Tuesday, August 15, 2017

श्रीयंत्र को यंत्रराज क्यों कहते हे ?

श्रीयंत्र को यंत्रराज क्यों कहते हे ?


 

प्रणाम दोस्तों

ज्यादातर लोग श्रीयंत्र को लक्ष्मी प्राप्ति का ही माध्यम समजते हे परन्तु श्रीयंत्र अपने आप में सारे संसार का सुख देने में सामर्थ्य रखता हे |

एक पौराणिक खाता के अनुसार लक्ष्मी जी पृथ्वी से रुष्ट हो कर वैन्कुठ चली गई | तो लक्ष्मीजी की अनुपस्थिति में पृथ्वी पर अनेक समस्याए उत्पन्न होगई तब महर्षि वशिष्ठ और श्री विष्णु ने लक्ष्मीजी को बहोत मनाया फिर भी लक्ष्मी जी नहीं मानी तब जाके देवगुरु बृहस्पति ने एक उपाय किया, लक्ष्मीजी को आकर्षित करने के लिए श्रीयंत्र की रचना की और उसका स्थापन और पूजन का उपाय बताया |

 तब जाके लक्ष्मीजी को न चाहते हुवे भी विवश हो कर पृथ्वी पर आना पड़ा क्यों की -

लक्ष्मीजी ने अपने स्वयं के मुख से कहा " श्रीयंत्र ही मेरा आधार हे और यही श्रीयंत्र में मेरी आत्मा निवास करती हे इस लिए मुझे आना ही पड़ा "

एक अन्य कथा में श्रीयंत्र का सम्बन्ध आध्यशंकराचार्य से जोड़ा गया हे |

एक बार विश्व में बहोत परेशानी व्याप्त हो गई तब आध्यशंकराचार्य जी ने आशुतोष शिवजी से विश्वकल्याण के लिए उपाय पूछा तो शिवजी ने श्रीयंत्र और श्रीविद्या प्रदान करते हुवे कहा की श्रीविद्या की साधना जाननेवाला मनुष्य अपर यश और लक्ष्मी का स्वामी होगा जबकि श्रीयंत्र का पूजन करने वाला प्रत्येक प्राणी सभी देवताओ की आराधना का फल प्राप्त करेगा क्यों की इस यंत्र राज

" श्रीयंत्र " में सभी देवी देवताओ का वास हे .... हरी ओम तत्सत

मेरे सभी दोस्तों से मेरा नम्र निवेदन हे की हो शके तो जीवन में एक बार सम्पूर्ण रूप से श्रीविद्या के तहद एक श्रीयंत्र वैदिक रीती से बनवाकर अपने घर में स्थापन करे और यह श्री यन्त्र का नित्य वैदिक पूजन करे और हवन द्वारा देवताको को भोग प्रदान करे ..

 अवश्य ही लक्ष्मी की महेर होगी .. मेरा स्यवंम का अनुभव हे ... कृपया लाभ उठाये

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम
.
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Monday, August 14, 2017

भूत प्रत्यक्षिकरण साधना.

भूत प्रत्यक्षिकरण साधना.




जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत
ही हो वही भूत कहलाता है। अतीत में
अटका आत्मा भूत बन जाता है। जीवन न अतीत है और न भविष्य वह सदा वर्तमान है।जो वर्तमान में रहता है वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है ।

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती
है।इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और
उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि
कहा जाता है।हिन्दू धर्म में गति और कर्म
अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन
किया है,आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं।

 भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।

इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे
अलग नामों से जाना जाता है। माना
गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती
मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।

84 लाख योनियां पशुयोनि,पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं।

आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते।यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है।बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।

पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण
करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों
का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है।

पृथ्वी पर अनिष्ट शक्तियों का अस्तित्व
विभिन्न स्थानों पर होता है । जीवित और निर्जीव वस्तुओं में वे अपने लिए केंद्र बना सकती हैं । जहां वे अपनी काली शक्ति संग्रहित कर सकती हैं, उसे केंद्र कहते
है ।

