें.

लपेटते समय निम्नलिखित मंत्र का जाप करें." ॐ श्री विष्णवे नमः"
अब अपने सामने लाल कपडे पर नारियल रख दें. पूजन करें.

नारियल के सामने निम्नलिखित मंत्र का 1008 बार जाप करें ऐसा कम से कम तीन दिन तक करें. पूरी नवरात्रि कर सकें तो और भी बेहतर है.

"ॐ नमो आदेश गुरून को इश्वर वाचा अजरी बजरी बाडा बज्जरी मैं बज्जरी को बाँधा, दशो दुवार छवा और के ढालों तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे, पहली चौकी गणपति दूजी चौकी में भैरों, तीजी चौकी में हनुमंत,चौथी चौकी देत रक्षा करन को आवे श्री नरसिंह देव जी शब्द सांचा पिंड कांचा फुरो मंत्र इश्वरी वाचा"

अब इस नारियल को लाल कपडे में लपेट ले. आपका रक्षा नारियल तय्यार है. इसे आप दशहरा, दीपावली, पूर्णिमा, अमावस्या या अपनी सुविधानुसार किसी भी दिन घर की छत में हुक हो तो उसपर बांधकर लटका दें.

यदि न हो तो पूजा स्थान में रख लें. नित्य पूजन के समय इसे भी अगरबत्ती दिखाएँ.

महाविद्या आश्रम में इस depawali के shubh मुहूर्त  में इस शाबर रक्षा नारियल का nirman किया जा रहा हैं जिस  किसी को भी शाबर रक्षा नारियल मांगना  हैं तो आप सब मेरे   व्हाट्सप्प न०;- 9958417249. पर संपर्क  कर सकते हैं .

दक्षिणा  न्यौच्छावर.   550 .रुपये

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें :

मोबाइल नं. : - 09958417249

                     08601454449

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गुरू गोरखनाथ,अवधूत दतात्रेय

गुरू गोरखनाथ,अवधूत दतात्रेय





,श्रीस्वामी,श्रीरामकृष्ण परमहंस,श्रीसाईबाबा,स्वामी समर्थ,तैलंग स्वामी,वामाखेपा,अघोरी कीनाराम ,आचार्य श्रीरामशर्मा ये सभी परम संत,साधक,तथा स्वयं परमतत्व ही है।

आज नकली साधक,संत से बाजार पटा है,सभी सिद्ध बनते है परन्तु ये किसी काम के नही है कारण माता धूमावती ने सभी को मोह से ग्रसित कर दिया है।

साधक को ज्यादा समय मिलता ही कहाँ जो शिविर लगाए,दीक्षा दे,ज्यादा भीड़ जुटाने वाले का लक्ष्य एक ही है कि मेरे भक्त ज्यादा लोग हो जाए और धनार्जन हो।दशमहाविद्या ब्रह्मविद्या है और इसके अधिपति शिव हैं।

बिना शिव कृपा किसी को महाविद्या की साधना फलीभूत नहीं होती।मेरा मन जब तक कृपण है,गणितीय बुद्धि है तब तक साधना के क्षेत्र में प्रगति संभव नहीं हैं।ऐसी कोई समस्या नहीं है,जो धूमावती माता दूर न करे। भूख लगी हो उस समय शरीर का क्या हाल होता है,इसे कोई भी समझता है।

 शिव ने लीला की और परम प्रेमी पुरूष शिव को ही उदरस्थ कर लिया यह जीव के प्रति शिव का प्रेम ही है, तभी तो करूणा से भरी उग्र शक्ति धूमावती को हम बार बार नमस्कार करते है।

माता हम सच्चे मन से आपको पकौड़ा,पकवान का भोग देकर आपकी स्तुति कर रहे है,हमारे,संतान,परिवार के साथ ही हमारे राष्ट की भी रक्षा करे,तभी तो दतिया में आप विराजमान है।आपकी जय हो,जय हो,जय हो।श्रीस्वामी सहित माता धूमावती को बार बार नमस्कार हैं।

