Friday, October 9, 2015

"माँ तारा":-(ममतामयी माँ सबको तारने वाली)
माँ तारा जब तुम्हें याद करता हूँ तो मन भर जाता है और शब्द निकल नहीं पाते क्या लिखूँ तारा माँ तुम्हारे बारे में।प्रेम की पराकाष्ठा हो तुम,परम प्रेममयी हो और सबको तारने वाली प्यारी माँ हो।वशिष्ठ के द्वारा तुम्हारी साधना करने पर भी जब तुम्हारी सिद्धि नहीं हो पाई तो तुम्ही को किलित करने लगे।तब तुमने आकाशवाणी कर बताया कि चीनाचार विधि से तुम्हारी साधना सफल हो पायेगी तब जाकर वे तारा की सिद्धि कर पाये और साधना स्थान रहा "तारापीठ की वीरभूमी" जहाँ पंचमुंडी आसन पर बैठकर वे साधना कर पाए।द्वापर युग में कृष्ण के आने पर तुम्हारी साधना के कीलन टुट गये और तुम्हारी साधना सबके लिए सुलभ हो पाया।तुम्हारे परम साधक,भक्त तारापीठ के वामाखेपा जी हुए जिन्होने बिना मंत्र,विधि के प्रेम और भक्ति से ही तुम्हें प्राप्त कर लिया।तुम अपने भक्तों का विशेष ख्याल रखती हो कारण तुम बहुत ममतामयी माँ हो।
-:प्रसंग:-
वामा,माँ तारा से झगड़ा करते फिर माँ को मनाते।कभी जब खुद रूठ जाते तो माँ अपने प्यारे बेटे को मनाती।ऐसा संबध है तारा माँ का अपने भक्तों से।एक बार की घटना है तारापीठ के मंदिर में मां का पूजा आरम्भ होने जा ही रहा था कि वामाखेपा मंदिर में पहुँच कर माँ का प्रसाद जो भोग के लिए रखा था खुद खाने लगे।इनके इस कृत्य को देख पंडित,पुजारी इन्हें मारने लगे,बहुत मारा उन्हें और उठाकर बाहर फेंक दिया और कहा कि फिर दिखाई मत देना मंदिर के आसपास।वामा रो रहे थे और बोल रहे थे कि "तुने ही मंदिर मे बुलाया माँ और इतना मार खाया मै।अरे भई तुम लोग मुझे इस तरह मत मारो,माँ ने मुझसे खाने को कहाँ था तभी मैं खा रहा हूँ।" इधर मार पे मार पड़ती रही,वो दर्द से चिल्लाते रहे।पागल मुर्ख कही के,अब देखते है कौन तुमको अब प्रसाद खाने को देता है,एक पुजारी कहता है।एक भक्त से रहा नहीं गया कि बेचारा बोल उठा क्यों मार रहे हो बेचारे को ब्राह्मण का लड़का है,छोड़ दो इसे।मारे नहीं तो क्या करें,इस पागल को अभी पुजा भी नहीं हुई है प्रसाद जुठा कर दिया है।यह शमशान में कुते,सियार के साथ बैठकर जुठन खाने वाला,इसे कह रहे हो क्यों मार रहे हो?ठीक कर रहे है!ये फिर मंदिर के सामने दिखाई दिया तो मार के हाथ पैर तोड़ देंगे।इधर वामाचरण आँखो के आँसू पोंछते पोंछते उठ कर दर्द से कराहते हुए श्मशान आ गये और पेड़ के नीचे लेट कर रोते रहे।नाटो की रानी सो रही थी।उन्होनें स्वप्न देखा कि तारापीठ मे माँ तारा मंदिर छोड़कर रोते रोते जा रही है।जैसे उनको बहुत दुःख हो,माँ के बदन,पीठ से खुन निकल रहा था।जैसे माँ को किसी ने बड़ी बेदर्दी से मारा हो।हाथ जोड़कर रानी खड़ी हो गई और कहने लगी,माँ किस अपराध की सजा दे रही हो मां,हमे क्यों छोड़कर जा रही हो मां।फिर मां ने कहा काफी युग युगान्तर से मैं यहां काफी अच्छी और सुख शान्ति में थी लेकिन अब नहीं हूँ,तुम्हारे मंदिर में मेरे प्रिय पुत्र वामाचरण को कई लोगों ने निर्दयी होकर मारा है।वो प्रहार सब मुझ पर पड़े हैं,वो चोट मुझे लगी है।काफी दर्द हो रहा है,इसी वजह से मै और यहाँ नहीं रहूँगी चली जाऊंगी।रानी बोली एक की सजा दूसरे को क्यों माँ?मुझे अपनी गलती सुधारने का मौका दो,ताकि जिसने ये पाप किया हैं उसे सजा मिले मां!पर तुम हमें क्षमा करो मां।ठीक है पुत्री!मेरे प्रसाद को मेरे पुत्र को खिला दो,कारण चार दिन से मेरा पुत्र भूखा है और मैं भी उपवास में हूँ।रानी पड़प उठी,अरे मां!ये क्या आप चार दिन से उपवास में हैं!हां!अगर पुत्र भुखा हो तो क्या मां खा सकती है।इसीलिए मै भी भुखी हूँ।फिर अचानक रानी की नींद टूट गई।इधर मां तारा अपने पुत्र बामा को मनाने लगी।बामा पीड़ा से कराह रहे थे।मां वामाचरण के पास खुद प्रसाद लेकर आई और वामा से कहने लगी,ले बेटा प्रसाद खा ले,कितने दिनों से तुमने कुछ खाया नहीं,देख कैसी हालत हो गई है,एकदम सुख गया हैं।मां की बात सुन वामा बोले नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगा और मै कभी तुम्हारे मंदिर में नहीं जाऊंगा।खुद मंदिर में बुलाकर मार खिलाती हो।नहीं बेटे!उनलोगों ने तुम्हें नहीं मारा है,मुझे मारा है,ये देखो मेरे बदन में भी दाग है।मुझे भी दर्द हो रहा है,मैं भी तुम्हारी तरह भूखी हूँ।इतना सुनते वामा बोले,माँ मेरी तु भी भुखी हैं क्यों नहीं खाया तो मां बोली बेटा तुने नहीं खाया तो मैं कैसे खा सकती हूँ?इधर रानी अपनी प्रजा के साथ मंदिर आई।