Wednesday, February 22, 2017

बगुलामुखी कवच यन्त्र

आज के इस भागदौड़ के युग में श्री बगलामुखी यंत्र
की साधना अन्य किसी भी साधना से अधिक
उपयोगी है। यह एक परीक्षित और अनुभवसिद्ध
तथ्य है। इसे गले में पहनने के साथ-साथ पूजा घर में
भी रख सकते हैं।

इस यंत्र की पूजा पीले दाने, पीले
वस्त्र, पीले आसन पर बैठकर निम्न मंत्र को
प्रतिदिन जप करते हुए करनी चाहिए। अपनी
सफलता के लिए कोई भी व्यक्ति इस यंत्र का
उपयोग कर सकता है।

इसका वास्तविक रूप में
प्रयोग किया गया है। इसे अच्छी तरह से अनेक
लोगों पर उपयोग करके देखा गया है।

शास्त्रानुसार और वरिष्ठ सड़कों के अनुभव के
अनुसार जिस घर में यह महायंत्र स्थापित होता
है, उस घर पर कभी भी शत्रु या किसी भी
प्रकार की विपत्ति हावी नहीं हो सकती।

 न
उस घर के किसी सदस्य पर आक्रमण हो सकता है, न
ही उस परिवार में किसी की अकाल मृत्यु हो
सकती है। इसीलिए इसे महायंत्र की संज्ञा दी
गई है। इससे दृश्य/अदृश्य बाधाएं समाप्त होती
हैं। यह यंत्र अपनी पूर्ण प्रखरता से प्रभाव
दिखाता है।

 उसके शारीरिक और मानसिक
रोगों तथा ऋण, दरिद्रता आदि से उसे मुक्ति
मिल जाती है। वहीं उसकी पत्नी और पुत्र सही
मार्ग पर आकर उसकी सहायता करते हैं। उसके
विश्वासघाती मित्र और व्यापार में
साझीदार उसके अनुकूल हो जाते हैं।

शत्रुओं के शमन (चाहे बाहरी हो या घरेलू कलह ,
दरिद्रता या शराब / नशे व्यसन रूप में भीतरी
शत्रु ),रोजगार या व्यापार आदि में आनेवाली
बाधाओं से मुक्ति, मुकदमे में सफलता के लिए ,
टोने टोटकों के प्रभाव से बचाव आदि के लिए
किसी साधक के द्वारा सिद्ध मुहूर्त में
निर्मित, बगलामुखी तंत्र से अभिसिंचित तथा
प्राण प्रतिष्ठित श्री बगलामुखी यंत्र घर में
स्थापित करना चाहिए या कवच रूप में धारण
करना चाहिए।

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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मोबाइल नं. : - 09958417249

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Tuesday, February 21, 2017

श्वेतार्क गणेश साधना

हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को अनेक रूप में पूजा जाता है इनमें से ही एक श्वेतार्क गणपति भी हैं. धार्मिक लोक मान्यताओं में धन, सुख-सौभाग्य समृद्धि ऐश्वर्य और प्रसन्नता के लिए श्वेतार्क के गणेश की मूर्ति शुभ फल देने वाली मानी जाती है.

श्वेतार्क के गणेश आक के पौधे की जड़ में बनी प्राकृतिक बनावट रुप में प्राप्त होते हैं. इस पौधे की एक दुर्लभ जाति सफेद श्वेतार्क होती है जिसमें सफेद पत्ते और फूल पाए जाते हैं  इसी सफेद श्वेतरक की जड़ की बाहरी परत को कुछ दिनों तक पानी में भिगोने के बाद निकाला जाता है तब इस जड़ में भगवान गणेश की मूरत दिखाई देती है.

इसकी जड़ में सूंड जैसा आकार तो अक्सर देखा जा सकता है. भगवान श्री गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि के दाता माना जाता है. इसी प्रकार श्वेतार्क नामक जड़ श्री गणेश जी का रुप मानी जाती है. श्वेतार्क सौभाग्यदायक व प्रसिद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है.

श्वेतार्क की जड़ को तंत्र प्रयोग एवं सुख-समृद्धि हेतु बहुत उपयोगी मानी जाती है. गुरू पुष्य नक्षत्र में इस जड़ का उपयोग बहुत ही शुभ होता है. यह पौधा भगवान गणेश के स्वरुप होने के कारण धार्मिक आस्था को ओर गहरा करता है.

श्वेतार्क गणेश पूजन | Shwetark Ganesha Pujan

श्वेतार्क गणपति की प्रतिमा को पूर्व दिशा की तरफ ही स्थापित करना चाहिए तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह गणेश मंत्रों का जप करने से सर्वकामना सिद्ध होती है. श्वेतार्क गणेश पूजन में लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करनी चाहिए.  नेवैद्य में लड्डू अर्पित करने चाहिए.

"ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्"

मंत्र का जप करते हुए श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ श्वेतार्क की पूजा कि जानी चाहिए पूजा के प्रभावस्वरुप प्रत्यक्ष रूप से इसके शुभ फलों की प्राप्ति संभव हो पाती है.

तन्त्र शास्त्र में भी श्वेतार्क गणपति की पूजा का विशेष विधान बताया गया है. तन्त्र शास्त्र  अनुसार घर में इस प्रतिमा को स्थापित करने से ऋद्धि-सिद्धि  कि प्राप्ति होती है. इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से भक्त को धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मी जी का निवास होता है.

 इसके पूजन द्वारा शत्रु भय समाप्त हो जाता है. श्वेतार्क प्रतिमा के सामने नित्य गणपति जी का मन्त्र जाप करने से गणश जी  का आशिर्वाद प्राप्त होता है तथा उनकी कृपा बनी रहती है.

श्वेतार्क गणेश महत्व | Significance of Shwetark Ganesha

दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के साथ ही श्वेतार्क गणेश जी का पूजन व अथर्वशिर्ष का पाठ करने से बंधन दूर होते हैं और कार्यों में आई रुकावटें स्वत: ही दूर हो जाती हैं. धन की प्राप्ति हेतु श्वेतरक की प्रतिमा को दीपावली की रात्रि में षडोषोपचार पूजन करना चाहिए. श्वेतार्क गणेश साधना अनेकों प्रकार की जटिलतम साधनाओं में सर्वाधिक सरल एवं सुरक्षित साधना है .

श्वेतार्क गणपति समस्त प्रकार के विघ्नों के नाश के लिए सर्वपूजनीय है. श्वेतार्क गणपति की विधिवत स्थापना और पूजन से समस्त कार्य साधानाएं आदि शीघ्र निर्विघ्न संपन्न होते हैं. श्वेतार्क-गणेश के सम्मुख मन्त्र का प्रतिदिन 10 माला ‘जप’ करना चाहिए तथा

 "ॐ नमो हस्ति-मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट-महात्मने आं क्रों ह्रीं क्लीं ह्रीं हुं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा" साधना से सभी इष्ट-कार्य सिद्ध होते हैं.

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Monday, February 20, 2017



अप्सरा रम्भा साधना









जब भी अप्सरा का नाम लिया जाता है तो मन में एक आकर्षक, सुन्दर, मनमोहिनी, जवान और अद्वितीय स्त्री की छवि बन जाती है. एक ऐसी स्त्री जिसको देखकर लगता है कि उसे शक्ति और सुंदरता विरासत में मिली हुई है.


उसमें से ऐसी सुगंध आती है जो सबको उसकी तरफ खिंच लेती है और जिसे देखकर आँखे सिर्फ उसी पर टिकी रहती है. इनके लम्बे घने खुले बाल इनकी सुंदरता को और भी अधिक बढ़ाते है.


अप्सरायें अधिकतर चुस्त कपड़ों के साथ गहने पहनती है और इनकी चाल देखते ही बनती है. अप्सरायें इतनी खुबसूरत होती है कि बड़े बड़े ऋषि भी इनकी सुंदरता के जाल में फंस जाते है.



जितनी ये खुबसूरत होती है उतनी ही अधिक ये अपने साधक के प्रति समर्पित भी होती है. 16 – 17 साल की दिखने वाली ये युवतियाँ वैसे बहुत सरल और सीधी भी होती है और कभी भी अपने साधक के साथ धोखा नहीं करती.

किन्तु ऐसे अनेक साधक भी होते है जिनके मन में इन अप्सराओं को देखकर अपवित्रता जन्म ले लेती है और वे उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करते है, जोकि सरासर गलत है. इसका परिणाम भी बुरा हो सकता है क्योकि इनके पास असीम शक्तियाँ भी होती है.

 इसलिए आप किसी भी अप्सरा को देखकर मन को विचलित ना होने दें और अपनी काम भावना को नियंत्रित रखें. आज हम आपको एक ऐसी ही अप्सरा की साधना के बारे में बताने जा रहे है जो बहुत ही आकर्षक और कामुक है.



आकर्षक और कामुक है.

