Saturday, October 24, 2015

जादू-टोना फेल हो जाता है इस एक चमत्कारी पौधे से







तंत्र शास्त्र में अनेक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है जैसे- काली हल्दी, शंख, रत्न, बांदा, श्रीफल, एकाक्षी नारियल, कौड़ी आदि। इन सबका अलग-अलग महत्व व प्रयोग है। यह सब चमत्कारी वस्तुएं हैं।
ऐसा ही एक चमत्कारी पौधा है अफेद आक (आंकड़ा)। यह बहुत चमत्कारी पौधा है। यह सामान्य रूप से पाएं जाने वाले आक के पौधे से अलग होता है। इसका उपयोग की तांत्रिक क्रियाओं में किया जाता है। तांत्रिक प्रयोगों से बचने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। जिस घर में यह लगा होता है उस घर किसी भी प्रकार के तंत्र-मंत्र या जादू-टोने का असर नहीं होता है।
इस आक के पौधे से भी अधिक चमत्कारी है इससे निर्मित गणेश प्रतिमा। तंत्र शास्त्र में यह बताया गया है कि यदि सफेद आक से निर्मित गणेश प्रतिमा की विधिवत पूजा की जाए तो सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। यह गणेश प्रतिमा अद्भुत व चमत्कारी होता है। इसकी पूजा बहुत नियम और कायदों से करनी पड़ती है। नियम से पूजा ना होने पर इसका उचित लाभ नहीं मिल पाता है। इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आपके घर में किसी तरह के तंत्र-मंत्र का असर ना हो तो ये पौधा घर में जरुर लगाएं। इसके अलावा सफेद आक की जड़ को भी तंत्र में बहुत उपयोगी माना जाता है।
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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धन कमाने के सरल तंत्र-मंत्र







धन कमाने के लिए खास तांत्रिक प्रयोग प्रस्तुत है। इस प्रयोग को दीपावली के रात में किया जाता है। इस प्रयोग से किसी तरह की हानि नहीं होती। यह सभी साधारणजन के लिए असरकारी और आसान तांत्रिक प्रयोग है।
इस सरल तांत्रिक प्रयोग को पूर्ण पवित्रता से करने पर लाभ अवश्य मिलता है। लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। धन की वर्षा होती है। रूका पैसा तो मिलता ही है आय के नए-नए साधन भी जुटने लगते हैं। सबसे पहले पूरी शुद्धता से नीचे दिए गए मंत्र की पहले 108 बार माला करें।
महालक्ष्मी मंत्र -
'ॐ श्रीं ह्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नम:'
सरल वि‍धि :
* चांदी की एक छोटी-सी डिबिया लें। अगर चांदी की उपलब्ध नहीं हो तो किसी और शुद्ध धातु की डिबिया भी आप ले सकते हैं।
* इस डिबिया को आप ऊपर तक नागकेशर तथा शहद से भरकर बंद कर दें।
* दीपावली की रात्रि को इसका पूजन-अर्चन करके इसे अपने लॉकर या दुकान के गल्ले में रख दीजिए।
* रखने के बाद इसे खोलने की जरूरत नहीं है और ना ही और कुछ उपाय करने की।
* फिर अगली दीपावली तक इसे लॉकर या गल्ले में रखी रहने दें। दिनों दिन बढ़ती लक्ष्मी का चमत्कार आप स्वयं देखेंगे।
राज गुरु जी
महाविद्या आश्रम
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सेवक संजयनाथ काली न्यास की स्थापना - 1993








मंदिर की स्थापना के बाद मुझे यह एहसास हुआ की मेरे जीवन के पश्चात कही यह मंदिर ओर भूमि परिवारवाद के अधिपत्या मैं ना पड़ जाए. इस सोच के कारण मैने 5 फ़रवरी 1993 में सेवक संजयनाथ कालीन्यास नामक एक चारिटबल ट्रस्ट की स्थापना की. इस ट्रस्ट का मुख्य उदेश्य माँ काली का मंदिर, स्कूल,कॉलेज हॉस्पिटल,धर्मशाला,वृधया आश्रम, अनाथ आश्रम जैसे सामाजिक क्रायो को प्रोत्साहित करना है।