केंद्र उनके लिए प्रवेश करने का स्थान
होता है तथा वे वहां से काली शक्ति ग्रहण अथवा प्रक्षेपित कर सकती हैं । अनिष्ट शक्तियां (भूत, प्रेत, पिशाच इ.)अपने लिए साधारणतः मनुष्य, वृक्ष, घर, बिजली के उपकरण आदि में केंद्र बनाती हैं। जब वे मनुष्य में अपने लिए केंद्र बनाती हैं, तब उनका उद्देश्य होता है-खाना-पीना, धूम्रपान करना तथा लैंगिक वासनाओं की पूर्ति करना अथवा लेन-देन खाता पूर्ण करना ।

मूलभूत वायुतत्त्व से बनने के कारण सूक्ष्म-दृष्टि के बिना उन्हें देख पाना संभव नहीं होता है इसलिये आज मै यहा अदृश्य शक्तीयो को देखने का विधान दे रहा हू।

कुत्ते, घोडे, उल्लू तथा कौए जैसे पक्षी तथा कुछ प्राणी अनिष्ट शक्तियों के अस्तित्व के संदर्भ में अधिक संवेदनशील होते हैं । रातमें जब कुत्तों का बिना किसी दृश्य कारण से अचानक भौंकना तथा रोना उनके द्वारा अनिष्ट शक्तियों के अस्तित्व को समझ पाने के कारण होता है ।

भुतोका अस्तित्व है यह बात आज अमेरिका वाले भी मानते है और हमारे देश मे तो यह मान्यता पहीले से ही है ।
साधना विधी:-

सामग्री:-भूतकेशी नामक जडि से निर्मित काजल,काली हकिक माला और भूत रक्षा कवच । विशेषता यह सामग्री आवश्यक है,बिना सामग्री के साधना करने पर सफलता प्राप्त करना मुश्किल है ।

भूतकेशी:-

यही जडि दुर्लभ है और हिमाचल प्रदेश के जंगल मे पायी जाती है,इसको घी मे पकाकर अग्नी के माध्यम से काजल निर्मित होता है ।इस जडि के काजल से अदृश्य शाक्तिया आसानी से देख सकते है क्युके इस जडि मे भूत का अस्तित्व सबसे ज्यादा होता है ।यह दिव्य काजल सिर्फ हमारे पास ही मिलता है ।

काली हकिक माला:-

यह तो आज कल मार्केट मे आसानी से मिल जाती है ।
भूत रक्षा कवच:-यह जरुरी है अन्यथा भूत-प्रेत साधक पर हमला करते है तो इसे पहेनना आवश्यक है और आप सुरक्षित रहेगे.बिना सुरक्षा कवच के साधना करना नुकसान दायक होता है ।

यह साधना तीन दिवसिय है और इसे अमावस्या के तीन दिन पूर्व शुरूवात करना होता है,आखरी दिन अमावस्या होना चाहिये ।आसन-वस्त्र-काले रंग के हो और दक्षिण दिशा के तरफ मुख होना चाहिये ।

साधना एक बंद कमरे मे करनी है जहा किसी भी प्रकार की कोई भी रोशनी ना हो सिर्फ तीव्र सुगंध युक्त अगरबत्ती जला सकते है ।साधना मे तीसरे दिन भयानक दृश्य आखो के सामने प्रकट होते है जिसे देखकर डर लगता है परंतु रक्षा कवच पहेनने के बाद डरना नही चाहिये ।

तीसरे दिन भूत प्रत्यक्ष हो तो उससे कोई भी तीन प्रकार के वचन माँगे,जिससे भूत आपका प्रत्येक कार्य पूर्ण कर दे ।

मंत्र-

ll ह्रीं क्रीं भुताय वश्यै फट ll

(hreem kreem bhootaay vashyai phat)

यह मंत्र दिखने मे छोटा है पर इसका प्रभाव तीव्र है ।यह मंत्र गुरू गोरखनाथ प्रणीत तंत्र से है जो शीघ्र सिद्धीप्रदायक है ।जब भूत सिद्धी होती है तो साधक भुतो से मनचाहा काम करवा सकता है ।

आकर्षण-वशीकरण जैसे काम भुतो के लिये छोटे काम है तो सोचिये भूत क्या-क्या कर सकते होगे?इसलिये जीवन मे भुतसिद्धी महत्वपूर्ण है ।

(नोट:-कमजोर दिल वाले लोग यह साधना करने का साहस ना करे)

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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चक्रेगमालिनी देवी साधना