रम्भा अप्सरा साधना सामग्री

-   रम्भा यन्त्र

-   अप्सरा माला

-   गुलाब के फुल व अगरबत्ती

-   गुलाबी रंग का कपडा

-   दीपक

-   आसन, जिसपर पिला वस्त्र बिछा हो

-   लकड़ी की चौकी

-   अक्षत ( बिना टूटे चावल )

-   सौंदर्य गुटिका

-   साफल्य  मुद्रिका

-   इत्र

-   स्टील की प्लेट

-   मुद्रिका

-   2 फूलों की माला



सही दिन  : पूर्णिमा की रात्री या शुक्रवार का दिन

साधना समय  : इस साधना को 21 दिनों तक रात्री में ही करना है.

रम्भा अप्सरा साधना विधि


साधना आरम्भ करने से पहले आप नहा धोकर अच्छे कपडे पहन खुद को शुद्ध और पवित्र कर लें. उसके बाद आप पीले रंग के आसन पर बैठ जाएँ और पूर्व दिशा की तरफ मुंह करें.

 ध्यान रहें कि आप अपने पास फूलों की 2 मालायें अवश्य रखें और जब अप्सरा आयें तो एक उसे पहना दें, दूसरी को वो आपको पहनाएगी. आप अगरबत्तियां और 1 घी के दीपक जलाएं. अपने सामने खाली स्टील की प्लेट को रखना बिलकुल ना भूलें.

अब आप गुलाब की पंखुडियां लेते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़ें और “ ओ राम्भे आगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते ” मंत्र का जप करें. हर मंत्र के बाद आप कुछ पंखुड़ियों को स्टील की प्लेट में डालें. आपको कम से कम 108 बार इस मंत्र का जाप करना है. स्टील की थाली कुछ देर बाद पंखुड़ियों से भर जायेगी. आप उसपर अप्सरा माला रख दें.



इसके बाद आपको गुलाबी कपडे को बिछाकर उसपर सौंदर्य गुटिका, साफल्य मुद्रिका और राम्भोत्किलन यंत्र को स्थापित करना है. अब आप उनका पंचोपचार पूजन करें. आप सारी सामग्री पर इत्र छिड़कना बिलकुल ना भूलें. अब आप गुलाबी रंग के चावलों के साथ यन्त्र की पूजा करें और निम्नलिखित मन्त्रों का जाप करें.

ॐ दिव्यायै नमः | ॐ वागीश्चरायै नमः | ॐ सौंदर्या प्रियायै नमः |

ॐ योवन प्रियायै नमः | ॐ सौभाग्दायै नमः | ॐ आरोग्यप्रदायै नमः |

ॐ प्राणप्रियायै नमः | ॐ उर्जश्चलायै नमः | ॐ देवाप्रियायै नमः |

ॐ ऐश्वर्याप्रदायै नमः | ॐ धनदायै धनदा रम्भायै नमः |

आप हर मंत्र के जाप के बाद कुछ चावलों को यन्त्र पर अवश्य डालते जाएँ. इसके बाद आपको 15 अप्सरा माला तक इस मंत्र को जपना है.

“ ॐ ह्रीं रं रम्भे आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांधितं देहि एं ॐ स्वाहा “

इस तरह आपकी अप्सरा साधना पूर्ण होती है.

रम्भा अप्सरा साधना लाभ



·     जो व्यक्ति रम्भा अप्सरा साधना करता है उसे बहुत सौभाग्यशाली माना जाता है क्योकि इसको करने वाले को हर तरह का सुख शांति और मिलती है.

·     उसे हर क्षेत्र में सफलता मिलती है और वो शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत हो जाता है.

·     इस साधना को पूर्ण कर लेने वाले व्यक्ति के साथ रम्भा पूरी जिंदगी उस व्यक्ति के साथ रहती है और हर कदम पर उसका साथ देती है.

·     जिस तरह रम्भा सबको अपनी तरफ आकर्षित करने की शक्ति रखती है ठीक उसी तरह साधक में भी आकर्षक और सम्मोहन शक्ति आ जाती है.

·     साधक में कभी भी बुढापा नहीं आता और बीमारियाँ तो कोशों दूर चली जाती है. इस तरह साधक के जीवन में प्यार और खुशियाँ भर जाती है.



सावधानियाँ


 वैसे अप्सरायें शीघ्रता से अपनी साधना से को पूरा भी नहीं होने देती और आपके ध्यान को भाग करने की कोशिश करती रहती है. कई बार तो आपको आपकी साधना पूर्ण होने से पहले ही अप्सरा दिखने लगती है किन्तु उस स्थिति में आप अपनी साधना को बिलकुल भी ना रोके और मन्त्रों और जप के पूर्ण होने के बाद ही उनके पास जाएँ.

§ साधना के दौरान और अप्सरा को देखने के बाद अपनी काम इच्छाओं पर काबू रखें और उसके प्रति समर्पित रहें.

§ साधना के दौरान जो भी घटित होता है उसे आप अपने तक ही सिमित रखें.