इस ट्रस्ट को सुराक्षित करने हेतु मैने 10 नियम रिजिस्टर करवाए।
1. इस ट्रस्ट का पीठाधीश आजीवन अविवाहित सन्यासी होगा और माँ काली का भक्त होना चाहिए. पीठाधीश ही इस ट्रस्ट के स्थाई ट्रस्टी होंगे
२ पीठाधीश ही अपने उत्तराधिकारी पीठाधीश का चयन करेंगे. किसी कारणवश अगर पीठाधीश किसी का चयन नही कर पाए तो ट्रस्ट के स्थाई सदस्य ही उत्तराधिकारी का चयन करेंगे।
3. पीठाधीश अगर किसी कारणवश विवाह कर लेते हैं तब स्वतः ही वह इस पद से मुक्त समझे जाएँगे ओर नये पीठाधीश का चुनाव स्थाई सदस्य के द्वारा होगा
4. इस ट्रस्ट में दो प्रकार के सदस्य होंगे. स्थाई ओर अस्थाई सदस्य
5. इस ट्रस्ट में सिर्फ़ 2 स्थाई सदस्य होंगे. एक पीठाधीश ओर दूसरा डॉक्टर विन्दा प्रसाद वर्मा के परिवार के कोई एक सदस्य होने चाहिए
6. इस ट्रस्ट की एक स्थाई कार्यकारिणी कमिटी होगी जिसमें एक अध्यक्ष, एक सचिव, एक कोषाध्यक्ष और अन्य सदस्य होंगे जिनका चुनाव हर दो वर्ष पर होगा . बीच में किसी प्रकार अस्थाई समिति के द्वारा किसी प्रकार की त्रुटि पाए जाने पर पीठाधीश और स्थाई सदस्यों के द्वारा कभी भी इस कमिटी को भंग किया जा सकता है और नये कमिटी का गठन किया जा सकता है।
7। इस ट्रस्ट की पूरी व्यवस्था और विकास की ज़िम्मेदारी अकेले पीठाधीश की होगी
8. इस ट्रस्ट के मंदिर और बाकी सामाजिक संस्थान से आने वाली पूरी आमदनी को ट्रस्ट के नाम पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया रक्सौल या फिर किसी दूसरे बैंक में ट्रस्ट के नाम पर जमा कराया जाएगा. इस अकाउंट को पीठाधीश एवं सेक्रेटरी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जाएगा।
9। इस ट्रस्ट की संपति को कोई भी किसी भी स्थिति में बेच और ट्रान्स्फर नही कर सकता. पीठाधीश को भी यह अधिकार नही होगा।
10. पीठाधीश को ट्रस्ट की अधिक संपति को किसी भी सरकारी या सामाजिक संस्थान में प्रयोग करने का अधिकार होगा. इस ट्रस्ट के सभी बहिखते एवं विपत्र पीठाधीश के अधीन होंगे
११ इस ट्रस्ट कमिटी और ट्रस्ट के ऑफीस के सभी निर्णय जॉइंट कमिटी पास करेगी.
क्या है तंत्र, मंत्र, यन्त्र,तांत्रिक, और तंत्र साधना...







यह पोस्ट मैं उन सभी लोगों के लिए लिख रहा हूँ जो तंत्र साधना ,तांत्रिक तथा वाम मार्गी के बारे में जानना चाहते है। यह पोस्ट उन लोगों के लिए भी है जिनके मन में तंत्र से जुडे कुछ संदेह हैं। तथा यह उन लोगों के लिए भी हैं जो हमारे हिंदू संस्कृति की सही खोज में लगे हैं।

यहाँ मैं बहुत ही सरल रूप में तंत्र, मंत्र, यन्त्र, तांत्रिक, तांत्रिक साधना,तांत्रिक क्रिया अथवा पञ्च मकार के बारे में संचिप्त में वर्णन करूँगा। तंत्र एक विज्ञानं है जो प्रयोग में विश्वास रखता है। इसे विस्तार में जानने के लिए एक सिद्ध गुरु की आवश्यकता है। अतः मैं यहाँ सिर्फ़ उसके सूक्ष्म रूप को ही दर्शा रहा हूँ।

पार्वतीजी ने महादेव शिव से प्रश्न किया की हे महादेव, कलयुग मे धर्म या मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग होगा?