चक्रेगमालिनी देवी साधना



(शिव शक्ति)

यह देवी भगवती से उत्पन्न है।यह सफ़ेद वस्त्रो को धारण किये हुये,गले में फूलो का सफ़ेद हार पहने हुये साधक को दर्शन देती है।

सिद्ध होने पर यह साधक को भूत भविष्य वर्तमान बताती हैं और अन्य बाते भी साधक के कानो में बोलकर बताती हैं।इस देवी सिद्धि से साधक स्वयं ही त्रिकाल दर्शी बन जाता है।

देवी अम्बिका की मूर्ति का पूजन करे।मिठाई का भोग लगाय, धूपबत्ती,फूल,अर्पित करे,देशी घी का दिया जलाय।जल का कलश रखे।

21 माला जाप 41 दिन करे।

सफ़ेद वस्त्र,सफ़ेद आसन ले।माथे पर लाल चन्दन का तिलक लगाये।रुद्राक्ष माला से जप करे।

बन्द आँखों से जप करे।सिद्ध होने पर यह साधक की सहायता करती हैं।

अंतिम दिन दशांश हवन करे।

गुरु पूजन,पवित्रीकरण,वास्तुदोष पूजन,शिव पूजन,अम्बा देवी पूजन करे।लालची साधक दूर रहे।

मन्त्र।

।ॐ ह्रीम् चक्रगमालिनी स्वाहा।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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प्रचंड भगवती धूमावती साधना

प्रचंड भगवती धूमावती साधना




प्रचंड भगवती धूमावती तंत्र की सातवी महाविद्या के रूप जगत में प्रसिद्धि हैं . दतिया मध्य प्रदेश में माँ बंगलामुखी सिद्धि पीठ के के समीप ही भगवती धूमावती का भी स्थान हैं . माँ भगवती धूमावती का साधना प्रयोग इस प्रकार हैं .

धूमावती मुखं पातु धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी |
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी ||
कल्याणी ह्रदयपातु हसरीं नाभि देशके |
सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना ||
सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः |
सौभाग्यमयतं प्राप्य जाते देवितुरं ययौ ||

॥ धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा॥

मंत्र जाप संख्या : - सवा लाख
दिशा :- दक्षिण
स्थान :- शमशान , शिवालय , सिद्धि पीठ , या निर्जन स्थान ,
समय :- रात्रि
दिन ;- शनिवार / या धूमावती जयंती
आसन :- सफ़ेद
वस्त्र :- काले रंग की धोती , कला वस्त्र , काला कम्बल ,
हवन :- ( दशांश ) हवन

विधि :-

मोहनी एकादशी या किसी भी शुक्रवार को स्नान आदि से निवित्र होकर कांशे की थाली में समस्त तांत्रिक पूजन सामग्री स्थापित करके पंचोपचार पूजन करना चाहिए व्यक्ति विशेष को वश में करने का अथवा सिद्धि का संकल्प लेते हुए ,

 विधि -

विधान पूर्वक गुरु - गणेश वंदना करके , मूल मंत्र का जाप करे , . जाप की पूर्णता पर दशांश हवन करके ब्राह्मण , एवं पांच कुवारी कन्यायो को भोजन सहित उपयुक्त दान - दक्षिणा देकर साधना को पूरा करे .

इस महत्व पूर्ण सम्मोहनी साधना से साधक का व्यक्तित्व अत्यंत सम्मोहक और आकर्षक हो जाता हैं .

उसके संपर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता .

 यदि कोई साधना करने में असमर्थ हो , तो योग्य विद्द्वान द्वारा या साधना सम्पन्न करा के करवाकर सम्मोहनी कवच धारण करके उक्त लाभ प्राप्त कर सकता हैं .

साधना सामग्री :-

सिद्धि अधेर मंत्रो से अभिमंत्रित धूमावती यन्त्र . काले हकीक की या रुद्राक्ष की माला , गुड़हल के फूल , तेल का दीपक नैवेद्य , कपूर ,एवं पूजन की अन्य आवश्यक सामग्री ,.

विधि :-

 भय रहित ह्रदय से नदी या तालाब में स्नान आदि से निवृत होकर पूर्ण विधि - विधान से एकाग्र भाव से साधना करें . मंत्र जाप की समाप्ति पर दशांश यज्ञ हवन करना चाहिए .

