Friday, February 12, 2016

कर्ण मातंगी साधना






जिज्ञासु पाठक श्री विनोद शर्मा जी के अनुरोध पर कर्ण मातंगी के बारे में संक्षिप्त जानकारी दे रहा हूं। यह मूलतः जल्दी फल देने वाली साधना से ज्यादा एक प्रयोग विधि है। इसके साधक को माता भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी स्वप्न में दे देती हैं। निष्कम भाव से साधना करने वालों पर माता अपनी विशेष कृपा बरसाती हैं लेकिन चूंकि फल आसानी से मिल जाता है, अतः साधक का निष्काम रह पाना बेहद कठिन होता है। फल आधारित साधना होने के कारण इसका असर भी जल्दी खत्म होने लगता है। अतः साधक को प्रयोग की अधिकता/कमी के आधार पर हर तीन या छह माह पर इसका पुनः जप कर लेना चाहिए। इनके कई मंत्र हैं लेकिन यहां अनुभव किए हुए सिर्फ दो मंत्रों का ही उल्लेख कर रहा हूं।
कर्ण मातंगी मंत्र
ऐं नमः श्री मातंगि अमोघे सत्यवादिनि मककर्णे अवतर अवतर सत्यं कथय एह्येहि श्री मातंग्यै नमः।
या
ऊं नमः कर्ण पिशाचिनी अमोघ सत्यवादिनी मम कर्णे अवतर अवतर अतीत अनागत वर्तमानानि दर्शय दर्शय मम भविष्यं कथय कथय ह्रीं कर्ण पिशाचिनी स्वाहा।
ऐं बीज से षडंगन्यास करें। पुरश्चरण के लिए आठ हजार की संख्या में जप करें। कई बार प्रतिकूल ग्रह स्थिति रहने पर जप संख्या थोड़ी बढ़ानी भी पड़ती है। जप के दौरान शारीरिक पवित्रता की जरूरत नहीं है लेकिन मानसिक रूप से पवित्र होना आवश्यक है। इसमें हवन भी आवश्यक नहीं है। हालांकि उच्छिष्ट वस्तु (खीर के प्रसाद से) या मांस-मछली को प्रसाद के रूप में माता को ही चढ़ाकर उससे हवन करना अतिरिक्त ताकत देता है। इसके साधक को माता कर्ण मातंगी भविष्य में घटने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं की जानकारी स्वप्न में देती हैं। इच्छुक साधक को माता से प्रश्न का जवाब भी मिल जाता है। भक्तिपूर्वक एवं निष्काम साधना करने पर माता साधक का पथप्रदर्शन करती हैं।
राजगुरु जी
महाविद्या आश्रम
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Thursday, February 11, 2016

एकाक्षी नारियल








तंत्र में अतिप्रचलित कुछ वस्तुएं
वैसे इसके बारे में कुछ अधिक कहने की जरुरत नहीं है आप लोग स्वयं ही जानते हैं । एकाक्षी नारियल माता महालक्ष्मी का साक्षात् स्वरुप और अष्टलक्ष्मी का फल देने वाला माना जाता है। इसे पुराने ज़माने का एटीएम कहना गलत नहीं होगा।
विधिवत सिद्ध किया गया एकाक्षी नारियल घर या दुकान की तिजोरी, मंदिर या रसोई घर में रखने से अन्न धन के भंडार भरे रहते हैं।
भूत प्रेत वायव्य बाधाओं से पीड़ित घर या भवन में एकक्षि नारियल से अभिमंत्रित जल का छिडकाव करने से इनसे मुक्ति मिलती है।
संतानहीन स्त्री को पिलाने से संतान प्राप्ति होती है और गर्भवती को पिलाने से सुचारू प्रसव होता है।
नियमित पूजन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मित्र साधको को एकाक्षी नारियल की अवशक्त हो तो उन्हें सिद्ध करके डाक के जरिये भेज दिया जायेगा
एक एकाक्षी नारियल का न्यौछावर राशि ( मूल्य ) मात्र - 500 , रूपये . प्राण प्रतिष्ठा , मंत्र सिद्धि चैतन्य युक्त
राजगुरु जी
महाविद्या आश्रम
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हकिक माला




हकिक की मालाये
लाल हकिक की माला
सफ़ेद हकिक की माला
स्फटिक की माला
मित्र साधको को इनमे से कोई भी माला की अवशक्त हो तो उन्हें सिद्ध करके डाक के जरिये भेज दिया जायेगा