मंदिर में रानी आते ही सबसे पहले उस पुजारी को निकाल कर नया पुजारी रखा,फिर वामा को खोजने लगी।ढूँढते हुए रानी श्मशान में आई ,वहाँ वामा को देख क्षमायाचना करने लगी तथा सपने की सारी बात बताई।उसी समय रानी के आदेश पर मंदिर की सारी जिम्मेवारी वामाचरण को सौंप दी और बोली पहले वामा बाबा को भोग लगेगा फिर मां को भोग लगेगा तथा मंदिर की पूजा वामा अपने हिसाब से करेगें।इसके बाद क्या मजाल,कौन क्या कहे,बामा जाकर मंदिर के आसन पर बैंठ गये।कोई आचार,विचार नहीं मां को देख वामा मुस्कुरा दिये,तुम तो अन्तर्यामी हो,तुम क्या खाओगी पहले मैं ही खाऊंगा,और खुद खाने लगे,ये देख वहाँ उपस्थित लोग आश्चर्य होकर देखने लगे।खाना खाने के बाद वामा ने शुरू किया मां का पूजन करना।दोनों हाथों में जवा फूल की माला लेकर जितनी भी इच्छा हुई उतनी गाली देना शुरू किया मां को और वामा के आँखों से आँसू भी गिरते रहे ।फूल से उस आँसू को पोछते हुए अन्जली देने के उद्देश्य से देवी की मूर्ति पर फूल फेंक दिया।मंत्र के नाम पर उन्होनें सिर्फ ये कहा ये लो फूल,ये लो बेलपत्र,सारे भक्तजन लोग देखे कि वामा के द्वारा फेंके फूल एक एक कर सब आपस में मिलकर माला का रूप ले लिया फिर माँ के गले मे पहुँच गई।ऐसी प्रेममयी है तारा माँ और उनके भक्त।बामा एक बार काशी से पैदल ही तारा पीठ चल पड़े,कारण पैसा भी नहीं था।उनके सामने जो रास्ता मिला उसी रास्ते से आगे बढते रहे,दिन भर चलते जहां रात होती वही किसी पेड़ के निचे सो जाते फिर प्रातःचलने लगते।लगातार कई दिन भूखे प्यासे चलते रहे,बाद में थक गये थे तथा कमजोरी के कारण चल भी नही पा रहे थे।थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गये फिर एक यात्री से पूछा ये कौन सी जगह हैं भाई,पर इन्हें पागल समझ लोग मुँह फेर चले जाते,थके तो थे ही फिर हार कर बोलने लगे हे माँ तारा ये कौन सी जगह ले आई हो माँ।अचानक एक आवाज आई तुम कहाँ जाओगे।नारी की आवाज सुन रास्ते के दुसरी तरफ देखा काले कपड़े पहनी हुई एक कुमारी कन्या खड़ी है,काफी सुन्दर घने बालों वाली कन्या थी तथा पाँवो मे आलता लगा हुआं था।वामा आवाक होकर देखते ही रहे और आंखो में आंसू बहने लगे।काली मां का एक कन्या के रूप में वामा के नजदीक आकर पूछने लगी तुम रो क्यों रहे हो?लगता हैं रास्ता भूल गये हो?हां माँ!मैं रास्ता भूल गया हूँ।श्यामांगी अपने आंचल से वामाचरण के आँसू पोंछने लगी फिर प्यार से बोली रोते क्यों हो?कहां जाओगे तुम?मुझे नहीं पता मां!महामाया मुझे कहां ले आई हैं,लेकिन मैं तो जाऊंगा मां।श्यामांगी मन्द मन्द हंसने लगी,लगता हैं तुम्हें काफी भूख लगी है,रूको मै माँ के मंदिर से प्रसाद लेकर आती हूँ।ये कहकर ही श्यामांगी दौड़कर जंगल की तरफ गई और कुछ देर बाद एक पत्ते में प्रसाद ले आई।ये देखकर वामा मन ही मन हंस रहे थे,सोचे ये क्या कर रही है माँ,मुझे संसार की मोह से दूर कर खूद बेटे के मोह में आ रही हैं।ये लो खाओ,मां बोली।वामा प्रसाद लेकर श्यामांगी का मुंह देखते देखते प्रसाद खाते रहे।खाने के बाद काफी तृप्ति मिली वामाचरण को तब वे मां से बोले,मैं "तारा पीठ" किस रास्ते से जाऊंगा मां?तुम तारापीठ जाओगे?वो तो बहुत दूर है,फिर भी इस जंगल के अन्दर से एक रास्ता जाता है,क्या तुम जा सकोगे?अगर आप हमें रास्ता दिखायेंगी तो मैं क्यो नहीं जा सकुंगा माँ! ऐसा क्या कभी हो सकता है?और क्यों तरसा रही हो मां,कैसे जाना है,किस रास्ते जाना है,मेरा हाथ पकड़ा के ले चलो मां,जिस रास्ते जाना हैं।मां अपने बेटे की बात सुन मुस्कुरा कर बोली,तो चलो जल्दी,फिर वामा भी हंस कर उस कन्या का हाथ पकड़ चल दिए,क्षण भर में वामा तारापीठ में थे,कन्या अदृश्य हो गई।
-:रुप:-
तंत्र में कहा गया है "ततःशून्या परारूपा श्रीमहासुन्दरी कला।सुन्दरी राजराजेशी महाब्रह्माण्डनायिका॥महाशून्या ततस्तारा तद्वैगुण्यक्रमेण च।मुक्तौ संयोज्य सर्वं तं महासुन्दर्यनन्ततः॥" श्रीमहासुन्दरी को कला और श्रीतारा को शून्यरूप निर्देश किया है।अब द्रष्टव्य यह है कि शून्यरूप में ही सब देवता और देवी शक्तियां हैं।इस कारण अंतिम शून्य साधना करने के बाद शून्यरूप निर्विकार ब्रह्मरूप में लीन होकर मुक्ति साधन किया जाता है।जब कही आसरा नहीं मिलता तो लोग तारा माँ के शरण में जाते है,माँ सभी को अभयदान भक्ति प्रदान करती ही हैं।काली का एक रूप है तारा माँ,थोड़ा सा फर्क हैं।वशिष्ट तारा माँ की सिद्धि वेदोक्त विधि से करने लगे।