किसी विशेष प्रयोजन हेतु यदि आप धूमावती साधना अनुष्ठान करने के इच्छुक हैं तो अपनी मनोकामना का स्पष्ट शब्दों में संकल्प करें . यह देवी साधक के सभी शत्रुओ को समाप्त कर देती हैं . इस देवी का सिद्ध साधक निर्भय हो जाता हैं .

राज गुरु जी

महाविद्या आश्रम
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Sunday, August 13, 2017

ज्वाला शत्रु स्तम्भय साधना

ज्वाला शत्रु स्तम्भय  साधना




जीवन मे निरंतर पग पग पर समस्या तथा बाधाए आना स्वाभाविक है। आज के युग मे जब चारो तरफ अविश्वास और ढोंग का माहोल छाया हुआ है तब ज्यादातर व्यक्तियो का समस्या से ग्रस्त रहना स्वाभाविक है। और व्यक्ति कई प्रकार के षड्यंत्रो का भोग बनता है।

यु एक हस्ते खेलते परिवार का जीवन जाता है अत्यधिक दुखी हो। कई बार व्यक्ति के परिचित ही उसके सबसे बड़े शत्रु बन जाते है और यही कोशिश मे रहते है की किसी न किसी रूप मे इस व्यक्ति का जीवन बर्बाद करना ही है।

 चाहे इसके लिए स्वयं का भी नुक्सान कितना भी हो जाए। आज के इस अंधे युग मे मानवता जैसे शब्दों को माना नहीं जाता है। और व्यक्ति इसे अपना भाग्य मान कर चुप हो जाता है।

अपने सामने ही खुद की तथा परिवार की बर्बादी को देखता ही रहता है और आखिर मे अत्यधिक दारुण परिणाम सामने आते है जो की किसी के भी जीवन को हिलाकर रख देते है।

 एसी परिस्थिति मे गिडगिडाने के अलावा और कोई उपाय व्यक्ति के पास नहीं रह जाता है। लेकिन हमारे ग्रंथो मे जहा एक और नम्रता को महत्व दिया है तो दूसरी और व्यक्ति की कायरता को बहोत बड़ा बाधक भी माना है।

 एसी परिस्थितियो मे शत्रु को सबक सिखाना कोई मर्यादाविरुद्ध नहीं है। यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार व्यक्ति अपनी और परिवार की आत्मरक्षा के लिए हमलावर को हावी ना होने दे और उस पर खुद ही हावी हो जाए। हमारे तंत्र ग्रंथो मे इस प्रकार के कई महत्वपूर्ण प्रयोग है जिसे योग्य समय पर उपयोग करना हितकारी है।

लेकिन मजाक मस्ती मे या फिर किसी को गलत इरादे से व्यर्थ ही परेशान करने के लिए इस प्रकार की साधनाओ का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए वरना इसका भयंकर विपरीत परिणाम भी आ सकता है।

शत्रुओ के द्वारा निर्मित षड्यंत्रो का किसीभी प्रकार से कोई असर हम पर ना हो और भविष्य मे वह हमारे विरुद्ध परेशान या नुकसान के इरादे से कोई भी योजना ना बना पाए इस प्रकार से साधक का चिंतन हो तो वह यथायोग्य है।

तन्त्र के कई रहस्यपूर्ण और गुप्त विधानों मे से एक विधान है "ज्वाला शत्रु स्तम्भन"। यह अत्यधिक महत्वपूर्ण विधान है जिसे पूर्ण सात्विक तरीके से सम्प्पन किया जाता है लेकिन इसका प्रभाव अत्यधिक तीक्ष्ण है।

देवी ज्वाला अपने आप मे पूर्ण अग्नि रूप है, और शत्रुओ की गति मति स्तंभित कर के साधक का कल्याण करती है। साधक को इस प्रयोग के लिए कोई विशेष सामग्री की ज़रूरत नहीं है।

इस विधान को साधक किसी भी दिन से शुरू कर सकता है तथा इसे आठ दिन तक करना है, इन आठ दिनों मे साधक को शुद्ध सात्विक भोजन ही करना चाहिए, लहसुन तथा प्याज भी नहीं खाना चाहिए।