§ जब साधना खत्म हो जाएँ तो आप एक मुद्रिका को अपनी अनामिका वाली उंगली में धारण करें. साथ ही बाकी के सामान को आप किसी बहते पानी अर्थात नदी में प्रवाहित कर दें.

तो आप भी रम्भा अप्सरा साधना कर अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हो, साथ ही किसी भी अन्य सहायता के लिए




राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Monday, February 13, 2017

महाकाली सबंधित पूर्ण काल ज्ञान के लिए

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निकटत्तम भविष्य को जानने के लिए एक सामान्य विधान इस रूप से है जो की व्यक्ति को भविष्य के ज़रोखे मे जांक कर देखने के लिए शक्ति प्रदान करता है

किसीभी शुभदिन से यह साधना शुरू की जा सकती है । इसमें महाकाली का विग्रह या चित्र अपने सामने स्थापित करे और रात्री काल मे उसका सामान्य पूजन कर के निम्न मंत्र की २१ माला २१ दिन तक करे । यानि रोज 21 माला प्रतिदिन जाप करना हे ।

मंत्र :-

काली कंकाली प्रत्यक्ष क्रीं क्रीं क्रीं हूं

साधना काल मे लोहबान का धुप व् घी का दीपक जलते रहना चाहिए ।

यह जाप रुद्राक्ष या काली हकीक माला से किया जा सकता है ।

साधना के कुछ दिनों मे साधको को कई मधुर अनुभव हो सकते है.

राजगुरु जी

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श्मशान काली सिद्धि दिवस

श्मशान काली सिद्धि को सभी वर्ग के साधक अत्यंत श्रेष्ठ मुहूर्त मानते है,येसे पावन पर्व पे अगर श्मशान काली साधना किया जाये तो यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात होगी.........

इसी दिवस पर श्रेष्ठ साधक सुरक्षा कवच का निर्माण करते है जो उन्हे वर्ष तक सहाय्यक होता है,परंतु आज हम बात करेगे श्मशान काली जी का जिनका रूप अत्यंत भव्य है जिसका कोई स्तुति नहीं कर सकता है,परम पूजनीय आदिगुरु शंकराचार्य जी ने श्मशान काली जी की स्तुति पूर्ण चैतन्ययुक्त शब्दो मे कियी है जिसका नाम है “काली श्मशानालयवासिनीम स्तोत्र”मे किया है,इस स्तोत्र का पाठ करने से माँ भक्तो को जहा दर्शन देती है वही सभी समस्याओ से मुक्त भी करती है............

मेरा नम्र निवेदन है आपसे इस स्तोत्र को आप प्राप्त कीजिये और कम से कम रोज एक पाठ इस दिवस से शुरू करते हुये एक वर्ष तक कीजिये तो आपको तंत्र शक्ति प्राप्त होगा जिसके माध्यम से आप गुरुकार्य कर सकते हो और अपना साधनात्मक कद भी आगे बढ़ा सकते हो...........

इसी विषय को समजते हुये तंत्र के महान साधकोने श्मशान काली साधना करके अपने जीवन को बाधामुक्त,भयमुक्त एवं दोषमुक्त बनाया जिसके बाद उन्हे प्रत्येक साधना मे निच्छित सफलता मिला,यह कोई आम बात नहीं येसे तांत्रिको को हमे सदैव धन्यवाद करना चाहिये जिन्होने श्मशान तंत्र को भी जीवित रखा नहीं तो आज हम लोग येसे मंत्र प्राप्त नहीं कर पाते॰

आज यहा मै सौम्य श्मशान काली साधना दे रहा जिसके माध्यम से बहोत सारे भौतिक और आध्यात्मिक सफलताये प्राप्त होती है,इस साधना से हर समस्या का समाधान प्राप्त होता है इसीलिये मुजे लगता है के ज्यादा कुछ लिखने का आवश्यकता नहीं है...........

विनियोग:-

        अस्य श्मशानकाली मंत्रस्य भृगुऋषी: । त्रिवृच्छन्द: । श्मशानकाली देवता । ऐं बीजम । ह्रीं शक्ति: । क्लीं किलकम । मम सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोग: ।

ध्यान:-

                   अन्जनाद्रिनिभां देवी श्मशानालय वासीनीं ।
                   रक्तनेत्रां मुक्तकेशीं शुष्कमांसातिभैरवां ॥
                   पिंगलाक्षीं वामहस्तेन मद्दपूर्णा समांसकाम ।
                   सद्द: कृ तं शिरो दक्ष हस्तेनदधतीं शिवाम ॥
                   स्मितवक्त्रां सदा चाम मांसचर्वणतत्पराम ।
                   नानालंकार भूशांगीनग्नाम मत्तां सदा शवै: ॥
  