इसके बाद उस सुपारी को माँ धूमावती का रूप मानते हुए,अक्षत,काजल,भस्म,काली मिर्च और तेल के दीपक से और उबाली हुयी उडद और फल का नैवेद्य द्वारा
उनका पूजन करे, तत्पश्चात उस पात्र के दाहिने अर्थात अपने बायीं और एक मिटटी या लोहे का छोटा पात्र स्थापित कर उसमे सफ़ेद तिलों की ढेरी बनाकर उसके ऊपर एक दूसरी सुपारी स्थापित करे,और
निम्न ध्यान मंत्र का ५ बार उच्चारण करते हुए माँ धूमावती के भैरव अघोर रूद्र का ध्यान करे –

त्रिपाद हस्त नयनं नीलांजनं चयोपमं,
शूलासि सूची हस्तं च घोर दंष्ट्राटट् हासिनम् ||

और उस सुपारी का पूजन,तिल,अक्षत,धूप-दीप तथा गुड़ से करे तथा काले तिल डालते हुए ‘ॐ अघोर रुद्राय नमः’ मंत्र का २१ बार उच्चारण करे |

इसके बाद बाए
हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से निम्न मंत्र का ५ बार उच्चारण करते हुए पूरे शरीर पर छिडके –

धूमावती मुखं पातु धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी |
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी ||
कल्याणी ह्रदयपातु हसरीं नाभि देशके |
सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना ||
सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः |
सौभाग्यमयतं प्राप्य जाते देवितुरं ययौ ||

इसके बाद जिस थाली में माँ धूमावती की स्थापना की थी,उस सुपारी को अक्षत और काली मिर्च मिलकर निम्न मंत्र की आवृत्ति ११ बार कीजिये अर्थात क्रम से हर मंत्र ११-११ बार बोलते हुए अक्षत मिश्रित काली मिर्च डालते रहे |

ॐ भद्रकाल्यै नमः
ॐ महाकाल्यै नमः
ॐ डमरूवाद्यकारिणीदेव्यै नमः
ॐ स्फारितनयनादेव्यै नमः
ॐ कटंकितहासिन्यै नमः
ॐ धूमावत्यै नमः
ॐ जगतकर्त्री नमः
ॐ शूर्पहस्तायै नमः

इसके बाद निम्न मंत्र का जप रुद्राक्ष माला से २१,५१ , १२५ माला करें, यथासंभव एक बार में ही ये जप हो सके तो अतिउत्तम,अब मंत्र जाप प्रारंभ करे.

मंत्र:- ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट् ||

मंत्र जप के बाद मिटटी या लोहे के हवन कुंड में लकड़ी जलाकर १०८ बार घी व काली मिर्च के द्वारा आहुति डाल दें |

आहुति के दौरान ही आपको आपके आस पास एक तीव्रता का अनुभव हो सकता है और पूर्णाहुति के साथ अचानक मानो सब कुछ शांत हो जाता है…

इसके बाद आप पुनः स्नान कर ही सोने के लिए जाए और दुसरे दिन सुबह आप सभी सामग्री को बाजोट पर बीछे वस्त्र के साथ ही विसर्जित कर दें और जप माला को कम से कम २४ घंटे नमक मिश्रित जल में डुबाकर रखे और फिर साफ़ जल से धोकर और उसका पूजन कर अन्य कार्यों में प्रयोग करें |

इस प्रयोग को करने पर स्वयं ही अनुभव हो जाएगा की आपने किया क्या है,कैसे परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हो जाती है ये तो स्वयं अनुभव करने वाली
बात है….

देवी धूमावती को आज तक कोई योद्धा युद्ध में नहीं परास्त कर पाया, तभी देवी का कोई संगी नहीं हैं।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Friday, October 6, 2017

बेताल साधना

 बेताल साधना







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यह साधना रात्रि कालीन है स्थान एकांत होना चाहिए ! मंगलबार को यह साधना संपन की जा सकती है !
घर के अतिरिक्त इसे किसी प्राचीन एवं एकांत शिव मंदिर मे या तलब के किनारे निर्जन तट पर की जा सकती है !
पहनने के बस्त्र आसन और सामने विछाने के आसन सभी गहरे काले रंग के होने चाहिए ! साधना के बीच मे उठना माना है !

इसके लिए वीर बेताल यन्त्र और वीर बेताल माला का होना जरूरी है !

यन्त्र को साधक अपने सामने बिछे काले बस्त्र पर किसी ताम्र पात्र मे रख कर स्नान कराये और फिर पोछ कर पुनः उसी पात्र मे स्थापित कर दे !