 यह जैन तंत्र साधना है इस लिए इन बातो का ध्यान रखा जाए। इस प्रयोग मे वस्त्र तथा आसान सफ़ेद रहे। दिशा उत्तर रहे। साधक रात्री काल मे 10 बजे के देवी ज्वाला को मन ही मन शत्रुओ से मुक्ति के लिए प्रार्थना करे।

 इसके बाद निम्न मंत्र की 1008 आहुतिय शुद्ध घी से अग्नि मे प्रदान करे।

औम झ्राम् ज्वालामालिनि शत्रु स्तम्भय उच्चाटय फट्

आहुति के बाद साधक फिर से देवी को प्रार्थना करे तथा भूमि पर सो जाए। इस प्रकार आठ दिन नियमित रूप से करने पर साधक के समस्त शत्रु स्तंभित हो जाते है और साधक को किसी भी प्रकार की कोई भी परेशानी नहीं होती। शत्रु के समस्त षडयंत्र उन पर ही भारी पड जाते है।

राजगुरु जी

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अर्पणा अप्सरा साधना

अर्पणा अप्सरा साधना




@परिचय अपसरा साधना स्पष्ट शब्दो मेँ यह काम भावना की साधना है। अप्सरा का अर्थ एसी देवी वर्ग से है जोसौंदर्य की द्रष्टि से अनुपमेय हो। मुख की सुन्दरता के साथ साथ देह व वाणी सौँन्दर्य न्रत्य संगीतकाव्य-हास्य-विनोद सभी प्रकार के सौंदर्योँ से भरपूर हो।जिसे देख कर मन मोहित हो काम स्फुरन आरंम्भ हो जाए

@कुंकुमपंअकलंकितदेहा गौरपयोधरकपम्पितहारा।नूपूरहंसरणत्पदपदूमाकं नवशीकुरुते भुविरामा॥@

अर्थ-जिसका शरीर केसर के उबटन से सुन्दर बना हुआ है, जिसके गुलाबी स्तनोँ पर मोती का हार झूल रहा है चरण कमल मे नुपूर रुपी हंस शब्द करतेँ हो। एसी लोकोत्तर सुन्दरी किसे अपने वश मे नहिकर सकती।

@आवश्यक सामग्री-गुलाबजल,गुलाब का इत्र, अप्सरा का चित्र,दीपक, शुद्ध घी या चमेली का तेल, एक बेजोट,कोरा श्वेत वस्त्र केसर दो गुलाब के फूल,शंख की माला, श्वेत या कंबल का आसन, सफेद धोती गमझा,

@दिन व समय-किसी भी मास की एक तारीख को या किसी भी पुष्य नक्षत्र मे की जा सकती है। रात्रि 11 बजे करे।

@

मंत्र-ॐ ल्रं ठं ह्रां सः सः[OM LRAM THM HRAM SH SH]@

विधी-

साधना के करने से पूर्व बेजोट पर श्वेत वस्त्र कोरा वस्त्र बिछा कर अप्सरा का चित्र रखेँ! दीपक जला कर केसर से पूजन करे।उक्त विधी द्वारा अंगो को चित्र मे स्पर्श करें!