उनके इस प्रश्न के उत्तर मे महादेव शिव ने उन्हे समझते हुए जो भी व्यक्त किया तंत्र उसी को कहते हैं।
योगिनी तंत्र मे वर्णन है की कलयुग मे वैदिक मंत्र विष हीन सर्प के सामान हो जाएगा। ऐसा कलयुग में शुद्ध और अशुद्ध के बीच में कोई भेद भावः न रह जाने की वजह से होगा। कलयुग में लोग वेद में बताये गए नियमो का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा। जो व्यक्ति वैदिक मंत्रो का कलयुग में उच्चारण करेगा उसकी व्यथा एक ऐसे प्यासे मनुष्य के सामान होगी जो गंगा नदी के समीप प्यासे होने पर कुआँ खोद कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश में अपना समय और उर्जा को व्यर्थ करता है। कलयुग में वैदिक मंत्रो का प्रभाव ना के बराबर रह जाएगा। और गृहस्त लोग जो वैसे ही बहुत कम नियमो को जानते हैं उनकी पूजा का फल उन्हे पूर्णतः नही मिल पायेगा। महादेव ने बताया की वैदिक मंत्रो का पूर्ण फल सतयुग, द्वापर तथा त्रेता युग में ही मिलेगा.
तब माँ पार्वती ने महादेव से पुछा की कलयुग में मनुष्य अपने पापों का नाश कैसे करेंगे? और जो फल उन्हे पूजा अर्चना से मिलता है वह उन्हे कैसे मिलेगा?
इस पर शिव जी ने कहा की कलयुग में तंत्र साधना ही सतयुग की वैदिक पूजा की तरह फल देगा। तंत्र में साधक को बंधन मुक्त कर दिया जाएगा। वह अपने तरीके से इश्वर को प्राप्त करने के लिए अनेको प्रकार के विज्ञानिक प्रयोग करेगा।
परन्तु ऐसा करने के लिए साधक के अन्दर इश्वर को पाने का नशा और प्रयोगों से कुछ प्राप्त करने की तीव्र इच्षा होनी चाहिए। तंत्र के प्रायोगिक क्रियाओं को करने के लिए एक तांत्रिक अथवा साधक को सही मंत्र, तंत्र और यन्त्र का ज्ञान जरुरी है।
मंत्र:
मंत्र एक सिद्धांत को कहते हैं। किसी भी आविष्कार को सफल बनाने के लिए एक सही मार्ग और सही नियमों की आवश्यकता होती है। मंत्र वही सिद्धांत है जो एक प्रयोग को सफल बनाने में तांत्रिक को मदद करता है। मंत्र द्वारा ही यह पता चलता है की कौन से तंत्र को किस यन्त्र में समिलित कर के लक्ष्य तक पंहुचा जा सकता है।
मंत्र के सिद्ध होने पर ही पूरा प्रयोग सफल होता है। जैसे क्रिंग ह्रंग स्वाहा एक सिद्ध मंत्र है।
मंत्र मन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। मंत्र में मन का अर्थ है मनन करना अथवा ध्यानस्त होना तथा त्र का अर्थ है रक्षा। इस प्रकार मंत्र का अर्थ है ऐसा मनन करना जो मनन करने वाले की रक्षा कर सके। अर्थात मन्त्र के उच्चारण या मनन से मनुष्य की रक्षा होती है।
तंत्र:
श्रृष्टि में इश्वर ने हरेक समस्या का समाधान स्वयम दिया हुआ है। ऐसी कोई बीमारी या परेशानी नही जिसका समाधान इश्वर ने इस धरती पर किसी न किसी रूप में न दिया हो। तंत्र श्रृष्टि में पाए गए रासायनिक या प्राकृतिक वस्तुओं के सही समाहार की कला को कहते हैं। इस समाहार से बनने वाली उस औषधि या वस्तु से प्राणियों का कल्याण होता है।
तंत्र तन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। जो वस्तु इस तन की रक्षा करे उसे ही तंत्र कहते हैं।