प्रत्येक एक पीस माला का न्यौछावर राशि ( मूल्य ) मात्र - 600 , रूपये . प्राण प्रतिष्ठा , मंत्र सिद्धि चैतन्य युक्त
राजगुरु जी
महाविद्या आश्रम
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तिलोत्तमा अप्सरा







तिलोत्तमा अप्सरा की गिनती भी श्रेष्ठ अप्सराओं मे होती हैं। यह अप्सरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो ही रुप मे साधक की सहायता करती रहती हैं। यह साधना अनुभुत हैं। इस साधना को करने से सभी सुखो की प्राप्ति होती हैं। इस साधना को शुरु करते ही एक – दो दिन में धीमी धीमी खुशबू का प्रवाह होने लगता हैं। यह खुशबू तिलोत्तमा के सामने होने की पूर्व सुचना हैं। अप्सरा का प्रत्यक्षीकरण एक श्रमसाध्य कार्य हैं। मेहनत बहुत ही जरुरी हैं। एक बार अप्सरा के प्रत्यक्षीकरण के बाद कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता, इसमे कोई दोराय नहीं हैं। यह प्रक्रिया आपकी सेवा में प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ। सामान्यतः अप्सरा साधना भी गोपनीयता की श्रेष्णी में आती हैं। सभी को इस प्रकार की साधना जीवन मे एक बार सिद्ध करने की पुरी कोशिश करनी चाहिए क्योंकि कलियुग में जो भी कुछ चाहिए वो सब इस प्रकार की साधना से सहज ही प्राप्त किया जा सकता हैं। इन साधनाओं की अच्छी बात यह हैं कि इन साधनाओं को साधारण व्यक्ति भी कर सकता हैं मतलब उसको को पंडित तांत्रिक बनाने की कोई अवश्यकता नहीं हैं।
साधक स्नान कर ले अगर नही भी कर सको तो हाथ-मुहँ अच्छी तरह धौकर, धुले वस्त्र पहनकर, रात मे ठीक 10 बजे के बाद साधना शुरु करें। रोज़ दिन मे एक बार स्नान करना जरुरी है। मंत्र जाप मे कम्बल का आसन रखे और अप्सरा और स्त्री के प्रति सम्मान आदर होना चाहिए। अप्सरा , गुरु, धार्मिक ग्रंथो और विधि मे पुर्ण विश्वास होना चाहिए, नहीं तो सफलत होना मुश्किल हैं। अविश्वास का साधना मे कोई स्थान नही है। साधना का समय एक ही रखने की कोशिश करनी चाहिए।
एक स्टील की प्लेट मे सारी सामग्री रख ले। साधना करते समय और मंत्र जप करते समय जमीन को स्पर्श नही करते। माला को लाल या किसी अन्य रंग के कपडे से ढककर ही मंत्र जप करे या गौमुखी खरीदे ले। मंत्र जप को अगुँठा और माध्यमा से ही करे । मंत्र जपते समय माला मे जो अलग से एक दान लगा होता हैं उसको लांघना नहीं है मतलब जम्प नहीं करना हैं। जब दुसरी माला शुरु हो तो माला के आखिए दाने/मनके को पहला दान मानकर जप करें, इसके लिए आपको माला को अंत मे पलटना होगा। इस क्रिया का बैठकर पहले से अभ्यास कर लें।
पूजा सामग्री:- सिन्दुर, चावल, गुलाब पुष्प, चौकी, नैवैध, पीला आसन, धोती या कुर्ता पेजामा, इत्र, जल पात्र मे जल, चम्मच, एक स्टील की थाली, मोली/कलावा, अगरबत्ती,एक साफ कपडा बीच बीच मे हाथ पोछने के लिए, देशी घी का दीपक, (चन्दन, केशर, कुम्कुम, अष्टगन्ध यह सभी तिलक के लिए))
विधि :
पूजन के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-सुथरे आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह करके बैठ जाएं। पूजन सामग्री अपने पास रख लें।
बायें हाथ मे जल लेकर, उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर, शरीर और पूजन सामग्री पर छिड़क लें या पुष्प से अपने को जल से छिडके।
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ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
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(निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए शिखा/चोटी को गांठ लगाये / स्पर्श करे)