पर यह संभव ही नहीं है कारण वेद के द्वारा तारा की साधना नहीं हो सकती।कारण ये शिव विद्या है।वेद तो नंदीश्वर के द्वारा शापित है,कारण दक्ष प्रजापति के यज्ञ में वेद अनुयायी ब्राह्मणों ने शिव निन्दा की तो कुपित होकर नंदी ने ब्राह्मणों को शापित कर दिया था।तारा के शिव अक्षोभ्य है,इन्हे तारा अपने मस्तक पर बिठाये रखती है।अक्षोभ्य यानि क्षोभ से मुक्त पूर्ण तृप्त कारण तारा प्रेयसी है,पूर्ण प्रेममयी सब कुछ प्रदान करने वाली सबसे बचाकर शिव को,पुत्र को,भक्त को अपने से अलग न करना तथा बहुत गलतियों को नजर अंदाज कर देना यही तारा रहस्य है।तारा कई रूपों में जानी जाती है।बौध हो या जैन धर्म सभी को तारा ही अपने लक्ष्य तक पहुँचाई है।जन्म जन्म के हमारे बंधन तारा अपने कैंची से काट देती है,यानि तार देती है।तारा धन देती है ,विद्या भी देती है,तथा सब कुछ प्रदान करती है यानि मूर्ख को भी ज्ञानी बना देती है।इनका एक रूप है नीलसरस्वती का ये कवित्व शक्ति प्रदात्री हैं।जो निश्चल हृद्वय के है,कपट से दूर वो पूर्ण प्रेम करना जानते हो उनके लिए अराध्य हैं तारा माँ।तारा में सीताराम छुपे हैं।
-:उपदेश:-
वामाक्षेपा के भक्तों के लिए कुछ प्यारे उपदेश "भगवान को देखने के लिए कैसी दृष्टि चाहिए,वैसी दृष्टि मिल सकती हैं साधना के द्वारा,विश्वास के द्वारा,फिर हम भगवान को देख सकते है।भगवान न पूरूष है न स्त्री,उनकी व्याख्या ही नहीं की जा सकती हैं।वो स्त्री और पूरूष का मिश्रण रूप है,इससे अधिक न समझो नहीं तो माथा खराब हो जायेगा।" भक्तों के आग्रह पर फिर बोले "परमब्रह्म निराकार है,ब्रह्म की आत्मा है आदिशक्ति सर्वभूता मातृरूप इसलिये शक्ति का नारी रूप है।वो नारी रूप में शक्ति प्रतीक बनकर घर घर विराजती है।ब्रह्म और शक्ति एक है ये ही दोनों मिलकर भगवान कहलाते है,इन दोनो का संबंध अटूट है।बच्चे सबसे पहले अपनी मां को पहचानते है,फिर मां ही पिता की पहचान करवाती है।इसलिये सभी को मां की उपासना करनी चाहिए।आदिशक्ति काली है,उनकी तीन सृष्टि हैं ब्रह्मा,विष्णु,महेश।असल में संसार एक भोग करने की जगह है,हर इंसान एक ही बार में त्यागी हो जाये यह असम्भव है।पहले भोग फिर त्याग।भोग नहीं करने से त्याग की शुद्धता नहीं मिलती हैं।त्याग ही निवृत्ति मार्ग का दरवाजा है,भोग के रास्ते से ही मन को तैयार करना पड़ता है।बहुत सा दिव्य वचन वामाक्षेपा जी ने दिया जो मनन करने लायक है।जीवन में निरसता क्यों?अगर परमसता को ही पाना है तो पहले बड़े उमंग से कर्म करना चाहिए।जीवन के आधार के लिए एक सच्चा मुकाम बनाकर कोई भी कार्य किया जा सकता है,तारा से सच्चे दिल से मांगने पर वह सब कुछ प्रदान कर देती हैं।बहुत सी बातें है,परन्तु मां तारा प्रेम की विरह वेदना से ही सिद्ध हो जाती है।जो भी भक्त को चाहिए वह प्रदान कर देती है,यह मां ही महामाया एवं ब्रह्म शक्ति है।दिल से तारा तारा पुकारने पर ही ये भक्त के सारे संकट हर लेती है।तारा माँ अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखो,तुम्हारी जय हो माँ।
-:तारापीठ स्थल:-
झारखंड के बैधनाथ धाम के बगल में दुमका जिला से सटे पश्चिम बंगाल के वीरभूमी में स्थित द्वारका नदी के पास महाश्मशान में स्थित है तारा पीठ।पूर्वी रेलवे के रामपुर हाल्ट स्टेशन से चार मील दूरी पर स्थित है तारा पीठ।रामकृष्ण के समकालीन ही वामा क्षेपा, तारा पीठ के सिद्ध अघोरी परम भक्त थे।तारा पीठ ५२ पीठो के अन्तर्गत माना गया है।तारा पीठ तीन हैं।सती देवी के तीन नेत्रों की मणि बिन्दु बतीस योजन के अन्दर त्रिकोणाकार,तीन विभिन्न स्थानों पर गिरे थे।मिथिला के पूर्व दक्षिणी कोने में,भागीरथी के उत्तर दिशा में,त्रियुगी नदी के पूर्व दिशा में "सती" देवी के बाँये नेत्र की मणि गिरी,तो यह स्थान "नील सरस्वती" तारा पीठ के नाम से प्रसिद्ध हैं।बगुड़ा जिले के अन्तर्गत "करतोया नदी के पश्चिम में दाँईं मणि गिरी,तो यह स्थान "एक जटा तारा" और भवानी तारा पीठ के नाम से विख्यात हैं।बैधनाथ धाम के पूर्व दिशा में उत्तर वाहिनी,द्वारका नदी के पूर्वी तट पर महाश्मशान में श्वेत शिमूल के वृक्ष के मूल स्थान में "सती देवी" के ऊर्धव यानी तीसरे नेत्र का तारा गिरा,तो यही स्थान "शिलामयी चण्डी भगवती उग्र तारा" के नाम से प्रसिद्ध हैं,यही तारा पीठ के भक्त थे वामाक्षेपा।
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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Wednesday, October 7, 2015