 माँ को हृदय मे स्थापित करना है इसलिये यहा सिर्फ हृदयादि षडंगन्यास दे रहा हु

 हृदयादि षडंगन्यास:-

                      ऐं हृदयाय नम: ।
                      ह्रीं शिरसे स्वाहा: ।
                      श्रीं शिखायै वषट ।
                      क्लीं कवचाय हुं ।
                      कालिके नेत्रत्रयाय वौषट ।
                      ऐं श्रीं क्लीं कालिके ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं अस्त्राय फट ।
                             इति हृदयादि षडंगन्यास: ॥

मंत्र:-

          ॥ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॥
Aim hreem shreem  kleem kaalike kleem shreem  hreem aim

यह साधना 3 दिन का है और इसमे रुद्राक्ष माला से 11 माला मंत्र जाप करना आवश्यक है,तीसरे दिन साधना समाप्ती के बाद हवन मे काले तिल से 374 बार मंत्र मे स्वाहा लगाकर आहूती दीजिये मंत्र इस प्रकार होगा 

“ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं स्वाहा”,

आहुती के बाद नींबू का बलि देना है और नींबू का थोड़ा सा रस हवनकुंड मे निचौड दीजिये,समय रात्री मे 10 बजे के बाद,दिशा दक्षिण,आसन-वस्त्र लाल/काले,भोग मे तिल और गुड के लड्डू जो मार्केट मे आसानी से मिलते है परंतु प्रयत्न कीजिये घर पर लड्डू बनाने का,महाकाली जी के चित्र पर रोज लाल रंग का पुष्प चढ़ाना मत भूलीयेगा॰

यह साधना विधि पूर्ण प्रामाणिक है और शीघ्र फलदायी भी है...............इस साधना का असर साधक को एक वर्ष तक प्राप्त होता रहता है...........

राजगुरु जी

महाविद्या आश्रम

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Sunday, February 12, 2017

अप्सरा साधना के नियम

यदि किसी भाई या बहन को साधना में यकीन ना हो तो यह साधनाए मत करें। यह साधना तो केवल साधक जगत के लोगों के लिए हैं ना कि किसी को यकीन दिलाने के लिए। साधक इन सब साधनाओं के बारे मे पहले से ही जानते हैं।

 बिना किसी के मार्गदर्शन मे साधना करने से समय ज्यादा लगता है इसलिए अच्छा यही है कि अपने गुरु की सहायता और आज्ञा प्राप्त करने के बाद ही इस प्रकार की साधना करें तो अधिक उपयुक्त रहेगा। जिन लोगों को इस प्रकार की साधना मे यकीन ना हो वो सब इनको कहानीयाँ समझ कर भुल जायें ऐसी हमारी प्रार्थना हैं।

The name of many Nymphs or Apsara are: Ambika, Alamvusha, Anavdaya, Anuchana, Aruna, Asita, Budbudha, Chandra Jyotsna, Devi, Ghartchi, Gunmukya, Gunuvra-Herrsha, Indar-lakshmi, Kamya, Karnika, Keshini, Kshaema Lata, Lakshmna, Manorama, Maarichi, Maneka, Misrasthlah, Mrigakshi, Nabhidarshana, Puarv-chitti, Pushpdeha, Rakshaita, Rambha, Rituashalah, Sahjanya, Samichi, Sor-Bhedi, Saradvti, Shuchika, Somi, Shuvahu, Shugandha, Supriya, Surza, Surasa, Surata (Riti Priya), Tialottama, Umalocha, Urvashi, Wpu, Waraga, Vidyutparna, Vihaachi.

अप्सराये अत्यंत सुंदर और जवान होती हैं. उनको सुंदरता और शक्ति विरासत में मिली है. वह गुलाब का इत्र और चमेली आदि की गंध पसंद करती हैं। तुमको उसके शरीर से बहुत प्रकार की खुशबू आती महसूस कर सकते हैं. यह गन्ध किसी भी पुरुष को आकर्षित कर सकती हैं।

वह चुस्त कपड़े पहनना के साथ साथ अधिक गहने पहना पसंद करती है. इनके खुले-लंबे बाल होते है। वह हमेशा एक 16-17 साल की लड़की की तरह दिखती है। दरअसल, वह बहुत ही सीधी होती है। वह हमेशा उसके साधक को समर्पित रहती है। वह साधक को कभी धोखा नहीं देती हैं। इस साधना के दौरान अनुभव हो सकता है, कि वह साधना पूरी होने से पहले दिखाई दे। अगर ऐसा होता है, तो अनदेखा कर दें।