ॐ चिद्रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते। तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥
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(अपने माथे पर कुंकुम या चन्दन का तिलक करें)
ॐ चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रं पापनाशनम्। आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥
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(अपने सीधे हाथ से आसन का कोना जल/कुम्कुम थोडा डाल दे) और कहे
ॐ पृथ्वी! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥
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संकल्प:- दाहिने हाथ मे जल ले।
मैं ........अमुक......... गोत्र मे जन्मा,................... यहाँ आपके पिता का नाम.......... ......... का पुत्र .............................यहाँ आपका नाम....................., निवासी.......................आपका पता............................ आज सभी देवी-देव्ताओं को साक्षी मानते हुए देवी तिलोत्त्मा अप्सरा की पुजा, गण्पति और गुरु जी की पुजा देवी तिलोत्त्मा अप्सरा के साक्षात दर्शन की अभिलाषा और प्रेमिका रुप मे प्राप्ति के लिए कर रहा हूँ जिससे देवी तिलोत्त्मा अप्सरा प्रसन्न होकर दर्शन दे और मेरी आज्ञा का पालन करती रहें साथ ही साथ मुझे प्रेम, धन धान्य और सुख प्रदान करें।
जल और सामग्री को छोड़ दे।
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गणपति का पूजन करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः। ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
गुरु पुजन कर लें कम से कम गुरु मंत्र की चार माला करें या जैसा आपके गुरु का आदेश हो।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणि नमोअस्तुते
ॐ श्री गायत्र्यै नमः। ॐ सिद्धि बुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।
ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः। ॐ वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।
ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः। ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।
ॐ भ्रं भैरवाय नमः का 21 बार जप कर ले।
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अब अप्सरा का ध्यान करें और सोचे की वो आपके सामने हैं।
दोनो हाथो को मिलाकर और फैलाकर कुछ नमाज पढने की तरफ बना लो। साथ ही साथ “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं तिलोत्त्मा अप्सरा आगच्छ आगच्छ स्वाहा” मंत्र का 21 बार उचारण करते हुए एक एक गुलाब थाली मे चढाते जाये। अब सोचो कि अप्सरा आ चुकी हैं।

हे सुन्दरी तुम तीनो लोकों को मोहने वाली हो तुम्हारी देह गोरे गोरे रंग के कारण अतयंत चमकती हुई हैं। तुम नें अनेको अनोखे अनोखे गहने पहने हुये और बहुत ही सुन्दर और अनोखे वस्त्र को पहना हुआ हैं। आप जैसी सुन्दरी अपने साधक की समस्त मनोकामना को पुरी करने मे जरा सी भी देरी नही करती। ऐसी विचित्र सुन्दरी तिलोत्तमा अप्सरा को मेरा कोटि कोटि प्रणाम।
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इन गुलाबो के सभी गन्ध से तिलक करे। और स्वयँ को भी तिलक कर लें।
ॐ अपूर्व सौन्दयायै, अप्सरायै सिद्धये नमः।
मोली/कलवा चढाये : वस्त्रम् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