कनेर......

गंजेपन का सफल इलाज:-

मैं काफी दिनों से देख रहा हूँ के लोग बालो कि समसया से काफ़ी परेशान हैं. जैसे की बाल झड़ना या बाल रहना ही ना.... तो उन सबके लिए एक बहुत ही आसान सा उपाय बता रहा हूँ कृपया लाभ उठायें......
कनेर के 60-70 ग्राम पत्ते (पीली ) ले के उन्हें पहले अच्छे से सूखे कपडे से साफ़ कर लें ताकि उनपे जो मिटटी है वो निकल जाये.,. अब एक लीटर सरसों का तेल या नारियल का तेल या जेतून का तेल ले के उसमे पत्ते काट काट के डाल दें. अब तेल को गरम करने के लिए रख दें. जब सारे पत्ते जल कर काले पड़ जाएँ तो उन्हें निकाल कर फेंक दें और तेल को ठण्डा कर के छान लें और किसी बोटल में भर के रख लें.....
पर्योग विधि :- रोज़ जहाँ जहाँ पर भी बाल नहीं हैं वहां वहां थोडा सा तेल ले के बस 2 मिनट मालिश करनी है और बस फिर भूल जाएँ अगले दिन तक. ये आप रात को सोते हुए भी लगा सकते हैं और दिन में काम पे जाने से पहले भी... बस एक महीने में आपको असर दिखना शुरू हो जायेगा.. सिर्फ 10 दिन के अन्दर अन्दर बाल झड़ने बंद हो जायेंगे या बहुत ही कम... और नए बाल भी एक महीने तक आने शुरू हो जायेंगे......
नोट : ये उपाय पूरी तरह से tested है.. हमने कम से कम भी 10 लोगो पे इसका सफल परीक्षण किया है. एक औरत के 4 साल से बाल झड़ने बंद नहीं हो रहे थे. इस तेल से मात्र 6 दिन में बाल झड़ने बंद हो गये. 55 साल तक के आदमियों के बाल आते देखे हैं . आप भी लाभ उठायें और अगर किसी को फरक पड़े तो कृपया हमे जरुर बताये... 

धन्यवाद ...

नोट :- पीले पत्ते वही ले जो पेड़ पर पक कर पीले हो जाये . पीले होने के बाद वो थोड़ा लाल भी हो जाते है , वो भी ले सकते है.

Monday, October 5, 2015

अत्यंत तीव्र वशीकरण प्रयोग .