यन्त्र:
मंत्र और तंत्र को यदि सही से प्रयोग किया जाए तो वह प्राणियों के कष्ट दूर करने में सफल है। पर तंत्र के रसायनों को एक उचित पात्र को आवश्यकता होती है। ताकि साधारण मनुष्य उस पात्र को आसानी से अपने पास रख सके या उसका प्रयोग कर सके। इस पात्र या साधन को ही यन्त्र कहते हैं। एक ऐसा पात्र जो तंत्र और मन्त्र को अपने में समिलित कर के आसानी से प्राणियों के कष्ट दूर करे वही यन्त्र है। हवन कुंड को सबसे श्रेष्ठ यन्त्र मन गया है। आसन, तलिस्मान, ताबीज इत्यादि भी यंत्र माने जाते है। कई प्रकार को आकृति को भी यन्त्र मन गया है। जैसे श्री यन्त्र, काली यन्त्र, महा मृतुन्जय यन्त्र इत्यादि।
यन्त्र शब्द यं तथा त्र के मिलाप से बना है। यं को पुर्व में यम यानी काल कहा जाता था। इसलिए जो यम से हमारी रक्षा करे उसे ही यन्त्र कहा जाता है।
इसलिए एक सफल तांत्रिक साधक को मंत्र, तंत्र और यन्त्र का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। विज्ञानं के प्रयोगों जैसे ही यदि तीनो में से किसी की भी मात्रा या प्रकार ग़लत हुई तो सफलता नही मिलेगी।
राजगुरु जी
महाविद्या आश्रम
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तंत्र में बलि की प्रमुख्यता क्यों?






हिंदू धर्म में सिर्फ़ वाम मार्ग ही ऐसा मार्ग है जिसमें त्याग की बात कम कही गई है और बलि पर अधिक से अधिक ज़ोर दिया गया है। यहाँ मैं बलि और त्याग में जो एक महीन अन्तर है वह पहले व्यक्त करता हूँ।
त्याग का मतलब है किस को छोड़ देना परन्तु अगर मौका मिले तो फ़िर से त्याग की गई वस्तु वापस अपनाई जा सकती है। सनातन धर्म के अधिकतर संप्रदाय में त्याग को महत्त्व दिया गया है। परन्तु सिर्फ़ वाम मार्ग में बलि को प्राथमिकता दी गई है। बलि क्यों?? बलि का मतलब होता है किसी का अंत। इसलिए तंत्र में बलि की महत्वता है। क्योंकि बलि की गई वस्तु वापस नही आ सकती है। त्याग की गई वस्तु को वापस अपनाया जा सकता है पर बलि देने के बाद हम उस वस्तु को पहले के सामान कभी भी अपना नही सकते।
आम साधक बलि का सही भावार्थ नही समझ पाते हैं। बलि को हमेशा किसी प्राणी के अंत से ही देखा जाता है। परन्तु सही रूप में बलि तो हमें अपने अन्दर छिपे दोष और अवगुणों का देना चाहिए। वाम मार्ग में तथा तंत्र में एक सही साधक हमेशा अपने अवगुणों की ही बलि देता है। हमेशा भटके हुए साधक, जिन्हे तंत्र का पूरा ज्ञान नही है वह दुसरे जीवों की बलि दे कर समझते हैं की उन्होंने इश्वर को प्रसन्न कर दिया। पर माँ काली का कहना है की उन्हे साधक के अवगुणों की बलि चाहिए ना की मूक जीवों की।
त्यागी व्यक्ति को हमेशा यह भय रहता है की कही वह अपनी त्याग की गई वस्तु, आदत को वापस न अपना लें। इसलिए त्यागी संत या साधक पूरी तरह से निर्भय नही हो पाते हैं। परन्तु तांत्रिक साधक जब बलि दे देता है तो वह भयहीन हो जाता है। इसलिए वह बलि देने के बाद माँ के और समीप हो जाते है।