गुलाब का इत्र चढाये : गन्धम समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
फिर चावल (बिना टुटे) : अक्षतान् समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
पुष्प : पुष्पाणि समर्पयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
अगरबत्ती : धूपम् आघ्रापयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
दीपक (देशी घी का) : दीपकं दर्शयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
मिठाई से पुजा करें।: नैवेद्यं निवेदयामि ॐ तिलोत्त्मा अप्सरायै नमः
फिर पुजा सामप्त होने पर सभी मिठाई को स्वयँ ही ग्रहण कर लें।
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पहले एक मीठा पान (पान, इलायची, लोंग, गुलाकन्द का) अप्सरा को अर्प्ति करे और स्वयँ खाये। इस मंत्र की स्फाटिक की माला से 21 माला जपे और ऐसा 11 दिन करनी हैं।
ॐ क्लीं तिलोत्त्मा अप्सरायै मम वश्मनाय क्लीं फट
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यहाँ देवी को मंत्र जप समर्पित कर दें। क्षमा याचना कर सकते हैं। जप के बाद मे यह माला को पुजा स्थान पर ही रख दें। मंत्र जाप के बाद आसन पर ही पाँच मिनट आराम करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात पर ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
ॐ श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः।
यदि कर सके तो पहले की भांति पुजन करें और अंत मे पुजन गुरु को समर्पित कर दे।
अंतिम दिन जब अप्सरा दर्शन दे तो फिर मिठाई इत्र आदि अर्पित करे और प्रसन्न होने पर अपने मन के अनुसार वचन लेने की कोशिश कर सकते हैं।
पुजा के अंत मे एक चम्मच जल आसन के नीचे जरुर डाल दें और आसन को प्रणाम कर ही उठें।
॥ हरि ॐ तत्सत ॥
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नियम जिनका पालन अधिक से अधिक इस साधना मे करना चाहिए वो सब नीचे लिखे हैं।
ब्रह्मचरी रहना परम जरुरी होता हैं अगर कुछ विचारना हैं तो केवल अपने ईष्‍ट का या ॐ नमः शिवाय या अप्सरा का ध्यान करें, आप सदैव यह सोचे कि वो सुन्दर सी अप्सरा आपके पास ही मौजुद हैं और आपको देख रही हैं। ऐसी अवस्था मे क्या शोभनीय हैं आप स्वयँ अन्दाजा लगा सकते हैं।
भोजन: मांस, शराब, अन्डा, नशे, तम्बाकू, तामसिक भोजन आदि सभी से ज्यादा से ज्यादा दुर रहना हैं। इनका प्रयोग मना ही हैं। केवल सात्विक भोजन ही करें क्योंकि यह काम भावना को भडकाने का काम करते हैं। मंत्र जप के समय कृपा करके नींद्, आलस्य, उबासी, छींक, थूकना, डरना, लिंग को हाथ लगाना, सेल फोन को पास रखना, जप को पहले दिन निधारित संख्या से कम-ज्यादा जपना, गा-गा कर जपना, धीमे-धीमे जपना, बहुत् ही ज्यादा तेज-तेज जपना, सिर हिलाते रहना, स्वयं हिलते रहना, मंत्र को भुल जाना (पहले से याद नहीं किया तो भुल जाना), हाथ-पैंर फैलाकर जप करना यह सब कार्य मना हैं। मेरा मतलब हैं कि बहुत ही गम्भीरता से मंत्र जप करना हैं। यदि आपको पैर बदलने की जरुरत हो तो माला पुरी होने के बाद ही पैरों को बदल सकते हैं या थोडा सा आराम कर सकते हैं लेकिन मंत्र जप बन्द ना करें।
यदि आपको सिद्धि चाहिए तो भगवन श्री शिव शंकर भगवान के कथन को कभी ना भुलना कि "जिस साधक की जिव्हा परान्न (दुसरे का भोजन खाना) से जल गयी हो, जिसका मन में परस्त्री (अपनी पत्नि के अलावा कोई भी) हो और जिसे किसी से प्रतिशोध लेना हो उसे भला केसै सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं"।