 [>समस्त अप्सराओ की साधना मे यह वैदिक विधी प्रयोग की जा सकती है।<]अं नारिकेल रुपायै नमः-शिरसिआं वासुकी रुपायै नमः-केशायइं सागर रुपायै नमः- नेत्रयोईँ-मत्यस्य रुपायै नमः -भ्रमरेउं मधुरायै नमः- कपोलेऊं गुलपुष्पायै नमः- मुखेएं गह्वरायै नमः-चिबुकेऐं पद्मपत्रायै नमः-अधरोष्ठेओं दाडिमबीजायै नमः-दंतपंक्तौऔं हंसिन्यै नमः-ग्रिवायैअं पुष्प वल्ल्यै नमः-भुजायोःअः सूर्यचंद्रमाय नमः-कुचेकं सागरप्रगल्भायै नमः- वक्षेखं पीपरपत्रकायै नमः-उदरौगं वासुकीझील्यै नमः-नाभौघं गजसुंडायै नमः-जंघायैचं सौंदर्यरुपायै नमः पादयौघं हरिणमोहिन्यै नमः-चरणेजं आकाशाय नमः-नितम्भयोझं जगतमोहिन्यै नमः-रुपेटं काम प्रियायै नमः- सर्वांगेअब अप्सरा के भावोँ की कल्पना करेँठं देवमोहिन्यै नमः-गत्यमौडं विश्व मोहिन्यै नमः-चितवनेढं अदोष रुपायै नमः-द्रष्ट्यैतं अष्टगंधायै नमः-सुगंधेषुथं देवदुर्लभायै नमः-प्रणयंदं सर्वमोहिन्यै नमः-हास्येघं सर्वमंगलायै नमः-कोमलांग्यैनं धनप्रदायै नमः- लक्ष्म्यैपं देहसुखप्रदाय नमः-रत्यैफं कामक्रिडायै नमः-मधुरेबं सुखप्रदायै नमः-हेमवत्यैभं आलिंगनायै नमः-रुपायैमं रात्रौसमाप्त्यैनमः-गौर्यैयं भोगप्रदायै नमः-भोग्यैरं रतिक्रयायै नमः-अप्सरायैलं प्रणयप्रियायै नमः-दिव्यांगनायैवं मनोवांछितप्रदायनमः-अप्सरायैशं सर्वसुखप्रदायै नमः-योगरुपायैषं कामक्रिडायै नमः-देव्यैसं जलक्रिडायै नमः-कोमलांगिन्यैहं स्वर्ग प्रदायै नमः-

अर्पणाप्सरायैअब एक गुलाब का पुष्प चित्र के पास रखे गुराब का इत्र रुई मे ले कर चित्र के पास रख दे। एवं अब स्वयं इत्र लगावेँ।

 एक मुलैठी या इलायची चबा जाऐ।अब लोटे मे जल ले उसमेँ गुलाब जल व गंगा जल मिला कर विनयोग करेँ

ॐ अस्य श्री अर्पणा अप्सरा मंत्रस्य कामदेव ऋषि पंक्ति छंद काम क्रिडेश्वरी देवता सं सौन्दर्य बीजं कं कामशक्ति अं कीलकं श्री अर्पणाप्सरा सिध्दयर्थं रति सुख प्रदाय प्रिया रुपेण सिद्धनार्थमंत्र जपे विनयोगः

न्यास/करन्यास

ॐअद्वितीयसौँदर्यनमः शिरषिॐकामक्रिड़ासिध्दायैनमः मुखेॐआलिंगनसुखप्रदायैनमः ह्रिदीॐदेहसुखप्रदायैनमः गुह्योॐआजन्मप्रियायैनमः

 पादयोॐमनोवांछितकार्यसिद्धायै नमः करसंपुटेॐ दरिद्रनाशय विनियोगायैनमः सरवांगेॐसुभगायै अंगुष्ठाभ्यां नमःॐसौन्दर्यायै तर्जनीभ्यां नमःॐरतिसुखप्रदाय मध्यमाभ्यां नमःॐदेहसुखप्रदाय अनामिकाभ्याम नमःॐ भोगप्रदाय कनिष्ठाभ्यां नमःॐ आजन्मप्रणयप्रदायै

 करतलपृष्ठाभ्यांनमःध्यानहेमप्रकारमध्ये सुरविटपटले रत्नपीठाधिरुढांयक्षीँ बालां स्मरामः परिमल कुसुमोद्भासिधम्मिल्लभाराम पीनोत्तुंग स्तननाढ्य कुवलयनयनां रत्नकांचीकराभ्यां भ्राम द्भक्तोत्पलाभ्यां नवरविवसनां रक्तभूषांगरागाम्रात्री

काल मेँ मन मे प्रेमिकासे मिलने का भाव रख कर 11 शंख की माला से जाप करेँ।

 5 माला पूर्ण हो जाने पर पर प्रमाव प्रत्यक्ष होने लगता हैनाना प्रकार की क्रिडा अप्सरा द्वारा की जाती है

 विचलित हुए बिना जप पूर्ण हो जाए तो वचन हरा लेँ।@विशेषसाधना से एक दिन पूर्व ही साधना कक्ष को साफ कर लेना चाहिए अर्धरात्री से मौन रखे कर अकले दिन रात मेँ साधना से पूर्व मौन खत्म होता है व्यसन कामुकता पूर्णतः वर्जित है।