तंत्र की क्रिया में तो सैकड़ो सम्मोहन प्रयोग है पर यह प्रयोग अपने आप में अचूक और अत्यंत तीष्ण,तुरंत असर दिखने वाली प्रयोग है.बाकि प्रयोग असफल हो सकती है परन्तु इस प्रयोग की सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं.
यह प्रयोग अघोरि और कपाली ओकी है.जिसे संपन्न करने से पाहिले १०० बार सोच समज़कर ही करनी चाहिए.
अमावस्या की रात्रि में बगीचा या फिर घरमे किसी कोने में बैट जाईये और अपने आसन की निचे श्मशान से लाकर थोड़ी सी राख राख दे आसन लाल रंग की होनी चाहिये फिर दक्षिण दिशा की और मुहकर सामने उस व्यक्ति की चित्र रख दे जिसे पूर्ण वशीकरण या सम्मोहित करनी/करना है.माला लाल हकिक की होनी चाहिये.
इसके बाद उस चित्र के सामने मात्र ५१ माला मन्त्र जाप करनी है और येसा करने से आश्चर्यजनक रूप से चमत्कार देखने को मिलती है और जो आपकी सर्वथा विरोधी व्यक्ति है वह भी आपके अनुकूल हो कर आपके कहे अनुसार कार्य संपन्न करती है.
मंत्र
||ॐ ऐम ऐम अमुक वाश्यमानय मम आज्ञा परिपालय ऐम ऐम फट ||
यह प्रयोग दिखने में अत्यंत सरल है परन्तु प्रभाव अचूक देखने मिलती है और तुरंत ही जिसे सम्मोहित करना चाहते है उसे अपने वश में करने में समर्थ हो जाते है.
राज गुरु जी
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Sunday, October 4, 2015

ऋण मुक्ति प्रयोग.




गुरु प्रदत ऋण मुक्ति
मैं जहां एक बहुत ही सरल
अनुभूत साधना प्रयोग दे
रहा हु आप निहचिंत हो कर
करे बहुत जल्द आप इस अभिशाप
... से मुक्ति पा लेंगे !
विधि –
शुभ दिन जिस दिन
रविपुष्य योग
हो जा रवि वार हस्त नक्षत्र
हो शूकल पक्ष हो तो इस
साधना को शुरू करे
वस्त्र --- लाल रंग की धोतीपहन सकते है !
माला – काले हकीक की ले !
दिशा –दक्षिण !
सामग्री – भैरव यन्त्र
जा चित्र और हकीक
माला काले रंग की ! मंत्र संख्या – 12 माला 21
दिन करना है !
पहले गुरु पूजन कर आज्ञा लेऔर
फिर श्री गणेश
जी का पंचौपचार पूजन करे तद
पहश्चांत संकल्प ले !
स्मस्थ ऋण मुक्ति के लिए
यहसाधना कर रहा हु हे भैरव
देव मुझे ऋण मुक्ति दे!जमीन पे
थोरा रेत विशा के उस उपर कुक्म से तिकोण बनाएउस में एक
पलेट में स्वास्तिक लिख कर उस
पे लालरंग का फूल रखे उस पे
भैरव यन्त्र की स्थापना करे
उस यन्त्र का जा चित्र
का पंचौपचार से पूजन करे तेल का दिया लगाए और भोग के
लिए गुड रखे जा लड्डू भी रख
सकते है ! मन को स्थिर रखते
हुये मन ही मन ऋण मुक्ति के
लिए पार्थना करे और जप
शुरूकरे 12 माला जप रोज करे इस प्रकार 21 दिन करे
साधना केबाद
स्मगरी माला यन्त्र और
जो पूजन किया है वोह समान
जल प्रवाह कर दे साधना के
दोरान रवि वार जा मंगल वार को छोटे
बच्चो को मीठा भोजनआदि जरूर
कराये ! शीघ्र ही कर्ज से
मुक्ति मिलेगी और कारोबार
में प्रगति भी होगी !
मंत्र—
ॐ ऐं क्लीम ह्रीं भमभैरवाये मम
ऋणविमोचनाये महां महा धन
प्रदाय क्लीम स्वाहा !!
राज गुरु जी