सिन्दूर और चावल से पूजन करे और निम्न ध्यान उच्चारित करें

"!! फुं फुं फुल्लार शब्दो वसति फणिर्जायते यस्य कण्ठे डिम डिम डिन्नाति डिन्नम डमरू यस्य पाणों प्रकम्पम!
तक तक तन्दाती तन्दात धीर्गति धीर्गति व्योमवार्मि
सकल भय हरो भैरवो सः न पायात !! "

इसके बाद माला से  31माला मंत्र जप करें यह 21  दिन की साधना है !

!! ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं वीर सिद्धिम दर्शय दर्शय फट !!

साधना के बाद सामग्री नदी मे या शिव मंदिर मे विसर्जित कर दें साधना का काल और स्थान बदलना नहीं चाहिए

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Wednesday, October 4, 2017

वशीकरण प्रयोग

 वशीकरण प्रयोग



तंत्र की क्रिया में तो सैकड़ो सम्मोहन प्रयोग है पर यह प्रयोग अपने आप में अचूक और अत्यंत तीष्ण,तुरंत असर दिखने वाली प्रयोग है.बाकि प्रयोग असफल हो सकती है परन्तु इस प्रयोग की सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं.

यह प्रयोग अघोरि और कपाली ओकी है.जिसे संपन्न करने से पाहिले १०० बार सोच समज़कर ही करनी चाहिए.

सामग्री -

   सिद्धि अघोरी  वशीकरण  यन्त्र प्राण  प्रतिष्ठा  युक्त ,  लाल  हकीक  माला   , वशीकरण काजल 

अमावस्या की रात्रि में बगीचा या फिर घरमे किसी कोने में बैट जाईये और अपने आसन की निचे श्मशान से लाकर थोड़ी सी राख राख दे आसन लाल रंग की होनी चाहिये फिर दक्षिण दिशा की और मुहकर सामने उस व्यक्ति की चित्र रख दे  तथा   सिद्धि अघोरी  वशीकरण  यन्त्र प्राण  प्रतिष्ठा  युक्त स्थापित    करें ,जिसे पूर्ण वशीकरण या सम्मोहित करनी/करना है.माला लाल हकिक की होनी चाहिये.

इसके बाद उस चित्र के सामने मात्र ५१ माला मन्त्र जाप करनी है और येसा करने से आश्चर्यजनक रूप से चमत्कार देखने को मिलती है और जो आपकी सर्वथा विरोधी व्यक्ति है वह भी आपके अनुकूल हो कर आपके कहे अनुसार कार्य संपन्न करती है.

                                                                       मंत्र

                      ||ॐ ऐम ऐम अमुक वाश्यमानय मम आज्ञा परिपालय ऐम ऐम फट ||

यह प्रयोग दिखने में अत्यंत सरल है परन्तु प्रभाव अचूक देखने मिलती है और तुरंत ही जिसे सम्मोहित करना चाहते है उसे अपने वश में करने में समर्थ हो जाते है.

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम

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महाविद्या मातंगी

महाविद्या मातंगी







सांसारिक रूप में महाविद्या कमला का आराधना से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के बाद किसी भी आदमी को जरूरत होती है, अपने आभामंडल और प्रभाव को बढ़ाने की। इंसान चाहता है कि लोग उसके धन व ऐश्वर्य को समझें और उसे सम्मान दें।

दूसरी ओर आध्यात्मिक क्षेत्र का साधक कमला की साधना से खुद को अंदर से परिपूर्ण करने के बाद प्रकृति को मोहित कर अपने साधना के स्तर को उठाना चाहता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ती है नौवीं महाविद्या मातंगी की। इनमें पूरे ब्रह्मांड को मोहित करने की शक्ति है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा था कि सभी महाविद्या में सब कुछ प्रदान करने की शक्ति है लेकिन उनके विशेषज्ञता के खास क्षेत्र हैं।

तंत्र के क्षेत्र में मातंगी की साधना का काफी महत्व है। यह ममता की मूर्ति हैं और सामन्यतया साधकों पर प्रसन्न होने में अधिक देर नहीं लगाती हैं। इनकी प्रसन्नता से ज्ञान वृद्धि, शास्त्राज्ञाता, कवित्व शक्ति एवं संगीत विद्या की भी प्राप्ति संभव है।