यदि उसे एक बार भी प्रेमिका की तरह प्रेम/पुजा किया तो आने मे कभी देरी नही करती है। साधना के समय वो एक देवी मात्र ही हैं और आप साधक हैं। इनसे सदैव आदर से बात करनी चाहिए। समस्त अप्सराएँ वाक सिद्ध होती हैं।
किसी भी साधना को सीधे ही करने नही बैठना चाहिए। उससे पहले आपको अपना कुछ अभ्यास करना चाहिए। मंत्रो का उचारण कैसे करना है यह भी जान लेना चाहिए और बार बार बोलकर अभ्यास कर लेना चाहिए।
ऐसा करने पर अप्सरा जरुर सिंद्ध होती हैं बाकी जो देवी कालिका की इच्छा क्योंकि होता वही हैं जो देवी जगत जननी चाहती हैं। साधना से किसी को नुकसान पहुँचाने पर साधना शक्ति स्वयँ ही समाप्त होने लगती हैं। इसलिए अपनी साधना की रक्षा करनी चाहिए। किसी को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरुरत नहीं हैं। यहाँ कोई किसी के काम नहीं आता हैं लेकिन फिर भी कभी कभार किसी ना किसी जो बहुत ही जरुरत मन्द हो की सहायता करी जा सकती हैं। वैसे यह साधना साधक का ही ज्यादा भला करने वाले हैं।
मैं तो इतना ही कहुगाँ कि इस साधना को नए साधक और ऐसे आदमी को जरुर करना चाहिए जो देवी देवता मे यकीन ना रखता हो। यदि ऐसे लोगों थोडा सा विश्वास करके भी इस साधना को करते हैं तो उन्हें कुछ ना कुछ अच्छे परिणाम जरुर मिलने चाहिए। यदि किसी को साधना करने मे कोई दिक्कत हो रही हैं तो हमसे भी सम्पर्क (ईमेल का पता सबसे उपर दिया गया हैं) किया जा सकता हैं। यदि पहली बार में साधना मे सिद्धि प्राप्त नहीं हो रही है तो आप सहायता के लिए ईमेल कर सकते हैं। देवी माँ आपको सभी सिद्धि प्रदान करें इस कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ।
राजगुरु जी
महाविद्या आश्रम
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६४ योगिनी - चौसठ योगिनी




मातृका शक्ति :- सीधा सा सम्बन्ध है इस शब्द का जिसमे प्रकृति या ऐसी शक्ति का बोध होता जो उत्पन्न करने और पालन करने का दायित्व निभाती है --- जिसने भी इस शक्ति की शरण में खुद को समर्पित कर दिया उसे फिर किसी प्रकार कि चिंता करने कि कोई आवश्यकता नहीं वह परमानन्द हो जाता है ---- चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता आदिशक्ति कि सहायक शक्तियों के रूप में चिन्हित कि जाती हैं जिनकी मदद से माता आद्या इस संसार का राज काज चलाती हैं एवं श्रष्टि के अंत काल में ये मातृका शक्तियां वापस माँ आद्या में पुनः विलीन हो जाती हैं और सिर्फ माँ आदिशक्ति ही बचती हैं फिर से पुनर्निर्माण के लिए !
बहुत बार देखने में आता है कि लोग वर्गीकरण करने लग जाते हैं और उसी वर्गीकरण के आधार पर साधकगण अन्य साधकों को हीन / हेय दृष्टि से देखने लग जाते हैं क्योंकि उनकी नजर में उनके द्वारा पूजित रूप को वे मूल या प्रधान समझते हैं और अन्य को द्वितीय भाव से देखते हैं --- जबकि ऐसा उचित नहीं है --- हर साधक का दुसरे साधक के लिए सम भाव होना चाहिए -- मैं भ्रात भाव तो नहीं कहूंगा यहाँ पर क्योंकि अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो आज के युग में सबसे ज्यादा वैमनस्य कि भावना भाइयों के मध्य ही विद्यमान है !
किन्तु नैतिक दृष्टिकोण और अध्यात्मिकता के आधार पर यदि देखा जाये तो न तो कोई उच्च है न कोई हीन --- हम आराधना करते हैं तो कोई अहसान नहीं करते यह सिर्फ अपनी मानसिक शांति और संतुष्टि के लिए और अगर कोई दूसरा करता है तो वह भी इसी उद्देश्य कि पूर्ती के लिए !