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मातंगी साधना.




प्रधान साधार विकल्प सत्ता स्वभाव भावद भुवन त्रयस्य |
सा विद्यया व्यक्तमपिहा माया ज्योतिः परा पातु जगंती नित्यं ||
दसमहाविद्या ओ मे भगवती मातंगी कि साधना अत्यंत सौभाग्यप्रद मानी जाती है,क्युकी यह केवल साधना ही नहीं अपितु सही अर्थो मे पुरे जीवन को आमूलचूल परिवर्तित कर देने कि ऐतिहासिक घटना है,इस साधना के बाद जीवन का कोई क्षेत्र अधूरा और शेष रहता ही नहीं है.ये बात किताबो मे आपको पढ़ने कि लिए मिल जायेगी परन्तु यह मेरी अनुभुतित साधना है,यह साधना संपन्न करने के बाद ही मुज़े हर क्षेत्र मे सफलता मिली है,
इस साधना के लाभ आज तक कभी पूर्ण स्पष्ट नहीं हो पाये ,क्युकी आप ज्यो भी इच्छा पूर्ती के लिए साधना करते है वह इच्छा पूर्ण हो जाती ही है,तो कैसे पता चलेगा कि इस साधना के कितने लाभ है.
मातंगी साधना कि सिद्धि पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास पर आधारित है,अन्यथा अभीष्ट सिद्धि कि संभावना नहीं बनेगी.
अक्षय तृतीया के दिन ''मातंगी जयंती'' होती है और आनेवाली वैशाख पूर्णिमा ''मातंगी सिद्धि दिवस'' होता है.इन १२ दिनों मे आप चाहे उतना मंत्र जाप कर सकते है,अगर येसी कोई साधना आप कर रहे है जिसमे सिद्धि नहीं मिल रही है या फिर सफलता नहीं मिल रही है,तो इन १२ दिनों मे आपकी मनचाही साधना मे सिद्धि प्राप्ति कि इच्छा कीजिये और मातंगी साधना संपन्न कीजिये.सफलता ही आपकी दासी बन जायेगी.
विनियोग :-
अस्य मंत्रस्य दक्षिणामूर्ति हृषीविराट छंद : मातंगी देवता ह्रीं बीजं हूं शक्तिः क्लीं कीलकं सर्वाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः |
ध्यान:-
श्यामांगी शशिशेखरां त्रिनयनां वेदैः करैविर्भ्रतीं ,
पाषं खेटमथामकुशं दृध्मसिं नाशाय भक्त द्विशाम |
रत्नालंकरण ह्रीं प्रभोज्ज्वलतनुं भास्वत्किरीटाम् शुभां ;
मातंगी मनसा स्मरामि सदयां सर्वार्थसिद्धि प्रदाम ||
मंत्र :-
|| ओम ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट स्वाहा ||
इस साधना मे माँ मातंगी का चित्र,यंत्र ,और लाल मूंगा माला का महत्व बताया गया है परन्तु सामग्री समय पे उपलब्ध ना हो तो किसी स्टील या ताम्बे कि प्लेट मे स्वास्तिक बनाये और उसपे एक सुपारी स्थापित कर दे और उसेही यंत्र माने,आपके पास मातंगी का चित्र ना हो तो आप '' माताजी ''को ही मातंगी स्वरुप मे पूजन करे,माताजी तो स्वयं ही '' जगदम्बा '' है,और माला कि विषय मे स्फटिक,लाल हकिक,रुद्राक्ष माला का उपयोग हो सकता है.साधना दिखने मे ही साधारण हो सकती है परन्तु बहुत तीव्र है,कम से कम ११ माला जाप आवश्यक है.और कोई १२५० मालाये कर ले तो सोने पे सुहागा,आज तक इस साधना मे किसी को असफलता नहीं मिली है,इतने अच्छे योग निर्मित हुये है इस साधना के लिए और क्या चाहिये.
राज गुरु जी
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अद्भुत शक्तियों के स्वामी हैं आप