 यह सम्मोहन और वशीकरण की अधिष्ठात्री हैं। इनके प्रयोग से भंडार की अक्षयवृद्धि होती है। आवश्यकता सिर्फ श्रद्धा का नियमपूर्वक साधना करने की है। मातंगी की साधना के बारे में संक्षिप्त जानकारी नीचे दी जा रही है। विस्तृत जानकारी के लिए अपने आसपास के किसी योग्य व्यक्ति से या मेल से मुझसे जानकारी ली जा सकती है।

मातंगी के कई नाम हैं। इनमें प्रमुख हैं-सुमुखी, लघुश्यामा या श्यामला, उच्छिष्टचांडालिनी, उच्छिष्टमातंगी, राजमातंगी, कर्णमातंगी, चंडमातंगी, वश्यमातंगी, मातंगेश्वरी, ज्येष्ठमातंगी, सारिकांबा, रत्नांबा मातंगी एवं वर्ताली मातंगी।

1-अष्टाक्षर मातंगी मंत्र- कामिनी रंजनी स्वाहा

विनियोग— अस्य मंत्रस्य सम्मोहन ऋषिः, निवृत् छंदः, सर्व सम्मोहिनी देवता सम्मोहनार्थे जपे विनियोकगः।

ध्यान--- श्यामंगी वल्लकीं दौर्भ्यां वादयंतीं सुभूषणाम्। चंद्रावतंसां विविधैर्गायनैर्मोहतीं जगत्।

फल व विधि------ विनियोग से ही मंत्र का फल स्पष्ट 20 हजार जप कर मधुयुक्त मधूक पूष्पों से हवन करने पर अभीष्ट की सिद्धि होती है।
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2-दशाक्षर मंत्र------ ऊं ह्री क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा।

विनियोग— अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिःर्विराट् छंदः, मातंगी देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्लीं कीलकं, सर्वेष्टसिद्धये जपे विनियोगः।

अंगन्यास--- ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः से हृदयादि न्यास करें।

फल व विधि------ साधक छह हजार जप नित्य करते हुए 21 दिन प्रयोग करें। फिर दशांस हवन करें। चतुष्पद श्मसान या कलामध्य में मछली, मांस, खीर व गुगल का धूप दे तो कवित्व शक्ति की प्राप्ति होती है। इससे जल, अग्नि एवं वाणी का स्तंभन भी संभव है।

 इसकी साधना करने वाला वाद-विवाद में अजेय बन जाता है। उसके घर में स्वयं कुबेर आकर धन देते हैं।

3-लघुश्यामा मातंगी का विंशाक्षर मंत्र--------- ऐं नमः उच्छिष्ट चांडालि मांतगि सर्ववशंकरि स्वाहा।

विधि---

विनियोग व न्यास आदि के साथ देवी की पूजा कर 11, 21, 41 दिन या पूर्णिमा/आमावास्या से पूर्णिमा/आमावास्या तक एक लाख जप पूर्ण करें। मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इसका जप उच्छिष्ट मुंह किया जाना चाहिए। ऐसा किया भी जा सकता है लेकिन विभिन्न ग्रंथों में इसे पवित्र होकर करने का भी विधान है।

 अतः साधक सुविधानुसार जप करें। जप पू्र्ण होने के बाद महुए के फूल व लकड़ी के दशांस होम कर तर्पन व मार्जन करें।

फल-------

 इसके प्रयोग से डाकिनी, शाकिनी एवं भूत-प्रेत बाधा नहीं पहुंचा सकते हैं। इसकी साधना से प्रसन्न होकर देवी साधक को देवतुल्य बना देती है। उसकी समस्त अभिलाषाएं  पूरी होती हैं।

चूंकि मातंगी वशीकरण विद्या की देवी हैं, इसलिए इसके साधक की वह शक्ति भी अद्भुत बढ़ती है। राजा-प्रजा सभी उसके वश में रहते हैं।

4-एकोन विंशाक्षर उच्छिष्ट मातंगी तथा द्वात्रिंशदक्षरों मातंगी मंत्र

मंत्र (एक)--- नमः उच्छिष्ट चांडालि मातंगी सर्ववशंकरि स्वाहा।

मंत्र (दो)---- ऊं ह्रीं ऐं श्रीं नमो भगवति उच्छिष्टचांडालि श्रीमातंगेश्वरि सर्वजन वशंकरि स्वाहा।