यदि एक उच्च कोटि का साधक बनना है तो बलि देने की आदत जरुरी है। बलि का मतलब यहाँ हिंसा से कभी भी नही है।
एक सफल साधक साधना में लीनं होने के लिए निम्न प्रकार की बलि देता है:
१> निजी मोह की बलि देता है।
२> निजी वासना की बलि देता है।
३> लज्जा की बलि देता है।
४> क्रोध की बलि देता है।
इसलिए त्याग से उत्तम बलि देना होता है। जो मनुष्य गृहस्थ आश्रम में है तथा सामान्य भक्ति करते हैं वह अपने जीवन में अगर कुछ हद तक मोह,वासना,ईष्या, और क्रोध की बलि दें तो वह इश्वर के समीप जा सकते है और उनका जीवन सफल होता है।
राजगुरु जी
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पञ्च मकार और तांत्रिक साधना का हमारे जीवन में महत्त्व....








युगों युगों से तंत्र साधना मानवता के उद्धार और कष्टों को दूर करने के लिए प्रकृति में उपलब्ध गुणों को खोज कर निकल लायी है। जैसा की हम सभी जानते हैं की इस श्रृष्टि में प्रकृति ने सभी प्रकार के कष्टों का निवारंड पहले से ही दे रखा है। प्राचीन काल में सन्यासी, ऋषि, मुनि और तांत्रिक इन्हे खोज निकालते थे। आधुनिक युग के वैज्ञानिको को ही पूर्व में तांत्रिक और ऋषि कहा गया था।

हमारे हिंदू धर्म में सभी चीजों की खोज बहुत पहले ही हो चुकी है। परन्तु जब आज वोही पुरानी चीजे आधुनिक वैज्ञानिक फ़िर से दुनिया को बता रहे हैं तो हमें आश्चर्य होता है। मैं यहाँ कुछ उदहारण देता हूँ।

आधुनिक युग का रेडियो जिसे हम कुछ वर्षो से जानते हैं , हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्राचीन काल से साधना और ध्यानमग्न मात्र होने से ही दूर बैठे मनुष्य से वार्तालाप हो जाता था। तांत्रिक साधना में एक तांत्रिक रेडियो के सामान ही सही समय पर सही किरणों के प्रभाव से दूर दूर बैठे लोगों के साथ जुड़ सकता है। इस प्रकार वह प्राणियों के कष्ट को दूर करता है। तंत्र साधन की वजह से तांत्रिक इन किरणों से ध्यान मग्न हो कर अपनी आन्तरिक शक्ति भी बढ़ता है।

तंत्र क्रिया सदेव ही प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलती है। यह पूरा संसार ही एक तांत्रिक क्रिया है। तांत्रिक क्रिया पञ्च मकार से मिल कर ही पूरी होती है। पञ्च मकार यानि तंत्र क्रिया के पाँच स्तम्भ।
मॉस,
मतस्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन तांत्रिक क्रिया के पञ्च मकार हैं। तथा बिना इन पञ्च मकार के सम्मिलन से श्रृष्टि में जीवन का सञ्चालन असंभव है।
मॉस: इस श्रृष्टि में प्राणी का जनम ही मॉस के लोथडे के रूप में हुआ है। ऐसा कोई भी प्राणी नही है जो पञ्च मकर के प्रथम " म" मॉस से वंचित रह कर जीवन यापन कर सके। मॉस के रूप में ही मनुष्य एवं जीवों की अपने माँ के गर्भ से उत्पत्ति हुई है। हर प्राणी किसी न किसी प्रकार मॉस का उपयोग अपने दैनिक क्रिया में करता है। चाहे वह भोजन में मॉस का लेना हो या फ़िर किसी को छूना, देखना या महसूस करना सभी में मॉस की प्राथमिकता है।