मनाली के पास स्थित वशिष्ठ का मंदिर
खुद को पहचानें

विभिन्न प्रदेशों की यात्राओं के दौरान मैंने देखा है कि विभिन्न ऋषियों- वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि, परशुराम आदि के बाकायदा मंदिर हैं, जिनमें उनको भगवान मानकर पूजा की जाती है। इसी तरह ऋषि पत्नी रेणुका, राक्षसी हिडंबा, एक जमींदार की पत्नी बिहुला, राणी सती आदि की देवी के रूप में पूजा होती है। अपने-अपने क्षेत्र में इन सभी देवी-देवताओं पर भक्तों का अगाध विश्वास है। वे श्रद्धा भाव से पूजा करते हैं और उनकी मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। कई जगह तो उन देवी-देवताओं के आशीर्वाद के बिना कोई महत्वपूर्ण काम भी शुरू नहीं किया जाता है। मनाली में मान्यता है कि माता हिडंबा के दर्शन के बिना कोई शुभ काम सफल नहीं हो सकता। स्थानीय लोगों की यहां तक मान्यता है कि बाहर से आने वाले लोगों के लिए भी मनाली आने पर माता का आशीर्वाद लेना आवश्यक है। इसके बिना उनकी यात्रा अधूरी रहती है। इन घटनाओं को महज संयोग नहीं कहा जा सकता है। इन देवी-देवताओं के संतुष्ट और समर्पित भक्तों की बड़ी संख्या साबित करती हैं कि उनमें कुछ तो है। पहाड़ी क्षेत्रों एवं ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में ऐसे देवियां एवं ग्राम देवता मिल जाते हैं जो पहले मानव ही थे। उन्होंने त्याग, तपस्या और जनकल्याण की भावना के बल पर ही यह स्थिति हासिल की है। वैज्ञानिक रूप से विचार करें तो पाएंगे कि ब्रह्मांड की सारी शक्ति हममें (मानवों में) भी सन्निहित है।
भगवान का ही रूप है इंसान
एक इंसान ब्रह्मांड का ही लघु रूप है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि वह भगवान का लघु रूप है। अतः खुद को पहचान कर तथा ब्रह्मांड से जुड़ी शक्तियों को जगाकर एवं उसका संबंध ब्रह्मांड से कर हम भी कभी नष्ट न होने वाले शक्तिपूंज बन सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हम पूर्ण भगवान बन सकते हैं। शास्त्रों में भी वर्णन है कि इंसान तंत्र, मंत्र, योग, ध्यान आदि तरीके से आध्यात्मिक शक्तियों को जगाकर खुद को परमपिता परमेश्वर में मिला सकता है। जाहिर है कि इस तरह से वह भगवान बन सकता है। वैज्ञानिक नजरिये से देखें तो साबित हो गया है कि ब्रह्मांड की हर वस्तु को टुकड़ों में विभक्त करते जाएं तो वह अणु से परमाणु फिर इलेक्ट्रान-प्रोटान-न्यूट्रान और अंततः गॉड पार्टिकल में विभक्त हो जाता है। अर्थात ब्रह्मांड की हर जड़ व चेतन वस्तु गॉड पार्टिकल से ही बनी है। जड़ व चेतन में वस्तु के गुण-धर्म के अनुरूप गाड पार्टिकल सक्रिय या निष्क्रिय पड़ा रहता है। ब्रह्मांड में सिर्फ इंसान में वह ताकत है कि योग, मंत्र, ध्यान आदि से अपने अंदर निहित शक्तियों को अधिक सक्रिय कर ईश्वरीय तत्व को हासिल कर सकता है। देवी-देवता बने महामानव इसी श्रेणी में आते हैं। ग्राम देवता, पीर बाबा की मजार आदि को भी इस के छोटे रूप में माना जाना चाहिए।
कैसे करें शक्ति को जागृत
शिमला के पास स्थित माता रेणुका का मंदिर
यह प्रश्न है कि जब सबके शरीर में समान ताकत है तो सभी ईश्वर क्यों नहीं बन जाते हैं? उन्हें क्यों बार-बार मानवीय समस्याओं और बंधनों में जकड़ना पड़ता है? वास्तव में इसका जवाब बहुत सरल है। ईश्वरीय तत्व हम सबके शरीर में है तो, लेकिन बीज रूप में। उसे फलीभूत करने के लिए पहले उसे जगाना होगा। ईश्वरीय तत्व हम सबके शरीर में बीज रूप में है। उसे ईश्वर रूपी पौधा बनाने के लिए मानव रूपी शरीर के तत्वों को गलना होगा, नष्ट करना होगा। जैसे बीज को पौधा बनने में अपने अस्तित्व को मिटाना पड़ता है, उसी तरह इंसान रूपी बीज को ईश्वरीय तत्व रूपी पौधे में बदलने के लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार से मुक्त होना होता है। इसमें भी सबसे जरूरी है अहं की भावना को खत्म कर खुद को ईश्वरीय तत्व के रूप में बदलना। यह सारी प्रक्रिया मुख्य रूप से मानसिक ही है लेकिन चूंकि मानव के रूप में हमारी पहचान, ताकत या बंधन जो भी कहें, शरीर ही है, इसलिए शरीर को भी मानसिक यात्रा के साथ सहभागी बनाना होगा। इसके लिए ध्यान, योग, भक्ति, मंत्र आदि प्रमुख माध्यम हैं। इनके माध्यम से शरीर में सबसे पहले सोयी पड़ी शक्तियों को जगाकर मानसिक यात्रा के अनुरूप बनाना होता है। यह अलग और विस्तृत विषय है, अतः इस पर बाद के लेखों में विस्तार से चर्चा करूंगा।
सूक्ष्म शरीर की यात्रा
मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और निश्चय ही आपमें से भी कई ने अनुभव किया होगा कि किसी गंभीर संकट या समस्या उपस्थित होने पर आकस्मिक रूप से कोई अज्ञात शक्ति हमें उससे निकलने में मदद करती है। उसे हम संयोग मान लेते हैं लेकिन वास्तव में संयोग कुछ होता ही नहीं है। इस ब्रह्मांड में जहां अकारण पत्ता भी नहीं हिलता है, वहां कई बार इस तरह की घटनाएं अकारण कैसे हो जाएंगी, निश्चय ही इसके कारण हैं। यह कारण सूक्ष्म रूप में मौजूद सकारात्मक शक्तियां हैं जो कभी शरीर में थीं लेकिन आंतरिक शक्तियों को जगाकर ब्रह्मांड में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल हो गई हैं। वही शक्तियां अपने समान गुण-धर्म वाले लोगों पर नजर रखती हैं और उन्हें समय-असमय मदद करती हैं। अगर आप ध्यान दें तो कई बार उनकी उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं। इसके लिए आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि अपनी संवेदनशीलता बढ़ाएं और महसूस करने का लगातार अभ्यास करें।
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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आठवीं महाविद्या बगलामुखी