अब अगर हम अपने विषय पर आ जाएँ तो इस मृत्यु लोक में मातृ शक्ति के जितने भी रूप विदयमान हैं सब एक ही विराट महामाया आद्यशक्ति के अंग / भाग / रूप हैं --- साधकों को वे जिस रूप की साधना करते हैं उस रूप के लिए निर्धारित व्यवहार और गुणों के अनुरूप फल प्राप्त होता है।
चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता दुर्गा कि सहायक शक्तियां है जो समय समय पर माता दुर्गा कि सहायक शक्तियों के रूप में काम करती हैं
एवं दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मातृका शक्तियां तंत्र भाव एवं शक्तियों से परिपूरित हैं और मुख्यतः तंत्र ज्ञानियों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं !
प्रमुख मंदिर :- मंदिरों के हिसाब से देखा जाये तो चौसठ योगिनियों के २ प्रमुख मंदिर उड़ीसा राज्य में और २ प्रमुख मंदिर मध्य प्रदेश में अवस्थित हैं !
उड़ीसा :-
१. एक प्रमुख मंदिर उड़ीसा में नवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था जो खुर्दा डिस्ट्रिक्ट हीरापुर में भुवनेश्वर से १५ किलोमीटर कि दूरी पर स्थित है !
२. दूसरा चौंसठ योगिनी मंदिर ( रानीपुर झरिअल ) टिटिलागढ़ बलांगीर डिस्ट्रिक्ट में स्थित है लेकिन इस मंदिर में ६४ के बजाय अब ६२ मूर्तियां ही उपलब्ध हैं !
मध्य प्रदेश :-
१. नविन शताब्दी में ही निर्मित एक मंदिर मध्य प्रदेश के खजुराहो नामक स्थान पर है जो छतरपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है और यहाँ पहुँचने के लिए झाँसी से इलाहबाद वाली रेलवे लाइन से जाकर महोबा स्टेशन पर उतरने के बाद लगभग ६० किलोमीटर का सफ़र तय करने के बाद खजुराहो पहुंचा जा सकता है
२. दूसरा मंदिर मध्य प्रदेश में ही भेड़ाघाट नमक स्थल पर है जो कि मध्य प्रदेश के जबलपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है
अन्य :- स्थान स्थान पर इनके रूप और स्थित में भेद दृष्टिगत हो सकता है जैसे कि :-
१. हीरापुर में सभी योगिनियां अपने -२ वाहनों पर सवार हैं और खड़ी मुद्रा में हैं
२. रानीपुर झरिअल में सभी योगिनियां नृत्य मुद्रा में हैं
३. जबकि भेड़ाघाट में सभी मूर्तियां ललितासन में बैठी हुयी हैं
A. हीरापुर में जिन नामों या रूपों का अस्तित्व मिलता है वे इस प्रकार हैं :-
१. बहुरूपा
२. तारा
३. नर्मदा
४. यमुना
५. शांति
६. वारुणी
७. क्षेमकरी
८. ऐन्द्री
९. वाराही
१०. रणवीरा
११. वानरमुखी
१२. वैष्णवी
१३. कालरात्रि
१४. वैद्यरूपा
१५. चर्चिका
१६. बेताली
१७. छिनमास्तिका
१८. वृषभानना
१९. ज्वाला कामिनी
२०. घटवारा
२१. करकाली
२२. सरस्वती
२३. बिरूपा
२४. कौबेरी
२५. भालुका
२६. नारसिंही
२७. बिराजा
२८. विकटानन
२९. महालक्ष्मी
३०. कौमारी
३१. महामाया
३२. रति
३३. करकरी
३४. सर्पश्या
३५. यक्षिणी
३६. विनायकी
३७. विन्द्यावालिनी
३८. वीरकुमारी
३९. माहेश्वरी
४०. अम्बिका
४१. कामायनी
४२. घटाबारी
४३. स्तुति
४४. काली
४५. उमा
४६. नारायणी
४७. समुद्रा
४८. ब्राह्मी
४९. ज्वालामुखी
५०. आग्नेयी
५१. अदिति
५२. चन्द्रकांति
५३. वायुबेगा
५४. चामुंडा
५५. मूर्ति
५६. गंगा
५७. धूमावती
५८. गांधारी
५९. सर्व मंगला
६०. अजिता
६१. सूर्य पुत्री
६२. वायु वीणा
६३. अघोरा
६४. भद्रकाली
अब इसके बाद कहीं - कहीं पर एक भ्रम और पैदा होता है यदि प्राचीन ग्रंथों का अध्यन और आकलन किया जाये वो ये कि :- क्या योगिनियों कि संख्या चौसठ है या फिर इक्यासी किन्तु हम यहाँ पर सिर्फ सर्वमान्य संख्या चौंसठ को ही मानकर चल रहे हैं !