जब माँ के गर्भ में जीवन का विकास होता है तब उसका सबसे पहला वजूद मॉस के रूप में ही होता है। इस से सिद्ध होता है की जीवन की शुरुवात ही पञ्च मकार के प्रथम " म " से होती है।
मतस्य:
मतस्य का शाब्दिक अर्थ मछली से होता है। परन्तु तंत्र क्रिया में अथवा पञ्च मकार में मतस्य का मतलब चंचलता या गति से होता है। जिस प्रकार मछली अपने जीवनपर्यंत गतिमान रहती है और पानी के विपरीत दिशा में तैरते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है उसी प्रकार तंत्र साधना के अनुसार बिना गति के कोई भी जीव इस संसार में रह नही सकता। पञ्च मकार के मॉस गुण के प्राणी में आने के बाद मतस्य गुण का होना एक मॉस को गति प्रदान करता है। पञ्च मकार के दुसरे मकार " मतस्य" से ही संसार में जीवो को हमेशा आगे बढ़ने की इक्षा मिलती हैं । मतस्य गुण ही व्यक्ति को नए कार्यो के प्रति प्रगतिशील बनता है।
मुद्रा:
तंत्र में मुद्रा के दो रूप हैं।
१> मुद्रा यानी किसी प्रकार की क्रिया जो व्यक्त की जा सके। जैसे योनी मुद्रा, लिंग मुद्रा, ज्ञान मुद्रा।
२> मुद्रा का मतलब खाद्य पदार्थ से भी है। जैसे चावल के पिण्ड
पञ्च मकार के मॉस, मतस्य गुण धारण करने के बाद जीव में सही मुद्रा (क्रिया) के ज्ञान का होना अति आवश्यक है। और सही क्रिया को करने के लिए सही मुद्रा ( खाद्द्य पदार्थ ) की भी आवश्यकता है।
जब गर्भ में जीव गति प्राप्त कर लेता है तब वह अपने हाथ और पैर को अपने गर्दन के चारो और बाँध कर एक मुद्रा धारण करता है। जैसे ही वह अपनी माता द्वारा ग्रहण किया गया भोजन को अपना आहार बनाता है, उसके हाथ पैर में गति आ जाती है। यह पञ्च मकार के तीसरे " म " का श्रेष्ठ उदहारण है।
मदिरा :
तंत्र में मदिरा का अर्थ "नशा" है। आम मनुष्य मदिरा पीने वाले नशे को ही तंत्र से जोड़ते हैं। परन्तु सही मायने में पञ्च मकार में मदिरा रुपी नशे को किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होने वाली लगन को कहते हैं। इश्वर की भक्ति को प्राप्त करने का नशा ही तांत्रिक को कठिन से कठिन साधना पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। जीव को आगे बढ़ने के लिए स्वयं में मदिरा गुण को लाना अति आवश्यक है।
पञ्च मकार के यह चारों गुन जब साथ मिलते हैं तो वह जीव मॉस (शरीर ), मतस्य (गति),मुद्रा (क्रिया,आहार )और मदिरा (नशा) के आने के बाद अपने जीवन में कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
जब बालक अपने माँ के गर्भ में बड़ा हो रहा होता है तो वह समय उसके लिए बहुत कष्टकारी होता है। माँ के द्वारा ग्रहण किया गया भोजन उसकी कोमल त्वचा को चोट पहुचाता है। गति आने के बाद और माँ से आहार मिलने के बाद वह जीव स्वयं को इस कष्ट से निकलने के लिए इश्वर से प्राथना करता है। उसके अन्दर मदिरा गुण का प्रवेश होते ही वह अपने कष्ट को दूर करने के लिए इश्वर की प्रार्थना में ली
मैथुन:
मैथुन का अर्थ है "मथना " तंत्र में मैथुन का बहुत महत्त्व है। परन्तु इसे किस प्रकार अपने जीवन में अपनाना है वह जानना बहुत जरुरी है। अधिकतर लोगों को तंत्र के बारे में यह भ्रान्ति है की यहाँ तांत्रिक को मैथुन करने की छुट है। मैं यहाँ पञ्च मकार के इस पांचवे और बहुत ही महत्व्य्पूर्ण " म " के बारे में बताना चाहता हूँ।
तंत्र में यह कहा गया है की इस संसार में पाई जाने वाली हर वस्तु को यदि सही प्रकार से मथा जाए तो एक नई वस्तु का जनम होता है। जिसका उदहारण हमारे शाश्त्रो में समुन्द्र मंथन से दिया गया है। समुन्द्र मंथन के समय सागर के मंथन से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की जनम हुआ था जिसमे विष और अमृत की उल्लेख प्रमुख्य है।
गृहस्त जीवन में भी जब एक पुरूष अपनी स्त्री के साथ मैथुन करता है, अपने वीर्य को स्त्री के बीज के साथ मंथन करता है तो एक बालक के रूप में नए जीवन की निर्माण होता है। इसलिए मैथुन करने से तंत्र में कुछ नया निर्माण करने की बात कही गई है।
जब एक तांत्रिक मैथुन करता है तब वह स्वयं अपने शरीर (ब्र्ह्म/ शिव ) तथा अपनी आत्मा ( शक्ति / शिवा) का मंथन करता है। तथा उस मंथन को सही ढंग से करने के उपरांत ही इश्वर को पाने के नए नए रास्तो की निर्माण करता है।
राजगुरु जी
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Thursday, October 22, 2015

छुपी है मंत्रों में अलौकिक शक्तियां
मंत्र-तंत्र-यंत्र में असीम अलौकिक शक्तियां निहित है। इसके द्वारा नर से नारायण बना जा सकता है। आवश्यकता है सविधि साधना के साथ-साथ श्रध्दा एवं विश्वास की। अब प्रश्न उठता है कि मंत्र-तंत्र-यंत्र आखिर क्या है?
अभी हम मंत्रों के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। मंत्र शब्दों या वाक्यों का वह वर्ण समूह है, जिसके निरंतर मनन से विशेष शक्ति प्राप्त की जाती है। मंत्र शास्त्र हमारे दिव्य दृष्टि युक्त ऋषि महर्षियों की देन है। मंत्र का सीधा संबंध मानव के मन से ही है, मन की एकाग्रता एवं तन्मयता मंत्र सिध्दि की मंजिल तक पहुंचाती है। मन को एकाग्र करके किसी भी देवी-देवता की सिध्दि प्राप्त की जा सकती है। मन की चंचलता हमें सामान्य रूप से किसी भी क्षेत्र में या कार्य में सफलता नहीं दिलवा सकती है। जब हम अपने को भौतिक जगत में असफल पाते हैं तो मंत्रों के रहस्यात्मक आलौकिक देव जगत में कैसे सफल हो सकते हैं? यह एक विचारणीय प्रश्न है। आज का मानव पूर्वापेक्षा अधिक परेशान है। वह जटिल समस्याओं के भंवर में बुरी तरह फंस चुका है।
भटका हुआ मानव
उसे सही रास्ते में तलाश है। भटका हुआ मानव अपने आप में ही परेशान है। उचित क्या है, उसे और क्या करना है और क्या नहीं करना है वह स्वयं निश्चय नहीं कर पाता है। अविश्वास के गहन अंधकार में दिग्भ्रमित होकर चक्कर काट रहा है। आज का बुध्दिजीवी वर्ग तो और भी ज्यादा परेशान है। परेशानी का मूल कारण है अपने आप को एडजस्ट न कर पाना। उसकी दिली तमन्ना रहती है कि उसकी हर चाह पूरी हो। यह हकीकत है कि हर तमन्ना तो एक शहंशाह की भी पूरी नहीं होती। हम दैनिक जीवन में आने वाली बहुत-सी समस्याओं का समाधान एवं इच्छित पदार्थों की प्राप्ति मंत्र की साधना से प्राप्त कर सकते हैं।