दस महाविद्या में बगलामुखी आठवीं मानी जाती हैं। इन्हें भगवान विष्णु की शक्ति भी कहा जाता है। शत्रु के संहार, दमन, स्तंभन आदि में इनका प्रयोग अचूक माना गया है। अच्छे साधक प्रकृति तक के क्रियाकलापों को स्तंभित कर लेते हैं, हालांकि यह सर्वथा अनुचित है। माता बगलामुखी ही ब्रह्मास्त्र शक्ति मानी जाती हैं। इनका ब्रह्मास्त्र स्तोत्र अत्यंत प्रभावी है। इनकी सामान्य पूजा भी अत्यंत कल्याणकारी मानी जाती है। नियमित दर्शन एवं पूजन से भी माता अपने भक्तों को निहाल करती रहती हैं। लेकिन ध्यान रहे कि विशेष पूजा में नियम का पालन अत्यंत सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। मैंने देखा है कि इनकी साधना या विशेष पूजन के दौरान थोड़ी सी भी चूक साधक पर उलटी पड़ती है और फायदे की जगह बड़ा नुकसान हो जाता है। अतः मेरा सुझाव है कि बगला के साधक को गणेश के वक्र तुंडाय हुम मंत्र का जप साधना काल के दौरान बीच-बीच में करते रहना चाहिए। हवन के समय भी उस मंत्र से आहूति देना श्रेयस्कर होता है। यदि यह ठीक न लगे तो वटुक भैरव के स्तोत्र का पाठ भी बेहद उपयोगी होता है।
यह तो हुई सांसारिक बातें और फायदे। आध्यात्मिक रूप से भी यह अत्यंत प्रभावी है। इनकी साधना मन की चंचलता को स्तंभित कर साधक को आध्यात्मिक रूप से विकास करने में बहुत प्रभावी होती है। खास बात यह भी है कि इनका प्रयोग शुचि-अशुचि में किया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि मन साफ हो। इनके मंत्रों का नियमित जप वाकसिद्धि देने वाला होता है। अतः इसके साधक को बोलते समय बहुत संयम रखना चाहिए। यदि खुद पर नियंत्रण न हो तो मेरा सुझाव है कि बगला की साधना कतई न करें। अन्यथा इसके दुरुपयोग के दोष के कारण भविष्य में कुफल भोगना होगा।
इनकी साधना करते समय पीले वस्त्र पहनना चाहिए। आसपास का स्थान भी पीला, आसान पीला तथा माला भी पीली होनी चाहिए। पूजन सामग्री फल-नैवेद्य भी पीले हों तो उत्तम। साधन काल में भोजन भी पीले रंग का ही करना चाहिए। शत्रु व राजकीय विवाद, मुकदमेबाजी आदि में यह महाविद्या शीघ्र फल देती हैं। मेरा अनुभव है कि यदि शत्रु ने आप पर पहले प्रयोग कर दिए हों तो साधना में बाधाएं आने लगती हैं। शत्रु का प्रयोग कड़ा हो तो कई बार अपनी साधना भी उलटी पड़ने लगती है। इसकी पहचान है कि मंत्र जप के समय बार-बार नियम टूटते हैं, जप में अधिक समय लगता है, मंत्रोच्चार के समय जिह्वा भारी तथा मंत्र के उच्चारण में परेशानी होने लगती है तथा मन उद्विग्न होने लगता है। ऐसे में विभिन्न विद्वानों ने रास्ता सुझाया है कि बगला के मंत्र का जप करते रहें, पर साथ में प्रत्यंगिरा, गायत्री, गणेश या तारा का मंत्र जप किया जाए तो बाधाएं दूर होने लगती है। मेरा अनुभव है कि बाधा आने पर बगलामुखी के मंदिर में जाकर जप करने से भी बाधाएं दूर हो जाती हैं और साधना सफल होती है।
एकाक्षरी मंत्र----- ह्लीं
विनियोग---------- एकाकी बगलामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छंदः, बगलामुखी देवता, लं बीजं, ह्रीं शक्तिः, ईं कीलकं, सर्वार्थ सिद्धयर्थें जपे विनियोगः। (बगलामुखी रहस्य में ह्रीं के बदले हूं शक्ति कहा गया है)
अंगन्यास---------- ह्लां, ह्लीं, ह्लूं, ह्रें, ह्लौं, हल्ः।
ध्यान-------------- रंकति क्षितfपतिः वैश्वानर शीतति, क्रोधी साम्यति दुर्जनः सुजनति क्षिप्रनुगः खंजति। गर्वि खर्वति सर्व विच्च जडति त्वद्यंत्रणा यंत्रितः, श्री नित्ये बगलामुखि प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नमः।
विधि--------------- विभिन्न पुस्तकों में इसके लिए विभिन्न जप विधान है लेकिन अधिकांश में एक लाख जप कर पीत पुष्पों से दशांश हवन तथा गुड़ोदक से उसका दशांश तर्पण करने का विधान है। मेरे विचार से किसी भी एकाक्षरी मंत्र का न्यूनतम दस लाख जप कर तदनुसार हवन एवं तर्पण करना सबसे अच्छा होता है। बगला का यह बीज मंत्र सर्वाधिक प्रभावशाली एवं कामधेनु के समान है। सिर्फ इस एक मंत्र से ही सब कुछ पाना संभव है। इसे सिद्ध करने के बाद इसका विभिन्न उपयोग किया जा सकता है। इससे माता की कृपा व शक्ति के साथ उन्हें जगाना भी संभव है। इस मंत्र का प्रभाव अक्षुण्ण रहता है। मंत्र में कोई कामना न होने के कारण इसमें चूक होने पर भी न्यूनतम खतरा है।
त्र्यक्षर मंत्र------- ऊं ह्लीं ऊं
चतुरक्षर मंत्र----- ऊं आं ह्लीं क्रों
विनियोग--------- इस मंत्र के बीज ह्लीं, शक्ति आं और कीलक क्रों हैं। शेष पूर्ववत है।
अंगन्यास-------- ऊं
ह्लां या ऊं ह्लीं से करें।
जप संख्या------ एक लाख
मुख्य व सर्वाधिक प्रचलित मंत्र----- ऊं ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ऊं स्वाहा।
विधि------------- विभिन्न ग्रंथों में इसे लेकर विभिन्न तरीके के मंत्र भेद, विधि में अंतर आदि हैं। यदि विशेषज्ञता चाहें तो उनका अवलोकन और योग्य गुरु के साथ उन पर चर्चा करना उचित होगा। सामान्य प्रयोग के लिए 21 हजार , 41 हजार, एक लाख, सवा लाख जप करना श्रेयस्कर होगा। मंत्र की संख्या के अनुपात में हवन व तर्पण कर अभीष्ट की प्राप्ति होती है। इसका प्रयोग कभी निष्फल नहीं होता है। कई बार ग्रहों के अत्यंत प्रतिकूल स्थिति के कारण फल की प्राप्ति में कमी या देरी हो सकती है लेकिन मिलता अवश्य है। पूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति न होने पर मंत्र जप की आवृत्ति बढ़ानी चाहिए।
सावधानी------- यह मंत्र अत्यंत फल देने वाला है लेकिन प्रयोग में चूक होने पर कई बार उलटा फल प्राप्त हो जाता है। चूंकि हमेशा योग्य पंडित या गुरु की देखरेख में साधना करना संभव नहीं है, अतः मेरा अनुभव है कि इससे बचने के लिए बगलामुखी के साथ गणेश के मंत्र का जप या वटुक भैरव स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए। हवन के दौरान भी उन्हें उनके मंत्रों से आहूतियां देना क्ल्याणकारी रहता है।
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...