आपको अपने मंत्र जाप पूरा करना चाहिए जैसा कि आप इसे नियमित रूप से करते थे। कोई जल्दबाजी ना करे जितने दिन की साधना बताई हैं उतने दिन पुरी करनी चाहिए। काम भाव पर नियंत्रण रखे। वासना का साधना मे कोई स्थान नहीं होता हैं।

 अप्सरा परीक्षण भी ले सकती हैं। जब सुंदर अप्सरा आती है तो साधक सोचता है, कि मेरी साधना पूर्ण हो गया है। लेकिन जब तक वो विवश ना हो जाये तब तक साधना जारी रखनी चाहिए।

केई साधक इस मोड़ पर, अप्सरा के साथ यौन कल्पना लग जाते है। यौन भावनाओं से बचें, यह साधना ख़राब करती हैं। जब संकल्प के अनुसार मंत्र जाप समाप्त हो और वो आपसे अनुरोध करें तो आप उसे गुलाब के फूल और कुछ इत्र दे।

उसे दूध का बनी मिठाई पान आदि भेंट दे। उससे वचन ले ले की वह जीवन-भर आपके वश में रहेगी। वो कभी आपको छोड़ कर नहीं जाएगी और आपक कहा मानेगी। जब तक कोई वचन न दे तब तक उस पर विश्वास नही किया जा सकता क्योंकि वचन देने से पहले तक वो स्वयं ही चाहती हैं कि साधक की साधना भंग हो जाये।

किसी भी साधना मैं सबसे महत्वपुर्ण भाग उसके नियम हैं. सामान्यता सभी साधना में एक जैसे नियम होते हैं. परतुं मैं यहाँ पर विशेष तौर पर यक्षिणी और अप्सरा साधना में प्रयोग होने वाले नियम का उल्लेख कर रहा हूँ ।

अप्सरा या यक्षिणी साधना में ऊपर जो अण्डरलाइन और हरे रंग से लिखे गये नियम ही प्रयोग में आने वाले नियम हैं ।

1. ब्रह्मचये : सभी साधना मैं ब्रह्मचरी रहना परम जरुरी होता हैं. सेक्स के बारे में सोचना, करना, किसी स्त्री के बारे में विचारना, सम्भोग, मन की अपवित्रा, गन्दे चित्र देखना आदि सब मना हैं, अगर कुछ विचारना हैं तो केवल अपने ईष्ट को, आप सदैव यह सोचे कि वो सुन्दर सी अलंकार युक्त अप्सरा या देवी आपके पास ही मौजुद हैं और आपको देख रही हैं. और उसके शरीर में से ग़ुलाब जैसी या अष्टगन्ध की खुशबू आ रही हैं । साकार रुप मैं उसकी कल्पना करते रहो.

2. भूमि शयन : केवल जमीन पर ही अपने सभी काम करें. जमीन पर एक वस्त्र बिछा सकते हैं और बिछना भी चाहिए

3. भोजन : मांस, शराब, अन्डा, नशे, तम्बाकू, लहसुन, प्याज आदि सभी का प्रयोग मना हैं. केवल सात्विक भोजन ही करें.

4. वस्त्र : वस्त्रो में उन्ही रंग का चुनाव करें जो देवता पसन्द करता हो.( आसन, पहनने और देवता को देने के लिये) (सफेद या पीला अप्सरा के लिये)
5. क्या करना हैं :- नित्य स्नान, नित्य गुरु सेवा, मौन, नित्य दान, जप में ध्यान- विश्वास, रोज पुजा करना आदि अनिवार्य हैं. और जप से कम से कम दो-तीन घंटे पहले भोजन करना चाहिए

6. क्या ना करें :- जप का समय ना बद्ले, क्रोध मत करो, अपना आसन किसी को प्रयोग मत करने दो, खाना खाते समय और सोकर जागते समय जप ना करें. बासी खाना ना खाये, चमडे का प्रयोग ना करना, साधना के अनुभव साधना के दोरान किसी को मत बताना (गुरु को छोडकर)

7. मंत्र जप के समय कृपा करके नींद्, आलस्य, उबासी, छींक, थूकना, डरना, लिंग को हाथ लगाना, बक्वास, सेल फोन को पास रखना, जप को पहले दिन निधारित संख्या से कम-ज्यादा जपना, गा-गा कर जपना, धीमे-धीमे जपना, बहुत् तेज-तेज जपना, सिर हिलाते रहना, स्वयं हिलते रहना, मंत्र को भुल जाना( पहले से याद नहीं किया तो भुल जाना ), हाथ-पैंर फैलाकर जप करना, पिछ्ले दिन के गन्दे वस्त्र पहनकर मंत्र जप करना, यह सब कार्य मना हैं (हर मंत्र की एक मुल ध्वनि होती हैं अगर मुल ध्वनि- लय में मंत्र जपा तो मज़ा ही जायेगा, मंत्र सिद्धि बहुत जल्द प्राप्त हो सकती हैं जो केवल गुरु से सिखी जा सकती हैं )