कार्य कोई भी हो व्यक्ति विशेष के भाग्य के अनुसार ही पूरा होता है। उसी प्रकार मंत्र-यंत्र-तंत्र की साधना का फल भी भाग्य के अनुसार ही प्राप्त होता है किसी को कम किसी को ज्यादा। सोये हुए भाग्य को जागृत करने में भगवत आराधना, तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना, अति सहायक सिध्द होती है। मंत्र शास्त्र के अन्तर्गत विविध कार्यों के लिये विविध मंत्र मिलते हैं। मंत्र मानव के विभिन्न कार्यों के अनुसार निश्चित हैं।
मूल रूप से वैदिक, साबर एवं तांत्रिक मंत्र है। वैदिक एवं साबर ये दोनों मंत्र एक साथ नहीं जपे जाते। साबर मंत्र अपने आप में स्वयं सिध्द है। गुरु गोरखनाथ एवं भगवान दत्तात्रेय द्वारा कृत ये मंत्री अत्यंत ही चमत्कारिक एवं प्रभाविक हैं।
मंत्र शास्त्र के अनुसार किसी मंत्र विशेष का निरंतर मनन करना यानि जपना मंत्र सिध्दि का सुलभ मार्ग है। ग्रह जनित पीड़ा, दोष, अनिष्ठ निवारण, शत्रुओं पर विजय प्राप्ति हेतु भगवत आराधना एवं मंत्र साधना अत्यंत ही कारगर सिध्द होती है। मंत्र साधना के द्वारा आत्मिक शक्ति को जाग्रत करके घातक रोगों से भी मुक्ति पायी जा सकती है। मंत्र साधना के द्वारा हम अपने जीवन को सुखपन, शांतिमय साथ ही साथ आनंदमय बनाने में सफल हो सकते हैं।
अमूल्य निधि
मंत्र शास्त्र भारत की प्राचीन अमूल्य निधि है इस विद्या का प्रचार एवं प्रसार करना, सर्वहितकारी एवं इस लोक के सामान्य जन के लिये प्रस्तुत करना तथा शोध के द्वारा अनुभवों में सत्य पाये गये मंत्र तंत्र यंत्र की जानकारी देना, जिससे आज के जन लाभ प्राप्त कर सकें और अपना जीवन सहज रूप में व्यतीत कर सकें, यही मेरा उद्देश्य है। यंत्र-मंत्र-तंत्र के साधक का परम पिता परमेश्वर पर असीम विश्वास रहता है। वे अपने सारे कार्य प्रभु कृपा को सुपुर्द कर देते हैं प्रभु की इच्छा ही साधक की इच्छा होती है और साधक की इच्छी ही प्रभु की इच्छा होती है। साधक को कभी भी किसी प्रकार की कमी नहीं खटकती है। उसे अपार आंतरिक सुख की अनुभूति होती है, उसका सीधा संबंध इष्ट देवता से यानि जिस देवता के मंत्र का साधक है, बना रहता है। उच्चकोटि के साधकों को भूत, भविष्य तथा वर्तमान का भी ज्ञान रहता है, ऐसे चमत्कार हमको प्राय: सुनने एवं पढ़ने को मिलते रहते हैं। उच्च कोटि के साधक को, जो भाव से साधना करते हैं उन्हें प्रभु चाह के अतिरिक्त और कोई चाह नहीं रहती। जहां प्रभु ही मिल गये वहां कमी किस बात की।
राज गुरु जी
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महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि

  ।। महा प्रचंड काल भैरव साधना विधि ।। इस साधना से पूर्व गुरु दिक्षा, शरीर कीलन और आसन जाप अवश्य जपे और किसी भी हालत में जप पूर्ण होने से पह...