वैसे इसका एक सिद्धान्त ये है कि यदि हम ८ मातृका शक्तिया मानकर चलते हैं तो ये ८ सहायक सहकतियों के साथ मिश्रित होती हैं जिससे इनकी संख्या ८ गुना ८ = ६४ होती है किन्तु जब हम ९ मातृका शक्तियों के आधार पर गणना करते हैं तो इनकी संख्या ८१ हो जाती है - प्रत्येक मातृका शक्ति एक योगिनी के रूप में गणित होती है और अन्य ८ मातृका शक्तियों के साथ गुणित कि जाती है !
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चौंसठ योगिनी मंत्र :-







१. ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा
२. ॐ कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा
३. ॐ कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा 
४. ॐ कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा
५. ॐ विरोधिनी विलासिनी स्वाहा
६. ॐ विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा
७. ॐ उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा
८. ॐ उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा
९. ॐ दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा
१०. ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा
११. ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा
१२. ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा
१३. ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा
१४. ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा
१५. ॐ मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा
१६. ॐ महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा
१७. ॐ कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा
१८. ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा
१९. ॐ नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा
२०. ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा
२१. ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा
२२. ॐ महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा
२३. ॐ शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा
२४. ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा
२५. ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा
२६. ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा
२७. ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा
२८. ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा
२९. ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा
३०. ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा
३१. ॐ चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा
३२. ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा
३३. ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा
३४. ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा
३५. ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा
३६. ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा
३७. ॐ शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा
३८. ॐ हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा
३९. ॐ तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा
४०. ॐ षोडशी लतिका देवी स्वाहा
४१. ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा
४२. ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा
४३. ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा
४४. ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा
४५. ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा
४६. ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा
४७. ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा
४८. ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा
४९. ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा
५०. ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा
५१. ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा
५२. ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा
५३. ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा
५४. ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा
५५. ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा
५६. ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा
५७. ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा
५८. ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा
५९. ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा
६०. ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा
६१. ॐ वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा
६२. ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा
६३. ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा
६४. ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा
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Wednesday, February 10, 2016

फोटो सम्मोहन गोपनीय विधि








(प्रामाणिक लेख)

वशीकरण का तात्पर्य सम्मोहन क्रिया से है। प्राचीन ग्रंथों में सम्मोहन को ही वशीकरण कहा गया है जो कभी भी, किसी के लिए भी किया जा सकता है। पशु-पक्षी, जीव-जंतु, मनुष्य या देवी- देवता, सभी पर सम्मोहन क्रिया संपन्न किया जा सकता है। इसमें कोई भेद या अनुचित नहीं है। किसी को सम्मोहित या वशीकरण करना किसी प्रकार से गुनाह अथवा पाप नहीं है।
यह तो एक आवश्यकता है जिसे हर किसी को करना ही चाहिए। अतः ऐसे ज्ञान का उपयोग स्वस्थ मस्तिष्क से प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए और इस विज्ञान की क्षमता को परखनी चाहिए। किसी को भी अपने वशीभूत करने के लिए प्राचीन ग्रंथों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रयोग है परन्तु फोटो के माध्यम से सम्मोहन या वशीकरण हेतु एक गोपनीय और सरल विधि प्रस्तुत किया जा रहा है। जिस पुरुष या स्त्री, अधिकारी, नौकर, मालिक, प्रेमी या प्रेमिका या किसी को भी वश में करना हो तो उसकी एक तस्वीर अपने पास रखें तथा सिद्ध किया हुआ वशीकरण यन्त्र प्राप्त कर लें।
शुक्रवार की प्रातः 6 बजे या रात्रि को 12 बजे शांत-एकांत कमरे में सफ़ेद वस्त्र के आसन पर एकाग्रचित होकर बैठ जाय। सामने स्वच्छ वस्त्र पर फोटो और वशीकरण यन्त्र पास-पास रखें। कोई सुगन्धित अगरबती जला लें। अब यन्त्र को पूरी आत्मियता से देखते हुए मन में ऐसी धारणा बनाएं कि, आपकी आतंरिक उर्जा को यन्त्र के माध्यम से कोई आकर्षण शक्ति प्राप्त हो रही है जो किसी को भी सम्मोहित कर देने में क्षमतावान है। अब उस फोटो की दोनों आँखों के मध्य, जहाँ बिंदी या तिलक किया जाता है, वहां दृष्टि जमाते हुए निम्न मंत्र का 21 बार शुद्ध स्फटिक माला अथवा लाल चन्दन की माला से शुद्ध उच्चारण करें।
मंत्र- ॐ रं श्रृं अमुकं वश्यमानाय हुं।
(अमुकं के स्थान पर व्यक्ति का नाम लें)
उच्चारण पूर्ण होने के बाद यन्त्र को स्वच्छ वस्त्र में ही बांधकर किसी बहती नदी तालाब में विसर्जित करके बिना पीछे देखे वापिस आ जायं। अगले 36 घंटे के मध्य में आप अनुभव करेंगे कि, आपकी सफलता आपके निकट आने को लालायित है। यही नहीं, अनुभव में यह भी आयेगा कि, आपके सम्मोहन में वशीभूत अधिक से अधिक लोग आपके निकट आने को वेताब हैं। बातचीत करने को उतावले हैं। और जब वार्ता होती है तब आपकी हर बात वो मानने को विवश से हैं।
(नोट- गलत मानसिकता से इसका प्रयोग उलटा या अनुचित परिणाम भी दे सकता है)
यह एक प्रामाणिक प्रयोग है। इसका लाभ कई लोगों ने उठाया है। क्योंकि वशीकरण यंत्र स्वयं सिद्ध यन्त्र होता है, जिसके सम्मुख वशीकरण मंत्र का शुद्ध उच्चारण किया जाता है तो फोटो वाले व्यक्ति की मानसिक तरंगें प्रयोगकर्ता के इच्छा का पालन करने लगती है तथा शुद्ध विचार से किया गया प्रयोग यथा शीघ्र परिणाम प्रकट कर देता है। एक बार एक चाय के दुकानदार ने बार-बार भाग जाने वाले अपने नौकर को टिकाऊ बनाने के लिए यह प्रयोग किया तो नौकर अपने मालिक की हर बात प्यार से मानने लगा। बाद में वह नौकर इतना अच्छा सेवक निकला कि, मालिक ने ही उसका व्याह कराकर अपना पुत्र मान लिया।
यह वशीकरण यन्त्र के प्रभाव का ही कमाल था। वैसे भी सम्मोहन शरीर का ही विज्ञान है। यह तो दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध कर दिया है कि, मानव तन के अन्दर कोई ऐसी उर्जा तरंग है जो हर क्षण बाहर नकलती रहती है और वातावरण को प्रभावित करती रहती है। यदि उस तरंग को भारतीय पद्धति से और विकसित कर लिया जाय तो पूरी दुनिया में तहलका मचाया जा सकता है, इसमें कोई दो राय नहीं। अतः इस प्रकार के प्रयोग निःसंकोच करके हर किसी को सकारात्मक लाभ उठाना चाहिए। आपको इस प्रयोग में पूरी सफलता मिले, हमारी मंगल कामना है। (आवश्यक जानकारी हेतु फोन कर लें)
राजगुरु जी
महाविद्या आश्रम
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