विधि-----

 विधिपूर्वक दैनिक पूजन के बाद निश्चित (जो साधक जप से पूर्व तय करे) समयावधि (घंटे या दिन) में दस हजार जप कर पुरश्चरण करे। उसके बाद दशांस हवन करे।

फल-----

मधुयुक्त महुए के फूल व लकड़ी से हवन करने पर वशीकरण का प्रयोग सिद्ध होता है। मल्लिका फूल के होम से योग सिद्धि, बेल फूल के हवन से राज्य प्राप्ति, पलास के पत्ते व फूल के हवन में जन वशीकरण, गिलोय के हवन से रोगनाश, थोड़े से नीम के टुकड़ों व चावल के हवन से धन प्राप्ति, नीम के तेल से भीगे नमक से होम करने पर शत्रुनाश, केले के फल के हवन से समस्त कामनाओं की सिद्धि होती है।

 खैर की लकड़ी से हवन कर मधु से भीगे नमक के पुतले के दाहिने पैर की ओर हवन की अग्नि में तपाने से शत्रु वश में होता है।

5-सुमुखी मातंगी प्रयोग

इसमें दो मंत्र हैं जिसमें सिर्फ ई की मात्रा का अंतर है पर ऋषि दोनों के अलग-अलग हैं। इसमें फल समान है।

पहला मंत्र---- उच्छिष्ट चांडालिनी सुमुखी देवी महापिशाचिनी ह्रीं ठः ठः ठः।

इसके ऋषि अज, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं।

विधि----

देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह आठ हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है। साधक को धन की प्राप्ति होती है और उसका आभामंडल बढ़ता है। हवन की विधि नीचे है।

दूसरा मंत्र-----

 उच्छिष्ट चांडालिनि सुमुखि देवि महापिशाचिनि ह्रीं ठः ठः ठः।

इसके ऋषि भैरव, छंद गायत्री और देवता सुमुखी मातंगी हैं।

विधि----

इसकी कई विधियां हैं। एक में एक लाख मंत्र जप का भी विधान वर्णित है। लेकिन मेरा मानना है कि देवी के विधिपूर्वक पूजन के बाद जूठे मुंह दस हजार जप करने से ही इसका पुरश्चरण होता है और साधक को धन की प्राप्ति होती है तथा उसका आभामंडल बढ़ता है।

हवन विधि------

दही से सिक्त पीली सरसो व चावल से हवन करने पर राजा-मंत्री सभी वश में हो जाते हैं। बिल्ली के मांस से हवन करने पर शस्त्र का वसीकरण होता है। बकरे के मांस के हवन से धन-समृद्धि मिलती है।

खीर के हवन से विद्या प्राप्ति तथा मधु व घी युक्त पान के पत्तों के हवन से महासमृद्धि की प्राप्ति होती है।

 कौवे व उल्लू के पंख के हवन से शत्रुओं का विद्वेषण होता है।

राजगुरु जी

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Tuesday, October 3, 2017

धूत विजय प्रयोग

धूत विजय  प्रयोग




जो लोग जुआ , सट्टा , मटका , रेसकोर्स , इत्यादि खेलने के शौक़ीन हों अथवा जिन्होंने इस शौक को ही अपना व्यापार बना रखा हो तो जुए इत्यादि में निरंतर सफलता प्राप्त के लिए उन्हें इस प्रयोग को अवशय ही सम्पन्न कर के लाभ उठाना चाहिए .

सामग्री ;;----- स्वर्णाकर्षण गुटिका ( मंत्र सिद्धि प्राण - प्रतिष्ठित ) तेल का दीपक

माला ;-- विद्दुत माला ( मंत्र सिद्धि चैतन्य )
समय ;-- रात का कोई भी समय
दिन ;;--- शुक्रवार
धारणीय वस्त्र ;;---- सफ़ेद रंग की धोती
आसन ;;-- सफ़ेद रंग का सूती आसन
दिशा ;;--- उत्तर

जाप संख्या ;;-- इक्कीस हजार ( २१००० )
अवधि -- इस्क्किस दिन

मंत्र ;;-----

'' ॐ नमो वीर बैताल आकस्मिक धन देहि देहि नमः '''

प्रयोग विधि ;;---

किसी भी शुक्रवार की रात्रि को यह प्रयोग करें . अपने दाहिने हाथ में स्वर्णाकर्षण गुटिका लेकर उसे पहले भली प्रकार से देखें , फिर सामने रख कर तेल का दीपक लगाकर उपरोक्त मंत्र का इक्कीस हजार जाप करें , जप के बाद इक्कीस दिनों में वह स्वर्णाकर्षण गुटिका गुटिका सिद्धि हो जाती हैं .