 साधना से पूर्व गुरु,गणेश,शिव,इष्ट पूजन आवश्यक है आसन शुद्धी माला संस्करण आसन जाप आदी कर लेना चाहिए ताकी साधना की सफलता की संभावना बनी रहे ये सभी साधनाओँ का आधार होते है

@भाव की प्रधानतायह साधना काम भाव की है अर्थ ये नही की आप कामुक भाव से करे। भाव ये है की एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के प्रेम मे व्याकुल उसे पुकार रहा है। और@

नोट-

 ये साधना एक दिवसी अवश्य है परन सरल नहि सात्विक्ता से रह कर, मौन रह कर, काम क्रोध लोभ मोह त्याग कर, मनको शांत रख कर ही आप साधना मे अपनी सफलता की संभावना को बढा सकतेँ है सामग्री को बदला जाए या इनके विकल्पो का प्रयोग करना वर्जित है।।

याद रखे गाण्डिवधारी अर्जुन जैसा धनुर्धर खुद को अप्सरा के श्राप से नहि बचा पाया था। अतः किसी भी साधना या शक्ती को सहज न समझेँ।

देवराज इन्द्र द्वारा इन्हे साधना भंग करने हेतु पहुँचाया जाता रहा अतः ये इस कार्य मे निपुण होतीँ है अतः साधक विचलित न हो ये आवश्यक है।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Saturday, August 12, 2017

तंत्र से करें सुख-समृद्धि

तंत्र से करें सुख-समृद्धि




1‌‌‍॰ यदि परिश्रम के पश्चात् भी कारोबार ठप्प हो, या धन आकर खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें। किसी गुरू पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन प्रात: हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे “संकटनाशन गणेश स्तोत्र´´ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूंग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रूपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिने मुख के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते रहे। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नयी थैली बना कर बदलते रहें।

2॰ किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर “बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।

3॰ रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´।

4॰ सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की `कुशा´ की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के पश्चात् किसी शुभ कार्य में दानादि दें।

5॰ व्यापार, विवाह या किसी भी कार्य के करने में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें- सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात मदार (आक) के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और कहें -“हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।´´ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।

6॰ सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है।

7॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग’ हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।

८॰ रविवार पुष्य नक्षत्र में एक कौआ अथवा काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भरकर, धूपदीपादि से पूजन कर धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। कौए या काले कुत्ते दोनों में से किसी एक का नाखून लें। दोनों का एक साथ प्रयोग न करें।

9॰ प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।

10॰ अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।

11॰ आटा पिसते समय उसमें 100 ग्राम काले चने भी पिसने के लियें डाल दिया करें तथा केवल शनिवार को ही आटा पिसवाने का नियम बना लें।

12॰ शनिवार को खाने में किसी भी रूप में काला चना अवश्य ले लिया करें।

13॰ अगर पर्याप्त धर्नाजन के पश्चात् भी धन संचय नहीं हो रहा हो, तो काले कुत्ते को प्रत्येक शनिवार को कड़वे तेल (सरसों के तेल) से चुपड़ी रोटी खिलाएँ।

14॰ संध्या समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सोने से पूर्व पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए, किन्तु गीले पैर नहीं सोना चाहिए। इससे धन का क्षय होता है।

15॰ रात्रि में चावल, दही और सत्तू का सेवन करने से लक्ष्मी का निरादर होता है। अत: समृद्धि चाहने वालों को तथा जिन व्यक्तियों को आर्थिक कष्ट रहते हों, उन्हें इनका सेवन रात्रि भोज में नहीं करना चाहिये।

16॰ भोजन सदैव पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करना चाहिए। संभव हो तो रसोईघर में ही बैठकर भोजन करें इससे राहु शांत होता है। जूते पहने हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिए।

17॰ सुबह कुल्ला किए बिना पानी या चाय न पीएं। जूठे हाथों से या पैरों से कभी गौ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श न करें।

18॰ घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाये गये फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।

19॰ अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह कर के रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है।

20॰ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो, तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त कर के घर लाएं। इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहें तो स्वर्ण ताबीज में भर कर धारण कर लें। जब तक यह ताबीज आपके पास रहेगी, तब तक कोई कमी नहीं आयेगी। घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन संपदा भरपूर होंगे। सुख शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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