8. यादि आपको सिद्धि करनी हैं तो श्री शिव शंकर भगवान के कथन को कभी ना भुलना कि “जिस साधक की जिव्हा परान्न (दुसरे का भोजन) से जल गयी हो, जिसका मन में परस्त्री (अपनी पत्नि के अलावा कोई भी) हो और जिसे किसी से प्रतिशोध लेना हो उसे भला केसै सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं”

9. और एक सबसे महत्वपुर्ण कि आप जिस अप्सरा की साधना उसके बारे में यह ना सोचे कि वो आयेगी और आपसे सेक्स करेंगी क्योंकि वासना का किसी भी साधना में कोई स्थान नहीं हैं । बाद कि बातें बाद पर छोड दे । क्योंकि सेक्स में उर्जा नीचे (मुलाधार) की ओर चलती हैं जबकि साधना में उर्जा ऊपर (सहस्त्रार) की ओर चलती हैं

10. किसी भी स्त्री वर्ग से केवल माँ, बहन, प्रेमिका और पत्नी का सम्बन्ध हो सकता हैं । यही सम्बन्ध साधक का अप्सरा या देवी से होता हैं।

11.यह सब वाक सिद्ध होती हैं । किसी के नसिब में अगर कोई चीज़ ना हो तब भी देने का समर्थ रखती हैं । इनसे सदैव आदर से बात करनी चाहिए।
अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच:

इस कवच को यक्षिणी पुजा से पहले 1,5 या 7 बार जप किया जाना चाहिए। इस कवच के जप से किसी भी प्रकार की सुन्दरी साधना में विपरीत परिणाम प्राप्त नहीं होते और साधना में जल्द ही सिद्धि प्राप्त होती हैं। हम आशा करते हैं कि जब भी आप कोई भी यक्षिणी साधना करोगें तो इस कवच का जप अवश्य करोगें।

इस कवच के जप से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली यक्षिणी साधक के नियंत्रण मे आ जाती हैं और साधक के सभी मनोरथो को पूर्ण करती हैं। यक्षिणी साधना से जुडा यह कवच अपने आप मे दुर्लभ हैं। इस कवच के जपने से यक्षिणीयों का वशीकरण होता हैं। तो क्या सोच रहे हैं आप……………………

।। श्री उन्मत्त-भैरव उवाच ।।

श्रृणु कल्याणि ! मद्-वाक्यं, कवचं देव-दुर्लभं। यक्षिणी-नायिकानां तु, संक्षेपात् सिद्धि-दायकं ।।
ज्ञान-मात्रेण देवशि ! सिद्धिमाप्नोति निश्चितं। यक्षिणि स्वयमायाति, कवच-ज्ञान-मात्रतः ।।
सर्वत्र दुर्लभं देवि ! डामरेषु प्रकाशितं। पठनात् धारणान्मर्त्यो, यक्षिणी-वशमानयेत् ।।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीयक्षिणी-कवचस्य श्री गर्ग ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्री अमुकी यक्षिणी देवता, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगः।
ऋष्यादिन्यासः- श्रीगर्ग ऋषये नमः शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः मुखे, श्री रतिप्रिया यक्षिणी देवतायै नमः हृदि, साक्षात् सिद्धि-समृद्धयर्थे पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