जब यह गुटिका सिद्धि हो जाये तो जब भी किसी जुए में जावें अथवा जुआ खेले या रेसकोर्स में जाये तो इस स्वर्णाकर्षण गुटिका को अपनी जेब में रखकर ले जाने से सफलता प्राप्त हो सकती हैं ,

नोट -

 साधको को सूचित किया जाता हैं की हर चीज की अपनी एक सीमा होती हैं , इसलिए किसी भी साधना का प्रयोग उसकी सीमा में ही रहकर करे , और मानव होकर मानवता की सेवा करे अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाएँ ,.

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम
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Monday, September 18, 2017

नवार्ण मंत्र

 नवार्ण मंत्र







माँ दुर्गा की साधना / उपासना क्रम मे, नवार्ण मंत्र एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों के इस मंत्र मे ,नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और
भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।

यह महामंत्र शक्ति साधना मे सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों स्तोत्रों मे से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है।

यह माँ आदिशक्ति के तीनों स्वरूपों - माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही माता दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है।

इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है।

नवार्ण मंत्र-

!! ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे !!

नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है, जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है।

ऐं - सरस्वती का बीज मन्त्र है ।
ह्रीं - महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है ।
क्लीं - महाकाली का बीज मन्त्र है ।

* इसके साथ नवार्ण मंत्र के प्रथम बीज ” ऐं “ से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिसमे सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

* नवार्ण मंत्र के द्वितीय बीज ” ह्रीं “ से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है, जिसमे चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समाहित है।

* नवार्ण मंत्र के तृतीय बीज ” क्लीं “ से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिसमे मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समाहित है।

* नवार्ण मंत्र के चतुर्थ बीज ” चा “ से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह को नियंत्रित किया जाता है।

* नवार्ण मंत्र के पंचम बीज ” मुं “ से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिसमे बृहस्पति ग्रह का नियंत्रण होता है।

* नवार्ण मंत्र के षष्ठ बीज ” डा “ से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिसमे शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

* नवार्ण मंत्र के सप्तम बीज ” यै “ से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की उपासना की जाती है, जिसमे शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति है।

* नवार्ण मंत्र के अष्टम बीज ” वि “ से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिसमे राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समाहित है।

* नवार्ण मंत्र के नवम बीज ” चै “ से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति होती है।

इस मंत्र के 9 लाख जप करने व उसी अनुसार हवन, तर्पण मार्जन ब्राह्मण भोज , हवन से माँ जगदम्बा के साक्षात दर्शन संभव हैं।

अधिकांश व्यक्ति नवरात्र मे 108 माला प्रति दिन करते है और प्रभाव दृष्टि गोचर होता है, पूर्ण सिद्धि के लिए 108 माला 90 दिन करना उचित माना गया है।

कई साधकों / आचार्यों का मत है कि किसी भी मन्त्र के प्रारम्भ मे प्रणव (ॐ) या नमः लगाने से मन्त्र में नपुंसक प्रभाव आ जाता है,

बीजाक्षर प्रधान है ... तांत्रिक प्रणव “ ह्रीं ” है , अतः माला के जप के प्रारम्भ मे “ ॐ ” लगायें तथा जब माला पूरी हो जाये तो माला के अंत मे “ ॐ ” लगाये,
यही मंत्र जाग्रति है ।

नवार्ण मंत्र साधना विधि -

“ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ”

विनियोगः-

ॐ अस्य श्रीनवार्ण मंत्रस्य ब्रह्म-विष्णु-रुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छन्दांसि, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतयो देवताः, रक्त-दन्तिका-दुर्गा भ्रामर्यो बीजानि, नन्दा शाकम्भरी भीमाः शक्त्यः, अग्नि-वायुसूर्यास्तत्त्वानि, ऋग्-यजुः-सामानि स्वरुपाणि, ऐं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती स्वरुपा त्रिगुणात्मिका श्री महादुर्गा देव्या प्रीत्यर्थे (यदि श्रीदुर्गा का पाठ कर रहे हो तो आगे लिखा हुआ भी उच्चारित करें) श्री दुर्गासप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यासः-