।। मूल पाठ ।।

शिरो मे यक्षिणी पातु, ललाटं यक्ष-कन्यका।
मुखं श्री धनदा पातु, कर्णौ मे कुल-नायिका ।।
चक्षुषी वरदा पातु, नासिकां भक्त-वत्सला।
केशाग्रं पिंगला पातु, धनदा श्रीमहेश्वरी ।।
स्कन्धौ कुलालपा पातु, गलं मे कमलानना।
किरातिनी सदा पातु, भुज-युग्मं जटेश्वरी ।।
विकृतास्या सदा पातु, महा-वज्र-प्रिया मम।
अस्त्र-हस्ता पातु नित्यं, पृष्ठमुदर-देशकम् ।।
भेरुण्डा माकरी देवी, हृदयं पातु सर्वदा।
अलंकारान्विता पातु, नितम्ब-स्थलं दया ।।
धार्मिका गुह्यदेशं मे, पाद-युग्मं सुरांगना।
शून्यागारे सदा पातु, मन्त्र-माता-स्वरुपिणी ।।
निष्कलंका सदा पातु, चाम्बुवत्यखिलं तनुं।
प्रान्तरे धनदा पातु, निज-बीज-प्रकाशिनी ।।
लक्ष्मी-बीजात्मिका पातु, खड्ग-हस्ता श्मशानके।
शून्यागारे नदी-तीरे, महा-यक्षेश-कन्यका।।
पातु मां वरदाख्या मे, सर्वांगं पातु मोहिनी।
महा-संकट-मध्ये तु, संग्रामे रिपु-सञ्चये ।।
क्रोध-रुपा सदा पातु, महा-देव निषेविका।
सर्वत्र सर्वदा पातु, भवानी कुल-दायिका ।।
इत्येतत् कवचं देवि ! महा-यक्षिणी-प्रीतिवं।
अस्यापि स्मरणादेव, राजत्वं लभतेऽचिरात्।।
पञ्च-वर्ष-सहस्राणि, स्थिरो भवति भू-तले।
वेद-ज्ञानी सर्व-शास्त्र-वेत्ता भवति निश्चितम्।
अरण्ये सिद्धिमाप्नोति, महा-कवच-पाठतः।
यक्षिणी कुल-विद्या च, समायाति सु-सिद्धदा।।
अणिमा-लघिमा-प्राप्तिः सुख-सिद्धि-फलं लभेत्।
पठित्वा धारयित्वा च, निर्जनेऽरण्यमन्तरे।।
स्थित्वा जपेल्लक्ष-मन्त्र मिष्ट-सिद्धिं लभेन्निशि।
भार्या भवति सा देवी, महा-कवच-पाठतः।।
ग्रहणादेव सिद्धिः स्यान्, नात्र कार्या विचारणा ।।

नोटः-

शुद्ध उच्चारण के साथ किसी साधक के मार्गदर्शन में इन मंत्रों का प्रयोग करना ही लाभकर होगा।यदि किसी भी प्रकार की दिक्कते हो,तो मुझसे सम्पर्क कर सकते है।

आप सभी को मेरी शुभकामनाएं साधना करें साधनामय बनें......

राजगुरु जी

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Saturday, February 11, 2017

कर्ण मातंगी साधना









जिज्ञासु पाठक श्री विनोद शर्मा जी के अनुरोध पर कर्ण मातंगी के बारे में संक्षिप्त जानकारी दे रहा हूं। यह मूलतः जल्दी फल देने वाली साधना से ज्यादा एक प्रयोग विधि है। इसके साधक को माता भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी स्वप्न में दे देती हैं।

निष्कम भाव से साधना करने वालों पर माता अपनी विशेष कृपा बरसाती हैं लेकिन चूंकि फल आसानी से मिल जाता है, अतः साधक का निष्काम रह पाना बेहद कठिन होता है।

 फल आधारित साधना होने के कारण इसका असर भी जल्दी खत्म होने लगता है। अतः साधक को प्रयोग की अधिकता/कमी के आधार पर हर तीन या छह माह पर इसका पुनः जप कर लेना चाहिए। इनके कई मंत्र हैं लेकिन यहां अनुभव किए हुए सिर्फ दो मंत्रों का ही उल्लेख कर रहा हूं।

कर्ण मातंगी मंत्र

ऐं नमः श्री मातंगि अमोघे सत्यवादिनि मककर्णे अवतर अवतर सत्यं कथय एह्येहि श्री मातंग्यै नमः।

या

ऊं नमः कर्ण पिशाचिनी अमोघ सत्यवादिनी मम कर्णे अवतर अवतर अतीत अनागत वर्तमानानि दर्शय दर्शय मम भविष्यं कथय कथय ह्रीं कर्ण पिशाचिनी स्वाहा।

ऐं बीज से षडंगन्यास करें। पुरश्चरण के लिए आठ हजार की संख्या में जप करें। कई बार प्रतिकूल ग्रह स्थिति रहने पर जप संख्या थोड़ी बढ़ानी भी पड़ती है।

 जप के दौरान शारीरिक पवित्रता की जरूरत नहीं है लेकिन मानसिक रूप से पवित्र होना आवश्यक है। इसमें हवन भी आवश्यक नहीं है। हालांकि उच्छिष्ट वस्तु (खीर के प्रसाद से) या मांस-मछली को प्रसाद के रूप में माता को ही चढ़ाकर उससे हवन करना अतिरिक्त ताकत देता है।

 इसके साधक को माता कर्ण मातंगी भविष्य में घटने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं की जानकारी स्वप्न में देती हैं। इच्छुक साधक को माता से प्रश्न का जवाब भी मिल जाता है। भक्तिपूर्वक एवं निष्काम साधना करने पर माता साधक का पथप्रदर्शन करती हैं।



राजगुरु जी

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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...