ब्रह्म-विष्णु-रुद्रा ऋषिभ्यो नमः शिरसि
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छन्देभ्यो नमः मुखे
श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतयो देवताभ्यो नमः हृदिः
ऐं बीज सहिताया रक्त-दन्तिका-दुर्गायै भ्रामरी देवताभ्यो नमः लिङ्गे (मनसा)
ह्रीं शक्ति सहितायै नन्दा-शाकम्भरी-भीमा देवताभ्यो नमः नाभौ
क्लीं कीलक सहितायै अग्नि-वायु-सूर्य तत्त्वेभ्यो नमः गुह्ये
ऋग्-यजुः-साम स्वरुपिणी श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती देवताभ्यो नमः पादौ
श्री महादुर्गा प्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” –

 नवार्ण मन्त्र पढ़कर शुद्धि करें ।

षडङ्ग-न्यास

कर-न्यास

ॐ ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां हुम्
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्

अंग-न्यास :-

ॐ ऐं हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा
ॐ क्लीं शिखायै वषट्
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्
ॐ विच्चे नेत्र-त्रयाय वौषट्
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्

अक्षर-न्यासः-

ॐ ऐं नमः शिखायां, ॐ ह्रीं नमः दक्षिण-नेत्रे, ॐ क्लीं नमः वाम-नेत्रे, ॐ चां नमः दक्षिण-कर्णे, ॐ मुं नमः वाम-कर्णे, ॐ डां नमः दक्षिण-नासा-पुटे, ॐ यैं नमः वाम-नासा-पुटे, ॐ विं नमः मुखे, ॐ च्चें नमः गुह्ये ।

व्यापक-न्यासः-

मूल मंत्र से चार बार सम्मुख दो-दो बार दोनों कुक्षि की ओर कुल आठ बार (दोनों हाथों से सिर से पैर तक) न्यास करें ।

दिङ्ग-न्यासः-

ॐ ऐं प्राच्यै नमः, ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः, ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः, ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः, ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः, ॐ क्लीं वायव्यै नमः, ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः, ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः, ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः ।

! ध्यानम् !

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचाप परिधाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः,
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्य पाददशकां सेवे महाकालिकाम्,
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ।। १।।
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां,
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ।। २।।
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दशतीं घनान्तविलसच्छितांशुतुल्य प्रभाम् ।।
गौरीदेहसमुद्भुवां त्रिजगतामाधारभूतां महापूर्वामत्र
सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ।। ३।।

माला-पूजन -

माला स्फटिक की हो ,लाल मुंगे की या रुद्राक्ष की
माला के गन्धाक्षत करें

तथा “ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः” इस मंत्र से पूजा करके प्रार्थना करें -

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्ति स्वरुपिणि ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तः तस्मान्मे सिद्धिदाभव ।।
ॐ अविघ्नं कुरुमाले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे ।
जपकाले च सिद्धयर्थं प्रसीद मम सिद्धये ।।
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्व मंत्रार्थ साधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा ।

इसके बाद

 “ऐ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”

 इस मंत्र का 1,25.000 बार जप करें ।

जप दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन, मार्जन का दशांश ब्राहमण भोज करावें।

! पाठ-समर्पण !

ॐ गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं, गृहाणास्मत्-कृतं जपम् ।
सिद्धिर्मे भवतु देवि ! त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि !

उक्त श्लोक पढ़कर देवी के वाम हस्त में जप समर्पित करें।

नवार्ण मंत्र की सिद्धि 9 दिनो मे 1,25,000 मंत्र जप से होती है,

परंतु कोई साधक न कर पाये तो नित्य 1, 3, 5, 7, 11 या 21 माला मंत्र जप करना उत्तम होगा ,

इस विधि से सम्पूर्ण इच्छायें पूर्ण होती है,समस्त दुख समाप्त होते है और धन का आगमन भी सहज रूप से होता है।

यदि मंत्र सिद्ध नहीं हो रहा हो तो “ ऐं ”, “ ह्रीं ”, “ क्लीं ” तथा “ चामुण्डायै विच्चे ” के पृथक पृथक सवा लाख जप करें फिर नवार्ण का पुनश्चरण करें।

! ॐ नमश्चंडिकाये !

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम
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